शुद्ध अक़ीदा और उसके विरुद्ध चीज़ें (हिन्दी)

शुद्ध अक़ीदा और उसके विरुद्ध चीज़ें

  • earth भाषा
    (हिन्दी)
  • earth लेखक:
    الشيخ عبد العزيز بن عبد الله بن باز
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العَقِيدَةُ الصَّحِيْحَةُ وَمَا يُضَادُّهَا

 

 

शुद्ध अक़ीदा और उसके विरुद्ध चीज़ें

 

 

لِسَمَاحَةِ الشَّيْخِ العَلَّامَةِ

عَبْدِ العَزِيزِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ بَازٍ

رَحِمَهُ اللهُ

 

 

लेखक आदरणीय शैख़

अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़

 

 

 


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ

पहली पुस्तिका

शुद्ध अक़ीदा और उसके विरुद्ध चीज़ें

लेखक आदरणीय शैख़

अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़

सारी प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए है, तथा अल्लाह की दया और शांति अवतरित हो अल्लाह के अंतिम संदेष्टा पर, तथा उनके परिजनों और साथियों पर।

अल्लाह की प्रशंसा एवं दरूद व सलाम के बाद असल विषय-वस्तु पर आते हैं। चूँकि विशुद्ध अक़ीदा ही इस्लाम धर्म का मूल आधार है, इसलिए मुझे इस विषय पर बात करना तथा इसे स्पष्ट करने के लिए लिखना आवश्यक लगा।

कुरआन व हदीस के अनगिनत प्रमाणों के आधार पर यह बात सर्वविदित है कि इनसान के कथन एवं कार्य उसी समय सही तथा ग्रहणयोग्य हो सकते हैं, जब उन्हें सहीह अक़ीदे के साथ किया जाए। यदि अक़ीदा सही न हो, तो उसके आधार पर होने वाले कार्य एवं कथन व्यर्थ हो जाते हैं। इसी बात को स्पष्ट करते हुए अल्लाह तआला ने कहा है :

﴿...وَمَن يَكۡفُرۡ بِٱلۡإِيمَٰنِ فَقَدۡ حَبِطَ عَمَلُهُۥ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ﴾

और जो ईमान से इनकार करे, तो निश्चय उसका कर्म व्यर्थ हो गया तथा वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से है। [सूरा अल-माइदा : 5]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः

﴿وَلَقَدۡ أُوحِيَ إِلَيۡكَ وَإِلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكَ لَئِنۡ أَشۡرَكۡتَ لَيَحۡبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ 65﴾

और निःसंदेह तुम्हारी ओर एवं तुमसे पहले के नबियों की ओर वह़्य की गई है कि यदि तुमने शिर्क किया, तो निश्चय तुम्हारा कर्म अवश्य नष्ट हो जाएगा और तुम निश्चित रूप से हानि उठाने वालों में से हो जाओगे। [सूरा अल-ज़ुमर : 65]

क़ुरआन के अंदर इस आशय की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अल्लाह की स्पष्टवादी पुस्तक और उसके विश्वसनीय संदेष्टा -उनके ऊपर उनके रब की ओर से सर्वश्रेष्ठ दरूद व सलाम हो- की सुन्नत से पता चलता है कि शुद्ध अक़ीदे का सारांश है : अल्लाह, उसके फ़रिशतों, उसकी किताबों, उसके संदेष्टाओं, आख़िरत के दिन तथा भली-बुरी तक़दीर पर विश्वास रखना। यही छह चीज़ें उस शुद्ध अक़ीदा के मूल सिद्धांत हैं, जिसके साथ अल्लाह की किताब अवतरित हुई है तथा जिसके साथ अल्लाह ने अपने संदेष्टा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भेजा है।

इन छह सिद्धांतों की सिद्धि के लिए क़ुरआन एवं हदीस के अंदर बहुत-से प्रमाण मौजूद हैं। उदाहरण-स्वरुप कुछ प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं :

1- क़ुरआन से प्रमाण; जैसे, सर्वशक्तिमान अल्लाह का कथन है :

﴿لَّيۡسَ ٱلۡبِرَّ أَن تُوَلُّواْ وُجُوهَكُمۡ قِبَلَ ٱلۡمَشۡرِقِ وَٱلۡمَغۡرِبِ وَلَٰكِنَّ ٱلۡبِرَّ مَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ وَٱلۡكِتَٰبِ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ...﴾

नेकी केवल यही नहीं कि तुम अपने मुँह पूर्व और पश्चिम की ओर फेर लो! बल्कि असल नेकी तो उसकी है, जो अल्लाह और अंतिम दिन (आख़िरत) और फ़रिश्तों और पुस्तकों और नबियों पर ईमान लाए... [सूरा अल-बक़रा : 177]

एक अन्य स्थान में उसने कहा है :

﴿ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّن رُّسُلِهِ...﴾

रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनकी तरफ़ उनके पालनहार की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले भी। हर एक अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी पुस्तकों और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (वे कहते हैं) हम उसके रसूलों में से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते। [सूरा अल-बक़रा : 285]

एक और स्थान पर पवित्र अल्लाह कहता है :

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ ءَامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَٱلۡكِتَٰبِ ٱلَّذِي نَزَّلَ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَٱلۡكِتَٰبِ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ مِن قَبۡلُۚ وَمَن يَكۡفُرۡ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ فَقَدۡ ضَلَّ ضَلَٰلَۢا بَعِيدًا136﴾

ऐ ईमान वालो! अल्लाह, उसके रसूल और उस पुस्तक पर ईमान लाओ जो अल्लाह ने अपने रसूल (मुहम्मद) पर उतारी और उस किताब पर भी जो उसने इससे पहले उतारी। और जो व्यक्ति अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी पुस्तकों और अंतिम दिवस (परलोक) का इनकार करे, वह निश्चय बहुत दूर की गुमराही में जा पड़ा। [सूरा अल-निसा : 136]

एक और स्थान पर पवित्र अल्लाह कहता है :

﴿أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِۚ إِنَّ ذَٰلِكَ فِي كِتَٰبٍۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ 70﴾

(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह जानता है, जो आकाश तथा धरती में है? निःसंदेह यह एक किताब में (अंकित) है। निःसंदेह यह अल्लाह के लिए अति सरल है। [सूरा हज्ज : 70]

2- सुन्नत से प्रमाण; इनमें वह सुप्रसिद्ध सहीह हदीस भी शामिल है, जिसका वर्णन इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में अमीरुल मोमिनीन उमर बिन खत्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- से किया है। उमर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि जिब्रील -अलैहिस्सलाम- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से ईमान के बारे में पूछा, तो आपने उत्तर दिया :

«الإِيمَانُ أَنْ تُؤْمِنَ بِاللَّهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكُتُبِهِ، وَرُسُلِهِ، وَاليَوْمِ الآخِرِ، وَتُؤْمِنَ بِالقَدَرِ خَيْرِهِ وَشَرِّهِ».

ईमान यह है कि तुम अल्लाह, उसके फरिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, अंतिम दिन तथा अच्छे एवं बुरे भाग्य पर ईमान लाओ।"1 पूरी हदीस देखें। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने मामूली अंतर के साथ अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत किया है।

इन छह मूल सिद्धांतों से ही पवित्र एवं महान अल्लाह की हस्ती, आख़िरत तथा इसके अतिरिक्त अन्य सभी परोक्ष संबंधित विषय निकलते हैं, जिनपर विश्वास रखना ज़रूरी है, और जिनके बारे में सर्वशक्तिमान अल्लाह तथा उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है।

इन छह सिद्धांतों का विवरण इस प्रकार है :

पहला सिद्धांत : अल्लाह तआला पर ईमान लाना।

इसके अंदर कुछ चीज़ें शामिल हैं : जैसे : इस बात पर ईमान कि अल्लाह ही वास्तविक पूज्य एवं वंदनीय है, और उसके अतिरिक्त कोई वंदना का हक़दार नहीं है। क्योंकि वही बंदों का स्रष्टा, उनके ऊपर उपकार करने वाला, उनको जीविका प्रदान करने वाला, उनकी खुली तथा छिपी बातों को जानने वाला तथा आज्ञाकारियों को प्रतिफल प्रदान करने और अवज्ञाकारियों को दंड देने की क्षमता रखने वाला है।

इसी इबादत के लिए अल्लाह ने जिन्न एवं इनसान को पैदा फ़रमाया और इसी का उनको आदेश दिया है। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :

﴿وَمَا خَلَقۡتُ ٱلۡجِنَّ وَٱلۡإِنسَ إِلَّا لِيَعۡبُدُونِ 56 مَآ أُرِيدُ مِنۡهُم مِّن رِّزۡقٖ وَمَآ أُرِيدُ أَن يُطۡعِمُونِ 57 إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلرَّزَّاقُ ذُو ٱلۡقُوَّةِ ٱلۡمَتِينُ58﴾

