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مَنْ خَلَقَ الكَونَ؟ وَمَنْ خَلَقَنِي؟ وَلِمَاذَا؟

 

ब्रह्माण्ड की रचना किसने की? मेरी रचना किसने की? और क्यों?

 

 

اللَّجْنَةُ العِلْمِيَّةُ

بِرِئَاسَةِ الشُّؤُونِ الدِّينِيَّةِ بِالمَسْجِدِ الحَرَامِ وَالمَسْجِدِ النَّبَوِيِّ

 

अनुसंधान समिति, प्रेसीडेंसी धार्मिक कार्य

मस्जिद--हराम एवं मस्जिद--नबवी

 


بِسْمِ اللهِ الرَّحمَنِ الرَّحِيمِ

क्या मैं सही मार्ग पर हूँ?

आकाशों, धरती और उनके अंदर मौजूद अनगिनत बड़ी-बड़ी सृष्टियों की रचना किसने की?

आकाश एवं धरती की यह सटीक एवं सुदृढ़ व्यवस्था किसने स्थापित की?

किसने इन्सान को पैदा किया, उसे सुनने एवं देखने की शक्ति प्रदान की, बुद्धि-विवेक दिया और ज्ञान प्राप्त करने एवं तथ्यों को समझने में सक्षम बनाया?

किसने आपके शरीर के अंगों में यह सूक्ष्म अद्भुत निर्माण की रचना की और आपको यह सुंदर आकार दिया?

भिन्न एवं विविध प्रकार की जीवित प्राणियों की रचना पर ग़ौर करेंउन्हें इतने असीम रूप और रंग के साथ किसने अद्भुत रूप से रचा?

यह महान ब्रह्माण्ड अपने सूक्ष्म नियमों के साथ इतने लंबे समय से कैसे व्यवस्थित एवं स्थिर रूप में चल रहा है?

इस संसार को नियंत्रित करने वाली प्रणालियों (जीवन और मृत्यु, प्राणियों का प्रजनन, दिन और रात, ऋतुओं का परिवर्तन, आदि) की स्थापना किसने की?

क्या इस संसार ने स्वयं अपनी रचना कर ली है? या अनस्तित्व से अस्तित्व मेंगया है? या सब कुछ संयोग मात्र से बन गया है? उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿‌أَمۡ خُلِقُواْ مِنۡ غَيۡرِ شَيۡءٍ أَمۡ هُمُ ٱلۡخَٰلِقُونَ٣٥ أَمۡ خَلَقُواْ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۚ بَل لَّا يُوقِنُونَ36﴾

"क्या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, अथवा वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं? या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है? बल्कि वे विश्वास ही नहीं रखते" [सूरा अल-तूर : 35-36]

अगर हमने ख़ुद अपनी रचना नहीं की है तथा यह भी असंभव है कि हम अपने आप वजूद (अस्तित्व) मेंजाएँ या एक संयोग मात्र से पैदा हो जाएँ, तो फिर निर्विवाद सत्य यही है कि इस संसार का अवश्य ही कोई महान एवं सर्वशक्तिमान स्रष्टा है; क्योंकि यह असंभव है कि यह ब्रह्माण्ड अपनी रचना स्वयं कर ले! या अनस्तित्व से अस्तित्व मेंजाए! या एक संयोग मात्र से उत्पन्न हो जाए!

मनुष्य ऐसी चीज़ों के अस्तित्व पर विश्वास क्यों रखता है, जिन्हें वह देख नहीं सकता? जैसे : (बोध, विवेक, आत्मा, भावनाएँ और प्रेम)। क्या यह केवल इसलिए नहीं कि वह इनके प्रभावों को देखता है? ऐसे में भला वह इस विशाल ब्रह्माण्ड के स्रष्टा के अस्तित्व का इनकार कैसे कर सकता है? क्या वह उसकी सृष्टियों, शिल्पकारी और दया के प्रभावों को नहीं देखता?

किसी भी विवेकी व्यक्ति से यदि यह कहा जाए कि यह भवन किसी के बनाए बिना अपने आप बन गया है, अथवा उस से कहा जाए कि शून्य ने इस भवन को उत्पन्न किया है, तो वह मानने को तैयार नहीं होगा ऐसे में, वह कुछ लोगों के इस दावे को कैसे सच मान सकता है कि यह महान् ब्रह्माण्ड किसी रचयिता के बिना ही सामनेगया हैकोई समझदार व्यक्ति कैसे स्वीकार कर सकता है कि यह सूक्ष्म व्यवस्था केवल संयोग मात्र से स्थापित हो गई है

यह सारी चीज़ें हमें एक ही निष्कर्ष तक पहुँचाती हैं कि इस संसार का एक महान और सर्वशक्तिमान पालनहार है, जो उसे चला रहा है, तथा केवल वही इबादत का हक़दार हैउसके अतिरिक्त जितनी भी चीज़ों की इबादत की जाती है, सब की इबादत ग़लत है, क्योंकि वे इस योग्य नहीं हैं कि उन की इबादत की जाए

महान पालनहार रचयिता

इस संसार का एक पालनहार एवं रचयिता हैवही इसका मालिक, संचालनकर्ता एवं जीविकादाता हैवही जीवन एवं मृत्यु देता हैउसी ने धरती की रचना की एवं उसे वश में कर दिया, और उसे सृष्टियों के रहने योग्य बनायाउसी ने आकाशों एवं उनमें विद्यमान बड़ी-बड़ी सृष्टियों को पैदा कियाउसी ने सूरज, चाँद, दिन एवं रात की यह सूक्ष्म व्यवस्था स्थापित की, जो उसकी महानता को दर्शाती है

उसी ने हमारे लिए हवा पैदा की, जिसके बिना हम जीवित नहीं रह सकतेवही हमारे लिए बारिश बरसाता हैउसी ने हमारे लिए समुद्र एवं नदियाँ बनाईंवही हमें उस समय भोजन एवं सुरक्षा प्रदान करता था, जब हम अपनी माँ के पेट में थे और हमारे पास कोई शक्ति नहीं थीवही जन्म से मृत्यु तक हमारी रगों में खून जारी रखता है

यह पालनहार, रचयिता और आजीविकादाता पवित्र एवं महान अल्लाह है

अल्लाह तआला का कथन है :

﴿إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٖ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِۖ يُغۡشِي ٱلَّيۡلَ ٱلنَّهَارَ يَطۡلُبُهُۥ حَثِيثٗا وَٱلشَّمۡسَ وَٱلۡقَمَرَ وَٱلنُّجُومَ مُسَخَّرَٰتِۭ بِأَمۡرِهِۦٓۗ أَلَا لَهُ ٱلۡخَلۡقُ وَٱلۡأَمۡرُۗ تَبَارَكَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ54﴾

