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مِنْ أَحْكَامِ الصِّيَامِ

 

 

रोज़े के कुछ अहकाम

 

 

 

 

اللَّجْنَةُ العِلْمِيَّةُ

بِرِئَاسَةِ الشُّؤُونِ الدِّينِيَّةِ بِالمَسْجِدِ الحَرَامِ وَالمَسْجِدِ النَّبَوِيِّ

 

अनुसंधान समिति, प्रेसीडेंसी धार्मिक कार्य मस्जिद--हराम एवं मस्जिद--नबवी

 

 


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ

रोज़े के कुछ अहकाम

चर्चा का पहला विषय

रोज़ा का अर्थ तथा रमज़ान के रोज़े की अनिवार्यता

1- रोज़ा का अर्थ :

रोज़ा नाम है: अल्लाह की इबादत के तौर पर फ़ज्र होने से सूरज डूबने तक रोज़ा तोड़ने वाली तमाम चीज़ों से बचे रहने का।

2- रमज़ान के रोज़े की अनिवार्यता :

रमज़ान महीने के रोज़े रखना इस्लाम के उन स्तंभों में से एक स्तंभ है, जिनके बिना एक मुसलमान का इस्लाम धर्म खड़ा नहीं हो सकता। वैसे, रोज़ा सारी उम्मतों पर फ़र्ज़ रहता आया है। यह और बात है कि उसका तौर-तरीक़ा एवं समय अलग-अलग रहा हो। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ 183

"ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़े उसी प्रकार फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिये गये हैं, जैसे तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किये गये थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।" (सूरा अल-बक़रा : 183) इस आयत में आए हुए शब्द "कुतिब" का अर्थ है, तुमपर फ़र्ज़ किया गया।

रोज़े की प्रमाणिकता पवित्र क़ुरआन, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस और इजमा तीनों से साबित होती है :

• जहाँ तक पवित्र क़ुरआन की बात है, तो उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ 183 أَيَّامٗا مَّعۡدُودَٰتٖ...

"ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़े उसी प्रकार फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिये गये हैं, जैसे तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किये गये थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।

ये गिनती के कुछ दिन हैं।" (सूरा अल-बक़रा : 183-184)

• और जहाँ तक हदीस की बात है, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़रमान है :

«بُنِيَ الإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَـهَ إِلَّا اللَّهُ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، وَإِقَامِ الصَّلَاةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ، وَحَجِّ الْبَيْتِ».

"इस्लाम के पाँच स्तंभ हैं : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना, और हज करना।"1

• रही बात इजमा की, तो तमाम मुसलमान इस बात पर एकमत हैं कि रमज़ान का रोज़ा फ़र्ज़ है, और उसके फ़र्ज़ होने का इनकार करने वाला मुसलमान नहीं है।

 

चर्चा का दूसरा विषय

रमज़ान महीने की फ़ज़ीलतें

इस महान महीने की बहुत-सी ऐसी बड़ी-बड़ी फ़ज़ीलतें एवं विशेषताएँ हैं, जो उसे अन्य महानों से विशिष्ट बनाती हैं। जैसे :

(1) इसी महीने में पवित्र क़ुरआन उतरा है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿شَهۡرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِيٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلۡقُرۡءَانُ...

"रमज़ान का महीना वह है, जिसमें क़ुरआन उतारा गया है।" (सूरा अल-बक़रा : 185)

(2) इस महीने में जन्नत के द्वार खोल दिए जाते हैं। क्योंकि इसमें बहुतायत से अच्छे कार्य किए जाते हैं।

(3) इसमें जहन्नम के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। क्योंकि गुनाह कम होते हैं।

इन दोनों बातों का उल्लेख अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस हदीस में हुआ है :

«إِذَا جَاءَ رَمَضَانُ، فُتِّحَتْ أَبْوَابُ الْجَنَّةِ، وَغُلِّقَتْ أَبْوَابُ النَّارِ، وَصُفِّدَتِ الشَّيَاطِينُ».

