महत्वपूर्ण पाठ उम्मत के सामान्य लोगों के लिए (हिन्दी)

शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ -रहिमहुल्लाह- की पुस्तक "उम्मत के सामान्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण पाठ" एक संक्षिप्त किंतु अत्यंत लाभदायक पुस्तिका है, जिसे इमाम ने आम मुसलमानों के लिए वैज्ञानिक (धार्मिक) पूँजी बनने के उद्देश्य से तैयार किया। इसमें उसूल-ए-दीन (इस्लाम के मूल सिद्धांतों) और उसके स्तंभों—तौहीद, ईमान और इस्लाम— से लेकर पवित्रता (तहारत) और नमाज़ के अहकाम (नियम), इस्लामी आचरण एवं शिष्टाचार, तथा शिर्क और गुनाह के खतरों का बयान, सब कुछ सरल और स्पष्ट शैली में, किताब व सुन्नत से प्रमाणित तौर पर, किया गया है, ताकि हर मुसलमान के लिए सही अक़ीदा और इबादत को सरल और सुलभ बना दिया जाए।

  • earth भाषा
    (हिन्दी)
  • earth लेखक:
    الشيخ عبد العزيز بن باز
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الدُّرُوسُ الْمُهِمَّةُ لِعَامَّةِ الْأُمَّةِ

 

 

महत्वपूर्ण पाठ उम्मत के सामान्य लोगों के लिए

 

 

لِسَمَاحَةِ الشَّيْخِ العَلَّامَةِ

عَبْدِ العَزِيزِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ بَازٍ

رَحِمَهُ اللهُ

 

ब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़
रह़िमहुल्लाह

 


अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बड़ा दयालु अत्यंत दयावान है

लेखक का प्राक्कथन

सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का रब है, तथा अच्छा परिणाम अल्लाह से डरने वालों के लिए है, एवं दुरूद व सलाम अवतरित हो उसके बंदे और रसूल, हमारे नबी मुहम्मद पर, तथा उनके परिवार वालों और उनके सभी साथियों पर।

इसके बाद मूल विषय पर आते हैं।

यह कुछ संक्षिप्त वाक्य हैं जो इस्लाम धर्म के बारे में आम जनता को अनिवार्य रूप से जानना चाहिए। मैंने इसे (महत्वपूर्ण पाठ सामान्य लोगों के लिए) का नाम दिया है।

अल्लाह से दुआ़ करता हूँ कि यह किताब मुसलमानों के हित में हो तथा अल्लाह तआला मेरे इस प्रयास को क़बूल करे। वह निस्संदेह बड़ा दानशील और तमाम गुणों में सर्वश्रेष्ठ है।

अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़

 


उम्मत के सामान्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण पाठ(1)

पहला पाठ : सूरा फातिहा एवं किसार -उस- सुवर (छोटी सूरतें)

सूरा फातिहा तथा सूरा ज़लज़ला से सूरा नास तक छोटी-छोटी जितनी सूरतें संभव हों उनको शुद्ध रूप से पढ़ना सिखाना, स्मरण करवाना एवं जिनको समझना आवश्यक है, उनकी व्याख्या करना।

दूसरा पाठ : इस्लाम के स्तंभ

इस्लाम के पाँच अरकान (स्तंभों) का विवरण, जिनमें सर्वप्रथम एवं महानतम है : यह गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तथा मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं। इसके अर्थों की व्याख्या (को जानने एवं मानने) के साथ, तथा ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की शर्तों की व्याख्या के साथ। ‘ला इलाहा’ का अर्थ है कि: (अल्लाह के सिवा) किसी की भी पूजा नहीं की जाएगी, और ‘इल्लल्लाह’ का अर्थ है कि केवल अल्लाह की ही पूजा की जाएगी, (जिसका कोई साझेदार नहीं है) ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की शर्तें हैं : अज्ञानता के विपरीत ज्ञान, संदेह के विपरीत विश्वास, शिर्क के विपरीत निष्ठा, झूठ के विपरीत सच्चाई, घृणा के विपरीत प्रेम, विरोध के विपरीत समर्पण, अस्वीकृति के विपरीत स्वीकृति, तथा अल्लाह के अतिरिक्त जिनकी पूजा की जाती है उनका इनकार। इन्हीं शर्तों को निम्नलिखित दो पंक्तियों में संकलित किया गया है :

ज्ञान, पूर्ण विश्वास, निष्ठा एवं सच्चाई... उस (गवाही) से प्रेम, उसकी अधीनता में रहने और उसे स्वीकार करने के साथ और आठवाँ यह है कि तू उन सभी चीज़ों का इनकार करे... जिन्हें अल्लाह के अतिरिक्त (लोगों ने) पूज्य बना लिया है

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के अल्लाह के रसूल होने की गवाही देने के साथ, तथा इसका तक़ाज़ा यह है: आपने जो सूचनाएँ दी हैं उनकी पुष्टि करना, आपने जो आदेश दिए हैं उनका पालन करना, जिन बातों से आपने मना किया है उनसे रुक जाना, तथा अल्लाह की इबादत केवल उसी ढंग से करना जो अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने निर्धारित किया है। तत्पश्चात छात्र को इस्लाम के शेष पाँच स्तंभों के बारे में बताया जाए, जो कि ये हैं : नमाज़, ज़कात, रमज़ान का रोज़ा, और जो सक्षम हो उसके लिए अल्लाह के पवित्र घर का ह़ज्ज करना।

तीसरा पाठ : ईमान के स्तंभ

ईमान के छः स्तंभ (अरकान) हैं: अल्लाह पर ईमान, उसके फ़रिश्तों पर ईमान, उसकी किताबों पर ईमान, उसके रसूलों पर ईमान, आख़िरत के दिन पर ईमान, और भले-बुरे भाग्य पर ईमान कि वे अल्लाह की ओर से होते हैं।

चौथा पाठ : तौहीद (एकेश्वरवाद) एवं शिर्क (बहुदेववाद) के प्रकार

तौहीद के प्रकारों का विवरण, और उसके तीन प्रकार हैं : तौहीद-ए-रुबूबिय्यत, तौहीद-ए-उलूहिय्यत तथा तौहीद-ए-असमा व सिफात।

1- तौह़ीद-ए-रुबूबिय्यत : यह इस बात पर ईमान लाना है कि अल्लाह हर वस्तु का स्रष्टा है और वही हर वस्तु को नियंत्रण करने वाला है एवं इन बातों में कोई उसका साझेदार नहीं।

2- तौहीद-ए-उलूहिय्य: इस बात पर ईमान लाना कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं और इस मामले में उसका कोई साझी नहीं है। यही 'ला इलाहा इल्लल्लाह' का अर्थ है, क्योंकि इसका अर्थ है कि निश्चित रूप से अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, अतएव नमाज़, रोज़ा आदि सारी इबादतों (उपासनाओं) को केवल अल्लाह के लिए खास करना है, किसी दूसरे के लिए उनमें से कुछ भी करना जायज नहीं।

