حِرَاسَةُ التَّوحِيدِ
तौहीद की हिफाज़त
لِسَمَاحَةِ الشَّيْخِ العَلَّامَةِ
عَبْدِ العَزِيزِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ بَازٍ
رَحِمَهُ اللهُ
लेखक आदरणीय शैख़
अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़
रह़िमहुल्लाह
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
पहली पुस्तिका:
शुद्ध अक़ीदा और उसके विरुद्ध चीज़ें
सारी प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए है, तथा अल्लाह की दया और शांति अवतरित हो अल्लाह के अंतिम संदेष्टा पर, तथा उनके परिजनों और साथियों पर।
अल्लाह की प्रशंसा एवं दुरूद व सलाम के बाद असल विषय-वस्तु पर आते हैं। चूँकि विशुद्ध अक़ीदा ही इस्लाम धर्म का मूल आधार है, इसलिए मुझे इस विषय पर बात करना तथा इसे स्पष्ट करने के लिए लिखना आवश्यक लगा।
कुरआन व हदीस के अनगिनत प्रमाणों के आधार पर यह बात सर्वविदित है कि इन्सान के कथन एवं कार्य उसी समय सही तथा ग्रहणयोग्य हो सकते हैं, जब उन्हें सहीह अक़ीदे के साथ किया जाए। यदि अक़ीदा सही न हो, तो उसके आधार पर होने वाले कार्य एवं कथन व्यर्थ हो जाते हैं। इसी बात को स्पष्ट करते हुए अल्लाह तआला ने कहा है :
﴿...وَمَن يَكۡفُرۡ بِٱلۡإِيمَٰنِ فَقَدۡ حَبِطَ عَمَلُهُۥ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ﴾
"...और जो ईमान से इनकार करे, तो निश्चय उसका कर्म व्यर्थ हो गया तथा वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से है।" [सूरा अल-माइदा : 5]।
और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَلَقَدۡ أُوحِيَ إِلَيۡكَ وَإِلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكَ لَئِنۡ أَشۡرَكۡتَ لَيَحۡبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ 65﴾
"और निःसंदेह तुम्हारी ओर एवं तुमसे पहले के नबियों की ओर वह़्य की गई है कि यदि तुमने शिर्क किया, तो निश्चय तुम्हारा कर्म अवश्य नष्ट हो जाएगा और तुम निश्चित रूप से हानि उठाने वालों में से हो जाओगे।" [सूरा अल-ज़ुमर : 65]
क़ुरआन के अंदर इस आशय की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अल्लाह की स्पष्टवादी पुस्तक और उसके विश्वसनीय संदेष्टा -उनके ऊपर उनके रब की ओर से सर्वश्रेष्ठ दुरूद व सलाम हो- की सुन्नत से पता चलता है कि शुद्ध अक़ीदे का सारांश है : अल्लाह, उसके फ़रिशतों, उसकी किताबों, उसके संदेष्टाओं, आख़िरत के दिन तथा भली-बुरी तक़दीर पर विश्वास रखना। यही छह चीज़ें उस शुद्ध अक़ीदा के मूल सिद्धांत हैं, जिसके साथ अल्लाह की किताब अवतरित हुई है तथा जिसके साथ अल्लाह ने अपने संदेष्टा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भेजा है।
इन छह सिद्धांतों की सिद्धि के लिए क़ुरआन एवं हदीस के अंदर बहुत-से प्रमाण मौजूद हैं। उदाहरण-स्वरुप कुछ प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं :
1- क़ुरआन से प्रमाण; जैसे, सर्वशक्तिमान अल्लाह का कथन है :
﴿لَّيۡسَ ٱلۡبِرَّ أَن تُوَلُّواْ وُجُوهَكُمۡ قِبَلَ ٱلۡمَشۡرِقِ وَٱلۡمَغۡرِبِ وَلَٰكِنَّ ٱلۡبِرَّ مَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ وَٱلۡكِتَٰبِ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ...﴾
"नेकी केवल यही नहीं कि तुम अपने मुँह पूर्व और पश्चिम की ओर फेर लो! बल्कि असल नेकी तो उसकी है, जो अल्लाह और अंतिम दिन (आख़िरत) और फ़रिश्तों और पुस्तकों और नबियों पर ईमान लाए...।" [सूरा अल-बक़रा : 177]।
एक अन्य स्थान में उसने कहा है :
﴿ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّن رُّسُلِهِ...﴾
"रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनकी तरफ़ उनके पालनहार की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले भी। हर एक अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी पुस्तकों और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (वे कहते हैं) हम उसके रसूलों में से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते...।" [सूरा अल-बक़रा : 285]।
एक और स्थान पर पवित्र अल्लाह कहता है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ ءَامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَٱلۡكِتَٰبِ ٱلَّذِي نَزَّلَ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَٱلۡكِتَٰبِ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ مِن قَبۡلُۚ وَمَن يَكۡفُرۡ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ فَقَدۡ ضَلَّ ضَلَٰلَۢا بَعِيدًا 136﴾
"ऐ ईमान वालो! अल्लाह, उसके रसूल और उस पुस्तक पर ईमान लाओ जो अल्लाह ने अपने रसूल (मुहम्मद) पर उतारी और उस किताब पर भी जो उसने इससे पहले उतारी। और जो व्यक्ति अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी पुस्तकों और अंतिम दिवस (परलोक) का इनकार करे, वह निश्चय बहुत दूर की गुमराही में जा पड़ा।" [सूरा अल-निसा : 136]।
एक और स्थान पर पवित्र अल्लाह कहता है :
﴿أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِۚ إِنَّ ذَٰلِكَ فِي كِتَٰبٍۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ 70﴾
"(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह जानता है, जो आकाश तथा धरती में है? निःसंदेह यह एक किताब में (अंकित) है। निःसंदेह यह अल्लाह के लिए अति सरल है।" [सूरा हज्ज : 70]।
2- सुन्नत से प्रमाण; इनमें वह सुप्रसिद्ध सहीह हदीस भी शामिल है, जिसका वर्णन इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में अमीरुल मोमिनीन उमर बिन खत्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हु- से किया है। उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि जिब्रील -अलैहिस्सलाम- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से ईमान के बारे में पूछा, तो आपने उत्तर दिया :
«الإِيمَانُ أَنْ تُؤْمِنَ بِاللَّهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكُتُبِهِ، وَرُسُلِهِ، وَاليَوْمِ الآخِرِ، وَتُؤْمِنَ بِالقَدَرِ خَيْرِهِ وَشَرِّهِ».
"ईमान यह है कि तुम अल्लाह, उसके फरिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, अंतिम दिन तथा अच्छे एवं बुरे भाग्य पर ईमान लाओ।"(1) पूरी हदीस देखें। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने मामूली अंतर के साथ अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।"
इन छह मूल सिद्धांतों से ही पवित्र एवं महान अल्लाह की हस्ती, आख़िरत तथा इसके अतिरिक्त अन्य सभी परोक्ष संबंधित विषय निकलते हैं, जिनपर विश्वास रखना ज़रूरी है, और जिनके बारे में सर्वशक्तिमान अल्लाह तथा उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है।
इन छह सिद्धांतों का विवरण इस प्रकार है :
पहला सिद्धांत : अल्लाह तआला पर ईमान लाना।
इसके अंदर कुछ चीज़ें शामिल हैं : जैसे : इस बात पर ईमान कि अल्लाह ही वास्तविक पूज्य एवं वंदनीय है, और उसके अतिरिक्त कोई वंदना का हक़दार नहीं है। क्योंकि वही बंदों का स्रष्टा, उनके ऊपर उपकार करने वाला, उनको जीविका प्रदान करने वाला, उनकी खुली तथा छिपी बातों को जानने वाला तथा आज्ञाकारियों को प्रतिफल प्रदान करने और अवज्ञाकारियों को दंड देने की क्षमता रखने वाला है।
इसी इबादत के लिए अल्लाह ने जिन्न एवं इनसान को पैदा फ़रमाया और इसी का उनको आदेश दिया है। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿وَمَا خَلَقۡتُ ٱلۡجِنَّ وَٱلۡإِنسَ إِلَّا لِيَعۡبُدُونِ 56 مَآ أُرِيدُ مِنۡهُم مِّن رِّزۡقٖ وَمَآ أُرِيدُ أَن يُطۡعِمُونِ 57 إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلرَّزَّاقُ ذُو ٱلۡقُوَّةِ ٱلۡمَتِينُ 58﴾
"और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें। मैं उनसे कोई रोज़ी नहीं चाहता और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ। निःसंदेह अल्लाह ही बहुत रोज़ी देनेवाला, बड़ा शक्तिशाली, अत्यंत मज़बूत है।" [सूरा अल-ज़ारियात : 56-58]।
और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱعۡبُدُواْ رَبَّكُمُ ٱلَّذِي خَلَقَكُمۡ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ 21 ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلۡأَرۡضَ فِرَٰشٗا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءٗ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَخۡرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزۡقٗا لَّكُمۡۖ فَلَا تَجۡعَلُواْ لِلَّهِ أَندَادٗا وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ 22﴾
"ऐ लोगो! अपने उस पालनहार की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ। जिसने तुम्हारे लिए धरती को एक बिछौना तथा आकाश को एक छत बनाया और आकाश से कुछ पानी उतारा, फिर उससे कई प्रकार के फल तुम्हारी जीविका के लिए पैदा किए। अतः अल्लाह के लिए किसी प्रकार के साझी न बनाओ, जबकि तुम जानते हो।" [सूरा अल-बक़रा : 21-22]।
इसी सत्य को बयान करने, इसी की ओर लोगों को बुलाने और इसके विरुद्ध चीज़ों से सावधान करने के लिए अल्लाह ने रसूलों को भेजा और किताबें उतारी हैं। स्वयं अल्लाह तआला ने कहा है :
﴿وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَ...﴾
"और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो...।" [सूरा अल-नह्ल : 36]।
और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَمَآ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِيٓ إِلَيۡهِ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّآ أَنَاْ فَٱعۡبُدُونِ 25﴾
"और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते थे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत करो।" [सूरा अल-अंबिया : 25]।
एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :
﴿الر كِتَابٌ أُحْكِمَتْ آيَاتُهُ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِنْ لَدُنْ حَكِيمٍ خَبِيرٍ 1 أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ إِنَّنِي لَكُمْ مِنْهُ نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ 2﴾
"अलिफ, लाम, रा। यह एक पुस्तक है, जिसकी आयतें सुदृढ़ की गईं, फिर उन्हें सविस्तार स्पष्ट किया गया एक पूर्ण हिकमत वाले की ओर से जो पूरी ख़बर रखने वाला है। यह कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो। निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए उसकी ओर से एक डराने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ।" [सूरा हूद : 1-2]।
इस इबादत (उपासना) का वास्तविक अर्थ यह है कि बंदे दुआ, भय, आशा, नमाज़, रोज़ा, क़ुर्बानी और मन्नत आदि हर प्रकार की इबादतें विशुद्ध रूप से अल्लाह के लिए, उसके आगे विनम्रता का प्रदर्शन करते हुए, अपने दिल में उसकी चाहत एवं भय रखते हुए, उससे संपूर्ण प्रेम एवं उसकी महानता के आगे अपनी हीनता का प्रदर्शन करते हुए करें।
पवित्र क़ुरआन को ध्यान से पढ़ने वाला हर व्यक्ति पाएगा कि उसका अधिकांश भाग इसी विशाल सिद्धांत की व्याख्या करता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿إِنَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ فَٱعۡبُدِ ٱللَّهَ مُخۡلِصٗا لَّهُ ٱلدِّينَ 2 أَلَا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ 3﴾
"निःसंदेह हमने आपकी ओर यह पुस्तक सत्य के साथ उतारी है। अतः आप अल्लाह की इबादत इस तरह करें कि धर्म को उसी के लिए खालिस करने वाले हों। सुन लो! ख़ालिस (विशुद्ध) धर्म केवल अल्लाह ही के लिए है। तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें। निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो।" [सूरा अल-ज़ुमर : 2-3]।
इसी प्रकार अल्लाह तआला फ़रमाता है :
﴿وَقَضَىٰ رَبُّكَ أَلَّا تَعۡبُدُوٓاْ إِلَّآ إِيَّاهُ...﴾
"और (ऐ बंदे) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो...।" [सूरा अल-इसरा : 23]।
इसी तरह उसका कथन है :
﴿فَٱدۡعُواْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡكَٰفِرُونَ 14﴾
"अतः तुम अल्लाह को, उसके लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए पुकारो, यद्यपि काफ़िरों को बुरा लगे।" [सूरा ग़ाफ़िर : 14]।
इसी तरह सुन्नत-ए-नबवी को ग़ौर से देखने पर भी मिलेगा कि इस सिद्धांत पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया गया है। सहीह बुखारी एवं सहीह मुस्लिम में मुआज़ -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :
«حَقُّ اللهِ عَلَى العِبَادِ أَن يَعْبُدُوهُ وَلَا يُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا».
"अल्लाह का हक बंदों के ऊपर यह है कि वे उसकी उपासना करें और उसका किसी को साझी न ठहराएँ।"(2)
अल्लाह पर ईमान में यह बात भी दाख़िल है कि उसके द्वारा बंदों पर फ़र्ज़ किए गए इस्लाम के पाँचों प्रत्यक्ष स्तंभों पर ईमान रखा जाए।
इस्लाम के पाँच प्रत्यक्ष स्तंभ हैं : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना, और सामर्थ्य रखने वाले पर अल्लाह के पवित्र घर काबा का हज करना; तथा पवित्र इस्लामी शरीअत में अनिवार्य की गई अन्य चीज़ें भी शामिल हैं।
इस्लाम के पाँच स्तंभों में सबसे महत्वपूर्ण और महान स्तंभ इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। इस गवाही का तक़ाज़ा यह है कि विशुद्ध रूप से केवल उसी की इबादत की जाए और उसके अतिरिक्त किसी की इबादत न की जाए। यही ला इलाहा इल्लल्लाह का वास्तविक अर्थ है। क्योंकि इस्लामी विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। इससे साबित यह हुआ कि उसके अतिरिक्त जितने भी इनसान, फ़रिश्ते एवं जिन्नात आदि पूजे जाते हैं, सब के सब असत्य पूज्य हैं और एकमात्र सत्य पूज्य केवल अल्लाह है। उसका कोई साझी एवं शरीक नहीं है। स्वयं अल्लाह तआला का फ़रमान है:
﴿ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدۡعُونَ مِن دُونِهِۦ هُوَ ٱلۡبَٰطِلُ...﴾
"यह इसलिए कि अल्लाह ही सत्य है, और जिसे वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वह असत्य है...।" [सूरा अल-हज्ज : 62]।
हम पीछे बयान कर आए हैं कि अल्लाह तआला ने जिन्न और इनसान को इसी महान सत्य को स्थापित करने के लिए पैदा किया है, उनको इसी के अनुपालन का आदेश दिया है, इसी के प्रचार-प्रसार के लिए रसूलों को भेजा है और इसी की व्याख्या के लिए किताबें उतारी हैं। अतः बंदे को इसपर अच्छे से विचार करना चाहिए, ताकि जान सके कि आज अधिकतर मुसलमान इस मूलभूत तथ्य से किस क़दर अनभिज्ञ हैं कि वे अल्लाह के साथ अन्य की इबादत किए जा रहे हैं और उसका शुद्ध अधिकार दूसरों को दिए जा रहे हैं। अल्लाह ही मदद कर सकता है।
अल्लाह पर ईमान के अंदर इस बात पर विश्वास भी शामिल है कि अल्लाह ही संसार का रचयिता, संचालनकर्ता और अपने ज्ञान एवं सामर्थ्य के आधार पर संसारवासियों के बारे में जिस तरह का चाहे, निर्णय लेने वाला है। वही लोक तथा परलोक का स्वामी और सारे संसार का रब है। उसके अलावा कोई स्रष्टा और उसके सिवा कोई रब नहीं है। उसने बंदों के सुधार और उन्हें दुनिया एवं आख़िरत में मुक्ति का मार्ग दिखाने के लिए रसूल भेजे और किताबें उतारीं। साथ ही यह कि इन तमाम बातों में उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿ٱللَّهُ خَٰلِقُ كُلِّ شَيۡءٖۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ وَكِيلٞ 62﴾
"अल्लाह ही प्रत्येक वस्तु का पैदा करने वाला है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है।" [सूरा ज़ुमर : 62]।
और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٖ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِۖ يُغۡشِي ٱلَّيۡلَ ٱلنَّهَارَ يَطۡلُبُهُۥ حَثِيثٗا وَٱلشَّمۡسَ وَٱلۡقَمَرَ وَٱلنُّجُومَ مُسَخَّرَٰتِۭ بِأَمۡرِهِۦٓۗ أَلَا لَهُ ٱلۡخَلۡقُ وَٱلۡأَمۡرُۗ تَبَارَكَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ 54﴾
"निःसंदेह तुम्हारा पालनहार वह अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में बनाया। फिर अर्श (सिंहासन) पर बुलंद हुआ। वह रात से दिन को ढाँप देता है, जो उसके पीछे दौड़ता हुआ चला आता है। तथा सूर्य और चाँद और तारे (बनाए), इस हाल में कि वे उसके आदेश के अधीन किए हुए हैं। सुन लो! सृष्टि करना और आदेश देना उसी का काम है। बहुत बरकत वाला है अल्लाह, जो सारे संसारों का पालनहार है।" [सूरा आराफ़ : 54]।
अल्लाह पर ईमान के अंदर क़ुरआन में वर्णित और पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से साबित अल्लाह के अच्छे-अच्छे नामों और सर्वोच्च गुणों पर, उनसे छेड़-छाड़ किए बिना, उनका इनकार किए बिना, उनके विवरण में जाए बिना और उनका उदाहरण दिए बिना, हूबहू उसी तरह ईमान भी शामिल है, जैसे वह आए हुए हैं। अल्लाह तआला का कथन हैः
﴿...لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ﴾
"उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।" [सूरा अश-शूरा : 11]।
साथ ही उन नामों एवं गुणों के विशाल अर्थों पर भी ईमान लाना ज़रूरी है, जो दरअसल सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के गुण हैं और जिनसे उसे उसकी महानता एवं प्रताप के अनुसार सुशोभित करना अनिवार्य है और जिनमें से किसी भी गुण में वह अपनी सृष्टि के समान नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿فَلَا تَضۡرِبُواْ لِلَّهِ ٱلۡأَمۡثَالَۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ وَأَنتُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ74﴾
"अतः अल्लाह के लिए उदाहरण (उपमा) न गढ़ो। निःसंदेह अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।" [सूरा अन-नह्ल : 74]।
अल्लाह के नामों और गुणों के बारे में यही अह्ल-ए-सुन्नत व जमात यानी अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथियों और भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वाले लोगों का अक़ीदा है। इसी अक़ीदा को इमाम अबुल हसन अशअरी ने अपनी किताब "अल-मक़ालात" में असहाब-ए-हदीस और अहल-ए-सुन्नत से नक़ल किया है, तथा इसे ही उनके अलावा अन्य मुस्लिम विद्वानों ने भी नक़ल किया है।
औज़ाई रहिमहुल्लाह कहते हैं : ज़ुहरी और मकहूल से अल्लाह के गुणों वाली आयतों के बारे में पूछा गया, तो दोनों ने कहा : "उनको उसी तरह मान लो, जैसे वे आई हुई हैं।"(3)
औज़ाई रहिमहुल्लाह का एक और कथन है : "हम, जबकि ताबेईगण पर्याप्त संख्या में मौजूद थे, कहा करते थे कि अल्लाह अपने सिंहासन (अर्श) के ऊपर है तथा हम हदीस में वर्णित अल्लाह के गुणों पर ईमान रखते हैं।"(4)
वलीद बिन मुस्लिम रहिमहुल्लाह कहते हैं : मालिक, औज़ाई, लैस बिन साद और सुफ़यान सौरी से अल्लाह के गुणों वाली हदीसों के बारे में पूछा गया, तो सब ने कहा : "उन्हें उनके विवरण में जाए बिना उसी तरह मान लो, जिस तरह आई हुई हैं।"(5)
जब इमाम मालिक के गुरु रबीआ बिन अबू अब्दुर रहमान से "इस्तिवा" यानी अल्लाह के अर्श के ऊपर होने के बारे में प्रश्न किया गया, तो उन्होंने उत्तर दिया : "इस्तिवा कोई अज्ञात वस्तु नहीं है, लेकिन उसकी स्थिति का वर्णन समझ में नहीं आ सकता। संदेश अल्लाह की ओर से आता है, रसूल का काम स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है और हमारा कर्तव्य उसकी पुष्टि करना है।"(6) इसी तरह जब इमाम मालिक रहिमहुल्लाह से इसके बारे में पूछा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया : इस्तिवा ज्ञात है, उसकी कैफ़ियत (विवरण) अज्ञात है, उसपर ईमान लाना अनिवार्य है और उसके बारे में प्रश्न करना बिदअत है।" फिर उन्होंने पूछने वाले से कहा: "मुझे तो तुम एक बुरे आदमी जान पड़ते हो!" और उन्होंने उसे अपनी सभा से बाहर निकाल देने का आदेश दिया, और उसे बाहर निकाल दिया गया।(7) यही अर्थ वाली बात मुसलमानों की माता उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से भी रिवायत की गई है।(8)
इमाम अब्दुर रहमान बिन मुबारक कहते हैं : "हम अपने रब को जानते हैं कि वह अपने बनाए हुए आकाशों के ऊपर अपने अर्श (सिंहासन) के ऊपर है और अपनी सृष्टि से अलग है।"(9)
इस विषय में बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम विद्वानों के कथन मौजूद हैं, जिन्हें इस पुस्तिका में नक़ल करना संभव नहीं है। जो व्यक्ति अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता है, वह इस विषय़ में उलमा-ए-सुन्नत की लिखी हुई पुस्तकों का अध्ययन करे। उदाहरण के तौर पर अब्दुल्लाह बिन इमाम अहमद की किताब "अस-सुन्नह", महान इमाम मुहम्मद बिन खुज़ैमा की किताब "अत-तौहीद", अबुल क़ासिम अल-लालकाई अत-तबरी की किताब "अस-सुन्नह" तथा शैखुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया की ओर से हमात वासियों को दिया गया उत्तर आदि। शैख़ुल इस्लाम का यह उत्तर एक विशाल एवं अति लाभदायक उत्तर है। इसमें शैखुल इस्लाम ने अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है, बहुत-से मुस्लिम विद्वानों के कथन नक़ल किए हैं तथा अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे के पक्ष में और उनके विरोधियों के अक़ीदे के खंडन में शरई एवं अक़्ली प्रमाण प्रस्तुत किए हैं।
इसी तरह उनकी पुस्तिका "अल-तदमुरिय्यह" का भी बड़ा महत्व है। इसमें उन्होंने अल्लाह के नामों एवं गुणों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखते हुए अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे को शरई एवं अक़्ली प्रमाणों के साथ बयान किया है और विरोधियों का खंडन किया है। फिर, यह सब कुछ इस अंदाज़ में किया है कि सही नीयत एवं सत्य से अवगत होने की सच्ची चाहत के साथ पढ़ने वाले के सामने सत्य स्पष्ट होकर आ जाता है और असत्य की अप्रासंगिकता ज़ाहिर हो जाती है। अल्लाह के नामों एवं गुणों के संबंध में अहल-ए-सुन्नत व जमात के अक़ीदे का सारांश यह है कि: उन्होंने अल्लाह के उन सभी नामों एवं गुणों को, जिन्हें उसने अपनी किताब में या फिर उसके संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी हदीस में बयान किया है, बिना उनका उदाहरण दिए साबित किया है तथा पवित्र एवं महान अल्लाह को उसकी सृष्टि के समान व समरूप होने से इस तरह पाक व पवित्र ठहराया है कि उससे उसके नामों और गुणों का अर्थहीन होना लाज़िम नहीं आता। इस तरह वे अंतर्विरोध से सुरक्षित रहे, और सभी दलीलों पर अमल भी हो गया। दरअसल अल्लाह का यह नियम है कि जो व्यक्ति उसके रसूलों के लाए हुए सत्य को थामे रहता है और सच्ची लगन से सत्य की तलाश में रहता है, उसे अल्लाह सत्य पर जमे रहने का सुयोग प्रदान करता है और उसके सामने सत्य के प्रमाणों को ज़ाहिर कर देता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿بَلۡ نَقۡذِفُ بِٱلۡحَقِّ عَلَى ٱلۡبَٰطِلِ فَيَدۡمَغُهُۥ فَإِذَا هُوَ زَاهِقٞ...﴾
"बल्कि हम सत्य को असत्य पर फेंक मारते हैं, तो वह उसका सिर कुचल देता है, तो एकाएक वह मिटने वाला होता है...।" [सूरा अंबिया : 18]।
और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः
﴿وَلَا يَأۡتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئۡنَٰكَ بِٱلۡحَقِّ وَأَحۡسَنَ تَفۡسِيرًا 33﴾
"और (ऐ रसूल!) जब भी वे आपके पास कोई उदाहरण लाते हैं, तो हम आपके पास सत्य और उत्तम व्याख्या ले आते हैं।" [सूरा फ़ुरक़ान : 33]।
दरअसल जो भी अल्लाह के नामों तथा गुणों के विषय में अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे के विरुद्ध गया है, उसे शरई एवं अक़्ली प्रमाणों के विरुद्ध जाना और स्वयं अपनी कही हुई बातों में विरोधाभास का शिकार होना पड़ा है। हाफ़िज़ इब्ने कसीर ने अपनी सुप्रसिद्ध तफ़सीर में इस विषय में बड़ी अच्छी बात कही है। यह बात उन्होंने सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के इस कथन के बारे में बात करते हुए कही है:
﴿إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٖ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِ...﴾
"निःसंदेह तुम्हारा पालनहार वह अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में बनाया। फिर अर्श (सिंहासन) पर बुलंद हुआ...।" [सूरा आराफ़ : 54]।
उनकी बात के महत्व को देखते हुए मैं उसे यहाँ नक़ल कर देना मुनासिब समझता हूँ। वह कहते हैं :
इस विषय में लोगों के बहुत-से अलग-अलग मत हैं, जिन्हें यहाँ बयान नहीं किया जा सकता। यहाँ हम मालिक, औज़ाई, सुफ़यान सौरी, लैस बिन साद, शाफ़िई, अहमद और इसहाक़ बिन राहवैह आदि सदाचारी पूर्वजों और अन्य पुराने एवं नए मुस्लिम इमामों के मार्ग पर चलेंगे। उनका मार्ग यह हैः अल्लाह के नामों एवं गुणों पर आधारित आयतों एवं हदीसों को हूबहू उसी तरह मान लिया जाए, जिस तरह वह आई हुई हैं। न नामों एवं गुणों का विवरण प्रस्तुत किया जाए, न समरूपता दिखाई जाए और न उनको अर्थहीन सिद्ध किया जाए। दरअसल, तश्बीह देने वालों के ज़ेहन में सबसे पहले जो बात आती है, वह अल्लाह के बारे में अस्वीकार्य है, क्योंकि अल्लाह के समान उसकी कोई सृष्टि नहीं हो सकती। स्वयं उसी का फ़रमान है :
﴿...لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ﴾
"... उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।" [सूरा अश-शूरा : 11]। बल्कि मामला वैसा ही है जैसा कि इमामों ने कहा है। उनमें से इमाम बुख़ारी के गुरु नुएैम बिन हम्माद अल-खुज़ाई कहते हैं: "जिसने अल्लाह को उसकी सृष्टि के समरूप कहा, उसने कुफ़्र किया और जिसने अल्लाह के स्वयं अपने लिए सिद्ध किए हुए किसी गुण का इनकार किया, उसने कुफ़्र किया।"(10) अल्लाह के जो गुण स्वयं उसने तथा उसके रसूल ने बताए हैं, उनके अंदर तशबीह (समरुपता) जैसी कोई बात नहीं है। अतः जिसने स्पष्ट आयतों और सहीह हदीसों के अंदर वर्णित अल्लाह के नामों एवं गुणों को, उसकी महानता एवं प्रताप के अनुरूप ही उसके लिए साबित किया तथा उसे त्रुटियों एवं कमियों से पाक जाना, वह सत्य के मार्ग पर चलने वाला है।"(11) इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह की बात समाप्त हुई।
अल्लाह पर ईमान के अंदर यह विश्वास भी दाख़िल है कि ईमान कथन एवं कर्म का नाम है, जो आज्ञापालन से बढ़ता और अवज्ञा से घटता है। साथ ही यह कि किसी मुसलमान को कुफ़्र एवं शिर्क के अतिरिक्त किसी बड़े से बड़े गुनाह जैसे व्यभिचार, चोरी, सूदखोरी, मदिरापान, माता-पिता की अवज्ञा आदि के कारण काफ़िर नहीं कहा जा सकता, जब तक वह उन्हें जायज़ न समझता हो। क्योंकि पवित्र एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغۡفِرُ أَن يُشۡرَكَ بِهِۦ وَيَغۡفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَآءُ...﴾
"निःसंदेह, अल्लाह यह क्षमा नहीं करेगा कि उसका साझी बनाया जाए और इसके सिवा जिसे चाहेगा, क्षमा कर देगा...।" [सूरा अन-निसा : 48]।
इसी तरह, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सहाबा और उनके बाद हर ज़माने में बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने इस बात को नक़ल किया है। मसलन एक हदीस में है :
«إِنَّ اللهَ يُخْرِجُ مِنَ النَّارِ مَنْ كَانَ فِي قَلْبِهِ مِثْقَالُ حَبَّةٍ مِنْ خَرْدَلٍ مِنْ إِيْمَانٍ».