और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।

मैं उनसे कोई रोज़ी नहीं चाहता और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ।

निःसंदेह अल्लाह ही बहुत रोज़ी देनेवाला, बड़ा शक्तिशाली, अत्यंत मज़बूत है। [सूरा अल-ज़ारियात : 56-58]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱعۡبُدُواْ رَبَّكُمُ ٱلَّذِي خَلَقَكُمۡ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ 21 ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلۡأَرۡضَ فِرَٰشٗا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءٗ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَخۡرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزۡقٗا لَّكُمۡۖ فَلَا تَجۡعَلُواْ لِلَّهِ أَندَادٗا وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ 22﴾

ऐ लोगो! अपने उस पालनहार की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ।

जिसने तुम्हारे लिए धरती को एक बिछौना तथा आकाश को एक छत बनाया और आकाश से कुछ पानी उतारा, फिर उससे कई प्रकार के फल तुम्हारी जीविका के लिए पैदा किए। अतः अल्लाह के लिए किसी प्रकार के साझी न बनाओ, जबकि तुम जानते हो। [सूरा अल-बक़रा : 21-22]

इसी सत्य को बयान करने, इसी की ओर लोगों को बुलाने और इसके विरुद्ध चीज़ों से सावधान करने के लिए अल्लाह ने रसूलों को भेजा और किताबें उतारी हैं। स्वयं अल्लाह तआला ने कहा है :

﴿وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَ...﴾

और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो... [सूरा अल-नह्ल : 36]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः

﴿وَمَآ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِيٓ إِلَيۡهِ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱعۡبُدُونِ 25﴾

और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते थे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत करो। [सूरा अल-अंबिया : 25]।

एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :

﴿الر كِتَابٌ أُحْكِمَتْ آيَاتُهُ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِنْ لَدُنْ حَكِيمٍ خَبِيرٍ1 أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ إِنَّنِي لَكُمْ مِنْهُ نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ2﴾

अलिफ, लाम, रा। यह एक पुस्तक है, जिसकी आयतें सुदृढ़ की गईं, फिर उन्हें सविस्तार स्पष्ट किया गया एक पूर्ण हिकमत वाले की ओर से जो पूरी ख़बर रखने वाला है।

यह कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो। निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए उसकी ओर से एक डराने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ। [सूरा हूद : 1-2]

इस इबादत (उपासना) का वास्तविक अर्थ यह है कि बंदे दुआ, भय, आशा, नमाज़, रोज़ा, क़ुर्बानी और मन्नत आदि हर प्रकार की इबादतें विशुद्ध रूप से अल्लाह के लिए, उसके आगे विनम्रता प्रदर्शित करते हुए, अपने दिल में उसकी चाहत एवं भय रखते हुए, उससे संपूर्ण प्रेम एवं उसकी महानता के आगे अपनी हीनता का प्रदर्शन करते हुए करें।

पवित्र क़ुरआन को ध्यान से पढ़ने वाला हर व्यक्ति पाएगा कि उसका अधिकांश भाग इसी विशाल सिद्धांत की व्याख्या करता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है :

﴿إِنَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ فَاعْبُدِ اللَّهَ مُخْلِصًا لَهُ الدِّينَ2 أَلَا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ3﴾

निःसंदेह हमने आपकी ओर यह पुस्तक सत्य के साथ उतारी है। अतः आप अल्लाह की इबादत इस तरह करें कि धर्म को उसी के लिए खालिस करने वाले हों। अतः आप अल्लाह की इबादत इस तरह करें कि धर्म को उसी के लिए खालिस करने वाले हों।

सुन लो! ख़ालिस (विशुद्ध) धर्म केवल अल्लाह ही के लिए है। तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें। निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो। [सूरा अल-ज़ुमर : 2-3].

इसी प्रकार अल्लाह तआला फ़रमाता है :

﴿وَقَضَىٰ رَبُّكَ أَلَّا تَعۡبُدُوٓاْ إِلَّآ إِيَّاهُ...﴾

और (ऐ बंदे) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो... [सूरा अल-इसरा : 23]

इसी तरह उसका कथन है :

﴿فَٱدۡعُواْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡكَٰفِرُونَ14﴾

अतः तुम अल्लाह को, उसके लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए पुकारो, यद्यपि काफ़िरों को बुरा लगे। [सूरा ग़ाफ़िर : 14]

इसी तरह सुन्नत-ए-नबवी को ग़ौर से देखने पर भी मिलेगा कि इस सिद्धांत पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया गया है। सहीह बुखारी एवं सहीह मुस्लिम में मुआज़ -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :

«حَقُّ اللهِ عَلَى العِبَادِ أَن يَعْبُدُوهُ وَلَا يُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا».

अल्लाह का हक बंदों के ऊपर यह है कि वे उसकी उपासना करें और उसका किसी को साझी न ठहराएँ।"2

अल्लाह पर ईमान में यह बात भी दाख़िल है कि उसके द्वारा बंदों पर फ़र्ज़ किए गए इस्लाम के पाँचों प्रत्यक्ष स्तंभों पर ईमान रखा जाए।

इस्लाम के पाँच प्रत्यक्ष स्तंभ हैं : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना, और सामर्थ्य रखने वाले पर अल्लाह के पवित्र घर काबा का हज करना; तथा पवित्र इस्लामी शरीयत में अनिवार्य की गई अन्य चीज़ें भी शामिल हैं।

इस्लाम के पाँच स्तंभों में सबसे महत्वपूर्ण और महान स्तंभ इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। इस गवाही का तक़ाज़ा यह है कि विशुद्ध रूप से केवल उसी की इबादत की जाए और उसके अतिरिक्त किसी की इबादत न की जाए। यही ला इलाहा इल्लल्लाह का वास्तविक अर्थ है। क्योंकि इस्लामी विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। इससे साबित यह हुआ कि उसके अतिरिक्त जितने भी इनसान, फ़रिश्ते एवं जिन्नात आदि पूजे जाते हैं, सब के सब असत्य पूज्य हैं और एकमात्र सत्य पूज्य केवल अल्लाह है। उसका कोई साझी एवं शरीक नहीं है। स्वयं अल्लाह तआला का फ़रमान है :

﴿ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدۡعُونَ مِن دُونِهِۦ هُوَ ٱلۡبَٰطِلُ...﴾

यह इसलिए कि अल्लाह ही सत्य है, और जिसे वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वह असत्य है... [सूरा अल-हज्ज : 62]।

हम पीछे बयान कर आए हैं कि अल्लाह तआला ने जिन्न और इनसान को इसी महान सत्य को स्थापित करने के लिए पैदा किया है, उनको इसी के अनुपालन का आदेश दिया है, इसी के प्रचार-प्रसार के लिए रसूलों को भेजा है और इसी की व्याख्या के लिए किताबें उतारी हैं। अतः बंदे को इसपर अच्छे से विचार करना चाहिए, ताकि जान सके कि आज अधिकतर मुसलमान इस मूलभूत तथ्य से किस क़दर अनभिज्ञ हैं कि वे अल्लाह के साथ अन्य की इबादत किए जा रहे हैं और उसका शुद्ध अधिकार दूसरों को दिए जा रहे हैं। अल्लाह ही मदद कर सकता है।

अल्लाह पर ईमान के अंदर इस बात पर विश्वास भी शामिल है कि अल्लाह ही संसार का रचयिता, संचालनकर्ता और अपने ज्ञान एवं सामर्थ्य के आधार पर संसारवासियों के बारे में जिस तरह का चाहे, निर्णय लेने वाला है। वही लोक तथा परलोक का स्वामी और सारे संसार का रब है। उसके अलावा कोई स्रष्टा और उसके सिवा कोई रब नहीं है। उसने बंदों के सुधार और उन्हें दुनिया एवं आख़िरत में मुक्ति का मार्ग दिखाने के लिए रसूल भेजे और किताबें उतारीं। साथ ही यह कि इन तमाम बातों में उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह तआला का फ़रमान है :

﴿ٱللَّهُ خَٰلِقُ كُلِّ شَيۡءٖۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ وَكِيلٞ 62﴾

अल्लाह ही प्रत्येक वस्तु का पैदा करने वाला है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है। [सूरा ज़ुमर : 62]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः

﴿إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٖ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِۖ يُغۡشِي ٱلَّيۡلَ ٱلنَّهَارَ يَطۡلُبُهُۥ حَثِيثٗا وَٱلشَّمۡسَ وَٱلۡقَمَرَ وَٱلنُّجُومَ مُسَخَّرَٰتِۭ بِأَمۡرِهِۦٓۗ أَلَا لَهُ ٱلۡخَلۡقُ وَٱلۡأَمۡرُۗ تَبَارَكَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ54﴾