3- तौहीद-ए-अस्मा व सिफ़ात : अल्लाह के उन सभी नामों तथा गुणों पर ईमान लाना, जो पवित्र क़ुरआन एवं सही हदीसों में उल्लिखित हैं तथा उन्हें अल्लाह के लिए उपयुक्त ढंग से साबित करना, इस तरह कि उसमें न कोई विकृति हो, न इनकार, न अवस्था बयान की जाए एवं ना ही उदाहरण दिया जाए, अल्लाह के इस आदेश के अनुसार :

﴿قُلۡ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ1 ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ2 لَمۡ يَلِدۡ وَلَمۡ يُولَدۡ 3 وَلَمۡ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدُۢ4﴾

"(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है। अल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न कोई उसका समकक्ष है।" [सूरा अल-इखलास : 1-4]

इसी तरह उसका कथन है :

﴿...لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ﴾

"उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।" [सूरा अश-शूरा : 11]

कुछ इस्लामी विद्वानों ने तौहीद की दो क़िस्में बताई हैं और तौहीद-ए-असमा व सिफ़ात को तौहीद-ए-रुबूबिय्यत के अंतर्गत माना है। इसमें कोई दोष भी नहीं है क्योंकि दोनों वर्गीकरणों से अस्ल उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है।

शिर्क के तीन प्रकार हैं : शिर्क-ए-अकबर (बड़ा शिर्क), शिर्क-ए-असग़र (छोटा शिर्क) तथा शिर्क-ए-ख़फ़ी(गुप्तप्राय शिर्क)।

शिर्क-ए-अकबर: मनुष्य के समस्त कर्मों को नष्ट कर देता है एवं इस शिर्क पर मरने वाला सदैव जहन्नम में रहेगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया :

﴿...وَلَوۡ أَشۡرَكُواْ لَحَبِطَ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ﴾

"...और यदि ये लोग शिर्क करते, तो निश्चय उनसे वह सब नष्ट हो जाता जो वे किया करते थे।" [सूरा अल-अनआम : 88]

एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :

﴿مَا كَانَ لِلۡمُشۡرِكِينَ أَن يَعۡمُرُواْ مَسَٰجِدَ ٱللَّهِ شَٰهِدِينَ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِم بِٱلۡكُفۡرِۚ أُوْلَٰٓئِكَ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡ وَفِي ٱلنَّارِ هُمۡ خَٰلِدُونَ17﴾

"मुश्रिकों (बहुदेववादियों) के लिए योग्य नहीं कि वे अल्लाह की मस्जिदों को आबाद करें, जबकि वे स्वयं अपने विरुद्ध कुफ़्र की गवाही देने वाले हैं। ये वही हैं जिनके कर्म व्यर्थ हो गए और वे आग ही में सदा के लिए रहने वाले हैं।" [सूरा अत्-तौबा : 17]

और अगर इसी हालत में उसका निधन हो जाए तो उसे क्षमादान नहीं मिलेगा तथा जन्नत उसके लिए हराम होगी जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया :

﴿إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغۡفِرُ أَن يُشۡرَكَ بِهِۦ وَيَغۡفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَآءُ...﴾

"निःसंदेह, अल्लाह यह क्षमा नहीं करेगा कि उसका साझी बनाया जाए और इसके सिवा जिसे चाहेगा, क्षमा कर देगा..." [सूरा अल-निसा : 48]

एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :

﴿...إِنَّهُۥ مَن يُشۡرِكۡ بِٱللَّهِ فَقَدۡ حَرَّمَ ٱللَّهُ عَلَيۡهِ ٱلۡجَنَّةَ وَمَأۡوَىٰهُ ٱلنَّارُۖ وَمَا لِلظَّٰلِمِينَ مِنۡ أَنصَارٖ﴾

"निःसंदेह सच्चाई यह है कि जो भी अल्लाह के साथ साझी बनाए, तो निश्चय उसपर अल्लाह ने जन्नत हराम (वर्जित) कर दी और उसका ठिकाना आग (जहन्नम) है। तथा अत्याचारियों के लिए कोई मदद करने वाला नहीं।" [सूरा अल-माइदा : 72]।

मरे हुए लोगों तथा मूर्तियों को पुकारना, उनसे सहायता मांगना, उनके लिए मन्नत मानना एवं उनके लिए जानवर ज़बह करना आदि शिर्क-ए-अकबर के अंतर्गत आते हैं।

शिर्क-ए-असग़र (छोटा शिर्क): हर वह कर्म है जिसको किताब व सुन्नत में शिर्क कहा गया हो, रंतु वह शिर्क-ए-अकबर (बड़ा शिर्क) ना हो जैसे रियाकारी यानी दिखावा, अल्लाह के सिवा किसी वस्तु की कसम खाना एवं 'जो अल्लाह चाहे एवं अमुक व्यक्ति चाहे' आदि कहना, क्योंकि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है :

«أَخْوَفُ مَا أَخَافُ عَلَيْكُمْ الشِّرْكَ الَأصْغَرَ» فَسُئِلَ عَنْهُ، فَقَالَ: «الرِّيَاءُ».

"सबसे अधिक जिस चीज़ का मुझे तुम लोगों पर भय है, वह है शिर्क -ए- अस़ग़र (छोटा शिर्क)।" आप से इसके बारे में पूछा गया, तो आप ने फ़रमाया : "रियाकारी (दिखावा)।"(2) इमाम अहमद, तबरानी तथा बैहक़ी ने महमूद बिन लबीद न्सारी -रज़ियल्लाहु न्हु- से 'जैयिद सनद' (वर्णनकर्ताओं के विश्वसनीय क्रम) के साथ इस हदीस का वर्णन किया है एवं तबरानी ने इसे कई 'जैयिद सनदों' से 'महमूद बिन लबीद के हवाले से, वह राफ़े बिन ख़दीज से और राफ़े ने, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़ (क्रम) से इसका वर्णन किया है।

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के अनुसार :

«مَنْ حَلَفَ بِشَيْءٍ دُونَ اللَّهِ فَقَدْ أَشْرَكَ».

''जो अल्लाह के सिवा किसी और वस्तु की क़सम खाता है, वह शिर्क करता है''(3) इस हदीस को इमाम अहमद ने स़ह़ीह़ सनद के साथ उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है। तथा इस ह़दीस़ को अबू दावूद ने एवं तिर्मिज़ी ने स़ह़ीह़ सनद के साथ इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से तथा उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत किया है, कि आप ने फ़रमाया :

«مَنْ حَلَفَ بِغَيْرِ اللَّهِ فَقَدْ كَفَرَ أَوْ أَشْرَكَ».