"अल्लाह जहन्नम से हर उस व्यक्ति को निकाल लेगा, जिसके दिल में राई के दाने के बराबर भी ईमान होगा।"(12)
दूसरा मूल आधार : फ़रिश्तों पर ईमान।
इसके अंदर दो बातें शामिल हैं :
पहली यह कि: तमाम फ़रिश्तों पर सामूहिक रूप से ईमान रखा जाए। यानी हम इस बात पर ईमान रखें कि अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते हैं, जिन्हें उसने अपनी इबादत के लिए पैदा किया है और उनके बारे में बताया है कि :
﴿وَقَالُواْ ٱتَّخَذَ ٱلرَّحۡمَٰنُ وَلَدٗاۗ سُبۡحَٰنَهُۥۚ بَلۡ عِبَادٞ مُّكۡرَمُونَ 26 لَا يَسۡبِقُونَهُۥ بِٱلۡقَوۡلِ وَهُم بِأَمۡرِهِۦ يَعۡمَلُونَ 27 يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡ وَلَا يَشۡفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ٱرۡتَضَىٰ وَهُم مِّنۡ خَشۡيَتِهِۦ مُشۡفِقُونَ 28﴾
"और उन (मुश्रिकों) ने कहा कि 'रहमान' (अत्यंत दयावान्) ने कोई संतान बना रखी है। वह (इससे) पवित्र है। बल्कि वे (फ़रिश्ते) सम्मानित बंदे हैं। वे बात करने में उससे पहल नहीं करते और वे उसके आदेशानुसार ही काम करते हैं। वह जानता है, जो उनके सामने है और जो उनके पीछे है। और वे सिफ़ारिश नहीं करते, परंतु उसी के लिए जिसे वह पसंद करे। तथा वे उसी के भय से डरने वाले हैं।" [सूरा अंबिया : 26-28]।
उनके बहुत से प्रकार हैं : कुछ फ़रिश्ते अर्श को उठाने पर नियुक्त हैं, कुछ स्वर्ग और नरक के दारोगा हैं, और कुछ बंदों के कर्मों को लिखने पर नियुक्त हैं।
दूसरी यह कि; उनपर सविस्तार ईमान रखा जाए। यानी जिन फ़रिश्तों को अल्लाह और उसके पैगंबर ने, उनका नाम लेकर चिह्नित किया है, हम उनपर विस्तार के साथ ईमान रखें। जैसे- जिबरील वह्य लाने के कार्य पर नियुक्त हैं, मीकाईल बारिश बरसाने के काम पर नियुक्त हैं, मालिक जहन्नम के दरोगा हैं, और इसराईल सूर फूँकने के कार्य पर नियुक्त हैं। इन फ़रिश्तों का ज़िक्र सहीह हदीसों में हुआ है। मसलन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«خُلِقَتِ الـمَلَائِكَةُ مِن نُورٍ، وَخُلِقَ الجَانُّ مِنْ مَارِجٍ مِنْ نَارٍ، وَخُلِقَ آدَمُ مِمَّا وُصِفَ لَكُم».
''फ़रिश्ते नूर से पैदा किए गए हैं, जिन्न धधकती आग से पैदा किए गए हैं और आदम (अलैहिस्सलाम) उस चीज़ से पैदा किए गए हैं, जिसके बारे में तुम्हें बताया गया है।''(13) इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह (सहीह मुस्लिम) में इसे रिवायत किया है।
तीसरा मूल आधार : किताबों पर ईमान
इसमें भी दो बातें शामिल हैं :
पहली यह कि सामूहिक रूप से तमाम किताबों पर ईमान रखा जाए। यानी हम इस बात पर ईमान रखें कि अल्लाह तआला ने अपने नबियों और रसूलों पर सत्य को स्पष्ट करने और उसकी ओर बुलाने के लिए किताबें उतारी हैं। अल्लाह का फ़रमान है :
﴿لَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا رُسُلَنَا بِٱلۡبَيِّنَٰتِ وَأَنزَلۡنَا مَعَهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡمِيزَانَ لِيَقُومَ ٱلنَّاسُ بِٱلۡقِسۡطِ...﴾
"निःसंदेह हमने अपने रसूलों को स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा तथा उनके साथ पुस्तक और तराज़ू उतारा, ताकि लोग न्याय पर क़ायम रहें...।" [सूरा हदीद : 25]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿كَانَ ٱلنَّاسُ أُمَّةٗ وَٰحِدَةٗ فَبَعَثَ ٱللَّهُ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَ ٱلنَّاسِ فِيمَا ٱخۡتَلَفُواْ فِيهِ...﴾
"(आरंभ में) सब लोग एक ही समुदाय थे। (फिर विभेद हुआ) तो अल्लाह ने नबी भेजे, शुभ समाचार सुनाने वाले और डराने वाले, और उनपर सत्य के साथ पुस्तक उतारी, ताकि वह लोगों के बीच उन बातों का फैसला करें, जिनमें उन्होंने मतभेद किया था।" [सूरा बक़रा : 213]।
दूसरी यह कि; किताबों पर सविस्तार ईमान रखा जाए। यानी हम तौरात, इंजील, ज़बूर एवं क़ुरआन आदि उन किताबों पर ईमान रखें, जिनको अल्लाह ने नाम लेकर बयान किया है और विश्वास रखें कि क़ुरआन अंतिम एवं सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है। यह सब किताबों का संरक्षण और सबकी पुष्टि करने वाली किताब है। क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रमाणित हदीसों का अनुसरण सभी लोगों के लिए अनिवार्य है। क्योंकि अल्लाह ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संदेष्टा के रूप में मनुष्य और जिन्न दोनों संप्रदायों की ओर भेजा था और आप पर क़ुरआन उतारा था, ताकि आप उसी के आलोक में सारे निर्णय लें। अल्लाह ने इसे दिलों के लिए रोगनिवारक, हर चीज़ को स्पष्ट करने वाला और मोमिनों के लिए मार्गदर्शन, दया एवं करुणा बनाया है। स्वयं उसी का फ़रमान है :
﴿وَهَٰذَا كِتَٰبٌ أَنزَلۡنَٰهُ مُبَارَكٞ فَٱتَّبِعُوهُ وَٱتَّقُواْ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ 155﴾
"तथा यह एक बरकत वाली पुस्तक है, जिसे हमने उतारा है। अतः इसका अनुसरण करो और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुमपर दया की जाए।" [सूरा अनआम : 155]।
एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَنَزَّلۡنَا عَلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ تِبۡيَٰنٗا لِّكُلِّ شَيۡءٖ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٗ وَبُشۡرَىٰ لِلۡمُسۡلِمِينَ﴾
"...और हमने आप पर यह पुस्तक (क़ुरआन) अवतरित की, जो प्रत्येक विषय का स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन और दया और आज्ञाकारियों के लिए शुभ सूचना है।" [सूरा नह्ल : 89]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنِّي رَسُولُ ٱللَّهِ إِلَيۡكُمۡ جَمِيعًا ٱلَّذِي لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُۖ فَـَٔامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِ ٱلنَّبِيِّ ٱلۡأُمِّيِّ ٱلَّذِي يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَكَلِمَٰتِهِۦ وَٱتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ 158﴾
"(ऐ नबी!) आप कह दें कि ऐ मानव जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जिसके लिए आकाशों तथा धरती का राज्य है। उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। वही जीवन देता और मारता है। अतः तुम अल्लाह पर और उसके रसूल उम्मी नबी पर ईमान लाओ, जो अल्लाह पर और उसकी सभी वाणियों (पुस्तकों) पर ईमान रखता है और उसका अनुसरण करो, ताकि तुम सीधा मार्ग पाओ।" [सूरा आराफ़ : 158]।
क़ुर्आन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
चौथा मूल आधार : रसूलों पर ईमान
इसके अंदर भी दो बातें शामिल हैं : पहली यह कि; हम सभी रसूलों पर सामूहिक रूप से ईमान रखें। यानी हम ईमान रखें कि अल्लाह ने अपने बंदों की ओर उन्हीं में से कुछ लोगों को रसूल के रूप में भेजा है, ताकि लोगों को शुभ सूचना दें, सावधान करें तथा सत्य की ओर बुलाएँ। अब, जो उनके आमंत्रण को स्वीकार करेगा, वह सौभाग्य प्राप्त करेगा और जो उनका विरोध करेगा, वह विफलता एवं पश्चाताप का पात्र बनेगा। इन संदेष्टाओं की अंतिम कड़ी और सर्वश्रेष्ठ संदेष्टा हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया है :
﴿وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَ...﴾
"और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो...।" [सूरा अल-नह्ल : 36]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿رُّسُلٗا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةُۢ بَعۡدَ ٱلرُّسُلِ...﴾
"ऐसे रसूल जो शुभ सूचना सुनाने वाले और डराने वाले थे। ताकि लोगों के पास रसूलों के बाद अल्लाह के मुक़ाबले में कोई तर्क न रह जाए...।" [सूरा निसा : 165]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَآ أَحَدٖ مِّن رِّجَالِكُمۡ وَلَٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ...﴾
"मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। बल्कि वह अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक हैं...।" [सूरा अहज़ाब : 40]।
दूसरी यह किः हम रसूलों पर सविस्तार ईमान रखें। यानी अल्लाह तआला और उसके रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जिन पैग़ंबरों का नाम लिया है, हम उनपर विस्तृत रूप से और निर्धारण के साथ ईमान रखें। जैसे नूह, हूद, सालेह, इब्राहीम और इनके अलावा अन्य रसूल। उनपर तथा हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा आपके परिजनों एवं अनुसरणकारियों पर सर्वश्रेष्ठ दुरूद एवं निर्मल शांति की धारा बरसे।
पाँचवाँ मूल आधार : आख़िरत के दिन पर ईमान
इसके अंदर शामिल है :
अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बताई हुई मृत्यु के बाद की सारी घटनाओं, जैसे क़ब्र की परीक्षा, उसकी यातना और उसकी नेमतों और इसी तरह क़ियामत के दिन घटित होने वाली सारी घटनाओं, जैसे उस दिन की भयावहता, कठिन परिस्थितियाँ, सिरात पर लोगों का चलना, कर्मों का तोला जाना, हिसाब होना, प्रतिफल दिया जाना, कर्म पत्र दिया जाना, किसी का दाएँ हाथ में, किसी का बाएँ हाथ में और किसी का पीठ के पीछे से कर्म पत्र प्राप्त करना आदि तमाम बातों पर विश्वास रखना।
इसी तरह, उसके अंदर हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को क़ियामत के दिन दिए जाने वाले हौज़-ए-कौसर, जन्नत और जहन्नम, ईमान वालों के अपने रब को देखने तथा अल्लाह के उनसे बात करने के साथ-साथ उन तमाम बातों पर विश्वास रखना शामिल है, जिनका उल्लेख पवित्र क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह सुन्नत में हुआ है। इन तमाम बातों पर विश्वास रखना और इनकी उसी प्रकार पुष्टि करना अनिवार्य है, जिस प्रकार अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है।
छठा मूल आधार : तक़दीर पर ईमान
तक़दीर पर ईमान के अंदर चार बातें शामिल हैं :
पहली बात : इस बात पर ईमान कि अल्लाह तआला, जो कुछ हो चुका है उसे भी जानता है और जो कुछ होने वाला है उसे भी जानता है। वह बंदों की हर बात और हर गतिविधि से अवगत है। वह उन्हें प्राप्त होने वाली जीविकाओं, मृत्यु के समय, आयु और कर्मों आदि सारी बातों से अवगत है। इनमें से कोई भी बात उससे नहीं छिपती। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿...وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ﴾
"और जान लो कि अल्लाह हर चीज़ को ख़ूब जानने वाला है...।" [सूरा बक़रा : 231]।
एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :
﴿...لِتَعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ وَأَنَّ ٱللَّهَ قَدۡ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عِلۡمَۢا﴾
"...ताकि तुम जान लो कि अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है और यह कि अल्लाह ने निश्चय प्रत्येक वस्तु को अपने ज्ञान के साथ घेर रखा है।" [सूरा तलाक़ : 12]।
दूसरी बात : अल्लाह तआला ने अपनी सारी योजनाओं तथा निर्णयों को लिख रखा है। स्वयं उसी का फ़रमान है :
﴿قَدۡ عَلِمۡنَا مَا تَنقُصُ ٱلۡأَرۡضُ مِنۡهُمۡۖ وَعِندَنَا كِتَٰبٌ حَفِيظُۢ 4﴾
"निश्चय हमें मालूम है जो कुछ धरती उनमें से कम करती है और हमारे पास एक पुस्तक है, जो ख़ूब सुरक्षित रखने वाली है।" [सूरा क़ाफ़ : 4]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَكُلَّ شَيۡءٍ أَحۡصَيۡنَٰهُ فِيٓ إِمَامٖ مُّبِينٖ﴾
"...तथा प्रत्येक वस्तु को हमने स्पष्ट पुस्तक में दर्ज कर रखा है।" [सूरा यासीन : 12]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِۚ إِنَّ ذَٰلِكَ فِي كِتَٰبٍۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ 70﴾
"(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह जानता है, जो आकाश तथा धरती में है? निःसंदेह यह एक किताब में (अंकित) है। निःसंदेह यह अल्लाह के लिए अति सरल है।" [सूरा अल-हज्ज : 70]।
तीसरी बात : अल्लाह की सार्वभौमिक इच्छा पर ईमान रखना और विश्वास रखना कि अल्लाह जो चाहेगा, वह होगा और जो नहीं चाहेगा, वह नहीं होगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿...إِنَّ ٱللَّهَ يَفۡعَلُ مَا يَشَآءُ﴾
"...निःसंदेह अल्लाह जो चाहता है, करता है।" [सूरा हज्ज : 18]।
एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :
﴿إِنَّمَآ أَمۡرُهُۥٓ إِذَآ أَرَادَ شَيۡـًٔا أَن يَقُولَ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ 82﴾
"उसका आदेश, जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो केवल यह होता है कि उससे कहता है "हो जा", तो वह हो जाती है।" [सूरा यासीन : 82]।
एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَا تَشَآءُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ 29﴾
"तथा तुम कुछ नहीं चाह सकते, सिवाय इसके कि सर्व संसार का पालनहार अल्लाह चाहे।" [सूरा तकवीर : 29]।
चौथी बात : इस बात पर ईमान कि सभी अस्तित्व में आई हुई चीज़ों को अल्लाह ने पैदा फ़रमाया है और उसके अतिरिक्त कोई स्रष्टा एवं रचयिता नहीं है। अल्लाह तआला ने फरमाया है :
﴿ٱللَّهُ خَٰلِقُ كُلِّ شَيۡءٖۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ وَكِيلٞ 62﴾
"अल्लाह ही प्रत्येक वस्तु का पैदा करने वाला है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है।" [सूरा ज़ुमर : 62]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱذۡكُرُواْ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡۚ هَلۡ مِنۡ خَٰلِقٍ غَيۡرُ ٱللَّهِ يَرۡزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِۚ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ فَأَنَّىٰ تُؤۡفَكُونَ 3﴾
"ऐ लोगो! अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो। क्या अल्लाह के सिवा कोई और उत्पत्तिकर्ता है, जो तुम्हें आकाश तथा धरती से जीविका प्रदान करे? उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। फिर तुम कहाँ बहकाए जाते हो?" [सूरा फ़ातिर : 3]।
अतः अहल-ए-सुन्नत व जमात के निकट तक़दीर पर ईमान के अंदर इन चारों चीज़ों पर ईमान आ जाता है। यह अलग बात है कि कुछ बिदअतियों ने इनमें से कुछ चीज़ों का इनकार किया है।
अह्ल-ए-सुन्नत व जमात के अक़ीदे का एक महत्वपूर्ण अंश अल्लाह के लिए प्रेम और अल्लाह के लिए घृणा तथा अल्लाह के लिए दोस्ती और अल्लाह के लिए दुश्मनी भी है। अह्ल-ए-सुन्नत के यहाँ इसे वला एवं बरा का अक़ीदा कहा जाता है। यह विश्वास भी अल्लाह पर ईमान के दायरे में आता है।
अतः एक मोमिन, अन्य मोमिनों से मोहब्बत करेगा और उनसे दोस्ती रखेगा, जबकि अविश्वासियों से नफ़रत करेगा और उनसे बैर रखेगा। याद रहे कि इस उम्मत के मोमिनों की सूची में जिन लोगों का नाम सबसे ऊपर है, वह अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथीगण हैं। अतः, अह्ल-ए-सुन्नत व जमात उनसे मोहब्बत एवं दोस्ती के साथ-साथ यह विश्वास भी रखते हैं कि वे नबियों के बाद सर्वश्रेष्ठ लोग हैं। क्योंकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- का फरमान है :
«خَيْرُ القُرُونِ قَرْنِي ثُمَّ الَّذِينَ يَلُونَهُمْ ثُمَّ الَّذِينَ يَلُونَهُم».
"सबसे उत्तम लोग मेरे ज़माने के लोग हैं, फिर वे जो उनके बाद आए और फिर वे जो उनके बाद आए।"(14) इस हदीस को इमाम बुख़ारी तथा इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।
उनका विश्वास है कि सहाबा के अंदर सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु, उनके बाद उमर रज़ियल्लाहु अन्हु, उनके बाद उसमान रज़ियल्लाहु अन्हु, उनके बाद अली रज़ियल्लाहु अन्हु, उनके बाद जन्नत की शुभ सूचना प्राप्त करने वाले दस सहाबा में से शेष छह सहाबा और उनके बाद बाक़ी सारे सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम हैं। अह्ल-ए-सुन्नत, सहाबा के बीच उत्पन्न होने वाले मतभेदों और विवादों के बारे में बात करने से बचते हैं और विश्वास रखते हैं कि इस संदर्भ में वे मुजतहिद (यानी सही निर्णय लेने के लिए शतप्रतिशत प्रयास करने वाले लोग) थे। जबकि इस तरह के लोग यदि सही निर्णय लेने में सफल हो जाएँ, तो दोहरा प्रतिफल प्राप्त करते हैं और यदि सफल न हों तो इकहरा प्रतिफल प्राप्त करते हैं।
वे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के मोमिन परिजनों से मोहब्बत करते और उनसे दोस्ती रखते हैं, मोमिनों की माताओं यानी अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नियों से अपने को जोड़ कर रखते हैं, उन सभी के लिए अल्लाह की प्रसन्नता की दुआ करते हैं। वे राफ़िज़ियों के तरीक़े से खुद को अलग रखते हैं, जो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सहाबा से द्वेष रखते, उनको बुरा-भला कहते और आपके परिजनों के बारे में अतिशयोक्ति से काम लेते हुए उन्हें अल्लाह के प्रदान किए हुए पद से ऊपर ले जाते हैं। इसी तरह वे नासिबियों के तरीके से भी खुद को अलग रखते हैं, जो अपने कथन अथवा कर्म द्वारा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के परिजनों को कष्ट देते हैं।
हमने यहाँ जिन बातों का ज़िक्र किया है, वह सब उस सही अक़ीदा के अंतर्गत आती हैं, जिसके साथ अल्लाह ने अपने संदेष्टा मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भेजा है। यही इस उम्मत के फ़िरक़ा-ए-नाजिया (मुक्ति प्राप्त करने वाले समुदाय) एवं अह्ल-ए-सुन्नत व जमात का अक़ीदा है, जिसके बारे में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :
«لَا تَـزَالُ طَائِفَةٌ مِنْ أُمَّتِي ظَاهِرِينَ عَلَى الحَقِّ، لَا يَضُرُّهُمْ مَنْ خَذَلَهُمْ، حَتَّى يَأْتِيَ أَمْرُ اللهِ وَهُمْ كَذَلِكَ».
"मेरी उम्मत का एक दल हमेशा सत्य पर प्रभुत्वप्राप्त रहेगा। उसका साथ छोड़ने वाले उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकेंगे, यहाँ तक कि अल्लाह का फैसला आ जाएगा और वह इसी तरह सत्य पर क़ायम रहेंगे।"(15)
एक अन्य रिवायत के शब्द इस प्रकार हैं :
«لَا تَزَالُ طَائِفَةٌ مِنْ أُمَّتِي عَلَى الحَقِّ مَنْصُورَةٌ».
"मेरी उम्मत का एक दल हमेशा सत्य पर प्रभुत्वप्राप्त रहेगा।"(16)
इसी तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«افْتَرَقَتِ اليَهُودُ عَلَى إِحْدَى وَسَبْعِينَ فِرْقَةً، وَافْتَرَقَتِ النَّصَارَى عَلَى اثْنَتَيْنِ وَسَبْعِينَ فِرْقَةً، وَسَتَفْتَرِقُ هَذِهِ الأُمَّةُ عَلَى ثَلَاثٍ وَسَبْعِينَ فِرْقَةً كُلُّهَا فِي النَّارِ إِلَّا وَاحِدَةً فَقَالَ الصَّحَابَةُ: مَنْ هِيَ يَا رَسُولَ اللهِ؟ قَالَ: مَنْ كَانَ عَلَى مِثْلِ مَا أَنَا عَلَيْهِ وَأَصْحَابِي».