"निःसंदेह तुम्हारा पालनहार वह अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में बनायाफिर अर्श (सिंहासन) पर बुलंद हुआवह रात से दिन को ढाँप देता है, जो उसके पीछे दौड़ता हुआ चला आता हैतथा सूर्य और चाँद और तारे (बनाए), इस हाल में कि वे उसके आदेश के अधीन किए हुए हैंसुन लो! सृष्टि करना और आदेश देना उसी का काम हैबहुत बरकत वाला है अल्लाह, जो सारे संसारों का पालनहार है" [सूरा अल-आराफ़ : 54]

अल्लाह ही इस संसार की सारी दिखने एवंदिखने वाली चीज़ों का रचयिता एवं पालनहार हैउसके सिवा सारी चीज़ें उसकी विशाल रचना का हिस्सा हैंवही एकमात्र इबादत का हक़दार हैउसके अतिरिक्त किसी और की इबादत नहीं होनी चाहिएउसकी बादशाहत, रचना, संचालन या इबादत में कोई साझी नहीं है

अगर उस सर्वशक्तिमान एवं महान पालनहार के अतिरिक्त अन्य पूज्य होते, तो इस संसार की व्यवस्था नष्ट हो जाती, क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता कि इस संसार को एक ही साथ दो पूज्य चलाएँउच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿لَوۡ كَانَ فِيهِمَآ ءَالِهَةٌ إِلَّا ٱللَّهُ لَفَسَدَتَا...﴾

"अगर उन दोनों में अल्लाह के सिवा कोई और पूज्य होते, तो वे दोनों अवश्य बिगड़ जाते..." [सूरा अल-अंबिया : 22]

पालनहार एवं रचयिता के गुण

पवित्र पालनहार के बेशुमार अच्छे-अच्छे नाम हैंउसके बहुत-से विशाल गुण हैं, जो उसकी संपूर्णता को दर्शाते हैंउसका एक नाम "अल-ख़ालिक" (सृष्टिकर्ता) और एक नाम "अल्लाह" हैअल्लाह का अर्थ है, ऐसी हस्ती जो अकेले इबादत की हक़दार हो और उसका कोई साझीहो। "अल-ह़य्य" (जीवित), "अल-क़य्यूम" (संसार को संभालने वाला), "अल-ह़ी" (दयावान्), "अल-राज़िक़" (रोज़ी देने वाला) और "अल-करीम" (उदार) आदि भी उसके नाम हैंउच्च एवं महान अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में कहा है :

﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُۚ لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِۦۚ يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيۡءٖ مِّنۡ عِلۡمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَۚ وَسِعَ كُرۡسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفۡظُهُمَاۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ255﴾

"अल्लाह (वह है कि) उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। (वह) जीवित है, हर चीज़ को सँभालने (क़ायम रखने) वाला है। न उसे कुछ ऊँघ पकड़ती है औरनींदउसी का है जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में हैकौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) करे? वह जानता है जो कुछ उनके सामने और जो कुछ उनके पीछे हैऔर वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ को (अपने ज्ञान से) नहीं घेर सकते, परंतु जितना वह चाहेउसकी कुर्सी आकाशों और धरती को व्याप्त है और उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकातीऔर वही सबसे ऊँचा, सबसे महान है" [सूरा अल-बक़रा : 255]

अल्लाह तआला ने एक अन्य स्थान में कहा है :

﴿قُلۡ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ١ ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ ٢ لَمۡ يَلِدۡ وَلَمۡ يُولَدۡ ٣ وَلَمۡ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدُۢ4﴾

"(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक हैअल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई संतान है औरवह किसी की संतान हैऔरकोई उसका समकक्ष है" [सूरा अल-ख़लास : 1-4]

पूज्य पालनहार अपने सभी गुणों में परिपूर्ण है

उसका एक गुण यह है कि वह पूज्य एवं वंदनीय है, जबकि उसके अतिरिक्त हर एक रचना, दायित्व का बोझ उठाने वाला, आदेशित और अधीन है

उसका एक गुण यह है कि वह जीवित एवं इस संसार को संभालने वाला हैइस संसार की हर जीवित वस्तु को उसी ने जीवन दिया है और उसी ने अनस्तित्व से अस्तित्व प्रदान किया हैवही रोज़ी देता है और उसकी सारी ज़रूरतें पूरी करता हैइस संसार का पालनहार जीवित हैउसे मौत नहीं आएगीउसे मौतभी नहीं सकतीउसने इस संसार को संभाल रखा हैवह सोता नहीं हैउसेऊँघ आती है औरनींद

उसका एक गुण यह है कि वह सब कुछ जानने वाला हैआकाश एवं धरती की कोई भी वस्तु उससे छुप नहीं सकती

उसका एक गुण यह है कि वह सुनने और देखने वाला हैवह सब कुछ सुनता और हर सृष्टि को देखता हैवह दिलों में पैदा होने वाले ख़्यालों और सीनों में छुपी हुई बातों को भी जानता हैआकाश एवं धरती की कोई वस्तु उससे छुप नहीं सकती

उसका एक गुण यह है कि वह क्षमतावान हैउसेकोई विवश कर सकता है औरकोई उसके इरादे को टाल सकता हैवह जो चाहे करता है और जिसे चाहे रोकता हैवह जिसे चाहे आगे और जिसे चाहे पीछे करता हैवह बड़ी हिकमतों वाला है

उसका एक गुण यह है कि वह सृष्टिकर्ता एवं संचालनकर्ता हैउसी ने इस संसार की सृष्टि की है और वही इसे संचालित करता हैसारी सृष्टियाँ उसके अधीन हैं

उसका एक गुण यह है कि वह परेशानहाल लोगों की फ़रियाद सुनता है, संकट में पड़े हुए लोगों को राहत देता है और उनका दुःख दूर करता हैकोई भी सृष्टि जब किसी संकट से घिरती और मुसीबत में पड़ती है, तो थक-हार कर उसी की शरण लेती है

इबादत केवल अल्लाह ही की हो सकती हैक्योंकि वही संपूर्ण है और एक मात्र वही इबादत का हक़दार हैउसके अतिरिक्त किसी और की इबादत उचित नहीं हैक्योंकि उसके अतिरिक्त कोई संपूर्ण एवं परिपूर्ण नहीं हैसबको मौत आनी है और फ़ना हो जाना है

पवित्र एवं महान अल्लाह ने हमें ऐसी अक़्लें दीं, जो उसकी महानता को महसूस कर सकें और ऐसा स्वभाव दिया, जो भलाई को पसंद करे, बुराई को नापसंद करे और संसार के पालनहार के आगे झुकने में संतुष्टि महसूस करेयह स्वभाव पालनहार की संपूर्णता और कमियों से पाक होने को इंगित करता है

किसी समझदार व्यक्ति के लिए उचित नहीं है कि वह संपूर्ण हस्ती के अतिरिक्त किसी और की इबादत करेऐसे में अपनी ही जैसी या अपने से कमतर किसी अपूर्ण सृष्टि की इबादत भला कैसे उचित हो सकती है?