"जो अल्लाह के सिवा किसी और वस्तु की क़सम खाता है, वह कुफ़्र करता है या शिर्क करता है।"(4) तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के अनुसार :

«لَا تَقُولُوا: مَا شَاءَ اللَّهُ وَشَاءَ فُلانٌ، وَلَكِنْ قُولُوا: مَا شَاءَ اللَّهُ ثُمَّ شَاءَ فُلانٌ».

"'जो अल्लाह चाहे एवं अमुक चाहे' ना कहो, बल्कि 'जो अल्लाह चाहे फिर अमुक चाहे' कहो।"(5) इसे अबू दावू ने ह़ुज़ैफ़ा बिन यमान -रज़ियल्लाहु न्हु- से स़ह़ीह़ सनद के साथ रिवायत किया है।

परन्तु इस शिर्क से कोई मुरतद (धर्म छोड़ने वाला) नहीं होता एवं न ही कोई इसके कारण सदैव जहन्नम में रहेगा, पर यह तौहीद की अनिवार्य संपूर्णता के विपरीत है।

तीसरा प्रकार : छिपा हुआ शिर्क (शिर्क -ए- ख़फ़ी), और इसका प्रमाण नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का यह कथन है :

«أَلَا أُخْبِرُكُمْ بِمَا هُوَ أَخْوَفُ عَلَيْكُمْ عِنْدِي مِنَ المَسِيحِ الدَّجَّالِ؟» قَالُوا: بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ، قَالَ: «الشِّرْكُ الخَفِيُّ، يَقُومُ الرَّجُلُ فَيُصَلِّي فَيُزَيِّنُ صَلاتَهُ لِمَا يَرَى مِنْ نَظَرِ الرَّجُلِ إِلَيْهِ».

"क्या मैं तुम्हें वह बात न बता दूं जिसका मुझे तुम्हारे बारे में दज्जाल से भी अधिक भय है? सहाबा -रज़ियल्लाहु न्हु- ने कहा : अवश्य, हे अल्लाह के रसूल! आपने कहा : शिर्क-ए-ख़फ़ी, आदमी खड़ा होता है और नमाज़ पढ़ता है, जब वह देखता है कि कोई आदमी उसकी ओर देख रहा है तो वह और अच्छे ढंग से नमाज़ पढ़ने लगता है।"(6) इसको इमाम अहमद ने अपनी मुसनद में अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु न्हु- से रिवायत किया है।

वैसे, शिर्क को केवल दो भागों में भी विभक्त किया जा सकता है :

अकबर (बड़ा) एवं असग़र (छोटा) रही बात शिर्क-ए-ख़फ़ी (गुप्त शिर्क) की, तो यह दोनों को शामिल है। अकबर (बड़े शिर्क) में ख़फ़ी का उदाहरण है मुनाफ़िकों (जो केवल दिखावे के लिए इस्लाम का दावा करें) का शिर्क; क्योंकि वे अपनी गलत आस्था को छिपाते हैं एवं अपनी जान बचाने हेतु इस्लाम का दिखावा करते हैं।

यह शिर्क-ए-असग़र (छोटा शिर्क) में भी होता है, जैसे रियाकारी (दिखावा), जैसा कि उपर्युक्त मह्मूद बिन लबीद अल-अंसारी की हदीस और मज़कूर अबू सईद की हदीस में है। और अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है।

पाँचवाँ पाठ : एहसान

एहसान का स्तंभ, और वह यह है कि आप अल्लाह की उपासना इस प्रकार करें कि मानो आप उस को देख रहे हैं; यदि यह कल्पना न उत्पन्न हो सके कि आप उसको देख रहे हैं, तो (यह स्मरण रखें कि) वह आपको अवश्य देख रहा है।

छठा पाठ : नमाज़ की शर्तें

नमाज़ की नौ शर्तें हैं :

इस्लाम, अक़्ल, होश संभालने की आयु, हदस (अपवित्रता) को दूर करना, नजासत (गन्दगी) को साफ़ करना, गुप्तांग को छिपाना, समय का आ जाना, क़िबले के सम्मुख होना तथा नीयत करना।

सातवाँ पाठ : नमाज़ के अरकान (स्तंभ)

नमाज़ के अरकान (स्तंभ) चौदह हैं :

सक्षम होने पर खड़ा होना, तकबीर-ए-तहरीमा (नमाज की प्रथम तकबीर), सूरा फ़ातिहा पढ़ना, रुकू करना, रुकू के पश्चात सीधे खड़ा होना, सात अंगों पर सज्दा करना, सज्दे से उठना, दोनों सज्दों के बीच बैठना, उपरोक्त समस्त कर्मों में शांति एवं ठहराव, अरकान (स्तंभों) की अदायगी में क्रम, आख़िरी तशह्हुद, तथा उसके लिए बैठना, अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर दुरूद भेजना, एवं दोनों सलाम।

आठवाँ पाठ : नमाज़ के वाजिब (आवश्यक) कर्म

नमाज़ के वाजिब कर्म आठ हैं :

तकबीर-ए-तहरीमा के सिवा, सारी तकबीरें, इमाम तथा अकेले दोनों का سمع الله لمن حمده कहना, तथा सभी का ربنا ولك الحمد कहना, रुकू में سبحان ربي العظيم कहना, ज्दे में سبحان ربي الأعلى कहना, दोनों ज्दों के बीच رب اغفر لي कहना, प्रथम तशह्हुद, और उसके लिए बैठना।

नौवाँ पाठ : तशह्हुद का विवरण

तशह्हुद निम्नलिखित है :

हर प्रकार का सम्मान, समग्र दुआएँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। हे नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो। हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद (सत्य पूज्य) नहीं है, एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।

फिर अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर दुरूद भेजेगा एवं उन के लिए बरकत की दुआ़ करते हुए कहेगाः (अल्लाहुम्मा स़ल्लि अला मुह़म्मदिन व अला आलि मुह़म्मद, कमा स़ल्लैता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा, इन्नका हमीदुन् मजीद। व बारिक अला मुह़म्मदिन व अला आलि मुह़म्मद, कमा बारक्ता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा, इन्नका हमीदुन् मजीद, अर्थातः हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनके परिवार पर उसी प्रकार अपनी रहमत भेज, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनके परिवार पर अपनी रहमत भेजी थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनके परिवार पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनके परिवार पर की थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है)।

फिर आख़िरी तशह्हुद में जहन्नम की यातना, क़ब्र के अज़ाब, जीवन एवं मौत की आज़माइश एवं दज्जाल के फ़ितने से अल्लाह का आश्रय मांगेगा। फिर जो दुआ़ चाहेगा पढ़ेगा, विशेष रूप से कुरआन एवं हदीस से सिद्ध दुआ़एँ। जैसे :