"यहूदी इकहत्तर संप्रदायों में विभाजित हो गए थे तथा ईसाई बहत्तर संप्रदायों में परंतु मेरी इस उम्मत के लोग तिहत्तर संप्रदायों में बँट जाएँगे। यह सारे संप्रदाय जहन्नम में जाएँगे, सिवाय एक संप्रदाय के। आपके साथियों ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! वह कौन-सा संप्रदाय होगा? आपने उत्तर दिया: वह संप्रदाय जो उसी तरह के मार्ग पर चल रहा होगा, जिसपर मैं और मेरे साथीगण चल रहे हैं।"(17)
शुद्ध अक़ीदे के विरुद्ध चीजें
इस अक़ीदे से मुँह फेरने वाले और इसकी विपरीत धारा में चलने वाले लोग बहुत-से प्रकार के हैं। उनमें से कुछ लोग मूर्तियों, फरिश्तों, वलियों, जिन्नों, वृक्षों तथा पत्थरों आदि की पूजा करते हैं। इस तरह के लोगों ने न केवल यह कि संदेष्टाओं के आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया, बल्कि उनका विरोध किया और उनसे दुश्मनी की। क़ुरैश तथा अरब के विभिन्न क़बीलों के लोगों ने हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ जो कुछ किया, वह इसका जीता जागता सबूत है। यह लोग अपने पूज्यों से ज़रूरत की चीज़ें माँगते, रोग से स्वास्थ्य लाभ की गुहार लगाते और शत्रुओं पर विजय की फ़रियाद करते थे। उनके नाम पर जानवर ज़बह करते थे और उनके लिए मन्नत मानते थे। ऐसे में, जब अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनके इन कर्मों का खंडन किया और विशुद्ध रूप से एक अल्लाह की इबादत का आदेश दिया, तो उन्होंने आश्चर्य प्रकट किया और कहने लगे :
﴿أَجَعَلَ ٱلۡأٓلِهَةَ إِلَٰهٗا وَٰحِدًاۖ إِنَّ هَٰذَا لَشَيۡءٌ عُجَابٞ 5﴾
"क्या उसने सब पूज्यों को एक पूज्य बना दिया? निःसंदेह यह तो बड़े आश्चर्य की बात है।" [सूरा साद : 5]।
आप उन्हें निरंतर अल्लाह की ओर बुलाते रहे, शिर्क (अनेकेश्वरवाद) के बुरे परिणाम से सावधान करते रहे और अपने आह्वान की वास्तविकता से अवगत करते रहे, यहाँ तक कि पहले तो कुछ ही लोगों ने आपके आह्वान को स्वीकार किया, लेकिन उसके बाद बड़ी संख्या में लोग इस्लाम ग्रहण करने लगे। इस तरह, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, आपके सहाबा -रज़ियल्लाहु अन्हुम- और पूरी निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करने वाले लोगों के निरंतर प्रयास और लंबे संघर्ष के बाद अल्लाह के धर्म इस्लाम का सभी धर्मों पर वर्चस्व हो गया। परन्तु, फिर इसके बाद हालात बदल गए, और अधिकतर लोग अज्ञानता के शिकार हो गए। अकसर लोग नबियों और वलियों के सम्मान में अतिशयोक्ति करने लगे, उनको पुकारने लगे, उनसे संकट के समय सहायता माँगने लगे, तथा शिर्क के अन्य बहुत-से कार्य करने लगे। इस तरह देखा जाए तो वे एक तरह से दोबारा अज्ञानता काल की ओर लौट गए। उनके अंदर "ला इलाहा इल्लल्लाह" के अर्थ की उतनी भी समझ न रही, जितनी अरब के काफ़िरों के अंदर मौजूद थी।
यह शिर्क, धर्म से अज्ञानता एवं नबवी दौर से दूरी के कारण लोगों के अंदर फैलता चला गया और सिलसिला आज भी जारी है।
दरअसल आज के शिर्क करने वाले भी उसी भ्रम के शिकार हैं, जो पहले के शिर्क करने वालों ने पाल रखा था। वह कहा करते थे कि :
﴿...هَٰٓؤُلَآءِ شُفَعَٰٓؤُنَا عِندَ ٱللَّهِ...﴾
"ये लोग अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं।" [सूरा यूनुस : 18]।
इसी तरह वह कहा करते थे कि :
﴿...مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ...﴾
"...हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें...।" [सूरा अल-ज़ुमर : 3]।
हालाँकि अल्लाह तआला ने इस भ्रम का खंडन कर दिया है, और यह स्पष्ट कर दिया है कि जिसने उसके अलावा किसी और की उपासना की, चाहे वह कोई भी हो, उसने उसके साथ शिर्क किया और काफ़िर हो गया। उसका फ़रमान है :
﴿وَيَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمۡ وَلَا يَنفَعُهُمۡ وَيَقُولُونَ هَٰٓؤُلَآءِ شُفَعَٰٓؤُنَا عِندَ ٱللَّهِ...﴾
"और वे लोग अल्लाह को छोड़कर उनको पूजते हैं, जो न उन्हें कोई हानि पहुँचाते हैं और न उन्हें कोई लाभ पहुँचाते हैं और कहते हैं कि ये लोग अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं...।" [सूरा यूनुस : 18]।
आगे अल्लाह ने इनका खंडन करते हुए कहा है :
﴿قُلۡ أَتُنَبِّـُٔونَ ٱللَّهَ بِمَا لَا يَعۡلَمُ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَلَا فِي ٱلۡأَرۡضِۚ سُبۡحَٰنَهُۥ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشۡرِكُونَ 18﴾
"आप कह दें : क्या तुम अल्लाह को ऐसी बात की सूचना दे रहे हो, जिसे वह न आकाशों में जानता है और न धरती में? वह पवित्र है और उससे बहुत ऊँचा है, जिसे वे साझीदार ठहराते हैं।" [सूरा यूनुस : 18]।
इस आयत के अन्दर अल्लाह तआला ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसे छोड़ नबियों, वलियों या किसी और की पूजा करना सबसे बड़ा शिर्क है, भले ही उसमें संलिप्त लोग उसका कोई और नाम रख लें। उसने एक अन्य स्थान में कहा है :
﴿...وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ...﴾
"...तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें...।" [सूरा ज़ुमर : 3]।
फिर अल्लाह ने उनका उत्तर देते हुए कहा है :
﴿...إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ﴾
"...निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो।" [सूरा ज़ुमर : 3]।
इस प्रकार अल्लाह तआला ने स्पष्ट कर दिया है कि इन लोगों का उसके अलावा किसी और से कुछ माँगना, उसका भय करना तथा उससे आशा रखना आदि अल्लाह के प्रति अविश्वास (कुफ़्र) व्यक्त करना है। साथ ही उनकी इस बात को भी झूठ क़रार दे दिया है कि उनके पूज्य उनको अल्लाह की निकटता लाभ करवा देंगे।
शुद्ध अक़ीदा एवं संदेष्टाओं की लाई हुई शिक्षाओं के विरुद्ध और कुफ़्र पर आधारित आस्थाओं में वर्तमान युग में मार्क्स व लेनिन तथा इन जैसे अन्य अधर्म एवं नास्तिकता के प्रचारकों के अनुयायियों की वह मान्यता भी शामिल है, जिसे लोग समाजवाद, साम्यवाद, बासवाद तथा इस तरह के अन्य नामों से जानते हैं। इन सारे नास्तिकों का मूल सिद्धांत यह कि किसी पूज्य का कोई अस्तित्व नहीं है और जीवन बस भौतिक संरचना का नाम है।
उनके सिद्धांतों में आख़िरत, जन्नत, जहन्नम और सारे धर्मों का इनकार भी शामिल है। जो व्यक्ति उनकी किताबों को देखेगा और उनकी वस्तुस्थिति का अध्ययन करेगा, वह निश्चित रूप से इस वास्तविकता से अवगत हो जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनकी यह मान्यता सभी आसमानी धर्मों का विरोध करती है और अपने मानने वालों के लिए दुनिया एवं आख़िरत में भयानक परिणाम का सबब बनेगी।
सत्य विरोधी अक़ीदों में कुछ सूफ़ियों का यह अक़ीदा भी शामिल है कि उनके तथाकथित औलिया संसार के संचालन में अल्लाह के साझी हैं, और दुनिया के कामों में अपना भी इख़्तियार रखते हैं। इस तरह के लोगों को वे क़ुतुब, वतद और ग़ौस आदि नामों से जानते हैं, जो दरअसल उन्हीं के गढ़े हुए नाम हैं। यह दरअसल अल्लाह के रब होने में साझी बनाना है, जो शिर्क का सबसे बदतरीन रूप है।
जो व्यक्ति अज्ञानता काल के लोगों के शिर्क पर विचार करेगा और उसकी तुलना बाद के लोगों में फैले हुए शिर्क से करेगा, वह पाएगा कि बाद के लोगों का शिर्क अधिक भयानक है। इसे आप इस तरह समझ सकते हैं : अज्ञानता काल के अरब अविश्वासियों की दो विशेषताएँ थीं : पहली बात यह कि; वे अल्लाह के रब होने में किसी को साझी नहीं बनाते थे। वे साझी केवल इबादत में बनाते थे। वे रब केवल सर्वशक्तिमान अल्लाह को ही मानते थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَهُمۡ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ...﴾
"और निश्चय यदि आप उनसे पूछें कि उन्हें किसने पैदा किया? तो वे अवश्य कहेंगे : अल्लाह ने...।" [सूरा ज़ुख़रुफ़ : 87]।
अल्लाह तआला ने एक अन्य स्थान में कहा है :
﴿قُلۡ مَن يَرۡزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِ أَمَّن يَمۡلِكُ ٱلسَّمۡعَ وَٱلۡأَبۡصَٰرَ وَمَن يُخۡرِجُ ٱلۡحَيَّ مِنَ ٱلۡمَيِّتِ وَيُخۡرِجُ ٱلۡمَيِّتَ مِنَ ٱلۡحَيِّ وَمَن يُدَبِّرُ ٱلۡأَمۡرَۚ فَسَيَقُولُونَ ٱللَّهُۚ فَقُلۡ أَفَلَا تَتَّقُونَ 31﴾
"कहो : वह कौन है जो तुम्हें आकाश और धरती से जीविका देता है? या फिर कान और आँख का मालिक कौन है? और कौन जीवित को मृत से निकालता और मृत को जीवित से निकालता है? और कौन है जो हर काम का प्रबंध करता है? तो वे ज़रूर कहेंगे : ''अल्लाह'', तो कहो : फिर क्या तुम डरते नहीं?" [सूरा यूनुस : 31]।
क़ुरआन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
जबकि दूसरी यह कि; वे इबादत में भी अल्लाह का साझी हमेशा नहीं बनाया करते थे। अल्लाह का साझी केवल सुख के समय बनाते थे। दुःख के समय तो वह भी केवल एक अल्लाह की इबादत करते थ। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿فَإِذَا رَكِبُواْ فِي ٱلۡفُلۡكِ دَعَوُاْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمۡ إِلَى ٱلۡبَرِّ إِذَا هُمۡ يُشۡرِكُونَ 65﴾
"फिर जब वे नाव पर सवार होते हैं, तो अल्लाह को, उसके लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, पुकारते हैं। फिर जब वह उन्हें बचाकर थल तक ले आता है, तो शिर्क करने लगते हैं।" [सूरा अंकबूत : 65]।
लेकिन बाद के मुश्रिक पहले के मुश्रिकों से दो मामलों में कहीं आगे बढ़ गए हैं : पहला यह कि; इनमें से कुछ लोग अल्लाह के रब होने में भी साझी बनाते हैं। जबकि दूसरा यह कि; ये सुख एवं दुख दोनों परिस्थितियों में शिर्क करते हैं, जैसा कि उनके साथ रहने वाला और उनके हाल से अवगत हर व्यक्ति जानता है। आख़िर वे मिस्र में हुसैन और बदवी आदि की क़ब्रों के पास, अदन में ईदरोस की क़ब्र के पास, यमन में हादी की क़ब्र के पास, सीरिया में इब्न-ए-अरबी की क़ब्र के पास, इराक में शैख अब्दुल क़ादिर जीलानी की क़ब्र के पास तथा इनके अलावा अन्य प्रसिद्ध कब्रों के पास क्या कुछ नहीं करते!! इनके विषय में आम लोग बड़ी अतिशयोक्ति से काम लेते हैं और सर्वशक्तिमान अल्लाह के बहुत-से अधिकार इनको बेझिझक दिए जा रहे हैं। दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है, जो इन लोगों को टोकें और इन्हें उस तौहीद से अवगत कराएँ, जो अल्लाह के अंतिम नबी और उनसे पहले के सारे नबीगण लाए थे।
सही अकीदे के विरुद्ध अकीदों में जहमिय्या एवं मोअतज़िला तथा उनके पद्चिह्नों पर चलने वाले अन्य बिदअतियों का अक़ीदा भी शामिल है, जो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के गुणों का इनकार करते हैं, उसे उसके गुणों से ख़ाली क़रार देते हैं तथा जड़ वस्तुओं की पंक्ति में ला खड़ा करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि अल्लाह उनकी इन बातों से बहुत ही ऊँचा है।
इसी दायरे में अशअरी जैसे वह लोग भी आ जाते हैं, जो अल्लाह के कुछ गुणों का इनकार करते हैं और कुछ गुणों को मानते हैं। क्योंकि उन्होंने जिन गुणों का इनकार किया और उनके प्रमाणों के गलत अर्थ बताए और इस तरह शरई एवं अक़्ली प्रमाणों की मुख़ालफ़त की एवं स्पष्ट रूप से अंतर्विरोध के शिकार हुए, उनको भी उन गुणों की तरह मानना ज़रूरी है, जिनको उन्होंने सिद्ध किया है।
जबकि इन लोगों के विपरीत, अह्ल-ए-सुन्नत व जमात ने अल्लाह के उन सभी नामों एवं गुणों को सिद्ध माना है, जिनको स्वयं अल्लाह या फिर उसके रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने साबित किया है। इसी तरह अल्लाह को उसकी सृष्टि की समानता से इस तरह पाक एवं पवित्र माना है कि उसे गुणविहीण करने की शंका तक पैदा न होती हो। इस तरह, उन्होंने सारे प्रमाणों पर अमल किया, उनके अर्थ के साथ छेड़-छाड़ से दूर रहे, अल्लाह को गुणविहीन बताने से खुद को बचाया और उस विरोधाभास से सुरक्षित रहे, जिसके अन्य लोग शिकार हो गए हैं।
दरअसल यही मुक्ति का मार्ग, दुनिया एवं आख़िरत की सफलता का रहस्य और वह सीधा रास्ता है, जिसपर इस उम्मत के सदाचारी पूर्वज एवं इमामगण चलते आए हैं। जबकि इस उम्मत के बाद के लोगों की सफलता उसी मार्ग पर चलने में निहित है, जिसपर उसके पहले दौर के लोगों ने चलकर दिखाया है। वह मार्ग है, क़ुरआन एवं हदीस के अनुसरण एवं उनके विपरीत चीज़ों को छोड़ने का मार्ग। हम अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह इस उम्मत को सत्य का मार्ग दिखाए, उनके अंदर बड़ी संख्या में सत्य के प्रचारक पैदा कर दे और मुस्लिम रहनुमाओं को इस शिर्क का मुक़ाबला करने और इसके मार्गों को बंद करने का सुयोग प्रदान करे। निश्चय ही वह सुनने वाला और निकट है। वही सुयोग प्रदान करता है। वही हमारे लिए काफ़ी है और वह बेहतर काम बनाने वाला है। उसके बिना न पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य करने की क्षमता। अल्लाह की दया, शांति एवं बरकतें अवतरित हों उसके बंदे एवं रसूल, हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर तथा आपके परिवार एवं साथियों पर।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
दूसरी पुस्तिका:
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से फ़रियाद के संबंध में शरई दृष्टिकोण
सारी प्रशंसा अल्लाह की है तथा दुरूद एवं सलाम हो अल्लाह के रसूल पर, तथा उनके परिजनों, साथियों और उनके मार्ग पर चलने वालों पर।
अल्लाह की प्रशंसा के बाद मूल विषय पर आते हैं : कुवैत के अख़बार अल-मुजतमा ने अपने अंक संख्या 15, दिनांक 19/4/1390 हिज्री में (अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म की याद में) शीर्षक के तहत कुछ छंद प्रकाशित किए हैं। इन छंदों में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से गुहार लगाई गई है कि इस उम्मत की मदद करें और उसे विभाजन एवं बिखराव से मुक्ति दिलाएँ। ये छंद आमिना नाम की एक औरत के हस्ताक्षर से छपे हैं। कुछ शेर आप भी देख लें :
ऐ अल्लाह के रसूल! इस संसार को बचाइए, जो युद्ध भड़काता है और उसकी आग में जलता है।
ऐ अल्लाह के रसूल! उम्मत की मदद करें, संदेह के अंधेरों में उसकी रात लम्बी हो चुकी है।
ऐ अल्लाह के रसूल! उम्मत की मदद करें कि दुःख की भूल भुलैया में उसकी अंतर्दृष्टि नष्ट हो गई है।
उसने आगे कहा है :
मदद जल्दी कीजिए, जिस प्रकार आपने बद्र के दिन जल्दी की थी, जब आपने अल्लाह को पुकारा था।
जिसके बाद अपमान एक शानदार विजय में परिवर्तित हो गया था। बेशक अल्लाह की ऐसी सेनाएँ हैं, जिन्हें आप देख नहीं सकते।
(अल्लाहु अकबर! आप देख रहे हैं कि किस तरह यह लेखिका अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को पुकार रही है, और आपसे फ़रियाद कर रही है। आपसे कह रही है कि जल्दी उम्मत की मदद कीजिए। वह यह भूल जा रही है -या इस बात से अज्ञान है- कि मदद केवल अल्लाह के हाथ में है। अल्लाह के नबी या किसी अन्य सृष्टि के हाथ में नहीं। उच्च एवं महान अल्लाह ने अपने पवित्र ग्रंथ क़ुरआन में कहा है :
﴿...وَمَا النَّصْرُ إِلَّا مِنْ عِنْدِ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ﴾
"...और सहायता तो केवल अल्लाह ही के पास से आती है, जो प्रभुत्वशाली, हिकमत वाला (तत्वदर्शी) है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 126]।
एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿إِنْ يَنْصُرْكُمُ اللَّهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْ وَإِنْ يَخْذُلْكُمْ فَمَنْ ذَا الَّذِي يَنْصُرُكُمْ مِنْ بَعْدِهِ...﴾
"यदि अल्लाह तुम्हारी सहायता करे, तो कोई तुमपर प्रभावी नहीं हो सकता। और यदि वह तुम्हें असहाय छोड़ दे, तो फिर कौन है जो उसके बाद तुम्हारी सहायता कर सके...?" [सूरा आल-ए-इमरान : 160]।
इस लेखिका के द्वारा किया गया पुकारने एवं फ़रियाद करने का यह कार्य दरअसल अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की इबादत करने के दायरे में आता है। जबकि पवित्र क़ुरआन एवं सुन्नत तथा उलमा के मतैक्य से साबित है कि ऐसा करना जायज़ नहीं है। अल्लाह ने सृष्टि की रचना अपनी इबादत के लिए की है और इसी इबादत की व्याख्या और आह्वान के लिए रसूल भेजे तथा किताबें उतारी हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ 56﴾
"और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।" [सूरा अल-ज़ारियात : 56]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ...﴾
"और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो...।" [सूरा अल-नह्ल : 36]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ 25﴾
"और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते थे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत करो।" [सूरा अल-अंबिया : 25]।
एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿الر كِتَابٌ أُحْكِمَتْ آيَاتُهُ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِنْ لَدُنْ حَكِيمٍ خَبِيرٍ 1 أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ إِنَّنِي لَكُمْ مِنْهُ نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ 2﴾
"अलिफ, लाम, रा। यह एक पुस्तक है, जिसकी आयतें सुदृढ़ की गईं, फिर उन्हें सविस्तार स्पष्ट किया गया एक पूर्ण हिकमत वाले की ओर से जो पूरी ख़बर रखने वाला है। यह कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो। निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए उसकी ओर से एक डराने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ।" [सूरा हूद : 1, 2]।
इन सुस्पष्ट आयतों में पवित्र एवं महान अल्लाह ने स्पष्ट रूप से बताया है कि उसने इन्सान एवं जिन्न की रचना इसलिए की है कि एकमात्र उसी की इबादत की जाए और किसी को उसका साझी न बनाया जाए। अल्लाह ने बताया है कि उसने रसूलों को इसी इबादत का आदेश देने और इसके विपरीत से रोकने के लिए भेजा है। उसने बताया है कि उसने अपनी किताब की आयतों को स्पष्ट रखा है, ताकि उसके अतिरिक्त किसी की इबादत न की जाए।
ज्ञात हो कि इबादत का अर्थ है: अल्लाह को एक मानना, तथा उसका आज्ञाकारी होना, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रह कर। इबादत का आदेश अल्लाह ने बहुत-सी आयतों में दिया है। जैसे उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन :
﴿وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ حُنَفَاءَ...﴾
"हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, एकाग्र होकर, उसकी उपासना करें...।" [सूरा अल-बय्यिना : 5]।
इसी तरह उसका कथन है :
﴿وَقَضَى رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ...﴾
"और (ऐ बंदे) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो...।" [सूरा अल-इसरा : 23]।
उसका एक और कथन है :
﴿إِنَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ فَٱعۡبُدِ ٱللَّهَ مُخۡلِصٗا لَّهُ ٱلدِّينَ 2 أَلَا لِلَّهِ ٱلدِّينُ ٱلۡخَالِصُۚ وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ 3﴾
"निःसंदेह हमने आपकी ओर यह पुस्तक सत्य के साथ उतारी है। अतः आप अल्लाह की इबादत इस तरह करें कि धर्म को उसी के लिए खालिस करने वाले हों। सुन लो! ख़ालिस (विशुद्ध) धर्म केवल अल्लाह ही के लिए है। तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें। निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो।" [सूरा अल-ज़ुमर : 2-3]।
क़ुरआन के अंदर इस अर्थ की बहुत सारी आयतें मौजूद हैं, जो बताती हैं कि इबादत बस अल्लाह की हो सकती है। किसी और की नहीं, चाहे वह नबी और वली ही क्यों न हों।
इस बात में भी कहीं कोई संदेह नहीं है कि दुआ इबादत का एक महत्वपूर्ण और व्यापक रूप है। इसलिए यह ज़रूरी है कि दुआ भी बस अल्लाह ही से की जाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿فَادْعُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ 14﴾
"अतः तुम अल्लाह को, उसके लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए पुकारो, यद्यपि काफ़िरों को बुरा लगे।" [सूरा ग़ाफ़िर : 14]।
एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :
﴿وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا 18﴾
"और यह कि मस्जिदें केवल अल्लाह के लिए हैं। अतः अल्लाह के साथ किसी को भी मत पुकारो।" [सूरा अल-जिन्न : 18]।
केवल एक अल्लाह की इबादत करने की जो बात इस आयत में बताई गई है, वह एक व्यापक बात है। इसमें नबी आदि सभी दाख़िल हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَلَا تَدْعُ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنْفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَ فَإِن فَعَلۡتَ فَإِنَّكَ إِذٗا مِّنَ ٱلظَّٰلِمِينَ 106﴾
"और अल्लाह को छोड़कर उसे न पुकारें, जो न आपको लाभ पहुँचाए और न आपको हानि पहुँचा सके। फिर यदि आपने ऐसा किया, तो निश्चय ही आप उस समय अत्याचारियों में से हो जाएँगे।" [सूरा यूनुस : 106]।
इस आयत में संबोधन यद्यपि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से है, लेकिन यह ज्ञात है कि अल्लाह ने आपको शिर्क से सुरक्षित रखा था, इसलिए स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य दूसरे लोगों को सावधान करना है। फिर सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा :
﴿وَلَا تَدۡعُ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَ فَإِنْ فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذًا مِنَ الظَّالِمِينَ 106﴾
"और अल्लाह को छोड़कर उसे न पुकारें, जो न आपको लाभ पहुँचाए और न आपको हानि पहुँचा सके। फिर यदि आपने ऐसा किया, तो निश्चय ही आप उस समय अत्याचारियों में से हो जाएँगे।" [सूरा यूनुस : 106]।
इस आयत में संबोधन तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से है, परंतु इसका उद्देश्य दूसरे लोगों को सावधान करना है। क्योंकि सब लोग जानते हैं कि अल्लाह ने आपको शिर्क से सुरक्षित रखा था। फिर अल्लाह ने सख़्ती से मना और सावधान करते हुए कहा है :
﴿...فَإِنْ فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذًا مِنَ الظَّالِمِينَ﴾
"...फिर यदि आपने ऐसा किया, तो निश्चय ही आप उस समय अत्याचारियों में से हो जाएँगे।"
ज़ुल्म शब्द जब साधारण रूप से बोला जाए, तो उससे मुराद शिर्क ही हुआ करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَالْكَافِرُونَ هُمُ الظَّالِمُونَ﴾
"...तथा काफ़िर लोग ही अत्याचारी हैं।" [सूरा अल-बक़रा : 254]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...إِنَّ الشِّرْكَ لَظُلْمٌ عَظِيمٌ﴾
"...निःसंदेह शिर्क महा अत्याचार है।" [सूरा लुक़मान : 13]।
ज़रा सोचें कि अगर मानव जाति के सरदार भी अल्ल्लाह के अतिरिक्त को पुकारने के कारण ज़ालिमों में शामिल हो जाएँ, तो हम और आप कहाँ ठहरते हैं?
