مَا لَا يَسَعُ المُسْلِمَ جَهْلُهُ
वह बातें जिनसे कोई मुसलमान अनभिज्ञ नहीं रह सकता
اللَّجْنَةُ العِلْمِيَّةُ
بِرِئَاسَةِ الشُّؤُونِ الدِّينِيَّةِ بِالمَسْجِدِ الحَرَامِ وَالمَسْجِدِ النَّبَوِيِّ
अनुसंधान समिति, प्रेसीडेंसी धार्मिक कार्य
मस्जिद-ए-हराम एवं मस्जिद-ए-नबवी
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
प्रस्तावना
सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जो समस्त संसार का रब है। दुरूद व सलाम हो उस संदेष्टा पर जो सारे संसार के लिए रहमत बनाकर भेजे गए। साथ ही उनके परिजनों, साथियों, उनकी सुन्नत का अनुसरण करने वालों और क़ियामत के दिन तक उनके मार्गदर्शन पर चलने वालों पर। तत्पश्चात:
यह एक संक्षिप्त पुस्तिका है, जिसमें हमने दोनों हरम (मक्का एवं मदीना) की ज़ियारत करने वाले पुरुषों एवं महिलाओं के लिए अक़ीदा, इबादत और मामलात से संबंधित आवश्यक बातें एकत्र कर दी हैं, ताकि उनके पास दीन से संबंधित ज़रूरी मालूमात मौजूद रहे। दुआ है कि अल्लाह इसे लाभकारी एवं अपनी प्रसन्नता की प्राप्ति का साधन बनाए। निश्चय ही वही सबसे बेहतर ज़ात (हस्ती) है, जिससे कुछ माँगा जाए और आशा रखी जाए।
अनुसंधान समिति, प्रेसीडेंसी धार्मिक कार्य मस्जिद-ए-हराम एवं मस्जिद-ए-नबवी
अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बड़ा दयालु अत्यंत दयावान है
पहला अध्याय :
अक़ीदे से संबंधित बातें
पहला विषय : इस्लाम का अर्थ और उसके स्तंभ :
इस्लाम का अर्थ है : तौहीद (केवल एक अल्लाह की इबादत) के माध्यम से अल्लाह के सामने आत्मसमर्पण कर देना, आज्ञाकारिता के माध्यम से उसके आदेशों के आगे झुक जाना तथा बहुदेववाद (शिर्क) एवं बहुदेववादियों से ख़ुद को अलग कर लेना।
इस्लाम के पाँच स्तंभ हैं :
पहला स्तंभ : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं।
दूसरा स्तंभ : नमाज़ स्थापित करना।
तीसरा स्तंभ : ज़कात देना।
चौथा स्तंभ : रमज़ान महीने के रोज़े रखना।
पाँचवाँ स्तंभ : सामर्थ्य रखने वालों के लिए अल्लाह के पवित्र घर का हज्ज करना।
तौहीद (एकेश्वरवाद) का महत्व :
ज्ञात हो कि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने सृष्टि की रचना इसलिए की है कि लोग उसकी इबादत करें और उसके साथ किसी को साझी न बनाएँ। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿وَمَا خَلَقۡتُ ٱلۡجِنَّ وَٱلۡإِنسَ إِلَّا لِيَعۡبُدُونِ 56﴾
"और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।" [सूरा अल-ज़ारियात : 56]।
और इस इबादत को केवल ज्ञान के माध्यम से ही जाना जा सकता है, जैसा कि अल्लाह ताआला का फ़रमान है :
﴿فَٱعۡلَمۡ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَٱسۡتَغۡفِرۡ لِذَنۢبِكَ وَلِلۡمُؤۡمِنِينَ وَٱلۡمُؤۡمِنَٰتِۗ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ مُتَقَلَّبَكُمۡ وَمَثۡوَىٰكُمۡ 19﴾
"अतः जान लें कि निःसंदेह तथ्य यह है कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, तथा अपने पापों के लिए क्षमा माँगें और ईमान वाले पुरुषों और ईमान वाली स्त्रियों के लिए भी, और अल्लाह तुम सब के चलने-फिरने और तुम सब के ठहरने को जानता है।" [सूरा मुहम्मद : 19]।
हम देखते हैं कि इस आयत में अल्लाह तआला ने कथनी तथा करनी से पहले ज्ञान का ज़िक्र किया है। इससे मालूम हुआ कि मुसलमान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सीखने योग्य विषय तौहीद अर्थात एक अल्लाह की इबादत की धारणा है; क्योंकि यही इस्लाम का मूल आधार है। धर्म तौहीद के बिना कायम नहीं हो सकता। यही मुसलमान का पहला और यही अंतिम कर्तव्य है। तौहीद इस्लाम के पाँच स्तंभों में से पहला स्तंभ है, जिसे हर मुसलमान के लिए जानना और उसपर अमल करना अनिवार्य है। जैसा कि अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित एक हदीस में है, वह कहते हैं : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है :
»بُنِيَ الإسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أنْ لَا إلَهَ إلَّا اللَّهُ وأنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، وَإقَامِ الصَّلَاةِ، وَإيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَحَجِّ البَيْتِ، وصَوْمِ رَمَضَانَ«.
"इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर रखी गई है : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और यह कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, अल्लाह के पवित्र घर (काबा) का हज्ज करना और रमज़ान महीने के रोज़े रखना।"(1)
अतः हर मुसलमान के लिए तौहीद का अर्थ सीखना आवश्यक है। तौहीद का अर्थ है, इबादत केवल एक अल्लाह की करना। इसलिए उसकी इबादत में किसी को साझी नहीं बनाया जाएगा। न अल्लाह के किसी निकटवर्ती फ़रिश्ते को, न उसके भेजे हुए किसी रसूल को।
''ला इलाहा इल्लल्लाह'' की गवाही का अर्थ :
बंदा दृढ़ विश्वास के साथ इस बात का इक़रार करे कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। अल्लाह की अकेले इबादत करे और विशुद्ध रूप से उसे ही दुआ, भय, आशा, भरोसा और अन्य सभी प्रकार की इबादतों का हक़दार माने।
गवाही तब तक पूरी नहीं होती जब तक उस में दो स्तंभ न हो:
पहला: अल्लाह के सिवा सभी उपास्य और इबादत के योग्य मखलूकात, जैसे कि सभी साझीदार, देवी-देवता और ताग़ूत का इनकार करना।
दूसरा स्तंभ : इस बात का इक़रार करना कि इबादत का हक़दार अल्लाह है। कोई और नहीं। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَۖ...﴾
"और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा पूजे जाने वालों) से बचो...।" [सूरा अल-नह्ल : 36]।
"ला इलाहा इल्लल्लाह" की शर्तें निम्नलिखित हैं :
पहली शर्त : ज्ञान जो अज्ञानता के विपरीत है।
दूसरी शर्त : यक़ीन जो संदेह के विपरीत है।
तीसरी शर्त : विशुद्धता जो शिर्क के विपरीत है।
चौथी शर्त : सत्य जो झूठ के विपरीत है।
पाँचवीं शर्त : प्रेम जो द्वेष के विपरीत है।
छठी शर्त : अनुसरण जो छोड़ने के विपरीत है।
सातवीं शर्त : स्वीकार करना जो अस्वीकार करने के विपरीत है।
आठवीं शर्त : अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली तमाम चीज़ों का इनकार करना।
इन शर्तों का पालन करना आवश्यक है। इन्हें निम्नलिखित दो पंक्तियों में संकलित किया गया है :
ज्ञान, विश्वास, निष्ठा (इख़लास) एवं तुम्हारी सच्चाई, प्रेम, अनुपालन एवं स्वीकृति।
तथा इनके साथ आठवीं शर्त यह बढ़ा लीजिए कि अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली तमाम चीज़ों का इनकार करना।
यह गवाही उसी समय संपूर्ण मानी जाएगी, जब केवल एक अल्लाह की इबादत की जाए और सारी इबादतों को उसी के साथ ख़ास रखा जाए। वह केवल अल्लाह को ही पुकारता है, केवल अल्लाह पर ही भरोसा करता है, केवल अल्लाह से ही आशा रखता है, केवल अल्लाह के लिए ही नमाज़ पढ़ता है, और केवल अल्लाह के लिए ही क़ुर्बानी करता है, जो महान और उच्च है।
तो कुछ लोग जो क़ब्रों के चारों ओर तवाफ़ करते हैं, उनमें दफ़न लोगों से फ़रियाद करते हैं और अल्लाह को छोड़कर उनसे दुआ करते हैं, यह उपासना में शिर्क है। इससे सावधान रहना और दूसरों को भी सावधान करना आवश्यक है, क्योंकि यह उसी प्रकार का कार्य है जैसा कि मुश्रिक लोग अल्लाह को छोड़कर मूर्तियों, पत्थरों और पेड़ों की इबादत करते हैं। यह वही शिर्क है जिससे सावधान करने और रोकने के लिए किताबें उतारी गईं और रसूल भेजे गए।
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, इस गवाही का अर्थ:
आपके आदेशों का पालन करना, आपकी बताई हुई बातों की पुष्टि करना, आपकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहना और आपके बताए हुए तरीक़े के अनुसार ही अल्लाह की इबादत करना। चुनांचे एक मुसलमान इस बात का इक़रार करता है कि मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह क़ुरशी हाशिमी अल्लाह की ओर से सभी मनुष्यों और जिन्नों के लिए रसूल बनाकर भेजे गए हैं। जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنِّي رَسُولُ ٱللَّهِ إِلَيۡكُمۡ جَمِيعًا...﴾
"(ऐ नबी!) आप कह दें कि ऐ मानव जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुम सब की ओर अल्लाह का रसूल हूँ...।" [सूरा अल-आराफ़ : 158]।
अल्लाह ने उन्हें अपने धर्म का पैग़ाम पहुँचाने और सृष्टियों का मार्गदर्शन करने के लिए भेजा, जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿وَمَآ أَرۡسَلۡنَٰكَ إِلَّا كَآفَّةٗ لِّلنَّاسِ بَشِيرٗا وَنَذِيرٗا وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعۡلَمُونَ 28﴾
''हमने आपको सभी लोगों की ओर शुभ संदेश देने वाला एवं डराने वाला बना कर भेजा है, किन्तु अधिकतर लोग ज्ञान नहीं रखते।'' [सूरा सबा: 28]।
इसी तरह उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَآ أَرۡسَلۡنَٰكَ إِلَّا رَحۡمَةٗ لِّلۡعَٰلَمِينَ 107﴾
"और (ऐ नबी!) हमने आपको समस्त संसार के लिए दया बनाकर भेजा है।" [सूरा अल-अंबिया : 107]।
यह गवाही इन्सान को इस प्रकार का कोई अक़ीदा रखने से रोकती है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इस ब्रह्मांड की रुबुबिय्यत एवं संचालन में कोई अधिकार है या आप इबादत के हक़दार हैं। आप खुद अल्लाह के बंदे हैं, आपकी बंदगी नहीं हो सकती। अल्लाह के रसूल हैं, आपको झुठलाया नहीं जा सकता। वह स्वयं अपने लिए या किसी और के लिए लाभ और हानि के मालिक नहीं हैं, सिवाय इसके कि अल्लाह जो चाहे। जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿قُل لَّآ أَقُولُ لَكُمۡ عِندِي خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعۡلَمُ ٱلۡغَيۡبَ وَلَآ أَقُولُ لَكُمۡ إِنِّي مَلَكٌۖ إِنۡ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَيَّ...﴾
"कह दीजिए कि न तो मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मेरे पास अल्लाह का ख़ज़ाना है और न मैं ग़ैब जानता हूँ, और न मैं यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ। मैं तो सिर्फ जो कुछ मेरे पास वह्य आती है, उसकी पैरवी करता हूँ।" [सूरा अल-अन्आम : 50]।
दूसरा विषय : ईमान का अर्थ और उसके स्तंभ :
ईमान : ईमान दिल से इक़रार करने, ज़बान से बोलने, दिल और शरीर के अंगों द्वारा अमल करने का नाम है, जो आज्ञापालन से बढ़ता और अवज्ञा से घटता है।
अतः इबादतों के सही और क़बूल होने के लिए ईमान शर्त है। जबकि शिर्क और कुफ्र सभी इबादतों को नष्ट कर देते हैं। जिस तरह वुज़ू के बिना अल्लाह नमाज़ स्वीकार नहीं करता, उसी तरह ईमान के बिना इबादत स्वीकार नहीं करता। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَمَن يَعۡمَلۡ مِنَ ٱلصَّٰلِحَٰتِ مِن ذَكَرٍ أَوۡ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤۡمِنٞ فَأُوْلَٰٓئِكَ يَدۡخُلُونَ ٱلۡجَنَّةَ وَلَا يُظۡلَمُونَ نَقِيرٗا 124﴾
"तथा जो अच्छे कार्य करेगा, चाहे नर हो या नारी, जबकि वह मोमिन हो, तो ऐसे लोग जन्नत में प्रवेश पाएंगे और उनका खजूर की गुठली के ऊपरी भाग के गड्ढे के बराबर भी हक़ नहीं मारा जाएगा।" [सूरा अल-निसा : 124]।
उच्च एवं महान अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया है कि शिर्क अमल को नष्ट कर देता है। जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿وَلَقَدۡ أُوحِيَ إِلَيۡكَ وَإِلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكَ لَئِنۡ أَشۡرَكۡتَ لَيَحۡبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ 65﴾
"निःसंदेह आपकी ओर और आपसे पूर्ववर्ती नबियों की ओर यह वह्य की गई है कि यदि आपने शिर्क किया, तो अवश्य ही आपका कर्म व्यर्थ हो जाएगा और आप घाटा उठाने वालों में से हो जाएँगे।" [सूरा अल-ज़ुमर: 65]।
ईमान के छः स्तंभ (अरकान) हैं: अल्लाह पर ईमान, उसके फ़रिश्तों पर ईमान, उसकी किताबों पर ईमान, उसके रसूलों पर ईमान, आख़िरत के दिन पर ईमान, और भले-बुरे भाग्य पर ईमान कि वे अल्लाह की ओर से होते हैं।
1) अल्लाह पर ईमान। इसमें तीन बातें शामिल हैं :
1- अल्लाह तआला की रुबूबिय्यत पर ईमान लाना:
यह अल्लाह तआला के कार्यों में तौहीद है; जैसे कि पैदा करना तथा आजीविका, जीवन और मृत्यु देना, अतः अल्लाह के अतिरिक्त कोई सृष्टिकर्ता नहीं है, अल्लाह के अतिरिक्त कोई रोज़ी देने वाला नहीं है, अल्लाह के अतिरिक्त कोई जीवन देने वाला नहीं है, अल्लाह के अतिरिक्त कोई मृत्यु देने वाला नहीं है, और इस ब्रह्माण्ड में उसके अलावा कोई और नहीं है जो इसे चलाता है।
यह ज्ञात नहीं है कि किसी भी सृष्टि ने अल्लाह की रुबूबिय्यत (उसके सृष्टिकर्ता, स्वामी और प्रबंधक होने) का इंकार किया हो। हाँ, कोई हठधर्मिता के आधार पर ऐसा कहे और उसके दिल में कुछ और बात हो, तो बात अलग है। जैसा कि फ़िरऔन के साथ हुआ, जब उसने अपनी क़ौम से कहा :
﴿...أَنَا رَبُّكُمُ الْأَعْلَى﴾
"मैं तुम्हारा सबसे ऊँचा रब हूँ।" [सूरा अल-नाज़िआत: 24]।
लेकिन खुद फ़िरऔन जानता था कि उसकी यह बात ग़लत है। अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम के हवाले से कहा है कि उन्होंने फ़िरऔन से कहा था:
﴿قَالَ لَقَدۡ عَلِمۡتَ مَآ أَنزَلَ هَٰٓؤُلَآءِ إِلَّا رَبُّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ بَصَآئِرَ وَإِنِّي لَأَظُنُّكَ يَٰفِرۡعَوۡنُ مَثۡبُورٗا 102﴾
"तुम जानते ही हो कि इन (निशानियों) को आकाशों और धरती के रब ही ने, (समझ-बूझ वालों के लिए अल्लाह के एक होने के) प्रमाण के तौर पर उतारा है। और ऐ फ़िरऔन! मेरा विश्वास है कि तू हलाक हो जाएगा।" [सूरा अल-इसरा : 102]।
तथा एक स्थान पर अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَجَحَدُوا بِهَا وَاسْتَيْقَنَتْهَا أَنْفُسُهُمْ ظُلْمًا وَعُلُوًّا... ﴾
"तथा उन्होंने अत्याचार एवं अभिमान के कारण उनका इनकार कर दिया। हालाँकि उनके दिलों को उनका विश्वास हो चुका था..."। [सूरा अल-नम्ल: 14]।
इन सृष्टियों का अवश्य ही एक स्रष्टा होना चाहिए, क्योंकि यह स्वयं अपने आपको उत्पन्न नहीं कर सकतीं; क्योंकि कोई वस्तु अपने आपको स्वयं पैदा नहीं करती है। इनका संयोग मात्र से अस्तित्व में आ जाना भी असंभव है; क्योंकि हर घटना के लिए एक कारण का होना आवश्यक है, और क्योंकि इन सृष्टियों का पूर्ण समन्वय और अद्भूत प्रणाली पर आधारित होना, असंभव बनाता है कि यह संयोगवश हुए हों, अतः यह बात निश्चित हो जाती है कि इनका कोई उत्पत्तिकर्ता और स्रष्टा है और वह स्रष्टा सारे संसार का रब अल्लाह है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿أَمۡ خُلِقُواْ مِنۡ غَيۡرِ شَيۡءٍ أَمۡ هُمُ ٱلۡخَٰلِقُونَ 35 أَمۡ خَلَقُواْ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۚ بَل لَّا يُوقِنُونَ 36﴾
"क्या यह लोग बिना किसी पैदा करने वाले के स्वयं पैदा हो गए हैं या यह स्वयं उत्पत्तिकर्ता (पैदा करने वाले) हैं? या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है? बल्कि वे विश्वास ही नहीं करते।" [सूरा अल-तूर : 35-36]।
मुश्रिक लोग अल्लाह तआला की रुबूबिय्यत (उसके सृष्टिकर्ता, स्वामी और प्रबंधक होने) को स्वीकार करते थे और उसकी उलूहिय्यत (उपासना) में शिर्क करते थे। लेकिन इतने भर से वह मुसलमान नहीं हो गए। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे युद्ध किया और उनके रक्त और संपत्ति को वैध ठहराया; क्योंकि उन्होंने इबादत में शिर्क किया, अर्थात उन्होंने अल्लाह के साथ अन्य की पूजा की; जैसे मूर्तियाँ, पत्थर, फरिश्ते और अन्य।
2- अल्लाह की उलूहिय्यत (उपासना) पर ईमान:
अल्लाह तआला की उलूहिय्यत पर ईमान लाने का अर्थ इस बात का वचन देना है कि अकेला अल्लाह ही सच्चा पूज्य है, उसका कोई साझी नहीं। ''अल-इलाह'' का अर्थ है ''मालूह'' अर्थात ''पूज्य, जिसकी पूजा की जाए'', प्रेम, आदर और विनम्रता के साथ।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَإِلَٰهُكُمۡ إِلَٰهٞ وَٰحِدٞۖ لَّآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلرَّحۡمَٰنُ ٱلرَّحِيمُ 163﴾
"और तुम्हारा पूज्य एक ही पूज्य है, उसके अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। वह अत्यंत दयावान, असीम दयालु है।" [सूरा अल-बक़रा : 163]।
अल्लाह के साथ जिस चीज़ को भी पूज्य ठहराकर उसकी इबादत की गई उसकी इबादत बातिल है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدۡعُونَ مِن دُونِهِۦ هُوَ ٱلۡبَٰطِلُ وَأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡكَبِيرُ 62﴾
"यह इसलिए कि अल्लाह ही सत्य है और जिसे वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वह असत्य हैं और अल्लाह ही सर्वोच्च, महान है।" [सूरा अल-हज्ज : 62]।
इसीलिए नूह अलैहिस्सलाम से लेकर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक सभी रसूल अपनी कौमों को बस एक अल्लाह की इबादत करने और उसके सिवा किसी की इबादत न करने का आह्वान देते रहे। अल्लाह तआला ने मुश्रिकों के अल्लाह के साथ अन्य पूज्य बनाने और उनकी पूजा करने, उनसे सहायता माँगने और फ़रियाद करने को दो बौद्धिक प्रमाणों से असत्य घोषित किया है :
पहला प्रमाण : इन देवताओं के अंदर ऐसी विशेषताएँ नहीं पाई जातीं, जो पूज्य के अंदर होनी चाहिए। ये सृष्टि एवं रचना हैं। न किसी को पैदा करते हैं, न अपने उपासकों को कोई लाभ पहुँचाते हैं, न उनसे कोई हानि दूर करते हैं। न जीवन, मृत्यु या दोबारा जीवित करके उठाने की शक्ति रखते हैं। जैसा कि अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿وَٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةٗ لَّا يَخۡلُقُونَ شَيۡـٔٗا وَهُمۡ يُخۡلَقُونَ وَلَا يَمۡلِكُونَ لِأَنفُسِهِمۡ ضَرّٗا وَلَا نَفۡعٗا وَلَا يَمۡلِكُونَ مَوۡتٗا وَلَا حَيَوٰةٗ وَلَا نُشُورٗا 3﴾
"और उन्होंने उसके अतिरिक्त अनेक पूज्य बना लिए हैं, जो किसी चीज़ की उत्पत्ति नहीं कर सकते और वे स्वयं उत्पन्न किये जाते हैं और न वे अधिकार रखते हैं अपने लिए किसी हानि का, न अधिकार रखते हैं किसी लाभ का, न अधिकार रखते हैं मरण और न जीवन और न पुनः जीवित करने का।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान: 3]।
दूसरा प्रमाण : ये मुश्रिक इस बात को स्वीकार करते थे कि अल्लाह तआला ही अकेला स्रष्टा और संचालनकर्ता है। ये दोनों काम उसके सिवा कोई नहीं करता। ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि जिस प्रकार यह लोग अल्लाह को एकमात्र रब मानते थे, उसी प्रकार एकमात्र पूज्य भी मानते। जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿قُل لِّمَنِ ٱلۡأَرۡضُ وَمَن فِيهَآ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ 84 سَيَقُولُونَ لِلَّهِۚ قُلۡ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ 85 قُلۡ مَن رَّبُّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ ٱلسَّبۡعِ وَرَبُّ ٱلۡعَرۡشِ ٱلۡعَظِيمِ 86 سَيَقُولُونَ لِلَّهِۚ قُلۡ أَفَلَا تَتَّقُونَ 87 قُلْ مَنْ بِيَدِهِ مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ يُجِيرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ 88 سَيَقُولُونَ لِلَّهِ قُلْ فَأَنَّى تُسْحَرُونَ 89﴾
"(ऐ नबी!) उनसे कह दें : यह धरती और इसमें जो कोई भी है किसका है, यदि तुम जानते हो? वे कहेंगे : अल्लाह का है। आप कह दें : फिर क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते? आप पूछिए : सातों आकाशों का रब तथा महान सिंहासन (अर्श) का रब कौन है? वे कहेंगे : अल्लाह ही है। आप कह दें : फिर क्या तुम डरते नहीं हो? आप उनसे कहिए : कौन है जिसके हाथ में हर चीज़ का अधिकार है और वह शरण देता है और उसके मुक़ाबले में शरण नहीं दी जाती, यदि तुम जानते हो (तो बताओ)? वे अवश्य कहेंगे कि (ये सब गुण) अल्लाह ही के हैं। आप कहिएः फिर तुमपर कहाँ से जादू हो जाता है?" [सूरा अल-मोमिनून : 84-89]।
जब उन्होंने तौहीद-ए-रुबूबीयत को स्वीकार कर लिया, तो यह अनिवार्य हो जाता है कि केवल पवित्र अल्लाह की इबादत करते और उसकी इबादत में किसी को उसका साझी न बनाते।
3- अस्मा व सिफ़ात (अल्लाह के नामों और गुणों) पर ईमान रखना:
अर्थात: अल्लाह ने अपने लिए जो नाम और गुण अपनी किताब में निर्धारित किया है, या अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी सुन्नत में उसके लिए साबित किया है; उन्हें साबित करना उस रूप में, जो अल्लाह तआला के योग्य है। न उनके अर्थ के साथ छेड़छाड़ की जाए, न उनको अर्थविहीन किया जाए, न उनकी कैफ़ियत बयान की जाए और न उनका उदाहरण दिया जाए। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَلِلَّهِ ٱلۡأَسۡمَآءُ ٱلۡحُسۡنَىٰ فَٱدۡعُوهُ بِهَاۖ وَذَرُواْ ٱلَّذِينَ يُلۡحِدُونَ فِيٓ أَسۡمَٰٓئِهِۦۚ سَيُجۡزَوۡنَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ 180﴾
"और सबसे अच्छे नाम अल्लाह ही के हैं। अतः उसे उन्हीं के द्वारा पुकारो और उन लोगों को छोड़ दो, जो उसके नामों के बारे में सीधे रास्ते से हटते हैं। उन्हें शीघ्र ही उसका बदला दिया जाएगा, जो वे किया करते थे।" [सूरा अल-आराफ़: 180]।
और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿...لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ﴾
"...उसके समान कोई चीज़ नहीं, तथा वह सब कुछ सुनने वाला सब कुछ देखने वाला है।" [सूरा अश-शूरा : 11]।
शिर्क के तीन प्रकार हैं:
1- बड़ा शिर्क।
2- छोटा शिर्क।
3- शिर्क-ए-ख़फ़ी (गुप्त शिर्क)।
1- बड़ा शिर्क:
इसका मापदंड: अल्लाह के विशेष गुणों में किसी और को अल्लाह के बराबर मानना है, जैसाकि अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿إِذۡ نُسَوِّيكُم بِرَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ 98﴾
"जब हम तुम्हें, समस्त संसार के रब के बराबर समझ रहे थे।" [सूरा अश-शुअरा: 98]।
और इसमें शामिल है: इबादत को अल्लाह तआला के अतिरिक्त किसी दूसरे के लिए अंजाम देना, या उसका कुछ भाग अल्लाह के सिवा के लिए करना, जैसे दुआ करना, फ़रियाद करना, मन्नत मानना, क़ुर्बानी देना, और अन्य प्रकार की इबादत।
इसी में शामिल है: अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल ने जिसे हराम कहा है उसे हलाल समझना, या वैध चीज़ों को अवैध समझना, अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल ने जो अनिवार्य किया है, उसे गिराना। जैसे व्यभिचार, शराब, माता-पिता की अवज्ञा, सूदखोरी या इस प्रकार की अन्य चीज़ें, जिनके इस्लाम में हराम होने में कोई किन्तु-परन्तु नहीं है, उन्हें हलाल समझ लेना
या अल्लाह की हलाल की हुई स्वच्छ चीज़ों को हराम कर लेना। या अल्लाह ने जो अनिवार्य किया है उसे छोड़ देना; जैसे यह विश्वास रखना कि नमाज़ वाजिब नहीं है, या रोज़ा वाजिब नहीं है, या ज़कात वाजिब नहीं है।
बड़ा शिर्क मनुष्य के समस्त कर्मों को नष्ट कर देता है एवं इस शिर्क पर मरने वाला सदैव जहन्नम में रहेगा। जैसाकि अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿...وَلَوۡ أَشۡرَكُواْ لَحَبِطَ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ﴾
"...और अगर वे शिर्क करें तो उनके समस्त कर्म बरबाद हो जाएंगे।" [सूरा अल-अनआम : 88]।
और अगर इसी हालत में उसका निधन हो जाए तो अल्लाह उसे क्षमादान नहीं देगा तथा जन्नत उसके लिए हराम होगी, जैसाकि अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغۡفِرُ أَن يُشۡرَكَ بِهِۦ وَيَغۡفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَآءُ...﴾
"निस्संदेह, अल्लाह शिर्क को क्षमा नही करेगा, इसके सिवा जिसके लिए जो गुनाह (पाप) चाहेगा, माफ़ कर देगा...।" [सूरा अल-निसा : 48]।
और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿إِنَّهُۥ مَن يُشۡرِكۡ بِٱللَّهِ فَقَدۡ حَرَّمَ ٱللَّهُ عَلَيۡهِ ٱلۡجَنَّةَ وَمَأۡوَىٰهُ ٱلنَّارُ...﴾
"निःसंदेह सच्चाई यह है कि जो भी अल्लाह के साथ साझी बनाए, तो निश्चय उसपर अल्लाह ने जन्नत हराम (वर्जित) कर दी और उसका ठिकाना आग (जहन्नम) है...।" [सूरा अल-माइदा : 72]।
2- शिर्क -ए- अस़ग़र (छोटा शिर्क):