ऐ अल्लाह! मुझे क्षमता दे कि मैं तेरा ज़िक्र करूँ, तेरा शुक्र करूँ एवं अच्छे ढंग से तेरी उपासना करूँ। ऐ अल्लाह! मैंने अपने आप पर बड़ा अत्याचार किया है और तेरे सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं कर सकता। इसलिए मुझे अपनी ओर से क्षमा प्रदान कर और मुझपर दया कर। निःसंदेह, तू ही क्षमा करने वाला, अति दयालु है।

ज़ुह्र, अस्र, मग़रिब तथा इशा में प्रथम तशह्हुद में 'शहादतैन' के पश्चात तीसरी रक्अत के लिए खड़ा हो जाएगा। परन्तु यदि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर दुरूद भेजता है तो यह अफ़ज़ल (उत्तम) है, क्योंकि इस बारे में हदीसों में आम बात आई है। फिर तीसरी रक्अत के लिए खड़ा होगा।

दसवाँ पाठ : नमाज़ की सुन्नतें

तथा उनमें से है :

1- इस्तिफ़्ताह़ (शुरूआती दुआ पढ़ना)।

2- रुकू से पहले और रुकू के बाद खड़े होने की अवस्था में दायीं हथेली को बायीं पर सीने के ऊपर रखना।

3- प्रथम तकबीर, रुकू में जाते समय, रुकू से उठते समय और प्रथम तशह्हुद से तीसरी रक्अ़त के लिए खड़ा होते समय, दोनों हाथों को कंधों के अथवा कानों के बराबर इस तरह बुलंद करना कि अंगुलियां मिली तथा खड़ी रहें।

4- रुकू एवं सज्दे में एक से अधिक बार तसबीह पढ़ना।

5- रुकू से उठने के बाद ربنا ولك الحمد से अधिक जो कहा जाए एवं दोनों सज्दों के दरमियान एक बार اللهم اغفرلي से अधिक जो कहा जाए।

6- रुकू करते समय सिर एवं पीठ को समानांतर रखना।

7- सज्दा करते समय बांहों को पहलुओं से तथा पेट को जांघों से एवं जांघों को टांगों से अलग रखना।

8- सज्दा करते समय, बाज़ुओं को ज़मीन से अलग रखना।

9- प्रथम तशह्हुद तथा दोनों सज्दों के बीच, बाएँ पैर को बिछाकर उसपर बैठना एवं दाएँ पैर को खड़ा रखना।

10- चार रक्अ़त एवं तीन रक्अ़त वाली नमाज़ों में अंतिम तशह्हुद में तवर्रुक (एक विशेष बैठक) करना, अर्थात: अपने चूतड़ पर बैठना, बाएँ पैर को दाएँ पैर के नीचे रखना एवं दाएँ पैर को खड़ा रखना।

11- प्रथम एवं दूसरे तशह्हुद में, बैठने के समय से अंत तक तर्जनी से इशारा करना एवं दुआ़ करते समय उसे हिलाते रहना।

12- प्रथम तशह्हुद में अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) एवं इब्राहीम -अ़लैहिस सलातु वस्सलाम- तथा उनके परिवार पर दुरूद भेजना एवं उनके लिए बरकत की दुआ़ करना।

13- अंतिम तशह्हुद में दुआ़ करना।

14- फ़ज्र, जुमा, दोनों ईदों, इस्तिसक़ा (वर्षा मांगने के लिए पढ़ी जाने वाली नमाज़) एवं मग़रिब तथा इशा की पहली दो रक्अ़तों में जहरी (बुलंद आवाज़ से) क़ुरआन पढ़ना।

15- ज़ुह्र, अस्र, मग़रिब की तीसरी रक्अ़त एवं इशा की आख़िर की दोनों रक्अ़तों में सिर्री (एकदम धीमी आवाज़ से) क़ुरआन पढ़ना।

16- फ़ातिहा के अतिरिक्त कुछ आयतें पढ़ना। इनके अलावा भी कुछ सुन्नतें हैं, जैसे वे दुआ़एँ जो इमाम, मुक़तदी (इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने वाला) एवं अकेला व्यक्ति रुकू से उठने के बाद ربنا ولك الحمد के अलावा पढ़ते हैं, एवं रुकू करते समय हाथों को घुटनों पर इस तरह रखना कि अंगुलियां खुली रहें। इन सभी सुन्नतों का ख़्याल रखा जाना चाहिए।

ग्यारहवाँ पाठ : नमाज़ को अमान्य करने वाली वस्तुएँ

नमाज़ को अमान्य करने वाली वस्तुएँ आठ हैं :

1- याद रहते हुए जान-बूझ कर बात करना, परन्तु यदि कोई अज्ञानतावश या भूल कर बात कर ले तो उसकी नमाज़ निष्फल नहीं होगी।

2- हँसना

3- खाना

4- पीना

5- गुप्तांग का खुल जाना

6- क़िबले की ओर से बहुत ज़्यादा फिर जाना

7- नमाज़ में बहुत ज्यादा लगातार बेकार की हरकतें करना

8- वुज़ू का टूटना

बारहवाँ पाठ : वुज़ू की शर्तें

वे दस हैं :

स्लाम, अक़्ल, होश संभालने की आयु, नीयत, वुज़ू सम्पूर्ण होने तक नीयत के हुक्म को जारी रखना, वुज़ू को वाजिब (आवश्यक) करने वाली वस्तुओं का ख़त्म होना, वुज़ू से पहले (शौच के पश्चात) जल अथवा पत्थर आदि का उपयोग करना, जल का पवित्र एवं जायज होना, जो वस्तु जल को चमड़े तक पहुँचने से रोके, उसे दूर करना एवं जिस (व्यक्ति) का ह़दस अर्थात नापाकी का स्राव लगातार हो, उसके लिए नमाज़ के समय का आ जाना।

तेरहवाँ पाठ : वुज़ू के आवश्यक कर्म

ये छह हैं :

चेहरे को धोना तथा इसी में कुल्ली करना और नाक में पानी लेकर झाड़ना शामिल है, दोनों हाथों को कोहनियों समेत धोना, पूरे सिर का मसह करना तथा इसी में कान भी शामिल है, दोनों पैरों को टखनों समेत धोना, क्रमबद्धता (तरतीब) एवं निरंतर करना (मुवालात)। चेहरे, हाथों और पैरों को तीन-तीन बार धोना पसंदीदा (मुस्तह़ब) है, इसी तरह कुल्ली करना एवं नाक में पानी लेकर झाड़ना भी। लेकिन इन सबमें फ़र्ज़ केवल एक बार करना है। जहां तक सिर का मसह करने का मामला है, तो उसे दोहराना पसंदीदा नहीं है, जैसा कि सहीह हदीसों से स्पष्ट होता है।

चौदहवाँ पाठ : वुज़ू को तोड़ने वाली वस्तुएँ

वे छह हैं :