"जब रमज़ान का महीना आता है, तो जन्नत के द्वार खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है।"2

(4) इस महीने की एक फ़ज़ीलत बयान करते हुए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«مَا مِنْ حَسَنَةٍ يَعْمَلُهَا ابْنُ آدَمَ إِلَّا كُتِبَ لَهُ عَشْرُ حَسَنَاتٍ إِلَى سَبْعِمِائَةِ ضِعْفٍ، قَالَ اللَّهُ: إِلَّا الصِّيَامَ، فَإِنَّهُ لِي وَأَنَا أَجْزِي بِهِ، يَدَعُ شَهْوَتَهُ وَطَعَامَهُ مِنْ أَجْلِي، الصِّيَامُ جُنَّةٌ، وَلِلصَّائِمِ فَرْحَتَانِ: فَرْحَةٌ عِنْدَ فِطْرِهِ، وَفَرْحَةٌ عِنْدَ لِقَاءِ رَبِّهِ، وَلَخُلُوفُ فَمِ الصَّائِمِ أَطْيَبُ عِنْدَ اللَّهِ مِنْ رِيحِ الْمِسْكِ».

"जब इन्सान कोई अच्छा काम करता है, तो उसके लिए दस से सात सौ गुना तक नेकियाँ लिखी जाती हैं। अल्लाह ने कहा है : लेकिन रोज़ा का मामला इससे अलग है। क्योंकि रोज़ा विशुद्ध रूप से मेरे लिए रखा जाता है, और उसका प्रतिफल मैं ही दूँगा। आदमी मेरे कारण अपनी वासना और अपना भोजन छोड़ता है। रोज़े ढाल हैं। रोज़ेदार के लिए दो ख़ुशियाँ हैं, पहली : जब वह रोज़ा तोड़ता है, तो उस समय वह खाने के कारण खुश होता है। दूसरी : जब वह अपने रब से मिलेगा। रोज़ेदार के मुँह की गंध अल्लाह के निकट कस्तूरी की गंध से अधिक सुगंधित है।"3 मालूम हुआ कि रोज़े का सवाब कितना गुना बढ़ाकर दिया जाएगा, इसकी कोई सीमा नहीं है।

(5) रोज़े के अंदर अन्य इबादतों की तुलना में नीयत की विशुद्धता अधिका पाई जाती है। क्योंकि एक हदीस-ए-क़ुदसी में है कि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

«تَرَكَ شَهْوَتَهُ وَطَعَامَهُ وَشَرَابَهُ مِنْ أَجْلِي».

"उसने मेरे कारण अपनी वासना तथा खाने-पीने को छोड़ा।"4

(6) अल्लाह ने रोज़ेदारों के लिए जन्नत का एक द्वार ख़ास कर रखा है, और उस द्वार का नाम रय्यान है, जहाँ से केवल रोज़ेदार ही प्रवेश करेंगे।

(7) रोज़ेदार की एक दुआ क़बूल होती है। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«لِلصَّائِمِ عِنْدَ فِطْرِهِ دَعْوَةٌ لَا تُرَدُّ».

"रोज़ेदार की इफ़तार के समय एक दुआ होती है, जो अस्वीकार नहीं होती।"5

(8) अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है :

«مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ».

"जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए, रमज़ान के रोज़े रखे, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।"6

अतः एक मुसलमान को चाहिए कि अल्लाह पर विश्वास एवं सवाब की नीयत से रोज़ा रखे, ताकि प्रतिफल प्राप्त कर सके और गुनाह माफ़ हो सकें।

चर्चा का तीसरा विषय

रमज़ान महीने का प्रवेश किन चीज़ों से साबित होता है?

रमज़ान महीने का प्रवेश दो में से किसी एक चीज़ से साबित होता है :

(1) रमज़ान महीने का चाँद देखना। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«إِذَا رَأَيْتُمُ الْهِلَالَ فَصُومُوا، وَإِذَا رَأَيْتُمُوهُ فَأَفْطِرُوا، فَإِنْ غُمَّ عَلَيْكُمْ فَاقْدُرُوا لَهُ».

