ثَلَاثَةُ الأُصُولِ وَأَدِلَّتُهَا
तीन मूल सिद्धान्त और उनके प्रमाण
لِلشَّيْخِ
مُحَمَّدٍ التَّمِيمِي رَحِمَهُ اللهُ
शैख़ मुहम्मद अत-तमीमी -अल्लाह की कृपा हो उनपर-
بِسْمِ اللهِ الرَّحمَنِ الرَّحِيمِ
तीन मूल सिद्धान्त और उनके प्रमाण
शैख़ मुहम्मद अत-तमीमी -अल्लाह की कृपा हो उनपर-
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान है
जान लो, अल्लाह आप पर दया करे, हमारे लिए चार बातों को सीखना ज़रूरी है।
पहली बात : ज्ञान, और इसका अर्थ है अल्लाह, उसके नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तथा इस्लाम धर्म को तर्कों और प्रमाणों के साथ जानना।
दूसरी बात: उस ज्ञान पर अमल करना।
तीसरी बात: उस ज्ञान की ओर दूसरे लोगों को बुलाना।
चौथी बात: इस राह में पेश आने वाले कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करना।
इसका प्रमाण: उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है: -अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं दयावान है-
﴿وَٱلۡعَصۡرِ1 إِنَّ ٱلۡإِنسَٰنَ لَفِي خُسۡرٍ2 إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَتَوَاصَوۡاْ بِٱلۡحَقِّ وَتَوَاصَوۡاْ بِٱلصَّبۡرِ3﴾
अस्र के समय की क़सम!
निःसंदेह इनसान घाटे में है।
सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए तथा सत्कर्म किए और एक-दूसरे को सत्य की ताकीद की और एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की। [सूरा अल-अस्र : 1-3]।
इमाम शाफ़िई -उनपर अल्लाह की कृपा हो- कहते हैं : "यदि अल्लाह तआला ने, अपनी सृष्टि पर तर्क के तौर पर यही एक सूरा उतार दिया होता और इसके सिवा कुछ न उतारता, तो भी यह सूरा काफ़ी होती।
और इमाम बुख़ारी - उन पर अल्लाह की कृपा हो - कहते हैंः "अध्याय : कहने और करने से पहले ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता। इसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿﴾فَٱعۡلَمۡ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَٱسۡتَغۡفِرۡ لِذَنۢبِكَ
(सूरा मुह़म्मदः 9)। अतः यहाँ कहने और करने से पहले ज्ञान से शुरुआत की गई है"।
आप यह भी जान लें -आप पर अल्लाह की कृपा हो- कि प्रत्येक मुसलमान पर, पुरुष हो या महिला, निम्नलिखित तीन बातों को जानना तथा उन पर अमल करना अनिवार्य है।
पहली बात : बेशक अल्लाह ही ने हमें पैदा किया है, उसी ने हमें जीविका प्रदान की है और उसने हमें यूँ ही बेकार नहीं छोड़ दिया, बल्कि हमारी ओर रसूल भेजा। अतः जो उनका आज्ञापालन करेगा वह स्वर्ग में जाएगा और जो अवज्ञा करेगा, वह नरक में प्रवेश करेगा।
इसका प्रमाण: उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है:
﴿إِنَّآ أَرۡسَلۡنَآ إِلَيۡكُمۡ رَسُولٗا شَٰهِدًا عَلَيۡكُمۡ كَمَآ أَرۡسَلۡنَآ إِلَىٰ فِرۡعَوۡنَ رَسُولٗا15 فَعَصَىٰ فِرۡعَوۡنُ ٱلرَّسُولَ فَأَخَذۡنَٰهُ أَخۡذٗا وَبِيلٗا16﴾
"निःसंदेह हमने तुम्हारी ओर एक रसूल भेजा, जो तुमपर गवाही देने वाला है, जिस प्रकार हमने फ़िरऔन की ओर एक रसूल भेजा।
चुनाँचे फ़िरऔन ने उस रसूल की अवज्ञा की, तो हमने उसकी बड़ी सख़्त पकड़ की"। [सूरा अल-मुज़्ज़म्मिल : 15-16]
दूसरी बात : यह है कि अल्लाह तआला को कदापि यह पसंद नहीं है कि उसकी इबादत (उपासना) में किसी अन्य को साझी बनाया जाए, यद्यपि वह कोई अल्लाह का निकटवर्ती फ़रिश्ता या अल्लाह की ओर से भेजा हुआ रसूल ही क्यों न हो। इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह कथन है :
﴿وَأَنَّ ٱلۡمَسَٰجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدۡعُواْ مَعَ ٱللَّهِ أَحَدٗا18﴾
"और यह कि मस्जिदें केवल अल्लाह के लिए हैं। अतः अल्लाह के साथ किसी को भी मत पुकारो"। [सूरत जिन्न: 18]
तीसरी बात : जिसने रसूल का अनुसरण किया तथा अल्लाह को एक स्वीकार कर लिया, उसके लिए यह कदापि वैध नहीं है कि अल्लाह एवं उसके रसूल के शत्रुओं से धार्मिक वैचारिक समानता और इसके आधार पर पनपने वाला मोह रखे, यद्यपि वे उसके अत्यंत निकटवर्ती ही क्यों न हों।
और इसकी दलील अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿لَّا تَجِدُ قَوۡمٗا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ يُوَآدُّونَ مَنۡ حَآدَّ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَلَوۡ كَانُوٓاْ ءَابَآءَهُمۡ أَوۡ أَبۡنَآءَهُمۡ أَوۡ إِخۡوَٰنَهُمۡ أَوۡ عَشِيرَتَهُمۡۚ أُوْلَٰٓئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ ٱلۡإِيمَٰنَ وَأَيَّدَهُم بِرُوحٖ مِّنۡهُۖ وَيُدۡخِلُهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَاۚ رَضِيَ ٱللَّهُ عَنۡهُمۡ وَرَضُواْ عَنۡهُۚ أُوْلَٰٓئِكَ حِزۡبُ ٱللَّهِۚ أَلَآ إِنَّ حِزۡبَ ٱللَّهِ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ22﴾