वह पूज्य पालनहार इन्सान, बुत, पेड़ या जानवर नहीं हो सकता

पालनहार अपने आकाशों के ऊपर, अपने अर्श पर अवस्थित और अपनी सृष्टि से जुदा हैउसके अंदर उसकी कोई सृष्टि समाहित नहीं है औरवह किसी सृष्टि के अंदर समाहित हैवह किसी सृष्टि का आकार लेकर प्रकट नहीं होता

पालनहार के जैसी कोई चीज़ नहीं हैवह सुनने और देखने वाला हैउसका कोई समकक्ष नहीं है। न वह सोता है औरखाता-पीता हैवह महान हैउसकीतो कोई पत्नी हो सकती है औरही कोई संतान हो सकती हैक्योंकि सृष्टिकर्ता अपने हर गुण में महान हैऐसा नहीं हो सकता कि उसे किसी चीज़ की ज़रूरत हो या उसके अंदर कोई कमी हो

अल्लाह तआला ने कहा है :

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ضُرِبَ مَثَلٞ فَٱسۡتَمِعُواْ لَهُۥٓۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ تَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ لَن يَخۡلُقُواْ ذُبَابٗا وَلَوِ ٱجۡتَمَعُواْ لَهُۥۖ وَإِن يَسۡلُبۡهُمُ ٱلذُّبَابُ شَيۡـٔٗا لَّا يَسۡتَنقِذُوهُ مِنۡهُۚ ضَعُفَ ٱلطَّالِبُ وَٱلۡمَطۡلُوبُ ٧٣ مَا قَدَرُواْ ٱللَّهَ حَقَّ قَدۡرِهِۦٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَقَوِيٌّ عَزِيزٌ74﴾

"लोगो! एक उदाहरण दिया गया हैइसे ध्यान से सुनोनिःसंदेह वे लोग जिन्हें तुम अल्लाह के अतिरिक्त पुकारते हो, कभी एक मक्खी भी पैदा नहीं करेंगे, यद्यपि वे इसके लिए इकट्ठे हो जाएँऔर यदि मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले, तो वे उसे उससे छुड़ा नहीं पाएँगेकमज़ोर है माँगने वाला और वह भी जिससे माँगा गयाउन्होंने अल्लाह का वैसे आदर नहीं किया, जैसे उसका आदर करना चाहिए! निःसंदेह अल्लाह अत्यंत शक्तिशाली, सब पर प्रभुत्वशाली है" [सूरा अल-हज्ज : 73-74]

महान सृष्टिकर्ता ने हमें क्यों पैदा किया? वह हमसे क्या चाहता है?

क्या यह बात समझ में आती है कि अल्लाह तआला ने इन सारी सृष्टियों को बिना किसी उद्देश्य के बनाया है? इन्हें व्यर्थ पैदा किया है? जबकि वह हिकमत वाला और सब कुछ जानने वाला है!

क्या यह बात समझ में आती है कि जिसने हमें इतनी सटीकता एवं निपुणता के साथ पैदा किया और आकाशों एवं धरती की सारी चीज़ों को हमारे अधीन कर दिया, वह हमें बिना किसी उद्देश्य के पैदा करे या उन महत्वपूर्ण सवालों का जवाबदे, जो हमें व्यस्त रखते हैं? जैसेः हम यहाँ क्यों आए हैं? मौत के बाद क्या होगा? हमारी रचना का उद्देश्य क्या है?

क्या यह बात समझ में आती है कि अत्याचार करने वाले को कोई सज़ा और उपकार करने वाले को कोई बदलादिया जाए?

उच्च एवं महान ल्लाह ने कहा है :

﴿أَفَحَسِبۡتُمۡ أَنَّمَا خَلَقۡنَٰكُمۡ عَبَثٗا وَأَنَّكُمۡ إِلَيۡنَا لَا تُرۡجَعُونَ115﴾

"तो क्या तुमने समझ रखा था कि हमने तुम्हें उद्देश्यहीन पैदा किया है और यह कि तुम हमारी ओर नहीं लौटाए जाओगे?" [सूरा अल-मोमिनून : 115]

सच्चाई यह है कि उसने रसूल भेजे और उनके माध्यम से हमें बताया कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है, हम अपने पालनहार की इबादत कैसे करें, उसकी निकटता कैसे प्राप्त करें, अल्लाह हमसे क्या चाहता है, हम उसकी प्रसन्नता कैसे प्राप्त कर सकते हैं और मौत के बाद हमारा अंजाम क्या होगा?

अल्लाह ने रसूल भेजे, ताकि वे हमें बताएँ कि केवल अल्लाह ही इबादत का हक़दार है, वो हमें अल्लाह की इबादत का तरीक़ा सिखाएँ, उसके आदेश एवं निषेध पहुँचाएँ और ऐसे नैतिक मूल्य सिखाएँ कि यदि हम उनका पालन करते हैं, तो हमारा जीवन भलाइयों एवं बरकतों से भरा हुआ होगा

अल्लाह ने बहुत सारे रसूल भेजेजैसे नूह, ब्राहीम, मूसा और ईसाअल्लाह ने सब को ऐसी निशानियाँ एवं चमत्कार प्रदान किए, जो उनके सच्चे नबी और अल्लाह के भेजे हुए रसूल होने को प्रमाणित करते होंइस सिलसिले की अंतिम कड़ी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम हैं

रसूलों ने हमें स्पष्ट तौर पर बताया कि हमारा यह जीवन एक परीक्षा है और असल जीवन मौत के बाद का जीवन है

वहाँ एकमात्र अल्लाह की इबादत करने वालों और सभी रसूलों पर विश्वास रखने वाले मोमिनों के लिए जन्नत है, तथा काफ़िरों के लिए, जो अल्लाह के साथ अन्य पूज्यों की इबादत करते हैं या अल्लाह के किसी भी रसूल का इनकार करते हैं, अल्लाह ने जहन्नम तैयार कर रखी है