"जब तुम (रमज़ान का) चाँद देखो, तो रोज़ा रखो और जब (शव्वाल का) चाँद दखो, तो रोज़ा रखना बंद कर दो। (और) अगर आकाश बादल से ढका हुआ हो, तो उसका अंदाज़ा लगा लो। (यानी महीने के तीस दीन पूरे कर लो।"7 इसी तरह आपने कहा है :

«لَا تَصُومُوا حَتَّى تَرَوُا الْهِلَالَ، وَلَا تُفْطِرُوا حَتَّى تَرَوْهُ».

"रोज़ा उस समय तक न रखो, जब तक चाँद न देख लो, और रोज़ा रखना उस समय तक बंद न करो, जब तक चाँद न देख लो।"8

(2) अगर चाँद न देखा जा सके, तो शाबान महीने को पूरे तीस दिन का कर लिया जाए। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«الشَّهْرُ تِسْعٌ وَعِشْرُونَ لَيْلَةً، فَلَا تَصُومُوا حَتَّى تَرَوْهُ، فَإِنْ غُمَّ عَلَيْكُمْ فَأَكْمِلُوا الْعِدَّةَ ثَلَاثِينَ».

"महीना उनतीस दिन का भी होता है। इसलिए रमज़ान का रोज़ा उस समय तक न रखो, जब तक रमज़ान का चाँद न देख लो। अगर आकाश बादल से ढका हुआ हो, तो शाबान महीने को पूरे तीस दिन का कर लो।"9

चर्चा का चौथा विषय

रोज़े की नीयत

नीयत हर अमल के लिए शर्त है। रमज़ान के रोज़े की नीयत रात ही में करना ज़रूरी है। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«مَنْ لَمْ يُبَيِّتِ الصِّيَامَ قَبْلَ الْفَجْرِ، فَلَا صِيَامَ لَهُ».

"जिसने फ़ज्र से पहले रोज़े की नीयत नहीं की, उसका रोज़ा नहीं होता।"10

शैख़ुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया कहते हैं : "जिसे मालूम हो कि कल रमज़ान है और वह रोज़ा रखना चाहता हो, उसने रोज़े की नीयत कर ली। नीयत के शब्द ज़बान पर लाए या न लाए, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। आम मुसलमान यही करते हैं। सब लोग रोज़े की नीयत रखते हैं।"11

चर्चा का पाँचवाँ विषय

रोज़ा किसपर फ़र्ज़ है?

रोज़ा हर वयस्क एवं अक़्ल वाले मुसलमान पर फ़र्ज़ है।

यदि स्वस्थ है और मुक़ीम है अर्थात मुसाफिर नहीं है, तो रोज़ा समय पर रखना अनिवार्य है, और अगर बीमार है, तो बाद में रखना अनिवार्य है।

अगर स्वस्थ है और यात्रा पर निकला हुआ है, तो चाहे तो रोज़ा रखे और चाहे तो न रखे। वैसे न रखना ही उत्तम है।

• रोज़ा किसी ग़ैर-मुस्लिम पर वाजिब नहीं है और अगर वह रख ले तो सही नहीं होगा। अगर बीच रमज़ान में तौबा कर ले तो बाक़ी दिनों के रोज़े रखेगा और कुफ्र (अविश्वास) के दिनों के रोज़ों की क़ज़ा नहीं करेगा।

• बच्चे पर रोज़ा फ़र्ज़ नहीं है, लेकिन बच्चा समझदार हो गया हो, तो उसका रोज़ा सही हो जाएगा और उसके हक़ में नफ़ल रोज़ा शुमार होगा।

• पागल पर न तो रोज़ा फ़र्ज़ है और न उसके रख लेने से सही होगा। क्योंकि उसके अंदर नीयत करने की योग्यता नहीं होती।

चर्चा का छठा विषय

किसे रोज़ा छोड़ने की अनुमति है?