निःसंदेह तुम्हारा पालनहार वह अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में बनाया। फिर अर्श (सिंहासन) पर बुलंद हुआ। वह रात से दिन को ढाँप देता है, जो उसके पीछे दौड़ता हुआ चला आता है। तथा सूर्य और चाँद और तारे (बनाए), इस हाल में कि वे उसके आदेश के अधीन किए हुए हैं। सुन लो! सृष्टि करना और आदेश देना उसी का काम है। बहुत बरकत वाला है अल्लाह, जो सारे संसारों का पालनहार है। [सूरा आराफ़ : 54]

अल्लाह पर ईमान के अंदर क़ुरआन में वर्णित और पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से साबित अल्लाह के अच्छे-अच्छे नामों और सर्वोच्च गुणों पर, उनसे छेड़-छाड़ किए बिना, उनका इनकार किए बिना, उनके विवरण में जाए बिना और उनका उदाहरण दिए बिना, हूबहू उसी तरह ईमान भी शामिल है, जैसे वह आए हुए हैं।

﴿...لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ﴾

उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है। [सूरा अश-शूरा : 11]

साथ ही उन नामों एवं गुणों के विशाल अर्थों पर भी ईमान लाना ज़रूरी है, जो दरअसल सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के गुण हैं और जिनसे उसे उसकी महानता एवं प्रताप के अनुसार सुशोभित करना अनिवार्य है और जिनमें से किसी भी गुण में वह अपनी सृष्टि के समान नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :

﴿فَلَا تَضۡرِبُواْ لِلَّهِ ٱلۡأَمۡثَالَۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ وَأَنتُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ74﴾

अतः अल्लाह के लिए उदाहरण (उपमा) न गढ़ो। निःसंदेह अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते। [सूरा अन-नह्ल : 74]।

अल्लाह के नामों और गुणों के बारे में यही अह्ल-ए-सुन्नत व जमात यानी अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथियों और भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वाले लोगों का अक़ीदा है। इसी अक़ीदा को इमाम अबुल हसन अशअरी ने अपनी किताब "अल-मक़ालात" में असहाब-ए-हदीस और अहल-ए-सुन्नत से नक़ल किया है, तथा इसे ही उनके अलावा अन्य मुस्लिम विद्वानों ने भी नक़ल किया है।

औज़ाई रहिमहुल्लाह कहते हैं : ज़ुहरी और मकहूल से अल्लाह के गुणों वाली आयतों के बारे में पूछा गया, तो दोनों ने कहा : "उनको उसी तरह मान लो, जैसे वे आई हुई हैं।"3

औज़ाई रहिमहुल्लाह का एक और कथन है : हम, जबकि ताबेईगण पर्याप्त संख्या में मौजूद थे, कहा करते थे कि अल्लाह अपने सिंहासन (अर्श) के ऊपर है तथा हम हदीस में वर्णित अल्लाह के गुणों पर ईमान रखते हैं।"4

वलीद बिन मुस्लिम रहिमहुल्लाह कहते हैं : मालिक, औज़ाई, लैस बिन साद और सुफ़यान सौरी से अल्लाह के गुणों वाली हदीसों के बारे में पूछा गया, तो सब ने कहा : "उन्हें उनके विवरण में जाए बिना उसी तरह मान लो, जिस तरह आई हुई हैं।"5

जब इमाम मालिक के गुरू रबीआ बिन أبو अब्दुर रहमान से "इसतिवा" यानी अल्लाह के अर्श के ऊपर होने के बारे में प्रश्न किया गया, तो उन्होंने उत्तर दिया : "इसतिवा कोई अज्ञात वस्तु नहीं है, लेकिन उसकी स्थिति का वर्णन समझ में नहीं आ सकता। संदेश अल्लाह की ओर से आता है, रसूल का काम स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है और हमारा कर्तव्य उसकी पुष्टि करना है।"6 इसी तरह जब इमाम मालिक रहिमहुल्लाह से इसके बारे में पूछा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया : इसतिवा ज्ञात है, उसकी कैफ़ियत (विवरण) अज्ञात है, उसपर ईमान लाना अनिवार्य है और उसके बारे में प्रश्न करना बिदअत है।" फिर उन्होंने पूछने वाले से कहा: "मुझे तो तुम एक बुरे आदमी जान पड़ते हो!" और उन्होंने उसे अपनी सभा से बाहर निकाल देने का आदेश दिया, और उसे बाहर निकाल दिया गया।7 यही अर्थ वाली बात मुसलमानों की माता उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा से भी रिवायत की गई है।8

इमाम अब्दुर रहमान बिन मुबारक कहते हैं : "हम अपने रब को जानते हैं कि वह अपने बनाए हुए आकाशों के ऊपर अपने अर्श (सिंहासन) के ऊपर है और अपनी सृष्टि से अलग है।"9

इस विषय में बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम विद्वानों के कथन मौजूद हैं, जिन्हें इस संबोधन में नक़ल करना संभव नहीं है। जो व्यक्ति अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता है, वह इस विषय़ में उलमा-ए-सुन्नत की लिखी हुई पुस्तकों का अध्ययन करे। उदाहरण के तौर पर अब्दुल्लाह बिन इमाम अहमद की किताब "अस-सुन्नह", महान इमाम मुहम्मद बिन खुज़ैमा की किताब "अत-तौहीद", अबुल क़ासिम अल-लालकाई अत-तबरी की किताब "अस-सुन्नह" तथा शैखुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया की ओर से हमात वासियों को दिया गया उत्तर आदि। शैख़ुल इस्लाम का यह उत्तर एक विशाल एवं अति लाभदायक उत्तर है। इसमें शैखुल इस्लाम ने अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है, बहुत-से मुस्लिम विद्वानों के कथन नक़ल किए हैं तथा अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे के पक्ष में और उनके विरोधियों के अक़ीदे के खंडन में शरई एवं अक़्ली प्रमाण प्रस्तुत किए हैं।

इसी तरह उनकी पुस्तिका "अल-तदमुरिय्यह" का भी बड़ा महत्व है। इसमें उन्होंने अल्लाह के नामों एवं गुणों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखते हुए अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे को शरई एवं अक़्ली प्रमाणों के साथ बयान किया है और विरोधियों का खंडन किया है। फिर, यह सब कुछ इस अंदाज़ में किया है कि सही नीयत एवं सत्य से अवगत होने की सच्ची चाहत के साथ पढ़ने वाले के सामने सत्य स्पष्ट होकर आ जाता है और असत्य की अप्रासंगिकता ज़ाहिर हो जाती है। अल्लाह के नामों एवं गुणों के संबंध में अहल-ए-सुन्नत व जमात के अक़ीदे का सारांश यह है कि: उन्होंने अल्लाह के उन सभी नामों एवं गुणों को, जिन्हें उसने अपनी किताब में या फिर उसके संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी हदीस में बयान किया है, बिना उनका उदाहरण दिए साबित किया है तथा पवित्र एवं महान अल्लाह को उसकी सृष्टि के समान व समरूप होने से इस तरह पाक व पवित्र ठहराया है कि उससे उसके नामों और गुणों का अर्थहीन होना लाज़िम नहीं आता। इस तरह वे अंतर्विरोध से सुरक्षित रहे, और सभी दलीलों पर अमल भी हो गया। दरअसल अल्लाह का यह नियम है कि जो व्यक्ति उसके रसूलों के लाए हुए सत्य को थामे रहता है और सच्ची लगन से सत्य की तलाश में रहता है, उसे अल्लाह सत्य पर जमे रहने का सुयोग प्रदान करता है और उसके सामने सत्य के प्रमाणों को ज़ाहिर कर देता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है :

﴿بَلۡ نَقۡذِفُ بِٱلۡحَقِّ عَلَى ٱلۡبَٰطِلِ فَيَدۡمَغُهُۥ فَإِذَا هُوَ زَاهِقٞ...﴾

बल्कि हम सत्य को असत्य पर फेंक मारते हैं, तो वह उसका सिर कुचल देता है, तो एकाएक वह मिटने वाला होता है... [सूरा अंबिया : 18]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः

﴿وَلَا يَأۡتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئۡنَٰكَ بِٱلۡحَقِّ وَأَحۡسَنَ تَفۡسِيرًا33﴾

और (ऐ रसूल!) जब भी वे आपके पास कोई उदाहरण लाते हैं, तो हम आपके पास सत्य और उत्तम व्याख्या ले आते हैं। [सूरा फ़ुरक़ान : 33]

दरअसल जो भी अल्लाह के नामों तथा गुणों के विषय में अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे के विरुद्ध गया है, उसे शरई एवं अक़्ली प्रमाणों के विरुद्ध जाना और स्वयं अपनी कही हुई बातों में विरोधाभास का शिकार होना पड़ा है। हाफ़िज़ इब्ने कसीर ने अपनी सुप्रसिध्द तफ़सीर में इस विषय में बड़ी अच्छी बात कही है। यह बात उन्होंने सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के इस कथन के बारे में बात करते हुए कही है:

﴿إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٖ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِ...﴾

निःसंदेह तुम्हारा पालनहार वह अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में बनाया। फिर अर्श (सिंहासन) पर बुलंद हुआ। [सूरा आराफ़ : 54].