आगे और पीछे वाले गुप्तांग से निकलने वाली वस्तु, शरीर से अधिक मात्रा में निकलने वाली नजासत (गंदगी), नींद आदि के कारण होश में ना रहना, बिना किसी आड़ के अपने आगे या पीछे वाले गुप्तांग को छूना, ऊँट का मांस खाना और इस्लाम को त्याग देना। अल्लाह तआ़ला हमें एवं सारे मुसलमानों को इससे बचाए।

महत्वपूर्ण चेतावनी: सही बात यह है कि मरे हुए व्यक्ति को स्नान देने से वुज़ू नहीं टूटता, क्योंकि इस बात की कोई दलील नहीं है। यही अधिकतर आलिमों की राय है। पर यदि मृतक के गुप्तांग पर बिना किसी आड़ के हाथ पड़ जाए तो वुज़ू टूट जाएगा और नमाज़ पढ़ने के लिए नया वुज़ू करना अनिवार्य होगा।

मृतक को स्नान देने वाले के लिए आवश्यक है कि वह बिना आड़ के उसके गुप्तांग को स्पर्श ना करे। इसी प्रकार, विद्वानों के दो मतों में से ज़्यादा सही मत के अनुसार, औरत को स्पर्श करने से भी वुज़ू नहीं टूटेगा, चाहे वासना सहित स्पर्श करे अथवा बिना वासना के, जबतक (स्पर्श करने वाले के गुप्तांग से) कुछ ना निकले, क्योंकि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बारे में आया है कि आपने अपनी किसी पत्नी का चुंबन लिया और वुज़ू किए बिना नमाज़ पढ़ ली।

रही बात सूरा अन-निसा एवं सूरा अल-माइदा की दो आयतों की, जिनमें है कि :

﴿...أَوۡ لَٰمَسۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ...﴾

"...या तुमने स्त्रियों से सहवास किया हो..." [सूरा अल-निसा : 43], [सूरा अल-माइदा : 6]

तो इस से आशय संभोग है, यही उलमा के दो दृष्टिकोणों में ज़्यादा सही दृष्टिकोण है और यही इब्ने अ़ब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- तथा सलफ़ अर्थात पहले के विद्वानों एवं ख़लफ़ (बाद में आने वाले विद्वानों) के एक समूह का मत है। अल्लाह तआ़ला ही सुयोग एवं क्षमता देने वाला है।

पंद्रहवाँ पाठ : प्रत्येक मुसलमान का सदाचारी होना

जैसे सच्चाई, ईमानदारी, पाकबाज़ी, लज्जा, वीरता, दानशीलता, वफ़ादारी, हर उस काम से दूर रहना जिसे अल्लाह ने हराम घोषित किया है और अच्छा पड़ोसी बनना, सामर्थ्य के अनुसार अभावग्रस्तों की सहायता करना आदि शिष्ट व्यवहार जो क़ुरआन एवं हदीसों से प्रमाणित हैं।

सोलहवाँ पाठ : इस्लामी शिष्टाचार धारण करना

कुछ स्लामी शिष्टाचार इस प्रकार हैं : सलाम करना, हँसमुख होना, दाएँ हाथ से खाना-पीना, 'बिस्मिल्लाह' कहकर खाना आरंभ करना एवं अंत में 'अल-ह़म्दु लिल्लाह' कहना, छींक आने के बाद 'अल-ह़म्दु लिल्लाह' कहना, छींकने वाले को जवाब देना, बीमार को देखने के लिए जाना, जनाज़े के लिए एवं दफ़नाने के लिए जाना, मस्जिद अथवा घर में प्रवेश करने एवं निकलने के धार्मिक आदाब, यात्रा के आदाब, माता-पिता, संबंधियों, पड़ोसियों, छोटों तथा बड़ों के संग च्छा व्यवहार करना, बच्चे के जन्म पर बधाई देना, शादी के समय बरकत की दुआ़ देना, मुसीबत (आपदा) के समय दिलासा देना एवं कपड़ा तथा जूता पहनने-उतारने के स्लामी आदाब आदि।

सत्रहवाँ पाठ : शिर्क एवं गुनाहों से सावधान करना

जैसे सात घातक (विनाशकारी) वस्तुएं जो इस प्रकार हैं: अल्लाह के साथ शिर्क करना, जादू, बिना हक़ के हत्या करना, सूद लेना, अनाथ का माल हड़पना, रणभूमि से फ़रार होना एवं मोमिन पाकदामन महिलाओं पर झूठा लांछन लगाना।

इसी प्रकार से माता-पिता का आज्ञाकारी ना होना, रिश्तों और नातों को तोड़ना, झूठी गवाही देना, झूठी कसम खाना, पड़ोसी को कष्ट देना, लोगों की जान, माल एवं उनके सम्मान पर आक्रमण करना, नशीले पदार्थों का सेवन करना, जु खेलना, गीबत एवं चुगली करना आदि जिन से अल्लाह तआ़ला एवं उसके रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम ने रोका है।

अठारहवाँ पाठ : मृतक के कफन और दफन का प्रबंध करना, उसके जनाज़े की नमाज़ पढ़ना एवं उसे दफ़नाना

नीचे इसका विवरण प्रस्तुत है :

1- मरणासन्न व्यक्ति को "ला इलाहा इल्लल्लाह" की तलक़ीन करना (कहने के लिए कहना) शरीअत में साबित है, क्योंकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का फ़रमान है :

«لَقِّنُوا مَوْتَاكُمْ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ».

"अपने मर रहे लोगों को "ला इलाहा इल्लल्लाह" पढ़ने के लिए प्रेरित करो।"(7) इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है। इस हदीस में (मर रहे लोगों) से मुराद ऐसे लोग हैं, जिनपर मौत के निशान ज़ाहिर हो चुके हों।

2- जब किसी की मृत्यु की पुष्टि हो जाए, तो उसकी आँखें बंद कर दी जाएं और उसके जबड़े कसकर बांध दिए जाएं, क्योंकि इस बारे में सुन्नत (हदीस) आई है।

3- मुस्लिम मृतक को ग़ुस्ल देना अनिवार्य है, सिवाय उस शहीद के जो युद्ध में मरा हो, क्योंकि उसे न तो ग़ुस्ल दिया जाता है और न ही उस पर जनाज़ा की नमाज़ पढ़ी जाती है, बल्कि उसे उसी के कपड़ों में दफ़न किया जाता है; इसलिए कि पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उह़ुद के युद्ध में शहीद होने वालों को न तो ग़ुस्ल दिया और न ही उन पर (जनाज़ा की) नमाज़ पढ़ी।