रमज़ान महीने में निम्नलिखित लोगों को रोज़ा छोड़ने की अनुमति है :

(1) किसी रोगी को जब रोज़ा रखने में कठिनाई हो, तो उसके लिए रोज़ा न रखना ही मुसतहब है।

(2) जब यात्रा के दौरान रज़मान का महीना आ जाए या रमज़ान में सफ़र शुरू किया जाए और दूरी 80 किलोमीटर या उससे अधिक की हो, तो रोज़ा न रखने की अनुमति होगी।

(3) माहवारी वाली या प्रसव के बाद के रक्तस्राव वाली स्त्रियों पर इस दौरान रोज़ा रखना हराम है। क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का कथन है : "हमें इस दौर से गुज़रना पड़ता, तो हमें रोज़ा बाद में रख लेने का आदेश दिया जाता, लेकिन नमाज़ बाद में पढ़ने का आदेश नहीं दिया जाता।"12

(4) ऐसा चिराकालिक रोगी, जिसके स्वस्थ लाभ करने की आशा न हो और वह उसकी वजह से कभी भी रोज़ा न रख सकता हो। ऐसा रोगी रोज़ा नहीं रखेगा और उसे बाद में भी नहीं रखना है। हर दिन के बदले आधा सा'अ गेहूँ आदि किसी निर्धन को दे देगा।

(5) ऐसा वयोवृद्ध बूढ़ा, जो रोज़ा न रख सकता हो। तो ऐसा व्यक्ति भी रोज़ा नहीं रखेगा। उसे हर-हर दिन के बदले एक निर्धन को खाना खिला देना है। उसे क़ज़ा भी नहीं करनी है।

(6) गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली स्त्री को जब रोज़ा रखने के कारण अपने या अपने बच्चे का नुक़सान होने का भय हो, तो वह रोज़ा छोड़ सकती है। लेकिन उन्हें बाद में रोज़ा रख लेना है। उन्होंने रोज़ा अगर केवल अपने बच्चे को नुक़सान होने के भय से छोड़ा है, तो बाद में रोज़ा रखने के साथ-साथ प्रत्येक दिन के बदले में एक-एक निर्धन को खाना भी खिलाएगी।

चर्चा का सातवाँ विषय

रोज़े को नष्ट कर देने वाली चीज़ें

1- संभोग :

जिसने रमज़ान महीने में दिन में संभोग कर लिया, उसका रोज़ा नष्ट हो जाएगा, लेकिन उसे दिन का शेष भाग खाने-पीने आदि से रुके रहना है, तौबा करना है, अल्लाह से क्षमा माँगना है, बाद में उस दिन का रोज़ा फिर से रखना है और कफ़्फ़ारा भी देना है। कफ़्फ़ारे के तौर पर एक ग़ुलाम आज़ाद करना है। ग़ुलाम न मिल सके, तो लगातार दो महीना रोज़ा रखना है। अगर इसकी शक्ति न हो, तो साठ निर्धनों को खाना खिलाना है। यानी गेहूँ या उस क्षेत्र में खाने के लिए प्रयोग होने वाला कोई भी अनाज आधा सा'अ देना है।

2- बोसा लेने, शरीर से शरीर मिलाने, हस्त मैथुन या बार-बार देखने आदि के कारण वीर्य निकल आना :

इनमें से कोई काम करने के कारण वीर्य निकल आए, तो रोज़ा नष्ट हो जाएगा। ऐसे में उसे उस दिन का शेष भाग खाने-पीने आदि से रुके रहना है और उस दिन का रोज़ा बाद में दोबारा रखना है। उसपर कफ़्फ़ारा तो नहीं है, लेकिन उसे तौबा करनी है, शर्मिंदा होना है, अल्लाह से क्षमा माँगना है और इस प्रकार की वासना को जगाने वाली चीज़ों से दूर रहना है। क्योंकि वह एक बहुत बड़ी इबादत कर रहा है।

3- जान-बूझकर खाना तथा पीना।

4- रोज़ेदार का ख़ून निकालना। जैसे पछना लगाना या

उपचार के उद्देश्य से नस से कुछ रक्त निकालना या

रक्तदान के लिए खून निकालना।

इसका आधार पछना लगाने के संबंध में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़रमान है :

«أَفْطَرَ الْحَاجِمُ وَالْمَحْجُومُ».