यह वह है जिसे नस़्स़ (क़ुरआन व ह़दीस) में शिर्क कहा गया हो, लेकिन वह शिर्क -ए- अकबर की हद तक नहीं पहुँचा हो, इसे शिर्क -ए- असग़र कहा जाता हैः जैसे अल्लाह के सिवा किसी और की क़सम खानाः जैसे काबा की क़सम खाना, नबियों की क़सम खाना, अमानत की क़सम खाना, अमुक की ज़िंदगी की क़सम खाना इत्यादि, जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया हैः
»مَنْ حَلَفَ بِغَيرِ اللهِ فَقَدْ كَفَرَ أَو أَشرَكَ.«
''जो अल्लाह के सिवा किसी और वस्तु की क़सम खाता है, वह कुफ़्र करता है या शिर्क करता है''।(2)
यह अकबर (बड़ा) हो सकता है, तथा यह उसके दिल की स्थिति पर निर्भर है, अगर क़सम खाने वाले के दिल में यह बात हो कि नबी या किसी शैख़ की हैसियत अल्लाह के बराबर है, उन्हें अल्लाह के स्थान पर पुकारा जा सकता है या उनका इस कायनात के संचालन में कुछ अमल-दख़ल है, तो यह बड़ा शिर्क हो जाएगा। लेकिन अगर अल्लाह के सिवा किसी और की क़सम खाने वाले के दिल में इस तरह की कोई बात न हो, बल्कि आदत होने के कारण उसके मुँह पर क़सम के शब्द ऐसे ही आ गए हों, तो यह छोटा शिर्क ही रहेगा। और यह कुछ स्थानों पर अक्सर होता है, इसलिए इसके प्रति सतर्क रहना और इससे सावधान करना आवश्यक है, ताकि तौहीद की सुरक्षा और उसकी हिफाज़त की जा सके।
3- शिर्क-ए-ख़फ़ी:
यह दिलों में रियाकारी (दिखावा) से होता है; जैसे कोई व्यक्ति नमाज़ इसलिए पढ़ता है या कुरआन की तिलावत इसलिए करता है ताकि लोग उसे देखें, या इसलिए तस्बीह पढ़ता है ताकि उसकी प्रशंसा की जाए, या सदक़ा इसलिए देता है ताकि उसकी सराहना की जाए। यह उस कार्य को बर्बाद कर देता है जिसमें दिखावा किया गया हो, लेकिन उन कार्यों को नहीं जो अल्लाह तआला के लिए विशुद्ध रूप से किए गए हों।
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है:
»الشِّرْكُ فِي هَذِهِ الْأُمَّةِ أَخْفَى مِنْ دَبِيبِ النَّمْلَةِ السَّودَاءِ عَلَى الصَّفَاةِ السَّودَاءِ فِي ظُلْمَةِ اللَّيْلِ، وَكَفَّارَتُهُ أَنْ يَقُولَ: "اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أُشْرِكَ بِكَ شَيْئًا وَأَنَا أَعْلَمُ، وَأَسْتَغْفِرُكَ مِنَ الذَّنْبِ الَّذِي لَا أَعْلَمُ .«
"इस उम्मत के अंदर शिर्क उससे कहीं अधिका गुप्त रूप से अपना काम करता रहता है कि जैसे कोई काली चींटी किसी काले पत्थर पर अंधेरी रात में रेंग रही हो। शिर्क का कफ़्फ़ारा यह दुआ है : ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ इस बात से कि जान-बूझकर किसी को तेरा साझी बनाऊँ और तुझसे क्षमा माँगता हूँ उस गुनाह के लिए जो अनजाने में हो जाए।"(3)
कुफ्र के प्रकार:
पहला प्रकार: बड़ा कुफ्र:
बड़ा शिर्क नरक में अनन्त दण्ड का कारण है।
शिर्क के पाँच प्रकार हैं :
1- तकज़ीब (झुठलाने) का कुफ्र:
इससे अभिप्राय रसूलों के झूठे होने का विश्वास है। अविश्वासियों के अंदर इसका उदाहरण कम देखने को मिलता है। क्योंकि अल्लाह ने अपने रसूलों का पक्ष स्पष्ट प्रमाणों द्वारा मज़बूत कर दिया था। और इन झुठलाने वालों की स्थिति वैसी ही है जैसा कि अल्लाह ने उनका वर्णन किया है:
﴿وَجَحَدُوا بِهَا وَاسْتَيْقَنَتْهَا أَنْفُسُهُمْ ظُلْمًا وَعُلُوًّا...﴾
"तथा उन्होंने अत्याचार एवं अभिमान के कारण उनका इनकार कर दिया। हालाँकि उनके दिलों को उनका विश्वास हो चुका था...।" [सूरा अल-नह्ल : 14]।
2- इन्कार और घमंड का कुफ़्र:
और यह इब्लीस के कुफ़्र की तरह है, क्योंकि उसने अल्लाह के आदेश का इंकार नहीं किया और न ही उसे झुठलाया, बल्कि उसका सामना इंकार और घमंड से किया। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَإِذۡ قُلۡنَا لِلۡمَلَٰٓئِكَةِ ٱسۡجُدُواْ لِأٓدَمَ فَسَجَدُوٓاْ إِلَّآ إِبۡلِيسَ أَبَىٰ وَٱسۡتَكۡبَرَ وَكَانَ مِنَ ٱلۡكَٰفِرِينَ 34﴾
"और जब हमने फ़रिश्तों से कहा : आदम को सज्दा करो, तो उन्होंने सज्दा किया सिवाय इब्लीस के। उसने इनकार किया और अभिमान किया और काफ़िरों में से हो गया।" [सूरा अल-बक़रा: 34]।
3- इअ'राज़ (विमुख होने) का कुफ्र:
यानी इन्सान सत्य को न तो सुनने के लिए तैयार हो, न समझने के लिए और न मानने के लिए। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّن ذُكِّرَ بِـَٔايَٰتِ رَبِّهِۦ ثُمَّ أَعۡرَضَ عَنۡهَآۚ إِنَّا مِنَ ٱلۡمُجۡرِمِينَ مُنتَقِمُونَ 22﴾
"और उससे बड़ा अत्याचारी कौन है, जिसे उसके पालनहार की आयतों द्वारा नसीहत की गई, फिर वह उनसे विमुख हो गया। निश्चय ही हम अपराधियों से बदला लेने वाले हैं।" [सूरा अस-सज्दा: 22]।
जहाँ तक आंशिक रूप से मुँह मोड़ने की बात है, तो वह कुफ़्र नहीं बल्कि 'फ़िस्क़' (पाप) है; जैसेकि कोई व्यक्ति धर्म के कुछ कर्तव्यों के ज्ञान से मुँह मोड़ ले, जैसे रोज़ा या हज्ज के अहकाम (नियम) आदि।
4- संदेह का कुफ्र :
यह इस प्रकार है कि वह असमंजस में हो, और सत्य के बारे में कोई निश्चितता न रखे, बल्कि उसमें संदेह करे, जैसा कि अल्लाह तआला के कथन में है:
﴿وَدَخَلَ جَنَّتَهُ وَهُوَ ظَالِمٌ لِنَفْسِهِ قَالَ مَا أَظُنُّ أَنْ تَبِيدَ هَذِهِ أَبَدًا35 وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِنْ رُدِدْتُ إِلَى رَبِّي لَأَجِدَنَّ خَيْرًا مِنْهَا مُنْقَلَبًا 36﴾
"और उसने अपने बाग़ में प्रवेश किया, अपने ऊपर अत्याचार करते हुए, उसने कहा : मैं नहीं समझता कि इसका विनाश हो जायेगा कभी। और न ये समझता हूँ कि क़ियामत आएगी और यदि मुझे अपने पालनहार की ओर पुनः ले जाया गया, तो मैं अवश्य ही इससे उत्तम स्थान पाऊँगा।" [सूरा अल-कह्फ़: 35-36]।
5- निफ़ाक़ का कुफ़्र:
यानी इन्सान ज़बान से अल्लाह पर विश्वास रखने का दावा करे, लेकिन दिल के अंदर अविश्वास छुपाए रखे। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَمَا هُم بِمُؤۡمِنِينَ 8﴾
"और कुछ लोग ऐसे हैं, जो कहते हैं कि हम अल्लाह पर तथा आख़िरत के दिन पर ईमान लाए, हालाँकि वे हरगिज़ मोमिन नहीं हैं।" [सूरा अल-बक़रा: 8]।
और ये बड़े कुफ़्र के प्रकार हैं जो मिल्लत से बाहर निकाल देते हैं।
द्वितीय प्रकार: छोटा कुफ़्र:
परन्तु इस प्रकार की वजह से कोई सदैव जहन्नम में नहीं रहेगा, इससे मुराद हर ऐसा कार्य है, जिसे क़ुर्आन या हदीस के अंदर कुफ़्र तो कहा गया है, लेकिन इस शब्द के साथ 'अलिफ़ लाम' लगा हुआ नहीं है। इसपर बहुत से उदाहरण मौजूद हैं, उनमें से एक है: अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया:
»اثْنَتَانِ فِي النَّاسِ هُمَا بِهِمْ كُفْرٌ: الطَّعْنُ فِي النَّسَبِ، وَالنِّيَاحَةُ عَلَى المَيِّتِ.«
"लोगों के अंदर कुफ़्र की दो बातें पाई जाती रहेंगी : किसी के कुल पर कटाक्ष करना तथा मरे हुए व्यक्ति पर विलाप करना।"(4)
2) फ़रिश्तों पर ईमान:
उनका संबंध अदृश्य (गैब की) दुनिया से है, अल्लाह तआला ने उन्हें नूर से उत्पन्न किया है, वे अल्लाह तआला की इबादत करने वाले हैं। उनके पास रब एवं पूज्य होने की कोई विशेषता नहीं है। वे अल्लाह के आदेश की अवज्ञा नहीं करते, वो वही करते हैं, जिनका उन्हें आदेश दिया जाता है। फ़रिश्ते बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अल्लाह को छोड़ कोई नहीं जानता कि उनकी संख्या कितनी है।
फ़रिश्तों पर ईमान लाने में चार चीजें सम्मिलित हैं:
1- उनके अस्तित्व पर ईमान रखना।
2- उन फ़रिश्तों पर ईमान लाना जिनके नाम हमें पता हैं: जैसे: जिब्रील, इस्राफ़ील तथा मीकाईल आदि। जिनका नाम हमें मालूम नहीं है, हम उन पर सामूहिक रूप से ईमान रखते हैं।
3- उनकी जिन विशेषताओं को हम जानते हैं उन पर ईमान लाना, जो क़ुरआन व हदीस़ में आई हैं: जिब्रील की एक विशेषता, जो ख़ुद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताई है कि आपने उनको उस रूप में देखा है, जो रूप देकर अल्लाह ने उनको पैदा किया है। आपने देखा कि उनके छह सौ पंख थे और उन्होंने पूरे क्षितिज को ढाँप रखा था।
4- उनके उन कार्यों पर ईमान लाना जिनका हमें ज्ञान है; जैसे कि उनका अल्लाह तआला की (पवित्रता) बयान करना, और किसी उदासीनता और आलस्य के बिना, रात-दिन उसकी उपासना में लगे रहना।
उदाहरण स्वरूप : जिब्रील वह्य लाने का काम करते हैं।
इस्राफ़ील को सूर फूँकने की ज़िम्मेवारी दी गई है।
मौत के फ़रिश्ते को मौत के समय रूह क़ब्ज़ करने (आत्मा निकालने) का काम सौंपा गया है।
मालिक जहन्नम के दारोग़ा हैं और रिज़वान जन्नत के रखवाले हैं।
3) किताबों पर ईमान:
किताबों से मुराद वह आसमानी किताबें हैं, जिन्हें अल्लाह ने अपने रसूलों पर उतारा है जो इन्सानों के लिए मार्गदर्शन और उन पर दया हैं, ताकि वे दोनों जहानों (लोक-परलोक) की ख़ुशियों को प्राप्त कर सकें।
ग्रंथों पर ईमान लाने में चार चीज़ें सम्मिलित हैं :
1- इस बात पर ईमान रखना कि वो सचमुच अल्लाह की ओर से उतारी गई हैं।
2- जिन किताबों के नाम से हम अवगत हैं, उनपर नाम के साथ ईमान रखना। जैसे: मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाली किताब क़ुर्आन, मूसा अलैहिस्सलाम पर उतरने वाली किताब तौरात, ईसा अलैहिस्सलाम पर उतरने वाली किताब इंजील तथा दावूद अलैहिस्सलाम को दी गई किताब ज़बूर।
जिन किताबों के नाम से हम अवगत नहीं हैं, उनपर सामूहिक रूप से ईमान रखेंगे।
3- उनके द्वारा दी गई सूचनाओं की पुष्टि करना; जैसे क़ुरआन के द्वारा दी गई सूचनाएँ और पिछली पुस्तकों के द्वारा दी गई वह सुचनाएँ, जो छेड़छाड़ से सुरक्षित हैं।
4- इन किताबों के उन प्रावधानों पर ईमान रखना तथा उन्हें मानना जो निरस्त नहीं हुए हैं। चाहे हम उनकी हिकमत समझ पाएँ या नहीं समझ पाएँ। और सभी पिछली किताबें महान क़ुरआन के द्वारा निरस्त (मन्सूख़) कर दी गई हैं, इसलिए पिछली आसमानी पुस्तकों के केवल उन्हीं प्रावधानों पर अमल करना जायज़ है, जो सही हैं और जिनको क़ुर्आन ने मान्यता दी है।
4) रसूलों -उन सब पर अल्लाह की सलामती हो- पर ईमान:
रुसुल: (रसूल) का बहुवचन है; और रसूल वह मनुष्य होते हैं जिस पर शरीअत की वह्य (प्रकाशना) की गयी हो और उन्हें उसके प्रसार का आदेश दिया गया हो। सबसे पहले रसूल नूह अलैहिस्सलाम और अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। वे इंसान मख़लूक़ हैं, उनके पास रुबूबिय्यत और उलूहिय्यत की कोई भी विशेषता नहीं है।
रसूलों पर ईमान में सम्मिलित हैं:
1- इस बात पर ईमान कि उनकी रिसालत अल्लाह की ओर से सत्य है, जिसने उनमें से किसी एक की रिसालत का इनकार किया, उसने समस्त रसूलों का इनकार किया।
2- उन पैगंबरों पर ईमान लाना जिनके नाम हमें पता हैं, जैसे: मुहम्मद, इब्राहीम, मूसा, ईसा, और नूह़ अलैहिमुस्स्लातु वस्सलाम। ये रसूलों में से 'उलुल अज़्म (दृढ़ निश्चय वाले)' हैं।
जिन रसूलों का नाम हम नहीं जानते, उनपर हम सामूहिक रूप से ईमान रखेंगे। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا رُسُلٗا مِّن قَبۡلِكَ مِنۡهُم مَّن قَصَصۡنَا عَلَيۡكَ وَمِنۡهُم مَّن لَّمۡ نَقۡصُصۡ عَلَيۡكَ...﴾
"तथा (ऐ नबी!) हम भेज चुके हैं बहुत-से रसूलों को आपसे पूर्व, जिनमें से कुछ का वर्णन हम आपसे कर चुके हैं तथा कुछ का वर्णन आपसे नहीं किया है...।" [सूरा ग़ाफ़िर : 78]।
3- उनकी जो ख़बरें साबित हों उनकी पुष्टि करना, उन सब पर सलाम हो।
4- जो रसूल हमारे पास भेजे गए हैं, उनकी शरीअत पर अमल करना, और वह अल्लाह के अंतिम रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हैं।
5) आख़िरत के दिन पर ईमान:
आख़िरत के दिन से मुराद क़ियामत का दिन है, जिस दिन लोगों को हिसाब-किताब और प्रतिफल के लिए उठाया जाएगा। उसे आख़िरत का दिन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उसके बाद कोई दिन नहीं होगा। उस दिन जन्नत वाले जन्नत में और जहन्नम वाले जहन्नम में अपने ठिकाने ग्रहण कर लेंगे।
आख़िरत के दिन पर ईमान के अंदर तीन बातें आती हैं:
अ- दोबारा जीवित करके उठाए जाने पर ईमान:
यानी इस बात पर ईमान रखना कि सूर में दूसरी बार फूँक मारे जाने के बाद मुर्दों को जीवित किया जाएगा, लोग संसार के रब की ओर उठेंगे, नंगे पाँव बिना जूतों के, नंगे बदन बिना कपड़ों के, बिना ख़तना किए हुए। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿كَمَا بَدَأْنَا أَوَّلَ خَلْقٍ نُعِيدُهُ وَعْدًا عَلَيْنَا إِنَّا كُنَّا فَاعِلِينَ 104﴾
''जिस प्रकार हमने पहले पैदा किया था, उसी प्रकार दोबारा पैदा कर देंगे। यह हमारा वादा है, हम ऐसा अवश्य करने वाले हैं।" [सूरा अल-अंबिया: 104]।
ब- हिसाब-किताब और प्रतिफल पर ईमान:
यानी इस बात पर ईमान कि बन्दे से उसके कर्मों का हिसाब लिया जाएगा और उसे उसके कर्मों का प्रतिफल दिया जाएगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّ إِلَيۡنَآ إِيَابَهُمۡ 25 ثُمَّ إِنَّ عَلَيۡنَا حِسَابَهُم26﴾
"निःसंदेह हमारी ही ओर उनको लौटकर आना है। फिर बेशक हमारे ही ज़िम्मे उनका हिसाब लेना है।" [सूरा अल-ग़ाशिया : 25-26]।
जन्नत और जहन्नम (स्वर्ग-नरक) पर ईमान:
और यह कि वे सृष्टि के लिए अनंत गंतव्य हैं; जन्नत आनंद का घर है जिसे अल्लाह तआला ने मोमिनों और परहेज़गारों के लिए तैयार कर रखा है, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आज्ञा का पालन किया था। उसमें ऐसी-ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें न किसी आँख ने देखा है, न उनके बारे में किसी कान ने सुना है और न उनकी कल्पना किसी इन्सान के दिल ने की है।
जहन्नम, नरक; वह यातना का घर है, जिसे अल्लाह ने अविश्वासियों के लिए तैयार कर रखा है, जिन्होंने अल्लाह के प्रति अविश्वास का व्यवहार किया और उसके रसूलों की अवज्ञा की। उसमें ऐसी भयानक यातना और सज़ा के प्रकार हैं, जिसका कभी किसी के दिल में खटका भी नहीं हुआ होगा।
6) भली-बुरी तक़दीर पर ईमान:
तक़दीर से मुराद है: सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह द्वारा अपने पूर्व ज्ञान एवं अपनी हिकमत के अनुसार आने वाले समय में घटने वाली तमाम घटनाओं का निर्धारण।
तथा तक़दीर पर ईमान के अंदर चार बातें शामिल हैं:
1- इल्म (ज्ञान): और इसका अर्थ है अल्लाह तआला के ज्ञान पर ईमान रखना, और यह कि वह हर उस विषय को जानता है, जो हो चुका है और जो होने वाला है, और वह किस प्रकार होगा, संक्षिप्त एवं विस्तृत रूप से, अनादिकाल से अनंतकाल तक। तथा अल्लाह तआला उन तमाम बातों को जानता है, जो नहीं हुईं, और अगर होतीं तो कैसी होतीं। जैसा की पवित्र अल्लाह ने फ़रमाया:
﴿وَلَوۡ رُدُّواْ لَعَادُواْ لِمَا نُهُواْ عَنۡهُ ...﴾
"और यदि उन्हें वापस भेज दिया जाए, तो अवश्य फिर वही करेंगे, जिससे उन्हें रोका गया था...।" [सूरा अल-अन्आम : 28]।
2- लिपिबद्ध करना : यानी अल्लाह तआला ने क़ियामत तक प्रकट होने वाली हर चीज़ की तक़दीर को लिख रखा है। जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِۚ إِنَّ ذَٰلِكَ فِي كِتَٰبٍۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ70﴾
"(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह जानता है, जो आकाश तथा धरती में है? निःसंदेह यह एक किताब में (अंकित) है। निःसंदेह यह अल्लाह के लिए अति सरल है।" [सूरा अल-हज्ज: 70]।
3- मशीअत (ईश्वरेच्छा): यह विश्वास रखना कि इस ब्रह्माण्ड में केवल वही होता है जो सर्वशक्तिमान और प्रतापी अल्लाह चाहता है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَرَبُّكَ يَخۡلُقُ مَا يَشَآءُ وَيَخۡتَارُ ...﴾
"और आपका पालनहार जो चाहता है पैदा करता है और चुन लेता है...।" [सूरा अल-क़सस : 68]।
वैसे, इन्सान के पास भी अपनी चाहत होती है, लेकिन वह अल्लाह के इरादे और चाहत के अधीन होती है, जैसा कि अल्लाह तआला ने कहा है :
﴿وَمَا تَشَآءُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ29﴾
"तथा तुम विश्व के पालनहार के चाहे बिना कुछ नहीं चाह सकते।" [सूरा अल-तकवीर : 29]।
4- ख़ल्क़ (रचना): यह ईमान रखना कि सर्वशक्तिमान और प्रतापी अल्लाह ने सृष्टि और उनके कार्यों तथा अच्छे और बुरे सभी कर्मों को उत्पन्न किया है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿ٱللَّهُ خَٰلِقُ كُلِّ شَيۡءٖۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ وَكِيلٞ 62﴾
"अल्लाह ही प्रत्येक वस्तु का पैदा करने वाला तथा वही प्रत्येक वस्तु का रक्षक है।" [सूरा अल-ज़ुमर : 62]।
इन श्रेणियों को इस पंक्ति में संकलित किया गया है :
हमारे स्वामी का ज्ञान, उसका हर बात को लिख रखना तथा उसकी इच्छा
***
और उत्पन्न करना। यानी अस्तित्व में लाना और आकार देना।
तीसरा विषय : एहसान :
एहसान: इसका एक ही स्तंभ है; और वह यह है कि आप अल्लाह की उपासना इस तरह करें कि जैसे आप उसे देख रहे हैं, यदि यह एह़सास न उत्पन्न हो सके कि आप उसे देख रहे हैं, तो (यह स्मरण रखें कि) वह आपको अवश्य देख रहा है।
इसका अर्थ यह है कि इन्सान अल्लाह तआला की इबादत इस प्रकार करे कि जैसे वह अल्लाह के सामने खड़ा है। इसका तात्पर्य यह है कि पवित्र अल्लाह के लिए पूर्ण भय और पूर्ण समर्पण अनिवार्य है। और यह कि इबादत को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत के अनुसार अदा करना ज़रूरी है।
एहसान के दो स्तर हैं: और एहसान के गुण से सुसज्जित एहसान (इबादत) में दो विभिन्न स्थानों पर होते हैं।
पहला स्थान : और यह सबसे ऊँचा है, और यह मुशाहिदा वाला स्थान है।
एहसान : एहसान एक अलग स्तंभ है। एहसान यह है कि आप अल्लाह की उपासना इस प्रकार करें कि आप उसे देख रहे हैं। यदि यह कल्पना न उत्पन्न हो सके कि आप उसे देख रहे हैं, तो (यह स्मरण रखें कि) वह आपको अवश्य देख रहा है।
दूसरा स्थान : इख़्लास़ और मुराक़बा का स्थान, और वह यह है कि बंदा इस बात को अपने दिल में रखे कि अल्लाह उसे देख रहा है और उसकी हर बात से वाकिफ है। जब वह इस बात को अपने दिल में रखता है, तो वह अल्लाह तआला के लिए विशुद्ध होता है।
चौथा विषय : संक्षेप में अह्ल-ए-सुन्नत व जमात के कुछ सिद्धांत:
1- अल्लाह की किताब और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत का पालन करना, आंतरिक और बाहरी रूप से। किसी भी इंसान के कलाम को सर्वशक्तिमान और प्रतापी अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वाणी पर प्राथमिकता न देना।
2- अपने दिल और ज़बान को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा के बारे में स्वच्छ रखना। उनका मानना है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद खलीफ़ा अबू बक्र, फिर उमर, फिर उसमान, फिर अली रज़ियल्लाहु अन्हुम हैं।
3- अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के परिवार के लोगों से मोहब्बत और दोस्ती रखना, विशेष रूप से आपके परिवार के नेक लोगों से।
4- शासकों और अमीरों के विरुद्ध विद्रोह न करना, अगरचे वे अन्याय करें। उनके लिए सम्मति एवं क्षमा की दुआ करना। उनपर बद-दुआ न करना। अल्लाह के आज्ञापालन के दायरे में रहकर उनकी बातों को मानना फ़र्ज़ है, जब तक वे किसी गुनाह के काम का आदेश न दें। यदि वे गुनाह का आदेश दें; तो उसमें उनका अनुसरण नहीं किया जाएगा। और भलाई के काम में उनका आज्ञापालन जारी रखा जाएगा।
पाँचवाँ: औलिया की करामात (चमत्कार) पर विश्वास करना; इनसे मुराद वह असाधारण घटनाएँ हैं, जो महान अल्लाह उनके हाथों द्वारा प्रकट करता है।
6- केवल पापों और बड़े गुनाहों के कारण किसी मुसलमान को काफ़िर नहीं ठहराते। जैसा कि ख़वारिज करते हैं। बल्कि ईमानी भाईचारा पापों के साथ भी स्थिर रहता है। वे गुनाहगार के बारे में कहते हैं कि: वह अपने ईमान के साथ मोमिन है, और अपने बड़े गुनाह के कारण फ़ासिक है।
दूसरा अध्याय : इबादत से संबंधित बातें
पहला विषय : तहारत (पवित्रता) :
तहारत का शाब्दिक अर्थ: शारीरिक और मानसिक गंदगी से स्वच्छता और पवित्रता है।
शरई दृष्टि से: हदस (अपवित्रता) का समाप्त होना और नजस (गंदगी) का दूर होना। तहारत नमाज़ की चाभी है, इसलिए, इसके मसायल जानना हर मुसलमान का एक महत्वपूर्ण दीनी कर्तव्य है।
प्रथम: पानी के प्रकार:
1- त़हूर; जिससे पाकी हासिल की जा सके, चाहे वह अपने मूल रूप पर बाक़ी रहे; जैसे वर्षा का जल, या नदियों का, या समुद्रों का, या उसमें पाक चीज़ मिली हो, जो उस पर हावी न हो और उसका नाम न छीने।
2- नापाक; इसका उपयोग करना ठीक नहीं है। इसलिए कि यह 'ह़दस़' (नापाकी की स्थिति) को दूर नहीं करता, और नजासत को भी दूर नहीं करता। नापाक पानी से तात्पर्य वह पानी है: जिसका रंग या गंध या स्वाद नापाक वस्तु के कारण बदल गया हो।
दूसरा: नजासत:
नजासत: एक विशेष प्रकार की गंदगी है, उसकी स्थिति नमाज़ से रोकती है; जैसे मूत्र, मल, रक्त आदि, जो शरीर, स्थान और वस्त्र में होते हैं।
चीज़ों के संबंध में मूल सिद्धांत उनकी वैधता और शुद्धता है, तो जिसने किसी चीज़ की नजासत का दावा किया है, उसको प्रमाण देना होगा। नजासत में शामिल नहीं है: बलगम, इंसान का पसीना, और गधे का पसीना, बल्कि ये पाक हैं यद्यपि गंदे हैं। और हर नापाक वस्तु गंदी है, परन्तु इसका उल्टा सही नहीं।
और नापाकी की तीन श्रेणियाँ होती हैं:
पहला दर्जा : सख़्त नापाकी :
उदाहरण: वह नजासत जिसमें कुत्ता मुँह डाल देता है, उसको पाक करने का तरीक़ा यह है कि उसे सात बार धोया जाए, पहली बार मिट्टी से।
दूसरा दर्जा : हल्की नापाकी :
जैसे शिशु का पेशाब जब कपड़े या उसके समान किसी चीज़ पर लग जाए। उसे पाक करने का तरीक़ा यह है कि उस पर इस तरह पानी छिड़का जाए कि पानी हावी हो जाए। रगड़ने या निचोड़ने की आवश्यकता नहीं है।
तीसरी बातः मध्यम अपवित्रता:
जैसे: मानव का मूत्र और मल, और अधिकांश अपवित्रताएँ, जब ज़मीन या कपड़े आदि पर गिरती हैं। उसे पाक करने का तरीका: अगर गंदगी का कोई ठोस अंश हो तो उसे हटाना, और उसके स्थान को पानी या अन्य सफाई के साधनों से साफ करना।
जिनकी नजासत पर प्रमाण मौजूद है उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
1- इंसान का मूत्र और शौच।
2- मज़ी और वदी।(5)
3-ऐसे जानवर का गोबर, जिसका मांस खाया नहीं जाता।।
4- हैज़ (मासिक धर्म) और निफ़ास का रक्त (प्रसवोत्तर रक्त)।
5- कुत्ते की लार।
6- मुर्दार, और इससे अपवाद हैं :
क- इन्सान जब मर जाता है।
ख- मरी हुई मछली और टिड्डी।
ग- मुर्दार, वह जिसका खून बहता नहीं है; जैसे मक्खी, चींटी, मधुमक्खी और इसी तरह के अन्य।
घ- मरे हुए जानवर की हड्डी, सींग, नाखून, बाल और पंख।
गंदगी को पाक करने की विधि यह है:
1- पानी द्वारा पाक करना। पाक करने का यही असल तरीक़ा है। कोई दूसरा तरीक़ा उसी समय अपनाया जाएगा, जब शरीअत से साबित हो।
2- शरीअत में अशुद्ध या अशुद्ध हुई चीज़ों को पाक करने की विधि:
क- मृत जानवर की खाल को चर्मशोधन द्वारा पाक किया जाता है।
ख: बरतन को पाक करने का तरीक़ा जब कुत्ता उसमें मुँह डाल दे; उसे सात बार धोया जाए; जिसमें पहली बार मिट्टी से धोया जाए।
ग- कपड़े में जब माहवारी का ख़ून लग जाए, तो उसे पाक करने का तरीक़ा यह है कि उसे रगड़ दिया जाए, फिर पानी के साथ खुरच दिया जाए, फिर उसपर पानी छिड़क दिया जाए। अगर इसके बाद भी कोई निशान रह जाए तो कोई हर्ज नहीं है।
घ- महिला के कपड़े का निचला भाग गंदगी पर पड़ जाए, तो बाद में पाक मिट्टी पर पड़ जाने की स्थिती में पाक हो जाता है।
ङ- कपड़े में दूध पीते बच्चे का पेशाब लग जाए, तो उसपर पानी छिड़क देने से और लड़की का पेशाब लग जाए, तो धो देने से, पाक हो जाता है।
च- कपड़े में मज़ी (पूर्व-स्खलन द्रव) लग जाए, तो लगे हुए स्थान पर पानी छिड़ककर पाक किया जाता है।
छ- जूते के तलवे को पाक ज़मीन पर रगड़कर साफ़ करने से वह पाक हो जाता है।
ज- ज़मीन को गंदगी से पाक करने का तरीक़ा यह है कि उस स्थान पर एक बालटी पानी डाल दिया जाए या उसे इस तरह छोड़ दिया जाए कि धूप अथवा हवा से सूख जाए। नापाकी का असर ख़त्म हो जाने के बाद जगह पाक हो जाती है।
तीसरा बिंदु : नापाक व्यक्ति के लिए कौन-कौन से कार्य हराम हैं :
वो चीज़ें जो छोटी या बड़ी नापाकी वाले व्यक्ति पर हराम होती हैं:
1- नमाज़, फ़र्ज़ हो या नफ़्ल; क्योंकि इब्ने उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित एक हदीस में है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है :
»لَا يَقْبَلُ اللَّهُ صَلاَةً بِغَيْرِ طُهُورٍ«.