इन तमाम तथा इनके अतिरिक्त अन्य आयतों से मालूम हुआ कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी और, जैसे मरे हुए लोगों, पेड़ों और मूर्तियों को पुकारना, इनको सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का साझी बनाना है, जो कि उस इबादत के विपरीत है, जिसके लिए अल्लाह ने इन्सान एवं जिन्नात की सृष्टि की है और जिसे स्पष्ट करने और जिसकी ओर बुलाने के लिए रसूल भेजे और किताबें उतारी हैं। यही अर्थ है, ला इलाहा इल्लल्लाह का। क्योंकि इसका अर्थ है; अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। यह कलिमा किसी और की इबादत का खंडन करता और एकमात्र अल्लाह की इबादत को सिद्ध करता है। जैसा कि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدۡعُونَ مِن دُونِهِۦ هُوَ ٱلۡبَٰطِلُ وَأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡكَبِيرُ 62﴾
"यह इसलिए कि अल्लाह ही सत्य है, और जिसे वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वह असत्य है, और अल्लाह ही सबसे ऊँचा, सबसे बड़ा है।" [सूरा अल-हज्ज : 62]।
यही इस्लाम की आत्मा और उसका मूल आधार है। जब तक यह आधार दुरुस्त न हो, कोई इबादत सही नहीं होती। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَلَقَدْ أُوحِيَ إِلَيْكَ وَإِلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكَ لَئِنْ أَشْرَكْتَ لَيَحْبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ 65﴾
"और निःसंदेह तुम्हारी ओर एवं तुमसे पहले के नबियों की ओर वह़्य की गई है कि यदि तुमने शिर्क किया, तो निश्चय तुम्हारा कर्म अवश्य नष्ट हो जाएगा और तुम निश्चित रूप से हानि उठाने वालों में से हो जाओगे।" [सूरा अल-ज़ुमर : 65]।
इसी प्रकार अल्लाह तआला फ़रमाता है :
﴿...وَلَوْ أَشْرَكُوا لَحَبِطَ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ﴾
"...और यदि ये लोग शिर्क करते, तो निश्चय उनसे वह सब नष्ट हो जाता जो वे किया करते थे।" [सूरा अल-अनआम : 88]।
उक्त बातों से स्पष्ट है कि दीन-ए-इस्लाम तथा ला इलाहा इल्लल्लाह की गवाही देने के दो बड़े आधार हैं :
1- इबादत बस एक अल्लाह की ही की जाए और किसी को उसका साझी न बनाया जाए। यही अर्थ है "ला इलाहा इल्लल्लाह" की गवाही देने का। अतः जिसने मरे हुए लोगों, जैसे नबियों आदि को पुकारा या बुतों, पेड़ों, पत्थरों आदि सृष्टियों को पुकारा, उनसे फ़रियाद की, उनकी निकटता प्राप्त करने के लिए जानवर ज़बह किए या चढ़ावे चढ़ाए, उनके लिए नमाज़ पढ़ी या उनको सज्दा किया, उसने उन्हें अल्लाह को छोड़कर रब बना लिया और अल्लाह का समकक्ष ठहरा दिया, जो कि इस आधार के विपरीत और "ला इलाहा इल्लल्लाह" से सीधा टकराता है। बिल्कुल इसी तरह जिसने दीन के नाम पर कोई ऐसा काम किया, जिसकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है, तो उसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने की गवाही के अर्थ को चरितार्थ होने नहीं दिया। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है :
2- अल्लाह की इबादत एक मात्र उसके नबी एवं रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत के अनुसार की जाए। अतः जिसने दीन के नाम पर कोई ऐसा नवीन कार्य किया, जिसकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है, उसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने की गवाही के अर्थ को चरितार्थ नहीं किया। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَقَدِمْنَا إِلَى مَا عَمِلُوا مِنْ عَمَلٍ فَجَعَلْنَاهُ هَبَاءً مَنْثُورًا 23﴾
"और हम उसकी ओर बढ़ कर जो उन्होंने कोई भी कर्म किया होगा, तो उसे बिखरी हुई धूल बना देंगे।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 23]।
इस आयत में उल्लिखित कर्मों से मुराद ऐसे व्यक्ति के कर्म हैं, जो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का साझी बनाते हुए मरा हो।
इसमें दीन के नाम पर गढ़ लिए गए ऐसे कर्म भी दाख़िल हैं, जिनकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है। ये भी क़ियामत के दिन धूल के समान उड़ जाएँगे। क्योंकि ये आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पाक शरीअत के अनुसार नहीं हैं। जैसा कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।" सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम।
सारांश यह कि इस लेखिका ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दुआ एवं फ़रियाद की है और सारे संसार के रब से मुँह फेरा है, जिसके हाथ में विजय तथा लाभ एवं हानि है और दूसरे के हाथ में इसमें से कुछ भी नहीं है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस महिला द्वारा किया गया यह कार्य बहुत बड़ा अत्याचार है। अल्लाह ने आदेश दिया है कि उसे पुकारा जाए, उसने उसे पुकारने वाले से पुकार सुनने का वादा किया है और इससे अभिमान करने वाले को जहन्नम में डालने की धमकी दी है। जैसा कि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ 60﴾
"तथा तुम्हारे पालनहार ने कहा है : तुम मुझे पुकारो। मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा। निःसंदेह जो लोग मेरी इबादत से अहंकार करते हैं, वे शीघ्र ही अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।" [सूरा ग़ाफ़िर : 60]।
यानी अपमानित एवं रुस्वा होकर। यह आयत बताती है कि दुआ इबादत है और इससे अभिमान करने वाले का ठिकाना जहन्नम है। भला बताएँ कि जब दुआ से अभिमान करने वाले का यह हाल है, तो अल्लाह को छोड़ किसी और को पुकारने वाले का क्या हाल होगा, जबकि अल्लाह निकट है, हर चीज़ का मालिक है और सब कुछ करने की क्षमता रखता है? उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ فَلْيَسْتَجِيبُوا لِي وَلْيُؤْمِنُوا بِي لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ 186﴾
"और (ऐ नबी!) जब मेरे बंदे आपसे मेरे बारे में पूछें, तो निश्चय मैं (उनसे) क़रीब हूँ। मैं पुकारने वाले की दुआ क़बूल करता हूँ जब वह मुझे पुकारता है। तो उन्हें चाहिए कि वे मेरी बात मानें तथा मुझ पर ईमान लाएँ, ताकि वे मार्गदर्शन पाएँ।" [सूरा अल-बक़रा: 186]।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह हदीस में है कि दुआ ही इबादत है। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने चचेरे भाई अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से फ़रमाया :
«احْفَظِ اللهَ يَحْفَظْكَ، احْفَظِ اللهَ تَجِدْهُ تُجَاهَكَ، إِذَا سَأَلْتَ فَاسْأَلِ اللهَ، وَإِذَا اسْتَعْنَتَ فَاسْتَعِنْ بِاللهِ».
"अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, अल्लाह तुम्हारी रक्षा करेगा। अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, तुम उसे अपने सामने पाओगे। जब माँगो तो अल्लाह से माँगो और जब मदद चाहो, तो अल्लाह से मदद चाहो।" इसे इमाम तिर्मिज़ी आदि ने रिवायत किया है।
एक अन्य अवसर पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
«مَنْ مَاتَ وَهُوَ يَدْعُو لِلهِ نِدًّا؛ دَخَلَ النَّارَ».
"जिस व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में हुई कि वह किसी को अल्लाह का समकक्ष बनाकर उसे पुकार रहा था, तो वह नरक में प्रवेश करेगा।" इसे इमाम बुख़ारी ने रिवायत किया है।
जबकि सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया कि सबसे बड़ा गुनाह कौन-से है? तो आपने उत्तर दिया :
«أَنْ تَجْعَلَ لِلهِ نِدًّا وَهُوَ خَلَقَكَ».
"यह कि तुम अल्लाह का साझी बनाओ, हालाँकि उसीने तुझे पैदा किया है।"
हदीस में आए हुए शब्द "الند" का अर्थ है समतुल्य एवं एक जैसा। जिसने भी अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारा, किसी से फ़रियाद की, किसी के लिए मन्नत मानी, जानवर ज़बह किया या अन्य कोई भी इबादत की, उसने उसे अल्लाह का समतुल्य बनाया। चाहे वह नबी हो, वली हो, फ़रिश्ता हो, जिन्न हो, बुत हो या कोई अन्य सृष्टि हो।
यहाँ कोई पूछ सकता है : कोई जीवित व्यक्ति जो चीज़ देने का सामर्थ्य रखता हो, उससे वह चीज़ माँगना तथा उसके सामर्थ्य के दायरे के अंदर के भौतिक कार्यों में उससे मदद तलब करना, शरई दृष्टिकोण से कैसा है? तो इसका उत्तर यह है कि : यह शिर्क के दायरे में नहीं आता। बल्कि मुसलमानों के बीच यह एक सामान्य और जायज़ बात है। उच्च एवं महान अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम के क़िस्से में फ़रमाया है :
﴿...فَاسْتَغَاثَهُ الَّذِي مِنْ شِيعَتِهِ عَلَى الَّذِي مِنْ عَدُوِّهِ...﴾
"...तो जो उसके गिरोह में से था, उसने उसके विरुद्ध उससे मदद माँगी, जो उसके शत्रुओं में से था...।" [सूरा अल-क़सस : 15]।
मूसा अलैहिस्सलाम के क़िस्से में एक अन्य स्थान में फ़रमाया है :
﴿فَخَرَجَ مِنْهَا خَائِفًا يَتَرَقَّبُ...﴾
"तो वह डरता हुआ उस (शहर) से निकल पड़ा, इंतज़ार करता था (कि अब क्या होगा)...।" [सूरा अल-क़सस : 21]।
इसी तरह इन्सान युद्ध आदि विपत्तियों के समय, जब दूसरों की सहायता की ज़रूरत होती है, अपने साथियों से फ़रियाद करता है।
अल्लाह ने अपने नबी को आदेश दिया है कि अपनी उम्मत को बता दें कि आप किसी के लाभ एवं हानि के मालिक नहीं हैं। पवित्र और महान आल्लाह का कथन है :
﴿قُلْ إِنَّمَا أَدْعُو رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِهِ أَحَدًا 21 قُلْ إِنِّي لَا أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا رَشَدًا 22﴾
"आप कह दें : मैं तो केवल अपने पालनहार को पुकारता हूँ और उसके साथ किसी को साझी नहीं ठहराता। आप कह दें : निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए न किसी हानि का अधिकार रखता हूँ और न सीधी राह पर लगा देने का।" [सूरा अल-जिन्न : 21, 22]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿قُلْ لَا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ وَلَوْ كُنْتُ أَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِيَ السُّوءُ إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ 188﴾
"आप कह दें कि मैं अपने लिए किसी लाभ और हानि का मालिक नहीं हूँ, परंतु जो अल्लाह चाहे। और यदि मैं ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान रखता होता, तो अवश्य बहुत अधिक भलाइयाँ प्राप्त कर लेता और मुझे कोई कष्ट नहीं पहुँचता। मैं तो केवल उन लोगों को सावधान करने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।" [सूरा अल-आ'राफ़ : 188]।
क़ुरआन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
यह कहने की ज़रूरत नहीं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम केवल अपने रब को पुकारा करते थे। सहीह हदीसों से साबित है कि बद्र युद्ध के दिन आप अल्लाह से फ़रियाद करते रहे, शत्रुओं पर विजय माँगते रहे और आग्रह करते हुए कहते रहे : "ऐ मेरे रब! जो वादा तूने मुझ से किया है, उसे पूरा करके दिखा दे।" आपकी हालत देखकर अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! बस हो गया। अल्लाह आपसे किया हुआ वादा ज़रूर पूरा करेगा। इसी परिदृश्य में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِذۡ تَسۡتَغِيثُونَ رَبَّكُمۡ فَٱسۡتَجَابَ لَكُمۡ أَنِّي مُمِدُّكُم بِأَلۡفٖ مِّنَ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ مُرۡدِفِينَ 9﴾
"जब तुम अपने पालनहार से (बद्र के युद्ध के समय) मदद माँग रहे थे, तो उसने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली कि निःसंदेह मैं एक हज़ार फ़रिश्तों के साथ तुम्हारी सहायता करने वाला हूँ, जो एक-दूसरे के पीछे आने वाले हैं।" [सूरा अल-अनफ़ाल : 9]।
इन आयतों में महान अल्लाह ने मुसलमानों को याद दिलाया है कि वे बद्र के दिन अल्लाह से फ़रियाद कर रहे थे, और बताया है कि अल्लाह ने उनकी फ़रियाद सुनते हुए जीत का सुसमाचार देने और ढारस बंधाने के लिए फ़रिश्तों को भेजा। फिर अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि मुसलमानों को जो सहायता मिली थी, वह फ़रिश्तों की ओर से नहीं थी, अल्लाह की ओर से थी। फ़रमाया :
﴿وَمَا النَّصْرُ إِلَّا مِنْ عِنْدِ اللَّهِ...﴾
"...सहायता तो केवल अल्लाह ही के पास से आती है...।" [सूरा आल-ए-इमरान : 126]।
एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ بِبَدْرٍ وَأَنْتُمْ أَذِلَّةٌ فَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ 123﴾
"और अल्लाह बद्र (के युद्ध) में तुम्हारी सहायता कर चुका है, जबकि तुम कमज़ोर थे। अतः अल्लाह से डरो, ताकि तुम उसके प्रति आभारी हो सको।" [सूरह आल -ए- इमरान : 123]।
इस आयत में उच्च एवं महान अल्लाह ने बताया है कि बद्र के दिन मुसलमानों की सहायता अल्लाह ने की थी। इससे मालूम हुआ कि मुसलमानों के पास मौजूद हथियार, शक्ति और फ़रिश्तों का सहयोग आदि सारी चीज़ें विजय, ख़ुशख़बरी और आश्वासन के साधन हैं। इनके दम पर विजय प्राप्त नहीं होती। विजय देने वाला केवल अल्लाह है। ऐसे में इस लेखिका तथा इस प्रकार के अन्य लोगों के लिए कैसे जायज़ हो सकता है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से फ़रियाद करें एवं विजय माँगें और सारे संसार के रब से मुँह मोड़े रखें, जो हर चीज़ का मालिक है और सब कुछ करने की क्षमता रखता है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह बदतरीन अज्ञानता और बहुत बड़ा शिर्क है। इसलिए इस लेखिका को विशुद्ध तौबा करनी चाहिए। और विशुद्ध तौबा के अंदर कुछ बातों का पाया जाना ज़रूरी है, जो इस प्रकार हैं : 1- किए हुए गुनाह पर शर्मिंदगी हो। 2- जो गुनाह हो चुका है, उससे ख़ुद को अलग कर लिया जाए। 3- उसे दोबारा न करने का संकल्प किया जाए। और अल्लाह के सम्मान में, उसकी प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए, उसके आदेशों के पालन में उसकी मना की हुई चीज़ों से सावधान रहने के लिए किया जाए। यही सच्ची तौबा है। 4- गुनाह का संबंध अगर किसी सृष्टि के अधिकार के हनन से हो, तो तौबा करते समय एक चौथी चीज़ भी ज़रूरी है। यह चौथी चीज़ है, अधिकार वाले को उसका अधिकार लौटा देना या उससे क्षमा प्राप्त कर लेना।
अल्लाह ने अपने नबी को तौबा का आदेश दिया है और उनकी तौबा क़बूल करने का वादा भी किया है। जैसाकि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है:
﴿وَتُوبُوا إِلَى اللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ 31﴾
"और ऐ ईमान वालो! तुम सब अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम सफल हो जाओ।" [सूरा अल-नूर : 31]।
एवं ईसाइयों के बारे में कहा है :
﴿أَفَلَا يَتُوبُونَ إِلَى اللَّهِ وَيَسْتَغْفِرُونَهُ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ 74﴾
"तो क्या वे अल्लाह के समक्ष तौबा नहीं करते तथा उससे क्षमा याचना नहीं करते, और अल्लाह अति क्षमाशील, अत्यंत दयावान् है।" [सूरा अल-माइदा : 74]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ يَلْقَ أَثَامًا 68 يُضَاعَفْ لَهُ الْعَذَابُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَيَخْلُدْ فِيهِ مُهَانًا 69 إِلَّا مَنْ تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ عَمَلًا صَالِحًا فَأُولَئِكَ يُبَدِّلُ اللَّهُ سَيِّئَاتِهِمْ حَسَنَاتٍ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِيمًا 70﴾
"और जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे पूज्य को नहीं पुकारते, और न उस प्राण को क़त्ल करते हैं, जिसे अल्लाह ने ह़राम ठहराया है परंतु हक़ के साथ और न व्यभिचार करते हैं। और जो ऐसा करेगा, वह पाप का भागी बनेगा। क़ियामत के दिन उसकी यातना दुगुनी कर दी जाएगी और वह अपमानित होकर उसमें हमेशा रहेगा। परंतु जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और अच्छे काम किए, तो ये लोग हैं जिनके बुरे कामों को अल्लाह नेकियों में बदल देगा और अल्लाह हमेशा बहुत बख़्शने वाला, अत्यंत दयावान् है।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 68-70]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَهُوَ الَّذِي يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَعْفُو عَنِ السَّيِّئَاتِ وَيَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ25﴾
"वही है, जो अपने बंदों की तौबा क़बूल करता है और बुराइयों को माफ़ करता है और जो कुछ तुम करते हो, उसे जानता है।" [सूरा अल-शूरा : 25]।
सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«الإِسْلَامُ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ، وَالتَّوْبَةُ تَجُبُّ مَا كَانَ قَبْلَهَا».
"इस्लाम पहले के गुनाहों को मिटा देता है और तौबा पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देती है।"
चूँकि शिर्क एक ख़तरनाक चीज़ और सबसे बड़ा गुनाह है, और इस लेखिका के लेख से आम लोगों के धोखे में पड़ने की आशंका है, एवं अल्लाह की महानता को सामने लाना और उसके बंदों का शुभचिंतन एक ज़रूरी कार्य है, इसलिए मैंने संक्षिप्त में यह बातें लिख दी हैं। दुआ है कि अल्लाह इन बातों को लाभकारी बनाए, हमारे और तमाम मुसलमानों के हालात दुरुस्त कर दे, हम सब को सही रूप से दीन समझने और उस पर जमे रहने का सुयोग प्रदान करे, तथा हमें और तमाम मुसलमानों को अपनी आत्माओं की बुराइयों एवं बुरे कर्मों से बचाए। निश्चित रूप से यह सब वही कर सकता है। उसके अतिरिक्त किसी के पास इसकी क्षमता नहीं है।
अल्लाह की दया, शांति एवं बरकतें अवतरित हों उसके बंदे एवं रसूल, हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, और आपके परिवार एवं साथियों पर।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
तीसरी पुस्तिका:
जिन्नों और शैतानों से फ़रियाद और उनके लिए मन्नत मानने के बारे में शरई दृष्टिकोण
यह पुस्तिका अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ की ओर से इसे देखने वाले तमाम मुसलमानों की ओर। अल्लाह मुझे और तमाम मुसलमानों को अपने दीन को थामे रखने और उस पर जमे रहने का सुयोग दे। आमीन।
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु। (आप पर सलामती, अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हों।)
इसके बाद अब मूल विषय पर आते हैं : मेरे कुछ दीनी भाइयों ने मुझसे कुछ अज्ञानी लोगों के कुछ कृत्यों, जैसे अल्लाह के अतिरिक्त किसी और को, मसलन जिन्नात आदि को पुकारना, कठिनाइयों के समय उनसे मदद माँगना, फ़रियाद करना, उनके लिए मन्नत मानना और जानवर ज़बह करना आदि के बारे में पूछा। उनका कहना था कि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि ऐ जिन्नात के सात सरदारो! इसे पकड़ लो, इसकी हड्डियाँ तोड़ दो, इसका रक्त पी जाओ और इसके साथ ऐसा एवं वैसा करो, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि ऐ ज़ुह्र के समय के जिन्नो! ऐ अस्र के समय के जिन्नो! इसे पकड़ लो। इस प्रकार की चीज़ें कुछ दक्षिणी भागों में बहुत ज़्यादा पाई जाती हैं। इसी से मिलती-जुलती चीज़ें हैं, मरे हुए लोगों, जैसे नबियों, अल्लाह के नेक बंदों और फ़रिश्तों को पुकारना तथा उनसे फ़रियाद करना। ये सारी तथा इस प्रकार की अन्य चीज़ें स्वयं को मुसलमान कहने वाले बहुत-से लोगों के अंदर पाई जाती हैं। यह सब दरअसल अज्ञानता एवं पुर्खों के अंधे अनुसरण का नतीजा है। कुछ लोग इस तरह की चीज़ों को हल्का करके दिखाने और प्रमाणित करने के लिए कह देते हैं कि यह चीज़ें बिना सोचे-समझे ज़बान पर आ जाती हैं और हम इनपर विश्वास नहीं रखते।
मुझसे यह भी पूछा गया कि इस प्रकार के काम करने वालों के साथ शादी-विवाह करने, उनके ज़बह किए हुए जानवर को खाने, उनपर जनाज़े की नमाज़ पढ़ने और उनके पीछे नमाज़ पढ़ने का किया हुक्म है। तथा ग़ैब की बात बताने का दावा करने वालों, जैसे रोगी के शरीर को छूने वाली किसी भी चीज़ जैसे पगड़ी, पायजामा और दुपट्टा आदि को देखकर ही बीमारी और उसके कारणों को जानने का दावा करने वालों को सच मानना कैसा है?
उत्तर : सारी प्रशंसा एकमात्र अल्लाह की है और अल्लाह की शांति एवं दया अवतरित हो अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, आपके परिवार, साथियों और क़ियामत के दिन तक उनके पद्चिह्नों पर चलने वालों पर।
इसके बाद अब मूल विषय पर आते हैं। पवित्र एवं महान अल्लाह ने इन्सान एवं जिन्नात की रचना केवल इसलिए की है कि वे अल्लाह ही की इबादत करें, जो माँगना हो उसी से माँगें, उसी से फ़रियाद करें, उसी के लिए जानवर ज़बह करें और मन्नत मानें, अतः इबादत के तौर पर जो कुछ करें उसी के लिए करें। इन्हीं बातों की शिक्षा देने के लिए अल्लाह ने रसूल भेजे और इन्हीं बातों को स्पष्ट करने, इन्हीं की ओर बुलाने और लोगों को शिर्क एवं अल्लाह के अतरिक्त की इबादत से सावधान करने के लिए अल्लाह ने आकाशीय ग्रंथ उतारे, जिनमें सबसे महान क़ुरआन है। यही मूल आधार और दीन की असल बुनियाद है। यही ला इलाहा इल्लल्लाह की गवाही देने का अर्थ है। यही अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य न होने का अर्थ है। क्योंकि यह कलिमा जहाँ यह बताता है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई भी इबादत का हक़दार नहीं है, वहीं यह भी बताता है कि अल्लाह ही इबादत का अकेला हक़दार है। कोई सृष्टि इस लायक़ नहीं है कि उसकी इबादत की जाए। इस मूल आधार के प्रमाण अल्लाह की किताब और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। उन्ही में से उदाहरण-स्वरूप सर्वशक्तिमान अल्लाह का यह कथन है :
﴿وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ56﴾
"और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।" [सूरा अल-ज़ारियात : 56]।
उसका एक और कथन है :
﴿وَقَضَى رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ...﴾
"और (ऐ बंदे) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो...।" [सूरा अल-इसरा : 23]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ حُنَفَاءَ...﴾
"हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, एकाग्र होकर, उसकी उपासना करें...।" [सूरा अल-बय्यिना : 5]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ60﴾
"तथा तुम्हारे पालनहार ने कहा है : तुम मुझे पुकारो। मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा। निःसंदेह जो लोग मेरी इबादत से अहंकार करते हैं, वे शीघ्र ही अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।" [सूरा ग़ाफ़िर : 60]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ...﴾
"और (ऐ नबी!) जब मेरे बंदे आपसे मेरे बारे में पूछें, तो निश्चय मैं (उनसे) क़रीब हूँ। मैं पुकारने वाले की दुआ क़बूल करता हूँ जब वह मुझे पुकारता है...।" [सूरा अल-बक़रा : 186]।
पवित्र एवं महान अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन के अंदर और अपने रसूल की ज़बानी इस बात का आदेश दिया है कि लोग इबादत केवल अपने रब की करें।
उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दुआ एक बहुत बड़ी इबादत है। इस इबादत से अभिमान करने वाला जहन्नम जाएगा। उसने अपने बंदों को केवल उसी से दुआ करने का आदेश दिया है। उसने बताया है कि वह अपने बंदों से निकट है और उनकी दुआ ग्रहण करता है। इसलिए तमाम बंदों का कर्तव्य है कि दुआ अपने रब ही से करें। क्योंकि दुआ भी इबादत का एक भाग है, जिसके लिए इन्सान एवं जिन्नात पैदा किए गए हैं और आदेशित हैं। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने कहा है :
﴿قُلْ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ162 لَا شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ163﴾
"आप कह दें कि निश्चय मेरी नमाज़, मेरी क़ुरबानी तथा मेरा जीवन-मरण सारे संसारों के पालनहार अल्लाह के लिए है। उसका कोई साझी नहीं। मुझे इसी का आदेश दिया गया है। और मैं सबसे पहला मुसलमान हूँ।" [सूरा अल-अनआम : 162, 163]।
अल्लाह ने अपने नबी को आदेश दिया है कि वह लोगों को बता दें कि उनकी नमाज़, जानवर ज़बह करना, जीना और मरना सब कुछ अल्लाह के लिए है, जो सारे संसार का रब है। अतः जिसने अल्लाह के सिवा किसी और के लिए जानवर ज़बह किया, तो अल्लाह के साथ शिर्क किया। उसी तरह, जिस तरह अल्लाह के सिवा किसी और के लिए नमाज़ पढ़ना अल्लाह के साथ शिर्क करना है। क्योंकि अल्लाह ने नमाज़ और जानवर ज़बह करने का ज़िक्र एक साथ किया है और बताया है कि ये दोनों काम एकमात्र अल्लाह के लिए हैं और इनमें उसका कोई साझी नहीं है। अतः जिसने अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की निकटता प्राप्त करने के लिए जानवर ज़बह किया, वह चाहे जिन्न हों, फ़रिश्ते हों या मरे हुए लोग, वह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के लिए नमाज़ पढ़ने वाले की तरह है। एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَعَنَ اللهُ مَنْ ذَبَحَ لِغَيْرِ اللهِ».
"अल्लाह की धिक्कार हो ऐसे व्यक्ति पर जो अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए जानवर ज़बह करे।"
इसी तरह इमाम अहमद ने हसन सनद द्वारा तारिक़ बिन शिहाब से रिवायत किया है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مرَّ رَجُلَانِ عَلَى قَومٍ لَهُم صَنَمٌ لَا يَجُوزُهُ أَحَدٌ حَتَّى يُقرِّبَ لَهُ شَيئًا، فَقَالُوا لِأَحَدِهِمَا: قَرِّبْ. قَالَ: لَيسَ عِندِي شَيءٌ أَقَرِّبُهُ، قَالُوا: قَرِّبْ وَلَوْ ذُبَابًا، فَقَرَّبَ ذُبَابًا، فَخَلُّوا سَبِيلَهُ، فَدَخَلَ النَّارَ، وَقَالُوا لِلآخَرِ: قَرِّبْ. قَالَ: مَا كُنْتُ لِأُقَرِّبَ لِأَحَدٍ شَيْئًا دُونَ اللهِ جَلَّ جَلَالُهُ، فَضَرَبُوا عُنُقَه، فَدَخَلَ الجَنَّةَ».