"आप उन लोगों को जो अल्लाह तथा अंतिम दिवस पर ईमान रखते हैं, ऐसा नहीं पाएँगे कि वे उन लोगों से प्यार और हार्दिक निकटता रखते हों, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया, चाहे वे उनके पिता या उनके पुत्र या उनके भाई या उनके परिजन हों। वही लोग हैं, जिनके दिलों में उसने ईमान लिख दिया है और अपने प्रकाशन और अपनी सहायता से उन्हें शक्ति प्रदान की है। तथा उन्हें ऐसी जन्नतों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे से नहरें बहती होंगी, वे उनके अंदर हमेशा रहेंगे। अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया तथा वे उससे प्रसन्न हो गए। ये लोग अल्लाह का दल हैं। सुन लो, निःसंदेह अल्लाह का दल ही सफल होने वाला है"। [सूरा अल-मुजादला : 22]
जान लो - अल्लाह आप को अपने आज्ञापालन की सामर्थ्य दे- कि इबराहीम अलैहिस्सलाम के धर्म हनीफीयत का अर्थ यह है कि आप केवल एक अल्लाह की इबादत करें, धर्म (उपासना) को उसके लिए विशुद्ध करते हुए। इसी का अल्लाह ने समस्त मनुष्यों को आदेश दिया है तथा इसी उद्देश्य हेतु उनकी रचना की है; जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿وَمَا خَلَقۡتُ ٱلۡجِنَّ وَٱلۡإِنسَ إِلَّا لِيَعۡبُدُونِ56﴾
"और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें"। [सूरा अल-ज़ारियात : 56] उपर्युक्त आयत में 'वे मेरी इबादत करें' का अर्थ है : वे मुझे एक मानें।
अल्लाह तआला ने जितने भी आदेश दिए हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण आदेश "तौहीद" (एकेश्वरवाद) का है, जिसका अर्थ है, केवल एक अल्लाह की उपासना करना।
तथा जिन चीज़ों से रोका है, उनमें सबसे भयानक चीज़ " शिर्क " (बहुदेववाद) है, जिससे अभिप्राय है, अल्लाह के साथ किसी और को भी पुकारना।
इसका प्रमाण: उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है:
﴿وَٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَلَا تُشۡرِكُواْ بِهِۦ شَيۡـٔٗا...﴾
"तथा अल्लाह की इबादत करो और किसी चीज़ को उसका साझी न बनाओ..." [सूरा अन-निसा : 36]
अतः यदि आपसे कहा जाए कि वह तीन मूल सिद्धांत क्या हैं, जिनके बारे में जानना हर इनसान पर अनिवार्य है?
तो आप कह देंः वे तीन सिद्धांत ये हैं कि बंदा अपने रब (स्रष्टा, सवामी, प्रबंधक), अपने धर्म तथा अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अच्छी तरह जाने।
[पहला सिद्धांत]
फिर जब आपसे पूछा जाए कि आपका रब (स्रष्टा, सवामी, प्रबंधक) कौन है?
तो आप कह दें : मेरा रब वह अल्लाह है, जो अपनी कृपा से मेरा तथा समस्त संसार वासियों का पालन-पोषण करता है l वही मेरा पूज्य है, उसके अतिरिक्त मेरा कोई अन्य पूज्य नहीं है । इसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह कथन है :
﴿ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ2﴾
"हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का रब है"। [सूरा अल-फ़ातिहा: 2] अल्लाह के अतिरिक्त सारी वस्तुएँ (आयत में प्रयुक्त शब्द) 'आलम (अर्थाथ: संसार)' में दाख़िल हैं और मैं भी उसी 'आलम' का एक भाग हूँ।
फिर जब आपसे पूछा जाए कि आपने अपने रब (स्रष्टा, सवामी, प्रबंधक) को कैसे जाना या पहचाना?
तो बता दीजिए कि उसकी निशानियों तथा उसकी पैदा की हुई वस्तुओं के द्वारा।
तथा उसकी निशानियों में से है: रात्रि, दिवस, सूर्य तथा चन्द्रमा।
और उसकी पैदा की हुई वस्तुओं में से: सातों आकाश, सातों ज़मीनें तथा उनमें और उनके बीच में मौजूद सारी वस्तुएँ।
इसका प्रमाण अल्लाह का यह फ़रमान है:
﴿وَمِنۡ ءَايَٰتِهِ ٱلَّيۡلُ وَٱلنَّهَارُ وَٱلشَّمۡسُ وَٱلۡقَمَرُۚ لَا تَسۡجُدُواْ لِلشَّمۡسِ وَلَا لِلۡقَمَرِ وَٱسۡجُدُواْۤ لِلَّهِۤ ٱلَّذِي خَلَقَهُنَّ إِن كُنتُمۡ إِيَّاهُ تَعۡبُدُونَ37﴾
"तथा उसकी निशानियों में से रात और दिन तथा सूरज और चाँद हैं। तुम न तो सूरज को सजदा करो और न चाँद को, और उस अल्लाह को सजदा करो, जिसने उन्हें पैदा किया है, यदि तुम उसी (अल्लाह) की इबादत करते हो। [सूरा फ़ुस्सिलत : 37]
एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٖ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِۖ يُغۡشِي ٱلَّيۡلَ ٱلنَّهَارَ يَطۡلُبُهُۥ حَثِيثٗا وَٱلشَّمۡسَ وَٱلۡقَمَرَ وَٱلنُّجُومَ مُسَخَّرَٰتِۭ بِأَمۡرِهِۦٓۗ أَلَا لَهُ ٱلۡخَلۡقُ وَٱلۡأَمۡرُۗ تَبَارَكَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ54﴾
"निःसंदेह तुम्हारा रब वह अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में बनाया। फिर अर्श (सिंहासन) के ऊपर बुलंद हुआ। वह रात से दिन को ढाँप देता है, जो उसके पीछे दौड़ता हुआ चला आता है। तथा सूर्य और चाँद और तारे (बनाए), इस हाल में कि वे उसके आदेश के अधीन किए हुए हैं। सुन लो! सृष्टि करना और आदेश देना उसी का काम है। बहुत बरकत वाला है अल्लाह, जो सारे संसारों का रब है"। [सूरा आराफ़ : 54].