उनकी बात के महत्व को देखते हुए मैं उसे यहाँ नक़ल कर देना मुनासिब समझता हूँ। वह कहते हैं :

इस विषय में लोगों के बहुत-से अलग-अलग मत हैं, जिन्हें यहाँ बयान नहीं किया जा सकता। यहाँ हम मालिक, औज़ाई, सुफ़यान सौरी, लैस बिन साद, शाफ़िई, अहमद और इसहाक़ बिन राहवैह आदि सदाचारी पूर्वजों और अन्य पुराने एवं नए मुस्लिम इमामों के मार्ग पर चलेंगे। उनका मार्ग यह है अल्लाह के नामों एवं गुणों पर आधारित आयतों एवं हदीसों को हूबहू उसी तरह मान लिया जाए, जिस तरह वह आई हुई हैं। न नामों एवं गुणों का विवरण प्रस्तुत किया जाए, न समरूपता दिखाई जाए और न उनको अर्थहीन सिद्ध किया जाए। दरअसल, तश्बीह देने वालों के ज़ेहन में सबसे पहले जो बात आती है, वह अल्लाह के बारे में अस्वीक़ार्य है, क्योंकि अल्लाह के समान उसकी कोई सृष्टि नहीं हो सकती। स्वयं उसी का फ़रमान है :

﴿...لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ﴾

उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है। [सूरा अश-शूरा : 11] बल्कि मामला वैसा ही है जैसा कि इमामों ने कहा है—उनमें इमाम बुख़ारी के गुरू नुएैम बिन हम्माद अल-खुज़ाई कहते हैं: "जिसने अल्लाह को उसकी सृष्टि के समरूप कहा, उसने कुफ़्र किया और जिसने अल्लाह के स्वयं अपने लिए सिद्ध किए हुए किसी गुण का इनकार किया, उसने कुफ़्र किया।"10 अल्लाह के जो गुण स्वयं उसने तथा उसके रसूल ने बताए हैं, उनके अंदर तशबीह (समरुपता) जैसी कोई बात नहीं है। अतः जिसने स्पष्ट आयतों और सहीह हदीसों के अंदर वर्णित अल्लाह के नामों एवं गुणों को, उसकी महानता एवं प्रताप के अनुरूप ही उसके लिए साबित किया तथा उसे त्रुटियों एवं कमियों से पाक जाना, वह सत्य के मार्ग पर चलने वाला है।"11 इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह की बात समाप्त हुई।

अल्लाह पर ईमान के अंदर यह विश्वास भी दाख़िल है कि ईमान कथन एवं कर्म का नाम है, जो आज्ञापालन से बढ़ता और अवज्ञा से घटता है। साथ ही यह कि किसी मुसलमान को कुफ़्र एवं शिर्क के अतिरिक्त किसी बड़े से बड़े गुनाह जैसे व्यभिचार, चोरी, सूदखोरी, मदिरापान, माता-पिता की अवज्ञा आदि के कारण काफ़िर नहीं कहा जा सकता, जब तक वह उन्हें जायज़ न समझता हो। क्योंकि पवित्र एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :

﴿إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغۡفِرُ أَن يُشۡرَكَ بِهِۦ وَيَغۡفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَآءُ...﴾

निःसंदेह, अल्लाह यह क्षमा नहीं करेगा कि उसका साझी बनाया जाए और इसके सिवा जिसे चाहेगा, क्षमा कर देगा... [सूरा अन-निसा : 48] इसी तरह, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सहाबा और उनके बाद हर ज़माने में बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने इस बात को नक़ल किया है। मसलन एक हदीस में है :

«إِنَّ اللهَ يُخْرِجُ مِنَ النَّارِ مَنْ كَانَ فِي قَلْبِهِ مِثْقَالُ حَبَّةٍ مِنْ خَرْدَلٍ مِنْ إِيْمَانٍ».

"अल्लाह जहन्नम से हर उस व्यक्ति को निकाल लेगा, जिसके दिल में राई के दाने के बराबर भी ईमान होगा।"12

 

 

दूसरा मूल आधार : फ़रिश्तों पर ईमान। इसमें भी दो बातों शामिल हैं :

इसके अंदर दो बातें शामिल हैं : पहली यह कि: तमाम फ़रिश्तों पर सामूहिक रूप से ईमान रखा जाए। यानी हम इस बात पर ईमान रखें कि अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते हैं, जिन्हें उसने अपनी इबादत के लिए पैदा किया है और उनके बारे में बताया है कि :

﴿وَقَالُواْ ٱتَّخَذَ ٱلرَّحۡمَٰنُ وَلَدٗاۗ سُبۡحَٰنَهُۥۚ بَلۡ عِبَادٞ مُّكۡرَمُونَ 26 لَا يَسۡبِقُونَهُۥ بِٱلۡقَوۡلِ وَهُم بِأَمۡرِهِۦ يَعۡمَلُونَ27 يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡ وَلَا يَشۡفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ٱرۡتَضَىٰ وَهُم مِّنۡ خَشۡيَتِهِۦ مُشۡفِقُونَ28﴾

और उन (मुश्रिकों) ने कहा कि 'रहमान' (अत्यंत दयावान्) ने कोई संतान बना रखी है। वह (इससे) पवित्र है। बल्कि वे (फ़रिश्ते) सम्मानित बंदे हैं।

वे बात करने में उससे पहल नहीं करते और वे उसके आदेशानुसार ही काम करते हैं।

वह जानता है, जो उनके सामने है और जो उनके पीछे है। और वे सिफ़ारिश नहीं करते, परंतु उसी के लिए जिसे वह पसंद करे। तथा वे उसी के भय से डरने वाले हैं। [सूरा अंबिया : 26-28]

उनके बहुत से प्रकार हैं : कुछ फ़रिश्ते अर्श को उठाने पर नियुक्त हैं, कुछ स्वर्ग और नरक के दारोगा हैं, और कुछ बंदों के कर्मों को लिखने पर नियुक्त हैं। दूसरी यह कि; उनपर सविस्तार ईमान रखा जाए। यानी जिन फ़रिश्तों को अल्लाह और उसके पैगंबर ने, उनका नाम लेकर चिह्नित किया है, हम उनपर विस्तार के साथ ईमान रखें। जैसे- जिबरील वह्य लाने के कार्य पर नियुक्त हैं, मीकाईल बारिश बरसाने के काम पर नियुक्त हैं, मालिक जहन्न के दरोगा हैं, और इसराईल सूर फूँकने के कार्य पर नियुक्त हैं। इन फ़रिश्तों का ज़िक्र सहीह हदीसों में हुआ है। मसलन आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से वर्णित एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«خُلِقَتِ الـمَلَائِكَةُ مِن نُورٍ، وَخُلِقَ الجَانُّ مِنْ مَارِجٍ مِنْ نَارٍ، وَخُلِقَ آدَمُ مِمَّا وُصِفَ لَكُم»

''फ़रिश्ते नूर से पैदा किए गए हैं, जिन्न धधकती आग से पैदा किए गए हैं और आदम (अलैहिस्सलाम) उस चीज़ से पैदा किए गए हैं, जिसके बारे में तुम्हें बताया गया है।''13 इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह (सहीह मुस्लिम) में इसे रिवायत किया है।

तीसरा मूल आधार : किताबों पर ईमान, इसमें भी दो बातें शामिल हैं :

पहली यह कि सामूहिक रूप से तमाम किताबों पर ईमान रखा जाए। यानी हम इस बात पर ईमान रखें कि अल्लाह तआला ने अपने नबियों और रसूलों पर सत्य को स्पष्ट करने और उसकी ओर बुलाने के लिए किताबें उतारी हैं। अल्लाह का फ़रमान है :

﴿لَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا رُسُلَنَا بِٱلۡبَيِّنَٰتِ وَأَنزَلۡنَا مَعَهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡمِيزَانَ لِيَقُومَ ٱلنَّاسُ بِٱلۡقِسۡطِ...﴾

निःसंदेह हमने अपने रसूलों को स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा तथा उनके साथ पुस्तक और तराज़ू उतारा, ताकि लोग न्याय पर क़ायम रहें... [सूरा हदीद : 25] एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :

﴿كَانَ ٱلنَّاسُ أُمَّةٗ وَٰحِدَةٗ فَبَعَثَ ٱللَّهُ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَ ٱلنَّاسِ فِيمَا ٱخۡتَلَفُواْ فِيهِ...﴾

(आरंभ में) सब लोग एक ही समुदाय थे। (फिर विभेद हुआ) तो अल्लाह ने नबी भेजे, शुभ समाचार सुनाने वाले और डराने वाले, और उनपर सत्य के साथ पुस्तक उतारी, ताकि वह लोगों के बीच उन बातों का फैसला करे, जिनमें उन्होंने मतभेद किया था। [सूरा बक़रा : 213]