''दो व्यक्ति एक समुदाय के यहाँ से गुज़रे। उस समुदाय का एक बुत था और प्रचलन यह था कि वहाँ से गुज़रने वाले हर व्यक्ति को कुछ न कुछ चढ़ावा देकर आगे बढ़ना होता था। उन्होंने दोनों में से एक से चढ़ावा चढ़ाने के लिए कहा, तो उसने उत्तर दिया कि उसके पास देने के लिए कुछ नहीं है। समुदाय के लोगों ने कहा कि चढ़ावा तो चढ़ाना पढ़ेगा, भले एक मक्खी ही सही। अतः उसने एक मक्खी का चढ़ावा चढ़ा दिया, जिसके बाद लोगों ने उसे जाने तो दिया, मगर वह जहन्नम का हक़दार बन गया। इसके बाद दूसरे व्यक्ति को चढ़ावा चढ़ाने के लिए कहा, तो उसने साफ़ कह दिया कि मैं सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की निकटता प्राप्त करने के लिए कुछ नहीं दे सकता। तब लोगों ने उसकी गर्दन उड़ा दी और वह जन्नत का हक़दार बन गया।''
आप अंदाज़ा लगाएँ कि जब एक व्यक्ति किसी बुत आदि की निकटता प्राप्त करने के लिए एक मक्खी देने मात्र से मुश्रिक और जहन्नम का हक़दार बन सकता है, तो जिन्नात, फ़रिश्तों और वलियों को पुकारने, उनसे फ़रियाद करने, उनके लिए मन्नत मानने और उनकी निकटता प्राप्त करने के लिए जानवर ज़बह करने वालों का क्या होगा? इस तरह के काम आम तौर पर धन की सुरक्षा, रोगी के स्वास्थ्य लाभ, जानवरों एवं खेती की रक्षा के लिए किए जाते हैं, या फिर जिन्नात आदि के भय से। इस तरह इस प्रकार के काम करने वाले लोग मक्खी का चढ़ावा चढ़ाने वाले से कहीं बढ़कर मुश्रिक और जहन्नम जाने के हक़दार हैं।
इस संदर्भ में उच्च एवं महान अल्लाह के जो कथन आए हैं, उनमें से एक यह है :
﴿إِنَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ فَٱعۡبُدِ ٱللَّهَ مُخۡلِصٗا لَّهُ ٱلدِّينَ2 أَلَا لِلَّهِ ٱلدِّينُ ٱلۡخَالِصُۚ وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ3﴾
"निःसंदेह हमने आपकी ओर यह पुस्तक सत्य के साथ उतारी है। अतः आप अल्लाह की इबादत इस तरह करें कि धर्म को उसी के लिए खालिस करने वाले हों। सुन लो! ख़ालिस (विशुद्ध) धर्म केवल अल्लाह ही के लिए है। तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें। निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो।" [सूरा अल-ज़ुमर : 2-3]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنْفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَؤُلَاءِ شُفَعَاؤُنَا عِنْدَ اللَّهِ قُلْ أَتُنَبِّئُونَ اللَّهَ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ18﴾
"और वे लोग अल्लाह को छोड़कर उनको पूजते हैं, जो न उन्हें कोई हानि पहुँचाते हैं और न उन्हें कोई लाभ पहुँचाते हैं और कहते हैं कि ये लोग अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं। आप कह दें : क्या तुम अल्लाह को ऐसी बात की सूचना दे रहे हो, जिसे वह न आकाशों में जानता है और न धरती में? वह पवित्र है और उससे बहुत ऊँचा है, जिसे वे साझीदार ठहराते हैं।" [सूरा यूनुस : 18]।
पवित्र एवं महान अल्लाह ने इन दोनों आयतों में बताया है कि मुश्रिकों ने अल्लाह के अतिरिक्त कुछ संरक्षक बना रखे हैं, जिनकी वे अल्लाह के साथ भय तथा आशा से ओतप्रोत होकर इबादत करते हैं। उनके लिए जानवर ज़बह करते हैं, मन्नत मानते हैं और इस प्रकार के अन्य कार्य करते हैं। और ये सब यह समझकर करते हैं कि उनके ये संरक्षक अपनी इबादत करने वालों को अल्लाह से निकट कर देंगे और उनके लिए अल्लाह के यहाँ सिफ़ारिश करेंगे। अल्लाह ने उनकी इस सोच को झुठला दिया है तथा उनको झूठा, अविश्वासी और मुश्रिक कहा है और स्वयं को उनके शिर्क से पवित्र क़रार दिया है। फ़रमाया है :
﴿...سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ﴾
"...वह पवित्र है और सर्वोच्च है, उनके साझी बनाने से।" [सूरा अल-नह्ल: 1]।
इससे मालूम हुआ कि जिसने अल्लाह के साथ किसी फ़रिश्ते, नबी, जिन्न, पेड़ या पत्थर को पुकारा, उससे फ़रियाद की और मन्नत मानकर या जानवर ज़बह करके उसकी निकटता यह सोचकर प्राप्त करने का प्रयास किया कि वह अल्लाह के यहाँ उसके लिए सिफ़ारिश करेगा, उसे अल्लाह की निकटता दिलाएगा, रोगी को स्वास्थ्य लाभ होगा, धन सुरक्षित रहेगा, खोया हुआ व्यक्ति सलामत रहेगा आदि, वह उस बड़े शिर्क एवं विपत्ति में पड़ गया, जिसके बारे में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ وَمَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدِ افْتَرَى إِثْمًا عَظِيمًا48﴾
"निःसंदेह, अल्लाह यह क्षमा नहीं करेगा कि उसका साझी बनाया जाए और इसके सिवा जिसे चाहेगा, क्षमा कर देगा। और जिसने अल्लाह का साझी बनाया, उसने बहुत बड़ा पाप गढ़ लिया।" [सूरा अल-निसा : 48]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّهُ مَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدْ حَرَّمَ اللَّهُ عَلَيْهِ الْجَنَّةَ وَمَأْوَاهُ النَّارُ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنْصَارٍ72﴾
"निःसंदेह सच्चाई यह है कि जो भी अल्लाह के साथ साझी बनाए, तो निश्चय उसपर अल्लाह ने जन्नत हराम (वर्जित) कर दी और उसका ठिकाना आग (जहन्नम) है। तथा अत्याचारियों के लिए कोई मदद करने वाला नहीं।" [सूरा अल-माइदा : 72]।
क़ियामत के दिन शफाअत (सिफ़ारिश) तौहीद के मार्ग पर चलने और केवल एक अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए काम करने वालों को प्राप्त होगी। शिर्क की राह पर चलने वालों को नहीं। एक हदीस में है कि जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया कि आपकी शफाअत (सिफ़ारिश) का सबसे अधिक हक़दार कौन होगा, तो आपने फ़रमाया :
«مَنْ قَالَ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ خَالِصًا مِنْ قَلْبِهِ».
"जो सच्चे दिल से "ला इलाहा इल्लल्लाह" कहे।"
एक अन्य अवसर पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
«لِكُلِّ نَبِيٍّ دَعْوَةٌ مُسْتَجَابَةٌ، فَتَعَجَّلَ كُلُّ نَبِيٍ دَعْوَتَهُ، وَإِنِّي اخْتَـبَأْتُ دَعْوَتِي شَفَاعَةً لِأُمَّتِي يَومَ القِيَامَةِ، فَهِيَ نَائِلَةٌ إِنْ شَاءَ الله مَن مَاتَ مِنْ أُمَّتِي لَا يُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا».
''हर नबी की एक दुआ निश्चित रूप से ग्रहण होती है। प्रत्येक नबी ने अपनी वह दुआ इस संसार में ही मांग ली, परंतु मैंने अपनी इस दुआ को क़ियामत के दिन अपनी उम्मत की शफाअत (सिफ़ारिश) के लिए छुपा रखा है। इस दुआ का हक़दार मेरी उम्मत का हर वह व्यक्ति होगा, जिसकी मौत इस हाल में आए कि वह किसी को अल्लाह का शरीक न ठहराता हो।''
आरंभिक काल के मुश्रिकों का विश्वास था कि अल्लाह उनका रचयिता और आजीविका दाता है। वह नबियों, वलियों, फ़रिश्तों, पेड़ों और पत्थरों आदि से जुड़ाव इस आधार पर रखते थे कि ये अल्लाह के यहाँ उनके लिए सिफ़ारिश करेंगे और उनको अल्लाह की निकटता लाभ कराएँगे, जैसा कि कुछ आयतों के आलोक में पीछे गुज़र चुका है। लेकिन उनकी इस धारणा को अल्लाह ने मान्यता नहीं दी। अल्लाह ने अपने महान ग्रंथ में उनके इस विचार का खंडन किया, उनको काफ़िर एवं मुश्रिक कहा और बताया कि उनके ये पूज्य न तो उनके लिए सिफ़ारिश करेंगे और न उनको अल्लाह की निकटता लाभ करा सकेंगे। उनकी इस धारणा को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी मान्यता नहीं दी। बल्कि आपने उनसे उस समय तक युद्ध किया, जब तक उन्होंने केवल एक अल्लाह की इबादत शुरू नहीं की और आपने यह कार्य अल्लाह के इस कथन पर अमल करते हुए किया :
﴿وَقَاتِلُوهُمْ حَتَّى لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدِّينُ لِلَّهِ...﴾
"तथा उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि कोई फ़ितना शेष न रहे और धर्म अल्लाह के लिए हो जाए...।" [सूरा अल-बक़रा : 193]।
और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है :
«أُمِرْتُ أَنْ أُقَاتِلَ النَّاسَ حَتَّى يَشْهَدُوا أَنْ لَا إِلهَ إِلَّا اللهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللهِ، وَيُقِيمُوا الصَّلَاةَ، وَيُؤتُوا الزَّكَاةَ، فَإِذَا فَعَلُوا ذَلِكَ عَصَمُوا مِنِّي دِمَاءَهُم وَأَمْوَالَهُمْ إِلَّا بِحَقِّ الإِسْلَامِ، وَحِسَابُهُم عَلَى اللهِ».
"मुझे आदेश दिया गया है कि लोगों से युद्ध करूँ, यहाँ तक कि वे इस बात की गवाही दें कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करें और ज़कात अदा करें। अगर उन्होंने इतना कर लिया तो अपनी जान तथा माल को इस्लाम के अधिकार के सिवा हमसे सुरक्षित कर लिया और उनका हिसाब अल्लाह पर है।"
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन :
«حَتَّى يَشْهَدُوا أَن لَا إِلهَ إِلَّا اللهُ»
"यहाँ तक कि वे इस बात की गवाही दें कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है" का अर्थ है; यहाँ तक कि वे तमाम चीज़ों को छोड़-छाड़ कर केवल एक अल्लाह की इबादत न करने लगें।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दौर के मुश्रिक जिन्नात से डरते थे और उनकी शरण लेते थे। चुनांचे इसी परिप्रेक्ष्य में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَأَنَّهُ كَانَ رِجَالٌ مِنَ الْإِنْسِ يَعُوذُونَ بِرِجَالٍ مِنَ الْجِنِّ فَزَادُوهُمْ رَهَقًا6﴾
"और वास्तविकता यह है कि मनुष्यों में से कुछ लोग, जिन्नों में से कुछ लोगों की शरण लिया करते थे। तो उन्होंने उन (जिन्नों) को सरकशी में बढ़ा दिया।" [सूरा अल-जिन्न : 6]।
इस आयत के बारे में क़ुरआन के व्याख्याकारों ने लिखा है : अल्लाह के कथन :
﴿...فَزَادُوهُمْ رَهَقًا﴾
"...तो उन्होंने उन (जिन्नों) को सरकशी में बढ़ा दिया।" में (रहक़ा) का अर्थ है : घबराहट और भय। जिन्नात जब देखते हैं कि इन्सान उनकी शरण ले रहे हैं, तो अभिमान में आ जाते हैं तथा उन्हें और अधिक डराना शुरू कर देते हैं, ताकि उनकी इबादत और उनकी शरण लेने की प्रवृत्ति को और बढ़ावा मिले।
अल्लाह ने मुसलमानों से कहा है कि वे इसके बदले में अल्लाह की और उसके संपूर्ण शब्दों की शरण लें। इस संदर्भ में उसने कहा है :
﴿وَإِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ إِنَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ200﴾
"और यदि शैतान आपको उकसाए, तो अल्लाह से शरण माँगिए। निःसंदेह वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।" [सूरा अल-आराफ़ : 200]।
इसी तरह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का कथन है :
﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ1﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के पालनहार की शरण लेता हूँ।"
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक सहीह हदीस में है :
«مَنْ نَزَلَ مَنْزِلًا فَقَالَ: (أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ)؛ لَم يَضُرَّهُ شَيءٌ حَتَّى يَرْتَحِلَ مِنْ مَنْزِلِهِ ذَلِكَ».
"जिसने किसी स्थान में उतरते समय यह दुआ पढ़ी : "मैं अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ों की बुराई से उसके संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ", उसे कोई वस्तु वह स्थान छोड़ने तक नुक़सान नहीं पहुँचा सकती।"
उपरोक्त आयतों एवं हदीसों से मुक्ति की चाहत, अपने धर्म को सुरक्षित रखने की इच्छा और स्वयं को छोटे-बड़े हर प्रकार के शिर्क से बचाने में दिलचस्पी रखने वाला व्यक्ति जान सकता है कि मरे हुए लोगों, फ़रिश्तों और जिन्नात आदि से आशाएँ रखना, उनको पुकारना और उनसे फ़रियाद करना आदि जाहिलिय्यत काल (अज्ञानता काल) के मुश्रिकों के कार्य और अल्लाह का साझी बनाने की बदतरीन मिसालें हैं। इसलिए इन्हें छोड़ना, इनसे सावधान रहना, एक-दूसरे को इन्हें छोड़ने का आदेश देना और इनमें संलिप्त लोगों की भर्त्सना करना ज़रूरी है।
जिस व्यक्ति के बारे में पता हो कि वह इस तरह के कार्यों में संलिप्त है, उससे शादी-विवाह करना, उसके ज़बह किए हुए जानवर को खाना, उसके जनाज़े की नमाज़ पढ़ना और उसके पीछे नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं है। हाँ, अगर वह इन कार्यों से तौबा का एलान कर देता है और एक अल्लाह को पुकारना और केवल उसी की इबादत करना शुरू कर देता है, तो ठीक है। याद रहे कि दुआ ही इबादत, बल्कि उसका सार है। जैसा कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«الدُّعَاءُ هُوَ العِبَادَةُ».
"दुआ ही इबादत है।"
अन्य शब्दों में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित एक यह हदीस है :
«الدُّعَاءُ مُخُّ العِبَادَةِ».
"दुआ इबादत का सार है।"
जहाँ तक मुश्रिकों से शादी-विवाह का संबंध है, तो उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَلَا تَنْكِحُوا الْمُشْرِكَاتِ حَتَّى يُؤْمِنَّ وَلَأَمَةٌ مُؤْمِنَةٌ خَيْرٌ مِنْ مُشْرِكَةٍ وَلَوْ أَعْجَبَتْكُمْ وَلَا تُنْكِحُوا الْمُشْرِكِينَ حَتَّى يُؤْمِنُوا وَلَعَبْدٌ مُؤْمِنٌ خَيْرٌ مِنْ مُشْرِكٍ وَلَوْ أَعْجَبَكُمْ أُولَئِكَ يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ وَاللَّهُ يَدْعُو إِلَى الْجَنَّةِ وَالْمَغْفِرَةِ بِإِذْنِهِ وَيُبَيِّنُ آيَاتِهِ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ221﴾
"तथा मुश्रिक स्त्रियों से विवाह न करो, यहाँ तक कि वे ईमान ले आएँ और निश्चय एक ईमान वाली दासी किसी भी मुश्रिक स्त्री से उत्तम है, यद्यपि वह तुम्हें अच्छी लगे। और अपनी स्त्रियों का निकाह़ मुश्रिकों से न करो, यहाँ तक कि वे ईमान ले आएँ और निश्चय एक ईमान वाला दास किसी भी मुश्रिक (पुरुष) से उत्तम है, यद्यपि वह तुम्हें अच्छा लगे। ये लोग आग की ओर बुलाते हैं तथा अल्लाह अपनी आज्ञा से जन्नत और क्षमा की ओर बुलाता है और लोगों के लिए अपनी आयतें खोलकर बयान करता है, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।" [सूरा अल-बक़रा : 221]।
यहाँ हम देख रहे हैं कि पवित्र एवं महान अल्लाह ने मुसलमानों को मुश्रिक औरतों से शादी करने से मना किया है, चाहे वो बुतों की इबादत करने वाली हों या जिन्नात एवं फ़रिश्तों की, जब तक वो विशुद्ध रूप से एक अल्लाह की इबादत, इस संबंध में प्राप्त रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिक्षाओं की पुष्टि एवं आपके मार्ग के अनुसरण के माध्यम से मोमिना न हो जाएँ। इसी प्रकार मुस्लिम औरतों की शादी मुश्रिकों से कराने से मना किया है, जब तक वो विशुद्ध रूप से एक अल्लाह की इबादत, इस संबंध में प्राप्त रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिक्षाओं की पुष्टि एवं आपके मार्ग के अनुसरण के माध्यम से मोमिन न हो जाएँ।
उच्च एवं पवित्र अल्लाह ने आगे बताया है कि मोमिन दासी आज़ाद मुश्रिक औरत से बेहतर है, यद्यपि उसका रूप एवं उसकी बातें आकर्षित क्यों न करती हों। इसी तरह मुस्लिम दास आज़ाद मुश्रिक से बेहतर है, यद्यपि उसका सौन्दर्य, वाक्पटुता और बहादुरी आकर्षित क्यों न करती हो। फिर इसके कारण बताते हुए फ़रमाया है :
﴿...أُولَئِكَ يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ...﴾
"...ये लोग आग की ओर बुलाते हैं...।" [सूरा अल-बक़रा : 221]।
यानी मुश्रिक पुरुष एवं मुश्रिक महिलाएँ। ये लोग अपने कथन, कार्य, सीरत एवं चरित्र से आग की ओर बुलाते हैं। जबकि मोमिन पुरुष एवं मोमिन स्त्रियाँ अपने आचरण, कार्य और व्यवहार से जन्नत की ओर बुलाते हैं। आप खुद ही सोचें कि दोनों बराबर कैसे हो सकते हैं?
जहाँ तक मुश्रिकों की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ने की बात है, तो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने मुनाफ़िक़ों के बारे में कहा है :
﴿وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَى قَبْرِهِ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ84﴾
"और उनमें से जो कोई मर जाए, उसका कभी जनाज़ा न पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर खड़े होना। निःसंदेह उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और इस अवस्था में मरे कि वे अवज्ञाकारी थे।" [सूरा अल-तौबा : 84]।
इस आयत में सर्वशक्तिमान अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया है कि मुनाफ़िक़ एवं काफ़िर की जनाज़े की नमाज़ नहीं पढ़ी जाएगी। इसका कारण है अल्लाह एवं उसके रसूल के प्रति दोनों का अविश्वास। इसी तरह उनके पीछे नमाज़ नहीं पढ़ी जाएगी और उनको मुसलमानों का इमाम नहीं बनाया जाएगा। इसके कारण हैं दोनों का अविश्वास, अमानतदारी से खाली होना, उनकी मुस्लिम दुश्मनी तथा उनका नमाज़ एवं इबादत का पात्र न होना। क्योंकि अविश्वास एवं शिर्क के साथ कोई अमल बाक़ी नहीं रहता। दुआ है कि अल्लाह हमें इनसे बचाए। जहाँ तक मुश्रिकों के ज़बह किए हुए जानवर का मांस खाने की बात है, तो सर्वशक्तिमान अल्लाह ने मरे हुए जानवर और मुश्रिकों के ज़बह किए हुए जानवरों के हराम होने का ज़िक्र करते हुए कहा है :
﴿وَلَا تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ وَإِنَّهُ لَفِسْقٌ وَإِنَّ الشَّيَاطِينَ لَيُوحُونَ إِلَى أَوْلِيَائِهِمْ لِيُجَادِلُوكُمْ وَإِنْ أَطَعْتُمُوهُمْ إِنَّكُمْ لَمُشْرِكُونَ121﴾
"तथा उसमें से न खाओ, जिसपर अल्लाह का नाम न लिया गया हो, तथा निःसंदेह यह (खाना) सर्वथा अवज्ञा है। तथा निःसंदेह शैतान अपने मित्रों के मन में संशय डालते रहते हैं, ताकि वे तुमसे झगड़ा करें। और यदि तुमने उनका कहा मान लिया, तो निःसंदेह तुम निश्चय बहुदेववादी हो।" [सूरा अल-अनआम : 121]।
हम देख रहे हैं कि इस आयत में अल्लाह -उसकी महिमा असीम है- ने मरा हुआ एवं मुश्रिकों का ज़बह किया हुआ जानवर खाने से मना किया है। क्योंकि जब मुश्रिक अशुद्ध है, तो उसका ज़बह किया हुआ जानवर मरे हुए जानवर के समान है। चाहे उसपर अल्लाह का नाम ही क्यों न लिया गया हो। क्योंकि उसका अल्लाह का नाम लेना निरर्थक है। क्योंकि अल्लाह का नाम लेना इबादत है और शिर्क इबादत को नष्ट कर देता है। जब तक इन्सान शिर्क से तौबा न कर ले, उसकी कोई इबादत काम नहीं देती। वैसे अल्लाह -उसकी महिमा असीम है- ने अपने इस कथन में किताब वालों के भोजन को हलाल कहा है :
﴿...وَطَعَامُ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ حِلٌّ لَكُمْ وَطَعَامُكُمْ حِلٌّ لَهُمْ...﴾
"...और उन लोगों का खाना तुम्हारे लिए हलाल है जिन्हें किताब दी गई, और तुम्हारा खाना उनके लिए हलाल है...।" [सूरा अल-माइदा : 5]।
क्योंकि वह अपना संबंध एक आकाशीय धर्म से जोड़ते हैं और मूसा एवं ईसा अलैहिमस्सलाम के अनुसरणकारी होने का दावा करते हैं। हालाँकि उनका यह दावा झूठा है और अल्लाह ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को पूरी मानव जाति का रसूल बनाकर भेजकर उनके दीन को निरस्त कर दिया है। लेकिन इन सारी बातों के बावजूद सर्वज्ञानी अल्लाह ने उनके भोजन तथा उनकी औरतों को हमारे लिए कई हिकमतों के मद्देनज़र हलाल क़रार दिया है, जिन्हें इस्लामी विद्वानों ने बयान फ़रमाया है। जबकि इसके विपरीत बुतों और मुर्दों, जैसे नबियों और वलियों आदि की इबादत करने वाले मुश्रिकों के भोजन को हलाल नहीं किया है, क्योंकि इनके दीन का कोई आधार नहीं है। यह बिल्कुल ही निराधार है। अतः इनका ज़बह किया हुआ जानवर मरा हुआ जानवर शुमार होगा और उसे खाने की अनुमति नहीं है।
जहाँ तक किसी व्यक्ति का अपने सामने वाले व्यक्ति से (तुझे जिन्न लग गया है), (तुझे जिन्न ने पकड़ लिया है), (तुझे शैतान ले उड़ा है) और इस प्रकार की अन्य बातें कहने का प्रश्न है, तो इस तरह के वाक्य गाली-गलौज के दायरे में आते हैं और गाली-गलौज के अन्य शब्दों की तरह इन वाक्य का उच्चारण किसी मुसलमान के लिए करना जायज़ नहीं है। लेकिन ये वाक्य शिर्क के दायरे में नहीं आते। हाँ, अगर इस प्रकार के वाक्यों का प्रयोग करने वाले व्यक्ति का विश्वास हो कि जिन्नात अल्लाह की अनुमति एवं इच्छा के बिना ही इन्सान पर प्रभाव डाल सकते हैं, तो बात अलग है। जिसने जिन्नात या किसी अन्य सृष्टि के बारे में इस प्रकार का विश्वास रखा, वह अपने इस विश्वास के कारण काफ़िर हो गया। क्योंकि अल्लाह ही हर चीज़ का मालिक है, उसी के पास सब कुछ करने की क्षमता है, वही लाभ एवं हानि का मालिक है, उसकी अनुमति, इच्छा एवं पूर्व निर्णय के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। अल्लाह ने अपने नबी को इस बात का आदेश देते हुए, कि लोगों को इस महान सिद्धांत के बारे में बता दें, कहा है :
﴿قُلْ لَا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ وَلَوْ كُنْتُ أَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِيَ السُّوءُ إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ188﴾
"आप कह दें कि मैं अपने लिए किसी लाभ और हानि का मालिक नहीं हूँ, परंतु जो अल्लाह चाहे। और यदि मैं ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान रखता होता, तो अवश्य बहुत अधिक भलाइयाँ प्राप्त कर लेता और मुझे कोई कष्ट नहीं पहुँचता। मैं तो केवल उन लोगों को सावधान करने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।" [सूरा अल-आराफ़ : 188]।
आप अंदाज़ा लगाएँ कि जब इस सृष्टि का सरदार एवं उनमें सबसे उत्कृष्ट व्यक्ति अपने लाभ एवं हानि का उससे ज़्यादा मालिक नहीं है, जितना अल्लाह चाहे, तो दूसरों का क्या हाल होगा? क़ुरआन के अंदर इस आशय की बहुत-सी आयतें मौजूद हैं।
जहाँ तक ग़ैब की बात बताने वालों, हाथ की सफाई एवं करतब दिखाने वालों और ज्योतिषियों आदि से कुछ पूछने की बात है, तो यह ग़लत है। जायज़ नहीं है। उनकी कही हुई बातों की पुष्टि करना तो और ग़लत है। बल्कि कुफ़्र की एक शाखा है। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَتَى عَرَّافًا فَسَأَلَهُ عَنْ شَيءٍ؛ لَمْ تُقْبَلْ لَهُ صَلَاةٌ أَرْبَعِينَ يَومًا».
"जिसने किसी खोई हुई अथवा चोरी की हुई वस्तु के बारे में बताने का दावा करने वाले के पास जाकर उससे कुछ पूछा, उसकी चालीस दिन की नमाज़ ग्रहण नहीं होगी।" इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है।
सहीह मुस्लिम ही में मुआविया बिन हकम सुलमी रज़ियल्लाहु अन्हु से यह भी वर्णित है :
«أَنَّ النَّبيَّ ﷺ نَهَى عَنْ إِتْيَانِ الكُهَّانِ وَسُؤَالِهِم».
"अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने काहिनों के पास जाने और उनसे कुछ पूछने से मना किया है।"
जबकि अह्ल-ए-सुनन ने रिवायत किया है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَتَى كَاهِنًا، فَصَدَّقَهُ بِمَا يَقُولُ؛ فَقَدْ كَفَرَ بِمَا أُنْزِلَ عَلَى مُحَمَّدٍ ﷺ».