और केवल रब ही पूज्य होने का हक़दार है। इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱعۡبُدُواْ رَبَّكُمُ ٱلَّذِي خَلَقَكُمۡ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ21 ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلۡأَرۡضَ فِرَٰشٗا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءٗ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَخۡرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزۡقٗا لَّكُمۡۖ فَلَا تَجۡعَلُواْ لِلَّهِ أَندَادٗا وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ22﴾
"ऐ लोगो! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ।
जिसने तुम्हारे लिए धरती को एक बिछौना तथा आकाश को एक छत बनाया और आकाश से कुछ पानी उतारा, फिर उससे कई प्रकार के फल तुम्हारी जीविका के लिए पैदा किए। अतः अल्लाह के लिए किसी प्रकार के साझी न बनाओ, जबकि तुम जानते हो"। [सूररा बक़रा : 21-22]
इब्ने कसीर - उन पर अल्लाह की कृपा हो - कहते हैंः "इन सारी चीज़ों का पैदा करने वाला ही इबादत (पूजा) का हक़दार है"।
उपासना एवं इबादत के सारे रूप, जिनका अल्लाह ने आदेश दिया है, जैसे- इसलाम, ईमान और एह़सान; और इबादत के कुछ रूप इस प्रकार भी हैंः दुआ, डर, आशा, भरोसा, रुचि, विस्मय, विनय, ज्ञान पर आधारित खौफ़, इनाबत (लौटना, झुकाव रखना), सहायता माँगना, शरण चाहना, फ़रियाद करना, बलि देना तथा मन्नत मानना आदि, और इन इबादतों के अलावा अन्य प्रकार भी, जिनका अल्लाह ने आदेश दिया है— ये सब के सब अल्लाह तआला के लिए हैं; और इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿وَأَنَّ ٱلۡمَسَٰجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدۡعُواْ مَعَ ٱللَّهِ أَحَدٗا18﴾
"और यह कि मस्जिदें केवल अल्लाह के लिए हैं। अतः अल्लाह के साथ किसी को भी मत पुकारो"। [सूरत जिन्न: 18]
अतः जिसने इनमें से कोई भी काम अल्लाह के सिवा किसी और के लिए किया, वह मुश्रिक अर्थात शिर्क करने वाला और काफ़िर है । इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह कथन है :
﴿وَمَن يَدۡعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ لَا بُرۡهَٰنَ لَهُۥ بِهِۦ فَإِنَّمَا حِسَابُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦٓۚ إِنَّهُۥ لَا يُفۡلِحُ ٱلۡكَٰفِرُونَ117﴾
"और जो (भी) अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को पुकारे, जिसका उसके पास कोई प्रमाण नहीं, तो उसका हिसाब केवल उसके रब के पास है। निःसंदेह काफ़िर लोग सफल नहीं होंगे"। [सूरा अल-मोमिनून : 117]
और एक हदीस में आया है:
"الدُّعَاءُ مُخُّ العِبَادَةِ".
"दुआ इबादत का सार है"।
इसका प्रमाण: उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है:
﴿وَقَالَ رَبُّكُمُ ٱدۡعُونِيٓ أَسۡتَجِبۡ لَكُمۡۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَسۡتَكۡبِرُونَ عَنۡ عِبَادَتِي سَيَدۡخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ60﴾
"तथा तुम्हारे रब ने कहा है : तुम मुझे पुकारो। मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा। निःसंदेह जो लोग मेरी इबादत से अहंकार करते हैं, वे शीघ्र ही अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे"। [सूरा गाफ़िर : 60]
'भय' के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿...فَلَا تَخَافُوهُمۡ وَخَافُونِ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ﴾
"अतः तुम उनसे न डरो और केवल मुझसे डरो, यदि तुम ईमान वाले हो"। [सूरा आल-ए-इमरान: 175].
'आशा' के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह ताआला का यह फ़रमान है:
﴿...فَمَن كَانَ يَرۡجُواْ لِقَآءَ رَبِّهِۦ فَلۡيَعۡمَلۡ عَمَلٗا صَٰلِحٗا وَلَا يُشۡرِكۡ بِعِبَادَةِ رَبِّهِۦٓ أَحَدَۢا﴾
"अतः जो कोई अपने रब से मिलने की आशा रखता हो, उसके लिए आवश्यक है कि वह अच्छे कर्म करे और अपने रब की इबादत में किसी को साझी न बनाए"। [सूरा अल-कह्फ़ : 110]।
'भरोसा' (तवक्कुल) के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿...وَعَلَى ٱللَّهِ فَتَوَكَّلُوٓاْ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ﴾
"तथा अल्लाह ही पर भरोसा (तवक्कुल) करो, यदि तुम ईमान वाले हो"। [सूरा अल-माइदा: 23] एक अन्य स्थान में उसका फरमान है :
﴿...وَمَن يَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱللَّهِ فَهُوَ حَسۡبُهُ...﴾
"तथा जो व्यक्ति अल्लाह पर भरोसा करे, वह उसके लिए पर्याप्त है"। [सूरा तलाक़: 3]
"रुचि, विस्मय और विनय के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿...إِنَّهُمۡ كَانُواْ يُسَٰرِعُونَ فِي ٱلۡخَيۡرَٰتِ وَيَدۡعُونَنَا رَغَبٗا وَرَهَبٗاۖ وَكَانُواْ لَنَا خَٰشِعِينَ﴾
"निःसंदेह वे नेकी के कामों में बहुत जल्दी करते थे और हमें रुचि तथा विस्मय के साथ पुकारते थे, और वे हमसे दीनतापूर्वक विनती करने वाले थे। [सूरा अल-अंबिया : 90].
'ज्ञान पर आधारित खौफ़' के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿...فَلَا تَخۡشَوۡهُمۡ وَٱخۡشَوۡنِ...﴾
"तो तुम उनसे विशेष प्रकार वाला भय न करो, यह विशेष भय केवल मुझसे करो"। [सूरा अल-माइदा : 3].
'इनाबत' (लौटना, झुकाव रखना) के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿وَأَنِيبُوٓاْ إِلَىٰ رَبِّكُمۡ وَأَسۡلِمُواْ لَهُ...﴾
"तथा अपने रब की ओर झुक पड़ो और उसके आज्ञाकारी हो जाओ..." [सूरा अज़-ज़ुमर : 54]
'सहायता माँगने' के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿إِيَّاكَ نَعۡبُدُ وَإِيَّاكَ نَسۡتَعِينُ5﴾
"(ऐ अल्लाह!) हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से सहायता माँगते हैं"। [सूरा फ़ातिहा: 5], और एक हदीस में आया है:
"إِذَا اسْتَعَنْتَ فَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ".
"जब तुम सहायता माँगो, तो केवल अल्लाह ही से माँगो"।
शरण माँगने के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلۡفَلَقِ1﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के रब की शरण लेता हूँ"। [सूरा फ़लक़ : 1], और
﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ1﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के रब की"। [सूरा अन्-नास: 1]
फ़रियाद के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿إِذۡ تَسۡتَغِيثُونَ رَبَّكُمۡ فَٱسۡتَجَابَ لَكُمۡ...﴾
"जब तुम अपने रब से मदद माँग रहे थे, तो उसने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली..." [सूरा अल-अनफ़ाल: 9]।
क़ुरबानी के इबादत होने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿قُلۡ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحۡيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ162 لَا شَرِيكَ لَهُ...﴾
"आप कह दें कि निश्चय मेरी नमाज़, मेरी क़ुरबानी तथा मेरा जीवन-मरण सारे संसारों के रब अल्लाह के लिए हैl
उसका कोई साझी नहीं..." [सूरा अनआम : 162-163] और हदीस में है:
"لَعَنَ اللَّهُ مَنْ ذَبَحَ لِغَيْرِ اللَّهِ".