"बिना वुज़ू के अल्लाह नमाज़ स्वीकार नहीं करता।"(6)
2- मुसहफ़ को छूना; क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर से अम्र बिन हज़्म के लिए जो लिखा गया था, उसमें एक बात यह लिखी थी :
»لَا يَمَسُّ الْقُرْآنَ إِلَّا طَاهِرٌ.«
"क़ुर्आन को केवल पाक व्यक्ति ही छूए।"(7)
3-पुराने घर (काबा) का तवाफ़; नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारणः
»الطَّوَافُ بِالْبَيْتِ صَلاةٌ، إِلَّا أَنَّ اللَّهَ أَبَاحَ فِيهِ الْكَلَامَ.«
"काबा का तवाफ़ नमाज़ के समान है, सिवाय इसके कि अल्लाह ने इसमें बात करने की अनुमति दी है।"(8)
तथा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तवाफ़ के लिए वुज़ू किया है। और यह भी कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सहीह तौर पर सिद्ध है कि आप ने माहवारी वाली स्त्री को अल्लाह के घर का तवाफ़ करने से मना किया है, यहाँ तक कि वह पाक हो जाए।
और जिन चीज़ों का निषेध विशेष रूप से बड़े हदस वाले के लिए है, वे हैं :
1- क़ुरआन पढ़ना, क्योंकि अली रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है: "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कुर्आन से जनाबत के सिवा कोई चीज़ नहीं रोकती थी।"(9)
2- बिना वुज़ू के मस्जिद में ठहरना; इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَقۡرَبُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَنتُمۡ سُكَٰرَىٰ حَتَّىٰ تَعۡلَمُواْ مَا تَقُولُونَ وَلَا جُنُبًا إِلَّا عَابِرِي سَبِيلٍ حَتَّىٰ تَغۡتَسِلُواْ...﴾
"ऐ ईमान वालो! तुम जब नशे में रहो, तो नमाज़ के समीप न जाओ, जब तक जो कुछ बोलो, उसे न समझो और न जनाबत की स्थिति में स्नान करने से पहले (मस्जिदों के समीप जाओ), परन्तु रास्ता पार करते हुए।" [सूरा अल-निसा : 43]।
यदि किसी पर बड़ी नापाकी हो और वह वुज़ू कर ले, तो उसके लिए मस्जिद में ठहरना जायज़ है। इसी तरह, बड़ी नापाकी की अवस्था में व्यक्ति के लिए मस्जिद से केवल गुज़रने के लिए, बिना वहाँ बैठे, गुज़रने में कोई हर्ज नहीं है।
चौथा: पेशाब-पाखाना के आदाब:
पेशाब-पाखाना के समय यह मुस्तहब (वांछित) है:
1- लोगों से दूरी अपनाना और एकांत में जाना।
2- प्रवेश करते समय की साबित दुआ कहना, जो यह है:
»اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْخُبْثِ وَالْخَبَائِثِ.«
"ऐ अल्लाह! मैं नापाक जिन्नों और नापाक जिन्नियों से तेरी शरण माँगता हूँ।"(10)
तथा पेशाब-पाखाना के समय वाजिब है:
1- पेशाब से बचना।
2- नग्नता (शरीर के छुपाने योग्य भाग) को छुपाए रखना।
पेशाब-पाखाना (मल-मूत्र त्याग) के समय निम्नलिखित कार्य निषिद्ध हैं:
1- क़िब्ला की ओर मुँह करना या पीठ करना।
2- लोगों के रास्तों और सार्वजनिक स्थानों पर पेशाब-पाखाना करना।
3- स्थिर जल में मूत्र त्यागना।
पेशाब-पाखाना के समय निम्नलिखित कार्य मकरूह (नापसंद) हैं:
1- पेशाब करते समय दाएं हाथ से लिंग को छूना।
2- दाएँ हाथ से इस्तिंजा और इस्तिजमार (शौच या पेशाब करने के बाद पानी एवं ढेले (पत्थर) से शुद्धिकरण)।
3- पाखाना-पेशाब करते समय बात करना, विशेषकर अल्लाह का ज़िक्र करना मकरूह है।
पाँचवाँ: इस्तिंजा और इस्तिजमार के नियम:
इस्तिंजा: दोनों मार्गों से निकलने वाले (पेशाब-पाखाना आदि) की पानी से सफ़ाई करना।
इस्तिजमार: दोनों मार्गों से निकलने वाले पदार्थ की पानी के अतिरिक्त किसी और चीज़, जैसे पत्थर या रूमाल आदि द्वारा सफ़ाई करना।
जिससे इस्तिजमार किया जाता है उसकी शर्तें:
1- मुबाह़ (वैध) हो।
2- पवित्र हो।
3- साफ़ हो।
4- हड्डी या गोबर न हो।
5- कोई सम्मानित वस्तु न हो। जैसे वे कागज़, जिनमें सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का नाम लिखा हो।
इस्तिजमार पर ही निर्भर रहना दो शर्तों के साथ जायज़ है :
1- बाहर निकलने वाली चीज़ें अपनी सामान्य जगह से आगे न बढ़ें।
2- इस्तिजमार के लिए तीन या अधिक स्वच्छ पत्थरों का प्रयोग किया जाए।
छठा: वुज़ू के अहकाम (नियम):
तीन इबादतों के लिए वुज़ू करना ज़रूरी है:
1- नमाज़; चाहे वह फ़र्ज़ हो या नफ़्ल।
2- मुसहफ़ को छूना।
3- तवाफ़
वुज़ू की शर्तें:
1- इस्लाम।
2- अक़्ल वाला होना।
3- भले-बुरे की पहचान रखना।
4- निय्यत : इसका स्थान दिल है और उसके लिए घड़े हुए शब्दों का उच्चारण, बिदअत है। और जो कोई वुज़ू करना चाहता है, तो (ऐसा सोचते ही) उसने निय्यत कर ली। वुज़ू के अंगों को ठंडक या सफाई की निय्यत से धोना वुज़ू नहीं है।
5- तहारत (वुज़ू) सम्पूर्ण होने तक निय्यत बरक़रार रखना।
6- वुज़ू को आवश्यक बनाने वाले कारणों का समाप्त होना, लेकिन उसके दायरे से बाहर होगा: वह व्यक्ति जिसे लगातार पेशाब की समस्या हो, और इस्तिहाज़ा (माहवारी के बाद भी रक्त जारी रहने की बीमारी) से ग्रसित औरत।
7- मूत्र या मल निकलने के बाद, वुज़ू से पहले इस्तिंजा या इस्तिजमार करना, अर्थात; पानी या किसी अन्य वस्तु द्वारा सफ़ाई कर लेना।
8- पानी का पाक तथा जायज़ होना।
9- त्वचा तक पानी पहुँचने से रोकने वाली चीज़ को हटाना।
10- उस व्यक्ति के लिए नमाज़ का समय होना जिसका वुज़ू निरंतर टूटता रहता है।
वुज़ू के फ़र्ज़:
1- चेहरा का धोना, इसी के अन्तर्गत कुल्ली करना और नाक में पानी चढाना है।
2- दोनों हाथों को कोहनियों के साथ धोना।
3- पूरे सर का मसह करना, और उसी में कानों का मसह भी शामिल है।
4- दोनों पैर को टखनों के साथ धोना।
5- वुज़ू के अंगों के बीच क्रम का पालन।
6- निरंतरता: अर्थात अंगों के बीच लंबा अंतराल न हो।
वुज़ू का तरीक़ा
1- बिस्मिल्लाह कहना।
2- दोनों हथेलियों को तीन बार धोना।
3- चेहरा तीन बार धोना, इसी के अन्तर्गत कुल्ली करना और नाक में पानी चढाना है।
4- फिर दोनों हाथों को कोहनियों समेत तीन बार धोना है, पहले दायां हाथ फिर बायां।
5- सर का मसह करना, और उसी में कान का मसह भी शामिल है।
6- टखनों तक तीन बार पैर धोना, पहले दाहिने पैर से शुरू करें फिर बाएं पैर से।
वुज़ू को तोड़ने वाली चीज़ें:
1- दोनों रास्तों से निकलने वाली चीज़ें, जैसे: पेशाब, वायु (पाद), और पाखाना।
2- शरीर से बाहर निकलने वाली अपवित्र और गंदी चीज़।
3- अक़्ल का लुप्त हो जाना नींद से या अन्य कारणों से।
4- और बिना किसी आड़ के लिंग या गुदा को हाथ से छूना।
5- ऊँट का मांस खाना।
6- इस्लाम से फिर जाना, अल्लाह हमें और मुसलमानों को इससे बचाए।
सातवां: ख़ुफ़्फ़ एवं जौरब पर मसह के अहकाम:
1- ख़ुफ़्फ़: वह है जो दोनों क़दमों पर पहना जाता है, एवं चमड़े आदि का होता है।
2- जौरब: वह है जो पैरों पर पहना जाता है और ऊन या कपास आदि से बना होता है ।
ख़ुफ़्फ़ एवं जौरब पर मसह की शर्तें:
1- उन्हें संपूर्ण पवित्रता प्राप्त करने के बाद पहना जाए।
2- ख़ुफ़्फ़ एवं जौरब टखने समेत पैरों को ढक कर रखें।
3- दोनों पवित्र हों।
4- मसह निर्धारित अवधि में किया जाए।
5- मसह वुज़ू में किया जाए, स्नान में नहीं।
6- छठी शर्त यह है कि ख़ुफ़्फ़ और इस जैसी चीज़ें जायज़ हों। अगर किसी ने छीना हुआ ख़ुफ़्फ़ पहन रखा हो या किसी पुरुष ने रेशम का ख़ुफ़्फ़ पहन रखा हो, तो मसह करना जायज़ नहीं होगा। क्योंकि हराम चीज़ का प्रयोग करके शरीअत द्वारा दी गई छूट का लाभ नहीं उठाया जा सकता।
मसह की अवधि:
ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एक रात है और यात्री के लिए तीन दिन तीन रात।
मसह का तरीक़ा:
हाथ को पानी से तर किया जाए, और उसे ख़ुफ़्फ़ या जौरब के ऊपरी भाग पर, पैरों की उँगलियों से पिंडली तक, एक बार फिराया जाए।
मसह को निष्प्रभावी करने वाली चीज़ें:
1- मसह की अवधि का समाप्त हो जाना।
2- मोज़े का उतार देना, यदि इंसान दोनों मोज़ों में से किसी एक को भी उतार दे।
3- बड़ी नापाकी का होना।
मोज़ों पर मसह का हुक्म:
यह एक रुख़्सत है, और अल्लाह की दी हुई रुख़्सत को अपनाना और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी करना, और नवाचारियों का विरोध करना, मोज़ों को उतारने और पैरों को धोने से बेहतर है।
3- जबाइर,असाइब तथा लुसूक़ पर मसह:
जबाइर: फ्रेक्चर पर लगाया जाने वाला प्लास्टर या बाँधी जाने वाली लकड़ियाँ आदि।
असाइब : कपड़े आदि से बनी पट्टी जो घाव, चोट या जले हुए स्थान पर बाँधी जाती है।
लुसूक़: घावों या फोड़ों पर इलाज के लिए लगाया जाने वाला लेप।
जबाइर,असाइब तथा लुसूक़ पर मसह का हुक्म:
जब उन्हें लगाए रखना ज़रूरी हो, तो उनपर मसह करना जायज़ है। बस शर्त यह है कि ये ज़रूरत के स्थान से आगे न बढ़ें।
और उनपर मसह जायज़ नहीं है: जब उनकी आवश्यकता समाप्त हो जाए, या उन्हें उतारने में कोई कठिनाई या हानि न हो।
जबाइर,असाइब तथा लुसूक़ पर मसह का तरीक़ा:
उनके चारों ओर धोए, और सभी दिशाओं से उनपर मसह करे। और वुज़ू की जगह से अधिक पर मसह नहीं करे।
अष्टम: तयम्मुम के नियम:
तयम्मुम: पवित्रता के उद्देश्य से विशेष तरीके से पवित्र मिट्टी से चेहरे और दोनों हथेलियों का मसह करना है।
तयम्मुम का हुक्म:
पानी की अनुपलब्धता या उसके उपयोग में असमर्थता की स्थिति में वुज़ू और ग़ुस्ल के स्थान पर तयम्मुम करना अनिवार्य है।
तयम्मुम की अनुमति देने की हिकमत :
तयम्मुम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत की विशेषताओं में से है। यह इस उम्मत पर अल्लाह की विशेष कृपा और उपकार है कि उसने इसके लिए तयम्मुम को जायज़ किया जो पिछली उम्मतों के लिए नहीं था।
वो हालात जिनमें तयम्मुम करना धर्मसंगत है:
1- जब पानी उपलब्ध न हो और तलाश करने के बावजूद न मिल सके। ऐसा चाहे ठहरे हुए अवस्था में हो या यात्रा में।
2- यदि पास में बस इतना पानी हो कि वह पीने या खाना पकाने के लिए आवश्यक हो और उससे पवित्रता प्राप्त कर लेने की अवस्था में ज़रूरत पूरी न हो पाए। मसलन वह खुद, अथवा कोई दूसरा व्यक्ति या कोई सम्मानित पशु प्यासा रह जाए।
3- जब पानी के प्रयोग से अपने शरीर को रोग के कारण हानि पहुँचने का भय हो या रोग के ठीक होने में देरी हो।
4- यदि कोई ऐसी बीमारी हो कि आदमी हिल-डुल न सके, वुज़ू कराने के लिए कोई मौजूद न हो और समय के निकल जाने का भय हो।
5- यदि पानी के उपयोग से ठंड लगने का डर हो और उसे गर्म करने का कोई साधन न मिले, तो तयम्मुम करे और नमाज़ पढ़े।
तयम्मुम की विधि:
अपने दोनों हाथों को, उनकी उंगलियों को खोलकर मिट्टी पर मारे, फिर अपनी उंगलियों के अंदरूनी भाग को चेहरे पर फेरे तथा अपनी हथेलियों के अंदरूनी हिस्से को हथेलियों के बाहरी हिस्से पर फेरे। पूरे चेहरे और दोनों हथेलियों पर पूर्ण रूप से फेरे।
तयम्मुम को निष्प्रभावी करने वाली चीज़ें:
1- अगर पानी न मिलने के कारण तयम्मुम किया गया हो, तो पानी मिलने पर तयम्मुम ख़त्म हो जाता है। और अगर तयम्मुम पानी प्रयोग करने की क्षमता न रखने के कारण किया गया हो, तो उसके प्रयोग की क्षमता हो जाने के बाद तयम्मुम टूट जाएगा।
2- वुज़ू को तोड़ने वाले किसी भी कारण से, या स्नान को अनिवार्य करने वाली किसी भी चीज़ से, जैसे जनाबत, माहवारी और प्रसवोत्तर रक्तस्राव।
पानी का उपयोग करने में असमर्थ और तयम्मुम करने में असमर्थ व्यक्ति का हुक्म:
जब पानी और मिट्टी दोनों उपलब्ध न हों, या ऐसी स्थिति में पहुँच जाएँ जहाँ पानी या मिट्टी से त्वचा को छूना संभव न हो; तो वह अपनी स्थिति के अनुसार बिना वुज़ू और बिना तयम्मुम के नमाज़ पढ़ेगा; क्योंकि अल्लाह किसी जान पर उसके सामर्थ्य से अधिक बोझ नहीं डालता। नमाज़ पढ़ने के बाद अगर पानी तथा मिट्टी मिल जाए या उनके इस्तेमाल की शक्ति आ जाए, तो वह अपनी पढ़ी हुई नमाज़ नहीं दोहराएगा। क्योंकि उसने वह काम कर लिया है, जिसका उसे आदेश दिया गया है। इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿...فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ مَا ٱسۡتَطَعۡتُمۡ...﴾
"...तुम अपनी शक्ति अनुसार अल्लाह से डरो...।" [सूरा अल-तग़ाबुन: 16]।
तथा नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है :
»إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِأَمْرٍ فَأْتُوا مِنْهُ مَا اسْتَطَعْتُمْ.«
"जब मैं तुम्हें किसी बात का आदेश दूँ, तो तुम लोग जहाँ तक हो सके, उसे पूरा करने का प्रयत्न करो।"(11)
फायदा: अगर जनाबत की वजह से तयम्मुम किया और फिर पानी मिल जाए, तो वह गुस्ल करेगा।
नौवां: माहवारी और प्रसवोत्तर रक्तस्राव से संबंधित शरई आदेश एवं निर्देश :
पहला बिंदु : ह़ैज़ (माहवारी)
यह एक प्राकृतिक और स्वाभाविक रक्त है, जो निर्धारित समय में गर्भाशय के गढ़े से निकलता है। आम तौर पर हर महीने छह या सात दिन निकलता है, और यह बढ़ भी सकता है या घट भी सकता है, औरत की तबीयत एवं प्रकृति के अनुसार उसका महीना लंबा या छोटा हो सकता है।
मासिक धर्म वाली महिलाओं से संबंधित शरई आदेश एवं निर्देश :
1- माहवारी की अवस्था में स्त्री न नमाज़ पढ़ सकती है और न रोज़ा रख सकती है। उसकी यह दोनों इबादतें सही भी नहीं होंगी।
2- रजस्वला स्त्री जब हैज़ से पाक हो जाये, तो वह रोज़ों की क़ज़ा करेगी, लेकिन नमाज़ की नहीं।
3- उसके लिए काबा का तवाफ़ करना जायज़ नहीं है। क़ुरआन नहीं पढ़ेगी, मस्जिद में नहीं बैठेगी।
4- उसके पति के लिए उससे संभोग करना हराम है, जब तक कि माहवारी समाप्त न हो जाए और वह स्नान न कर ले।
5- माहवारी की अवस्था में पति अपनी पत्नी से संभोग के अतिरिक्त सब कुछ, जैसे छूना एवं चुंबन लेना आदि कर सकता है।
6- पति अपनी पत्नी को माहवारी की अवस्था में तलाक़ नहीं दे सकता।
और त़ुहर खून का रुक जाना है, जब खून रुक जाए; तो वह पवित्र हो गई और उसकी माहवारी की अवधि समाप्त हो गई, अतः उस पर स्नान करना अनिवार्य है। स्नान के बाद औरत वह सारे कार्य कर सकती है, जो माहवारी के सबब मना हो गए थे।
यदि पाक हो जाने के बाद गदला या पीला ख़ून देखे, तो उसकी ओर ध्यान न दे।
दूसरा: निफ़ास (प्रसवोत्तर रक्तस्राव):
इससे मुराद वह रक्त है जो प्रसव के लिए और उसके बाद गर्भाशय से निकलता है। यह दरअसल गर्भावस्था के दौरान रुका हुआ शेष रक्त होता है।
और जायज़ बातों में निफ़ास, हैज़ की तरह है, जैसे योनि के अलावा रजस्वला के शेष शरीर से आनंद लेना।
और हराम चीज़ों में भी निफास हैज़ ही की तरह है; जैसे कि संभोग, रोज़ा और नमाज़ का निषेध, तलाक़, तवाफ़ और क़ुरआन की तिलावत, तथा मस्जिद में ठहरना, और उसके रक्तस्राव के रुकने पर स्नान का वाजिब होना, जैसे रजस्वला के लिए।
उसे हायज़ा ही की तरह रोज़ों की क़ज़ा करनी होगी, लेकिन नमाज़ की नहीं।
और निफास की अधिकतम अवधि चालीस दिन है, यदि प्रसवोत्तर रक्तस्राव चालीस दिन से पहले बंद हो जाए, तो उसका निफ़ास समाप्त हो गया है। वह स्नान करेगी, नमाज़ पढ़ेगी, और निफ़ास के कारण जिन कार्यों से रोकी गई थी, उन्हें करेगी।
दूसरा विषय : नमाज़ :
प्रथम बिंदु: अज़ान तथा इक़ामत के अहकाम:
अज़ान देने का आरंभ हिजरत के पहले वर्ष हुआ। इसके आरंभ का कारण यह हुआ कि जब सहाबा को नमाज़ का समय जानने में कठिनाई होने लगी, तो इसका एक चिह्न निर्धारित करने के संबंध में सहाबा ने विचार विमर्श किया। तत्पश्चात अबदुल्लाह बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु को स्वप्न में अज़ान दिखाई गई और जिसको वह्य ने स्वीकृति प्रदान कर दी।
अज़ान: नमाज़ का समय प्रवेश होने का एलान है। इक़ामत: नमाज़ क़ायम करने की सूचना है।
पुरुषों की जमाअत पर फ़र्ज़ नमाज़ों के लिए अज़ान और इक़ामत दोनों फ़र्ज़-ए-किफ़ाया हैं, वे इस्लाम के प्रतीक हैं, अतः उन्हें निलंबित करना जायज़ नहीं है।
अज़ान की शर्तें:
1- मुअज़्ज़िन का पुरुष होना।
2- अज़ान क्रमबद्ध होना चाहिए।
3- अज़ान लगातार होना चाहिए।
4- अज़ान समय के बाद होना। फज्र और जुमे की नमाज़ की पहली अज़ान का हुक्म इससे मुस्तस्ना (अलग) है।
अज़ान की सुन्नतें
1- अपनी दोनों तर्जनी उंगलियों को अपने दोनों कानों में डाले।
2- अज़ान पहले समय में दे।
3- हय्या अलस्स्लाह और हय्या अलल्फलाह के साथ दाएं एवं बाएं दोनों ओर मुँह फेरना।
4- अच्छी आवाज़ का होना।
5- अज़ान के शब्दों को हद से ज्यादा खींचे बिना रुक-रुक कर कहना।
6-हर वाक्य के बाद रुकना।
7- अज़ान के समय क़िब्ला की ओर मुँह करना।
अज़ान पंद्रह वाक्यों की होती है, जैसा कि बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उपस्थिति में हमेशा दिया करते थे।
अज़ान के शब्द:
''الله أكبر'' (अल्लाहु अकबर) चार बार।
(أشهد أن لا إله إلا الله): दो बार।
(أشهد أن محمدًا رسول الله): दो बार।
(حي على الصلاة): दो बार
(حي على الفلاح): दो बार।
फिर वह दो बार कहे: (अल्लाहु अकबर)।
फिर एक बार (ला इलाहा इल्लल्लाह) कहकर अज़ान का अंत करे।
फ़ज्र में हय्या अलल फ़लाह के बाद दो बार कहा जाता है: (الصلاة خير من النوم) अर्थात: "नमाज़ नींद से बेहतर है"; क्योंकि यह वह समय है जब लोग प्रायः सोते हैं।
और इक़ामत के ग्यारह वाक्य होते हैं जिन्हें जल्दी से पढ़ा जाता है, क्योंकि यह उपस्थित लोगों को सूचित करने के लिए होती है, इसलिए इसमें विस्तार की आवश्यकता नहीं होती।
इसके शब्द इस प्रकार है:
दो बार (الله أكبر, अल्लाहु अकबर) कहे,
(أشهد أن لا إله إلا الله) : एक बार।
(أشهد أن محمدًا رسول الله): एक बार।
(حي على الصلاة): एक बार।
(حي على الفلاح): एक बार।
(قد قامت الصلاة, क़द क़ामतिस्सलाह): दो बार।
दो बार (الله أكبر, अल्लाहु अकबर) कहें,
(لا إله إلا الله), ला इलाहा इल्लल्लाह : एक बार कहें।
जिसने अज़ान सुनी हो, उसके लिए यह पसंदीदा है कि वह मुअज़्ज़िन के कहे अनुसार कहे, सिवाय 'हय्या अलस-सलाह' और 'हय्या अलल-फ़लाह' के, जिनके बाद 'ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह' कहा जाएगा। फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजेगा। उसके बाद कहे :
»اللهم رَبَّ هَذِهِ الدَّعْوَةِ التَّامَّةِ، وَالصَّلاةِ القَائِمَةِ، آتِ مُحَمَّدًا الوَسِيلَةَ وَالفَضِيلَةَ، وَابْعَثْهُ مَقَامًا مَحْمُودًا الَّذِي وَعَدْتَهُ، إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيعَادَ.«
"ऐ अल्लाह! इस संपूर्ण आह्वान तथा खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को वसीला (जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान) और श्रेष्ठतम दर्जा प्रदान कर और उन्हें वह प्रशंसनीय स्थान प्रदान कर, जिसका तू ने उन्हें वचन दिया है। निश्चय तू वचन नहीं तोड़ता।"(12)
और यह दुआ भी पढ़े:
»رَضِيتُ بِاللَّهِ رَبًّا، وَبِالْإِسْلَامِ دِينًا، وَبِمُحَمَّدٍ ﷺ نَبِيًّا.«
"मैं अल्लाह से रब के रूप में, इस्लाम से धर्म के रूप में, और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से नबी के रूप में संतुष्ट हूँ।"(13)
अज़ान के बाद बिना किसी उचित कारण या वापसी की निय्यत के मस्जिद से निकलना हराम है।
और दो नमाज़ों को इकठ्ठा करने पर एक अज़ान और हर नमाज़ के लिए एक इक़ामत पर्याप्त होती है।
दूसरा बिंदु : नमाज़ का स्थान और उसकी फ़ज़ीलत (सद्गुण) :
नमाज़, शहादतैन (अल्लाह के एक होने एवं मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दूत होने की गवाही) के बाद इस्लाम का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। उसका एक विशेष स्थान है। क्योंकि अल्लाह ने इसे, अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, आसमान में 'मेराज' की रात में फर्ज़ किया था, ज़ाहिर सी बात है कि इससे नमाज़ का महत्व, अनिवार्यता और अल्लाह के यहाँ उसकी प्रतिष्ठा साबित होती है।
इसकी फज़ीलत और हर व्यक्ति पर इसकी अनिवार्यता के बारे में बहुत-सी हदीसें आई हैं। इस्लाम धर्म के अन्दर इसकी अनिवार्यता आवश्यक रूप से ज्ञात है।
इसके वाजिब और महत्वपूर्ण होने के प्रमाण क़ुरआन और सुन्नत के अंदर बहुतायत से मौजूद हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :
1- अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿...إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ كَانَتۡ عَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ كِتَٰبٗا مَّوۡقُوتٗا﴾
"...अवश्य नमाज़ मोमिनों पर निश्चित तथा निर्धारित समय पर अनिवार्य की गई है।" [सूरा अल-निसा : 103]।
अर्थात निर्धारित समय में फ़र्ज़ की गई हैं, जिन्हें रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बयान फ़रमा दिया है।
2- तथा अल्लाह तआला का यह फ़रमान भी उसी का प्रमाण है:
﴿وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ حُنَفَاءَ وَيُقِيمُوا الصَّلَاةَ...﴾
"हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, एकाग्र होकर, उसकी उपासना करें, तथा नमाज़ अदा करें...।" [सूरा अल-बय्यिना : 5]।
3- तथा अल्लाह तआला का यह फ़रमान भी उसी का प्रमाण है:
﴿فَإِنْ تَابُوا وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ فَإِخْوَانُكُمْ فِي الدِّينِ...﴾
"अतः यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें, तो धर्म में तुम्हारे भाई हैं...।" [सूरा अल-तौबा : 11]।
4-जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
»إِنَّ بَيْنَ الرَّجُلِ وَبَيْنَ الشِّرْكِ وَالْكُفْرِ تَرْكُ الصَّلَاةِ. «
"आदमी के बीच तथा कुफ़्र एवं शिर्क के बीच की रेखा नमाज़ छोड़ना है।"(14)
5- बुरैदा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया:
»العَهْدُ الَّذِي بَيْنَنَا وَبَيْنَهُمُ الصَّلَاةُ، فَمَن تَرَكَهَا فَقَدْ كَفَرَ. «
"हमारे और उन (काफ़िरों) के बीच अंतर केवल नमाज़ का है, इसलिए जिस व्यक्ति ने उसे छोड़ दिया उसने कुफ्र किया|"(15)
उलमा इस बात पर आम सहमति (इज्माअ) रखते हैं कि जो इसके वाजिब होने का इन्कार करता है, वह काफ़िर है। जहाँ तक ऐसे व्यक्ति का सवाल है जिसने इसे आलस्य और लापरवाही के कारण छोड़ा, तो सही बात यह है कि वह भी काफ़िर है, जैसा कि पहले उल्लेखित सहीह हदीस में आया है और इसपर सहाबा का इज्माअ है।
तीसरा बिंदु: नमाज़ की शर्तें
1- नमाज़ के समय का प्रवेश करना:
इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿...إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ كَانَتۡ عَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ كِتَٰبٗا مَّوۡقُوتٗا﴾
"...निःसंदेह नमाज़ ईमान वालों पर निर्धारित समय पर फ़र्ज़ की गई है।" [सूरा अल-निसा : 103]।
अर्थात : निर्धारित समय में अनिवार्य की गई है।
अनिवार्य नमाज़ों का समय इस प्रकार है:
अ- फ़ज्र: फ़ज्र के उदय से लेकर सूर्योदय तक।
ब- ज़ुह्र: सूरज ढ़लने से लेकर हर चीज़ की छाया उसके बराबर होने के समय तक।
ग- अस्र : ज़ुह्र के समय के ख़त्म होने से सूरज के पीला होने तक या ज़रूरत पड़ने पर सूर्यास्त तक।
मग़्रिब: सूर्यास्त से पश्चिम में लाली ख़त्म होने तक।
इशा: मग़्रिब का समय समाप्त होने से आधी रात तक है।
2- नग्नता को ढकना
नग्नता से तात्पर्य शरीर का वह भाग है जिसे ढांकना आवश्यक है और जिसका प्रकट होना बुरा है और जिससे शर्म आती है, पुरुष के शरीर का छुपाने योग्य भाग नाभि से घुटने तक है। औरत का पूरा शरीर नमाज़ में छुपाने योग्य है, सिवाय उसके चेहरे के, वह अपने चेहरे को ढक लेगी यदि वह गैर-महरम (अजनबी) पुरुषों की उपस्थिति में हो, अर्थात: जो उसके महरम नहीं हैं।
3-नजासत (गंदगी) से बचना:
नजासत: यह एक विशेष गंदगी है, जो नमाज़ (सही होने) को रोकती है; जैसे मूत्र, मल, रक्त आदि, और यह शरीर, स्थान तथा वस्त्र में होती है।
4- क़िब्ला की ओर मुँह करना।
क़िब्ला काबा शरीफ है, इसे क़िब्ला इसलिए कहा जाता है क्योंकि लोग इसकी ओर रुख करते हैं।
क़िब्ला की ओर मुंह किए बिना नमाज़ सही नहीं होती, इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿...وَحَيۡثُ مَا كُنتُمۡ فَوَلُّواْ وُجُوهَكُمۡ شَطۡرَهُ...﴾
"...तथा तुम जहाँ भी हो, तो अपने चेहरे उसी की ओर फेर लो...।" [सूरा अल-बक़रा : 144]।
5- निय्यत (इरादा):
इसका अर्थ अरबी भाषा में: इरादा है, और शरीअत में इसका अर्थ है: अल्लाह की निकटता प्राप्त करने हेतु इबादत करने का पक्का इरादा करना। और इसका स्थान दिल है, इसलिए इसे जुबान से बोलने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह एक बिदअत है।
चौथा बिंदु : नमाज़ के अरकान (स्तंभ)
नमाज़ के चौदह अरकान (स्तंभ) हैं:
पहला स्तंभ: सक्षम होने पर खड़ा होना,
इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿...وَقُومُواْ لِلَّهِ قَٰنِتِينَ﴾
"...अल्लाह के लिए आज्ञाकारी होकर (विनयपूर्वक) खड़े रहो।" [सूरा अल-बक़रा : 238]।
तथा इसकी दलील इमरान रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित यह रिवायत भी है कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम ने कहा:
»صَلِّ قَائِمًا، فَإِن لَمْ تَسْتَطِعْ فَقَاعِدًا، فَإِن لَمْ تَسْتَطِعْ فَعَلَى جَنْبٍ. «