"पछना लगाने वाले और पछना लगवाने वाले दोनों का रोज़ा टूट जाता है।"13

शैख़ुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया रहिमहुल्लाह कहते हैं : "पछना लगाने से रोज़ा टूट जाने की बात अधिकतर फ़ुक़हा-ए-हदीस, जैसे अहमद बिन हंबल, इसहाक़ बिन राहवैह, इब्न-ए-ख़ुज़ैमा एवं इब्न अल-मुंज़िर आदि ने कही है।"14

लेकिन अगर रोज़ेदार के शरीर से बिना इरादे के रक्त निकल जाए, जैसे नाक से रक्त निकल जाए, ज़ख़्म से रक्त बहने लगे या दाँत निकालते समय रक्त बहने लगे, तो इससे रोज़ा प्रभावित नहीं होता।

5- जान-बूझकर उलटी करना :

यानी पेट के अंदर मौजूद खाना-पानी को मुँह के रास्ते से जान-बूझकर निकाल देना। लेकिन अगर बिना इरादा के अपने आप उलटी हो जाए, तो इससे रोज़ा प्रभावित नहीं होगा। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«مَنْ ذَرَعَهُ الْقَيْءُ فَلَيْسَ عَلَيْهِ قَضَاءٌ، وَمَنْ اسْتَقَاءَ فَلْيَقْضِ».

"जिसे अपने आप उलटी आ जाए, उसपर क़ज़ा नहीं है। लेकिन जो जान-बूझकर उलटी करे, वह रोज़े की क़ज़ा करे।"15 इस हदीस में आए हुए शब्द "ज़रअहू" का अर्थ है, अपने आप आ जाए।

चर्चा का आठवाँ विषय

रोज़े के मुसतहब कार्य

(1) सहरी करना : क्योंकि अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«تَسَحَّرُوا، فَإِنَّ فِي السُّحُورِ بَرَكَةً».

"तुम लोग सहरी किया करो, क्योंकि सहरी में बरकत है।"16

(2) सहरी देर से करना : लेकिन देर इतनी नहीं होनी चाहिए कि फ़ज्र हो जाए।

(3) सूरज डूबने से आशवस्त हो जाने के बाद इफ़तार जल्दी करना। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«لَا تَـزَالُ أُمَّتِي بِخَيْرٍ، مَا أَخَّرُوا السُّحُورَ، وَعَجَّلُوا الْفِطْرَ».

"मेरी उम्मत उस समय तक भलाई में रहेगी, जब तक सहरी देर से करेगी और इफ़तार जल्दी करेगी।"17

(4) इफ़तार तर खजूर से करना मुसतहब है। तर खजूर न मिल सके, तो सूखी खजूर से किया जाए। सूखी खजूर भी न मिल सके, तो पानी से किया जाए। क्योंकि अनस रज़ियल्लाहु अनहु फ़रमाते हैं :

«كَانَ رَسُولُ اللَّهِ يُفْطِرُ عَلَى رُطَبَاتٍ قَبْلَ أَنْ يُصَلِّيَ، فَإِنْ لَمْ تَكُنْ رُطَبَاتٌ، فَعَلَى تَمَرَاتٍ، فَإِنْ لَمْ تَكُنْ، حَسَا حَسَوَاتٍ مِنْ مَاءٍ».

"अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मग़्रिब की नमाज़ पढ़ने से पहले कुछ तर खजूरें खाकर इफ़तार किया करते थे। तर खजूरें न मिलने पर सूखी खजूरें लेते। अगर वह भी न मिलतीं, तो कुछ घूँट पानी पी लेते।"18

(5) मुसतहब यह है कि रोज़ेदार इफ़तार करते समय जो दुआ चाहे, करे। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«إِنَّ لِلصَّائِمِ عِنْدَ فِطْرِهِ دَعْوَةً لَا تُرَدُّ».

"रोज़ेदार की इफ़तार के समय एक दुआ होती है, जो अस्वीकार नहीं होती।"19.