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है:

﴿يَٰبَنِيٓ ءَادَمَ إِمَّا يَأۡتِيَنَّكُمۡ رُسُلٞ مِّنكُمۡ يَقُصُّونَ عَلَيۡكُمۡ ءَايَٰتِي فَمَنِ ٱتَّقَىٰ وَأَصۡلَحَ فَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُونَ ٣٥ وَٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَا وَٱسۡتَكۡبَرُواْ عَنۡهَآ أُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ36﴾

"आदम की संतान! जब तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल आएँ, जो तुम्हें मेरी आयतें सुनाएँ, तो जो कोई डरा और अपना सुधार कर लिया, तो उनके लिएतो कोई भय होगा औरवे शोक करेंगेतथा जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उन्हें मानने से अभिमान किया, वही लोग आग (जहन्नम) वाले हैं, वे उसमें हमेशा रहने वाले हैं" [सूरा अल-आराफ़ : 35-36]

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है:

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱعۡبُدُواْ رَبَّكُمُ ٱلَّذِي خَلَقَكُمۡ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ ٢١ ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلۡأَرۡضَ فِرَٰشٗا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءٗ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَخۡرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزۡقٗا لَّكُمۡۖ فَلَا تَجۡعَلُواْ لِلَّهِ أَندَادٗا وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ٢٢ وَإِن كُنتُمۡ فِي رَيۡبٖ مِّمَّا نَزَّلۡنَا عَلَىٰ عَبۡدِنَا فَأۡتُواْ بِسُورَةٖ مِّن مِّثۡلِهِۦ وَٱدۡعُواْ شُهَدَآءَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ٢٣ فَإِن لَّمۡ تَفۡعَلُواْ وَلَن تَفۡعَلُواْ فَٱتَّقُواْ ٱلنَّارَ ٱلَّتِي وَقُودُهَا ٱلنَّاسُ وَٱلۡحِجَارَةُۖ أُعِدَّتۡ لِلۡكَٰفِرِينَ ٢٤ وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ أَنَّ لَهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُۖ كُلَّمَا رُزِقُواْ مِنۡهَا مِن ثَمَرَةٖ رِّزۡقٗا قَالُواْ هَٰذَا ٱلَّذِي رُزِقۡنَا مِن قَبۡلُۖ وَأُتُواْ بِهِۦ مُتَشَٰبِهٗاۖ وَلَهُمۡ فِيهَآ أَزۡوَٰجٞ مُّطَهَّرَةٞۖ وَهُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ25﴾

"लोगो! अपने उस पालनहार की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओजिसने तुम्हारे लिए धरती को एक बिछौना तथा आकाश को एक छत बनाया और आकाश से कुछ पानी उतारा, फिर उससे कई प्रकार के फल तुम्हारी जीविका के लिए पैदा किएअतः अल्लाह के लिए किसी प्रकार के साझीबनाओ, जबकि तुम जानते होऔर यदि तुम उस (पुस्तक) के बारे में किसी संदेह में हो, जो हमने अपने बंदे पर उतारा है, तो उसके समान एक सूरत ले आओ और अल्लाह के सिवा अपने समर्थकों को भी बुला लो, यदि तुम सच्चे होफिर यदि तुमने ऐसाकिया और तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगे, तो उस आग से बचो, जिसका ईंधन मानव तथा पत्थर हैं, जो काफ़िरों के लिए तैयार की गई हैऔर (ऐ नबी!) उन लोगों को शुभ सूचना दे दो, जो ईमान लाए तथा उन्होंने अच्छे काम किए कि निःसंदेह उनके लिए ऐसे स्वर्ग हैं, जिनके नीचे से नहरें बहती हैंजब कभी उनमें से कोई फल उन्हें खाने के लिए दिया जाएगा, तो कहेंगे : यह तो वही है, जो इससे पहले हमें दिया गया था, तथा उन्हें एक-दूसरे से मिलता-जुलता फल दिया जाएगा तथा उनके लिए उनमें पवित्र पत्नियाँ होंगी और वे उनमें हमेशा रहने वाले हैं" [सूरा अल-बक़रा : 21-25]

इतनी संख्या में रसूल क्यों आए?

अल्लाह ने सभी समुदायों की ओर अपने रसूल भेजेएक भी समुदाय ऐसा नहीं है, जिसकी ओर अपनी इबादत की तरफ़ बुलाने और अपने आदेश एवं निषेध पहुँचाने के लिए कोई रसूलभेजा होतमाम रसूलों के आह्वान का सार थाः एक र्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की इबादतजब भी किसी समुदाय ने अपने रसूल की शिक्षा को छोड़ना या उसे बिगाड़ना शुरू किया, अल्लाह ने सुधार तथा एकेश्वरवाद एवं अनुसरण पर लोगों को उनकी सही फितरत की ओर लौटाने के लिए दूसरा रसूल भेज दिया

इस सिलसिले का अंत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम पर किया, जो एक संपूर्ण दीन और क़यामत के दिन तक के तमाम लोगों के लिए एक शास्वत और पहले की तमाम शरीतों के लिए पूरक एवं उनको निरस्त करने वाली शरी लेकर आए, जिसे क़यामत के दिन तक निरंतर रूप से बाक़ी रखने की गारंटी अल्लाह तआला ने दी है

कोई व्यक्ति सभी रसूलों पर ईमान लाए बिना मोमिन नहीं हो सकता

अल्लाह वह है, जिसने रसूल भेजे और तमाम सृष्टियों को उनका अनुसरण करने का आदेश दियाजिसने किसी एक रसूल का इनकार किया, उसने दरअसल सभी रसूलों का इनकार कियाक्योंकि इससे बड़ा गुनाह कुछ और नहीं हो सकता कि इन्सान अल्लाह की वह्य को ठुकराएइस तरह जन्नत में प्रवेश पाने के लिए तमाम रसूलों पर ईमान रखना ज़रूरी है

अतः आज हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से अल्लाह, उसके तमाम रसूलों और आख़िरत के दिन पर ईमान रखना चाहिए, जिसके लिए अल्लाह के अंतिम रसूल पर ईमान रखना और उनकी शिक्षाओं पर अमल करना ज़रूरी है, जिनको एक शास्वत चमत्कार क़ुरआन दिया गया था, जिसे सुरक्षित रखने की ज़िम्मेवारी ख़ुद अल्लाह ने ले रखी है

अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में बताया है कि जिसने किसी भी रसूल पर ईमान लाने से इनकार किया, वह अल्लाह के प्रति अविश्वास व्यक्त करने वाला और उसकी वह्य को झुठलाने वाला हैउच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡفُرُونَ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيُرِيدُونَ أَن يُفَرِّقُواْ بَيۡنَ ٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيَقُولُونَ نُؤۡمِنُ بِبَعۡضٖ وَنَكۡفُرُ بِبَعۡضٖ وَيُرِيدُونَ أَن يَتَّخِذُواْ بَيۡنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا ١٥٠ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡكَٰفِرُونَ حَقّٗاۚ وَأَعۡتَدۡنَا لِلۡكَٰفِرِينَ عَذَابٗا مُّهِينٗا151﴾

"निःसंदेह जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों के साथ कुफ़्र करते हैं और चाहते हैं कि अल्लाह तथा उसके रसूलों के बीच अंतर करें तथा कहते हैं कि हम कुछ पर ईमान रखते हैं और कुछ का इनकार करते हैं और चाहते हैं कि इसके बीच कोई राह अपनाएँयही लोग वास्तविक काफ़िर हैं और हमने काफ़िरों के लिए अपमानकारी यातना तैयार कर रखी है" [सूरा अल-निसा : 150-151]

इसलिए हम मुसलमान अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए उसपर ईमान रखते हैं, आख़िरत के दिन पर विश्वास रखते हैं, तमाम रसूलों पर विश्वास रखते हैं और पिछले ग्रंथों पर विश्वास रखते हैंउच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّن رُّسُلِهِۦۚ وَقَالُواْ سَمِعۡنَا وَأَطَعۡنَاۖ غُفۡرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيۡكَ ٱلۡمَصِيرُ285﴾

"रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनकी तरफ़ उनके पालनहार की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले भीहर एक अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी पुस्तकों और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (वे कहते हैं) हम उसके रसूलों में से किसी एक के बीच अंतर नहीं करतेऔर उन्होंने कहा हमने सुना और हमने आज्ञापालन कियाहम तेरी क्षमा चाहते हैंहमारे पालनहार! और तेरी ही ओर लौटकर जाना है" [सूरा अल-बक़रा : 285]

पवित्र क़ुरआन क्या है?

क़ुरआन सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की वाणी और उसकी वह्य है, जिसे उसने अपने अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम पर उतारा थाक़ुरआन दरअसल अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम के सच्चे नबी होने को प्रमाणित करने वाला सबसे बड़ा चमत्कार है और उसके सारे विधि-विधान उचित तथा उसकी प्रदान की हुई सारी सूचनाएँ सच्ची हैं

अल्लाह ने झुठलाने वालों को इसके समान एक सूरा ही प्रस्तुत करने की चुनौती दी, लेकिन उसका विषय-वस्तु इतना महान एवं इतना व्यापक है कि वे ऐसा करने में असमर्थ रहेइसके अंदर ईमान से जुड़ी हुई वह सारी बातें बयान कर दी गई हैं, जिनपर विश्वास रखना ज़रूरी है

इसी तरह इसके अंदर वह सारे आदेश एवं निषेध भी दे दिए गए हैं, जिनका पालन एक व्यक्ति को अपने तथा अपने पालनहार के बीच, अपने तथा अपने नफ़्स के बीच या फिर अपने तथा सारी सृष्टियों के बीच करना चाहिएवो भी बड़े ही स्पष्ट एवं प्रभावी अंदाज़ में

इसमें बहुत सारे तर्कसंगत सबूत तथा वैज्ञानिक तथ्य मौजूद हैं, जो यह बताती हैं कि यह पुस्तक मनुष्य द्वारा नहीं बनाई जा सकतीयह तो मानव जाति के पवित्र एवं उच्च पालनहार की वाणी है

इस्लाम क्या है?

इस्लाम नाम है, एकेश्वरवाद के माध्यम से सर्वशक्तिमान अल्लाह के प्रति समर्पण, आज्ञाकारिता के माध्यम से उसके आगे सिर झुकाने, सहमति एवं स्वीकृति के साथ उसकी शरी का पालन करने और उसके सिवा पूजी जाने वाली तमाम चीज़ों का इनकार करने का

अल्लाह ने तमाम रसूलों को एक ही संदेश के साथ भेजावह संदेश हैः किसी को साझी बनाए बिना बस एक अल्लाह की इबादत और उसके अतिरिक्त पूजी जाने वाली तमाम चीज़ों के इनकार का आह्वान

इस्लाम तमाम नबियों का दीन हैउनका आह्वान एक है और शरीयतें अलग-अलगआज केवल मुसलमान ही तमाम नबियों के लाए हुए सही धर्म का पालन करते हैंइस्लाम का संदेश ही सच्चा संदेश हैयही सृष्टिकर्ता की ओर से मानव जाति को मिलने वाला अंतिम संदेश है

जिस पालनहार ने इब्राहीम, मूसा और ईसा अलैहिमुस्सलाम को भेजा था, उसी ने अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम को भेजाइस्लामी शरी पिछली सभी शरीतों को निरस्त करने वाली शरी के तौर पर आई

आज लोग इस्लाम के अतिरिक्त जितने भी धर्मों का पालन करते हैं, सब या तो मानव निर्मित धर्म हैं या फिर आकाशीय धर्म थे, लेकिन इन्सानी हाथों का खिलौना बन गए, जिसके कारण पाखंडों का ढेर और किंदवंतियों एवं मानवीय प्रयासों का मिश्रण हो गए

जबकि मुसलमानों का धर्म परिवर्तनों से सुरक्षित एक स्पष्ट धर्म हैइसी तरह अल्लाह की इबादत के तौर पर उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य भी एक हैंसारे मुसलमान पाँच समय की नमाज़ पढ़ते हैं, अपने धन की ज़कात देते हैं और रमज़ान महीने के रोज़े रखते हैंज़रा उनके संविधान पवित्र क़ुरआन पर ग़ौर करें, दुनिया के तमाम देशों में वह एक ही किताब हैउच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗاۚ فَمَنِ ٱضۡطُرَّ فِي مَخۡمَصَةٍ غَيۡرَ مُتَجَانِفٖ لِّإِثۡمٖ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ﴾

"आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लियाफिर जो व्यक्ति भूख की किसी सूरत में मजूबर कर दिया जाए, इस हाल में कि किसी पाप की ओर झुकाव रखने वालाहो, तो निःसंदेह अल्लाह अति क्षमाशील, अत्यंत दयावान् है" [सूरा अल-माइदा : 3]