"अल्लाह की धिक्कार हो एसे व्यक्ति पर जो अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए जानवर ज़बह करे"।
मन्नत के उपासना होने का प्रमाण, अल्लाह का यह फ़रमान है:
﴿يُوفُونَ بِٱلنَّذۡرِ وَيَخَافُونَ يَوۡمٗا كَانَ شَرُّهُۥ مُسۡتَطِيرٗا7﴾
"जो नज़्र (मन्नत) पूरी करते हैं और उस दिन से डरते हैं जिसकी आपदा चारों ओर फैली हुई होगी"। [सूरा इनसान : 7]
[दूसरा सिद्धांत]
इस्लाम धर्म को प्रमाण सहित जानना और इस्लाम का मतलब है, यह है: एकेश्वरवाद (तौह़ीद) के माध्यम से ईश्वर अल्लाह के प्रति समर्पण, उसकी आज्ञाकारिता को अपनाना उसके आदेशों का पालन करके, तथा अनेकेश्वरवाद (शिर्क) और मुश्रिकों का त्याग।
और इसकी तीन श्रेणियाँ हैं: इस्लाम, ईमान एवं एहसान।
तथा प्रत्येक श्रेणी के कुछ स्तंभ हैं।
इस्लाम के पाँच स्तंभ (अरकान) हैं: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और यह कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना, एवं अल्लाह के पवित्र घर (काबा शरीफ़) का हज करना।
'गवाही देने' का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿شَهِدَ ٱللَّهُ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ وَأُوْلُواْ ٱلۡعِلۡمِ قَآئِمَۢا بِٱلۡقِسۡطِۚ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ18﴾
अल्लाह ने गवाही दी कि निःसंदेह उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, तथा फ़रिश्तों और ज्ञान वालों ने भी, इस हाल में कि वह न्याय को क़ायम करने वाला है। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है। [सूरा आल-इमरान : 18]
इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं है।
यहाँ "ला इलाह" शब्द द्वारा, हर उस वस्तु को नकार दिया गया है, जिसकी अल्लाह के अतिरिक्त पूजा की जाती है।
إِلَّا اللَّهُ":इस बात को साबित करता है कि इबादत का हक़दार केवल अल्लाह ही है।
इबादत में उसका कोई साझी नहीं है, जिस तरह उसकी बादशाही में उसका कोई शरीक नहीं है।
इसकी व्याख्या अल्लाह तआला के इस फ़रमान से हो जाती है:
﴿وَإِذۡ قَالَ إِبۡرَٰهِيمُ لِأَبِيهِ وَقَوۡمِهِۦٓ إِنَّنِي بَرَآءٞ مِّمَّا تَعۡبُدُونَ26 إِلَّا ٱلَّذِي فَطَرَنِي..﴾
"तथा याद करो, जब इबराहीम ने अपने पिता तथा अपनी जाति से कहा : निःसंदेह मैं उन चीज़ों से बरी हूँ, जिनकी तुम इबादत करते हो।
सिवाय उसके जिसने मुझे पैदा किया"। [सूरा अज़-ज़ुख़रुफ़ : 26,27] अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿قُلۡ يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ تَعَالَوۡاْ إِلَىٰ كَلِمَةٖ سَوَآءِۭ بَيۡنَنَا وَبَيۡنَكُمۡ أَلَّا نَعۡبُدَ إِلَّا ٱللَّهَ وَلَا نُشۡرِكَ بِهِۦ شَيۡـٔٗا وَلَا يَتَّخِذَ بَعۡضُنَا بَعۡضًا أَرۡبَابٗا مِّن دُونِ ٱللَّهِۚ فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَقُولُواْ ٱشۡهَدُواْ بِأَنَّا مُسۡلِمُونَ64﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : ऐ किताब वालो! आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे बीच और तुम्हारे बीच समान (बराबर) है; यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें और उसके साथ किसी चीज़ को साझी न बनाएँ तथा हममें से कोई किसी को अल्लाह के सिवा रब न बनाए। फिर यदि वे मुँह फेर लें, तो कह दो कि तुम गवाह रहो कि हम (अल्लाह के) आज्ञाकारी हैं"। [सूरा आल-ए-इमरान : 64]
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने की गवाही देने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿لَقَدۡ جَآءَكُمۡ رَسُولٞ مِّنۡ أَنفُسِكُمۡ عَزِيزٌ عَلَيۡهِ مَا عَنِتُّمۡ حَرِيصٌ عَلَيۡكُم بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ رَءُوفٞ رَّحِيمٞ128﴾
"निःसंदेह तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल आया है। तुम्हारा कठिनाई में पड़ना उसपर बहुत कठिन है। वह तुम्हारे कल्याण के लिए अति उत्सुक है, ईमान वालों के प्रति बहुत करुणामय, अत्यंत दयावान है"। [सूरा -तौबा: 128]।
मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के अल्लाह के रसूल होने की गवाही देने का अर्थ यह है कि -आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जो आदेश दिया है उसका अनुपालन करना, जो सूचनाएँ दी हैं उनकी पुष्टि करना, जिन बातों से रोका है उनसे रुक जाना तथा अल्लाह की उपासना उसी तरीक़ा अनुसार करना जो आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने दर्शाया है।
तौह़ीद (एकेश्वरवाद) की व्याख्या, नामज़ और ज़कात का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿وَمَآ أُمِرُوٓاْ إِلَّا لِيَعۡبُدُواْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ حُنَفَآءَ وَيُقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُواْ ٱلزَّكَوٰةَۚ وَذَٰلِكَ دِينُ ٱلۡقَيِّمَةِ5﴾
"हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, एकाग्र होकर, उसकी उपासना करें, तथा नमाज़ अदा करें और ज़कात दें और यही सीधा धर्म है"। [सूरा अल-बय्यिना : 5]
रोज़े का प्रमाण अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ183﴾
"ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़ा रखना फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिया गया है, जैसे उन लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किया गया जो तुमसे पहले थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ"। [सूरा अल-बक़रा : 183]