(6) इस महीने में हर तरह की इबादतें, जैसे क़ुरआन की तिलावत, अल्लाह का ज़िक्र, रात की नमाज़, तरावीह की नमाज़, पाँच समयों की नमाज़ से पहले एवं बाद में पढ़ी जाने वाली सुन्नतें, सदक़ा और अल्लाह की राह में खर्च करना आदि अधिक से अधिक की जाए। क्योंकि नेकियाँ गुनाहों को नष्ट करने का काम करती हैं।

चर्चा का नवाँ विषय

ध्यान देने योग्य कुछ बातें

• रोज़ेदार के लिए झूठ बोलने, गीबत (किसी की अनुपस्थिति में उसकी बुराई करने) और गाली-गलोज करने आदि से बचना ज़रूरी है। अगर कोई गाली-गलोज करे, तो कह दे कि मैं रोज़े से हूँ।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«الصِّيَامُ جُنَّةٌ، فَلَا يَرْفُثْ وَلَا يَجْهَلْ، وَإِنِ امْرُؤٌ قَاتَلَهُ أَوْ شَاتَمَهُ، فَلْيَقُلْ: إِنِّي صَائِمٌ، إِنِّي صَائِمٌ».

"रोज़ा ढाल है। अतः रोज़ेदार अश्लील एवं अज्ञानता वाली बातें न करे। अगर कोई उसे गाली-गलोज करे या लड़ने-भिड़ने लगे, तो कह दे कि मैं रोज़े से हूँ, मैं रोज़े से हूँ।"20

• रोज़े के लिए अतिशयोक्ति के साथ कुल्ली करना और नाक में पानी चढ़ाना मना हैं। क्योंकि इससे पानी अंदर जा सकता है।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«وَبَالِغْ فِي الِاسْتِنْشَاقِ إِلَّا أَنْ تَكُونَ صَائِمًا».

"ख़ूब अच्छी तरह नाक में पानी चढ़ाओ, लेकिन अगर रोज़े से हो, तो ऐसा मत करो।"21

• मिस्वाक करने से रोज़ा प्रभावित नहीं होता। अपितु सहीह बात यह है कि रोज़ेदार तथा ग़ैर-रोज़ेदार दोनों के लिए लिए सुबह- शाम मिस्वाक करना मुसतहब है।

चर्चा का दसवाँ विषय

रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा

जिसने किसी जायज़ शरई कारण जिसकी वजह से रोज़ा तोड़ना जायज़ हो जाता है, या किसी हराम सबब के कारण जैसे संभोग आदि द्वारा रोज़े को नष्ट कर लेने की वजह से, रमज़ान के दिन में रोज़ा तोड़ दिया, उसपर क़ज़ा वाजिब होगी, क्योंकि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿...فَعِدَّةٞ مِّنۡ أَيَّامٍ أُخَرَ...

"तो ये गिनती, दूसरे दिनों में पूरी करे।" [सूरा अल-बक़रा : 283] मुसतहब यह है कि इस तरह का व्यक्ति जल्दी से जल्दी क़ज़ा कर ले, ताकि उसके ज़िम्मे जो काम है वह जल्दी अदा हो जाए। मुसतहब यह भी है कि क़ज़ा लगातार की जाए, क्योंकि क़ज़ा अदा की तरह ही है। वैसे, क़ज़ा करने में देर करना भी जायज़ है, क्योंकि क़ज़ा का समय लम्बी अवधि तक होता है।

इसी तरह क़ज़ा के रोज़ों को अलग-अलग करके भी उनका क़ज़ा करना जायज़ है। लेकिन अगर शाबान के उतने ही दिन बचे हों, जितने रोज़े की क़ज़ा बाक़ी हो, तो फिर लगातार क़ज़ा कर लेना वाजिब है। इसमें सभों का मतैक्य है। क्योंकि यहाँ समय तंग है और बिना उचित कारण के क़ज़ा को रमज़ान के बाद तक टालना जायज़ नहीं है।

• जिसने क़ज़ा को दूसरे रमज़ान के बाद तक टाल दिया, उसकी दो हालतें हो सकती हैं :

क़ज़ा में देर किसी शरई मजबूरी के कारण हुई हो। जैसे, बीमारी दूसरे रमज़ान तक निरंतर रूप से जारी रहे। ऐसे व्यक्ति पर केवल क़ज़ा ही वाजिब है।