तथा उच्च एवं महान अल्लाह ने क़ुरआन में कहा है :

﴿قُلۡ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ عَلَيۡنَا وَمَآ أُنزِلَ عَلَىٰٓ إِبۡرَٰهِيمَ وَإِسۡمَٰعِيلَ وَإِسۡحَٰقَ وَيَعۡقُوبَ وَٱلۡأَسۡبَاطِ وَمَآ أُوتِيَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَٱلنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمۡ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّنۡهُمۡ وَنَحۡنُ لَهُۥ مُسۡلِمُونَ٨٤ وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡهُ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ85﴾

"(ऐ रसूल!) कह दो : हम अल्लाह पर ईमान लाए और उसपर जो हमपर उतारा गया, और जो इब्राहीम, इस्माईल, इस्ह़ाक़, याक़ूब तथा उनकी संतान पर उतारा गया, और जो मूसा तथा ईसा और दूसरे नबियों को उनके पालनहार की ओर से दिया गया, हम इनमें से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते और हम उसी (अल्लाह) के आज्ञाकारी हैंऔर जो इस्लाम के अलावा कोई और धर्म तलाश करे, तो वह उससे हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा" [सूरा आल-ए-इमरान : 84-85]

इस्लाम धर्म दरअसल एक संपूर्ण जीवन विधान है, जो मानव स्वभाव एवं तर्क के अनुरूप है और जिसे स्वच्छ आत्माएँ सहर्ष स्वीकार करती हैंइस विशाल विधान को महान सृष्टिकर्ता ने अपनी सृष्टि के लिए तैयार किया हैयह तमाम लोगों को दुनिया एवं आख़िरत में ख़ुशी प्रदान करने वाला धर्म हैइसमें नस्ल एवं रंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हैइसकी नज़र में सारे लोग बराबर हैंइसमें किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति पर उतनी ही प्रतिष्ठा प्राप्त है, जितनी उसके पास सत्कर्म की पूंजी हो

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है:

﴿مَنۡ عَمِلَ صَٰلِحٗا مِّن ذَكَرٍ أَوۡ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤۡمِنٞ فَلَنُحۡيِيَنَّهُۥ حَيَوٰةٗ طَيِّبَةٗۖ وَلَنَجۡزِيَنَّهُمۡ أَجۡرَهُم بِأَحۡسَنِ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ97﴾

"जो भी अच्छा कार्य करे, नर हो अथवा नारी, जबकि वह ईमान वाला हो, तो हम उसे अच्छा जीवन व्यतीत कराएँगेऔर निश्चय हम उन्हें उनका बदला उन उत्तम कार्यों के अनुसार प्रदान करेंगे जो वे किया करते थे" [सूरा अल- नह्ल: 97]

इस्लाम ख़ुशियों का मार्ग है

इस्लाम तमाम नबियों का धर्म है और तमाम लोगों के लिए अल्लाह का धर्म हैयह केवल अरबों का धर्म नहीं है

इस्लाम इस दुनिया की सच्ची ख़ुशी और आख़िरत के शास्वत आनंद का मार्ग है

इस्लाम एकमात्र ऐसा धर्म है, जो आत्मा और शरीर की जरूरतों को पूरा करता है और सभी मानवीय समस्याओं का समाधान करता हैउच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿قَالَ ٱهۡبِطَا مِنۡهَا جَمِيعَۢاۖ بَعۡضُكُمۡ لِبَعۡضٍ عَدُوّٞۖ فَإِمَّا يَأۡتِيَنَّكُم مِّنِّي هُدٗى فَمَنِ ٱتَّبَعَ هُدَايَ فَلَا يَضِلُّ وَلَا يَشۡقَىٰ 123 وَمَنۡ أَعۡرَضَ عَن ذِكۡرِي فَإِنَّ لَهُۥ مَعِيشَةٗ ضَنكٗا وَنَحۡشُرُهُۥ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ أَعۡمَىٰ124﴾

"(अल्लाह ने) फरमाया : तुम दोनों यहाँ से एक साथ उतर जाओ, तुम एक-दूसरे के शत्रु होफिर अगर कभी मेरी ओर से तुम्हारे पास कोई हिदायत आए, तो जो कोई मेरी हिदायत पर चला, तोवह भटकेगा औरमुसीबत में पड़ेगातथा जिसने मेरी नसीहत से मुँह फेरा, तो निःसंदेह उसके लिए तंग जीवन है और हम उसे क़ियामत के दिन अंधा करके उठाएँगे" [सूरा ताहा : 123-124]

लोक एवं परलोक में मुसलमान को क्या लाभ प्राप्त होता है?

इस्लाम के बड़े लाभ हैं, जैसे :

- दुनिया में यह कामयाबी और सम्मान कि इन्सान अल्लाह का बंदा होकर जीवन व्यतीत करेअगर ऐसाहो, तो वह हवा-ए-नफ़्स (अपने मन), शैतान और आकांक्षाओं का बंदा बनकर रह जाए

- आख़िरत में यह सफलता कि अल्लाह की क्षमा एवं उसकी प्रसन्नता प्राप्त होती है, अल्लाह उसे जन्नत एवं उसकी कभी ख़त्महोने वाली नेमतें प्रदान करता है और वह जहन्नम की यातना से छुटकारा प्राप्त कर लेता है

- ईमान वालों को क़यामत के दिन नबियों, सिद्दीक़ों (सत्यवादियों), शहीदों और अल्लाह के नेक बंदों के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त होगाक्या ही बेहतरीन संगति है यह! जबकि अल्लाह पर विश्वासरखने वाले लोग अत्याचारियों, बुरे लोगों, अपराधियों एवं बिगाड़ पैदा करने वालों के साथ होंगे

- जो लोग जन्नत जाने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे, वे हमेशा बाक़ी रहने वाली नेमतों में होंगे। न मौत, न बीमारी, न बुढ़ापा, न दुःख औरचिंता होगीउनकी हर इच्छा पूरी होगीजबकि जहन्नम जाने वाले हमेशा रहने वाले अज़ाब में पड़े रहेंगे, जो कभी ख़त्महोगी

- जन्नत में ऐसी-ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हेंकिसी आँख ने देखा है, न उनके बारे में किसी कान ने सुना है औरउनकी कल्पना किसी इन्सान के दिल ने की हैइसका एक प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है :