दूसरी यह कि; किताबों पर सविस्तार ईमान रखा जाए। यानी हम तौरात, इंजील, ज़बूर एवं क़ुरआन आदि उन किताबों पर ईमान रखें, जिनको अल्लाह ने नाम लेकर बयान किया है और विश्वास रखें कि क़ुरआन अंतिम एवं सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है। यह सब किताबों का संरक्षण और सबकी पुष्टि करने वाली किताब है। क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रमाणित हदीसों का अनुसरण सभी लोगों के लिए अनिवार्य है। क्योंकि अल्लाह ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संदेष्टा के रूप में मनुष्य और जिन्न संप्रदायों की ओर भेजा था और आपपर क़ुरआन उतारा था, ताकि आप उसी के आलोक में सारे निर्णय लें। अल्लाह ने इसे दिलों के लिए रोगनिवारक, हर चीज़ को स्पष्ट करने वाला और मोमिनों के लिए मार्गदर्शन, दया एवं करूना बनाया है। स्वयं उसी का फ़रमान है :

﴿وَهَٰذَا كِتَٰبٌ أَنزَلۡنَٰهُ مُبَارَكٞ فَٱتَّبِعُوهُ وَٱتَّقُواْ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ155﴾

तथा यह एक बरकत वाली पुस्तक है, जिसे हमने उतारा है। अतः इसका अनुसरण करो और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुमपर दया की जाए। [सूरा अनआम : 155] एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :

﴿...وَنَزَّلۡنَا عَلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ تِبۡيَٰنٗا لِّكُلِّ شَيۡءٖ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٗ وَبُشۡرَىٰ لِلۡمُسۡلِمِينَ﴾

और हमने आपपर यह पुस्तक (क़ुरआन) अवतरित की, जो प्रत्येक विषय का स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन और दया और आज्ञाकारियों के लिए शुभ सूचना है। [सूरा नह्ल : 89] एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :

﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنِّي رَسُولُ ٱللَّهِ إِلَيۡكُمۡ جَمِيعًا ٱلَّذِي لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُۖ فَـَٔامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِ ٱلنَّبِيِّ ٱلۡأُمِّيِّ ٱلَّذِي يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَكَلِمَٰتِهِۦ وَٱتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ158﴾

(ऐ नबी!) आप कह दें कि ऐ मानव जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जिसके लिए आकाशों तथा धरती का राज्य है। उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। वही जीवन देता और मारता है। अतः तुम अल्लाह पर और उसके रसूल उम्मी नबी पर ईमान लाओ, जो अल्लाह पर और उसकी सभी वाणियों (पुस्तकों) पर ईमान रखता है और उसका अनुसरण करो, ताकि तुम सीधा मार्ग पाओ। [सूरा आराफ़ : 158], क़ुर्आन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

चौथा मूल आधार : रसूलों पर ईमान

इसके अंदर भी दो बातें शामिल हैं : पहली यह कि; हम सभी रसूलों पर सामूहिक रूप से ईमान रखें। यानी हम ईमान रखें कि अल्लाह ने अपने बंदों की ओर उन्हीं में से कुछ लोगों को रसूल के रूप में भेजा है, ताकि लोगों को शुभ सूचना दें, सावधान करें तथा सत्य की ओर बुलाएँ। अब, जो उनके आमंत्रण को स्वीकार करेगा, वह सौभाग्य प्राप्त करेगा और जो उनका विरोध करेगा, वह विफलता एवं पश्चाताप का पात्र बनेगा। इन संदेष्टाओं की अंतिम कड़ी और सर्वश्रेष्ठ संदेष्टा हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया है :

﴿وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَ...﴾

और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो... [सूरा अल-नह्ल : 36]। एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :

﴿رُّسُلٗا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةُۢ بَعۡدَ ٱلرُّسُلِ...﴾

ऐसे रसूल जो शुभ सूचना सुनाने वाले और डराने वाले थे। ताकि लोगों के पास रसूलों के बाद अल्लाह के मुक़ाबले में कोई तर्क न रह जाए... [सूरा निसा : 165] एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :

﴿مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَآ أَحَدٖ مِّن رِّجَالِكُمۡ وَلَٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ...﴾

मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। बल्कि वह अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक हैं... [सूरा अहज़ाब : 40]

दूसरी यह कि; हम रसूलों पर सविस्तार ईमान रखें। यानी अल्लाह तआला और उसके रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जिन पैग़ंबरों का नाम लिया है, हम उनपर विस्तृत रूप से और निर्धारण के साथ ईमान रखें। जैसे नूह, हूद, सालेह, इबराहीम और इनके अलावा अन्य रसूल। उनपर तथा हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा आपके परिजनों एवं अनुसरणकारियों पर सर्वश्रेष्ठ दरूद एवं निर्मल शांति की धारा बरसे।

पाँचवाँ मूल आधार : आख़िरत के दिन पर ईमान

इसके अंदर शामिल है :

अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बताई हुई मृत्यु के बाद की सारी घटनाओं, जैसे क़ब्र की परीक्षा, उसकी यातना और उसकी नेमतों और इसी तरह क़यामत के दिन घटित होने वाली सारी घटनाओं, जैसे उस दिन की भयावहता, कठिन परिस्थितियाँ, सिरात पर लोगों का चलना, कर्मों का तोला जाना, हिसाब होना, प्रतिफल दिया जाना, कर्म पत्र दिया जाना, किसी का दाएँ हाथ में, किसी का बाएँ हाथ में और किसी का पीठ के पीछे से कर्म पत्र प्राप्त करना आदि तमाम बातों पर विश्वास रखना।

इसी तरह, उसके अंदर हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को क़यामत के दिन दिए जाने वाले हौज़-ए-कौसर, जन्नत और जहन्नम, ईमान वालों के अपने रब को देखने तथा अल्लाह के उनसे बात करने के साथ-साथ उन तमाम बातों पर विश्वास सखना शामिल है, जिनका उल्लेख पवित्र क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह सुन्नत में हुआ है। इन तमाम बातों पर विश्वास रखना और इनकी उसी प्रकार पुष्टि करना अनिवार्य है, जिस प्रकार अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है।

छठा मूल आधार : तक़दीर पर ईमान

तक़दीर पर ईमान के अंदर चार बातें शामिल हैं :

पहली बात : इस बात पर ईमान कि अल्लाह तआला, जो कुछ हो चुका है उसे भी जानता है और जो कुछ होने वाला है उसे भी जानता है। वह बंदों की हर बात और हर गतिविधि से अवगत है। वह उन्हें प्राप्त होने वाली जीविकाओं, मृत्यु के समय, आयु और कर्मों आदि सारी बातों से अवगत है। इनमें से कोई भी बात उससे नहीं छिपती। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :

﴿...وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ﴾

और जान लो कि अल्लाह हर चीज़ को ख़ूब जानने वाला है। [सूरा बक़रा : 231] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :

﴿...لِتَعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ وَأَنَّ ٱللَّهَ قَدۡ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عِلۡمَۢا﴾

ताकि तुम जान लो कि अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है और यह कि अल्लाह ने निश्चय प्रत्येक वस्तु को अपने ज्ञान के साथ घेर रखा है। [सूरा तलाक़ : 12]

दूसरी बात : अल्लाह तआला ने अपनी सारी योजनाओं तथा निर्णयों को लिख रखा है। स्वयं उसी का फ़रमान है :

﴿قَدۡ عَلِمۡنَا مَا تَنقُصُ ٱلۡأَرۡضُ مِنۡهُمۡۖ وَعِندَنَا كِتَٰبٌ حَفِيظُۢ 4﴾

निश्चय हमें मालूम है जो कुछ धरती उनमें से कम करती है और हमारे पास एक पुस्तक है, जो ख़ूब सुरक्षित रखने वाली है। [सूरा क़ाफ़ : 4] एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :

﴿...وَكُلَّ شَيۡءٍ أَحۡصَيۡنَٰهُ فِيٓ إِمَامٖ مُّبِينٖ﴾

तथा प्रत्येक वस्तु को हमने स्पष्ट पुस्तक में दर्ज कर रखा है। [सूरा यासीन : 12] एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :

﴿أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِۚ إِنَّ ذَٰلِكَ فِي كِتَٰبٍۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ70﴾

(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह जानता है, जो आकाश तथा धरती में है? निःसंदेह यह एक किताब में (अंकित) है। निःसंदेह यह अल्लाह के लिए अति सरल है। [सूरा अल-हज्ज : 70]

तीसरी बात : अल्लाह की सार्वभौमिक इच्छा पर ईमान रखना और विश्वास रखना कि अल्लाह जो चाहेगा, वह होगा और जो नहीं चाहेगा, वह नहीं होगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :

﴿...إِنَّ ٱللَّهَ يَفۡعَلُ مَا يَشَآءُ﴾

निःसंदेह अल्लाह जो चाहता है, करता है। [सूरा हज्ज : 18] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :

﴿إِنَّمَآ أَمۡرُهُۥٓ إِذَآ أَرَادَ شَيۡـًٔا أَن يَقُولَ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ82﴾

उसका आदेश, जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो केवल यह होता है कि उससे कहता है "हो जा", तो वह हो जाती है। [सूरा यासीन : 82] एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :

﴿وَمَا تَشَآءُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ29﴾

तथा तुम कुछ नहीं चाह सकते, सिवाय इसके कि सर्व संसार का पालनहार अल्लाह चाहे। [सूरा तकवीर : 29]

चौथी बात : इस बात पर ईमान कि सभी अस्तित्व में आई हुई चीज़ों को अल्लाह ने पैदा फ़रमाया है और उसके अतिरिक्त कोई स्रष्टा एवं रचयिता नहीं है। अल्लाह तआला ने फरमाया है :

﴿ٱللَّهُ خَٰلِقُ كُلِّ شَيۡءٖۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ وَكِيلٞ62﴾

अल्लाह ही प्रत्येक वस्तु का पैदा करने वाला है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है। [सूरा ज़ुमर : 62] एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱذۡكُرُواْ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡۚ هَلۡ مِنۡ خَٰلِقٍ غَيۡرُ ٱللَّهِ يَرۡزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِۚ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ فَأَنَّىٰ تُؤۡفَكُونَ3﴾

ऐ लोगो! अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो। क्या अल्लाह के सिवा कोई और उत्पत्तिकर्ता है, जो तुम्हें आकाश तथा धरती से जीविका प्रदान करे? उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। फिर तुम कहाँ बहकाए जाते हो? [सूरा फ़ातिर : 3]

अतः अहल-ए-सुन्नत व जमात के निकट तक़दीर पर ईमान के अंदर इन चारों चीज़ों पर ईमान आ जाता है। यह अलग बात है कि कुछ बिदअतियों ने इनमें से कुछ चीज़ों का इनकार किया है।

अह्ल-ए-सुन्नत व जमात के अक़ीदे का एक महत्वपूर्ण अंश अल्लाह के लिए प्रेम और अल्लाह के लिए घृणा तथा अल्लाह के लिए दोस्ती और अल्लाह के लिए दुश्मनी भी है। अह्ल-ए-सुन्नत के यहाँ इसे वला एवं बरा का अक़ीदा कहा जाता है। यह विश्वास भी अल्लाह पर ईमान के दायरे में आता है।

अतः एक मोमिन, अन्य मोमिनों से मोहब्बत करेगा और उनसे दोस्ती रखेगा, जबकि अविश्वासियों से नफ़रत करेगा और उनसे बैर रखेगा। याद रहे कि इस उम्मत के मोमिनों की सूची में जिन लोगों का नाम सबसे ऊपर है, वह अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथीगण हैं। अतः, अह्ल-ए-सुन्नत व जमात उनसे मोहब्बत एवं दोस्ती के साथ-साथ यह विश्वास भी रखते हैं कि वे नबियों के बाद सर्वश्रेष्ठ लोग हैं। क्योंकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- का फरमान है :

«خَيْرُ القُرُونِ قَرْنِي ثُمَّ الَّذِينَ يَلُونَهُمْ ثُمَّ الَّذِينَ يَلُونَهُم».

"सबसे उत्तम लोग मेरे ज़माने के लोग हैं, फिर वे जो उनके बाद आए और फिर वे जो उनके बाद आए।"14 इस सहदीस को इमाम बुख़ारी तथा इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।

उनका विश्वास है कि सहाबा के अंदर सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति अबू बक्र रज़ियल्लाहु अनहु, उनके बाद उमर रज़ियल्लाहु अनहु, उनके बाद उसमान रज़ियल्लाहु अनहु, उनके बाद अली रज़ियल्लाहु अनहु, उनके बाद जन्नत की शुभ सूचना प्राप्त करने वाले दस सहाबा में से शेष छह सहाबा और उनके बाद बाक़ी सारे सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम हैं। अह्ल-ए-सुन्नत, सहाबा के बीच उत्पन्न होने वाले मतभेदों और विवादों के बारे में बात करने से बचते हैं और विश्वास रखते हैं कि इस संदर्भ में वे मुजतहिद (यानी सही निर्णय लेने के लिए शतप्रतिशत प्रयास करने वाले लोग) थे। जबकि इस तरह के लोग यदि सही निर्णय लेने में सफल हो जाएँ, तो दोहरा प्रतिफल प्राप्त करते हैं और यदि सफल न हों तो इकहरा प्रतिफल प्राप्त करते हैं।

वे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के मोमिन परिजनों से मोहब्बत करते और उनसे दोस्ती रखते हैं, मोमिनों की माताओं यानी अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नियों से अपने को जोड़ कर रखते हैं, उन सभी के लिए अल्लाह की प्रसन्नता की दुआ करते हैं। वे राफ़िज़ियों के तरीक़े से खुद को अलग रखते हैं, जो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सहाबा से द्वेष रखते, उनको बुरा-भला कहते और आपके परिजनों के बारे में अतिशयोक्ति से काम लेते हुए उन्हें अल्लाह के प्रदान किए हुए पद से ऊपर ले जाते हैं। इसी तरह वे नासिबियों के तरीके से भी खुद को अलग रखते हैं, जो अपने कथन अथवा कर्म द्वारा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के परिजनों को कष्ट देते हैं।

हमने यहाँ जिन बातों का ज़िक्र किया है, वह सब उस सही अक़ीदा के अंतर्गत आती हैं, जिसके साथ अल्लाह ने अपने संदेष्टा मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भेजा है। यही इस उम्मत के फ़िरक़ा-ए-नाजिया (मुक्ति प्राप्त करने वाले समुदाय) एवं अह्ल-ए-सुन्नत व जमात का अक़ीदा है, जिसके बारे में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :

«لَا تَـزَالُ طَائِفَةٌ مِنْ أُمَّتِي ‌ظَاهِرِينَ ‌عَلَى ‌الحَقِّ، لَا يَضُرُّهُمْ مَنْ خَذَلَهُمْ، حَتَّى يَأْتِيَ أَمْرُ اللهِ وَهُمْ كَذَلِكَ».

"मेरी उम्मत का एक दल हमेशा सत्य पर प्रभुत्वप्राप्त रहेगा। उसका साथ छोड़ने वाले उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकेंगे, यहाँ तक कि अल्लाह का फैसला आ जाएगा और वह इसी तरह सत्य पर क़ायम रहेंगे।"15 एक अन्य रिवायत के शब्द इस प्रकार हैं :

«لَا تَزَالُ طَائِفَةٌ مِنْ أُمَّتِي عَلَى الحَقِّ مَنْصُورَةٌ».

"मेरी उम्मत का एक दल हमेशा सत्य पर प्रभुत्वप्राप्त रहेगा।"16 इसी तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

«افْتَرَقَتِ اليَهُودُ عَلَى إِحْدَى وَسَبْعِينَ فِرْقَةً، وَافْتَرَقَتِ النَّصَارَى عَلَى اثْنَتَيْنِ وَسَبْعِينَ فِرْقَةً، وَسَتَفْتَرِقُ هَذِهِ الأُمَّةُ عَلَى ثَلَاثِ وَسَبْعِينَ فِرْقَةً كُلُّهَا فِي النَّارِ إِلَّا وَاحِدَةً فَقَالَ الصَّحَابَةُ: مَنْ هِيَ يَا رَسُولَ اللهِ؟ قَالَ: مَنْ كَانَ عَلَى مِثْلِ مَا أَنَا عَلَيْهِ وَأَصْحَابِي».