"जिस व्यक्ति ने किसी काहिन के पास जाकर उससे कुछ पूछा और उसकी कही हुई बात को सच माना, उसने उस दीन (धर्म) का इनकार किया जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरा है।"
इस आशय की बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं। इसलिए मुसलमानों को अनिवार्य रूप से काहिनों, ग़ैब की बात जानने का दावा करने वालों और करतब दिखाने वालों से सावधान रहना चाहिए, जो ग़ैब की बात बताते फिरते हैं और मुसलमानों को धोखा देते हैं, चाहे वह इलाज के नाम पर ही क्यों न हो। पीछे गुज़र चुका है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस प्रकार के लोगों के पास जाने और उनकी पुष्टि करने से मना फ़रमाया है एवं उनसे सावधान किया है। इसके अंदर इलाज के नाम पर किए जाने वाले ग़ैब की बात जानने के दावे भी शामिल हैं। मसलन कुछ लोगों का पुरुष रोगी की पगड़ी या महिला रोगी का दोपट्टा आदि सूँघ कर बताना कि इसने यह काम किया है या अमुक चीज़ बनाई है। हालाँकि यह ग़ैब की बात है, जिसका रोगी की पगड़ी या दोपट्टा से कोई संकेत नहीं मिलता। इसका उद्देश्य केवल धोखा देना होता है, ताकि लोग कहें कि इसके पास इलाज एवं रोग और उसके प्रकारों का ज्ञान है। कभी-कभी यह लोग कुछ दवाएँ भी दे देते हैं और अल्लाह के लिखे के अनुसार स्वास्थ्य लाभ हो जाता है, तो उनके पास जाने वाले यह गुमान कर लेते हैं कि ऐसा उनकी दवा के कारण हुआ। कभी-कभी बीमारी के पीछे कुछ जिन्नों एवं शैतानों का हाथ हुआ करता है, जो इलाज का दावा करने वाले इस प्रकार के लोगों से जुड़े होते हैं और उन्हें कुछ ग़ैब की बातें बता देते हैं, जिनसे वह किसी तरह अवगत हो जाते हैं। तब इलाज का दावा करने वाले लोगों का भरोसा इन्हीं बातों पर होता है। यह लोग जब जिन्नों एवं शैतानों की कुछ इबादतें करते हैं, तो खुश होकर वे रोगी को छोड़कर चले जाते हैं और उसे कष्ट देना बंद कर देते हैं। यह बातें जिन्नों एवं शैतानों तथा उनका इस्तेमाल करने वालों के बारे में मशहूर और प्रचलित हैं।
इसलिए मुसलमानों को इस प्रकार की चीज़ों से सावधान रहना चाहिए, दूसरों से इनसे दूर रहने का आग्रह करना चाहिए और सभी मामलों में एक मात्र अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए। हाँ, क़ुरआन एवं हदीस में आए हुए अज़कार को पढ़कर इलाज करने, जायज़ दवाओं का प्रयोग करने और ऐसे डॉक्टरों के पास जाने में कोई हर्ज नहीं है, जो रोगी का चेकअप करते हैं और भौतिक उपकरणों द्वारा बीमारी की पहचान करते हैं। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक सहीह हदीस में है :
«مَا أَنْزَلَ اللهُ دَاءً إِلَّا أَنْزَلَ لَهُ شِفَاءً، عَلِمَهُ مَنْ علِمه، وَجَهِلَهُ مَنْ جَهِلَهُ».
"अल्लाह ने जितने भी रोग उतारे हैं, उनकी दवा भी उतारी है। यह और बात है कि कसी को मालूम हो गई और किसी को मालूम न हो सकी।"
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक और अवसर पर फ़रमाया है:
«لِكُلِّ دَاءٍ دَوَاءٌ، فإِذَا أُصِيبَ دَوَاءٌ الدَّاءَ بَرَأَ بِإِذْنِ اللهِ».
"हर बीमारी की दवा मौजूद है। जब बीमारी की सही दवा ज्ञान में आ जाती है, तो अल्लाह की अनुमति से स्वास्थ्य लाभ होता है।"
एक और हदीस में है :
«عِبَادَ اللهِ، تَدَاوَوا وَلَا تَدَاوَوا بِحَرَامٍ».
"अल्लाह के बंदो! इलाज किया करो, लेकिन किसी हराम चीज़ द्वारा इलाज न किया करो।" इस आशय की बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं।
दुआ है कि अल्लाह -जिसकी महिमा असीम है- तमाम मुसलमानों के हालात दुरुस्त कर दे, उनके दिलों एवं शरीरों को हर बीमारी से स्वास्थ्य लाभ करे, उनको सच्चे मार्ग पर चलाए, उन्हें और हमें गुमराह कर देने वाले फ़ितनों और शैतान तथा उसके मित्रों के अनुसरण से बचाए। वह जो चाहे कर सकता है। उसकी ओर से सुयोग मिले बिना न कोई बुरे काम से बच सकता है और न अच्छा काम कर सकता है।
अल्लाह की दया, शांति एवं बरकतें अवतरित हों उसके बंदे एवं रसूल, हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, और आपके परिवार एवं साथियों पर।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
चौथी पुस्तिका:
नवरचित तथा शिर्क की मिलावट वाले विर्दों के साथ इबादत करने के बारे में शरई दृष्टिकोण
अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ की ओर से सम्मानित भाई ........ के नाम, उसे अल्लाह हर भलाई का सुयोग प्रदान करे। आमीन।
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह, (आप पर शांति, अल्लाह की दया एवं बरकतें उतरें।)
अब मूल विषय पर आते हैं। मुझे आपका पत्र मिला, जिससे मालूम हुआ कि आपके यहाँ कुछ लोग कुछ ऐसे विर्द करते हैं, जो किताब व सुन्नत से साबित नहीं हैं। उनमें से कुछ विर्द बिदअत पर आधारित हैं, तो कुछ शिर्क पर। और वे इन विर्दों का संबंध अमीरुल मोमिनीन अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु आदि से जोड़ते हैं। लोग इन विर्दों को ज़िक्र की सभाओं या मग़्रिब की नमाज़ के बाद मस्जिदों में यह समझकर पढ़ते हैं कि इससे अल्लाह की निकटता प्राप्त होगी। मसलन वे कहते हैं : अल्लाह के लिए, ऐ अल्लाह के लोगो! अल्लाह की मदद से हमारी मदद करो और अल्लाह के वास्ते हमारे मददगार बन जाओ। इसी तरह वह कहते हैं : ऐ क़ुतुबो और ऐ सरदारो! ऐ हमारी मदद करने वालो! अल्लाह के लिए हमारी सिफ़ारिश करो। यह आपका बंदा खड़ा है। आपके द्वार पर पड़ा हुआ है। अपनी कोताहियों से घबराया हुआ है। ऐ अल्लाह के रसूल! हमारी फ़रियाद सुन लें। भला आपको छोड़ कर हम किसके पास जाएँ? मुराद तो यहीं से पूरी होनी है। आप अल्लाह वाले हैं। शहीदों के सरदार हमज़ा के वास्ते से हमारी मदद करें। ऐ अल्लाह के रसूल! हमारी फ़रियाद सुनें। इसी तरह वह कहते हैं : ऐ अल्लाह! अपनी दया उसपर उतार, जिसे तूने अपने वैभव के रहस्यों के प्रकटन और दया पर आधारित प्रकाशों के सामने आने का सबब बनाया है। जिसके फलस्वरूप वह तेरा नायब और तेरे ज़ाती रहस्यों का ख़लीफ़ा बन गया।
आपने इच्छा व्यक्त की कि शिर्क एवं बिदअत की परिभाषा समझा दी जाए और यह बता दिया जाए कि क्या इस तरह की दुआ करने वाले व्यक्ति के पीछे नमाज़ पढ़ना सही है? जबकि यह सारी बातें सर्वविदित हैं।
उत्तर : सारी प्रशंसा एकमात्र अल्लाह के लिए है और अल्लाह की शांति एवं दया अवतरित हो अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, और आपके परिवार, साथियों और क़ियामत के दिन तक उनके पद्चिह्नों पर चलने वालों पर।
अब मूल विषय पर आते हैं। सबसे पहले हमें यह जानना चाहिए कि अल्लाह ने सृष्टि की रचना इसलिए की और रसूल इसलिए भेजे कि एकमात्र उसी की इबादत की जाए और किसी को उसका साझी न बनाया जाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ56﴾
"और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।" [सूरा अल-ज़ारियात : 56]।
जबकि हम पीछे बयान कर आए हैं कि इबादत नाम है, अल्लाह और उसके रसूल का अनुसरण करने का। अनुसरण का मतलब यह है कि अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों का पालन किया जाए और उनकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहा जाए। इबादत के साथ ज़रूरी है कि अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान हो, एकमात्र अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए काम किया जाए और अल्लाह से हद दर्जा मुहब्बत हो तथा उसके सामने संपूर्ण विनम्रता धारण की जाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَقَضَى رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ...﴾
"और (ऐ बंदे) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो...।" [सूरा अल-इसरा : 23]।
इस आयत में आए हुए शब्द "क़ज़ा" का अर्थ है, आदेश और हुक्म दिया। एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ2 الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ3 مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ4 إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ5﴾
"हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार है। जो अत्यंत दयावान्, असीम दया वाला है। जो बदले के दिन का मालिक है। (ऐ अल्लाह!) हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से सहायता माँगते हैं।" [सूरा अल-फ़ातिहा : 2-5]।
इन आयतों के माध्यम से अल्लाह ने स्पष्ट रूप से बता दिया है कि वही एकमात्र इस बात का हक़दार है कि उसकी इबादत की जाए और उससे मदद माँगी जाए। उसके सिवा कोई इस योग्य नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ فَٱعۡبُدِ ٱللَّهَ مُخۡلِصٗا لَّهُ ٱلدِّينَ2 أَلَا لِلَّهِ ٱلدِّينُ ٱلۡخَالِصُۚ...﴾
"निःसंदेह हमने आपकी ओर यह पुस्तक सत्य के साथ उतारी है। अतः आप अल्लाह की इबादत इस तरह करें कि धर्म को उसी के लिए खालिस करने वाले हों। सुन लो! ख़ालिस (विशुद्ध) धर्म केवल अल्लाह ही के लिए है।" [सूरा अल-ज़ुमर : 2-3]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿فَادْعُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ14﴾
"अतः तुम अल्लाह को, उसके लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए पुकारो, यद्यपि काफ़िरों को बुरा लगे।" [सूरा ग़ाफ़िर : 14]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا18﴾
"और यह कि मस्जिदें केवल अल्लाह के लिए हैं। अतः अल्लाह के साथ किसी को भी मत पुकारो।" [सूरा अल-जिन्न : 18]।
क़ुरआन के अंदर इस आशय की आयतें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं और सब की सब बताती हैं कि इबादत केवल एक अल्लाह ही की होनी चाहिए।
और यह बात सर्वविदित है कि दुआ अपने सभी रूपों के साथ इबादत है। इसलिए इन आयतों तथा इस प्रकार की अन्य आयतों के मद्देनज़र किसी के लिए भी अल्लाह के सिवा किसी से दुआ करना, मदद माँगना और फ़रियाद करना जायज़ नहीं है। लेकिन यहाँ बात सामान्य परिस्थितियों एवं भौतिक संसाधनों से परे की हो रही है कि जिनमें जीवित एवं उपस्थित इन्सान सहयोग कर सकता है। इस तरह के हालात में सहयोग माँगना इबादत नहीं है। क़ुरआन एवं सुन्नत तथा उलमा के मतैक्य से यह बात साबित है कि सामान्य कार्यों में जीवित एवं सक्षम इन्सान का सहयोग ऐसे कार्यों में लिया जा सकता है, जिसमें सहयोग करने की वह शक्ति रखता हो। जैसे अपने बच्चे, नौकर या कुत्ते की बुराई आदि से बचने के लिए किसी से सहयोग माँगना या फ़रियाद करना। तथा उदाहरण स्वरूप कोई व्यक्ति किसी जीवित, उपस्थित एवं सक्षम व्यक्ति से या फिर किसी अनुपस्थित व्यक्ति से लिखित संदेश आदि संवादी माध्यमों से अपने घर के निर्माण या गाड़ी ठीक कराने आदि के लिए सहयोग माँगे। यही हाल जिहाद एवं युद्ध आदि में अपने साथियों से फ़रियाद करने का है। इसी का एक उदाहरण सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का यह कथन भी है, जो मूसा अलैहिस्सलाम के क़िस्से में आया हुआ है :
﴿...فَاسْتَغَاثَهُ الَّذِي مِنْ شِيعَتِهِ عَلَى الَّذِي مِنْ عَدُوِّهِ...﴾
"...तो जो उसके गिरोह में से था, उसने उसके विरुद्ध उससे मदद माँगी, जो उसके शत्रुओं में से था...।" [सूरा अल-क़सस : 15]।
लेकिन जहाँ तक मरे हुए लोगों, जिन्नात, फ़रिश्तों, पेड़ों और पत्थरों से फ़रियाद करने की बात है, तो यह सारी चीज़ें बड़े शिर्क में दाख़िल हैं। इसी तरह के काम अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दौर के मुश्रिक अपने पूज्यों, जैसे लात एवं उज़्ज़ा आदि के साथ करते थे। इसी तरह ऐसे जीवित लोगों से, जिन्हें वली समझा जाता हो, ऐसी चीज़ों के लिए फ़रियाद करना एवं मदद माँगना शिर्क है, जिनका सामर्थ्य केवल अल्लाह के पास ही है, जैसे रोगियों को रोगमुक्त करना, दिलों को हिदायत देना, जन्नत में दाख़िल करना और जहन्नम से बचाना आदि।
उपर्युक्त आयतें और इस आशय की अन्य आयतें एवं हदीसें इस बात को प्रमाणित करती हैं कि तमाम मामलात में दिलों को अल्लाह से संबद्ध करना चाहिए और एकमात्र उसी की इबादत करनी चाहिए। क्योंकि इन्सान को पैदा ही इसी के लिए किया गया है और उसे आदेश भी इसी का दिया गया है। जैसा कि कुछ आयतों के आलोक में पीछे बताया जा चुका है। एक जगह उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَاعْبُدُوا اللَّهَ وَلَا تُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا...﴾
"तथा अल्लाह की इबादत करो और किसी चीज़ को उसका साझी न बनाओ...।" [सूरा अल-निसा : 36]।
उसका एक और कथन है :
﴿وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ...﴾
"हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए...।" [सूरा अल-बय्यिना : 5]।
इसी तरह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में फ़रमाया है :
«حَقُّ اللهِ عَلَى العِبَادِ أَنْ يَعْبُدُوهُ وَلَا يُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا».
"अल्लाह का हक बंदों के ऊपर यह है कि वे उसकी उपासना करें और उसका किसी को साझी न ठहराएँ।" इस हदीस को इमाम बुख़ारी तथा इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इसी तरह अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ مَاتَ وَهُوَ يَدْعُو لِلهِ نِدًّا؛ دَخَلَ النَّارَ».
"जिस व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में हुई कि वह किसी को अल्लाह का समकक्ष बनाकर उसे पुकार रहा था, तो वह जहन्नम (नरक) में प्रवेश करेगा।" इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जब मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु को यमन की ओर भेजा, तो फ़रमाया:
«إِنَّكَ تَأْتِي قَومًا أَهْلَ كِتَابٍ، فَلْيَكُنْ أَوَّلَ مَا تَدْعُوهُم إِلَيهِ شَهَادَةُ أَنْ لَا إِلهَ إِلَّا اللهُ».
"तुम एक ऐसे समुदाय के पास जा रहे हो, जिसे इससे पहले किताब दी जा चुकी है। अतः, सबसे पहले उन्हें "لا إله إلا الله" की गवाही देने की ओर बुलाना।"
एक दूसरी रिवायत में है :
«اُدْعُهُمْ إِلَى شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلهَ إِلَّا اللهُ وَأَنِّي رَسُولُ اللهِ».
"उन्हें इस बात की गवाही देने का आह्वान करना कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मैं अल्लाह का रसूल हूँ।"
जबकि सहीह बुखारी की एक रिवायत में है :
«فَلْيَكُنْ أَوَّلَ مَا تَدْعُوهُم إِلَى أَنْ يُوَحِّدُوا اللهَ».
"उन्हें सबसे पहले इस बात का आह्वान करना कि अल्लाह को एक मानें।"
सहीह मुस्लिम में तारिक़ बिन अश्यम अशजई रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ قَالَ: لَا إِلهَ إِلَّا اللهُ، وَكَفَرَ بِمَا يُعْبَدُ مِن دُونِ اللهِ؛ حَرُمَ مَالُهُ وَدَمُهُ، وَحِسَابُهُ عَلَى اللهِ جَلَّ جَلَالُهُ».
"जिसने 'ला इलाहा इल्लल्लाह' का इक़रार किया और अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली अन्य वस्तुओं का इनकार कर दिया, उसका धन तथा प्राण सुरक्षित हो जाएगा और उसका हिसाब अल्लाह के हवाले होगा।"
इस आशय की बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं।
यह तौहीद इस्लाम धर्म का मूल आधार है और सबसे महत्वपूर्ण फ़रीज़ा है। इसी के लिए इन्सान एवं जिन्नात की सृष्टि की गई और तमाम रसूल भेजे गए। इस आशय की आयतें पीछे गुज़र चुकी हैं, जिनमें एक आयत इस तरह है :
﴿وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ56﴾
"और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।" [सूरा अल-ज़ारियात : 56]।
इसका एक प्रमाण सर्वशक्तिमान अल्लाह का यह कथन भी है :
﴿وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ...﴾
"और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो...।" [सूरा अल-नह्ल : 36]।
इसी प्रकार अल्लाह तआला फ़रमाता है :
﴿وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ25﴾
"और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते थे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत करो।" [सूरा अल-अंबिया : 25]।
सर्वशक्तिमान अल्लाह ने नूह, हूद, सालेह और शुऐब अलैहिमुस्सलाम के बारे में कहा है कि उन्होंने अपनी-अपनी जातियों से कहा था :
﴿...اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ...﴾
"...अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं...।" [सूरा अल-आराफ़ : 59]।
यही सभी रसूलों का आह्वान है। यही पिछली दोनों आयतों से प्रतीत होता है। रसूलों के दुश्मनों ने भी इस बात को माना है कि रसूलों ने उनको केवल एक अल्लाह की इबादत करने का और उसको छोड़ अन्य पूज्यों से खुद को अलग कर लेने का आदेश दिया है। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने आद जाति के क़िस्से में बताया है कि उन्होंने हूद अलैहिस्सलाम से कहा था :
﴿...أَجِئْتَنَا لِنَعْبُدَ اللَّهَ وَحْدَهُ وَنَذَرَ مَا كَانَ يَعْبُدُ آبَاؤُنَا...﴾
"...क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि हम अकेले अल्लाह की इबादत करें और उन्हें छोड़ दें जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते थे...?" [सूरा अल-आराफ़ : 70]।
सर्वशक्तिमान और पवित्र अल्लाह ने क़ुरैश के बारे में बताया है कि जब उन्हें हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने केवल एक अल्लाह की इबादत करने और फ़रिश्तों, वलियों, बुतों तथा पेड़ों आदि की इबादत से रुक जाने को कहा, तो उन्होंने कहा :
﴿أَجَعَلَ الْآلِهَةَ إِلَهًا وَاحِدًا إِنَّ هَذَا لَشَيْءٌ عُجَابٌ5﴾
"क्या उसने सब पूज्यों को एक पूज्य बना दिया? निःसंदेह यह तो बड़े आश्चर्य की बात है।" [सूरा साद : 5]।
पवित्र एवं महान अल्लाह ने उनके बारे में कहा है :
﴿إِنَّهُمْ كَانُوا إِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ يَسْتَكْبِرُونَ35 وَيَقُولُونَ أَئِنَّا لَتَارِكُوٓاْ ءَالِهَتِنَا لِشَاعِرٖ مَّجۡنُونِۭ36﴾
"निःसंदेह वे ऐसे लोग थे कि जब उनसे कहा जाता कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य (इबादत के योग्य) नहीं, तो वे अभिमान करते थे। तथा कहते थे : क्या सचमुच हम अपने पूज्यों को एक दीवाने कवि के कारण छोड़ देने वाले हैं?" [सूरा अल-साफ़्फ़ात : 35, 36]।
इस आशय की आयतें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
हमने जो आयतें और हदीसें प्रस्तुत की हैं, उनसे स्पष्ट है कि आपके द्वारा उल्लिखित प्रश्न में आई हुई दुआओं एवं फ़रियाद के शब्द बड़े शिर्क के दायरे में आते हैं। क्योंकि इनका उच्चारण दरअसल अल्लाह के अतिरिक्त की इबादत है। इनके द्वारा अल्लाह के सिवा, जैसे मरे हुए एवं अनुपस्थित लोगों से ऐसी चीज़ें माँगी जाती हैं, जिन्हें देने की शक्ति अल्लाह के सिवा किसी और के पास नहीं है। और यह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने के मुश्रिकों से भी बुरा शिर्क है। क्योंकि उस दौर के मुश्रिक केवल ख़ुशहाली के समय शिर्क करते थे। वे परेशानी के समय केवल एक अल्लाह की इबादत करते थे। क्योंकि जानते थे कि उनको परेशानी से बचाने की शक्ति केवल अल्लाह के पास है। किसी और के पास नहीं। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन के अंदर उन मुश्रिकों के बारे में कहा है :
﴿فَإِذَا رَكِبُواْ فِي ٱلۡفُلۡكِ دَعَوُاْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمۡ إِلَى ٱلۡبَرِّ إِذَا هُمۡ يُشۡرِكُونَ65﴾
"फिर जब वे नाव पर सवार होते हैं, तो अल्लाह को, उसके लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, पुकारते हैं। फिर जब वह उन्हें बचाकर थल तक ले आता है, तो शिर्क करने लगते हैं।" [सूरा अल-अनकबूत : 65]।
अल्लाह ने उन्हें संबोधित करते हुए एक अन्य आयत में कहा है :
﴿وَإِذَا مَسَّكُمُ ٱلضُّرُّ فِي ٱلۡبَحۡرِ ضَلَّ مَن تَدۡعُونَ إِلَّآ إِيَّاهُۖ فَلَمَّا نَجَّىٰكُمۡ إِلَى ٱلۡبَرِّ أَعۡرَضۡتُمۡۚ وَكَانَ ٱلۡإِنسَٰنُ كَفُورًا67﴾
"और जब समुद्र में तुमपर कोई आपदा आती है, तो अल्लाह के सिवा तुम जिन्हें पुकारते हो, गुम हो जाते हैं, फिर जब वह (अल्लाह) तुम्हें बचाकर थल तक पहुँचा देता है, तो (उससे) मुँह फेर लेते हो। और मनुष्य बहुत ही कृतघ्न है।" [सूरा अल-इसरा : 67]।
अगर आज के दौर के मुश्रिकों में से कोई कहे : हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि हम जिन लोगों को पुकारते हैं, वह खुद ही हमें फ़ायदा पहुँचाते हैं, हमारे रोगियों को रोगमुक्त करते हैं, हमारा भला या बुरा करते हैं। हमारा उद्देश्य यह है कि वे अल्लाह से हमारी मुरादें पूरी करने की सिफ़ारिश करें, (फिर ऐसा अनुचित कैसे होगा)?