﴿مَنۡ عَمِلَ صَٰلِحٗا مِّن ذَكَرٍ أَوۡ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤۡمِنٞ فَلَنُحۡيِيَنَّهُۥ حَيَوٰةٗ طَيِّبَةٗۖ وَلَنَجۡزِيَنَّهُمۡ أَجۡرَهُم بِأَحۡسَنِ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ97﴾

"जो भी अच्छा कार्य करे, नर हो अथवा नारी, जबकि वह ईमान वाला हो, तो हम उसे अच्छा जीवन व्यतीत कराएँगेऔर निश्चय हम उन्हें उनका बदला उन उत्तम कार्यों के अनुसार प्रदान करेंगे जो वे किया करते थे" [सूरा अन-नह्ल: 97]।

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः

﴿فَلَا تَعۡلَمُ نَفۡسٞ مَّآ أُخۡفِيَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعۡيُنٖ جَزَآءَۢ بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ17﴾

"तो कोई प्राणी नहीं जानता कि उनके लिए आँखों की ठंढक में से क्या कुछ छिपाकर रखा गया है, उसके बदले के तौर पर, जो वे (दुनिया में) किया करते थे" [सूरा अल-सजदा : 17]

ग़ैर-मुस्लिम को क्या-क्या नुक़सान होता है?

इन्सान सबसे बड़े ज्ञान से हाथ धो बैठेगाउसके पास अल्लाह के बारे में कोई जानकारी नहीं रहेगीवह अल्लाह पर ईमान की दौलत से महरूम हो जाएगाउस ईमान की दौलत से, जो इन्सान को दुनिया में सुरक्षा एवं शांति तथा आख़िरत में कभीख़त्म होने वाली नेमतें प्रदान करता है

इन्सान लोगों के लिए अल्लाह की उतारी हुई महानतम किताब पर ईमान लाने और उसका अनुसरण करने के सौभाग्य से वंचित हो जाएगा

इन्सान अल्लाह के नबियों पर ईमान और जन्नत में उनकी संगति से वंचित रह जाएगाउसे जहन्नम की आग में शैतानों, अपराधियों तथा अत्याचारियों के साथ जलना पड़ेगास्थान भी बुरा और साथी भी बुरे

अल्लाह तआला ने कहा है :

﴿قُلۡ إِنَّ ٱلۡخَٰسِرِينَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ وَأَهۡلِيهِمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۗ أَلَا ذَٰلِكَ هُوَ ٱلۡخُسۡرَانُ ٱلۡمُبِينُ 15 لَهُم مِّن فَوۡقِهِمۡ ظُلَلٞ مِّنَ ٱلنَّارِ وَمِن تَحۡتِهِمۡ ظُلَلٞۚ ذَٰلِكَ يُخَوِّفُ ٱللَّهُ بِهِۦ عِبَادَهُۥۚ يَٰعِبَادِ فَٱتَّقُونِ16﴾

"आप कह दें : निःसंदेह वास्तविक घाटे में पड़ने वाले तो वे हैं, जिन्होंने क़ियामत के दिन खुद को तथा अपने घर वालों को घाटे में डालासुन लो! यही खुला घाटा हैउनके लिए उनके ऊपर से आग के छत्र होंगे तथा उनके नीचे से भी छत्र होंगेयही वह चीज़ है, जिससे अल्लाह अपने बंदों को डराता है। ऐ मेरे बंदो! अतः तुम मुझसे डरो" [सूरा अल-ज़ुमर : 15-16]

जिसे आख़िरत में मुक्ति चाहिए, वह अल्लाह के प्रति आज्ञाकारी मुसलमान बने और अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम का अनुसरण करे

तमाम नबी तथा रसूल इस तथ्य पर एकमत हैं कि आख़िरत में केवल मुसलमानों को ही मुक्ति मिलेगी, जो अल्लाह पर ईमान रखते हैं, किसी को उसका साझी नहीं बनाते और तमाम नबियों एवं रसूलों पर विश्वास रखते हैंरसूलों के सारे अनुयायी और उनपर विश्वास रखने वाले तथा उनको सच्चा मानने वाले सारे लोग जन्नत में प्रवेश पाएँगे तथा जहन्नम से मुक्ति प्राप्त करेंगे

अतः जो लोग अल्लाह के नबी मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने में रहे, उनपर ईमान लाए और उनकी शिक्षाओं पर अमल किया, वो सच्चे मोमिनमुसलमान थेलेकिन जब अल्लाह ने ईसा अलैहिस्सलाम को भेज दिया, तो मूसा अलैहिस्सलाम का अनुसरण करने वालों पर ईसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लाना और उनका अनुसरण करना अनिवार्य हो गया

ऐसे में, जो लोग ईसा अलैहिस्सलाम पर ईमान ले आए, वे सच्चे मुसलमान हैंइसके विपरीत जिन्होंने ईसा अलैहिस्सलाम को ठुकरा दिया और मूसा अलैहिस्सलाम के दीन पर क़ायम रहने की ज़िद पर अड़े रहे, वे मोमिन नहीं हैंक्योंकि उन्होंने अल्लाह के भेजे हुए एक रसूल पर ईमान लाने से मना कर दिया

फिर जब अल्लाह ने अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम को भेज दिया, तो तमाम लोगों के लिए आप पर ईमान लाना अनिवार्य हो गयाक्योंकि जिस पालनहार ने मूसा एवं ईसा अलैहिस्सलाम को भेजा था, उसी ने अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम को भेजा हैइसलिए जिसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम के आह्वान को ठुकराया और मूसा अलैहिस्सलाम या ईसा अलैहिस्सलाम के अनुसरण पर क़ायम रहने की ज़िद की, वह मोमिन नहीं हो सकता

किसी व्यक्ति का यह कहना काफ़ी नहीं है कि वह मुसलमानों का सम्मान करता हैआख़िरत में मुक्ति प्राप्त करने के लिए सदक़ा करना और ग़रीबों की मदद करना भी काफ़ी नहीं हैइसके लिए अल्लाह, उसकी किताबों, उसके रसूलों और आख़िरत के दिन पर ईमान ज़रूरी हैक्योंकि शिर्क, अल्लाह के इनकार, उसकी उतारी हुई वह्य को ठुकराने और अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम की नुबुव्वत की अवहेलना से बड़ा कोई गुनाह नहीं है