"खड़े होकर नमाज़ पढ़ो, अगर इसकी क्षमता न हो तो बैठकर पढ़ो और अगर यह भी न हो सके तो पहलू के बल लेट कर नमाज़ अदा करो।"(16)
यदि बीमारी के कारण खड़े होने की क्षमता न हो, तो अपनी स्थिति के अनुसार नमाज़ पढ़े, बैठकर या पहलू के बल लेटकर, और बीमार ही की तरह: भयातुर और वस्त्रहीन है, तथा वह व्यक्ति भी है जिसे बैठने या लेटने की आवश्यकता हो, क्योंकि उसके लिए उपचार के लिए खड़े न रहना आवश्यक है। इसी तरह, यदि कोई व्यक्ति किसी मस्जिद के ऐसे नियुक्त इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ रहा हो, जो खड़े होने में असमर्थ हो, तो उसे खड़े होने से छूट दी जाएगी। यदि इमाम बैठकर नमाज़ पढ़े, तो उसके पीछे नमाज़ पढ़ने वाले भी उसके अनुसरण में बैठकर नमाज़ पढ़ेंगे। नफ़्ल नमाज़ें बैठकर पढ़ना भी जायज़ है, भले ही खड़े होकर पढ़ने की क्षमता हो, लेकिन इसका सवाब खड़े होकर पढ़ने के सवाब के बराबर नहीं होता।
दूसरा स्तंभ: नमाज़ के आरंभ में तकबीर-ए-तहरीमा कहनाः
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारण:
»ثُمَّ اسْتَقْبِلِ الْقِبْلَةَ، وَكَبِّرْ.«
"फिर क़िब्ला की ओर मुँह करो और तकबीर कहो।"(17)
और इसका सूत्र यह कहना है: (अल्लाहु अकबर), इसके बदले में दूसरे शब्द नहीं कहे जा सकते।
तीसरा स्तंभ: सूरा फ़ातिहा पढ़ना:
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारण:
»لَا صَلاَةَ لِمَنْ لَمْ يَقْرَأْ بِفَاتِحَةِ الْكِتَابِ.«
"जिसने सूरा-ए-फ़ातिहा नहीं पढ़ी, उसकी नमाज़ ही नहीं।"(18)
चौथा स्तंभ: हर रक्अत में रुकूअ:
इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا ارْكَعُوا وَاسْجُدُوا...﴾
"ऐ वह लोगो जो ईमान लाए हो! रुकूअ और सज्दा करो...।" [सूरा अल-हज्ज: 77]।
पंचम और छठा स्तंभ:
रुकूअ से उठना, और उसके बाद सीधे खड़ा होना, जैसे कि पहले था, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस पर हमेशा अमल किया।
और क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ में गलती करने वाले से कहा :
»ثُمَّ ارْفَعْ حَتَّى تَعْتَدِلَ قَائِمًا. «
"फिर उठो यहाँ तक कि सीधे खड़े हो जाओ।"(19)
सातवाँ स्तंभ: सात अंगों पर सज्दा करना:
और यह सातों अंग हैं: पेशानी और इसके साथ नाक भी शामिल है, दोनों हाथ, घुटने, और दोनों पैर की उंगलियों के किनारे, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारणः
»أُمِرْنَا أَنْ نَسْجُدَ عَلَى سَبْعَةِ أَعْظُمٍ: الجَبْهَةِ، وَأَشَارَ بِيدِهِ عَلَى أَنْفِهِ، وَالكَفَّيْنِ، وَالرُّكْبَتَيْنِ، وَأَطْرَافِ القَدَمَيْنِ.«
"हमें सात हड्डियों पर सज्दा करने का आदेश दिया गया है: पेशानी, और आपने अपने हाथ से अपनी नाक की ओर इशारा किया, दोनों हथेली, दोनों घुटने तथा दोनों पावों की उंगलियों पर।"(20)
आठवां स्तंभ: सज्दे से सिर उठाना और दोनों सज्दों के बीच बैठना, आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की इस हदीस के कारण :
»كَانَ النَّبِيُّ ﷺ إِذَا رَفَعَ رَأْسَهُ مِنَ السَّجْدَةِ، لَمْ يَسْجُدْ حَتَّى يَسْتَوِيَ جَالِسًا.«
"नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब सज्दे से सिर उठाते, तो तब तक दूसरा सज्दा नहीं करते जब तक कि पूरी तरह से बैठ न जाएँ।"(21)
नवम स्तंभ: सभी रुक्नों में इत्मीनान और संतुष्टि का होना :
और वह शांति है, चाहे वह थोड़ी ही क्यों न हो, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ में गलती करने वाले से कहा:
»حَتَّى تَطْمَئِنَّ.«
"यहाँ तक कि इत्मीनान से खड़े हो जाओ।"(22)
दसवां और ग्यारहवाँ स्तंभ:
अंतिम तशह्हुद और उसकी बैठक: इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु की मर्फ़ूअ हदीस के अनुसार:
»إِذَا صَلَّى أَحَدُكُمْ فَلْيَقُلْ: التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلاَمُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ.«
"जब तुममें से कोई नमाज़ पढ़े तो कहे : हर प्रकार का सम्मान, सारी दुआएँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो, हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवाय कोई सत्य पूज्य नहीं है एवं मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।"(23)
बारहवाँ स्तंभ: अंतिम तशह्हुद में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद:
यह इस प्रकार कहे :
»اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ.«
"ऐ अल्लाह! मुहम्मद पर अपनी रहमत भेज।"(24)
और जो इससे अधिक है वह सुन्नत है।
तेरहवां स्तंभ: स्तंभों के बीच क्रम:
क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ क्रमबद्ध तरीक़े से पढ़ते थे। और आप ने फ़रमाया है:
»صَلُّوا كَمَا رَأَيْتُمُونِي أُصَلِّي. «
''तुम नमाज़ उसी प्रकार पढ़ो, जिस प्रकार मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देखते हो।''(25)
और फिर आप ने क्रमबद्धता को नमाज़ में ग़लती करने वाले को सिखाया था, जिसका सूचक हदीस में आया शब्द "ثم" अर्थात : फिर, है।
चौदहवां स्तंभ: सलाम :
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारण :
»وَخِتَامُهَا التَّسْلِيمُ.«
"नमाज़ का अंत सलाम फेरना है।"
और आप का यह कथन भी है :
»وَتَحْلِيلُهَا التَّسْلِيمُ.«
"उससे हलाल होने का ज़रिया सलाम फेरना है।"(26)
पाँचवाँ बिंदु : नमाज़ के वाजिबात (अनिवार्य कार्य )
नमाज़ के अनिवार्य कार्य हैं :
1- तकबीर-ए-तहरीमा के सिवा, सारी तकबीरें।
2- रुकूअ में एक बार ''سبحان ربي العظيم'' कहना। और इसे तीन बार कहना सुन्नत है। दरअसल तीन बार संपूर्णता की सबसे कम संख्या है। और सुन्नत दस तक कहना है और यह संपूर्णता का उच्चतम स्तर है।
3- रुकूअ से उठते समय इमाम और अकेले नमाज़ पढ़ रहे व्यक्ति का ''سمع الله لمن حمده'' कहना।
4- रुकूअ में सीधे खड़े होकर ''रब्बना व लकल हम्द'' कहना।
5- सज्दे में एक बार ''सुब्हाना रब्बियल-आला'' कहना। और इसे तीन बार कहना सुन्नत है।
6- दोनों सज्दों के बीच एक बार ''रब्बिग़्फ़िर ली'' कहना। और तीन तक बढ़ोतरी करना सुन्नत है।
7- पहला तशह्हुद; और वह इस प्रकार कहे:
»التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ، وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ.«
"हर प्रकार का सम्मान, सारी दुआएँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो, हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे, मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवाय कोई सत्य पूज्य नहीं एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।"(27)
8-पहले तशह्हुद के लिए बैठना।
छठा बिंदु : नमाज़ की सुन्नतें
नमाज़ की सुन्नतें छोड़ने से नमाज़ निरस्त नहीं होती, नमाज़ की सुन्नतें दो प्रकार की हैं: क़ौली (मौखिक) सुन्नतें और फ़ेअली (व्यावहारिक) सुन्नतें।
पहले: क़ौली (मौखिक) सुन्नतें:
1- इस्तिफ़्ताह़ की दुआ, इसके कई रूप हैं, उनमें से एक यह है:
»سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالى جَدُّكَ، وَلا إِلٰهَ غَيْرُكَ .«
"तू पवित्र है ऐ अल्लाह! हम तेरी प्रशंसा करते हैं, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है तथा तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।"(28)
2- फ़ातिह़ा से पहले शरण मांगना, इससे मुराद ''أعوذ بالله من الشيطان الرجيم'' (मैं बहिष्कृत शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।) कहना है।
3- पढ़ने से पहले "बस्मला" कहना है। जो यह कथन है: «बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम» (शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बहुत कृपालु अत्यंत दयावान है)।
4- रुकूअ एवं सज्दे में एक से अधिक बार तस्बीह पढ़ना।
5- एक से अधिक बार यह कहना :
»رَبِّ اغْفِرْ لِي «
"ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर।" दोनों सज्दों के बीच,
6- यह कहना:
»مِلْءَ السَّمَاوَاتِ، وَمِلْءَ الْأَرْضِ، وَمِلْءَ مَا بَيْنَهُمَا، وَمِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيْءٍ بَعْدُ.«
''आकाशों तथा धरती के बराबर, उन दोनों के बीच जो कुछ है उसके बराबर और इनके बाद तू जो कुछ चाहे उसके बराबर।'' इस कथन के बाद।
»رَبَّنَا ولَكَ الحَمْدُ.«
"हे हमारे रब! और तेरे लिए ही सारी प्रशंसा है"(29)
7- सूरह फ़ातिहा के बाद क़ुरआन से कुछ और पढ़ना।
8- यह कहना:
»اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ جَهَنَّمَ، وَمِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ. «
"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ जहन्नम के अज़ाब से, क़ब्र की यातना से, जीवन और मृत्यु के फ़ितने से तथा मसीह दज्जाल के फ़ितने से।"(30)
और जो कुछ भी इसके अलावा अंतिम तशह्हुद में दुआ की जाए।
दूसरा: फेअली (व्यावहारिक) सुन्नतें:
1- चार स्थानों पर कंधों के बराबर अथवा कानों के बराबर दोनों हाथों को उठाना:
क- तकबीर-ए-तहरीमा के समय,
ख- रुकूअ करते समय,
ग- रुकूअ से सिर उठाते समय,
घ- तीसरी रक्अत के लिए खड़े होते समय।
2- रुकूअ से पहले और रुकूअ के बाद खड़े होने की अवस्था में दायीं हथेली को बायीं पर सीने के ऊपर रखना।
3- अपनी दृष्टि को सज्दे के स्थान पर रखना।
4- सज्दा करते समय बाँहों को पहलुओं से अलग रखना।
5- दोनों सज्दों के दौरान पेट को जांघों से अलग रखना।
6- सभी नमाज़ की बैठकों में इफ़्तिराश (अपने बाएं पैर को चूतड़ के नीचे रखना एवं उसपर बैठना, और दाएं पैर को खड़ा रखना) करना, सिवाय तीन रक्अ़तों और चार रक्अ़तों वाली नमाज़ के आखिरी तशह्हुद के।
7- तीन रक्अत या चार रक्अत वाली नमाज़ के अंतिम तशह्हुद में तवर्रुक करना।
सातवाँ बिंदु- नमाज़ का तरीक़ा:
1- अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ के लिए खड़े होते, तो क़िब्ला की ओर मुख करते, अपने हाथ उठाते, और अपनी उंगलियों के अंदरूनी हिस्से को क़िब्ला की ओर रखते, और कहते:
»الله أكبر.«
"अल्लाह सबसे बड़ा है"।
2- फिर अपने बाएं हाथ को दाएं हाथ से पकड़ें, और उन्हें अपनी छाती पर रखें।
3- फिर इस्तिफ़ताह़ (प्रारंभ करने) की दुआ पढ़ें, परंतु एक ही प्रारंभ पर स्थिर न रहें, क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित सभी इस्तिफ़ताह़ की दुआओं से नमाज़ आरंभ करना जायज़ है, और उनमें से एक यह है:
»سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالى جَدُّكَ، وَلا إِلٰهَ غَيْرُكَ.«
"तू पवित्र है ऐ अल्लाह! हम तेरी प्रशंसा करते हैं, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है तथा तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।"
4- फिर कहे:
»أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ، بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ.«
"मैं धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगता हूँ। अल्लाह के नाम से आरंभ करता हूँ, जो बड़ा कृपालु एवं अति दयावान है।"
5- फिर सूरह फातिहा पढ़े, और जब समाप्त करे: तो कहे: "आमीन"।
6- फिर क़ुरआन से जो भी याद हो पढ़े, फ़ज्र तथा मग़्रिब एवं इशा की पहली दो रक्अतों में ऊँची आवाज़ में क़ुरआन पढ़े। अन्य नमाज़ों में क़ुर्आन धीमी आवाज़ में पढ़े। हर नमाज़ की पहली रक्अत को दूसरी रक्अत की तुलना में अधिक लम्बी करे।
7- फिर इस्तिफ़ताह के समय की तरह अपने दोनों हाथों को उठाए। फिर कहे: ''अल्लाहु अकबर''। और रुकूअ के लिए झुक जाए। अपने दोनों हाथों को, उंगलियों को फैलाए हुए अपने घुटनों पर रखे और उन्हें मज़बूती से पकड़े, पीठ को सीधी रखे और सर को पीठ के बराबर रखे। न उससे ऊँचा होने दे और ना ही नीचा होने दे। और कहे:
»سُبْحَانَ رَبِّيَ الْعَظِيمِ«.
मेरा महान पालनहार पवित्र है। एक बार। और न्यूनतम पूर्णता: तीन बार है, जैसा कि पहले बताया गया है।
8- फिर अपना सर उठाते हुए कहे:
»سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ.«
"अल्लाह ने उस बंदे की सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की।" और रुकुअ के समय की तरह अपने हाथों को उठाए।
9- फिर खड़े होकर सीधे हो जाए तो कहे:
»اللَّهُمَّ رَبَّنَا وَلَكَ الْحَمْدُ، حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، مِلْءَ السَّمَاءِ، وَمِلْءَ الْأَرْضِ، وَمِلْءَ مَا بَيْنَهُمَا، وَمِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيْءٍ بَعْدُ، أَهْلَ الثَّنَاءِ وَالْمَجْدِ، أَحَقُّ مَا قَالَ الْعَبْدُ، وَكُلُّنَا لَكَ عَبْدٌ، لَا مَانِعَ لِمَا أَعْطَيْتَ، وَلَا مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ، وَلَا يَنْفَعُ ذَا الْجَدِّ مِنْكَ الْجَدُّ . «
"ऐ हमारे पालनहार! सब प्रशंसा तेरे ही लिए है, भरपूर, पवित्र और बरकत वाली प्रशंसा। आकाशों एवं धरती के बराबर, उन दोनों के बीच की सारी चीज़ों और इसके बाद तू जो कुछ चाहे, उसकी समाई के बराबर। ऐ प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा के मालिक! तू बंदे की प्रशंसा का सबसे अधिक हक़दार है और हम सब तेरे बंदे हैं। ऐ अल्लाह! जो कुछ तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है और जो कुछ तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है तथा किसी प्रतिष्ठावान व्यक्ति की प्रतिष्ठा तेरे यहाँ कुछ काम नहीं दे सकती।"(31)
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यहाँ देर तक खड़े रहते थे।
10- फिर तकबीर कहते हुए सज्दे में जाए। हाथ नहीं उठाए, और अपनी पेशानी, नाक, दोनों हाथों, घुटनों, और दोनों पैरों की उंगलियों के किनारों पर सज्दा करे, और अपने हाथों और पैरों की अंगुलियों को क़िब्ले की ओर कर ले, अपने सज्दे में संतुलित रहे, अपनी पेशानी और नाक को धरती पर टिकाए। अपने दोनों हाथों का सहारा ले और कोहनियों को उठाए रखे। और अपने दोनों बाजुओं को अपने पहलुओं से दूर रखे, और अपने पेट को अपनी जांघों से उठाए, और अपनी जाँघों को अपनी पिंडलियों से अलग रखे। और अपने सज्दे में कहे :
»سُبْحَانَ رَبِّيَ الأَعْلَى.«
मेरा उच्च एवं महान पालनहार पवित्र है। एक बार। और न्यूनतम पूर्णता: तीन बार है, जैसा कि पहले बताया गया है। और जो दुआएँ वर्णित हैं, उनके द्वारा अल्लाह से प्रार्थना करे।
11- फिर ''अल्लाहु अकबर'' कहते हुए अपना सर उठाए। फिर अपना बायाँ पैर बिछाकर उसपर बैठे, और दाहिना पैर खड़ा रखे, अपने हाथों को अपनी जाँघों पर रखे और फिर यह दुआ पढ़े :
»اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي، وَارْحَمْنِي، وَاجْبُرْنِي، وَاهْدِنِي، وَارْزُقْنِي. «
"ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा प्रदान कर, मुझ पर दया कर, मेरी चारागरी कर, मुझे सत्य का मार्ग दिखा और मुझे रोज़ी प्रदान कर।"(32)
12- फिर तकबीर कहते हुए सज्दा करे, और दूसरे में वही सब करे, जो पहले में किया था।
13- फिर "अल्लाहु अकबर" कहते हुए अपना सर उठाए, अपने घुटनों और जाँघों पर टेक लगाते हुए अपने पैरों के अग्रभाग पर खड़ा हो जाए।
14- जब पूरी तरह खड़ा हो जाए; तो क़ुरआन पढ़ना शुरू करे और दूसरी रक्अत भी पहली रक्अत की तरह पढ़े।
15- फिर पहले तशह्हुद के लिए इफ्तिराश करते हुए बैठेगा जैसे दो सज्दों के बीच बैठता है, अपना दाहिना हाथ अपनी दाहिनी जाँघ पर और अपना बायाँ हाथ अपनी बाईं जाँघ पर रखे, अपने दाहिने हाथ के अंगूठे को अपनी मध्यमा उंगली पर इस प्रकार रखे कि हलक़ा (दायरा) बन जाए। और अपनी शहादत की उंगली से इशारा करे, और उसकी ओर देखे, और कहे:
»التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ. «
"हर प्रकार का सम्मान, सारी दुआएँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो। हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं है एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।"
इस बैठक को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हल्का रखते थे।।
16- फिर "अल्लाहु अकबर" कहते हुए खड़ा हो जाए, और तीसरी और चौथी रक्अत पढ़े, और उन्हें पहली दो रक्अतों से हल्का रखे। दोनों में सूरा फ़ातिहा पढ़े।
17- फिर अंतिम तशह्हुद में तवर्रुक करते हुए बैठेगा, तवर्रुक यह है कि बाएँ पैर को बिछाए और उसे दाईं ओर से बाहर निकाले, दाएँ पैर को खड़ा रखे, और नितंब को ज़मीन पर रखे।
18- फिर अंतिम तशह्हुद पढ़े जो पहले तशह्हुद के समान है, और इस पर यह शब्द बढ़ा लेगा :
»اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، وَبَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ. «
"ऐ अल्लाह! मुहम्मद एवं उनके परिवार पर उसी प्रकार अपनी रहमत भेज, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम के परिवार पर अपनी रहमत भेजी थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनके परिवार पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर जिस प्रकार से तूने इब्राहीम के परिवार पर की थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है।"
19- और अल्लाह की शरण माँगे जहन्नम के अज़ाब से, क़ब्र के अज़ाब से, जीवन और मृत्यु के फ़ितने से और मसीह दज्जाल के फ़ितने से।
और अल्लाह की किताब एवं उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में वर्णित दुआओं को मांगे।
20- फिर अपने दायीं ओर सलाम फेरे, और कहे:
»السَّلاَمُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللَّهِ.«
"अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह।" इन्हीं शब्दों द्वारा बाईं ओर भी सलाम फेरे। सलाम की शुरुआत क़िब्ला की ओर मुख करके करे और इसे समाप्त पूरी तरह मुड़ने के साथ करे।
आठवाँ बिंदु: नमाज़ में मकरूह चीज़ें (नापसंद कार्य):
1- बिना ज़रूरत के इधर-उधर मुड़ना।
2- आकाश की ओर दृष्टि उठाना।
3- बिना आवश्यकता के आँख बंद करना।
4- सज्दा करते समय, बाज़ुओं को फैलाना।
5- बिना आवश्यकता के मुँह और नाक को ढकना।
6- पेशाब या पाखाना की ज़रूरत के समय, या पसंदीदा भोजन की उपस्थिति में नमाज़ पढ़ना।
7- सज्दे के दौरान पेशानी या नाक में कोई चीज़ लग जाए, तो उसे पोंछना। नमाज़ के बाद पोंछने में कोई हर्ज नहीं है।
8- बिना आवश्यकता के खड़े होते समय दीवार या उसके समान किसी चीज़ का सहारा लेना।
नौवाँ बिंदु: नमाज़ को अमान्य करने वाली चीजें:
1- खाना और पीना।
2- नमाज़ से बाहर की बात करना।
3- हँसना और ठहाका लगाना।
4- जान-बुझ कर नमाज़ के किसी रुक्न (स्तंभ) या वाजिब (अनिवार्य कार्य) को छोड़ देना।
5- जानबूझकर किसी रुक्न या रक्अत की वृद्धि करना।
6- इमाम से पहले जानबूझकर सलाम करना।
7- बिना किसी आवश्यकता के, अत्यधिक, लगातार ऐसी गतिविधि जो नमाज़ का हिस्सा नहीं है।
8- नमाज़ की शर्तों में से किसी एक के विपरीत कार्य करना; जैसे वुज़ू का टूटना, जान-बूझ कर ढकने योग्य अंगों को खोलना, बिना ज़रूरत के क़िब्ला से बहुत ज्यादा शरीर का हटाना, और निय्यत को तोड़ देना।
दसवां बिंदु: सह्व (विस्मृति) के सज्दे:
सह्व का अर्थ: भूल है, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से नमाज़ में भूल हुई थी, क्योंकि भूल मानव स्वभाव की विशेषता है। और आप की भूल अल्लाह की ओर से आप की उम्मत पर पूर्ण नेमत और उनके धर्म की पूर्णता का हिस्सा थी, ताकि वे भूल के समय आपके द्वारा निर्धारित किए गए नियमों का अनुसरण करें।
सज्दा-ए-सह्व के लिए निर्धारित कारण:
1- पहली स्थिति:
नमाज़ में वृद्धि, जो या तो कार्यों की वृद्धि हो या शब्दों की वृद्धि:
(क) कार्यों की वृद्धि: यदि वृद्धि नमाज़ ही के किसी हिस्सा द्वारा हो, जैसे बैठने की जगह खड़ा होना, खड़े होने की जगह बैठना, या रुकूअ या सज्दा अधिक करना, तो यदि यह भूलवश हो जाए, तो सज्दा-ए-सह्व करेगा।
(ख) बातों की वृद्धि: जैसे रुकूअ और सज्दे में क़ुरआन पढ़ना, ऐसा कर देने पर सह्व के सज्दे करना मुस्तहब है।
2- दूसरी स्थिति :
भूलवश नमाज़ में कमी। और यह दो कारणों में से किसी एक के कारण होती है:
क- रुक्न छोड़ना: यदि यह रुक्न तकबीर-ए-तहरीमा (पहली तकबीर) है, तो उसकी नमाज़ नहीं मानी जाएगी, और इसके लिए सज्दा-ए-सह्व पर्याप्त नहीं होगा। अगर तकबीर-ए-तहरीमा के अलावा कोई दूसरा स्तंभ जैसे रुकूअ या सज्दा भूल जाए और दूसरी रक्अत की तिलावत शुरू करने से पहले याद आ जाए, तो अनिवार्य रूप से लौटकर उसे और उसके बाद का कार्य करेगा।
और अगर दूसरी रक्अत की तिलावत शुरू करने के बाद याद आए, तो वह रक्अत बातिल (व्यर्थ) हो जाएगी, जिसका स्तंभ भूल गया था और उसके बाद वाली रक्अत उसका बदल बन जाएगी।
ख- वाजिब (अनवार्य) को छोड़ना: जैसे: पहले तशह्हुद को भूल जाना, या रुकूअ में तस्बीह को भूल जाना। इस स्थिति में: सह्व (विस्मृति) के सज्दे करेगा।
3- तीसरी स्थिति: संदेह:
उदाहरण: यदि ज़ुह्र की नमाज़ में संदेह हो कि तीन रक्अत पढ़ी है या चार, तो इस स्थिति में:
अ- यदि कोई बात स्पष्ट हो जाए; तो उस पर अमल करे, और भूल के लिए सज्दा करे।
ब- जब उसे किसी चीज़ में भ्रम हो तथा किसी को किसी पर वरीयता न दे सके, तो यक़ीन के आधार पर काम करे और सह्व के सजदे करे।
अगर संदेह नमाज़ के बाद हो, या व्यक्ति बहुत ज़्यादा संदेह करने वाला हो; तो उस संदेह की ओर ध्यान न दे।
फ़ायदा: अगर सह्व का सज्दा कमी की वजह से हो, या संदेह की स्थिति में हो और यक़ीन के साथ निर्णय न ले सके, तो सलाम फेरने से पहले किया जाएगा।
और यह सलाम फेरने के बाद किया जाएगा: यदि यह वृद्धि के कारण हो, या यदि संदेह हो और प्रबल राय के अनुसार अमल किया हो, परंतु इन शा अल्लाह इस संबंध में मामला व्यापक है।
ग्यारहवाँ बिंदु: वो समय, जिनमें नमाज़ पढ़ना मना है :
मूल रूप से, किसी भी समय नमाज़ पढ़ना जायज़ है, लेकिन शरीअत ने कुछ समय में नमाज़ पढ़ने की मनाही की है, जो इस प्रकार हैं:
1-फ़ज्र की नमाज़ के बाद से लेकर सूरज निकलने और देखने वाले को ज़मीन से एक नेजा ऊपर दिखाई देने तक का समय।
2- जब सूरज आसमान के बीच में हो। जब तक सूरज ढल न जाए, नमाज़ पढ़ना मना है। यह सबसे संक्षिप्त समय है, जिसमें नमाज़ पढ़ना मना है।
3- अस्र की नमाज़ से लेकर सूरज डूबने तक, यह सबसे लंबा समय है जिसमें नमाज़ की मनाही है।
वो नमाज़ें, जिन्हें मनाही के समय में अदा करना जायज़ है:
1- छूटी हुई फ़र्ज़ नमाज़ों की क़ज़ा।
2- सबब वाली नमाज़ें, जैसे: तह़िय्यतुल मस्जिद, तवाफ़ की दो रक्अतें, सूरज ग्रहण की नमाज़ और नमाज़-ए-जनाज़ा।
3- फ़ज्र की नमाज़ के बाद फ़ज्र की सुन्नत अदा करना।
बारहवाँ बिंदु : जमात के साथ नमाज़ :
मस्जिदों में जमात के साथ नमाज़ इस्लाम के महान प्रतीकों में से एक महान प्रतीक है। मुसलमानों का इस बात पर इत्तेफाक है कि मस्जिदों में पाँच वक़्त की नमाज़ अदा करना सबसे महत्वपूर्ण इबादतों और सबसे महान नेकियों में से एक है , बल्कि यह इस्लाम की सबसे महान निशानियों में से है।
1- जमात के साथ नमाज़ का हुक्म:
पाँचों वक़्त की नमाज़ें मस्जिद में जाकर जमात के साथ अदा करना ऐसे पुरुषों पर वाजिब है, जो इसकी शक्ति रखते हों। ठहरने की अवस्था में भी और यात्रा की हालत में भी, शांति की अवस्था में भी और भय की अवस्था में भी। यह व्यक्तिगत रूप से हर मुसलमान पर अनिवार्य है।
किताब और सुन्नत तथा मुसलमानों की पीढ़ी दर पीढ़ी पूर्वजों से लेकर उत्तराधिकारियों तक की परंपरा से यह सिद्ध होता है कि जमात के साथ नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है।
पवित्र क़ुरआन का एक प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿وَإِذَا كُنتَ فِيهِمۡ فَأَقَمۡتَ لَهُمُ ٱلصَّلَوٰةَ فَلۡتَقُمۡ طَآئِفَةٞ مِّنۡهُم مَّعَكَ...﴾
"और जब आप उनमें उपस्थित हों तो उनके लिए नमाज़ स्थापित करें, तो उनका एक गिरोह आपके साथ खड़ा हो जाये...।" [सूरा अल-निसा : 102]।
इस आयत से यह स्पष्ट है कि जमात के साथ नमाज़ पढ़ना अत्यधिक अनिवार्य है, क्योंकि मुसलमानों को भय की स्थिति में भी इसे छोड़ने की अनुमति नहीं दी गई है। अगर जमात के साथ नमाज़ पढ़ना अनिवार्य नहीं होता, तो भय की अवस्था में इसे छोड़ने की अनुमति ज़रूर दी जाती। जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना छोड़ देना और उसमें सुस्ती करना मुनाफ़िक़ों की सबसे प्रसिद्ध विशेषताओं में से है।
बहुत सारी ऐसी हदीसें भी मौजूद हैं, जिनसे जमात के साथ नमाज़ पढ़ने की अनिवार्यता साबित होती है, जिन में से कुछ निम्नांकित हैं :
सहीह मुस्लिम की एक हदीस में है कि:
أَنَّ رَجُلًا أَعْمَى قَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، لَيْسَ لِي قَائِدٌ يَقُودُنِي إِلَى الْمَسْجِدِ، فَسَأَلَهُ أَنْ يُرَخِّصَ لَهُ أَنْ يُصَلِّيَ فِي بَيْتِهِ، فَرَخَّصَ لَهُ، فَلَمَّا وَلَّى دَعَاهُ فَقَالَ: «هَلْ تَسْمَعُ النِّدَاءَ؟» قَالَ: نَعَمْ، قَالَ: «فَأَجِبْ».