4- मृतक को स्नान कराने का तरीका

उसके गुप्तांग को ढक दिया जाए, फिर उसे थोड़ा ऊपर उठा कर उसके पेट को हल्के से दबाया जाए। इसके बाद, धोने वाला अपने हाथ पर कपड़ा या कुछ और लपेट कर उसके गुप्तांग को साफ करे। फिर उसे नमाज़ के वुज़ू की तरह वुज़ू कराए। इसके बाद, उसके सिर एवं दाढ़ी को पानी तथा बैर के पत्ते अथवा किसी और चीज़ से धोए। तत्पश्चात उसके दाहिने हिस्से को धोए, फिर बाएँ हिस्से को। इसी प्रकार से उसे दूसरी एवं तीसरी बार भी धोए, हर बार उसके पेट पर हाथ फेरे, यदि कुछ बाहर निकले तो उसे धोए तथा उस स्थान को रुई या किसी और चीज़ से बंद कर दे। यदि वह न रुके तो मिट्टी या आधुनिक चिकित्सा के साधनों जैसे चिपकने वाली पट्टी (टेप) आदि से बंद कर दे।

फिर उसका वुज़ू दोहराया जाए, तथा यदि तीन बार धोने से सफाई न हो तो पाँच या सात बार तक धोए, फिर उसे कपड़े से सुखाया जाए एवं उसकी बग़ल (काँख) और सज्दे के स्थानों पर इत्र लगाया जाए। यदि पूरे शरीर पर इत्र लगाया जाए तो अति उत्तम है, उसके कफ़न को बख़ूर से महकाया जाए। यदि उसकी मूंछें या नाखून लंबे हों तो उन्हें काट दिया जाए, किंतु यदि छोड़ दिया जाए तो भी कोई हर्ज (आपत्ति की बात) नहीं। उसके बालों में कंघी न की जाए, न ही उसके शष्प (जननेंद्रिय के बाल) हटाए जाएं, तथा न ही उसका ख़तना किया जाए, क्योंकि (क़ुरआन एवं ह़दीस़ में) इसके लिए कोई प्रमाण नहीं है। महिला के बालों को तीन चोटियों में गूंथा जाए और उन्हें उसकी पीठ के पीछे छोड़ दिया जाए।

5- मृतक को कफ़नाना

बेहतर यह है कि पुरुष को तीन सफ़ेद कपड़ों में कफ़नाया जाए, जिनमें ना कमीज हो ना पगड़ी, जैसा कि नबी (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) के साथ किया गया, लेकिन अगर कमीज, तहबंद एवं एक लपेटने वाले कपड़े में कफ़नाया जाए तो कोई हर्ज नहीं।

एवं महिला को पाँच कपड़ों में कफ़नाया जाएगा। कमीज, दुपट्टा, तहबंद तथा दो लपेटने वाले कपड़े। बच्चे को एक, दो अथवा तीन कपड़ों में एवं बच्ची को कमीज तथा दो लपेटने वाले कपड़ों में कफ़नाया जाएगा।

हाँ, पुरुष, महिला और बच्चे, सबके लिए वाजिब केवल एक कपड़ा है, जो समस्त शरीर को छिपा दे। परन्तु, मृतक यदि एहराम की अवस्था में हो तो उसे जल एवं बेरी के पत्तों से स्नान दिया जाएगा एवं एक तहबंद तथा एक चादर आदि में कफ़नाया जाएगा। ना उसका सिर ढाँका जाएगा और ना उसका चेहरा और ना ही उसे सुगंध लगाई जाएगी, क्योंकि क़यामत के दिन उसे लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक पुकारता हुआ पुनर्जीवित किया जाएगा, जैसा कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) की स़ह़ीह़ हदीस से साबित है। और एहराम की हालत में मरने वाली महिला को साधारण महिलाओं की तरह कफ़नाया जाएगा, मगर उसे सुगंध नहीं लगाई जाएगी एवं निक़ाब द्वारा उसका चेहरा नहीं ढाँका जाएगा एवं उसके हाथों को दस्ताने नहीं पहनाए जाएंगे। मगर उसका चेहरा तथा उसके हाथ कफ़न में लपेटे जाएंगे, जैसा कि इसका विवरण पहले दिया जा चुका है।

6- मृतक को स्नान देने, उसके जनाज़े की इमामत करने एवं उसे दफ़न करने का सबसे अधिक हक़दार कौन है?

इसका हक़दार सबसे पहले वह व्यक्ति होता है जिसके बारे में मृतक ने वसीयत की हो, फिर पिता, फिर दादा, फिर रिश्तेदारी में जो सबसे नज़दीकी 'अस्बा' (पुश्तैनी पुरुष संबंधी) हो, उसे यह हक़ प्राप्त होता है।

एवं महिला को स्नान देने का सबसे ज्यादा अधिकार उस महिला को प्राप्त है जिसके बारे में मृतका ने वसीयत की हो, फिर माता, फिर दादी, फिर जो जितनी निकटवर्ती महिला हो। पति-पत्नी के लिए यह जायज़ है कि एक-दूसरे को स्नान दें, क्योंकि अबू बक्र -रज़ियल्लाहु न्हु- को उनकी पत्नी ने नहलाया था एवं अ़ली -रज़ियल्लाहु न्हु- ने अपनी पत्नी फ़ातिमा -रज़ियल्लाहु न्ह- को स्नान दिया था।

7- जनाज़े की नमाज़ का तरीका

चार तकबीरें कहेगा। प्रथम तकबीर के बाद सूरा फ़ातिहा पढ़ेगा। यदि उसके साथ कोई छोटी सूरत अथवा एक आयत या दो आयतें पढ़ ले तो अच्छी बात है, क्योंकि इस संबंध में इब्ने अ़ब्बास -रज़ियल्लाहु न्हुमा- की हदीस मौजूद है। फिर दूसरी तकबीर कहे एवं अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) पर दुरूद भेजे, तशह्हुद की तरह, फिर तीसरी तकबीर कहे तथा यह दुआ़ पढ़ेः हे अल्लाह! हममें से जो जीवित हैं और जिनकी मृत्यु हो गई है, हममें से जो उपस्थित हैं और अनुपस्थित हैं, चाहे वे छोटे हों या बड़े, पुरुष हों या महिलाएँ, उन सबको क्षमा कर दे। हे अल्लाह! हममें से जिसे तू जीवित रखेगा, उसे स्ला पर जीवित रख, एवं जिसे मृत्यु देगा, उसे ईमान पर मृत्यु दे। हे अल्लाह! उसे क्षमा कर दे, उस पर कृपा कर, उसे समस्त आपदाओं से सुरक्षित रख, उसके पापों को मिटा दे, उसका अच्छा स्वागत-सत्कार करना, उसकी क़ब्र को विस्तारित कर दे, उसे जल, तुषार तथा ओले से स्नान करवा, उसे पापों से उसी प्रकार साफ़ कर दे जिस प्रकार सफ़ेद कपड़े को गंदगी से निर्मल किया जाता है, उसे पृथ्वी से उत्तम घर एवं उत्तम परिवार प्रदान कर, उसे जन्नत में प्रवेश करा तथा क़ब्र के दंड और आग के दंड से मुक्ति दे, उसकी क़ब्र को प्रशस्त एवं ज्योतिर्मय कर दे। हे अल्लाह! हमें उसके प्रतिफल से वंचित ना कर एवं उसके पश्चात पथभ्रष्ट मत कर। फिर चौथी तकबीर कहेगा एवं दाईं ओर एक सलाम कहेगा।