"यहूदी इकहत्तर संप्रदायों में विभाजित हो गए थे तथा ईसाई बहत्तर संप्रदायों में परंतु मेरी इस उम्मत के लोग तिहत्तर संप्रदायों में बँट जाएँगे। यह सारे संप्रदाय जहन्नम में जाएँगे, सिवाय एक संप्रदाय के। आपके साथियों ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! वह कौन-सा संप्रदाय होगा? आपने उत्तर दिया : वह संप्रदाय जो उसी तरह के मार्ग पर चल रहा होगा, जिसपर मैं और मेरे साथीगण चल रहे हैं।"17

शुद्ध अक़ीदे के विरुद्ध चीजें

इस अक़ीदे से मुँह फेरने वाले और इसकी विपरीत धारा में चलने वाले लोग बहुत-से प्रकार के हैं। उनमें से कुछ लोग मूर्तियों, फरिश्तों, वलियों, जिन्नों, वृक्षों तथा पत्थरों आदि की पूजा करते हैं। इस तरह के लोगों ने न केवल यह कि संदेष्टाओं के आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया, बल्कि उनका विरोध किया और उनसे दुश्मनी की। क़ुरैश तथा अरब के विभिन्न क़बीलों के लोगों ने हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ जो कुछ किया, वह इसका जीता जागता सबूत है। यह लोग अपने पूज्यों से ज़रूरत की चीज़ें माँगते, रोग से स्वास्थ्य लाभ की गुहार लगाते और शत्रुओं पर विजय की फ़रियाद करते थे। उनके नाम पर जानवर ज़बह करते थे और उनके लिए मन्नत मानते थे। ऐसे में, जब अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनके इन कर्मों का खंडन किया और विशुद्ध रूप से एक अल्लाह की इबादत का आदेश दिया, तो उन्होंने आश्चर्य प्रकट किया और कहने लगे :

﴿أَجَعَلَ ٱلۡأٓلِهَةَ إِلَٰهٗا وَٰحِدًاۖ إِنَّ هَٰذَا لَشَيۡءٌ عُجَابٞ5﴾

क्या उसने सब पूज्यों को एक पूज्य बना दिया? निःसंदेह यह तो बड़े आश्चर्य की बात है। [सूरा साद : 5]

आप उन्हें निरंतर अल्लाह की ओर बुलाते रहे, शिर्क (अनेकेश्वरवाद) के बुरे परिणाम से सावधान करते रहे और अपने आह्वान की वास्तविकता से अवगत करते रहे, यहाँ तक कि पहले तो कुछ ही लोगों ने आपके आह्वान को स्वीकार किया, लेकिन उसके बाद बड़ी संख्या में लोग इस्लाम ग्रहण करने लगे। इस तरह, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, आपके सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- और पूरी निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करने वाले लोगों के निरंतर प्रयास और लंबे संघर्ष के बाद अल्लाह के धर्म इस्लाम का सभी धर्मों पर वर्चस्व हो गया। परन्तु, फिर इसके बाद हालात बदल गए, और अधिकतर लोग अज्ञानता के शिकार हो गए। अकसर लोग नबियों और वलियों के सम्मान में अतिशयोक्ति करने लगे, उनको पुकारने लगे, उनसे संकट के समय सहायता माँगने लगे, तथा शिर्क के अन्य बहुत-से कार्य करने लगे। इस तरह देखा जाए तो वे एक तरह से दोबारा अज्ञानता काल की ओर लौट गए। उनके अंदर "ला इलाहा इल्लल्लाह" के अर्थ की उतनी भी समझ न रही, जितनी अरब के काफ़िरों के अंदर मौजूद थी।

यह शिर्क, धर्म से अज्ञानता एवं नबवी दौर से दूरी के कारण लोगों के अंदर फैलता चला गया और सिलसिला आज भी जारी है।

दरअसल आज के शिर्क करने वाले भी उसी भ्रम के शिकार हैं, जो पहले के शिर्क करने वालों ने पाल रखा था। वह कहा करते थे कि :

﴿...هَٰٓؤُلَآءِ شُفَعَٰٓؤُنَا عِندَ ٱللَّهِ...﴾

ये लोग अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं। [सूरा यूनुस : 18], इसी तरह वह कहा करते थे कि :

﴿...مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ...﴾

...हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें।... [सूरा अल-ज़ुमर : 3], हालाँकि अल्लाह तआला ने इस भ्रम का खंडन कर दिया है, और यह स्पष्ट कर दिया है कि जिसने उसके अलावा किसी और की उपासना की, चाहे वह कोई भी हो, उसने उसके साथ शिर्क किया और काफ़िर हो गया। उसका फ़रमान है :

﴿وَيَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمۡ وَلَا يَنفَعُهُمۡ وَيَقُولُونَ هَٰٓؤُلَآءِ شُفَعَٰٓؤُنَا عِندَ ٱللَّهِ...﴾

और वे लोग अल्लाह को छोड़कर उनको पूजते हैं, जो न उन्हें कोई हानि पहुँचाते हैं और न उन्हें कोई लाभ पहुँचाते हैं और कहते हैं कि ये लोग अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं... [सूरा यूनुस : 18] आगे अल्लाह ने इनका खंडन करते हुए कहा है :

﴿قُلۡ أَتُنَبِّـُٔونَ ٱللَّهَ بِمَا لَا يَعۡلَمُ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَلَا فِي ٱلۡأَرۡضِۚ سُبۡحَٰنَهُۥ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشۡرِكُونَ18﴾

आप कह दें : क्या तुम अल्लाह को ऐसी बात की सूचना दे रहे हो, जिसे वह न आकाशों में जानता है और न धरती में? वह पवित्र है और उससे बहुत ऊँचा है, जिसे वे साझीदार ठहराते हैं। [सूरा यूनुस : 18]

इस आयत के अन्दर अल्लाह तआला ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसे छोड़ नबियों, वलियों या किसी और की पूजा करना सबसे बड़ा शिर्क है, भले ही उसमें संलिप्त लोग उसका कोई और नाम रख लें। उसने एक अन्य स्थान में कहा है :

﴿...وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ...﴾

तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें। [सूरा ज़ुमर : 3] फिर अल्लाह ने उनका उत्तर देते हुए कहा है :

﴿...إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ﴾

निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो। [सूरा ज़ुमर : 3]

इस प्रकार अल्लाह तआला ने स्पष्ट कर दिया है कि इन लोगों का उसके अलावा किसी और से कुछ माँगना, उसका भय करना तथा उससे आशा रखना आदि अल्लाह के प्रति अविश्वास (कुफ़्र) व्यक्त करना है। साथ ही उनकी इस बात को भी झूठ क़रार दे दिया है कि उनके पूज्य उनको अल्लाह की निकटता लाभ करवा देंगे।

शुद्ध अक़ीदा एवं संदेष्टाओं की लाई हुई शिक्षाओं के विरुद्ध और कुफ़्र पर आधारित आस्थाओं में वर्तमान युग में मार्क्स व लेनिन तथा इन जैसे अन्य अधर्म एवं नास्तिकता के प्रचारकों के अनुयायियों की वह मान्यता भी शामिल है, जिसे लोग समाजवाद, साम्यवाद, बासवाद तथा इस तरह के अन्य नामों से जानते हैं। इन सारे नास्तिकों का मूल सिद्धांत यह कि किसी पूज्य का कोई अस्तित्व नहीं है और जीवन बस भौतिक संरचना का नाम है।

उनके सिद्धांतों में आख़िरत, जन्नत, जहन्नम और सारे धर्मों का इनकार भी शामिल है। जो व्यक्ति उनकी किताबों को देखेगा और उनकी वस्तुस्थिति का अध्ययन करेगा, वह निश्चित रूप से इस वास्तविकता से अवगत हो जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनकी यह मान्यता सभी आसमानी धर्मों का विरोध करती है और अपने मानने वालों के लिए दुनिया एवं आख़िरत में भयानक परिणाम का सबब बनेगी।

सत्य विरोधी अक़ीदों में कुछ सूफ़ियों का यह अक़ीदा भी शामिल है कि उनके तथाकथित औलिया संसार के संचालन में अल्लाह के साझी हैं, और दुनिया के कामों में अपना भी इख़्तियार रखते हैं। इस तरह के लोगों को वे क़ुतुब, वतद और ग़ौस आदि नामों से जानते हैं, जो दरअसल उन्हीं के गढ़े हुए नाम हैं। यह दरअसल अल्लाह के रब होने में साझी बनाना है, जो शिर्क का सबसे बदतरीन रूप है।

जो व्यक्ति अज्ञानता काल के लोगों के शिर्क पर विचार करेगा और उसकी तुलना बाद के लोगों में फैले हुए शिर्क से करेगा, वह पाएगा कि बाद के लोगों का शिर्क अधिक भयानक है। इसे आप इस तरह समझ सकते हैं : अज्ञानता काल के अरब अविश्वासियों की दो विशेषताएँ थीं : पहली बात यह कि; वे अल्लाह के रब होने में किसी को साझी नहीं बनाते थे। वे साझी केवल इबादत में बनाते थे। वे रब केवल सर्वशक्तिमान अल्लाह को ही मानते थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَهُمۡ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ...﴾

और निश्चय यदि आप उनसे पूछें कि उन्हें किसने पैदा किया? तो वे अवश्य कहेंगे : अल्लाह ने... [सूरा ज़ुख़रुफ़ : 87] अल्लाह तआला ने एक अन्य स्थान में कहा है :

﴿قُلۡ مَن يَرۡزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِ أَمَّن يَمۡلِكُ ٱلسَّمۡعَ وَٱلۡأَبۡصَٰرَ وَمَن يُخۡرِجُ ٱلۡحَيَّ مِنَ ٱلۡمَيِّتِ وَيُخۡرِجُ ٱلۡمَيِّتَ مِنَ ٱلۡحَيِّ وَمَن يُدَبِّرُ ٱلۡأَمۡرَۚ فَسَيَقُولُونَ ٱللَّهُۚ فَقُلۡ أَفَلَا تَتَّقُونَ31﴾