इसका उत्तर यह होगा कि : यही उद्देश्य तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दौर के काफ़िरों का भी हुआ करता था। वह भी यह नहीं समझते थे कि उनके पूज्य खुद कुछ पैदा करते हैं, रोज़ी देते हैं, किसी का लाभ या हानि करते हैं। पवित्र क़ुरआन के बयान के अनुसार उस दौर के काफ़िर समझते थे कि यह लोग अल्लाह के यहाँ उनकी सिफ़ारिश करेंगे और उनको अल्लाह की निकटता लाभ कराएँगे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَيَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمۡ وَلَا يَنفَعُهُمۡ وَيَقُولُونَ هَٰٓؤُلَآءِ شُفَعَٰٓؤُنَا عِندَ ٱللَّهِ...﴾
"और वे लोग अल्लाह को छोड़कर उनको पूजते हैं, जो न उन्हें कोई हानि पहुँचाते हैं और न उन्हें कोई लाभ पहुँचाते हैं और कहते हैं कि ये लोग अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं...।" [सूरा यूनुस : 18]।
अल्लाह ने उनका उत्तर देते हुए कहा है :
﴿...قُلۡ أَتُنَبِّـُٔونَ ٱللَّهَ بِمَا لَا يَعۡلَمُ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَلَا فِي ٱلۡأَرۡضِۚ سُبۡحَٰنَهُۥ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشۡرِكُونَ﴾
"...आप कह दें : क्या तुम अल्लाह को ऐसी बात की सूचना दे रहे हो, जिसे वह न आकाशों में जानता है और न धरती में? वह पवित्र है और उससे बहुत ऊँचा है, जिसे वे साझीदार ठहराते हैं।" [सूरा यूनुस : 18]।
इस आयत में अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया है कि वह आकाशों एवं धरती में किसी ऐसे सिफ़ारिशी को नहीं जानता, जो उस तरह सिफ़ारिश कर सके, जिस तरह मुश्रिक समझते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि जिस चीज़ के अस्तित्व का ज्ञान अल्लाह को न हो, उसका अस्तित्व कैसे हो सकता है? उससे तो कुछ भी छुपा नहीं रहता। एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿تَنزِيلُ ٱلۡكِتَٰبِ مِنَ ٱللَّهِ ٱلۡعَزِيزِ ٱلۡحَكِيمِ 1 إِنَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ فَٱعۡبُدِ ٱللَّهَ مُخۡلِصٗا لَّهُ ٱلدِّينَ2 أَلَا لِلَّهِ ٱلدِّينُ ٱلۡخَالِصُۚ وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ3﴾
"इस पुस्तक का उतारना अल्लाह की ओर से है, जो अत्यंत प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है। निःसंदेह हमने आपकी ओर यह पुस्तक सत्य के साथ उतारी है। अतः आप अल्लाह की इबादत इस तरह करें कि धर्म को उसी के लिए खालिस करने वाले हों। सुन लो! ख़ालिस (विशुद्ध) धर्म केवल अल्लाह ही के लिए है। तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें। निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो।" [सूरा अल-ज़ुमर : 1-3]।
यहाँ दीन शब्द का अर्थ इबादत है। जबकि इबादत नाम है अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अनुसरण का। इबादत में दुआ, फ़रियाद, भय, आशा, जानवर ज़बह करना और मन्नत मानना आदि भी दाख़िल हैं। बिल्कुल उसी तरह, जैसे नमाज़ और रोज़ा आदि ऐसे काम दाख़िल हैं, जिनका आदेश अल्लाह और उसके रसूल ने दिया है। अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया है कि इबादत उसी की होनी चाहिए। बंदों का दायित्व है कि एक अल्लाह की इबादत करें। क्योंकि अल्लाह का अपने नबी को केवल अपनी इबादत का आदेश देना दरअसल इस उम्मत के तमाम लोगों को आदेश देना है।
फिर इसके बाद सर्वशक्तिमान अल्लाह ने काफ़िरों का हाल बयान करते हुए कहा है :
﴿...وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ...﴾
"...तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें...।" [सूरा अल-ज़ुमर : 3]।
फिर उनकी इस धारणा का खंडन करते हुए कहा है :
﴿...إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ﴾
"निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो।" [सूरा अल-ज़ुमर : 3]।
इस आयत में सर्वशक्तिमान अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया है कि अविश्वासी अल्लाह को छोड़ अपने बनाए हुए संरक्षकों की इबादत इसलिए करते हैं, ताकि उन्हें अल्लाह की निकटता लाभ करा दें। यही हर दौर के अविश्वासियों का उद्देश्य रहा है। पहले दौर के भी और बाद के दौर के भी। लेकिन अल्लाह ने उनकी इस अवधारणा का खंडन कर दिया है। कहा है :
﴿...إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ﴾
"निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो।" [सूरा अल-ज़ुमर : 3]।
इस आयत में अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि मुश्रिकों का यह दावा झूठा है कि उनके पूज्य उनको अल्लाह की निकटता दिलाएँगे। अल्लाह ने इन पूज्यों की इबादत को अल्लाह के प्रति अविश्वास भी कहा है। इससे हर विवेकी व्यक्ति जान सकता है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दौर के काफ़िरों का कुफ़्र यह था कि वह नबियों, वलियों, पेड़ों एवं पत्थरों आदि सृष्टियों को अल्लाह के यहाँ अपना सिफ़ारिशी मानते थे। उनका मानना था कि उनके ये पूज्य अल्लाह की अनुमति और इच्छा के बिना भी उनकी ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं। जैसा कि आम तौर पर बादशाहों के मंत्री किया करते हैं। उन्होंने अल्लाह को बादशाहों और लीडरों पर क़यास कर लिया था। उनका कहना था कि जिस प्रकार जब किसी व्यक्ति को बादशाह या लीडर के पास कोई काम होता है, तो उसके ख़ास लोगों एवं मंत्रियों से सिफ़ारिश कराता है, उसी प्रकार हम अल्लाह के नबियों एवं वलियों की इबादत के माध्यम से उसकी निकटता प्राप्त करना चाहते हैं। लेकिन यह एक निरर्थक बात है। क्योंकि अल्लाह के जैसा कोई नहीं है, उसे उसकी सृष्टि पर क़यास नहीं किया जा सकता, उसकी अनुमति के बिना उसके सामने कोई सिफ़ारिश नहीं कर सकता, वह अनुमति भी केवल एकेश्वरवाद के मार्ग पर चलने वालों को देगा, वह जो चाहे कर सकता है, सब कुछ जानता है, सबसे बड़ा दयावान है, उसे किसी का भय नहीं है, कयोंकि वह सब का प्रभु है और लोगों के बारे में अपनी इच्छानुसार जो चाहता है करता है। जबकि बादशाहों एवं लीडरों का मामला इससे बिलकुल भिन्न है। उनकी क्षमताएँ बहुत ही सीमित हैं। इसलिए उन्हें मंत्री, दरबारी एवं सेना आदि की ज़रूरत होती है, जो उनका सहयोग ऐसे कामों में करें, जिन्हें वह ख़ुद कर नहीं सकते। इसी तरह जिन लोगों की आवश्यकताओं से वह ख़ुद अवगत नहीं होते, उनकी आवश्यकताओं को उनके सामने रखे जाने की ज़रूरत होती है। इस तरह, उन्हें ऐसे मंत्रियों एवं दरबारियों की ज़रूरत होती है, जो उनसे दया दृष्टि का अनुरोध करें। लेकिन जहाँ तक सर्वशक्तिमान रब अल्लाह का मामला है, वह अपनी सृष्टि से निस्पृह है, वह उसपर माँ से भी अधिक दया रखता है, सारी चीज़ों का निर्णय करता है, न्यायकारी है, अपनी हिकमत, ज्ञान एवं सामर्थ्य के अनुसार सारी चीज़ों को उनके उचित स्थानों में रखता है। इसलिए किसी भी दृष्टि से उसकी तुलना उसकी सृष्टि से नहीं की जा सकती। यही कारण है कि सर्वशक्तिमान अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में बताया है कि मुश्रिकों ने इस बात का इक़रार किया है कि वही रचयिता, आजीविकादाता और संचालनकर्ता है। वही परेशान हाल लोगों की फ़रियाद सुनता है और उनकी परेशानी दूर करता है। वही जीवन एवं मृत्यु देता है और इस प्रकार के सारे कार्य करता है। मुश्रिकों एवं रसूलों के बीच में झगड़ा केवल विशुद्ध रूप से एक अल्लाह की इबादत करने या न करने को लेकर था। जैसा कि सर्वश्कितमान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَهُمۡ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ...﴾
"और निश्चय यदि आप उनसे पूछें कि उन्हें किसने पैदा किया? तो वे अवश्य कहेंगे : अल्लाह...।" [सूरा अज़-ज़ुख़रुफ़ : 87]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿قُلۡ مَن يَرۡزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِ أَمَّن يَمۡلِكُ ٱلسَّمۡعَ وَٱلۡأَبۡصَٰرَ وَمَن يُخۡرِجُ ٱلۡحَيَّ مِنَ ٱلۡمَيِّتِ وَيُخۡرِجُ ٱلۡمَيِّتَ مِنَ ٱلۡحَيِّ وَمَن يُدَبِّرُ ٱلۡأَمۡرَۚ فَسَيَقُولُونَ ٱللَّهُۚ فَقُلۡ أَفَلَا تَتَّقُونَ31﴾
"कहो : वह कौन है जो तुम्हें आकाश और धरती से जीविका देता है? या फिर कान और आँख का मालिक कौन है? और कौन जीवित को मृत से निकालता और मृत को जीवित से निकालता है? और कौन है जो हर काम का प्रबंध करता है? तो वे ज़रूर कहेंगे : ''अल्लाह'', तो कहो : फिर क्या तुम डरते नहीं?" [सूरा यूनुस : 31]।
क़ुरआन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
पीछे इस आशय की आयतें गुज़र चुकी हैं कि रसूलों और उनकी उम्मतों के बीच जो झगड़े हुआ किए हैं, वह केवल एक अल्लाह की इबादत के विषय में हुआ किए हैं। मसलन अल्लाह का कथन है :
﴿وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَ...﴾
"और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो...।" [सूरा अल-नह्ल : 36]।
क़ुरआन के अंदर इस आशय की और भी आयतें मौजूद हैं। अल्लाह ने अपने पवित्र ग्रंथ के बहुत-से स्थानों में सिफ़ारिश के विषय में बताया है। अतः सूरा अल-बक़रा में कहा है :
﴿...مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِ...﴾
"...कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) करे...?" [अल-बक़रा : 255]।
एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है :
﴿وَكَم مِّن مَّلَكٖ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ لَا تُغۡنِي شَفَٰعَتُهُمۡ شَيۡـًٔا إِلَّا مِنۢ بَعۡدِ أَن يَأۡذَنَ ٱللَّهُ لِمَن يَشَآءُ وَيَرۡضَىٰٓ26﴾
"और आकाशों में कितने ही फ़रिश्ते हैं कि उनकी सिफ़ारिश कुछ लाभ नहीं देती, परंतु इसके पश्चात कि अल्लाह अनुमति दे जिसके लिए चाहे तथा (जिसे) पसंद करे।" [सूरा अल-नज्म : 26]।
अल्लाह ने फ़रिश्तों के बारे में बताया है :
﴿...وَلَا يَشۡفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ٱرۡتَضَىٰ وَهُم مِّنۡ خَشۡيَتِهِۦ مُشۡفِقُونَ﴾
"...और वे सिफ़ारिश नहीं करते, परंतु उसी के लिए जिसे वह पसंद करे। तथा वे उसी के भय से डरने वाले हैं।" [सूरा अल-अंबिया : 28]।
सर्वशक्तिमान अल्लाह ने बताया है कि वह अपने बंदों की कृतघ्नता को पसंद नहीं करता। वह उनकी कृतज्ञता को पसंद करता है। और कृतज्ञता का अर्थ है; अल्लाह को एक मानना और उसके आदेशों का पालन करना। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِن تَكۡفُرُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِيٌّ عَنكُمۡۖ وَلَا يَرۡضَىٰ لِعِبَادِهِ ٱلۡكُفۡرَۖ وَإِن تَشۡكُرُواْ يَرۡضَهُ لَكُمۡ...﴾
"यदि तुम नाशुक्री करो, तो अल्लाह तुमसे बहुत बेनियाज़ है और वह अपने बंदों के लिए नाशुक्री पसंद नहीं करता, और यदि तुम शुक्रिया अदा करो, तो वह उसे तुम्हारे लिए पसंद करेगा...।" [सूरा अल-जुमर : 7]।
इमाम बुख़ारी ने अपनी सहीह में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! आपकी सिफ़ारिश का सबसे ज़्यादा हक़दार कौन होगा? आपने उत्तर दिया :
«مَنْ قَالَ: لَا إِلهَ إِلَّا اللهُ خَالِصًا مِنْ قَلْبِهِ».
"जो सच्चे दिल से "ला इलाहा इल्लल्लाह" कहे।"
या फिर फ़रमाया :
«مِنْ نَفْسِهِ».
"सच्चे मन से।"
अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لِكُلِّ نَبِيٍّ دَعْوَةٌ مُسْتَجَابَةٌ، فَتَعَجَّلَ كُلُّ نَبِيٍّ دَعْوَتَهُ، وَإِنِّي اخْتَبَأْتُ دَعْوَتِي شَفَاعَةً لِأُمَّتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ، فَهِيَ نَائِلَةٌ إِنْ شَاءَ اللَّهُ مَنْ مَاتَ مِنْ أُمَّتِي لَا يُشْرِكُ بِاللَّهِ شَيْئًا».
''हर नबी की कुछ दुआएँ हैं जिनके द्वारा उन्होंने अपने रब को पुकारा, और वह क़बूल हुईं। मैंने अपनी दुआ को क़ियामत के दिन अपनी उम्मत की सिफ़ारिश के लिए जमा कर रखा है, तो मेरी सिफ़ारिश इन शा अल्लाह मेरी उम्मत में से उसको प्राप्त होगी जिसको मृत्यु इस हाल में आई कि वह अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाता हो।''
इस आशय की बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं।
ऊपर उल्लिखित सभी आयतें एवं हदीसें प्रमाणित करती हैं कि इबादत केवल अल्लाह का हक़ है। उसका कोई भी अंश अल्लाह के सिवा किसी और के लिए जायज़ नहीं है। न नबियों के लिए न ग़ैर-नबियों के लिए। इसी प्रकार सिफ़ारिश का मालिक बस अल्लाह है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿قُل لِّلَّهِ ٱلشَّفَٰعَةُ جَمِيعٗا...﴾
"आप कह दें कि सिफ़ारिश तो सब अल्लाह के अधिकार में है...।" [सूरा अल-ज़ुमर : 44]।
सिफ़ारिश का हक़दार वही व्यक्ति होगा, जिससे अल्लाह संतुष्ट हो और उसकी सिफ़ारिश की अनुमति किसी को प्रदान करे। ज़ाहिर सी बात है कि अल्लाह संतुष्ट उसी से होगा, जो दुनिया में एकेश्वरवाद के मार्ग पर चलने वाला रहा हो। इससे स्पष्ट है कि किसी मुश्रिक के बारे में सिफ़ारिश की कल्पना तक नहीं की जा सकती। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿فَمَا تَنفَعُهُمۡ شَفَٰعَةُ ٱلشَّٰفِعِينَ 48﴾
"तो उन्हें सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश लाभ नहीं देगी।" [सूरा अल-मुद्दस्सिर : 48]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...مَا لِلظَّٰلِمِينَ مِنۡ حَمِيمٖ وَلَا شَفِيعٖ يُطَاعُ﴾
"अत्याचारियों का न कोई मित्र होगा, न कोई सिफ़ारिशी जिसकी बात मानी जाए।" [सूरा ग़ाफ़िर : 18]।
बताने की ज़रूरत नहीं है कि ज़ुल्म शब्द जब साधारण रूप से बोला जाए, तो उससे मुराद शिर्क हुआ करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَٱلۡكَٰفِرُونَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ﴾
"तथा काफ़िर लोग ही अत्याचारी हैं।" [सूरा अल-बक़रा : 254]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...إِنَّ ٱلشِّرۡكَ لَظُلۡمٌ عَظِيمٞ﴾
"निःसंदेह शिर्क महा अत्याचार है।" [सूरा लुक़मान : 13]।
इसी तरह आपने कुछ सूफ़ियों के इस कथन के बारे में पूछा है : "ऐ अल्लाह! अपनी दया उस पर उतार, जिसे तूने अपने वैभव के रहस्यों के प्रकटन और दया पर आधारित प्रकाशों के सामने आने का सबब बनाया है। जिसके फलस्वरूप वह तेरा नायब और तेरे ज़ाती रहस्यों का ख़लीफ़ा बन गया...।"
इसका उत्तर यह है कि इस प्रकार की बातें अतिशयोक्ति (ग़ुलू) के दायरे में आती हैं, जिससे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सावधान किया है। सहीह मुस्लिम की एक हदीस में, जिसे अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहू अन्हु ने रिवायत किया है, आया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«هَلَكَ المُتَنَطِّعُونَ» قَالَهَا ثَلَاثًا.
"अतिशयोक्ति करने वाले हलाक हो गए।" आपने यह बात तीन बार कही।
इमाम ख़त्ताबी रहिमहुल्लाह कहते हैं : इस हदीस में आए हुए शब्द "अल-मुतनत्तिउ" का अर्थ है, बाल की खाल निकालने वाला, तर्कशास्त्र में रुचि रखने वाला, निरर्थक एवं ऐसी चीज़ों में घुसने वाला, जहाँ तक इन्सान की अक़्ल पहुँच न सकती हो।
अबू अल-सआदात इब्न अल-असीर कहते हैं : ये वो लोग हैं, जो बात करते समय अतिशयोक्ति से काम लेते हैं और चबा-चबाकर बातें करते हैं। ""अल-मुतनत्तिउ" शब्द "नतअ" से लिया गया है, जिसका अर्थ है, मुँह का ऊपरी गहरा भाग। यानी तालू। बाद में ""अल-मुतनत्तिउ" शब्द का प्रयोग कार्य एवं कथन द्वारा अतिशयोक्ति करने वाले हर व्यक्ति के लिए होने लगा।
इन दोनों भाषाविदों की व्याख्या से आपके तथा हर सूझ-बूझ रखने वाले व्यक्ति के लिए स्पष्ट हो गया होगा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उक्त शब्दों द्वारा दुरूद व सलाम भेजना अतिशयोक्ति के दायरे में आता है, जिससे मना किया गया है। हर व्यक्ति को दुरूद व सलाम भेजने का वही तरीक़ा अपनाना चाहिए, जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित है और वही तरीक़ा हमारे लिए काफ़ी है। हमें इधर-उधर देखने की कोई ज़रूरत नहीं है।
सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में काब बिन उजरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, जबकि शब्द सहीह बुख़ारी के हैं, कि सहाबा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह ने हमें आप पर दुरूद भेजने का आदेश दिया है, तो हम आप पर दुरूद कैसे भेजें? आपने फ़रमाया :
«قُولُوا: اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، وَبَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ».
"तुम कहो : ऐ अल्लाह! अपने निकटवर्ती फ़रिश्तों के सामने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके परिवार-परिजन की प्रशंसा कर, जैसे तू ने अपने निकटवर्ती फ़रिश्तों के सामने इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके परिवार-परिजन की प्रशंसा की है, निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है।"
सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम ही में अबू हुमैद साइदी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि सहाबा ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! हम आप पर दुरूद कैसे भेजें? आपने उत्तर दिया :
«قُولُوا: اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى أَزْوَاجِهِ وَذُرِّيَّتِهِ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبرَاهِيمَ، وَبَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى أَزْوَاجِهِ وَذُرِّيَّتِهِ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ».
"तुम कहो : ऐ अल्लाह! मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की और उनकी पत्नियों तथा संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जैसे तूने इब्राहीम अलैहिस्सलाम की संतान-संतति की प्रशंसा की है। निश्चय ही, तू प्रशंसा-योग्य और सम्मानित है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपकी पत्नियों तथा संतान-संतति में उसी प्रकार बरकत दे, जैसे इब्राहीम अलैहिस्सलाम की संतान-संतति के अंदर बरकत रखी थी। निश्चय ही, तू प्रशंसा-योग्य और सम्मानित है।"
सहीह मुस्लिम में अबू मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि बशीर बिन साद ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह ने हमें आप पर दुरूद भेजने का आदेश दिया है, तो हम आप पर दुरूद कैसे भेजें? प्रश्न सुनकर आप कुछ देर खामोश रहे और उसके बाद फ़रमाया :
«قُولُوا: اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ؛ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبرَاهِيمَ، وَبَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ؛ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبرَاهِيمَ فِي العَالَمِينَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، وَالسَّلَامُ كَمَا عَلِمتُم».
''तुम कहो : ऐ अल्लाह! अपने निकटवर्ती फ़रिश्तों के सामने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके परिवार-परिजनों की प्रशंसा कर, जैसे तू ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम के परिवार-परिजनों की प्रशंसा की थी। और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके परिवार-परिजनों में बरकत दे, जैसे तु ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम के परिवार-परिजनों के अंदर समस्त संसार में बरकत रखी थी। निश्चय ही, तू प्रशंसित और सर्वसम्मानित है। और सलाम भेजने का तरीक़ा तो तुम जानते ही हो।''
अतः अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजते समय आपसे आये इन्ही शब्द तथा इन्ही जैसे अन्य शब्दों का ही प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस बात से अधिक अवगत थे कि आपके तथा आपके रब के बारे में किन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए।
जहाँ तक अतिशयोक्ति वाले, नव-आविष्कृत एवं अनुचित अर्थ वाले शब्दों का प्रश्न है, तो उनके प्रयोग से बचना चाहिए। क्योंकि उनके अंदर अतिशयोक्ति है, उनका ग़लत अर्थ निकाला जा सकता है और वो उन शब्दों से हटकर भी हैं, जिनका चयन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किया है और जिनकी ओर अपनी उम्मत का मार्गदर्शन किया है। ज़ाहिर सी बात है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस कायनात के सबसे ज्ञानी, सबसे बड़े शुभचिंतक और अतिशयोक्ति से सबसे दूर रहने वाले इन्सान हैं।
मैं समझता हूँ कि तौहीद एवं शिर्क की तथ्यात्मक व्याख्या, और इस संबंध में पहले दौर के मुश्रिकों के और आज के दौर के मुश्रिकों के व्यवहार के अंतर एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजने के उचित तरीक़े को स्पष्ट करने के लिए हमने जो प्रमाण यहाँ प्रस्तुत किए हैं, वो सत्य का पता लगाने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए काफ़ी हैं। वैसे भी, जिसके मन में सत्य को जानने की रुचि न हो, वह तो अपनी इच्छाओं ही का पालन करेगा। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने कहा है :
﴿فَإِن لَّمۡ يَسۡتَجِيبُواْ لَكَ فَٱعۡلَمۡ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهۡوَآءَهُمۡۚ وَمَنۡ أَضَلُّ مِمَّنِ ٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ بِغَيۡرِ هُدٗى مِّنَ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ50﴾
"फिर यदि वे आपकी माँग पूरी न करें, तो आप जान लें कि वे केवल अपनी इच्छाओं का पालन कर रहे हैं, और उससे बढ़कर पथभ्रष्ट कौन है, जो अल्लाह की ओर से किसी मार्गदर्शन के बिना अपनी इच्छा का पालन करे? निःसंदेह अल्लाह अत्याचार करने वाले लोगों को मार्ग नहीं दिखाता।" [सूरा अल-क़सस : 50]।
इस आयत में सर्वशक्तिमान अल्लाह ने बता दिया है कि अल्लाह ने अपने नबी को जो मार्गदर्शन एवं सच्चा दीन देकर भेजा है, उसके प्रति लोगों के दो प्रकार के व्यवहार सामने आते हैं :
1- कुछ अल्लाह और उसके रसूल की बात को मान लेते हैं।
2- जबकि कुछ लोग अपनी इच्छाओं का पालन करते हैं। जबकि उच्च एवं महान अल्लाह ने बताया है कि अल्लाह की ओर से प्रदान किए गए मार्गदर्शन को छोड़कर अपनी इच्छाओं का पालन करने वाले से बड़ा गुमराह कोई नहीं हो सकता।
दुआ है कि अल्लाह हमें इच्छाओं के पीछे भागने से बचाए। इसी तरह हमें, आपको और तमाम मुसलमानों को अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बात मानने वाला, शरीअत का पालन करने वाला और तमाम शरीअत विरोधी बातों अर्थात नवाचारों और विकृत कार्यों से दूर रहने वाला बनाए। निश्चिय ही वह दानशील एवं दाता है।
दुरूद हो अल्लाह के बंदे एवं रसूल हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिजनों, साथियों एवं क़ियामत के दिन तक भलाई के साथ आपके बताए हुए मार्ग पर चलने वालों पर।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
पाँचवीं पुस्तिका:
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा किसी और का जन्म-दिन मनाने के बारे में शरई दृष्टिकोण
सारी प्रशंसा अल्लाह की है तथा दुरूद एवं सलाम हो अल्लाह के रसूल पर, तथा आपके परिजनों, साथियों और उनके मार्ग पर चलने वालों पर।
इसके बाद अब मूल विषय पर आते हैं। बहुत-से लोगों द्वारा पूछा गया कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म दिन मनाना कैसा है और जन्म दिन मनाते समय आपके सम्मान में खड़ा होना और आपको सलाम करना आदि काम कैसे हैं?
उत्तर : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम या किसी और व्यक्ति का जन्म-दिन मनाना जायज़ नहीं है। क्योंकि यह दीन के नाम पर किया जाने वाला एक नया काम है। जन्म-दिन न तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मनाया है, न ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन ने मनाया है, न अन्य सहाबा ने मनाया है और न उनके मार्ग पर चलने वाले उत्कृष्ट दौरों के लोगों ने मनाया है। हालाँकि ये लोग बाद के लोगों की तुलना में सुन्नत की अधिक जानकारी रखने वाले, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अधिक प्रेम करने वाले और आपकी शरीअत का अधिक पालन करने वाले लोग थे। पवित्र एवं महान अल्लाह ने अपनी सुस्पष्ट किताब में कहा है :
﴿...وَمَآ ءَاتَىٰكُمُ ٱلرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَىٰكُمۡ عَنۡهُ فَٱنتَهُواْ...﴾
"...और रसूल तुम्हें जो कुछ दें, उसे ले लो और जिस चीज़ से रोक दें, उससे रुक जाओ...।" [सूरा अल-हश्र : 7]।
एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿...فَلۡيَحۡذَرِ ٱلَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنۡ أَمۡرِهِۦٓ أَن تُصِيبَهُمۡ فِتۡنَةٌ أَوۡ يُصِيبَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ﴾
"...अतः उन लोगों को डरना चाहिए, जो आपके आदेश का विरोध करते हैं कि उनपर कोई आपदा आ पड़े अथवा उनपर कोई दुःखदायी यातना आ जाए।" [सूरा अल-नूर : 56]।
एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :
﴿لَّقَدۡ كَانَ لَكُمۡ فِي رَسُولِ ٱللَّهِ أُسۡوَةٌ حَسَنَةٞ لِّمَن كَانَ يَرۡجُواْ ٱللَّهَ وَٱلۡيَوۡمَ ٱلۡأٓخِرَ وَذَكَرَ ٱللَّهَ كَثِيرٗا21﴾
"निःसंदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है। उसके लिए, जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो, तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करता हो।" [सूरा अल-अहज़ाब : 21]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَٱلسَّٰبِقُونَ ٱلۡأَوَّلُونَ مِنَ ٱلۡمُهَٰجِرِينَ وَٱلۡأَنصَارِ وَٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُم بِإِحۡسَٰنٖ رَّضِيَ ٱللَّهُ عَنۡهُمۡ وَرَضُواْ عَنۡهُ وَأَعَدَّ لَهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي تَحۡتَهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدٗاۚ ذَٰلِكَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ100﴾
"तथा सबसे पहले (ईमान की ओर) आगे बढ़ने वाले मुहाजिरीन और अंसार और जिन लोगों ने नेकी के साथ उनका अनुसरण किया, अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया और वे उससे प्रसन्न हो गए तथा उसने उनके लिए ऐसी जन्नतें तैयार कर रखी हैं, जिनके नीचे से नहरें बहती हैं। वे उनके अंदर हमेशा रहेंगे। यही बड़ी सफलता है।" [सूरा अल-तौबा : 100]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا...﴾
"...आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया...।" [सूरा अल-माइदा : 3]।
क़ुरआन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنهُ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।"
अर्थात : उसके इस अमल को उसी के मुँह पर मार दिया जाएगा। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक अन्य हदीस में है :
«عَلَيكُم بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الخُلَفَاءِ الرَّاشِدِينَ المَهْدِيَّينَ مِنْ بَعدِي، تَمَسَّكُوا بِهَا، وَعَضُّوا عَلَيهَا بِالنَّوَاجِذِ، وَإِيَّاكُمْ وَمُحْدَثَاتِ الأُمُورِ، فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٌ وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالةٌ».