हज का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿وَلِلَّهِ عَلَى ٱلنَّاسِ حِجُّ ٱلۡبَيۡتِ مَنِ ٱسۡتَطَاعَ إِلَيۡهِ سَبِيلٗاۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ ٱلۡعَٰلَمِينَ97﴾
"तथा अल्लाह के लिए लोगों पर इस घर का हज्ज अनिवार्य है, जो वहाँ तक पहुँचने का सामर्थ्य रखता हो, और जिसने इनकार किया तो निःसंदेह अल्लाह (उससे, बल्कि) समस्त संसार से निस्पृह (बेनियाज़) है"। [सूरह आल-ए-इमरान: 97]।
दूसरा मरतबा: ईमान; इसकी तिहत्तर से कुछ अधिक शाखाएँ हैं, जिनमें सबसे ऊँची शाखा 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहना है, और सबसे छोटी शाखा रास्ते से कष्टदायक वस्तु को हटाना है, तथा हया भी ईमान की एक (महान) शाखा है।
ईमान के छः स्तंभ (अरकान) हैं: अल्लाह पर ईमान, उसके फ़रिश्तों पर ईमान, उसकी किताबों पर ईमान, उसके रसूलों पर ईमान, आख़िरत (परलोक) के दिन पर ईमान, और भले-बुरे भाग्य पर ईमान।
इन छः स्तंभों का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿لَّيۡسَ ٱلۡبِرَّ أَن تُوَلُّواْ وُجُوهَكُمۡ قِبَلَ ٱلۡمَشۡرِقِ وَٱلۡمَغۡرِبِ وَلَٰكِنَّ ٱلۡبِرَّ مَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ وَٱلۡكِتَٰبِ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ...﴾
"नेकी केवल यही नहीं कि तुम अपने मुँह पूर्व और पश्चिम की ओर फेर लो! बल्कि असल नेकी तो उसकी है, जो अल्लाह और अंतिम दिन (आख़िरत) और फ़रिश्तों और पुस्तकों और नबियों पर ईमान लाए..." [सूरा अल-बक़रा : 177]
भाग्य (तक़दीर) पर ईमान लाने का प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿إِنَّا كُلَّ شَيۡءٍ خَلَقۡنَٰهُ بِقَدَرٖ49﴾
"निःसंदेह हमने प्रत्येक वस्तु को एक निर्धारित अनुमान के साथ पैदा किया है"। [सूरह अल-क़मर: 49]।
तीसरा दर्जा: एहसान — यह एक ही स्तंभ है — और उसका सारांश यह है कि आप अल्लाह की उपासना इस प्रकार करें कि मानो आप उस को देख रहे हैं, यदि यह कल्पना न उत्पन्न हो सके कि आप उसको देख रहे हैं तो (यह स्मरण रखें कि) वह आपको अवश्य देख रहा है।
इसका प्रमाण अल्लाह का यह फ़रमान है:
﴿إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَواْ وَّٱلَّذِينَ هُم مُّحۡسِنُونَ128﴾
"निःसंदेह अल्लाह उन लोगों के साथ है, जो उससे डरते हैं और जो उत्तम कार्य करने वाले हैं"। [सूरा अल-नह्ल: 128]।
उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿وَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱلۡعَزِيزِ ٱلرَّحِيمِ217 ٱلَّذِي يَرَىٰكَ حِينَ تَقُومُ218 وَتَقَلُّبَكَ فِي ٱلسَّٰجِدِينَ219﴾
"तथा उस सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान पर भरोसा कर।
जो तुझ को देखता है, जब आप खड़े होते हैं।
और सजदा करने वालों में आपके फिरने को भी"। [सूरा अश-शुअरा : 217-219]
उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿وَمَا تَكُونُ فِي شَأۡنٖ وَمَا تَتۡلُواْ مِنۡهُ مِن قُرۡءَانٖ وَلَا تَعۡمَلُونَ مِنۡ عَمَلٍ إِلَّا كُنَّا عَلَيۡكُمۡ شُهُودًا إِذۡ تُفِيضُونَ فِيهِ...﴾
"(ऐ नबी!) आप जिस दशा में भी होते हैं और क़ुरआन में से जो कुछ भी पढ़ते हैं, तथा (ऐ ईमान वालो!) तुम जो भी कर्म करते हो, हम तुम्हें देख रहे होते हैं, जब तुम उसमें लगे होतो हो..." [सूरा यूनुस : 61] पूरी आयत देखें।
जबकि सुन्नत से इसकी दलील, जिब्रील वाली मशहूर हदीस है। उमर रज़ियल्लाहु अनहु फ़रमाते हैं :
"بَيْنَمَا نَحْنُ عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ ذَاتَ يَوْمٍ، إِذْ طَلَعَ عَلَيْنَا رَجُلٌ، شَدِيدُ بَيَاضِ الثِّيَابِ، شَدِيدُ سَوَادِ الشَّعَرِ، لَا يُرَى عَلَيْهِ أَثَرُ السَّفَرِ، وَلَا يَعْرِفُهُ مِنَّا أَحَدٌ، حَتَّى جَلَسَ إِلَى النَّبِيِّ ﷺ فَأَسْنَدَ رُكْبَتَيْهِ إِلَى رُكْبَتَيْهِ، وَوَضَعَ كَفَّيْهِ عَلَى فَخِذَيْهِ، وَقَالَ: يَا مُحَمَّدُ !
"हम लोग एक दिन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास बैठे हुए थे कि अचानक एक व्यक्ति प्रकट हुआ। उसके वस्त्र अति सफ़ेद एवं बाल बहुत काले थे। उस पर यात्रा का कोई प्रभाव भी नहीं दिख रहा था और हममें से कोई उसे पहचान भी नहीं रहा था। वह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास बैठ गया, उसने अपने दोनों घुटने आपके घुटनों से मिला लिए और अपनी दोनों हथेलियाँ अपनी दोनों रानों पर रख लीं, और कहा: ऐ मुहम्मद!
أَخْبِرْنِي عَنِ الإِسْلَامِ؟
मुझे इस्लाम के बारे में बताइए।
فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: الإِسْلَامُ: أَنْ تَشْهَدَ أَلَّا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، وَتُقِيمَ الصَّلَاةَ، وَتُؤْتِيَ الزَّكَاةَ، وَتَصُومَ رَمَضَانَ، وَتَحُجَّ البَيْتَ إِنِ اسْتَطَعْتَ إِلَيْهِ سَبِيلًا، قَالَ: صَدَقْتَ - فَعَجِبْنَا لَهُ، يَسْأَلُهُ وَيُصَدِّقُهُ –.
तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः "इस्लाम यह है कि तुम इस बात की गवाही दो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करो, ज़कात दो, रमज़ान के रोज़े रखो, और सामर्थ्य हो तो अल्लाह के घर काबा का हज करो।" उसने कहा: "तुमने सच कहा" — तो हम उसके इस हाल पर अचंभित हुए कि वह उनसे पूछता भी है और उनकी तस्दीक भी करता है।
قَالَ: فَأَخْبِرْنِي عَنِ الْإِيمَانِ؟
उसने कहा : ''मुझे ईमान के बारे में बताइए?''