क़ज़ा में देर किसी शरई मजबूरी के कारण करे। ऐसे व्यक्ति पर क़ज़ा के साथ-साथ हर-हर रोज़े के बदले एक-एक निर्धन को उस क्षेत्र में खाने की वस्तु के रूप से प्रयोग में आने वाली किसी चीज़ का आधा सा'अ देना अनिवार्य है।

• जिस व्यक्ति पर क़ज़ा वाजिब हो, उसका नफ़ल रोज़ा रखने का हुक्म : जिसपर रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा वाजिब हो, तो बेहतर यह है कि वह नफ़ल रोज़े से पहले फ़र्ज़ रोज़े की क़ज़ा कर ले। लेकिन अगर नफ़ल रोज़ा ऐसा हो कि उसका समय निकल जाता हो, जैसे अरफ़ा और आशूरा के रोज़े, तो इस तरह के रोज़े क़ज़ा से पहले रख सकता है। क्योंकि क़ज़ा का समय लम्बी अवधी तक है और आशूरा तथा अरफ़ा का समय निकल जाएगा। लेकिन शव्वाल के छह रोज़े छूटे हुए फ़र्ज़ रोज़ों की क़ज़ा के बाद ही रखेगा।

ये कुछ बातें हैं, जो हमने एकत्र कर दी हैं।अल्लाह की ओर से दरूद व सलाम की बरखा हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिजनों तथा साथियों पर।

 

***

सूची

 

चर्चा का पहला विषय 2

रोज़ा का अर्थ तथा रमज़ान के रोज़े की अनिवार्यता 2

चर्चा का दूसरा विषय 4

रमज़ान महीने की फ़ज़ीलतें 4

चर्चा का तीसरा विषय 6

रमज़ान महीने का प्रवेश किन चीज़ों से साबित होता है? 6

चर्चा का चौथा विषय 7

रोज़े की नीयत 7

चर्चा का पाँचवाँ विषय 8

रोज़ा किसपर फ़र्ज़ है? 8

चर्चा का छठा विषय 9

किसे रोज़ा छोड़ने की अनुमति है? 9

चर्चा का सातवाँ विषय 10

रोज़े को नष्ट कर देने वाली चीज़ें 10

चर्चा का आठवाँ विषय 12

रोज़े के मुसतहब कार्य 12

चर्चा का नवाँ विषय 14

ध्यान देने योग्य कुछ बातें 14

चर्चा का दसवाँ विषय 15

रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा 15

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hi419v1.0 - 22/02/2026


सहीह बुख़ारी : 1898 (3/25), सहीह मुस्लिम : 1079 (2/758)

नसाई की अल-कुबरा : 2536 (3/131).

पिछला संदर्भ देखें।

सुनन इब्न-ए-माजा : 1753 (1/775).

सहीह बुख़ारी : 38 (1/16), सहीह मुस्लिम : 760 (1/523)

मुस्नद-ए-इमाम अहमद : 6323 (10/402), नसाई की अल-कुबरा : 2446 (3/102).

सहीह बुख़ारी : 1906 (3/27), सहीह मुस्लिम :1080 (2/759).

सहीह बुख़ारी : 1907 (3/27), सहीह मुस्लिम :1081 (2/762).

नसाई की अल-कुबरा : 2652 (3/170).

अल-फ़तावा अल-कुबरा (2/469)

सहीह मुस्लिम : 335 (1/265).

सहीह बुख़ारी : 1937 (3/33), मुस्नद-ए-अहमद : 26217 (43/278).

मजमू अल-फ़तावा (25/252)

मुस्नद-ए-इमाम अहमद : 10463 (16/283), तिर्मिज़ी की अल-जामे अल-कबीर : 720 (2/91).

सहीह बुख़ारी : 1923 (3/29), सहीह मुस्लिम :1095, (2/770).

मुस्नद-ए-अहमद : 12507 (35/399).

सुनन अबू दाऊद : 2356 (2/306)

सुनन इब्न-ए-माजा : 1753 (1/775).

सहीह बुख़ारी : 1894 (3/24).

सुनन अबू दाऊद : 2366 (2/308), तिर्मिज़ी की अल-जामे अल-कबीर : 788 (2/147).

सहीह बुख़ारी : 8 (1/11), सहीह मुस्लिम : 16 (1/34)