अतः जिन यहूदियों, ईसाइयों तथा अन्य धर्म के मानने वालों ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम के नबी होने की बात सुनी और आप पर ईमान लाने तथा इस्लाम धर्म को ग्रहण करने से इनकार कर दिया, उनको जहन्नम जाना पड़ेगा और वहाँ वो हमेशा रहेंगेयह अल्लाह का निर्णय हैकिसी इन्सान का निर्णय नहींउच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ وَٱلۡمُشۡرِكِينَ فِي نَارِ جَهَنَّمَ خَٰلِدِينَ فِيهَآۚ أُوْلَٰٓئِكَ هُمۡ شَرُّ ٱلۡبَرِيَّةِ6﴾

"निःसंदेह किताब वालों और मुश्रिकों में से जो लोग काफ़िर हो गए, वे सदा जहन्नम की आग में रहने वाले हैं, वही लोग सबसे बुरे प्राणी हैं" [सूरा अल-बय्यिना : 6]

चूँकि मानव समाज की ओर अल्लाह का अंतिम संदेश उतर चुका है, इसलिए इस्लाम तथा अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिसल्लम की नुबुव्वत की ख़बर पाने वाले हर व्यक्ति के लिए आप पर ईमान लाना, आपकी शरी का पालन करना और आपके आदेशों एवं निषेधों का पालन करना वाजिब हैइस लिए जिसने इस अंतिम संदेश के बारे में सुना और इसे ठुकरा दिया, अल्लाह उसकी ओर से कुछ भी ग्रहण नहीं करेगा और उसे आख़िरत में यातनाग्रस्त करेगा

इसका एक प्रमाण अल्लाह तआला का यह कथन है :

﴿‌وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡهُ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ85﴾

"और जो इस्लाम के अलावा कोई और धर्म तलाश करे, तो वह उससे हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा" [सूरा आल-ए-इमरान: 85]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः

﴿قُلۡ يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ تَعَالَوۡاْ إِلَىٰ كَلِمَةٖ سَوَآءِۭ بَيۡنَنَا وَبَيۡنَكُمۡ أَلَّا نَعۡبُدَ إِلَّا ٱللَّهَ وَلَا نُشۡرِكَ بِهِۦ شَيۡـٔٗا وَلَا يَتَّخِذَ بَعۡضُنَا بَعۡضًا أَرۡبَابٗا مِّن دُونِ ٱللَّهِۚ فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَقُولُواْ ٱشۡهَدُواْ بِأَنَّا مُسۡلِمُونَ64﴾

"(ऐ नबी!) कह दीजिए :किताब वालो! आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे बीच और तुम्हारे बीच समान (बराबर) है; यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादतकरें और उसके साथ किसी चीज़ को साझीबनाएँ तथा हममें से कोई किसी को अल्लाह के सिवा रबबनाएफिर यदि वे मुँह फेर लें, तो कह दो कि तुम गवाह रहो कि हम (अल्लाह के) आज्ञाकारी हैं" [सूरा आल-ए-इमरान : 64]

मुसलमान पर क्या अनिवार्य है?

मुसलमान के लिए इन छह स्तंभों पर ईमान लाना अनिवार्य है :

अल्लाह तआला पर तथा इस बात पर विश्वास रखना कि वह सृष्टिकर्ता, आजीविकादाता, संचालनकर्ता और मालिक हैउसके जैसी कोई चीज़ नहीं हैउसकीपत्नी है, न संतानवही इबादत का हक़दार हैउसके साथ किसी और की इबादत नहीं की जा सकतीसाथ ही इस बात का विश्वास रखना कि अल्लाह के अतिरिक्त जिन चीज़ों की इबादत की जाती है, उनकी इबादत अनुचित है

इस बात पर ईमान कि फ़रिश्ते अल्लाह के बंदे हैं, अल्लाह ने उनको नूर से पैदा किया है और उनको एक काम यह दिया है कि वे नबियों के पास वह्य लेकर आया करते थे

नबियों पर अल्लाह की ओर से उतरने वाली तमाम किताबों (जैसे तौरात एवं इंजील -उनके साथ छेड़-छाड़ होने से पहले तक-) और अंतिम किताब पवित्र क़ुरआन पर विश्वास

तमाम रसूलों, जैसे नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा तथा अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिम सल्लम पर ईमान रखना और इस बात का विश्वास रखना कि वे इन्सान थे, उनपर अल्लाह ने वह्य उतारी थी और ऐसी निशानियाँ तथा चमत्कार दिए थे, जो उनके सच्चे नबी होने को प्रमाणित करते थे

आख़िरत के दिन पर ईमान, जब अल्लाह अगले तथा पिछले तमाम लोगों को जीवित करके दोबारा उठाएगा, अपनी सृष्टियों के दरमियान निर्णय करेगा और विश्वास रखने वालों को जन्नत तथा विश्वासरखने वालों को जहन्नम में दाख़िल करेगा

तक़दीर पर ईमान तथा इस बात पर विश्वास कि अल्लाह सब कुछ जानता है, उन बातों को भी जो अब तक हो चुकी हैं और उन बातों को भी जो आगे होंगीअल्लाह ने इन्हें लिख भी रखा हैइस संसार में जो कुछ भी होता है, उसकी मर्ज़ी से होता है और वही हर चीज़ का रचयिता है

अल्लाह ने जिन इबादतों का आदेश दिया है, उन इबादतों को अंजाम दें -जैसे नमाज़, ज़कात, रोज़ा और सामर्थ्य होने पर हज्ज- फिर उन पर लाज़िम है कि अपना दीन सीखें, जो दुनिया में उन के सौभाग्य का स्रोत एवं आख़िरत में उन की मुक्ति का कारण होगा

 

 

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सूची

 

महान पालनहा रचयिता 4

यह पालनहार, रचयिता और आजीविकादाता पवित्र एवं महान अल्लाह है। 4

पालनहार एवं रचयिता के गुण 6

पूज्य पालनहार अपने सभी गुणों में परिपूर्ण है 7

महान सृष्टिकर्ता ने हमें क्यों पैदा किया? वह हमसे क्या चाहता है? 10

इतनी संख्या में रसूल क्यों आए? 13

कोई व्यक्ति सभी रसूलों पर ईमान लाए बिना मोमिन नहीं हो सकता 14

पवित्र क़ुरआन क्या है? 16

इस्लाम क्या है? 17

इस्लाम ख़ुशियों का मार्ग है 19

लोक एवं परलोक में मुसलमान को क्या लाभ प्राप्त होता है? 20

ग़ैर-मुस्लिम को क्या-क्या नुक़सान होता है? 22

जिसे आख़िरत में मुक्ति चाहिए, वह अल्लाह के प्रति आज्ञाकारी मुसलमान बने और अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि सल्लम का अनुसरण करे 23

मुसलमान पर क्या अनिवार्य है? 26

 

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