قَالَ: أَنْ تُؤْمِنَ بِاللَّهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكُتُبِهِ، وَرُسُلِهِ، وَاليَوْمِ الْآخِرِ، وَتُؤْمِنَ بِالقَدَرِ خَيْرِهِ وَشَرِّهِ، قَالَ: صَدَقْتَ.
उन्होंने कहा: ईमान यह है कि तुम अल्लाह, उसके फरिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, अंतिम दिन तथा भाग्य के अच्छे एवं बुरे होने पर ईमान लाओ। उन्होंने कहा: तुमने सच कहा।
قَالَ: فَأَخْبِرْنِي عَنِ الْإِحْسَانِ؟
उसने कहा : ''एहसान के संबंध में मुझे बताइए?''
قَالَ: أَنْ تَعْبُدَ اللَّهَ كَأَنَّكَ تَرَاهُ، فَإِنْ لَمْ تَكُنْ تَرَاهُ فَإِنَّهُ يَرَاكَ.
उन्होंने कहा: अल्लाह की उपासना इस तरह करो कि जैसे उसे सामने देख रहे हो। यदि यह कल्पना न उत्पन्न हो सके कि उसे देख रहे हो, तो (यह कल्पना करो कि) वह आपको अवश्य देख रहा है।
قَالَ: فَأَخْبِرْنِي عَنِ السَّاعَةِ؟
फिर पूछा : मुझे क़यामत के बारे में बताइए?
قَالَ: مَا المَسْؤُولُ عَنْهَا بِأَعْلَمَ مِنَ السَّائِلِ.
उन्होंने कहा: इसके विषय में जिस से पूछा गया, वह पूछने वाले से अधिक जानकार नहीं है।
قَالَ: فَأَخْبِرْنِي عَنْ أَمَارَاتِهَا؟
पूछा : फिर उसकी निशानियों के बारे में मुझे बताइए?
قَالَ: أَنْ تَلِدَ الأَمَةُ رَبَّتَهَا، وَأَنْ تَرَى الحُفَاةَ العُرَاةَ العَالَةَ رِعَاءَ الشَّاءِ، يَتَطَاوَلُونَ فِي البُنْيَانِ.
आपने कहाः कि दासी अपनी मालकिन को जन्म देगी, और तुम नंगे पाँव, नग्न, निर्धन भेड़-बकरियों के चरवाहों को ऊँची-ऊँची इमारतें बनाने में एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर होड़ करते देखोगे।
قَالَ: ثُمَّ انْطَلَقَ فَلَبِثْتُ مَلِيًّا، ثُمَّ قَالَ لِي: يَا عُمَرُ! أَتَدْرِي مَنِ السَّائِلُ؟ قُلْتُ: اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ، قَالَ: فَإِنَّهُ جِبْرِيلُ، أَتَاكُمْ يُعَلِّمُكُمْ دِينَكُمْ".
फिर वह व्यक्ति चला गया। जब कुछ क्षण बीत गए तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझसे कहा: "ऐ उमर! क्या तुम जानते हो कि यह सवाल करने वाला व्यक्ति कौन था?" मैंने कहा: अल्लाह और उसके रसूल ही भली-भाँति जानते हैं। आपने फ़रमाया: "यह जिबरील (अलैहिस्सलाम) थे, जो तुम्हें तुम्हारा धर्म सिखाने आए थे।
[तीसरा सिद्धांत]
अपने प्रिय नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को जानना: आपका शुभ नाम मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम है। हाशिम क़ुरैश से हैं, और क़ुरैश अरब से हैं, और अरब इसमाईल बिन इब्राहीम ख़लील के वंश से हैं -उनपर एवं हमारे नबी पर सर्वश्रेष्ठ दरूद व सलाम हो-.
आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने तिरसठ (63) साल की उम्र पाई, जिनमें से चालीस (40) साल नबी बनाए जाने से पहले के, तथा तेईस (23) साल नबी व रसूल के तौर पर।
“इक़रा” की वह़्य के ज़रिए नबी बनाए गए, और “अल-मुद्दस्सिर” की वह़्य के ज़रिए रसूल बनाए गए, और उनका नगर मक्का है।
अल्लाह तआला ने आपको इसलिए रसूल बनाकर भेजा, ताकि आप, लोगों को शिर्क (बहु-ईश्वरवाद) से डराएँ तथा तौहीद (एकेश्वरवाद) की तरफ़ दावत दें। इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلۡمُدَّثِّرُ1 قُمۡ فَأَنذِرۡ2 وَرَبَّكَ فَكَبِّرۡ3 وَثِيَابَكَ فَطَهِّرۡ4 وَٱلرُّجۡزَ فَٱهۡجُرۡ5 وَلَا تَمۡنُن تَسۡتَكۡثِرُ6 وَلِرَبِّكَ فَٱصۡبِرۡ7﴾
"ऐ कपड़े में लिपटने वाले!
खड़े हो जाओ, फिर सावधान करो।
तथा अपने रब ही की महिमा का वर्णन करो।
तथा अपने कपड़े को पवित्र रखो।
और गंदगी (बुतों) से दूर रहो।
तथा उपकार न जताओ (अपनी नेकियों को) अधिक समझ कर।
और अपने रब ही के लिए धैर्य से काम लो"। [सूरा अल-मुद्दस्सिर: 1-7].