कहो : वह कौन है जो तुम्हें आकाश और धरती से जीविका देता है? या फिर कान और आँख का मालिक कौन है? और कौन जीवित को मृत से निकालता और मृत को जीवित से निकालता है? और कौन है जो हर काम का प्रबंध करता है? तो वे ज़रूर कहेंगे : ''अल्लाह'', तो कहो : फिर क्या तुम डरते नहीं? [सूरा यूनुस : 31] क़ुरआन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

जबकि दूसरी यह कि; वे इबादत में भी अल्लाह का साझी हमेशा नहीं बनाया करते थे। अल्लाह का साझी केवल सुख के समय बनाते थे। दुःख के समय तो वह भी केवल एक अल्लाह की इबादत करते थ। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

﴿فَإِذَا رَكِبُواْ فِي ٱلۡفُلۡكِ دَعَوُاْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمۡ إِلَى ٱلۡبَرِّ إِذَا هُمۡ يُشۡرِكُونَ65﴾

फिर जब वे नाव पर सवार होते हैं, तो अल्लाह को, उसके लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, पुकारते हैं। फिर जब वह उन्हें बचाकर थल तक ले आता है, तो शिर्क करने लगते हैं। [सूरा अंकबूत : 65]

लेकिन बाद के मुश्रिक पहले के मुश्रिकों से दो मामलों में कहीं आगे बढ़ गए हैं : पहला यह कि; इनमें से कुछ लोग अल्लाह के रब होने में भी साझी बनाते हैं। जबकि दूसरा यह कि; ये सुख एवं दुख दोनों परिस्थितियों में शिर्क करते हैं, जैसा कि उनके साथ रहने वाला और उनके हाल से अवगत हर व्यक्ति जानता है। आख़िर वे मिस्र में हुसैन और बदवी आदि की क़ब्रों के पास, अदन में ईदरोस की क़ब्र के पास, यमन में हादी की क़ब्र के पास, सीरिया में इब्न-ए-अरबी की क़ब्र के पास, इराक में शैख अब्दुल क़ादिर जीलानी की क़ब्र के पास तथा इनके अलावा अन्य प्रसिद्ध कब्रों के पास क्या कुछ नहीं करते!! इनके विषय में आम लोग बड़ी अतिशयोक्ति से काम लेते हैं और सर्वशक्तिमान अल्लाह के बहुत-से अधिकार इनको बेझिझक दिए जा रहे हैं। दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है, जो इन लोगों को टोकें और इन्हें उस तौहीद से अवगत कराएँ, जो अल्लाह के अंतिम नबी और उनसे पहले के सारे नबीगण लाए थे।

सही अकीदे के विरुद्ध अकीदों में जहमिया एवं मोतज़िला तथा उनके पद्चिह्नों पर चलने वाले अन्य बिदअतियों का अक़ीदा भी शामिल है, जो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के गुणों का इनकार करते हैं, उसे उसके गुणों से ख़ाली क़रार देते हैं तथा जड़ वस्तुओं की पंक्ति में ला खड़ा करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि अल्लाह उनकी इन बातों से बहुत ही ऊँचा है।

इसी दायरे में अशअरी जैसे वह लोग भी आ जाते हैं, जो अल्लाह के कुछ गुणों का इनकार करते हैं और कुछ गुणों को मानते हैं। क्योंकि उन्होंने जिन गुणों का इनकार किया और उनके प्रमाणों के गलत अर्थ बताए और इस तरह शरई एवं अक़्ली प्रमाणों की मुख़ालफ़त की एवं स्पष्ट रूप से अंतर्विरोध के शिकार हुए, उनको भी उन गुणों की तरह मानना ज़रूरी है, जिनको उन्होंने सिद्ध किया है।

जबकि इन लोगों के विपरीत, अह्ल-ए-सुन्नत व जमात ने अल्लाह के उन सभी नामों एवं गुणों को सिद्ध माना है, जिनको स्वयं अल्लाह या फिर उसके रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- ने साबित किया है। इसी तरह अल्लाह को उसकी सृष्टि की समानता से इस तरह पाक एवं पवित्र माना है कि उसे गुणविहीण करने की शंका तक पैदा न होती हो। इस तरह, उन्होंने सारे प्रमाणों पर अमल किया, उनके अर्थ के साथ छेड़-छाड़ से दूर रहे, अल्लाह को गुणविहीन बताने से खुद को बचाया और उस विरोधाभास से सुरक्षित रहे, जिसके अन्य लोग शिकार हो गए हैं।

दरअसल यही मुक्ति का मार्ग, दुनिया एवं आख़िरत की सफलता का रहस्य और वह सीधा रास्ता है, जिसपर इस उम्मत के सदाचारी पूर्वज एवं इमामगण चलते आए हैं। जबकि इस उम्मत के बाद के लोगों की सफलता उसी मार्ग पर चलने में निहित है, जिसपर उसके पहले दौर के लोगों ने चलकर दिखाया है। वह मार्ग है, क़ुरआन एवं हदीस के अनुसरण एवं उनके विपरीत चीज़ों को छोड़ने का मार्ग। हम अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह इस उम्मत को सत्य का मार्ग दिखाए, उनके अंदर बड़ी संख्या में सत्य के प्रचारक पैदा कर दे और मुस्लिम रहनुमाओं को इस शिर्क का मुक़ाबला करने और इसके मार्गों को बंद करने का सुयोग प्रदान करे। निश्चय ही वह सुनने वाला और निकट है। वही सुयोग प्रदान करता है। वही हमारे लिए काफ़ी है और वह बेहतर काम बनाने वाला है। उसके बिना न पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य करने की क्षमता। अल्लाह की दया, शांति एवं बरकतें अवतरित हों उसके बंदे एवं रसूल, हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर तथा आपके परिवार एवं साथियों पर।

 

 

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इस हदीस को बुख़ारी (2856) और मुस्लिम (30) نے रिवायत किया है।

इसे लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (735) और इबن अब्दुलबर्र ने जामे अल-इल्म व फ़ज़्लिह (1801) में रिवायत किया है। लेकिन उसमें गुणों से संबंधित आयतों के स्थान पर गुणों से संबंधित हदीसों का ज़िक्र है। उसके शब्द हैं : "इन हदीसों को उसी तरह रिवायत करो, जिस तरह यह आई हुई हैं और इनके बारे में बहस मत करो।

इसे बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (865) में रिवायत किया है और इसकी सनद को इब्न-ए-तैमिया ने अल-हमवियह (पृष्ठ 269) में सहीह कहा है। जबकि ज़हबी ने अल-अर्श (2/223) में कहा है कि इसके वर्णनकर्ता इमाम एवं विश्वसनीय हैं।

इसे लालكाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (930) और बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (955) में रिवायत किया है।

इसे लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (665) और बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (868) में रिवायत किया है।

इसे लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (664), अबू नुऐम ने हिलयह अल-औलिया (6/325) और बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (867) में रिवायत किया है।

इसे अल-मुज़क्की ने अल-मुज़क्कियात (29), इब्न-ए-बत्ता ने अल-इबानह (120) तथा लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (663) में रिवायत किया है।

इसे दारिमी ने अल-रद्द अला अल-जहमिय्यह (67) तथा बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (903) में रिवायत किया है।

इसे ज़हबी ने अल-उलू (464) में रिवायत किया है, जबकि अलबानी ने मुख़तसर अल-उलू (पृष्ठ-184) में कहा है : इसकी सनद सहीह है, इसके वर्णनकर्ता विश्वसनीय एवं परिचित हैं।

तफ़सीर इब्न-ए-कसीर (3/426,427)

इसे बुख़ारी ने (22) में अबू सईद खु़दरी रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत किया है।

सहीह मुस्लिम : 2996, वर्णनकर्ता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा।

सहीह बुख़ारी : 3651, सहीह मुस्लिम : 2533, वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु।

सहीह मुस्लिम : 1920, वर्णनकर्ता सौबान रज़ियल्लाहु अनहु।

सुनन इब्न-ए-माजा : (3952), वर्णनकर्ता सौबान रज़ियल्लाहु अनहु। इसे इब्न-ए-हिब्बान ने (7614) एवं हाकिम ने (8653) सहीह कहा है।

इसे तिर्मिज़ी ने (2641) में अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत किया है और मुनावी ने फ़ैज़ अल-क़दीर (5/347) में कहा है : "इसमें अब्दुर रहमान बिन ज़ियाद अफ़्रीक़ी है, जिसके बारे में ज़हबी ने कहा है कि इसे मुहद्दिसों ने ज़ईफ़ (दुर्बल) कहा है।" जबकि अलबानी ने इस हदीस को सहीह अल-जामे (5343) में सहीह कहा है।

इसे मुस्लिम (8) ने रिवायत किया है।