एक अंधे व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे पास कोई आदमी नहीं है जो मुझे मस्जिद ले आए। अतः उसने आप से घर में नमाज़ पढ़ने की छूट माँगी, तो आपने उसे छूट दे दी। लेकिन जब वह जाने लगा, तो उसे बुलाया और फ़रमाया : "क्या तुम अज़ान सुनते हो?" उसने कहा : हाँ, सुनता हूँ। तो आप ने फ़रमाया : "फिर तो तुम अवश्य इस आमंत्रण को ग्रहण करो।"(33)
तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे मस्जिद में हाज़िर होकर जमात के साथ नमाज़ पढ़ने और अज़ान का उत्तर देने का आदेश दिया, जबकि वह अंधा था और उसे कठिनाई का सामना करना पड़ता था। यह इस बात का प्रमाण है कि जमात के साथ नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है।
2- नमाज़ का कितना भाग मिल जाने से जमात मिल जाती है :
इमाम के साथ नमाज़ की एक रक्अत मिल जाने से जमात मिल जाती है। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारण:
»مَنْ أَدْرَكَ رَكْعَةً مِنَ الصَّلَاةِ فَقَدْ أَدْرَكَ الصَّلَاةَ.«
"जिसे किसी नमाज़ की एक रक्अत मिल गई, उसे नमाज़ मिल गई।"(34)
3- कितनी नमाज़ मिलने से रक्अत मिल जाती है :
रुकूअ पाने से रक्अत मिल जाती है, तो जब मसबूक (वह व्यक्ति जिसकी नमाज़ छूट गई हो) अपने इमाम को रुकूअ में पाए: तो उसे अनिवार्य रूप से खड़े होकर तकबीर-ए-तहरीमा कहनी चाहिए, फिर रुकूअ के लिए दोबारा तकबीर कहते हुए रुकूअ में जाना चाहिए, और अगर वह खड़े होते समय सिर्फ तकबीर-ए-तहरीमा पर ही इक्तिफा कर ले, तो यह रुकूअ की तकबीर के लिए काफी है।
4- जमात छोड़ने को जायज़ ठहराने वाली मजबूरियाँ :
1- जब रोग के कारण जुमा और जमात में हाज़िर होना कठिन हो।
2- मूत्र या मल को रोकने की अवस्था; क्योंकि इन्हें रोकने से नमाज़ में एकाग्रता समाप्त हो जाती है और यह शरीर के लिए भी हानिकारक होता है।
3- जब खाना हाज़िर हो और इंसान भूखा हो या उसका मन खाने की ओर आकर्षित हो। बशर्ते कि इसे जमात के साथ नमाज़ से बचने के लिए आदत या बहाने के रूप में न अपनाया जाए।
4- जान या माल आदि के लिए वास्तविक भय होना।
तेरहवाँ बिंदु : भय के समय की नमाज़ :
भय की नमाज़ हर वैध युद्ध में पढ़ी जा सकती है, जैसे कि काफ़िरों, बगावत करने वालों और लड़ाई करने वालों के विरुद्ध युद्ध में, क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है:
﴿...إِنۡ خِفۡتُمۡ أَن يَفۡتِنَكُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ...﴾
''...यदि तुम इस बात से डरते हो कि अवज्ञाकारी लोग तुम्हें फितने में डाल देंगे...।'' [सूरा निसा : 101]।
और इसी पर बाकी लोगों से तुलना करें जिनसे युद्ध करना जायज़ है।
भय के समय की नमाज़ दो शर्तों के साथ धर्मसंगत है:
1) दुश्मन से युद्ध करना जायज़ हो।
2) नमाज़ के समय मुसलमानों पर उसके हमले का डर हो।
भय की नमाज़ का तरीक़ा
इसके कई तरीके हैं, और सबसे प्रसिद्ध वह है जो हदीस में सह्ल रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है:
أَنَّ طَائِفَةً صَفَّتْ مَعَ النَّبِي ﷺ، وَطَائِفَةً وِجَاهَ العَدُوِّ، فَصَلَّى بِالَّتِي مَعَهُ رَكْعَةً، ثُمَّ ثَبَتَ قَائِمًا، وَأَتَمُّوا لِأَنْفُسِهِمْ، ثُمَّ انْصَرَفُوا، وَصَفُّوا وِجَاهَ العَدُوِّ، وَجَاءَتِ الطَّائِفَةُ الأُخْرَى، فَصَلَّى بِهِمُ الرَّكْعَةَ الَّتِي بَقِيَتْ مِنْ صَلَاتِهِ، ثُمَّ ثَبَتَ جَالِسًا، وَأَتَمُّوا لِأَنْفُسِهِمْ، ثُمَّ سَلَّمَ بِهِمْ.
"एक समूह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ सफ़ बाँध लिया और एक समूह शत्रु के सामने खड़ा रहा। चुनांचे जो लोग आपके साथ थे, उन्हें आपने एक रक्अत पढ़ाई। फिर आप खड़े रहे और उन्होंने अपनी नमाज़ पूरी कर ली तथा दुश्मन के आगे मोरचाबंद हो गए। फिर दूसरा गिरोह आया, तो आप उन्हें शेष एक रक्अत पढ़ाकर बैठे रहे और उन्होंने अपनी नमाज़ पूरी कर ली। फिर आपने उनके साथ सलाम फेरा।"(35)
भय के समय की नमाज़ से हमें निम्नलिखित बातें मालूम होती हैं :
1- इस्लाम में नमाज़ की अहमियत, और जमात के साथ नमाज़ का महत्व, क्योंकि यह इन कठिन हालतों में भी माफ़ नहीं की गई।
2- इस उम्मत से कठिनाई को दूर करना, और शरीअत की सरलता और हर समय और स्थान के लिए उसकी उपयुक्तता।
3- इस्लामी शरीअत की संपूर्णता और यह कि उसने हर स्थिति के लिए उपयुक्त नियम बनाए हैं।
चौदहवाँ बिंदु : जुमा की नमाज़ :
पहला : जुमे की नमाज़ का हुक्म :
जुमे की नमाज़ अक़्लमंद, वयस्क, पुरुष एवं (अपने स्थान पर) ठहरे हुए मुसलमान पर, जिसके साथ कोई उज़्र न हो, व्यक्तिगत रूप से फ़र्ज़ है।
इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا نُودِيَ لِلصَّلَوٰةِ مِن يَوۡمِ ٱلۡجُمُعَةِ فَٱسۡعَوۡاْ إِلَىٰ ذِكۡرِ ٱللَّهِ وَذَرُواْ ٱلۡبَيۡعَۚ ذَٰلِكُمۡ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ9﴾
''ऐ ईमान वालो! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए आवाज़ दी जाए, तो अल्लाह की याद की ओर दौड़ पड़ो, तथा क्रय-विक्रय छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो।'' [सूरा जुमा: 9]।
तथा नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया :
»لَيَنْتَهِيَنَّ أَقْوَامٌ عَنْ وَدْعِهِمُ الْجُمُعَاتِ، أَوْ لَيَخْتِمَنَّ اللَّهُ عَلَى قُلُوبِهِمْ، ثُمَّ لَيَكُونُنَّ مِنَ الْغَافِلِينَ. «
"लोग जुमा की नमाज़ छोड़ने से रुक जायें वरना अल्लाह उनके दिलों पर मुहर लगा देगा, फिर वे अचेत रहने वालों में हो जायेंगे|"(36)
द्वितीय: जुमे की नमाज़ के सहीह होने की शर्तें:
1) समय: और उसका समय ज़ुह्र की नमाज़ के समय जैसा है, अतः जुमे की नमाज़ समय से पहले या उसके निकल जाने के बाद सही नहीं है।
2) इसे जमाअत के साथ अदा करना चाहिए, और सही राय के अनुसार जमाअत की न्यूनतम संख्या तीन है, अतः एक या दो आदमी द्वारा पढ़ी गई जुमे की नमाज़ सही नहीं होगी।
3) नमाज़ पढ़ने वाले ऐसे मकानों में रहने वाले हों, जो आमतौर पर निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाली सामग्री से बने हों। चाहे वह सशक्त सीमेंट से हो या पत्थरों से या मिट्टी से अथवा अन्य सामग्री से, इसलिए, उन घुमंतू या भ्रमणशील लोगों की जुमे की नमाज़ सही नहीं है, जो ख़ेमों और ऊन के घरों में रहते हों और किसी स्थायी स्थान पर न बसते हों, बल्कि अपने पशुओं के लिए चारा ढूंढते हुए इधर-उधर घूमते रहते हों।
4- जुमे की नमाज़ से पहले दो खुतबे दिए जाएँ, क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पाबंदी से ऐसा किया करते थे।
तृतीय: जुमा के ख़ुतबे के स्तंभ:
1- अल्लाह की प्रशंसा और दो गवाहियाँ (शहादतें)।
2- नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दुरूद भेजना
3- अल्लाह का तक़वा अपनाने का आग्रह करना।
4- क़ुरआन में से कुछ पढ़ना।
5- नसीहत करना।
चौथा: जुमा के दोनों खुतबों की मुस्तहब (वांछित) चीज़ें:
2- मिंबर पर ख़ुतबा देना।
3- दोनों ख़ुतबों के बीच में कुछ देर बैठ बैठना।
4- मुसलमानों और उनके शासकों के लिए दुआ करना।
5- ख़ुतबों को छोटा रखना।
6- ख़तीब का मिंबर पर चढ़ते समय लोगों को सलाम करना।
पाँचवाँ : जुमे के दिन के मुस्तहब कार्य :
1- मिस्वाक करना।
2- खुशबू लगाना यदि उपलब्ध हो।
3- जुमा की नमाज़ के लिए मस्जिद की ओर जल्दी निकलना।
4- मस्जिद पैदल जाना। किसी सवारी पर सवार न होना।
5- इमाम के क़रीब जगह लेना।
6- दुआ करना।
7- सूरा अल-कह्फ़ पढ़ना।
8- नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दुरूद भेजना।
छठा : जो व्यक्ति जुमा की नमाज़ में हाज़िर हो, उसे किन चीज़ों से मना किया गया है :
1- जुमे के दिन इमाम के खुत्बा देने के दौरान बात करना हराम है, जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम ने फरमाया है:
»إِذَا قُلْتَ لِصَاحِبِكَ يَوْمَ الْجُمُعَةِ: أَنصِتْ، وَالْإِمَامُ يَخْطُبُ، فَقَدْ لَغُوتَ.«
"यदि तुमने जुमा के दिन, इमाम के ख़ुतबा देते समय अपने साथी से कहा कि खामोश हो जा, तो तुमने व्यर्थ कार्य किया।"(37)
यानी तूने गुनाह का काम किया।
2- लोगों की गर्दनें फलाँगना नापसंदीदा (मकरूह) है। हाँ, इमाम ऐसा कर सकता है। इसी तरह यदि आगे खाली जगह हो और उसे भरने का कोई दूसरा रास्ता न हो, तब भी ऐसा किया जा सकता है।
जुमा की नमाज़ कब मिल जाती है :
जिसने जुमा की नमाज़ की दूसरी रक्अत में इमाम के साथ रुकूअ पा लिया, उसने जुमा की नमाज़ पा ली, और वह इसकी दो रक्अतें पूरी करे। यदि दूसरी रक्अत का रुकूअ नहीं पाया, तो उसकी जुमा की नमाज़ छूट गई और वह ज़ुह्र की नमाज़ की चार रक्अत पढ़े। और इसी तरह जो व्यक्ति नींद या किसी अन्य कारण से जुमे की नमाज़ छोड़ दे, तो उसे ज़ुह्र की नमाज़ पढ़नी चाहिए।
पंद्रहवाँ बिंदु : उज़्र वाले लोगों की नमाज़:
पहला: बीमार की नमाज़ :
पहला: रोगी को अपनी क्षमता के अनुसार नमाज़ अदा करना अनिवार्य है। जब तक उसका विवेक स्थिर है, उसके लिए समय से विलंब करना जायज़ नहीं है।
दूसरा: बीमार कैसे नमाज़ पढ़े?
1- रोगी को खड़े होकर नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है यदि वह बिना किसी कठिनाई या हानि के खड़ा हो सकता है, और रुकूअ और सज्दा करे।
2- यदि रुकूअ या सज्दे से उसे हानि होती हो, जबकि वह खड़े होने की क्षमता रखता हो; तो खड़े होकर रुकूअ का इशारा करे और बैठकर सज्दे का इशारा करे।
3- यदि खड़े होकर नमाज़ अदा करने की क्षमता न हो तो बैठकर नमाज़ पढ़े। ऐसे में सुन्नत यह है कि खड़े होने के स्थान पर पालथी मारकर बैठे, रुकूअ इशारे से करे और हो सके तो सज्दा ज़मीन पर करे। सज्दा भी ज़मीन पर न कर सके, तो इशारे से कर ले। उसमें रुकूअ से कुछ ज़्यादा झुके।
4- यदि बैठकर नमाज़ अदा करने की क्षमता न हो; तो पहलू के बल लेटकर नमाज़ पढ़े और अपना चेहरा क़िब्ला की ओर रखे। यदि संभव हो तो दाएँ पहलू के बल लेटकर नमाज़ पढ़ना उत्तम है। इस अवस्था में भी रुकूअ और सज्दा इशारे से करे।
5- अगर पहलू के बल नमाज़ अदा करने की क्षमता न हो; तो पीठ के बल लेटकर, पैर क़िब्ला की ओर करके नमाज़ पढ़े, और रुकूअ और सज्दा इशारा के साथ करे।
6- यदि उसके लिए रुकूअ और सज्दा में अपने शरीर से इशारा करना संभव न हो; तो वह अपने सिर से इशारा करे, और यदि यह भी कठिन हो; तो इशारा करना उससे माफ़ हो जाता है, अपने दिल में नमाज़ के कार्यों को अंजाम दे। दिल में नमाज़ के कार्यों जैसे रुकूअ, सज्दा और बैठक आदि की निय्यत करता जाए और उनके अज़कार पढ़ता जाए।
7- बीमार व्यक्ति नमाज़ की शर्तों में जितने का पालन कर सके, करेगा, जैसे: क़िब्ले की ओर मुँह करना, पानी से वुज़ू करना, या असमर्थता की स्थिति में तयम्मुम करना, और नजासतों से पवित्रता। यदि इनमें से किसी चीज़ में असमर्थ हो, तो वह उससे मुक्त होगा, और अपनी स्थिति के अनुसार नमाज़ पढ़ेगा, और नमाज़ को उसके समय से विलंबित नहीं करेगा।
8- सुन्नत यह है कि बीमार व्यक्ति खड़े होने और रुकूअ के स्थान पर पालथी मारकर बैठे, और अन्य कार्यों के लिए इफ्तिराश की मुद्रा में बैठे।
दूसरा: यात्री की नमाज़:
1- उज़्र वाले लोगों में से एक यात्री भी है। अतः उसके लिए चार रक्अत वाली नमाज़ों को चार से घटाकर दो रक्अत पढ़ना शरीअत सम्मत है। इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿وَإِذَا ضَرَبۡتُمۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَلَيۡسَ عَلَيۡكُمۡ جُنَاحٌ أَن تَقۡصُرُواْ مِنَ ٱلصَّلَوٰةِ...﴾
"और जब तुम धरती में यात्रा करो, तो नमाज़ क़स्र (संक्षिप्त) करने में तुमपर कोई गुनाह नहीं है...।" [सूरा अल-निसा : 101]।
अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं :
»خَرَجْنَا مَعَ النَّبِيِّ ﷺ مِنَ الْمَدِينَةِ إِلَى مَكَّةَ، فَكَانَ يُصَلِّي رَكْعَتَيْنِ رَكْعَتَيْنِ، حَتَّى رَجَعْنَا إِلَى الْمَدِينَةِ.«
"हम अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ मदीना से मक्का तक गये। आप इस दौरान दो दो रक्अत पढ़ते रहे, यहां तक कि हम लोग मदीना लौट आए।"(38)
और क़स्र उस समय शुरू होती है जब यात्री अपने शहर की आबादी से निकल जाता है; क्योंकि अल्लाह ने क़स्र की इजाज़त उन लोगों को दी है जो धरती में सफ़र करते हैं, अपने शहर से बाहर निकलने से पहले, वह न तो ज़मीन पर चलने वाला होता है और न ही मुसाफ़िर, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम केवल तब क़स्र करते थे जब आप सफ़र पर निकलते थे।
2- वह दूरी जिसे तय करने पर मुसाफ़िर के लिए नमाज़ क़स्र करना जायज़ होता है, लगभग अस्सी किलोमीटर है।
3- यात्री को यात्रा से वापसी के समय भी अपने नगर में, जहाँ से यात्रा का आरंभ किया था, प्रवेश करने तक आधी नमाज़ पढ़ने की अनुमति है।
4- यदि यात्री किसी शहर में पहुँचता है और वहाँ ठहरने का इरादा करता है, तो उसके लिए तीन स्थितियाँ हैं:
क) यदि चार दिनों से अधिक ठहरने का इरादा कर ले, तो उसे पहले दिन से ही पूरी नमाज़ पढ़नी होगी और यात्रा की रुख़्सतों का लाभ नहीं उठा सकेगा।
ख) यदि चार दिन या उससे कम ठहरने का इरादा हो, तो क़स्र (चार रक्अत वाली नमाज़ों को दो रक्अत पढ़ना) और यात्रा की रुख़्सतों (छूटों) का लाभ उठाना जायज़ है।
ग) ठहरने की कोई निश्चित मंशा न हो, बल्कि स्थान की अनुकूलता के अनुसार एक दिन या दस दिन तक भी रुक सकता हो, या इलाज या किसी काम के लिए रुका हो, और इरादा यह हो कि जब उसका काम समाप्त हो जाए तो अपने देश लौट जाए; इसलिए उसे क़स्र (चार रक्अत वाली नमाज़ों को दो रक्अत पढ़ना) और यात्रा की रुख़्सतों (छूटों) का लाभ उठाने की अनुमति है, जब तक कि वह लौट न आए, भले ही उसके ठहरने का समय चार दिनों से अधिक हो जाए।
5- अगर यात्री मुक़ीम (स्थायी निवासी) इमाम के पीछे नमाज़ पढ़े, तो उसपर पूरी नमाज़ पढ़ना वाजिब है, चाहे उसने इमाम के साथ केवल अंतिम तशह्हुद ही पाया हो।
6- अगर मुक़ीम (स्थायी निवासी) किसी मुसाफ़िर (यात्री) के पीछे नमाज़ पढ़े जो नमाज़ क़स्र कर रहा हो, तो मुक़ीम पर इमाम के सलाम फेरने के बाद अपनी नमाज़ पूरी करना वाजिब है।
सोलहवाँ बिंदू : दोनों ईदों की नमाज़ :
मुसलमानों के त्योहार अल्लाह की ओर से निर्धारित हैं। मुसलमानों ने स्वयं इनको निर्धारित निहीं किया है। उनके पास केवल दो ईदें हैं, और वे: ईद-उल-फ़ित़्र, तथा ईद-उल-अज़्हा हैं। जबकि काफ़िरों के त्योहार अल्लाह की ओर से निर्धारित नहीं, बल्कि ख़ुद उनके द्वारा निर्धारित किए हुए हैं।
दोनों ईदों की नमाज़ का हुक्मः
फर्ज़ -ए- किफ़ाया है, जिसे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नियमित रूप से किया और ख़लीफ़ा-ए-राशिदीन रज़ियल्लाहु अन्हुम ने भी इसे जारी रखा। यह धर्म के प्रतीकों और इसके स्पष्ट चिन्हों में से एक हैं।
ईद की नमाज़ का समय सूरज के एक भाले के बराबर ऊँचा हो जाने से शुरू होता है, यानी सूरज निकलने के लगभग पंद्रह मिनट बाद, और इसका समय सूरज के ढल जाने पर समाप्त होता है।
दोनों ईदों की नमाज़ का तरीक़ाः
1- पहली रक्अत में तकबीरतुल-इह़राम कहे, फिर दुआ-ए-इस्तिफ़ताह़ पढ़े, फिर छह तकबीरें कहे, हर तकबीर के साथ अपने हाथ उठाये, और अल्लाह की हम्द और उसकी प्रशंसा करे, और तकबीरों के बीच नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजे, फिर तअव्वुज़ (अउज़ुबिल्लाहि मिनश्शैत़ानिर्रजीम) और बिस्मिल्लाह (बिस्मिल्लाहिर्रह़मानिर्रह़ीम) पढ़े, और क़िराअत शुरू करे।
2- दूसरी रक्अत में, तकबीर-ए-इंतिकाल के बाद पाँच तकबीरें कहे। फिर तअव्वुज़ और बिस्मिल्लाह पढ़े और क़िरात (क़ुरआन पढ़ना) शुरू करे। पहली रक्अत में सूरा फ़ातिहा के बाद सूरा अल-आ़ला पढ़ना मुस्तहब है और दूसरी रक्अत में सूरा अल-ग़ाशिया।
3- जब इमाम सलाम फेर ले, तो मिंबर पर चढ़कर दो खुतबे दे और उनके बीच कुछ क्षणों के लिए बैठ, जैसा कि जुमे के खुतबे में किया जाता है।
ईद की सुन्नतें:
क- स्नान करना।
ख- स्वच्छता प्राप्त करना और खुशबू लगाना।
ग - ईद अल-फ़ित्र के लिए निकलने से पहले कुछ खाना और ईद अल-अज़्हा की नमाज़ पढ़ने के बाद अपनी क़ुर्बानी का मांस खाना, यदि उसके पास क़ुरबानी हो तो।
घ- पैदल चलकर जाना।
ङ- एक रास्ते से जाना और दूसरे रास्ते से लौटना।
च- मुक़्तदियों का जल्दी ईदगाह जाना, इमाम का नहीं।
तकबीर कहना
दोनों ईदों की रातों में, ज़ुल-हिज्जा के पहले दस दिनों में, और अय्याम-ए-तशरीक़ के दिनों में तकबीर पढ़ना सुन्नत है। यह दो प्रकार का होता है।
प्रथम प्रकार: तकबीर-ए-मुत़लक़ (सामान्य तकबीर): जो किसी विशेष समय से बंधा हुआ नहीं है।
1- ईद अल-फ़ित्र में : यह तकबीर ईद अल-फ़ित्र में ईद की रात सूरज डूबने से लेकर ईद की नमाज़ शुरू होने तक पढ़नी है।
2- ईद-उल-अज़्हा में: ज़ुल-हिज्जा के पहले दिन की रात के सूरज डूबने से लेकर तशरीक़ के आखिरी दिन के सूरज डूबने तक।
द्वितीय प्रकार: तकबीर-ए-मुक़य्यद (सीमित तकबीर): जो फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद कही जाती है।
1- ग़ैर-मुहरिम (ऐसा व्यक्ति जो एहराम न बाँधे हुआ हो): यह तकबीर अरफ़ा के दिन की सुबह से तशरीक़ के आख़िरी दिन की अस्र तक कहेगा।
2- मुहरिम (एहराम बाँधे हुआ व्यक्ति): यह तकबीर ईद के दिन की ज़ुहर की नमाज़ से लेकर तशरीक़ के आख़िरी दिन की अस्र की नमाज़ तक कहेगा।
सत्रहवाँ बिंदु : सूर्य ग्रहण की नमाज़ :
अल-ख़ुसूफ़ु और अल-कुसूफ़ु का अर्थ :
अल-ख़ुसूफ़ु: रात में चाँद की रौशनी का या उसके कुछ हिस्से का ग़ायब हो जाना।
अल-कुसूफ़: दिन में सूर्य की रौशनी का या उसके कुछ हिस्से का गायब हो जाना।
सूर्य ग्रहण एवं चाँद ग्रहण की नमाज़ का हुक्म :
यह सुन्नत-ए-मुअक्कदा है, तथा इसका प्रमाण अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अमल से मिलता है, जब आपने अपने ज़माने में सूर्य ग्रहण के समय यह नमाज़ अदा की। इसी तरह आपने इस नमाज़ का हुक्म भी दिया है। उलमा का इसके शरीअत सम्मत होने पर मतैक्य भी है।
सूर्य ग्रहण एवं चाँद ग्रहण की नमाज़ का समय :
सूर्य ग्रहण या चाँद ग्रहण के शुरू होने से लेकर ग्रहण के समाप्त होने तक का समय।
सूर्य ग्रहण एवं चाँद ग्रहण की नमाज़ का तरीक़ा :
इसकी नमाज़ दो रक्अत है, जिनमें क़िरात ज़ोर से की जाती है, और इसकी विधि इस प्रकार है:
क- तकबीर-ए-तहरीमा कहे, इस्तिफ़ताह पढ़े, तअव्वुज़ और बिस्मिल्लाह कहे, फिर सूरा फ़ातिहा पढ़े, उसके बाद लंबी क़िरात करे।
ख- फिर लंबा रुकूअ करे।
ग- फिर रुकूअ से सर उठाए और ''سمع الله لمن حمده" कहे, फिर सूरा फ़ातिहा पढ़े, फिर पहली क़िरात की तुलना में थोड़ी कम लंबी तिलावत करे।
घ: फिर लंबा रुकूअ करे लेकिन पहले रुकूअ से थोड़ा कम लंबा करे।
ङ- फिर रुकूअ से उठे और ''سمع الله لمن حمده'' कहे।
और फिर दो लंबे सज्दे करे।
फिर दूसरी रक्अत के लिए खड़ा हो, जो पहली रक्अत ही की तरह है, लेकिन उससे थोड़ी कम लम्बी पढ़े।
सूरज ग्रहण तथा चाँद ग्रहण की नमाज़ की सुन्नतें :
क) "الصلاة جامعة, नमाज़ के लिए एकत्र हो जाओ" कहकर इस नमाज़ के लिए लोगों को बुलाना।
ख) जमात के साथ अदा की जाए।
ग) नमाज़ में खड़े होने, रुकूअ और सज्दा में लंबाई करना।
घ) दूसरी रक्अत पहली से छोटी हो।
ङ) उसके बाद उपदेश, और नेकियों को करने और बुराइयों को छोड़ने की प्रेरणा देना।
व) अधिकाधिक दुआ, विनती, इस्तिग़फ़ार और सदक़ा करना।
अठाहरवाँ बिंदु : इस्तिसक़ा -बारिश माँगने- की नमाज़ :
1) इस्तिसक़ा : सूखे के समय अल्लाह तआला से बारिश माँगना।
इस्तिसक़ा की नमाज़ का समय :
जब ज़मीन सूख जाए, बारिश रुक जाए, और उसके रुकने से नुकसान हो, तो इस्तिसक़ा की नमाज़ पढ़ना शुरू किया जाता है। ऐसे समय में इन्सान के पास कोई चारा नहीं होता सिवाय इसके कि वे अपने रब के सामने गिड़गिड़ाएँ और उससे बारिश माँगें, और विभिन्न तरीक़ों से गिड़गिड़ा कर उससे मदद की गुहार लगाएँ।
क- कभी जमात के साथ नमाज़ पढ़ कर कभी अकेले नमाज़ पढ़ कर।
ख- कभी जुमा के ख़ुतबे में दुआ कर के, जिसमें ख़तीब दुआ करे और मुसलमान उसकी दुआ पर आमीन कहें।
उत्तर- और कभी भी किसी भी समय दुआ करे, बिना नमाज़ और बिना खुतबा के।
इस्तिस्क़ा की नमाज़ का हुक्म :
सुन्नत -ए- मुअक्कदा है, जब इसका कारण मौजूद हो, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अमल के कारण, जैसा कि अब्दुल्लाह बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है कि उन्होंने कहा:
»خَرَجَ النَّبِيُّ ﷺ إِلَى الْمُصَلَّى، فَاسْتَسْقَى، وَاسْتَقْبَلَ الْقِبْلَةَ، وَقَلَبَ رِدَاءَهُ، وَصَلَّى رَكْعَتَيْنِ. «
"नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदगाह की ओर निकले, बारिश माँगने की दुआ की, क़िब्ले की ओर मुँह किया, अपनी चादर पलट दी और दो रक्अत नमाज़ पढ़ी।"(39)
4) इस्तिसक़ा -बारिश माँगने- की नमाज़ का तरीक़ा :
इस्तिसक़ा की नमाज़ का तरीक़ा अपने स्थान पर ईद की नमाज़ ही की तरह है। इसे ईद की नमाज़ की तरह ईदगाह में अदा करना मुस्तहब है, और इसके अहकाम ईद की नमाज़ के अहकाम के समान हैं; रक्अतों की संख्या में, क़िरात ऊँची आवाज़ में करने में, ख़ुतबे से पहले इसके अदा करने में, और पहली और दूसरी रक्अत में क़िरात से पहले ज़्यादा तक्बीरात कहने में। जैसा कि पहले दोनों ईदों की नमाज़ में बताया गया है: एक ख़ुतबा देगा।
उन्नीसवाँ बिंदु : जनाज़े से संबंधित शरई प्रावधान :
पहला : मरणासन्न व्यक्ति के पास मौजूद व्यक्ति से संबंधित प्रावधान :
1-सुन्नत यह है कि जो व्यक्ति मर रहे व्यक्ति के पास उपस्थित हो, वह उसे ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' याद दिलाए।
2- मरणासन्न व्यक्ति का मुँह क़िब्ला की ओर कर देना सुन्नत है।
3- उसकी आँखें बंद कर देना मुस्तहब है।
4- मृतक को मृत्यु के बाद कपड़े से ढक देना सुन्नत है।
5- जल्दी-जल्दी कफ़न-दफ़न कर देना चाहिए।
6- मृतक के कर्ज़ जल्दी चुका देना ज़रूरी है।
7- मृतक को नहलाया जाए और कफ़न दिया जाए। यह दोनों कार्य फ़र्ज़-ए-किफ़ाया हैं।
दूसरा : जनाज़े की नमाज़ से संबंधित प्रावधान :
1- जनाज़े की नमाज़ का हुक्म : जनाज़े की नमाज़ फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है।
2- जनाज़े की नमाज़ की शर्तें :
1- क़िब्ला की ओर मुँह करना।
2- नग्नता को ढकना।
3- गंदगी से बचना।
4- नमाज़ी और जिस पर नमाज़ पढ़ी जा रही है, उनका पाक होना।
5- नमाज़ पढ़ने वाले और जिस पर नमाज़ पढ़ी जा रही है, दोनों का मुसलमान हो।
6) यदि क्षेत्र और नगर में हो तो जनाज़े में शामिल होना।
7- शरई ज़िम्मेवारियों को उठाने का पाबंद होना।
3- जनाज़े की नमाज़ के स्तंभ :
1- उसमें खड़ा होना।
2- चार तकबीरें कहना।
3) सूरा फ़ातिहा पढ़ना।
4) नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजना।
5- मृतक के लिए दुआ करना।
6- तरतीब का ख़्याल रखना।
7- सलाम फेरना।
जनाज़े की नमाज़ की सुन्नतें :
1- हर तकबीर के साथ दोनों हाथों को उठाना।
2- शरण मांगना।
3) अपने लिए और मुसलमानों के लिए दुआ करना।
4- धीमी आवाज़ से क़ुरआन पढ़ना।
5- चौथी तकबीर के बाद और सलाम फेरने से पहले थोड़ी देर खड़ा रहना।
6- दायें हाथ को बायें हाथ पर सीने के ऊपर रखना।
7- सलाम फेरते समय दाईं ओर मुड़ना।
जनाज़े की नमाज़ का तरीक़ा
इमाम और अकेले नमाज़ पढ़ने वाला व्यक्ति पुरुष के सीने के बराबर एवं महिला के बीच में खड़ा हो, इहराम की तकबीर (पहली तकबीर) कहे, तअव्वुज़ पढ़े, इस्तिफ़ताह न पढ़े, बिस्मिल्लाह कहे और सूरा फ़ातिहा पढ़े।