और अर्थ
﴿قُمۡ فَأَنذِرۡ﴾
खड़े हो जाओ, फिर सावधान करो। शिर्क (बहु-ईश्वरवाद) से सावधान करता है और तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाता है।
﴿وَرَبَّكَ فَكَبِّرۡ﴾
"तथा अपने रब ही की महिमा का वर्णन करो"।
का अर्थ यह हैः तौहीद (एकेश्वरवाद) के द्वारा उसका सम्मान करो।
﴿وَثِيَابَكَ فَطَهِّرۡ﴾
"तथा अपने कपड़े को पवित्र रखो"।
अर्थात : अपने सभी कर्मों को शिर्क से पवित्र रखो।
﴿وَٱلرُّجۡزَ فَٱهۡجُرۡ﴾
"और गंदगी (बुतों) से दूर रहो"।
‘मलिनता’ का अर्थ है: मूर्तियाँ। और उनका त्याग: उन्हें छोड़ना तथा उनसे और उनकी पूजा करने वालों से अलग हो जाना।
आप 10 वर्ष तक लोगों को तौहीद की ओर बुलाते रहे। 10 वर्ष के बाद आपको आकाश पर ले जाया गया और पाँच नमाज़ें अनिवार्य की गईं। आपने तीन वर्ष मक्का में नमाज पढ़ी। उसके बाद मदीने की ओर हिजरत करने का आदेश मिला।
हिजरत का अर्थ है : शिर्क के देश को छोड़कर इस्लाम के देश की तरफ़ चले जाना।
शिर्क वाली भूमि से इस्लामी भूमि की ओर हिजरत करना मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की उम्मत पर फ़र्ज़ है, और यह हुक्म क़यामत तक बना रहेगा।
और इसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿ إِنَّ ٱلَّذِينَ تَوَفَّىٰهُمُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ ظَالِمِيٓ أَنفُسِهِمۡ قَالُواْ فِيمَ كُنتُمۡۖ قَالُواْ كُنَّا مُسۡتَضۡعَفِينَ فِي ٱلۡأَرۡضِۚ قَالُوٓاْ أَلَمۡ تَكُنۡ أَرۡضُ ٱللَّهِ وَٰسِعَةٗ فَتُهَاجِرُواْ فِيهَاۚ فَأُوْلَٰٓئِكَ مَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُۖ وَسَآءَتۡ مَصِيرًا97 إِلَّا ٱلۡمُسۡتَضۡعَفِينَ مِنَ ٱلرِّجَالِ وَٱلنِّسَآءِ وَٱلۡوِلۡدَٰنِ لَا يَسۡتَطِيعُونَ حِيلَةٗ وَلَا يَهۡتَدُونَ سَبِيلٗا98﴾
"निःसंदेह फ़रिश्ते जिन लोगों के प्राण इस हाल में निकालते हैं कि वे (कुफ़्र के देश से हिजरत न करके) अपने ऊपर अत्याचार करने वाले होते हैं, तो उनसे पूछते हैं कि तुम किस हाल में थे? वे कहते हैं : हम धरती में कमज़ोर थे। तब फ़रिश्ते कहते हैं : क्या अल्लाह की धरती विशाल न थी कि तुम उसमें हिजरत कर जाते? सो यही लोग हैं जिनका ठिकाना जहन्नम है और वह बहुत बुरा ठिकाना है!
सिवाय उन असहाय पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों के जो कोई उपाय नहीं कर सकते और न (वहाँ से निकलने का) कोई रास्ता पाते हैं"। [सूरह अन-निसा: 97-98]।
उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿يَٰعِبَادِيَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّ أَرۡضِي وَٰسِعَةٞ فَإِيَّٰيَ فَٱعۡبُدُونِ56﴾
"ऐ मेरे बंदो जो ईमान लाए हो! निःसंदेह मेरी धरती विशाल है। अतः तुम मेरी ही इबादत करो"। [सूरा अनकबूत : 56]
इमाम बग़वी -उन पर अल्लाह की कृपा हो- कहते हैं : यह आयत मक्का के उन मुसलमानों के बारे में अवतरित हुई है, जिन्होंने हिजरत नहीं की थी। अल्लाह ने उन्हें "ईमान वालों" के नाम से संबोधित किया है।
हदीस से हिजरत करने का प्रमाण, आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का यह फ़रमान है :
"لَا تَنْقَطِعُ الهِجْرَةُ حَتَّى تَنْقَطِعَ التَّوْبَةُ، وَلَا تَنْقَطِعُ التَّوْبَةُ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ مِنْ مَغْرِبِهَا".
"हिजरत उस समय तक ख़त्म नहीं होगी, जब तक तौबा का दरवाज़ा बंद नहीं होगा और तौबा का दरवाज़ा उस समय तक बंद नहीं होगा, जब तक सूर्य पश्चिम दिशा से उदय न हो जाए"।
जब आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मदीने में जम गए, तो इस्लाम के बाक़ी अहकाम (विधान) का हुक्म हुआ, जैसे- ज़कात, रोज़ा, हज, अज़ान, जिहाद (अर्थात धर्मयुद्ध), तथा भलाई का हुक्म और बुराई से रोकना। इन कामों में दस साल लगे।
फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का देहान्त हो गया। आपका लाया हुआ धर्म आज भी बाक़ी है और यही आपका धर्म है, जो क़यामत तक बाक़ी रहेगा। (हमारे प्यारे नबी ने) अपनी उम्मत को एक-एक भलाई की बात बताई और एक-एक बुराई वाली बात से सावधान कर दिया।
भलाई की बातें, तौहीद और वह सब कार्य हैं, जिनसे अल्लाह प्रसन्न और ख़ुश होता है।
बुराई वाली बातें, शिर्क और वह सब कार्य हैं, जिनको अल्लाह नापसन्द करता है।
आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अल्लाह तआला ने तमाम लोगों के लिए रसूल बनाकर भेजा है और आपका आज्ञापालन सारे जिन्नातों एवं इनसानों पर फ़र्ज़ है। इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنِّي رَسُولُ ٱللَّهِ إِلَيۡكُمۡ جَمِيعًا...﴾
"(ऐ नबी!) आप कह दें कि ऐ मानव जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ..." [सूरा अल-आराफ़: 158]
अल्लाह ने आपके द्वारा इस्लाम धर्म को संपूर्ण कर दिया; और दलील यह है कि अल्लाह तआला ने फरमाया :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗاۚ...﴾
"आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया"। [सूरा अल-माइदा : 3]
उनकी मृत्यु हो गई, इसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह फ़रमान है:
﴿إِنَّكَ مَيِّتٞ وَإِنَّهُم مَّيِّتُونَ30 ثُمَّ إِنَّكُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ عِندَ رَبِّكُمۡ تَخۡتَصِمُونَ31﴾
"(ऐ नबी!) निःसंदेह आप मरने वाले हैं तथा निःसंदेह वे भी मरने वाले हैंl
फिर निःसंदेह तुम क़ियामत के दिन अपने रब के पास झगड़ोगे"। [सूरा-ज़ुमर : 30-31]
सारे लोग क़यामत के दिन मरने के बाद दोबारा ज़िन्दा किए जाएँगे। जिसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿مِنۡهَا خَلَقۡنَٰكُمۡ وَفِيهَا نُعِيدُكُمۡ وَمِنۡهَا نُخۡرِجُكُمۡ تَارَةً أُخۡرَىٰ55﴾
"इसी से हमने तुम्हें पैदा किया और इसी में हम तुम्हें लौटाएँगे और इसी से हम तुम्हें एक बार फिर निकालेंगे"। [सूरा ताहा : 55] उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿وَٱللَّهُ أَنۢبَتَكُم مِّنَ ٱلۡأَرۡضِ نَبَاتٗا17 ثُمَّ يُعِيدُكُمۡ فِيهَا وَيُخۡرِجُكُمۡ إِخۡرَاجٗا18﴾
"और अल्लाह ही ने तुम्हें धरती से (विशेष ढंग से) उगाया।
फिर वह तुम्हें उसी में वापस ले जाएगा और तुम्हें (उसी से) निकालेगा"। [सूरा नूह : 17-18].