हर तकबीर के साथ हाथ उठाना मुस्तह़ब (वांछित) है, यदि मृतक महिला हो तो कहा जाए : "अल्लाहुम्मग़्फ़िर लहा..." अंत तक, और यदि जनाज़े दो हों तो कहा जाए : "अल्लाहुम्मग़्फ़िर लहुमा..." अंत तक, तथा यदि जनाज़े दो से अधिक हों तो कहा जाए : "अल्लाहुम्मग़्फ़िर लहुम..." अंत तक, किंतु मृतक यदि छोटा बच्चा (शिशु) हो, तो उसके लिए मग़फ़िरत की दुआ के स्थान पर यह दूसरी दुआ पढ़ी जाए : (हे अल्लाह! इसे इसके माता-पिता के लिए अग्रदूत एवं संग्रह बना दे, और एक स्वीकार्य सिफ़ारिशकर्ता बना दे। हे अल्लाह! इसके द्वारा उनके तराजू को भारी कर दे, और इसके द्वारा उनके पुण्य को बढ़ा दे, तथा इसे ईमान वाले सदाचारी पूर्वजों के साथ मिला दे। इसे इब्राहीम -अलैहिस्सलातु वस्सलाम- की कफ़ालत में रख, और अपनी दया से इसे जहन्नम के अज़ाब से बचा।)

सुन्नत यह है कि इमाम पुरुष के सिर के सामने और महिला के मध्य में खड़ा हो। यदि कई शव हों, तो पुरुष इमाम के निकट हो और महिला क़िबला की ओर। यदि उनके साथ बच्चे भी हों, तो लड़के को महिला से पहले रखा जाए, फिर महिला, फिर लड़की। लड़के का सिर पुरुष के सिर के सामने हो, तथा महिला का मध्य पुरुष के सिर के सामने हो, और इसी प्रकार लड़की का सिर महिला के सिर के सामने हो और उसका मध्य पुरुष के सिर के सामने हो। सभी नमाज़ी इमाम के पीछे खड़े हों, सिवाय इसके कि यदि कोई अकेला हो और उसे इमाम के पीछे स्थान न मिले, तो वह इमाम के दाहिनी ओर खड़ा हो।

8- मृतक को दफ़न करने का तरीका

मशरूअ (सुन्नत) यह है कि क़ब्र को मनुष्य की कमर तक गहरा किया जाए, तथा इसमें क़िबला की दिशा में लह़द (साइड चैम्बर) होना चाहिए। मृतक को लह़द में उसके दाहिने पहलू पर रखा जाए, और कफ़न की गांठें खोल दी जाएं, परंतु उन्हें हटाना नहीं चाहिए, बल्कि वैसे ही छोड़ दिया जाए, तथा उसका चेहरा नहीं खोला जाए चाहे मृतक पुरुष हो अथवा महिला, फिर उस पर ईंटें रखी जाएं एवं गारा से इसे सील कर दिया जाए ताकि वह स्थिर रहे तथा नीचे मिट्टी गिरने से बचाए। यदि ईंटें उपलब्ध नहीं हों, तो प्लाई, पत्थर, लकड़ी अथवा अन्य सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। फिर उसके ऊपर मिट्टी डाल दिया जाए, इस समय यह कहना मुस्तह़ब (वांछनीय) है : “बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह, अर्थात अल्लाह के नाम से तथा रसूल के ढ़ंग पर”, क़ब्र को एक बालिश्त (बित्ता) ऊँचा उठाया जाए, एवं यदि उपलब्ध हो उस पर कंकड़ डाल दिया जाए तथा उस पर पानी का छिड़काव किया जाए।

यह बात शरीअत (स्लामी विधान) के अंतर्गत है कि मृतक के साथ जाने वाले लोग क़ब्र के समीप खड़े हों तथा मृतक के लिए दुआ़ करें, क्योंकि नबी -सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम- दफ़न के पश्चात खड़े होते एवं कहते:

«اسْتَغْفِرُوا لِأَخِيكُمْ، وَاسْأَلُوا لَهُ التَّثْبِيتَ، فَإِنَّهُ الْآنَ يُسْأَلُ».

"तुम लोग अपने भाई के लिए क्षमा मांगो एवं दुआ़ करो कि वह प्रश्नों का उत्तर देने में समर्थ एवं अडिग रह सके, क्योंकि उससे अभी प्रश्न पूछे जाएंगे।"(8)

9- यदि किसी की जनाज़े की नमाज़ छूट गई हो तो वह दफ़न के बाद पढ़ सकता है।

क्योंकि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) ने ऐसा किया है। परन्तु शर्त यह है कि ऐसा एक मास के अंदर होना चाहिए। इससे अधिक विलंब हो तो यह नमाज़ पढ़ना सही नहीं होगा। क्योंकि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) से साबित नहीं है कि आपने दफ़न के एक महीना बाद किसी क़ब्र पर नमाज़ पढ़ी हो।

10- मृतक के परिवार के लिए जायज़ नहीं कि वे लोगों के लिए खाना बनाएँ। जरीर बिन अब्दुल्लाह बजली -रज़ियल्लाहु अन्हु- के इस कथन के कारण कि :

«كُنَّا نَعُدُّ الِاجْتِمَاعَ إِلَى أَهْلِ الْمَيِّتِ وَصَنْعَةَ الطَّعَامِ بَعْدَ الدَّفْنِ مِنَ النِّيَاحَة».

"हम मृतक के घर में एकत्र होने एवं उसे दफ़नाने के बाद खाना बनाने को मातम समझते थे।"(9) इमाम अहमद ने इसे हसन सनद के साथ रिवायत किया है।

रही बात मृतक के परिवार तथा उनके अतिथियों के लिए खाना बनाने की तो इसमें कोई हर्ज नहीं और उसके संबंधियों तथा पड़ोसियों का उनके लिए खाना बनाना शरीत के अंतर्गत है। क्योंकि जब सीरिया में जाफ़र बिन अबू तालिब -रज़ियल्लाहु अन्हु- की मृत्यु हुई तो अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) ने अपने परिवार को आदेश दिया कि वे जाफ़र -रज़ियल्लाहु न्हु- के परिवार के लिए खाना बनाएँ, एवं फ़रमाया :

«إِنَّهُ أَتَاهُمْ مَا يَشْغَلُهُمْ».