फिर तकबीर कहे, और उसके बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजे, फिर तकबीर कहे, और मृतक के लिए वह दुआ करे जो वर्णित है; एक दुआ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन है :
»اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا، وَصَغِيرِنَا وَكَبِيرِنَا، وَذَكَرِنَا وَأُنثَانَا، وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا، اللَّهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ عَلَى الإِيمَانِ، وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَى الإِسْلَامِ، اللَّهُمَّ لَا تَحْرِمْنَا أَجْرَهُ، وَلَا تُضِلَّنَا بَعْدَهُ.«
"ऐ अल्लाह! हमारे जीवित तथा मृत, छोटे तथा बड़े, पुरुष तथा स्त्री और उपस्थित तथा अनुपस्थित सबको क्षमा कर दे। ऐ अल्लाह, हममें से जिसे जीवित रखना हो, ईमान पर जीवित रख और हममें से जिसे मारना हो, उसे इस्लाम की अवस्था में मौत दे। ऐ अल्लाह! हमें उसके प्रतिफल से वंचित न कर और हमें उसके बाद पथ-भ्रष्ट मत कर।"(40)
एक दुआ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन भी है :
»اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ، وَعَافِهِ وَاعْفُ عَنْهُ، وَأَكْرِمْ نُزُلَهُ، وَوَسِّعْ مَدْخَلَهُ، وَاغْسِلْهُ بِالْمَاءِ وَالثلْجِ وَالْبَرَدِ، وَنَقِّهِ مِنَ الْخَطَايَا كَمَا نَقَّيْتَ الثَّوْبَ الْأَبْيَضَ مِنَ الدَّنَسِ، وَأَبْدِلْهُ دَارًا خَيْرًا مِنْ دَارِهِ، وَأَهْلًا خَيْرًا مِنْ أَهْلِهِ، وَزَوْجًا خَيْرًا مِنْ زَوْجِهِ، وَأَدْخِلْهُ الْجَنَّةَ، وَأَعِذْهُ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، وَمِنْ عَذَابِ النَّارِ.«
"ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे, इसपर दया कर, इसे सकुशल रख, इसे माफ़ कर, इसका ससम्मान सत्कार कर, इसकी क़ब्र को फैला दे, इसे पानी, बर्फ और ओले से धो दे, इसे गुनाहों से उसी तरह स्वच्छ एवं साफ़ कर, जैसे तू ने उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया है, इसे अपने घर के बदले में उससे उत्तम घर प्रदान कर, अपने घर वालों से अच्छे घर वाले दे और अपने जीवन साथी से अच्छा जीवन साथी दे, इसे जन्नत में दाख़िल कर और क़ब्र की यातना तथा आग के अज़ाब से बचा।"(41)
फिर तकबीर कहेगा, और उसके बाद थोड़ी देर खड़ा रहेगा, फिर दाईं ओर एक बार सलाम फेरे गा।
तीसरा विषय : ज़कात :
1- ज़कात की परिभाषा और उसका महत्व :
ज़कात का शाब्दिक अर्थ है: वृद्धि एवं बढ़ोतरी।
ज़कात शरीअत के अनुसार: एक अनिवार्य हक़ है, जो शरीअत द्वारा निर्धारित विशेष धन में, विशेष समूह के लोगों के लिए होता है।
और यह इस्लाम के स्तंभों में तीसरा स्तंभ है, कुरआन में बयासी स्थानों पर ज़कात का ज़िक्र नमाज़ के साथ हुआ है, जो उसके महत्व को दर्शाता है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ...﴾
"तथा नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो...।" [सूरा अल-बक़रा: 43]।
और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:
»بُنِيَ الإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّـهُ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّـهِ، وَإِقَامِ الصَّلَاةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَحَجِّ الْبَيْتِ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ.«
"इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर रखी गई है : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज्ज करना तथा रमज़ान के रोज़े रखना।"(42)
इसके फ़र्ज़ होने पर सभी मुसलमान एकमत हैं। और इस बात पर भी कि जिसने उसकी अनिवार्यता का इनकार किया, वह काफिर है। तथा इस पर भी कि उन लोगों से लड़ाई की जाएगी जो इसे निकालने से रोकते हैं।
2- ज़कात की अनिवार्यता की शर्तें:
क) आज़ाद होना : दास पर ज़कात अनिवार्य नहीं है, क्योंकि उसके पास कोई धन नहीं होता। जो कुछ उसके पास होता है, वह उसके मालिक का होता है। इसलिए उसकी ज़कात उसके मालिक पर अनिवार्य होती है।
ख) इस्लाम: काफ़िर पर यह फ़र्ज़ नहीं है; क्योंकि यह एक इबादत और आज्ञापालन है, और काफ़िर इबादत और आज्ञापालन के योग्य नहीं है।
ग) निसाब का मालिक होना: निसाब से कम पर ज़कात अनिवार्य नहीं है, और यह धन की एक निश्चित मात्रा है।
घ) पूर्ण स्वामित्व: अर्थात धन का स्वामित्व व्यक्ति के पास पूर्ण और सम्पूर्ण रूप से हो, अतः उस धन में ज़कात नहीं है जिसका स्वामित्व स्थिर नहीं हुआ हो, जैसे कि किताबत का कर्ज़।
ङ) धन पर एक वर्ष का गुज़रना: आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की इस मर्फूअ हदीस के कारण :
»لَا زَكَاةَ فِي مَالٍ حَتَّى يَحُولَ عَلَيْهِ الْحَوْلُ.«
''माल पर तब तक ज़कात नहीं है जब तक कि उस पर एक साल न गुज़र जाए।''(43)
3- वे संपत्तियाँ जिनमें ज़कात वाजिब है:
पहला बिंदू: बहीमतुल-अनआम (विशेष पशु),
और इन से तात्पर्य: ऊँट, गाय और बकरियाँ हैं, और इन में ज़कात दो शर्तों के साथ वाजिब है:
1-इन्हें दूध और बच्चे के लिए पाला जाए। काम लेने के लिए नहीं।
2- चरने वाले हों, अतः उन जानवरों पर ज़कात वाजिब नहीं है, जिन्हें उनके लिए ख़रीदे गए चारे, एकत्रित की गई घास आदि खिलाया जाए। उन जानवरों पर भी ज़कात नहीं है, जो साल का कुछ हिस्सा ही चरकर गुज़ारा करते हैं, न कि पूरा या अधिकतर हिस्सा।
4- इन जानवरों की ज़कात का निसाब:
1- ऊँट की ज़कात:
जब शर्तें पूरी हो जाएं, तो हर पाँच ऊँटों पर एक बकरी, दस पर दो बकरियाँ, पंद्रह पर तीन बकरियाँ, और बीस पर चार बकरियाँ देना वाजिब है। इस बात की पुष्टि सुन्नत एवं इज्मा से होती है। फिर जब संख्या 25 हो जाए, तो एक बिंत-ए-मख़ाज़ यानी एक वर्ष की ऊंटनी देनी है, जो एक साल पूरा कर चुकी हो और दूसरे साल में प्रवेश कर चुकी हो। अगर बिंत-ए-मख़ाज़ उपलब्ध न हो, तो एक इब्न-ए-लबून अर्थात दो साल का ऊंट देना होगा।
और जब ऊँटों की संख्या 36 हो जाए, तो ज़कात के तौर पर एक बिंत-ए-लबून यानी दो साल की ऊँटनी देनी होगी।
जब ऊँटों की संख्या 46 हो जाए, तो ज़कात के तौर पर एक हिक़्क़ा, यानी तीन साल की ऊँटनी देनी होगी।
जब ऊँटों की संख्या 61 हो जाए, तो ज़कात के तौर पर एक जज़'आ, यानी चार साल की ऊँटनी देनी होगी।
फिर जब ऊँटों की संख्या 76 हो जाए, तो दो बिंत-ए-लबून देना होगा।
जब ऊँटों की संख्या 91 हो जाए, तो ज़कात के तौर पर दो हिक़्क़ा ऊँटनियाँ देनी होंगी।
फिर जब ऊँटों की कुल संख्या एक सौ बीस से एक अधिक हो जाए, तो तीन बिंत-ए-लबून देना आवश्यक होगा। फिर, इसके बाद हर 40 ऊँटों पर एक बिंत-ए-लबून और हर 50 पर एक ह़िक्क़ा देनी होगी।
2- गायों की ज़कात:
जब शर्तें पूरी हो जाएँ और संख्या 30 हो जाए, तो एक साल का बछड़ा या बछिया देनी होगी। अर्थात्, जो एक साल पूरी कर चुकी हो और दूसरे साल में प्रवेश कर चुकी हो।
तीस से कम में कुछ नहीं।
जब संख्या 40 हो जाए, तो दो साल की एक बछिया देनी होगी।
जब गायों की कुल संख्या 40 से अधिक हो जाए, तो हर 30 पर एक साल का बछड़ा या बछिया और हर 40 पर दो साल की एक बछिया देनी होगी।
3- बकरियों की ज़कात:
जब भेड़-बकरियों की कुल संख्या 40 हो जाए, तो ज़कात के तौर पर छः महीने का भेड़ या एक साल की बकरी निकाली जाएगी।
बकरियों पर ज़कात नहीं है यदि उनकी संख्या 40 से कम हो। जब बकरियों की कुल संख्या 121 हो जाए, तो दो बकरियाँ देना होगी। यदि संख्या 201 हो जाए, तो फिर तीन बकरियाँ देना होंगी।
फिर, इस संख्या के बाद हर सौ बकरियों पर एक बकरी देना फर्ज़ है। इस प्रकार, चार सौ बकरियों पर चार बकरियाँ देनी होंगी, और इसी तरह आगे।
दूसरा बिंदू: ज़मीन से निकलने वाली चीज़ों की ज़कात:
ज़मीन से निकलने वाली चीज़ें दो प्रकार की होती हैं:
1) अनाज और फल।
2) धातुएँ
प्रथम प्रकार: अनाज और फल:
अनाज, जैसे गेहूँ, जौ और चावल पर ज़कात वाजिब है। और फलों में; जैसे: खजूर और किशमिश, और अन्य पौधों पर ज़कात वाजिब नहीं है; जैसे दालें और सब्ज़ियाँ।
अनाज और फलों पर ज़कात वाजिब होने की शर्तें:
1) ज़ख़ीरा किया गया हो: फलों और सब्ज़ियों जैसी चीज़ों पर ज़कात नहीं है जिन्हें ज़ख़ीरा नहीं किया जाता।
2) वह मापी जाने वाली चीज़ों के दायरे में आएँ : इसलिए उन फलों और अनाजों पर ज़कात नहीं है जो गिनती या वज़न से बेचे जाते हों; जैसे तरबूज, प्याज़ तथा अनार आदि।
3) निसाब तक पहुँच जाएँ : निसाब पाँच वसक़ है। इससे कम में ज़कात नहीं है।
4) ज़कात की अनिवार्यता के समय निसाब का मालिक होना।
तो जिस व्यक्ति के पास ज़कात वाजिब होने के समय के बाद धन आया, उसपर ज़कात वाजिब नहीं है, जैसे कि उसने उसे कटाई के बाद ख़रीदा हो या उसे उपहार में मिला हो।
ज़कात के अनिवार्य होने का समय :
अनाजों और फलों पर ज़कात वाजिब है जब वे पकने लगें। और पकने के प्रारंभ की निशानी इस प्रकार है:
क- अनाज जब सख़्त हो जाए।
ख- खजूर लाल या पीला हो जाए।
ख- अंगूर में यह है कि वह नरम और मीठा हो।
अनाज और फलों का निसाब:
अनाज और फलों का निसाब: पाँच वसक़ है, एक वसक़ साठ साअ का होता है, तो निसाब तीन सौ साअ नबवी होगा, और किलोग्राम में निसाब लगभग 900 किलोग्राम के बराबर होगा।
अनाज और फलों में वाजिब ज़कात की मात्रा :
जो ज़मीन बिना मेहनत और खर्च के सैराब हो, मसलन बारिश के पानी और चश्मों से सैराब होती हो, तो उसमें दसवाँ हिस्सा वाजिब होगा।
जबकि जो ज़मीन खर्च और मेहनत से सैराब की जाए; मसलन कुओं और नदियों के पानी से जानवरों या आधुनिक यंत्रों के माध्यम से सैराब की जाए, तो उसमें बीसवाँ हिस्सा वाजिब होगा।
द्वितीय प्रकार: धातुएँ:
पृथ्वी से निकलने वाले प्रकार: खनिज, यह वह वस्तू है जो धरती से निकाला जाता है, लेकिन धरती से विभिन्न होता है; जैसे सोना, चांदी, लोहा और रत्न।
धातू में ज़कात अदा करने का समय:
जब उसे प्राप्त कर ले और उसका मालिक बन जाए; तो तुरंत उसकी ज़कात निकाल दे, क्योंकि इसके लिए साल का पूरा होना आवश्यक नहीं है। और इसका निसाब सोने और चाँदी का निसाब है, और इसकी कीमत का ढाई प्रतिशत निकाला जाएगा।
तीसरा बिंदू: ज़कात अल-अस़्मान:
अल-अस़्मान (क़ीमतों) से मुराद: सोना, चाँदी और नक़दी नोट हैं, और इनकी ज़कात वाजिब है, इसका प्रमाण: उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है:
﴿وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ وَلَا يُنْفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ 34﴾
"तथा जो लोग सोना-चाँदी एकत्र करके रखते हैं और उसे अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते, तो उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दो।" [सूरा अल-तौबा: 34]।
और एक हदीस में आया है:
»مَا مِنْ صَاحِبِ ذَهَبٍ وَلَا فِضَّةٍ لَا يُؤَدِّي فِيهَا حَقَّهَا؛ إِلَّا إِذَا كَانَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ صُفِّحَتْ لَهُ صَفَائِحُ مِنْ نَارٍ.«
''जो भी सोना या चाँदी रखने वाला व्यक्ति अपने उस धन का हक़ (ज़कात) अदा नहीं करता, उसके लिए क़ियामत के दिन आग की तख़्तियाँ तैयार की जाएँगी।''(44)
सभी विद्वानों की इस बात पर सहमति है कि सोने और चांदी में ज़कात अनिवार्य है। तथा कागज़ी मुद्रा का भी वही हुक्म है जो सोने और चांदी का है, क्योंकि यह मुद्रा लेन-देन में उनके स्थान पर इस्तेमाल होती है।
सिक्कों में ज़कात का निसाब और उसमें वाजिब मात्रा:
क़ीमतों का निसाब वही है, जो सोने और चाँदी का है। क्योंकि क़ीमतें क़ीमत होने के मामले में उन दोनों के स्थान पर काम करती हैं। इसलिए जब ये, दोनों में से किसी एक के निसाब तक पहुँच जाएँ, तो इनकी ज़कात देनी होगी। आज कल आम तौर पर काग़ज़ी मुद्रा का निसाब चाँदी का निसाब माना जाता है। क्योंकि चाँदी सोने के मुक़ाबले में सस्ती है और इसका निसाब सोने के निसाब से पहले पूरा हो जाता है। जब किसी मुसलमान के पास 595 ग्राम चाँदी की क़ीमत हो और साल गुज़र जाए, तो उसमें ज़कात वाजिब होगी। वैसे चाँदी की क़ीमत बदलती रहती है। इसलिए जिसके पास कम धन हो और पता न हो कि निसाब तक पहुँचा है या नहीं, तो वह व्यापारियों से एक ग्राम चाँदी की क़ीमत पूछे और उसे 595 से गुना कर दे। जितना निकलेगा, वही निसाब होगा।
नोट : यदि कोई अपने माल की ज़कात निकालना चाहता है, तो वह निसाब को चालीस पर विभाजित करे, जो निकले वही वाजिब मात्रा है।
4- व्यापार के सामान की ज़कात:
इनसे मुराद वह वस्तुएँ हैं, जो लाभ एवं मुनाफा के उद्देश से ख़रीदने और बेचने के लिए तैयार रखी जाती हैं। व्यापार के सामान में नक़दी के सिवा सभी प्रकार की धनराशि शामिल होती है; जैसे कि गाड़ियाँ, कपड़े सिले हुए और बगैर सिले हुए, लोहा, लकड़ी आदि जो व्यापार के लिए तैयार किया गया हो।
व्यापार के सामान में ज़कात वाजिब होने की शर्तें:
1- उसका स्वामित्व अपने कार्य द्वारा प्राप्त करना; जैसे ख़रीद-बिक्री, किराया, और अन्य प्रकार की कमाई के माध्यम से।
2- उनका मालिक व्यापार की निय्यत से होना; यानी उनसे कमाना उद्देश्य हो, क्योंकि सारे कर्म निय्यत पर आधारित होते हैं और व्यापार एक कार्य है, इसलिए अन्य कार्यों की तरह इसके साथ भी निय्यत का होना आवश्यक है।
3- उनकी क़ीमत सोना या चाँदी में से किसी एक के निसाब तक पहुँचनी चाहिए।
4- उस पर पूरा साल, यानी पूरी तरह एक साल का गुज़रना।
व्यावसायिक सामान की ज़कात निकालने का तरीक़ा :
साल पूरा होने पर सामानों के मूल्य का निर्धारण सोने या चाँदी से किया जाएगा। जब उनके मूल्य का निर्धारण किया जाए और सोने या चाँदी में से किसी एक के अनुसार निसाब तक पहुँच जाएँ, तो उनकी क़ीमत का चालीसवाँ हिस्सा ज़कात के रूप में निकाला जाएगा।
पाँचवां : ज़कात अल-फ़ित्र
यह रमज़ान के महीने के अंत में दी जाने वाली वाजिब स़दक़ा (दान) है, हिजरत के दूसरे साल में इस ज़कात को फ़र्ज़ किया गया।
ज़कात अल-फ़ित्र का हुक्म :
ज़कात अल-फ़ित्र हर उस मुसलमान पर अनिवार्य है जिसके पास ईद के दिन और रात के लिए अपने और अपने परिवार के लिए पर्याप्त भोजन के अतिरिक्त कुछ बचता हो। यह प्रत्येक मुसलमान पर अनिवार्य है; चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, छोटा हो या बड़ा, आज़ाद हो या गुलाम, इसका प्रमाण यह हदीस है :
»فَرَضَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ زَكَاةَ الْفِطْرِ عَلَى الْعَبْدِ وَالْحُرِّ، وَالذَّكَرِ وَالْأُنثَى، وَالصَّغِيرِ وَالْكَبِيرِ، مِنَ الْمُسْلِمِينَ.«
"अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हर मुसलमान ग़ुलाम और आज़ाद, मर्द और औरत, छोटे और बड़े पर सदक़ा-ए-फ़ित्र फर्ज़ किया है।"(45)
और फ़र्ज़ का अर्थ है: अनिवार्य और वाजिब किया गया।
ज़कात अल-फ़ित्र को अनिवार्य करने की हिकमत:
इब्ने-अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं :
»فَرَضَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ زَكَاةَ الْفِطْرِ؛ طُهْرَةً لِلصَّائِمِ مِنَ اللَّغْوِ وَالرَّفَثِ، وَطُعْمَةً لِلْمَسَاكِينِ.«
"अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सदक़ा-ए-फ़ित्र को रोज़ेदार के लिए व्यर्थ और गंदी बातों से पवित्रता और मिस्कीनों (निर्धनों) के लिए भोजन के रूप में अनिवार्य किया है।"(46)
ज़कात अल-फ़ित्र के वाजिब होने और उसे निकालने का समय :
ईद की रात सूरज डूबने के साथ ज़कात अल-फ़ित्र वाजिब हो जाती है। ईद के दिन ईद की नमाज़ के लिए निकलने से पहले इसे निकालना मुस्तहब है। और ईद की नमाज़ के बाद तक उसे विलंबित करना जायज़ नहीं है, यदि ईद की नमाज़ तक इसे नहीं निकाला, तो क़ज़ा के तौर पर निकालना होगा और निर्धारित समय पर न निकालने का गुनाह भी होगा।
ईद से एक या दो दिन पहले इसे अदा करना जायज़ है।
ज़कात अल-फ़ित्र क्या और कितना निकाला जाए :
क्षेत्र के लोगों के सामान्य खाने की वस्तुओं, जैसे : चावल, गेहूँ तथा खजूर आदि का एक साअ (एक प्रकार का माप) निकालना है। साअ की मात्रा: लगभग तीन किलोग्राम। और क़ीमत के रूप में नक़द देना जायज़ नहीं है, क्योंकि यह रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश के विपरीत है।
ज़कात निकालना और उसके ख़र्च करने की जगहें :
इसके निकालने का समय :
ज़कात का निकालना फ़ौरन वाजिब है जब उसका समय आ जाए। इसमें विलंब करना केवल आवश्यकता के समय ही जायज़ है। मसलन यह कि धन किसी दूर देश में हो और कोई प्रतिनिधि न मिल सके।
निकालने का स्थान :
बेहतर है कि ज़कात उसी क्षेत्र और देश में निकाली जाए जहाँ धन मौजूद है, और इसे उस क्षेत्र और देश से जहाँ धन है दूसरे क्षेत्र और देश में ले जाना जायज़ है निम्नलिखित परिस्थितियों में:
क- यदि उस देश और क्षेत्र में ज़कात का कोई हक़दार मौजूद न हो।
ख- यदि किसी अन्य देश में कोई जरूरतमंद रिश्तेदार मौजूद हो।
ग- यदि कोई शरई (धार्मिक) हित उसे स्थानांतरित करने की मांग करता हो, जैसे: उसे उन मुस्लिम क्षेत्रों में स्थानांतरित करना जो अकाल और बाढ़ से प्रभावित हैं।
नाबालिग और पागल के माल में ज़कात वाजिब होती है, क्योंकि ज़कात के प्रमाण आम हैं। उनके माल में से ज़कात निकालने की ज़िम्मेदारी उनके वली की होती है। ज़कात निकालना निय्यत के बिना जायज़ नहीं है। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
»إِنَّمَا الْأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ.«
"सभी कार्यों का दारोमदार निय्यतों पर है।"(47)
ज़कात के हकदार :
ज़कात प्राप्त करने के हकदार आठ प्रकार के लोग हैं:
पहली किस्म: निर्धन:
ये ऐसे लोग हैं जिनका आवास, भोजन और वस्त्र की बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं, ज़कात से इनको इतनी मात्रा दी जाएगी जो उनके और उनके आश्रितों के लिए एक साल के लिए पर्याप्त हो।
द्वितीय प्रकार: मिस्कीन:
ये ऐसे लोग हैं जिनके पास पर्याप्तता का अधिकांश भाग होता है, लेकिन पूरा नहीं होता है, जैसे: जिनके पास वेतन है, परन्तु वह पूरे वर्ष के लिए पर्याप्त नहीं होता।
ज़कात से इनको इतनी मात्रा दी जाएगी जो उनकी और उनके आश्रितों की साल भर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो।
तीसरा प्रकार: ज़कात की वसूली और वित्रण का काम करने वाले:
यानी ऐसे लोग जिन्हें शासक ज़कात इकट्ठा करने का कार्य सौंपता है या जो ज़कात की सुरक्षा या उसे ज़रूरतमंदों तक पहुँचाने का कार्य करते हैं।
ज़कात में से उन्हें जो दिया जाता है, वह उनके कार्य का पारिश्रमिक होता है, बशर्ते कि उन्हें राज्य से कोई वेतन या तनख्वाह न मिल रही हो।
चौथा प्रकार : ऐसे लोग जिनके दिलों को जोड़ना उद्देश्य हो :
इनसे मुराद ऐसे सभी लोग हैं, जिन्हें कुछ देने के बाद आशा हो कि मुसलमान हो जाएँगे, या उनका ईमान मज़बूत होगा या मुसलमानों को नुक़सान नहीं पहुँचाएँगे।
इन्हें ज़कात का धन इतना दिया जाएगा कि उनके दिलों को जोड़ा जा सके।
पाँचवाँ प्रकार : गर्दनें मुक्त कराने में:
इसका उद्देश्य दासों और मुकातब को आज़ाद कराना है।
मुकातब: वह दास होता है जिसने अपने मालिक से खुद को ख़रीद लिया हो, इसमें युद्ध में बंदी बनाए गए मुसलमानों को छुड़ाना भी शामिल है।
छठा प्रकार: कर्ज़दार, और वे दो प्रकार के होते हैं:
प्रथम: जिसपर अपनी आवश्यकता के लिए कर्ज़ है और उसके पास चुकाने के लिए साधन नहीं है, ऐसे व्यक्ति को ज़कात का धन इतना दिया जाएगा कि उसका क़र्ज़ अदा हो जाए।
द्वितीय : जिसने झगड़े ख़त्म करवाने के लिए क़र्ज़ लिया हो। ऐसे व्यक्ति को ज़कात का धन इतना दिया जाएगा कि क़र्ज़ अदा हो जाए, चाहे वह धनवान ही क्यों न हो।
सातवाँ प्रकार : अल्लाह के रास्ते में :
और यह वे लोग हैं जो अल्लाह की राह में जिहाद करते हैं।
ज़कात से उन्हें इतना माल दिया जाएगा जो अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए पर्याप्त हो; जैसे सवारी, शस्त्र, भोजन और अन्य आवश्यकताएँ।
आठवाँ प्रकार : यात्री :
यह ऐसा मुसाफ़िर है, जिसका यात्रा के दौरान खर्च समाप्त हो गया हो या उससे चोरी हो गया हो, और उसके पास अपने क्षेत्र या नगर तक पहुँचने का साधन न बचा हो।
इस तरह के व्यक्ति को ज़कात का धन इतना दिया जाएगा कि अपनी बस्ती तक पहुँच जाए, चाहे वह अपने शहर में मालदार ही क्यों न हो।
चौथा विषय : रोज़ा :
रोज़े की परिभाषा :
रोज़ा अल्लाह तआला की इबादत के लिए फ़ज्र के प्रकट होने से सूर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से रुके रहने का नाम है।
यह इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है, अल्लाह तआला के फ़राइज़ में से एक फ़र्ज़ है, इस्लाम धर्म के अन्दर इसकी अनिवार्यता आवश्यक रूप से ज्ञात है। इसकी अनिवार्यता पर किताब (क़ुरआन), सुन्नत और मुसलमानों की सर्वसम्मति में प्रमाण मौजूद हैं।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿شَهۡرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِيٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلۡقُرۡءَانُ هُدٗى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٖ مِّنَ ٱلۡهُدَىٰ وَٱلۡفُرۡقَانِۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهۡرَ فَلۡيَصُمۡهُ...﴾
"रमज़ान का महीना वह है, जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो लोगों के लिए मार्गदर्शन है। तथा मार्गदर्शन और सत्य एवं असत्य के बीच अंतर करने के स्पष्ट प्रमाण हैं। अतः तुममें से जो व्यक्ति इस महीने में उपस्थित हो, तो वह इसका रोज़ा रखे...।" [सूरा अल-बक़रा : 185]।
रमज़ान के रोज़े के वाजिब होने की शर्तें:
1- मुसलमान होना, क्योंकि काफ़िर का रोज़ा रखना सही नहीं है।
2- बालिग होना, इसलिए कि छोटे बच्चे पर यह फ़र्ज़ नहीं। परंतु छोटे समझदार बच्चे का रोज़ा सही होता है, और उसके लिए यह नफ़्ल होता है।
3- अक़्ल का होना, पागल पर रोज़ा फ़र्ज़ नहीं होता और उसकी निय्यत के अभाव के कारण सही नहीं होता।
4- रोज़ा रखने की शक्ति रखना। अतः रोगी पर, जो इसे करने में असमर्थ है, यह अनिवार्य नहीं है। और न ही यात्री पर, और बीमार और मुसाफिर इसे उस समय पूरा करेंगे जब उनकी मजबूरी समाप्त हो जाएगी, अर्थात: बीमारी और सफर। महिला के लिए इसके सही होने की शर्त यह है कि हैज़ और निफ़ास का रक्त उसे न आ रहा हो।
रमज़ान महीने का दाख़िल होना दो चीज़ों में से किसी एक से साबित होता है :
क- रमज़ान के महीना का चाँद देखना, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारण:
»صُومُوا لِرُؤْيَتِهِ، وَأفْطِرُوا لِرُؤْيَتِهِ.«
"चाँद देख कर रोज़ा रखो और चाँद देख कर रोज़ा रखना छोड़ो।"(48)
ख- शाबान महीने के तीस दिन पूरे कर लेना। ऐसा तब करना होता है जब रमज़ान का चाँद न देखा जा सके या उसके देखने में बादल, धूल या इसी तरह की कोई और चीज़ रुकावट बन जाए। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
»فَإِنْ غُمَّ عَلَيْكُمْ؛ فَأَكْمِلُوا عِدَّةَ شَعْبَانَ ثَلاثِينَ يَوْمًا.«
"अगर बादल आदि के कारण चाँद नज़र न आए, तो शाबान के तीस दिन पूरे कर लो।"(49)
रोज़े में निय्यत :
रोज़ा, अन्य इबादतों की तरह, निय्यत के बिना सही नहीं होता। फ़र्ज़ रोज़े की निय्यत का समय अन्य रोज़ों से भिन्न होता है, और इसका वर्णन इस प्रकार है:
प्रथमः फ़र्ज़ रोज़ा; जैसे कि रमज़ान का रोज़ा, क़ज़ा या नज़्र का रोज़ा, इसके लिए रात में ही फज्र से पहले निय्यत करना ज़रूरी है। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारण:
»مَن لَمْ يُبَيِّتْ الصِّيَامَ مِنَ اللَّيْلِ فَلَا صِيَامَ لَهُ.«
"जिसने रात में रोज़े की निय्यत नहीं की, उसका रोज़ा नहीं।"(50).