लोग जब (क़यामत के दिन) दोबारा ज़िन्दा किए जाएँगे, तो उनसे हिसाब लिया जाएगा और हर एक को उसके कर्म का बदला दिया जाएगा। इसकी दलील, अल्लाह का यह फ़रमान है :
﴿...لِيَجۡزِيَ ٱلَّذِينَ أَسَٰٓـُٔواْ بِمَا عَمِلُواْ وَيَجۡزِيَ ٱلَّذِينَ أَحۡسَنُواْ بِٱلۡحُسۡنَى﴾
"...ताकि वह बुराई करने वालों को उनके किए का बदला दे, और भलाई करने वालों को अच्छा बदला दे"। [सूरा अल-नज्म : 31]
जो व्यक्ति (क़यामत के दिन) ज़िन्दा करके उठाए जाने का इनकार करता है, वह काफ़िर (विधर्मी) है। इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿زَعَمَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ أَن لَّن يُبۡعَثُواْۚ قُلۡ بَلَىٰ وَرَبِّي لَتُبۡعَثُنَّ ثُمَّ لَتُنَبَّؤُنَّ بِمَا عَمِلۡتُمۡۚ وَذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ7﴾
"काफ़िरों ने समझ रखा है कि वे कदापि पुनर्जीवित नहीं किए जाएँगे। आप कह दें : क्यों नहीं? मेरे रब की क़सम! निश्चय तुम अवश्य पुनर्जीवित किए जाओगे। फिर निश्चय तुम्हें अवश्य बताया जाएगा कि तुमने (संसार में) क्या किया है तथा यह अल्लाह के लिए अति सरल है"। [सूरा तग़ाबुन: 7]
अल्लाह ने सारे रसूलों को शुभ संदेश देने वाला और सावधान करने वाला बनाकर भेजा। इसकी दलील, अल्लाह का यह फ़रमान है :
﴿رُّسُلٗا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةُۢ بَعۡدَ ٱلرُّسُلِۚ...﴾
"ऐसे रसूल जो शुभ सूचना सुनाने वाले और डराने वाले थे। ताकि लोगों के पास रसूलों के बाद अल्लाह के मुक़ाबले में कोई तर्क न रह जाए..."। [सूरा अन-निसा : 165].
सबसे पहले रसूल नूह अलैहिस्सलाम हैं।
और उनमें अंतिम नबी मुहम्मद - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - हैं; वे नबियों के सिलसिले की अंतिम कड़ी हैं, उनके बाद कोई नबी नहीं। और इसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह कथन है :
﴿مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَآ أَحَدٖ مِّن رِّجَالِكُمۡ وَلَٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ...﴾
"मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। बल्कि वह अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक हैं..." [सूरा अल-अहज़ाब :40]
नूह अलैहिस्सलाम सबसे पहले रसूल थे, इसका प्रमाण अल्लाह का यह फ़रमान है:
﴿إِنَّآ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ كَمَآ أَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ نُوحٖ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ مِنۢ بَعۡدِهِ...﴾
"(ऐ नबी!) निःसंदेह हमने आपकी ओर वह़्य भेजी, जैसे हमने नूह़ और उसके बाद (दूसरे) नबियों की ओर वह़्य भेजी..." [सूरा अन-निसा :163]
अल्लाह ने नूह (अलैहिस्सलाम) से लेकर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तक, जिस समुदाय के पास भी रसूल भेजा, रसूल उन्हें केवल अल्लाह की उपासना का आदेश देते रहे और तागूत (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य पूज्य) की उपासना से रोकते रहे। इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :
﴿وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَ...﴾
"और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो..." [सूरा अन-नह्ल : 36]
अल्लाह ने समस्त बंदों पर तागूत (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य पूज्यों) को नकारने तथा अल्लाह पर विश्वास करने को अनिवार्य किया है।
इब्ने क़ैइम - उन पर अल्लाह की कृपा हो - कहते हैंः "‘ताग़ूत’ का अर्थ है: हर वह चीज़ जिसकी इबादत करके या उसके पीछे लगकर अथवा उसकी बात मानकर, बन्दा अपनी हद (सीमा) से आगे बढ़ जाए"।
'ताग़ूत' बहुत सारे हैं, जिनमें पाँच प्रमुख हैं: 1- इब्लीस, उस पर अल्लाह की लानत हो, 2- वह व्यक्ति जिसकी उपासना की जाए और वह उससे प्रसन्न हो, 3- वह व्यक्ति जो लोगों को अपनी उपासना की ओर बुलाए, 4- वह व्यक्ति जो किसी प्रकार के ग़ैब (परोक्ष) जानने का दावा करे और 5- वह व्यक्ति जो अल्लाह के अवतरित किए हुए नियम के अनुसार फ़ैसला न करे।
इसका प्रमाण अल्लाह का यह फ़रमान है :
﴿لَآ إِكۡرَاهَ فِي ٱلدِّينِۖ قَد تَّبَيَّنَ ٱلرُّشۡدُ مِنَ ٱلۡغَيِّۚ فَمَن يَكۡفُرۡ بِٱلطَّٰغُوتِ وَيُؤۡمِنۢ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱسۡتَمۡسَكَ بِٱلۡعُرۡوَةِ ٱلۡوُثۡقَىٰ لَا ٱنفِصَامَ لَهَاۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ256﴾
"धर्म के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। निःसंदेह सन्मार्ग, पथभ्रष्टता से स्पष्ट हो चुका है। अतः जो कोई ताग़ूत (अल्लाह के सिवा अन्य पूज्यों) का इनकार करे और अल्लाह पर ईमान लाए, तो निश्चय उसने मज़बूत कड़े को थाम लिया, जिसे किसी भी तरह टूटना नहीं। तथा अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है"। [सूरा बक़रा : 256] यही "ला इलाहा इल्लल्लाह" का अर्थ है, और हदीस में है:
"رَأْسُ الأَمْرِ: الإِسْلَامُ، وَعَمُودُهُ: الصَّلَاةُ، وَذِرْوَةُ سَنَامِهِ: الجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ".
"सबसे महत्वपूर्ण वस्तु इस्लाम है, उसका स्तंभ नमाज़ है तथा उसकी चोटी अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना है"।
और अल्लाह ही बेहतर जानता है।
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सूची
[दूसरा सिद्धांत] 13
[तीसरा सिद्धांत] 22
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