"उनपर ऐसी मुसीबत आई हुई है कि उनको किसी और काम के करने का होश भी नहीं है।"(10)

मृतक के परिवार वालों पर कोई बाधा नहीं कि वे अपने पड़ोसियों आदि को उस खाने पर बुलाएँ जो उन्हें भेजा गया हो, एवं हमारी जानकारी के अनुसार, शरी में इस का कोई नियत समय नहीं है।

11- किसी भी महिला के लिए किसी मृतक पर तीन दिनों से अधिक शोक मनाना जायज़ नहीं, सिवाय अपने पति के

क्योंकि पत्नी पर अपने पति के लिए चार महीने और दस दिन तक शोक मनाना वाजिब है, किंतु यदि वह गर्भवती हो, तो उसे बच्चे के जन्म तक शोक मनाना होगा, क्योंकि ऐसा करना नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की स़ह़ीह़ हदीस से साबित है।

लेकिन पुरुष के लिए किसी भी करीबी या दूरस्थ रिश्तेदार का शोक मनाना सिरे से जायज नहीं है।

12- शरी के अनुसार, पुरुष कुछ समयांतराल पर क़ब्रों की ज़ियारत (दर्शन) के लिए जा सकते हैं ताकि उन के लिए अल्लाह की कृपा की दुआ़ करें एवं मृत्यु तथा उस के पश्चात की बातों को स्मरण करें।

क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है :

«زُورُوا الْقُبُورَ، فَإِنَّهَا تُذَكِّرُكُمُ الْآخِرَةَ».

"क़ब्रों की ज़ियारत करो, क्योंकि वे तुम्हें परलोक की याद दिलाएंगी।"(11) इसे इमाम मुस्लिम ने अपनी स़ह़ीह़ में रिवायत किया है।

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम अपने साथियों को यह दुआ सिखाते थे, कि जब वे क़ब्रों की ज़ियारत (भ्रमण) करें तो इसे पढ़ें :

«السَّلَامُ عَلَيْكُمْ أَهْلَ الدِّيَارِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُسْلِمِينَ، وَإِنَّا إِنْ شَاءَ اللَّهُ بِكُمْ لَاحِقُونَ، نَسْأَلُ اللَّهَ لَنَا وَلَكُمُ الْعَافِيَةَ، يَرْحَمُ اللَّهُ الْمُتَقَدِّمِينَ مِنَّا وَالْمُسْتَأْخِرِينَ».

"ऐ मोमिन व मुसलमान क़ब्र वासियों! तुमपर शान्ति की जलधारा बरसे एवं यदि अल्लाह चाहे तो हम तुमसे भेंट करने वाले हैं। हम अपने तथा तुम्हारे लिए आफियत की दुआ़ करते हैं। अल्लाह तआ़ला हम में से आगे जाने वालों एवं पीछे आने वालों, सबके ऊपर कृपा करे!"(12)

जहाँ तक महिलाओं की बात है, तो उनके लिए क़ब्रों की ज़ियारत करना जायज़ नहीं है, क्योंकि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़ब्रों की ज़ियारत करने वाली महिलाओं पर लानत भेजी है, और इसलिए भी कि उनके फ़ितने में पड़ जाने एवं सब्र (धैर्य) न कर पाने का भय होता है। इसी तरह, महिलाओं के लिए जनाज़े के साथ क़ब्रिस्तान तक जाना भी जायज़ नहीं है, क्योंकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें इससे मना किया है। जहाँ तक मृतक पर मस्जिद में अथवा मुसल्ला (प्रार्थना स्थल) में नमाज़ पढ़ने की बात है तो यह पुरुषों एवं महिलाओं दोनों के लिए जायज़ (वैध) है।

यही कुछ है जिसको संकलित किया जाना संभव हो सका। दुरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिवार वालों और तमाम साथियों पर।

***

सूची

 

लेखक का प्राक्कथन 2

पहला पाठ : सूरा फातिहा एवं किसार -उस- सुव (छोटी सूरतें) 3

दूसरा पाठ : इस्लाम के स्तंभ 3

तीसरा पाठ : ईमान के स्तंभ 4

चौथा पाठ : तौहीद (एकेश्वरवाद) एवं शिर्क (बहुदेववाद) के प्रकार 4

पाँचवाँ पाठ : एहसान 10

छठा पाठ : नमाज़ की शर्तें 10

सातवाँ पाठ : नमाज़ के अरकान (स्तंभ) 11

आठवाँ पाठ : नमाज़ के वाजिब (आवश्यक) कर्म 11

नौवाँ पाठ : तशह्हुद का विवरण 11

दसवाँ पाठ : नमाज़ की सुन्नतें 13

ग्यारहवाँ पाठ : नमाज़ को अमान्य करने वाली वस्तुएँ 15

बारहवाँ पाठ : वुज़ू की शर्तें 15

तेरहवाँ पाठ : वुज़ू के आवश्यक कर्म 15

चौदहवाँ पाठ : वुज़ू को तोड़ने वाली वस्तुएँ 16

पंद्रहवाँ पाठ : प्रत्येक मुसलमान का सदाचारी होना 17

सोलहवाँ पाठ : इसलामी शिष्टाचार धारण करना 17

सत्रहवाँ पाठ : शिर्क एवं गुनाहों से सावधान करना 18

अठारहवाँ पाठ : मृतक के कफ और दफन का प्रबंध करना, उसके जनाज़े की नमाज़ पढ़ना एवं उसे दफ़नाना 18

 


() इसे इमाम अह़मद ने (5/428), तथा त़बरानी ने 'अल-कबीर' (4/338) में, और बैहक़ी ने 'अश-शुअब' (14/355) में रिवायत किया है। 'मज्मउज़-ज़वाएद' (1/121) में (उसके लेखक ने) कहा है : इसे अह़मद ने रिवायत किया है और इसके रावी 'स़ह़ीह़' के रावी हैं।

() मुस्नद-ए-अहमद (1/47)

() सुनन अबू दावूद हदीस संख्या: (3251) एवं तिर्मिज़ी हदीस संख्या: (1535)

() सुनन अबू दावूद हदीस संख्या : (4980) एवं अहमद (5/384)

() इब्ने माजह हदीस संख्या: (4204) एवं अहमद (3/30)

() मुस्लिम हदीस संख्या: (916-917)

() अबू दावूद हदीस संख्या: (3221) तथा हाकिम (3/399)

() इब्ने माजह हदीस संख्या: (1612) तथा इमाम अहमद (2/204)

() मुस्लिम, अल-जना’इज़ (976), नसई, अल-जना’इज़ (2034), अबू दावूद, अल-जना’इज़ (3234), इब्न -ए- माजह, अल-जना’इज़ (1569), अह़मद (2/441)

() इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : (1569) तथा अल्लामा अलबानी ने इसे सहीह करार दिया है।

() सहीह मुस्लिम हदीस संख्या (975)

() फ़तवों एवं विविध लेखों का संग्रह (3/ 288-298)