दूसरा: नफ़्ल रोज़ा (स्वैच्छिक उपवास), जिसकी निय्यत व्यक्ति दिन के दौरान भी कर सकता है। शर्त यह है कि फ़ज्र के बाद रोज़ा तोड़ने वाला कोई काम न किया हो।
रोज़े को नष्ट कर देने वाली वस्तुएँ :
1- संभोग: जब भी किसी ने संभोग किया, उसका रोज़ा टूट जाएगा और जिस दिन उसने संभोग किया, उस दिन की क़ज़ा (बाद में पूरा करना) उसपर वाजिब होगी। उसे क़ज़ा के साथ-साथ कफ़्फ़ारा भी देना होगा, जो कि एक दास को मुक्त करना है। यदि वह दास नहीं पा सके, तो उसे लगातार दो महीने रोज़ा रखना होगा। फिर यदि वह किसी शरई कारण से इसमें सक्षम न हो, तो उसे साठ निर्धनों को भोजन कराना होगा, प्रत्येक निर्धन को आधा साअ् उस भोजन का देना होगा जो उस क्षेत्र में खाया जाता हो।
2- वीर्य का स्खलन: चुम्बन, स्पर्श, हस्तमैथुन, या बार-बार देखने के कारण हो, तो उसपर केवल क़ज़ा है, बिना कफ्फ़ारा (प्रायश्चित) के; क्योंकि कफ्फ़ारा केवल संभोग के लिए विशिष्ट है। जहाँ तक सोने वाले का सवाल है, यदि वह स्वप्नदोष का अनुभव करे और वीर्य स्खलन हो जाए, तो उसपर कुछ नहीं है; क्योंकि यह उसके नियंत्रण के बाहर है, इसलिए वह जनाबत (अपवित्रता) का स्नान करेगा।
तीसरा: जान बूझकर खा पी लेना। इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿وَكُلُواْ وَٱشۡرَبُواْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكُمُ ٱلۡخَيۡطُ ٱلۡأَبۡيَضُ مِنَ ٱلۡخَيۡطِ ٱلۡأَسۡوَدِ مِنَ ٱلۡفَجۡرِۖ ثُمَّ أَتِمُّواْ ٱلصِّيَامَ إِلَى ٱلَّيۡلِ...﴾
"तथा खाओ और पियो, यहाँ तक कि तुम्हारे लिए भोर की सफेद धारी रात की काली धारी से स्पष्ट हो जाए, फिर रोज़े को रात (सूर्य डूबने) तक पूरा करो...।" [सूरा अल-बक़रा : 187]।
जो भूलवश खा ले या पी ले, उस पर कोई गुनाह नहीं है; इसका प्रमाण अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की यह हदीस है:
»مَنْ نَسِيَ وَهُوَ صَائِمٌ، فَأَكَلَ أَوْ شَرِبَ، فَلْيُتِمَّ صَوْمَهُ، فَإِنَّمَا أَطْعَمَهُ اللَّهُ وَسَقَاهُ.«
"जो रोज़े से हो और भूलवश खा ले अथवा पी ले, वह अपना रोज़ा पूरा करे; क्योंकि उसे अल्लाह ने खिलाया और पिलाया है।"(51)
चौथा: जान बूझकर उल्टी करना, लेकिन जिसे बिना इच्छा के उल्टी आ जाए, तो उसका रोज़ा प्रभावित नहीं होता। क्योंकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है:
»مَنْ ذَرَعَهُ الْقَيءُ فَلَيْسَ عَلَيْهِ قَضَاءٌ، وَمَن اسْتَقَاءَ عَمْدًا فَلْيَقْضِ.«
"जिसे (अपने आप) उल्टी आ जाए, उसपर कोई क़ज़ा नहीं है, और जो जानबूझकर उल्टी करे, वह क़ज़ा करे।"(52)
पाँचवाँ : शरीर से खून निकालना; खून चाहे पछना के माध्यम से निकाला जाए या रग काटकर या किसी बीमार की मदद के लिए खून दान करने के लिए। इन सब चीज़ों से रोज़ा टूट जाता है। जहां तक थोड़े से ख़ून को निकालने की बात है जो जाँच के लिए लिया जाता है, तो इसका रोज़े पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसी तरह, बिना इच्छा के ख़ून का निकलना; जैसे नकसीर, चोट या दांत का उखड़ना; इससे रोज़े पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
रमज़ान में किन्हें रोज़ा छोड़ने की अनुमति है :
प्रथम प्रकार के लोग: जिनके लिए रोज़ा छोड़ना जायज़ है, और उनपर क़ज़ा अनिवार्य है, वे हैं:
1- ऐसा मरीज़ जिसके स्वास्थ्य लाभ की उम्मीद हो और जिसे रोज़ा रखने से नुकसान हो या जिसके लिए रोज़ा रखना कठिन हो।
2- यात्री ; चाहे सफ़र में कष्ट हो या न हो।
इन दोनों प्रकार के लोगों के लिए रोज़ा के अनिवार्य न होने का प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :
﴿...وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوۡ عَلَىٰ سَفَرٖ فَعِدَّةٞ مِّنۡ أَيَّامٍ أُخَرَ...﴾
"...फिर यदि तुममें से कोई रोगी अथवा यात्रा पर हो, तो ये गिनती, दूसरे दिनों में पूरी करे...।" [सूरा अल-बक़रा : 185]।
3- गर्भवती स्त्री या दूध पिलाने वाली स्त्री, यदि रोज़ा रखना उनके लिए कठिन हो, या उनके या उनके बच्चे के लिए हानिकारक हो, तो वे बीमार के हुक्म में आती हैं, और उनके लिए रोज़ा छोड़ने की अनुमति है। लेकिन उनपर वाजिब है कि वे रोज़े को किसी और समय में पूरा करें।
4- हायज़ा (माहवारी) और निफ़ास (प्रसव) वाली औरतें, उनपर रोज़ा छोड़ना वाजिब है। इन दोनों का रोज़ा सही नहीं होगा, और इनपर यह वाजिब है कि वे इसे दूसरे दिनों में पूरा करें।
द्वितीय प्रकार: जिन्हें रोज़ा तोड़ने की अनुमति है, और उनपर कफ़्फ़ारा वाजिब है लेकिन क़ज़ा नहीं, वे निम्नलिखित हैं:
1- ऐसा मरीज़ जिसके ठीक होने की उम्मीद नहीं है।
2- बड़ी आयु का व्यक्ति जो रोज़ा रखने में असमर्थ हो।
तो ये लोग रोज़ा नहीं रखेंगे ,और रमज़ान के महीने के हर दिन के बदले में एक निर्धन को भोजन कराएंगे, और जब कोई वृद्ध व्यक्ति विक्षिप्तता की अवस्था में पहुँच जाए, तो उसपर कोई धार्मिक कर्तव्य नहीं रह जाता है; वह रोज़ा नहीं रहेगा और उसपर कोई कफ़्फ़ारा भी वाजिब नहीं होगा।
क़ज़ा का समय और क़ज़ा करने में देर करने का हुक्म :
रमज़ान के रोज़े को उसके बाद वाले रमज़ान से पहले पूरा करना वाजिब है। और रोजों की क़ज़ा में जल्दी करना अफ़ज़ल है । कज़ा रोज़ा को अगले रमज़ान के बाद तक टालना जायज़ नहीं है। आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का वर्णन है, वह कहती हैं :
»كَانَ يَكُونُ عَلَيَّ الصَّوْمُ مِنْ رَمَضَانَ، فَمَا أَسْتَطِيعُ أَنْ أَقْضِيَ إِلَّا فِي شَعْبَانَ لِمَكَانِ رَسُولِ اللهِ ﷺ.«
"मुझ पर रमज़ान के रोज़े बाक़ी होते थे, मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की स्थिति के कारण शाबान के अलावा किसी भी महीने में इसकी भरपाई नहीं कर पाती थी।"(53)
जो व्यक्ति अगले रमज़ान के बाद रोज़ा क़ज़ा करता है, उसकी दो स्थितियाँ होती हैं :
1- किसी शरई कारण से देर करना, जैसे: बीमारी अगले रमज़ान तक जारी रहे, तो ऐसे व्यक्ति पर केवल क़ज़ा वाजिब है।
2- बिना किसी शरई कारण के क़ज़ा में देरी करे, तो इस तरह से टालमटोल करना गुनाह है। और उसपर यह अनिवार्य है कि तौबा करे तथा रोज़े की क़ज़ा करे, और हर दिन के बदले एक मिस्कीन को खाना खिलाए।
ऐसे व्यक्ति का नफ़्ल रोज़ा रखना, जिसके ज़िम्मे क़ज़ा रोज़े हों :
जिस व्यक्ति पर रमज़ान के कुछ रोज़ों की क़ज़ा है, तो उसके लिए बेहतर यह है कि वह नफ़्ल रोज़े रखने से पहले उन क़ज़ा रोज़ों को पूरा कर ले। लेकिन यदि नफ़्ल रोज़े का समय निकल रहा हो -जैसे कि अरफ़ा और आशूरा का रोज़ा- तो उसे क़ज़ा से पहले रख ले, क्योंकि क़ज़ा का समय विस्तृत है, जबकि आशूरा और अरफ़ा का समय निकल जाता है। लेकिन शव्वाल के छह रोज़े तभी रखे जब क़ज़ा रोज़े पूरे कर लिए हों।
जिन दिनों के रोज़े हराम हैं :
1- ईद अल-फ़ित्र और ईद अल-अज़्हा के दिन रोज़ा रखना; क्योंकि इसकी मनाही है।
2- ज़ुल-हिज्जा महीने के तशरीक़ के दिनों में रोज़ा रखना, अलबत्ता हज्ज-ए-तमत्तुअ और हज्ज-ए-क़िरान कर रहा व्यक्ति, यदि उसके पास क़ुर्बानी का जानवर न हो, तो इन दिनों में रोज़ा रख सकता है। तशरीक़ के दिन ज़ुल-हिज्जा महीने के ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें दिन होते हैं।
3- संदेह की वजह से संदेह वाला दिन, जो शाबान का तीसवां दिन होता है, अगर उसकी रात बादल या धूल से ढकी हो, जो चाँद देखने में बाधा उत्पन्न करे।
किन-किन दिनों का रोज़ा मकरूह है :
क- विशेष रूप से रजब महीने में रोज़ा रखना, क्योंकि इससे मना किया गया है।
ख- विशेष रूप से जुमे के दिन रोज़ा रखना, क्योंकि इससे मना किया गया है। यदि उससे पहले या बाद में एक दिन का रोज़ा रख लिया जाए, तो मकरूह नहीं रहेगा।
किन दिनों का रोज़ा सुन्नत है?
क- शव्वाल महीने के छह दिनों के रोज़े।
ख- ज़ुल-हिज्जा के नौ दिनों का रोज़ा रखना, जिसमें अरफ़ा का दिन सबसे महत्वपूर्ण है। अलबत्ता हाजी इससे अलग हैं। उनके लिए इस दिन का रोज़ा रखना सुन्नत नहीं है। इस रोज़े से दो साल के गुनाह मिट जाते हैं।
ग- हर महीने तीन दिन रोज़ा रखना। बेहतर यह है कि यह अय्याम-ए-बीज़ के दिन हों। यानी चाँद की तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़।
घ- हर हफ़्ते के सोमवार और बृहस्पतिवार के रोज़े, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इन दिनों का रोज़ा रखते थे; क्योंकि इन दिनों में बंदों के आमाल पेश किए जाते हैं।
नफ़्ल रोज़ा :
क- दावूद अलैहिस्सलाम के रोज़े, जो एक दिन रोज़ा रखते थे और एक दिन बिना रोज़े के रहते थे।
ख- मुहर्म महीने के रोज़े। यह सबसे उत्कृष्ट महीना है, जिसका रोज़ा मुस्तहब है। इस महीने का भी सबसे महत्वपूर्ण रोज़ा आशूरा का रोज़ा है। आशूरा मुहर्रम महीने का दसवाँ दिन है। इस दिन के साथ नौवें दिन का भी रोज़ा रखा जाएगा। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
»لَئِنْ بَقِيتُ إِلَى قَابِلٍ لَأَصُومَنَّ التَّاسِعَ.«
"अगर मैं अगले साल तक जीवित रहा, तो मैं नौवें दिन भी रोज़ा रखूँगा।"(54)
यह रोज़ा एक साल पहले के गुनाह को मिटा देता है।
पाँचवाँ विषय : हज्ज तथा उमरा
हज्ज का शाब्दिक अर्थ है : इरादा करना। जबकि शरई अर्थ है, विशेष समय में मक्का में स्थित अल्लाह के पवित्र घर और पवित्र स्थलों का इरादा करना, ताकि कुछ विशेष धार्मिक कार्यों को अंजाम दिया जा सके।
उमरा का शाब्दिक अर्थ है: ज़ियारत।
उमरा का शरई अर्थ है : किसी भी समय कुछ खास इबादतों के लिए अल्लाह के पवित्र घर काबा की यात्रा करना।
हज्ज इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ और इसकी महान बुनियादों में से एक है। हज्ज हिजरत के नौवें वर्ष फ़र्ज़ हुआ था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने केवल एक हज्ज किया; और वह था (हज्जतुल वदा)।
हज्ज सामर्थ्य रखने वाले व्यक्ति पर जीवन में एक बार फ़र्ज़ है। कोई एक से अधिक बार हज्ज करे, तो नफ़्ली हज्ज होगा। जहाँ तक उमरा का सवाल है, तो यह बहुत से उलमा के कथनानुसार वाजिब है, इस प्रमाण की वजह से कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया: क्या औरतों पर जिहाद है? तो आपने फ़रमाया:
»نَعَمْ، عَلَيْهِنَّ جِهَادٌ لَا قِتَالَ فِيهِ: الْحَجُّ وَالْعُمْرَةُ.«
"हाँ, उनके लिए एक ऐसा जिहाद है, जिसमें कोई लड़ाई नहीं है : हज्ज और उमरा।"(55)
हज्ज और उमरा के वाजिब होने की शर्तें:
1- इस्लाम
2- अक़्ल का होना
3- वयस्क होना
4- आज़ाद होना
5- सामर्थ्य रखना
औरत के लिए एक छठी शर्त यह है कि उसके साथ सफ़र करने के लिए एक महरम का होना ज़रूरी है। क्योंकि उसके लिए हज्ज या किसी अन्य यात्रा के लिए बिना महरम के यात्रा करना जायज़ नहीं है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के कारण:
»لَا تُسَافِرُ الْمَرْأَةُ إِلَّا مَعَ ذِي مَحْرَمٍ، وَلَا يَدْخُلُ عَلَيْهَا رَجُلٌ إِلَّا وَمَعَهَا مَحْرَمٌ.«
"कोई स्त्री महरम के बिना यात्रा न करे, और कोई पुरुष उसके पास न जाए जब तक उसके साथ कोई महरम न हो।"(56)
महरम से मुराद महिला का पति या ऐसा व्यक्ति है, जिसके साथ उसकी शादी हमेशा के लिए हराम हो। यह नसब के रिश्ते से होता है; जैसे स्त्री का भाई, पिता, चचा, भतीजा और मामा, या किसी वैध कारण से; जैसे दूध शरीक भाई (सह-दुग्ध भ्राता), या ससुराली संबंध कारण से; जैसे स्त्री की माँ का पति और उसके पति का बेटा।
सामर्थ्य : यहाँ सामर्थ्य से मुराद भौतिक सामर्थ्य भी है और शारीरिक सामर्थ्य भी। यानी सवारी कर सके, सफ़र की कठिनाइयों को झेल सके और इतना धन मौजूद हो कि जाने-आने की व्यवस्था हो जाए। और वह अपने बच्चों और जिनकी देखभाल का ज़िम्मा उसपर है, उनके लिए, लौट आने तक, पर्याप्त साधन रखता हो।
और हज्ज का मार्ग उसकी जान और माल के लिए सुरक्षित हो।
और जो व्यक्ति अपने माल से सक्षम है लेकिन अपने शरीर से नहीं, जैसे कि वह वृद्ध हो या किसी ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो जिसका ठीक होना संभव नहीं है; तो उसपर यह अनिवार्य है कि वह किसी को नियुक्त करे जो उसकी ओर से हज्ज और उमरा करे।
हज्ज और उमरा में प्रतिनिधित्व की स्वीकृति के लिए दो शर्तें हैं:
1- हज्ज की फ़र्ज़ अदायगी के योग्य होना चाहिए, अर्थात ऐसा व्यक्ति वयस्क, समझ रखने वाला और मुसलमान होना चाहिए।
2-स्वयं की ओर से हज्ज-ए-इस्लाम कर चुका हो।
एहराम के मीक़ात :
मवाक़ीत: मीक़ात का बहुवचन है, और इसका शाब्दिक अर्थ है : सीमा। जबकि शरई अर्थ है:
इबादत का स्थान या उसका समय।
हज्ज के लिए मीक़ात समय और स्थान से संबंधित होते हैं :
क- समय-सीमा: अल्लाह ने अपने इस कथन में इसका उल्लेख किया है:
﴿ٱلۡحَجُّ أَشۡهُرٞ مَّعۡلُومَٰتٞۚ فَمَن فَرَضَ فِيهِنَّ ٱلۡحَجَّ...﴾
"हज्ज के महीने ज्ञात हैं। अतः जो इन महीनों में हज्ज का निश्चय कर ले...।" [सूरा अल-बक़रा : 197]।
ये महीने हैं: शव्वाल, ज़ुल-क़ादा, और ज़ुल-ह़िज्जा के दस दिन।
ख- एहराम बाँधने के स्थान : ये वो स्थान हैं, जिन्हें मक्का की ओर जा रहे हाजी के लिए एहराम बाँधे बिना पार करना जायज़ नहीं है। वह इस प्रकार हैं :
1- ज़ुल-हुलैफ़ा: मदीना के निवासियों का मीक़ात।
2- जुहफ़ा: यह शाम, मिस्र और पश्चिमी देशों के निवासियों का मीक़ात है।
3- क़र्न अल-मनाज़िल: जिसे अब 'अस-सैल' के नाम से जाना जाता है; यह नज्द के निवासियों का मीक़ात है।
4- ज़ात-ए-इर्क़: इराक के निवासियों का मीक़ात।
5- यलमलम: यमन के निवासियों का मीक़ात।
जिसका घर इन मीक़ातों के अंदर हो, वह अपने घर से ही हज्ज और उमरा का एहराम बाँधे। जो मक्का का निवासी हो, वह मक्का से ही एहराम बाँधे। उसे एहराम बाँधने के लिए मीक़ात जाने की ज़रूरत नहीं है। रही बात उमरा की; तो उसके लिए सबसे निकट स्थिति हलाल स्थान की ओर जाकर वहाँ से एहराम बाँधेगा। जो हज्ज या उमरा का इरादा रखता हो, उसके लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम द्वारा निर्धारित स्थानों से एहराम बाँधना ज़रूरी है, जिनका ज़िक्र पीछे गुज़र चुका है। जो व्यक्ति हज्ज या उमरा करना चाहता है, उसके लिए बिना इहराम बाँधे मीक़ात से गुजरना जायज़ नहीं है।
- इन मीक़ातों से गुज़रने वाले ऐसे लोग जो इनके निवासी न हों, वो इन्हीं स्थानों से एहराम बाँधेंगे।
- जो मक्का की ओर जा रहा हो और उसका मार्ग किसी भी मीक़ात से होकर न गुजरता हो, चाहे वह भूमि मार्ग हो, समुद्री मार्ग हो या वायुमार्ग; तो वह उस मीक़ात के समक्ष पहुँचने पर एहराम बाँध ले, जो उसके सबसे निकट हो। उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु का कथन है : ''अपने रास्ते में उनके सामने स्थित स्थानों को देखो।''(57)
- जिस व्यक्ति की हज्ज या उमरा यात्रा हवाई जहाज़ से हो, उसे उस समय एहराम बाँधना चाहिए, जब हवाई जहाज़ उसके मार्ग में आने वाले मीक़ात के समक्ष से गुज़रे। उसके लिए यह जायज़ नहीं है कि वह इहराम बाँधने को हवाई अड्डे पर विमान के उतरने तक टाले।
एहराम :
एहराम दरअसल हज्ज या उमरा के कार्यों में प्रवेश करने की निय्यत करना है। हज्ज में: एहराम का अर्थ हज्ज में प्रवेश करने की निय्यत करना है। उमरा में: एहराम का अर्थ उमरा में प्रवेश करने की निय्यत करना है। हज्ज या उमरा में दाख़िल होने की निय्यत किए बिना आदमी मोहरिम नहीं हो सकता। और केवल इहराम के वस्त्र पहन लेना बिना निय्यत के इहराम नहीं होता।
एहराम के मुस्तहब कार्य :
1- एहराम से पहले पूरे शरीर का स्नान करना।
2- पुरुष का अपने शरीर पर खुशबु लगाना, न कि इहराम के कपड़ों पर।
3- इहराम बाँधना सफेद इज़ार (तहबंद) और रिदा (चादर) में, तथा जूते पहनना।
4- अगर सवार हो तो क़िब्ला की ओर मुँह करके इहराम बाँधना।
हज्ज के प्रकार :
मुहरिम को हज्ज के तीन प्रकार में से किसी एक को चुनने की अनुमति है। हज्ज के तीन प्रकार इस तरह हैं :
1- तमत्तुअः यह है कि हज्ज के महीनों में उमरा के लिए एहराम बाँधे, उसे पूरा करे, फिर उसी साल हज्ज के लिए एहराम बाँधे।
2- इफराद; अर्थात् केवल हज्ज का इहराम बाँधना मीक़ात से, और अपने इहराम में बने रहना जब तक हज्ज के कार्य पूरे न कर ले।
3- क़िरान; यह है कि हज्ज और उमरा दोनों का एहराम बाँधे, या उमरा का एहराम बाँधे, फिर तवाफ़ शुरू करने से पहले हज्ज को उसमें शामिल कर ले, तो मीक़ात से उमरा और हज्ज दोनों की निय्यत करे, या उमरा के तवाफ़ की शुरुआत से पहले, और दोनों के लिए तवाफ़ और सई करे।
तमत्तुअ और क़िरान करने वालों पर फ़िदया अनिवार्य है, यदि वे मस्जिद-ए-हराम में उपस्थित लोगों में से न हों।
हज्ज के इन तीनों तरीकों में से सबसे उत्तम तरीक़ा तमत्तुअ है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों को इसका आदेश दिया था(58)। फिर क़िरान है, क्योंकि इसमें हज्ज और उमरा दोनों हो जाते हैं और इसके बाद इफ़राद है।
ग- जब इनमें से किसी प्रकार के हज्ज लिए एहराम बाँध ले, तो एहराम के फ़ौरन बाद तल्बिया कहे, जोकि निम्न वाक्य हैं :
»لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ.«
"मैं उपस्थित हूँ, ऐ अल्लाह! मैं उपस्थित हूँ। मैं उपस्थित हूँ, तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ। निस्संदेह सारी प्रशंसा, सारी नेमतें और सारा राज्य तेरा है। तेरा कोई साझी नहीं है।"(59)
तल्बिया सुन्नत है और इसे अधिक से अधिक कहना मुस्तहब है। पुरुष इसे ऊँची आवाज़ में कहेंगे और महिलाएँ धीमी आवाज़ में।
तल्बिया का समय : इसका आरंभ एहराम के बाद होता है और इसका अंतिम समय इस प्रकार है :
1- उमरा करने वाला तवाफ़ शुरू करने से पहले इसे समाप्त कर दे।
2- हाजी इसे ईद के दिन जमरह अक़बा को कंकड़ियां मारने की शुरुआत करते समय समाप्त करेगा।
एहराम की अवस्था में वर्जित कार्य :
पहला निषिद्ध कार्य: शरीर के किसी भी हिस्से से बालों को मुँडवाना, काटना या उखाड़ना।
दूसरा निषिद्ध कार्य: बिना किसी कारण के हाथ या पैर के नाखूनों को काटना या छाँटना। लेकिन यदि नाखून टूट जाए और उसे हटा दे, तो उस पर कोई जुर्माना नहीं है।
तीसरा निषिद्ध कार्य: पुरुष के सिर को किसी सटे हुए वस्त्र से ढकना, जैसे: टोपी और ग़ुत्रा (शिमाग़)।
चौथा निषिद्ध कार्य: पुरुष का अपने शरीर पर या उसके कुछ हिस्सों पर सिला हुआ कपड़ा पहनना; जैसे कमीज़, पगड़ी या पायजामा। सिले हुए कपड़ों से मुराद ऐसे कपड़े हैं, जो अंग के आकार के अनुसार तैयार किए जाते हैं, जैसे जूते, दस्ताने और मोज़े आदि। जहाँ तक महिला का सवाल है, तो वह एहराम की स्थिति में अपनी आवश्यकता के अनुसार कोई भी कपड़े पहन सकती है, सिवाय बुरक़ा के। और जब अजनबी पुरुष गुज़रें, तो अपने चेहरे को दुपट्टा या चादर से ढाँप लेगी। और अपनी हथेलियों पर दस्ताने न पहने।
पाँचवां निषिद्ध कार्य: खुशबू लगाना; क्योंकि मुहरिम (एहराम बाँधने वाले व्यक्ति) से अपेक्षा की जाती है कि वह विलासिता तथा सांसारिक श्रृंगार तथा सुखों से दूर रहे और आख़िरत की ओर ध्यान दे।
छठा निषिद्ध कार्य: जंगली शिकार को मारना और उसका शिकार करना। एहराम बाँधे हुआ व्यक्ति जंगली शिकार नहीं करेगा, न ही उसके शिकार में सहायता करेगा, और न ही उसे ज़ब्ह करेगा।
एहराम बाँधे व्यक्ति के लिए उस शिकार का मांस खाना हराम है, जिसे उसने खुद शिकार किया हो, या उसके लिए शिकार किया गया हो, या उसने शिकार करने में मदद की हो; क्योंकि यह उसके लिए मुर्दार के समान है।
जहाँ तक समुद्री शिकार का संबंध है, तो एहराम बाँधे व्यक्ति के लिए उसका शिकार करना हराम नहीं है। और न ही उसके लिए पालतू जानवर जैसे मुर्गी और चौपायों को ज़ब्ह करना हराम है, क्योंकि यह शिकार नहीं है।
सातवाँ निषिद्ध कार्य : निकाह का अनुबंध : स्वयं के लिए या किसी और के लिए निकाह का अनुबंध करना, या उसका गवाह बनना।
आठवां निषिद्ध कार्य: संभोग; जो व्यक्ति प्रथम हलाल को प्राप्त कर लेने से पहले संभोग कर लेता है, उसका नुसुक (हज्ज का अनुष्ठान) फासिद हो जाता है, परंतु उसपर हज्ज के शेष अनुष्ठानों को पूरा करना अनिवार्य है, और अगले वर्ष हज्ज की क़ज़ा करना भी अनिवार्य है, और उसपर एक ऊँट की क़ुर्बानी करना भी वाजिब है। और यदि यह प्रथम हलाल को प्राप्त कर लेने के बाद हो, तो उसका हज्ज ख़राब नहीं होगा, लेकिन उस पर दम वाजिब होगा।
इस मामले में, महिला पुरुष के समान होती है यदि वह सहमत हो।
नौवां निषिद्ध कार्य : पुरुष का स्त्री के शरीर से अपना शरीर वासना के साथ मिलाना। ऐसा करना जायज़ नहीं है। क्योंकि यह संभोग की ओर ले जाता है, जो कि एहराम की अवस्था में हराम है।
उमरा :
क- उमरा के स्तंभ :
1- इहराम।
2- तवाफ़।
3- सई।
ख: उमरा के वाजिब कार्य
1- मान्य मीक़ात से एहराम बाँधना।
2- बाल मुंडवाना या छोटे करवाना।
ग- उमरा का तरीक़ा:
सबसे पहले उमरा करने वाला सात चक्कर लगाए, जिसकी शुरुआत हजर-ए-असवद से हो और उसी पर समाप्त हो। अपने तवाफ़ के दौरान, वह पाक रहे, अपनी नाभि से लेकर घुटनों तक के ढ़ाँपने योग्य भागों को ढाँपकर रखे। उसके लिए पूरे तवाफ़ में ओढ़े हुए चादर के मध्य भाग को दाएँ कंधे के नीचे से निकालकर उसके दोनों किनारों को बाएँ कंधे पर डाले रखना सुन्नत है। और जब सातवां चक्कर पूरा हो जाए; तो इज़्तिबा छोड़ दे, और अपनी चादर से अपने कंधों को ढक ले।
हजर-ए-असवद के सामने खड़ा हो, अगर उसे चूमना संभव हो तो चूमे, अन्यथा दाएँ हाथ से छू ले और अपने हाथ को चूमे। यदि हजर-ए-असवद को छूना संभव न हो, तो दाएँ हाथ को उठाकर उसकी ओर इशारा करे और एक बार "अल्लाहु अकबर" कहे। इस परिस्थिति में न तो अपने हाथ को चूमे और न रुके। फिर अपने तवाफ़ में आगे बढ़े; काबा को अपने बाईं ओर रखते हुए, और यह सुन्नत है कि पहले तीन चक्करों में रम्ल की अवस्था में (यानी तेज़) चले। रम्ल : तेज़ गति से चलने को कहते हैं जिसमें कदमों के बीच की दूरी कम हो।
और जब वह रुक्न-ए-यमानी के पास से गुजरे - जो काबा का चौथा रुक्न है - तो अगर संभव हो तो उसे दाएँ हाथ से छूए, बिना तकबीर कहे और बिना चूमे। अगर छूना संभव न हो, तो आगे बढ़ जाए, न उसकी ओर इशारा करे और न तकबीर कहे। दोनों रुक्नों: रुक्न-ए-यमानी और हजर-ए-असवद के बीच यह दुआ पढ़े :
﴿...رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِي ٱلدُّنۡيَا حَسَنَةٗ وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِ حَسَنَةٗ وَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ﴾
"...हमारे रब, हमें दुनिया में भलाई दे तथा आख़िरत में भी भलाई दे और हमें आग (जहन्नम) के अज़ाब से बचा।" [सूरा अल-बक़रा : 201]।
जब तवाफ़ समाप्त हो जाए, तो हो सके तो मक़ाम-ए-इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- के पीछे दो रक्अत नमाज़ पढ़े। अगर यह संभव न हो, तो मस्जिद-ए-हराम के किसी भी स्थान पर पढ़ ले। पहली रक्अत में सूरा "अल-फ़ातिहा" के बाद सूरा "अल-काफ़िरून" पढ़ना सुन्नत है। दूसरी रक्अत में सूरा अल-फ़ातिहा के बाद सूरा अल-इख़लास पढ़ना। फिर सई करने (तेज़ चलने) के स्थना की ओर बढ़े, और सफ़ा एवं मर्वा पहाड़ी के बीच सात चक्कर लगाए; जाना एक चक्कर है और वापस आना एक चक्कर है।
सई का कार्य सफ़ा से शुरू करे। उस पर चढ़े या उसके पास खड़ा हो। यदि संभव हो तो सफ़ा पर चढ़ना उत्तम है। और इस अवसर पर अल्लाह तआला का यह फ़रमान पढ़े :
﴿إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلۡمَرۡوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِ...﴾
"निश्चय ही सफ़ा एवं मर्वा अल्लाह की निशानियों में से हैं...।" [सूरा अल-बक़रा : 158]।
यहाँ क़िब्ला की ओर मुँह करके खड़े होकर अल्लाह की प्रशंसा एवं बड़ाई बयान करना मुस्तहब है, और यह कहे:
»لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ، لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، يُحْيِي وَيُمِيتُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ، أَنْجَزَ وَعْدَهُ، وَنَصَرَ عَبْدَهُ، وَهَزَمَ الْأَحْزَابَ وَحْدَهُ.«
"अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी के लिए राज्य है, और उसी के लिए सब प्रशंसा है, वही जीवन देता है और मृत्यु देता है, और वह हर चीज़ करने में सक्षम है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, उसने अपना वादा पूरा किया, अपने बंदे की मदद की, और अकेले ही दलों को पराजित किया।"(60)
फिर अपने हाथों को उठाकर जो दुआ करनी हो, करे, और इस ज़िक्र और इस दुआ को तीन बार पढ़े। फिर उतरकर मर्वा की ओर जाए। जब पहले हरे चिह्न तक पहुँचे, तो पुरुष तेज़ चलकर दूसरे चिह्न तक जाए। औरत के लिए दो निशानों के बीच तेज़ चलना उचित नहीं है, क्योंकि वह संपूर्ण छुपाने की वस्तु है। उसके लिए सई के दौरान पूरे समय चलना ही शरीअत सम्मत है। फिर आगे बढ़े और मर्वा पर्वत के ऊपर चढ़े या उसके पास खड़ा हो। संभव हो तो ऊपर चढ़ना ही उत्तम है। फिर मर्वा पर वही कहे और करे, जो सफ़ा पर कहा और किया था, सिवाय आयत पढ़ने के, जो अल्लाह तआला का यह कथन है:
﴿إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلۡمَرۡوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِ...﴾
"निश्चित रूप से सफा और मर्वा अल्लाह के शआइर (प्रतीकों) में से हैं...।" [सूरा अल-बक़रा : 158]।
यह केवल पहले चक्कर में सफ़ा पर चढ़ते समय पढ़ा जाना चाहिए, फिर नीचे उतरे एवं उस स्थान पर चले जहाँ सामान्य रूप से चला जाता है, तथा उस स्थान पर तेज़ी से चले जिस स्थान पर तेज़ चला जाता है, यहाँ तक कि सफ़ा तक पहुँच जाए। ऐसा सात बार करे, जाना एक चक्कर है और वापस आना एक चक्कर है। सई के दौरान जो ज़िक्र और दुआएँ हो सके उनको अधिक से अधिक, पढ़ना मुस्तहब है। और छोटी एवं बड़ी दोनों नापाकियों से पाक होना चाहिए, लेकिन इसके बिना भी सई हो सकती है, इसी प्रकार यदि तवाफ़ के बाद महिला को मासिक धर्म आ जाए या वह निफास (प्रसव) की स्थिति में हो, तो वह सई कर सकती है और यह मान्य होगा, क्योंकि सई में तहारत (पवित्रता) शर्त नहीं है, बल्कि यह मुस्तहब (वांछनीय) है।
जब सातों चक्कर लगाने का कार्य पूरा हो जाए, तो वह अपना सिर मुंडवाए या बाल छोटे करवाए। पुरुष के लिए सिर मुंडवाना ही उत्तम है।
इस प्रकार उसके उमरा के कार्य पूरे हो गए।
हज्ज :
क- हज्ज के स्तंभ :
1- एहराम बाँधना।
2- अरफ़ा में ठहरना।
3- तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा।
4- सई (सफ़ा एवं मर्वा के बीच तेज़ चलना)।
ख- हज्ज के वाजिब कार्य :
1- मीकात से इहराम बांधना।
2- ज़ुल-हिज्जा के नौवें दिन सूर्यास्त तक अरफ़ा में ठहरना, उन लोगों के लिए जो दिन में वहाँ ठहरें।
3- दस ज़िलहिज्जा की रात मुज़्दलिफ़ा में आधी रात तक ठहरना।
4- 'तशरीक़' के दिनों में मिना में रात गुज़ारना।
5- कंकड़ मारना।
6- सर मुंडवाना या सर के बाल छोटे करवाना।
7- तवाफ़-ए-वदा।
ग- हज्ज का तरीक़ा:
जब मुसलमान मीक़ात पर पहुँचे और उसके पास समय कम हो, तो हज्ज-ए-इफ़राद की निय्यत करके तलबिया कहे। फिर जब मक्का पहुँचे तो तवाफ़ एवं सई करे। फिर एहराम ही की हालत में रहे। नौवीं तारीख़ को अरफ़ा के दिन अरफ़ा मैदान जाए, वहाँ सूरज डूबने तक रहे।
फिर तलबिया कहता हुआ मुज़्दलिफ़ा जाए और वहीं रुका रहे। फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने के बाद अल्लाह का ज़िक्र करता रहे, तलबिया कहता रहे और दुआएँ करता रहे। यहाँ तक कि सुबह का उजाला फैल जाए।
जब भोर में पूर्णरूपेण उजाला हो जाए, तो सूरज के निकलने से पहले मिना की ओर रवाना हो जाए और फिर वहाँ जमरा-ए-अक़बा को सात कंकड़ मारे। फिर सर मुंडवा ले या बाल छोटे करवा ले। वैसे, बाल मुंडवा लेना ही उत्तम है।
फिर तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा करे। अब दोबारा सई करने की ज़रूरत नहीं है। पहली सई ही काफ़ी है। इतना कर लेने के बाद हज्ज पूरा हो गया और हाजी पूरी तरह हलाल हो गया।
अब बाक़ी रह गया ग्यारहवीं और बारहवीं तारीख़ को कंकड़ मारना, अगर जल्दी निकलना हो तो। तीनों जमरों को कंकड़ मारे। हर जमरा को सात-सात कंकड़। हर कंकड़ के साथ अल्लाहु अकबर कहे। पहले छोटे जमरे को मारे, जो मस्जिद-ए-ख़ैफ़ के निकट है। फिर मध्यम जमरे को और उसके बाद जमरा-ए-अक़बा को जो अंतिम जमरा है। हर जमरा को सात-सात कंकड़ मारे। हाजी बारहवीं तारीख़ के बाद रुकना चाहता हो, तो ग्यारहवीं और बारहवीं तारीख़ की तरह तेरहवीं तारीख़ को भी कंकड़ मारे।
कंकड़ मारने का समय:(तशरीक के) तीनों दिनों में सूरज ढलने के पश्चात्।
अगर बारहवीं तारीख़ को सूरज डूबने से पहले निकल जाना चाहे, तब भी कोई हर्ज नहीं है। अगर रुक कर तेरहवीं तारीख़ को सूरज ढलने के बाद कंकड़ मार ले, तो यह बेहतर है। क्योंकि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है:
﴿...فَمَن تَعَجَّلَ فِي يَوۡمَيۡنِ فَلَآ إِثۡمَ عَلَيۡهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَآ إِثۡمَ عَلَيۡهِۖ لِمَنِ ٱتَّقَىٰ...﴾
"फिर जो व्यक्ति जल्दी करते हुए दो ही दिन में (मिना से) चल दे, उसपर कोई दोष नहीं और जो विलंब करे उसपर भी कोई दोष नहीं, उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह से डरा...।" [सूरा अल-बक़रा : 203]।
और अगर सफ़र का इरादा करे, तो तवाफ़-ए-वदा के लिए बिना सई के सात चक्कर लगाए।
हाजी के साथ क़ुर्बानी का जानवर हो, तो उसके लिए तमत्तुअ का एहराम बाँधना बेहतर है। ऐसा हाजी आठवें दिन हज्ज का तलबिया कहे और हज्ज के वह सारे कार्य करे, जो पीछे गुज़र चुके हैं। अगर हज्ज और उमरा दोनों का एहराम साथ बाँध ले, तब भी कोई हर्ज नहीं है। इसे हज्ज-ए-क़िरान कहा जाता है। यानी ऐसा हज्ज जिसमें हज्ज एवं उमरा का एहराम एक साथ बाँधा जाता है। इसमें तवाफ़ और सई दोनों एक ही बार हुआ करते हैं।
तृतीय अध्याय:
मामलात से संबंधित
उलमा ने स्पष्ट रूप से बता दिया है कि कौन-से ज्ञान को अर्जित करना हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। तथा उन्होंने उस मात्रा के बारे में भी बात की है जिसे सीखना हर मुसलमान पर व्यक्तिगत रूप से फ़र्ज़ है।
और ज्ञान की उन बातों में से इन का उल्लेख किया है : व्यापार में संलग्न व्यक्ति के लिए व्यापार के नियमों का ज्ञान प्राप्त करना, ताकि वह ह़राम या सूद में न पड़ जाए और उसे पता भी न चले, कुछ सहाबा के कथनों से भी इसकी पुष्टि होती है।
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा:
"हमारे बाजार में वही व्यक्ति व्यापार करे, जिसने दीन का गहन ज्ञान प्राप्त किया हो।"(61)
अली बिन अबू तालिब -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं : "जो इस्लाम का ज्ञान प्राप्त करने से पहले व्यापार करेगा, वह सूद में फँसेगा, वह सूद में फँसेगा, वह सूद में फँसेगा।"(62)
इब्न-ए-आबिदीन, अल्लामी से, नक़ल करते हुए कहते हैं: "इस्लामी आदेशों एवं निर्देशों का पालन करने के उत्तरदायी हर पुरुष एवं महिला पर फ़र्ज़ है कि वह अकीदा और आस्था का ज्ञान प्राप्त करने के बाद वुज़ू, स्नान, नमाज़, रोज़े, निसाब के बराबर धन होने पर ज़कात, सामर्थ्य होने पर हज्ज और व्यवसाय से जुड़े होने पर व्यापार से संबंधित इस्लामी प्रावधानों को सीखे, ताकि तमाम मामलात में संदेहास्पद एवं मकरूह चीज़ों से बच सके। यही हाल विभिन्न पेशों से जुड़े लोगों का है। और जो जिस काम से जुड़ा हो, उसके लिए उससे संबंधित प्रावधानों को जानना ज़रूरी है, ताकि उससे संबंधित वर्जित चीज़ों से बच सके।"(63)
नववी - उन पर अल्लाह की कृपा हो - कहते हैं : "जहाँ तक क्रय-विक्रय, निकाह और इसी तरह की अन्य चीज़ों का संबंध है, जो मूल रूप से अनिवार्य नहीं है, तो इनकी ओर क़दम बढ़ाना हराम है, जब तक उनकी शर्तों को न जान लिया जाए।"(64)
ये कुछ नियम हैं जो इस्लामी शरीअत में वित्तीय लेनदेन से संबंधित हैं:
1- इस्लाम में हर वह चीज़ वैध है, जिसमें निश्चित तौर कोई हित हो या जिसका हित वाला होना प्रबल हो। जैसे हलाल चीज़ों की क्रय-विक्रय, किराए पर देना और शुफ़्आ का अधिकार।(65)
2- लोगों के अधिकारों को सुनिश्चितता और सुरक्षा प्रदान करने वाला हर काम जायज़ है। जैसे गिरवी रखना और गवाह बनाना।
3- अनुबंध करने वाले दोनों पक्षों के हित में जो कुछ भी हो, जैसे कि 'इक़ाला', 'ख़ियार' और बिक्री में शर्तें, तथा उसकी वैधता।
4- लोगों पर अत्याचार और उनके धन को ग़लत तरीक़े से खाने पर आधारित हर काम से रोका गया है। जैसे सूद, अवैध क़ब्ज़ा और ज़ख़ीरा करना आदि।
5- हर वह कार्य जिसमें भलाई के लिए सहयोग हो, जैसे ऋण, उधार और अमानत की वैधता।
6. बिना काम, लाभ या मेहनत के धन खाने वाले सभी साधनों को निषिद्ध करना; जैसे जुआ और सूद।
7- हर उस व्यापारिक लेन-देन से मना किया गया है जिसमें अज्ञानता हावी हो या धोखा की प्रबल संभावना हो। जैसे कि व्यक्ति का किसी ऐसी वस्तु को बेचना जिसका वह मालिक न हो और अज्ञात वस्तु को खरीदना या बेचना।
8- हराम को हलाल करने के लिए किया गया हर प्रकार का छल हराम है। मसलन ईना वाली विक्रय करते हुए किसी को कोई सामान उधार बेच देना और उसके बाद उससे कम क़ीमत पर नक़द ख़रीद लेना।(66)
9- अल्लाह की आज्ञा का पालन करने से रोकने वाली चीज़ों से बचना; जैसे दूसरे जुमे की अज़ान के बाद व्यापार करना।
10- हर उस चीज़ से मना करना जो हानि पहुँचाती है, या मुसलमानों के बीच शत्रुता का कारण बनती है; जैसे कि हराम चीज़ों का व्यापार, और किसी (मुसलमान) भाई के सौदे पर सौदा करना।
जब किसी व्यक्ति को किसी चीज़ के बारे में शरई दिशा-निर्देश पता न हो, तो उसे उलमा से पूछ लेना चाहिए। उसकी ओर क़दम शरई दृष्टिकोण जानने के बाद ही बढ़ाना चाहिए। जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है:
﴿...فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ﴾
"...तो तुम ज्ञानियों से पूछ लो यदि तुम नहीं जानते।" [सूरा अल-नह्ल : 43]।
ये कुछ मसायल हैं, जो संकलित कर दिए गए हैं। दुआ है कि अल्लाह हमें लाभकारी ज्ञान और नेक अमल प्रदान करे। निश्चय ही वह बड़ा दाता एवं दयावान है। अल्लाह की कृपा एवं शान्ति की बरखा बरसे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, आपके परिजनों और साथियों पर, और बहुत अधिक शांति अवतरित हो।
सूची
पहला अध्याय : 3
अक़ीदे से संबंधित बातें 3
पहला विषय : इस्लाम का अर्थ और उसके स्तंभ : 3
तौहीद (एकेश्वरवाद) का महत्व : 3
''ला इलाहा इल्लल्लाह'' की गवाही का अर्थ : 5
"ला इलाहा इल्लल्लाह" की शर्तें निम्नलिखित हैं : 6
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, इस गवाही का अर्थ: 7
दूसरा विषय : ईमान का अर्थ और उसके स्तंभ : 9
1) अल्लाह पर ईमान। इसमें तीन बातें शामिल हैं : 10
1- अल्लाह तआला की रुबूबिय्यत पर ईमान लाना: 10
2- अल्लाह की उलूहिय्यत (उपासना) पर ईमान: 12
3- अस्मा व सिफ़ात (अल्लाह के नामों और गुणों) पर ईमान रखना: 15
2) फ़रिश्तों पर ईमान: 23
3) किताबों पर ईमान: 25
4) रसूलों -उन सब पर अल्लाह की सलामती हो- पर ईमान: 26
5) आख़िरत के दिन पर ईमान: 27
अ- दोबारा जीवित करके उठाए जाने पर ईमान: 27
ब- हिसाब-किताब और प्रतिफल पर ईमान: 27
जन्नत और जहन्नम (स्वर्ग-नरक) पर ईमान: 28
6) भली-बुरी तक़दीर पर ईमान: 28
तीसरा विषय : एहसान : 31
चौथा विषय : संक्षेप में अह्ल-ए-सुन्नत व जमात के कुछ सिद्धांत: 32
दूसरा अध्याय : इबादत से संबंधित बातें 33
पहला विषय : तहारत (पवित्रता) : 33
प्रथम: पानी के प्रकार: 33
दूसरा: नजासत: 33
तीसरा बिंदु : नापाक व्यक्ति के लिए कौन-कौन से कार्य हराम हैं : 36
चौथा: पेशाब-पाखाना के आदाब: 39
पाँचवाँ: इस्तिंजा और इस्तिज़मार के नियम: 40
छठा: वुज़ू के अहकाम (नियम): 41
सातवां: ख़ुफ़्फ़ एवं जौरब पर मसह के अहकाम: 43
अष्टम: तयम्मुम के नियम: 45
नौवां: माहवारी और प्रसवोत्तर रक्तस्राव से संबंधित शरई आदेश एवं निर्देश: 48
दूसरा विषय : नमाज़ : 50
प्रथम बिंदु: अज़ान तथा इक़ामत के अहकाम: 50
दूसरा बिंदु : नमाज़ का स्थान और उसकी फ़ज़ीलत (सद्गुण) : 54
तीसरा बिंदु: नमाज़ की शर्तें 56
चौथा बिंदु : नमाज़ के अरकान (स्तंभ) 58
पाँचवाँ बिंदु : नमाज़ के वाजिबात (अनिवार्य कार्य ) 64
छठा बिंदु : नमाज़ की सुन्नतें 65
सातवाँ बिंदु- नमाज़ का तरीक़ा: 68
आठवाँ बिंदु: नमाज़ में मकरूह चीज़ें (नापसंद कार्य): 74
नौवाँ बिंदु: नमाज़ को अमान्य वाली चीजें: 75
दसवां बिंदु: सह्व (विस्मृति) के सज्दे: 75
ग्यारहवाँ बिंदु: वो समय, जिनमें नमाज़ पढ़ना मना है : 77
बारहवाँ बिंदु : जमात के साथ नमाज़ : 78
तेरहवाँ बिंदु : भय के समय की नमाज़ : 81
भय की नमाज़ का तरीक़ा 82
चौदहवाँ बिंदु : जुमा की नमाज़ : 83
पाँचवाँ : जुमे के दिन के मुस्तहब कार्य : 85
जुमा की नमाज़ कब मिल जाती है : 86
पंद्रहवाँ बिंदु : उज़्र वाले लोगों की नमाज़: 87
सोलहवाँ बिंदू : दोनों ईदों की नमाज़ : 90
सत्रहवाँ बिंदु : सूर्य ग्रहण की नमाज़ : 93
अठाहरवाँ बिंदु : इस्तिसक़ा -बारिश माँगने- की नमाज़ : 94
उन्नीसवाँ बिंदु : जनाज़े से संबंधित शरई प्रावधान : 96
तीसरा विषय : ज़कात : 100
1- ज़कात की परिभाषा और उसका महत्व : 100
2- ज़कात के अनिवार्यता की शर्तें: 101
3- वे संपत्तियाँ जिनमें ज़कात वाजिब है: 102
चौथा विषय : रोज़ा : 114
रमज़ान के रोज़े की वाजिब होने की शर्तें: 114
पाँचवाँ विषय : हज्ज तथा उमरा 123
हज्ज और उमरा के वाजिब होने की शर्तें: 123
एहराम के मीक़ात : 125
एहराम : 127
उमरा : 131
हज्ज : 135
तृतीय अध्याय: 138
मामलात से संबंधित 138
***
() इसे अहमद ने अपनी मुसनद में हदीस संख्या (6072) और तिर्मिज़ी ने अपनी सुनन में हदीस संख्या (1535) के तहत रिवायत किया है और तिर्मिज़ी ने इसे हसन कहा है।
() इसे इमाम बुखारी ने अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : (716), अहमद ने अल-मुस्नद हदीस संख्या : (19606), और अल-ज़िया अल-मक़दिसी ने अल-अहादीस अल-मुख्तारा (1/150) में रिवायत किया है। अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे अल-सग़ीर हदीस संख्या : (3731) में सहीह कहा है।
() सहीह मुस्लिम हदीस संख्या (121) तथा मुस्नद-ए-अहमद हदीस संख्या (10434)।
() (मज़ी) : यह एक पतला पानी है जिसका कोई रंग नहीं होता और यह यह प्यार भरी बातें और हरकत करने, संभोग के बारे में सोचने, उसकी इच्छा होने या देखने आदि से निकलता है और यह बूंद-बूंद होकर निकलता है और कभी-कभी इसके निकलने का एहसास भी नहीं होता। (वदी) : यह गाढ़ा सफेद पानी है जो पेशाब के बाद या भारी चीज़ उठाने पर निकलता है।
() इसे मुस्लिम (224) ने रिवायत किया है।
() इसे मालिक ने मुवत्ता (680, 219), दारिमी (312) ने तथा अब्दुर रज़्ज़ाक़ ने ''अल-मुस़न्नफ़'' (1328) में रिवायत किया है और अल्बानी ने ''इरवा अल-ग़लील'' (122) में सहीह कहा है।
() इसे अहमद (15423) तथा नसई (12808) ने रिवायत किया है और अलबानी ने ''इरवा अल-ग़लील'' (121) में सहीह कहा है।
() इसे इब्ने माजह (594) और इब्ने हिब्बान (799) ने रिवायत किया है और अलबानी ने ज़ईफ़ सुनन तिर्मिज़ी (146) में दुर्बल कहा है।
() इस हदीस को बुख़ारी (142) और मुस्लिम (122) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (7288) और मुस्लिम (6066) ने रिवायत किया है।
() शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ -रहिमहुल्लाह- ने अपने फतवों के संग्रह (29/141) में कहा है : (बैहक़ी ने जाबिर से एक अच्छी (जैयिद) सनद के साथ «जिसका तूने वादा किया है» के बाद यह वाक्य अधिक रिवायत किया है : «निःसंदेह तू वादे के खिलाफ़ नहीं करता»)।
() सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 2635।
() इसे मुस्लिम (82) ने रिवायत किया है।
() सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 265। तिर्मिज़ी ने इसे हसन सहीह ग़रीब कहा है और अलबानी ने इसे सहीह तरग़ीब व तरहीब में सहीह कहा है।
() इसे बुख़ारी (1117) ने रिवायत किया है।
() इसे बुख़ारी (6251) और मुस्लिम (884) ने रिवायत किया है।
() इसे बुख़ारी (756) और मुस्लिम (872) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (793) और मुस्लिम (398) ने रिवायत किया है।
() इसे इमाम बुख़ारी (812) और इमाम मुस्लिम (490) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को इमाम मुस्लिम (498) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (724) और मुस्लिम (398) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (797) और मुस्लिम (402) ने रिवायत किया है।
() सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 839।
() इसे इमाम बुख़ारी (6008) ने वर्णन किया है।
() इसे इमाम बुख़ारी (1110) ने रिवायत किया है।
() इसे बुख़ारी ने हदीस संख्या (835) के अंतर्गत रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (743) और मुस्लिम (399) ने रिवायत किया है।
() सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 266।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 588।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 5168।
() सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 284।
() इसे इमाम मुस्लिम (1484) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (609) और मुस्लिम (602) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (4130) और मुस्लिम (842) ने रिवायत किया है।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 865।
() इस हदीस को बुख़ारी (934) और मुस्लिम (851) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (1081) और मुस्लिम (693) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (1012) और मुस्लिम (894) ने रिवायत किया है।
() इसे अबू दावूद (3/211) और तिर्मिज़ी (1024) ने रिवायत किया है और तिर्मिज़ी ने हसन सहीह कहा है।
() इसे मुस्लिम (962) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (8) और मुस्लिम (111) ने रिवायत किया है।
() इसे इब्ने माजह (1792) और तिर्मिज़ी (63), (631) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (1402) और मुस्लिम (2287) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (1432) और मुस्लिम (984) ने रिवायत किया है।
() सुनन अबू दावूद (1609), इब्ने माजह (1827)। अलबानी ने इसे सहीह अबू दावूद (1609) में सहीह कहा है।
() इस हदीस को इमाम बुख़ारी (1) और इमाम मुस्लिम (1907) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (1810) और मुस्लिम (1086) ने रिवायत किया है।
() इसे बुख़ारी (1909) ने रिवायत किया है।
() इसे अहमद हदीस संख्या : (26457), अबू दावूद हदीस संख्या : (2454), और नसई हदीस संख्या : (2331) ने रिवायत किया है। शब्द नसई के हैं।
() इस हदीस को बुख़ारी (6669) और मुस्लिम (2709) ने रिवायत किया है।
() इसे अबू दावूद (2380), तिर्मिज़ी (719) और इब्ने माजह (676) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (1849) और मुस्लिम (1846) ने रिवायत किया है।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1134।
() इस हदीस को अहमद (25198), नसई (2627) और इब्न-ए-माजह (2901) ने रिवायत किया है।
() इसे बुख़ारी (1862) और मुस्लिम (1341) ने रिवायत किया है।
() इसे सहीह बुख़ारी (1531) ने रिवायत किया है।
() यह रिवायत सहीह मुस्लिम (1211) की है।
() इसे इमाम बुख़ारी ने हदीस संख्या : (1549) के अन्तर्गत रिवायत किया है।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : (1218)।
() इसे इमाम तिर्मिज़ी (487) ने रिवायत किया है और हसन ग़रीब कहा है। अलबानी ने भी इसे हसन कहा है।
() देखिए : «मुग़नी अल-मुहताज» (2/22)।
() हाशिया इब्न-ए-आबिदीन (1/42).
() देखें : अल-मजमूअ (1/50).
() शुफ़्आ: शुफ़्आ से मुराद यह अधिकार है कि एक साझेदार अपने साझेदार के हिस्से को वित्तीय मुआवज़े के बदले में उससे वापस ले सकता है, जिसे वह हस्तांतरित हो गया था।
() ईना : ईना यह है कि कोई व्यक्ति किसी अन्य को कोई वस्तु उधार पर बेचे और उसे सौंप दे, फिर क़ीमत प्राप्त करने से पहले उसे उसी व्यक्ति से कम क़ीमत पर नक़द ख़रीद ले।
() इसे बुख़ारी ने हदीस संख्या (8) के अंतर्गत रिवायत किया है।