"तुम मेरी सुन्नत तथा सत्य के मार्ग पर चलने वाले मेरे ख़लीफ़ा-गणों की सुन्नत का पालन करना। इसे मज़बूती से पकड़े रहना और दीन के नाम पर सामने आने वाली नित-नई चीज़ों से बचे रहना। क्योंकि दीन के नाम पर सामने आने वाली हर नई चीज़ बिदअत है, और हर बिदअत गुमराही है।"
इन दोनों हदीसों में दीन के नाम पर किसी नई चीज़ का आविष्कार एवं उसपर अमल करने से अत्यधिक सावधान किया गया है।
जबकि इस प्रकार से जन्म-दिन मनाने का अर्थ यह होता है कि अल्लाह ने इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन नहीं दिया है, और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वह सारी चीज़ें नहीं पहुँचाई हैं, जिनपर अमल किया जाना चाहिए। यहाँ तक कि बाद के दौर के कुछ लोग पैदा हुए और अल्लाह की शरीअत में कुछ ऐसी चीज़ों की वृद्धि की, जिनकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी थी। दावा यह है कि इन चीज़ों से अल्लाह की निकटता प्राप्त होगी। क्या इसमें कोई संदेह हो सकता है कि यह एक ख़तरनाक सोच है? यह तो दरअसल अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर आपत्ति है। सच्चाई यह है कि अल्लाह ने अपने बंदों को एक संपूर्ण दीन एवं संपूर्ण नेमत दी है, तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्पष्ट रूप से सब कुछ पहुँचा दिया है। आपने जन्नत की ओर ले जाने वाला और जहन्नम से दूर करने वाला हर रास्ता बता दिया है। अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَا بَعَثَ اللهُ مِن نَبِيٍ إِلَّا كَانَ حَقًّا عَلَيهِ أَن يَدُلَّ أُمَّتَهُ عَلَى خَيرِ مَا يَعْلَمُهُ لَهُم، وَيُنْذِرَهُمْ شَرَّ مَا يَعْلَمُهُ لَهُمْ».
"अल्लाह के भेजे हुए हर नबी का कर्तव्य था कि वह अपनी उम्मत को अपनी जानकारी के अनुसार तमाम अच्छी एवं बुरी चीज़ें बता दे।" इस ह़दीस को इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है।
यह बात बताने की ज़रूरत नहीं है कि हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सबसे उत्कृष्ट, अंतिम, इस्लाम का संदेश सबसे संपूर्ण रूप से पहुँचाने वाले और सबसे अधिक शुभचिंतन करने वाले नबी हैं। ऐसे में अगर जन्म-दिन मनाना दीन का कोई ऐसा काम होता, जिससे अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त हो सकती है, तो आप ख़ुद उम्मत को बता देते, अपने जीवन काल में उसपर अमल करके दिखाते या आपके सहाबा का उसपर अमल रहा होता। लेकिन, ऐसा कुछ भी न होना इस बात का प्रमाण है कि जन्म-दिन मनाना कोई इस्लामी कार्य नहीं, बल्कि दीन के नाम पर आविष्कृत उन कामों में से एक है, जिनसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी उम्मत को सावधान किया है। इस तरह की हदीसें पीछे गुज़र चुकी हैं। इस आशय की आयतें एवं हदीसें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
उलमा के एक समूह ने उपर्युक्त तथा इस प्रकार के अन्य प्रमाणों के मद्देनज़र रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म-दिन मनाने का खंडन किया है, और इससे सावधान किया है। जबकि बाद के दौरों के कुछ उलमा ने इसके विपरीत जाते हुए रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्मदिन मनाने की अनुमति दी है, जब उसमें कोई शरीअत विरोधी कार्य, जैसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में अतिशयोक्ति, स्त्रियों एवं पुरुषों का बिना रोक-टोक घुलना-मिलना और मनोरंजन के उपकरणों का इस्तेमाल आदि न पाया जाए। ये इसे बिदअत-ए-हसना यानी दीन के नाम पर आविष्कार किए जाने वाले अच्छे कामों में शुमार करते हैं।
ऐसी परिस्थिति में शरीअत के एक सिद्धांत पर अमल किया जाना चाहिए। सिद्धांत यह है कि जिस चीज़ में मतभेद हो जाए, उसे अल्लाह की किताब पवित्र क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत के आलोक में हल करना चाहिए। ख़ुद महान अल्लाह ने कहा है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ وَأُوْلِي ٱلۡأَمۡرِ مِنكُمۡۖ فَإِن تَنَٰزَعۡتُمۡ فِي شَيۡءٖ فَرُدُّوهُ إِلَى ٱللَّهِ وَٱلرَّسُولِ إِن كُنتُمۡ تُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ ذَٰلِكَ خَيۡرٞ وَأَحۡسَنُ تَأۡوِيلًا59﴾
"ऐ ईमान वालो! अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल का आज्ञापालन करो और अपने में से अधिकार वालों (शासकों) का। फिर यदि तुम आपस में किसी चीज़ में मतभेद कर बैठो, तो उसे अल्लाह और रसूल की ओर लौटाओ, यदि तुम अल्लाह तथा अंतिम दिन (परलोक) पर ईमान रखते हो। यह (तुम्हारे लिए) बहुत बेहतर है और परिणाम की दृष्टि से बहुत अच्छा है।" [सूरा अल-निसा : 59]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है:
﴿وَمَا ٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِيهِ مِن شَيۡءٖ فَحُكۡمُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ ...﴾
"और तुम जिस चीज़ के बारे में भी मतभेद करो, उसका निर्णय अल्लाह की ओर है...।" [सूरा अल-शूरा : 10]।
जब हमने यह जानने का प्रयास किया कि जन्म-दिन मनाने के बारे में पवित्र क़ुरआन क्या कहता है, तो पाया कि पवित्र क़ुरआन हमें अल्लाह के रसूल की सिखाई हुई बातों का अनुसरण करने का आदेश देता है, आपकी मना की हुई बातों से सावधान करता है और बताता है कि अल्लाह ने इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन दिया है। ऐसे में चूँकि जन्म-दिन मनाना अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सिखाई हुई बातों का हिस्सा नहीं है, इसलिए उस संपूर्ण दीन का हिस्सा नहीं हो सकता, जो अल्लाह ने इस उम्मत को दिया है और जिसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हुए मानने का आदेश दिया है।
इसके बाद जब हमने यह जानने का प्रयास किया कि इस संबंध में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत क्या कहती है, तो पाया कि इसे न अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किया है, न आपने इसका आदेश दिया है, और न आपके सहाबा ने किया है। इससे यह पता चला कि यह दीन का हिस्सा नहीं है। यह दीन के नाम पर बाद के समय में सामने आने वाली चीज़ है। इसे मनाना यहूदियों एवं ईसाइयों के त्योहारों की नक़्क़ाली करना है।
इससे सत्य का पता लगाने की न्यूनतम इच्छा रखने वाले और इस संबंध में न्याय से काम लेने वाले व्यक्ति के लिए स्पष्ट हो जाता है कि जन्म-दिन मनाना इस्लाम धर्म का हिस्सा नहीं है। यह दीन के नाम पर किया जाने वाला एक नव-आविष्कृत कार्य है और इस प्रकार के तमाम कार्यों से दूर रहने और इनसे सावधान रहने का आदेश अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दिया है। किसी विवेकी व्यक्ति को इस धोखे में भी नहीं आना चाहिए कि दुनिया के हर भाग में बहुत बड़ी संख्या में लोग अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म-दिन मना रहे हैं। क्योंकि सही क्या है, इसे जानने के लिए उसका पालन करने वालों की संख्या नहीं, बल्कि शरई प्रमाण देखे जाएँगे। जैसा कि सर्वशक्तिमान अल्लाह ने यहूदियों एवं ईसाइयों के बारे में कहा है :
﴿وَقَالُواْ لَن يَدۡخُلَ ٱلۡجَنَّةَ إِلَّا مَن كَانَ هُودًا أَوۡ نَصَٰرَىٰۗ تِلۡكَ أَمَانِيُّهُمۡۗ قُلۡ هَاتُواْ بُرۡهَٰنَكُمۡ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ111﴾
"तथा उन्होंने कहा जन्नत में हरगिज़ नहीं जाएँगे, परंतु जो यहूदी होंगे या ईसाई। ये उनकी कामनाएँ ही हैं। (उनसे) कहो : लाओ अपने प्रमाण, यदि तुम सच्चे हो।" [सूरा अल-बक़रा : 111]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَإِنْ تُطِعْ أَكْثَرَ مَنْ فِي الْأَرْضِ يُضِلُّوكَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ...﴾
"और (ऐ नबी!) यदि आप उन लोगों में से अधिकतर का कहना मानें जो धरती पर हैं, तो वे आपको अल्लाह के मार्ग से भटका देंगे...।" [सूरा अल-अनआम : 116]।
दूसरी बात यह है कि जन्म-दिन के ये आयोजन बिदअत होने के साथ-साथ आम तौर पर अन्य शरीअत विरोधी गतिविधियों से खाली नहीं होते। इनमें पुरुषों एवं स्त्रियों का बिना रोक-टोक मेल-जोल होता है, गानों और संगीत वाद्ययंत्रों का उपयोग होता है, नशीले पदार्थों का सेवन होता है तथा इस प्रकार की अन्य कई बुराइयाँ पाई जाती हैं। इन आयोजनों में इन सब से भी एक भयानक चीज़ देखने को मिलती है। और वह है बड़ा शिर्क, जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम या औलिया के बारे में अतिशयोक्ति एवं उनसे दुआ, फ़रियाद, मदद तलब करने और उनके ग़ैब की बातें जानने के दावे के रूप से प्रकट होता है। इस तरह के काम अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एवं तथाकथित वलियों का जन्म दिवस मनाते समय बहुत-से लोगों द्वारा किए जाते हैं। जबकि एक सही हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«إِيَّاكُم وَالغُلُوَّ فِي الدِّينِ، فَإِنَّمَا أَهْلَكَ مَن كَانَ قَبْلَكُم الغُلُوُّ فِي الدِّينِ».
"तुम दीन में अतिशयोक्ति से बचो। तुमसे पहले के लोगों का विनाश इसी अतिशयोक्ति ने किया है।"
इसी तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَا تُطْرُونِي كَمَا أَطْرَتِ النَّصَارَى ابْنَ مَرْيَمَ، إِنَّمَا أَنَا عَبدٌ، فَقُولُوا: عَبدُ اللهِ وَرَسُولُه».
"तुम लोग मेरी प्रशंसा और तारीफ़ में उस प्रकार अतिशयोक्ति न करो, जिस प्रकार ईसाइयों ने मरयम के पुत्र के बारे में किया। मैं केवल एक बंदा हूँ। अतः मुझे अल्लाह का बंदा और उसका रसूल कहो।" इस हदीस को इमाम बुख़ारी ने अपनी सहीह में अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से नक़ल किया है।
एक आश्चर्यजनक बात यह है कि बहुत-से लोग इस प्रकार के नव-आविष्कृत आयोजनों में खूब दिल लगाकर शामिल होते हैं और इनका बचाव करते हैं, लेकिन जुमा एवं बा-जमात नमाज़ में शामिल नहीं होते, इसपर ध्यान नहीं देते और यह भी नहीं समझते कि उन्होंने कुछ बड़ा गुनाह का काम किया है। निश्चित रूप से यह ईमान एवं दूरदर्शिता की कमी तथा दिलों पर गुनाहों का ज़ंग लग जाने का नतीजा है। दुआ है कि अल्लाह हमें और तमाम मुसलमानों को इससे बचाए।
इस आयोजन से जुड़ी एक और बात यह है कि कुछ लोगों के अनुसार अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने जन्म दिवस के आयोजन में शामिल होते हैं। इसी धारणा के कारण वे आपका स्वागत करने के लिए खड़े होते हैं और सलाम प्रस्तुत करते हैं। यह दरअसल बदतरीन अज्ञानता का नमूना है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ियामत से पहले अपनी क़ब्र से नहीं निकलेंगे। आप न किसी से मिलते हैं और न किसी सभा में उपस्थित होते हैं। क़ियामत तक अपनी क़ब्र ही में रहेंगे। अलबत्ता आपकी आत्मा अपने रब के पास सम्मानित घर के सर्वोच्च भाग (आला-इल्लिय्यीन) में है। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿ثُمَّ إِنَّكُمْ بَعْدَ ذَلِكَ لَمَيِّتُونَ15 ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ تُبْعَثُونَ16﴾
"फिर निःसंदेह तुम इसके पश्चात् अवश्य मरने वाले हो। फिर निःसंदेह तुम क़ियामत के दिन उठाए जाओगे।" [सूरा अल-मोमिनून: 15,16]।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«أَنَا أَوَّلُ مَنْ يَنْشَقُّ عَنْهُ القَبْرُ يَومَ القِيَامَةِ، وَأَنَا أَوَّلُ شَافِعٍ، وَأَوَّلُ مُشَفَّعٍ».
"मैं क़ियामत के दिन सबसे पहले क़ब्र से निकलूँगा। मैं सबसे पहले सिफ़ारिश करूँगा और मेरी ही सिफ़ारिश सबसे पहले क़बूल होगी।" आप पर अपने रब की ओर से कृपा एवं शांति की बरखा बरसे।
यह दोनों आयतें, यह हदीस और इस आशय की अन्य आयतें एवं हदीसें प्रमाणित करती हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा अन्य मरे हुए लोग अपनी क़ब्रों से क़ियामत के दिन ही निकलेंगे। यह एक ऐसा तथ्य है कि इसपर तमाम मुस्लिम विद्वान एकमत हैं। किसी का कोई मतभेद नहीं है। इसलिए तमाम मुसलमानों को इन बातों को समझना चाहिए और अज्ञान लोगों के ऐसे आविष्कृत कार्यों से सचेत रहना चाहिए, जिनका अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा है। हमें इस प्रकार के कार्यों से अल्लाह बचाए। उसी पर हमारा भरोसा है। सच्चाई यह है कि उसके सिवा कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो भलाई की ओर ले जाए और बुराई से रोके।
जहाँ तक अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद व सलाम भेजने की बात है, तो यह एक उत्कृष्ट इबादत एवं नेकी का काम है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِيِّۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ صَلُّواْ عَلَيۡهِ وَسَلِّمُواْ تَسۡلِيمًا56﴾
"निःसंदेह अल्लाह तथा उसके फ़रिश्ते नबी पर दुरूद भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम (भी) उनपर दुरूद तथा बहुत सलाम भेजा करो।" [सूरा अल-अहज़ाब : 56]।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«مَنْ صَلَّى عَلَيَّ وَاحِدَةً؛ صَلَّى اللهُ عَلَيهِ بِهَا عَشْرًا».
"जिसने मुझपर एक बार दुरूद भेजा, उसके बदले में अल्लाह उसपर दस रहमतें उतारेगा।"
वैसे तो दुरूद व सलाम भेजने का काम किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन हर नमाज़ के अंत में दुरूद व सलाम भेजने की ताकीद आई है, बल्कि कुछ इस्लामी विद्वानों के अनुसार हर नमाज़ के अंतिम तशह्हुद में यह वाजिब है। और बहुत सारी जगहों में सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। मसलन अज़ान के बाद, आपका ज़िक्र आने पर और जुमा के दिन एवं जुमे की रात को। जैसा कि बहुत-सी हदीसों से प्रमाणित होता है।
दुआ है कि अल्लाह हमें और तमाम मुसलमानों को दीन की सही समझ प्रदान करे, उसपर मज़बूती से क़ायम रखे, सुन्नत का पालन करने एवं बिदअत से सचेत रहने का सुयोग दे। सच यह है कि जिसको जो मिलता है, उसी के यहाँ से मिलता है।
दुरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिवार और तमाम साथियों पर।
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بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
छठी पुस्तिका:
इसरा एवं मेराज की रात जश्न मनाना शरई दृष्टिकोण से
समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है तथा दुरूद व सलाम (प्रशंसा व शांति) अवतरित हो अल्लाह के रसूल पर, तथा उनके परिवार वालों पर, एवं उनके साथियों पर और उनसे मित्रता रखने वालों पर।
इसके बाद अब मूल विषय पर आते हैं। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि इसरा एवं मेराज अल्लाह की एक बहुत बड़ी निशानी है, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सच्चे रसूल होने, अल्लाह के यहाँ बड़ा ऊँचा स्थान रखने तथा अल्लाह के असीम सामर्थ्य वाला एवं अपनी सृष्टि से ऊँचा होने को प्रमाणित करती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿سُبۡحَٰنَ ٱلَّذِيٓ أَسۡرَىٰ بِعَبۡدِهِۦ لَيۡلٗا مِّنَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ إِلَى ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡأَقۡصَا ٱلَّذِي بَٰرَكۡنَا حَوۡلَهُۥ لِنُرِيَهُۥ مِنۡ ءَايَٰتِنَآۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ1﴾
"पवित्र है वह (अल्लाह) जो अपने बंदे को रातों-रात मस्जिदे-हराम (काबा) से मस्जिदे-अक़सा तक ले गया, जिसके चारों ओर हमने बरकत रखी है। ताकि हम उसे अपनी कुछ निशानियाँ दिखाएँ। निःसंदेह वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।" [सूरा अल-इसरा : 1]।
यह बात वर्णनकर्ताओं की बहुत बड़ी संख्या से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रातों-रात सातों आकाशों की सैर कराई गई और आपके लिए उनके द्वार खोले गए, यहाँ तक कि आप सातवें आकाश तक पहुँच गए। वहाँ आपके रब ने आपसे बात की और पाँच वक़्त की नमाज़ें फ़र्ज़ कीं। वैसे तो अल्लाह ने पहले पचास वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की थी, लेकिन आप बार-बार अपने रब के पास जाते रहे और बोझ हल्का करने की बात करते रहे, यहाँ तक कि शेष पाँच वक़्त की नमाज़ें ही रह गईं। इस तरह ये पढ़ने में तो पाँच नमाज़ें हैं, लेकिन प्रतिफल में पचास नमाज़ें हैं। क्योंकि अल्लाह के यहाँ एक नेकी का बदला दस मिलता है। हम अल्लाह की तमाम नेमतों पर उसका शुक्र अदा करते हैं।
वह रात, जिसमें अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का से बैत अल-मक़दिस ले जाए गए और वहाँ से सात आकाशों की सैर कराए गए सही हदीसों से उसकी तिथि एवं महीने का निर्धारण नहीं होता। निश्चित नहीं है कि वह रात रजब महीने की थी या किसी और महीने की। इस संबंध में जो रिवायतें आई हैं, हदीस का ज्ञान रखने वालों के अनुसार वो साबित नहीं हैं। वैसे, निर्धारण हो भी जाता, तब भी उसमें विशेष रूप से कोई इबादत एवं सभा का आयोजन करना जायज़ नहीं होता। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा ने न तो उस रात कुछ विशेष कार्य किया है और न ही किसी सभा का आयोजन किया है। अगर उस रात सभा का आयोजन करना नेकी का काम होता, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उम्मत को बता देते। कथन द्वारा हो कि कार्य द्वारा। फिर, अगर आपने बताया होता, तो लोग उसे जानते और सहाबा हम तक पहुँचा देते। क्योंकि सहाबा ने अपने नबी की वह सारी बातें नक़ल की हैं, जिनकी उम्मत को ज़रूरत थी। उनसे इस मामले में कोई कोताही नहीं हुई। वह तो हर अच्छे काम में आगे रहने वाले लोग थे। अगर इस रात सभा का आयोजन करना नेकी का काम होता, तो वह इसमें भी सबसे आगे रहते। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों के सबसे अधिक शुभचिंतक थे। आपने अल्लाह का संदेश पहुँचा दिया है। दीन पहुँचाने की जो ज़िम्मेवारी आपके हवाले की गई थी, उसको भली-भाँति निभाया है। ऐसे में अगर इस रात का सम्मान और इसमें सभा का आयोजन दीन का काम होता, तो आप उसे नज़र अंदाज़ कर देते और बयान न करते यह संभव नहीं है। इसलिए आपका बयान न करना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इस रात का सम्मान करना और इसमें सभा का आयोजन करना दीन का हिस्सा नहीं है। अल्लाह ने तो इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन दिया है और दीन के अंदर किसी ऐसे काम का आविष्कार करने वाले का खंडन किया है, जिसकी अनुमति उसने न दी हो। उसने पवित्र क़ुरआन में कहा है :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا...﴾
"...आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया...।" [सूरा अल-माइदा : 3]।
एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿أَمۡ لَهُمۡ شُرَكَٰٓؤُاْ شَرَعُواْ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمۡ يَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةُ ٱلۡفَصۡلِ لَقُضِيَ بَيۡنَهُمۡۗ وَإِنَّ ٱلظَّٰلِمِينَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ21﴾
"या इन (मुश्रिकों) के कुछ ऐसे साझी हैं, जिन्होंने उनके लिए धर्म का एक ऐसा नियम निर्धारित किया है जिसकी अल्लाह ने अनुमति नहीं दी है? और यदि नियत की हुई बात न होती, तो अवश्य उनके बीच निर्णय कर दिया जाता तथा निश्चय ही अत्याचारियों के लिए दुखद यातना है।" [सूरा अल-शूरा : 21]।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों में बिदअत से सचेत किया गया है, और उसे स्पष्ट रूप से गुमराही कहा गया है, जिससे साबित होता है कि यह एक हानिकारक वस्तु है और इससे बचने की ज़रूरत है। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ؛ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।"
सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है :
«مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيهِ أَمْرُنَا؛ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके सम्बंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह अग्रहणीय है।"
सहीह मुस्लिम में जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जुमे के दिन अपने ख़ुतबे में कहा करते थे :
«أَمَا بَعْدُ، فَإِنَّ خَيرَ الحَدِيثِ كِتَابُ اللهِ، وَخَيرَ الهَدْيِ هَدْيُ مُحَمَّدٍ ﷺ، وَشَرَّ الأُمُورِ مُحْدَثَاتُهَا، وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
"तत्पश्चात, निःसंदेह सबसे अच्छी बात अल्लाह की किताब है, और सबसे उत्तम तरीक़ा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का तरीक़ा है, और सबसे बुरी चीज़ (धर्म के नाम पर निकाली जाने वाली) नई चीज़ें हैं और हर बिदअत (धर्म के नाम पर निकाली गई नई चीज़) गुमराही है।"
सुनन नसई में जैयिद सनद से यह वृद्धि है :
«وَكُلَّ ضَلَالَةٍ فِي النَّارِ».
"और हर गुमराही जहन्नम में (ले जाने वाली) है।"
सुनन की किताबों में इरबाज़ बिन सारिया रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें ऐसा उपदेश दिया जिससे हृदय कांप उठे तथा नेत्रों से अश्रु की धारा बहने लगी। हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! यह तो विदाई लेने वाले का उपदेश प्रतीत होता है, हमें कुछ वसीयत कीजिए। तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया :
«أُوصِيكُم بِتَقْوَى اللهِ وَالسَّمعِ وَالطَّاعَةِ وَإِنْ تَأَمَّرَ عَلَيكُم عَبدٌ، فَإِنَّهُ مَنْ يَعِشْ مِنْكُم فَسَيَرَى اخْتِلَافًا كَثِيرًا، فَعَلَيكُم بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الخُلَفَاءِ الرَّاشِدِينَ المَهْدِيِّينَ مِنْ بَعْدِي، تَمَسَّكُوا بِهَا وَعَضُّوا عَلَيْهَا بِالنَّوَاجِذِ، وَإِيَّاكُم وَمُحْدَثَاتِ الأُمُورِ، فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٍ وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
"मैं तुम्हें अल्लाह का भय खाने, (शासक की बात) सुनने और (उसकी) आज्ञा का पालन करने की वसीयत करता हूँ, चाहे तुम्हारा शासक कोई दास ही क्यों न हो। जो तुम में से जीवित रहेगा, वह अनेक प्रकार के मतभेद देखेगा। इसलिए मेरी सुन्नत और मेरे सही मार्गदर्शित ख़लीफाओं (उत्तराधिकारियों) की सुन्नत को दृढ़ता से पकड़ लेना। इनको ढृढ़ता के साथ थाम लेना, तथा दीन के नाम पर सामने आने वाली नई चीज़ों से बचना, क्योंकि दीन के नाम पर सामने आने वाली हर नई चीज़ बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है।"
इस आशय की बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा और उनके बाद सलफ़-ए-सालेह (सदाचारी पूर्वजों) ने बिदअतों से सचेत किया एवं डराया है। इसका कारण यह है कि बिदअतें दीन में वृद्धि करने, जिस चीज़ की अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है उसे दीन बनाने और यहूदियों एवं ईसाइयों जैसे अल्लाह के दुश्मनों की भांति व्यवहार करते हुए दीन के नाम पर नित-नई चीज़ों का आविष्कार करने का द्योतक हैं। दूसरी बात यह है कि बिदअत का आविष्कार इस्लाम धर्म का अपमान और उसपर एक असंपूर्ण धर्म होने का आरोप मढ़ना है। ज़ाहिर है कि यह एक बहुत बड़ा आरोप है, जो सर्वशक्तिमान अल्लाह के इस कथन से सीधे तौर पर टकराता हैं :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ...﴾
"...आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया...।" [सूरा अल-माइदा : 3]।
इसी तरह यह व्यवहार उन हदीसों के विरुद्ध है, जो बिदअत से सचेत करती और डराती है।
हमें आशा है कि हमारे द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाण इसरा एवं मेराज की रात का जश्न मनाने के संबंध में शरीअत का दृष्टिकोण जानने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए काफ़ी हैं। इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि इस कृत्य का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है।
चूँकि मुसलमानों का शुभचिंतन और उनको दीन की सही जानकारी देना आवश्यक और ज्ञान छुपाना हराम है, इसलिए मैंने सोचा कि अपने मुसलमान भाइयों को इस बिदअत के बारे में सचेत कर दिया जाए, जो बहुत-से इलाक़ों में फैल चुकी है और कुछ लोगों ने उसे दीन का हिस्सा समझ लिया है।
दुआ है कि अल्लाह तमाम मुसलमानों की हालत दुरुस्त कर दे, उनको दीन की सही समझ प्रदान करे और हमें तथा उनको सत्य को मज़बूती से पकड़ने तथा उसपर सुदृढ़ रहने और उसके विपरीत चीज़ों से अलग रहने का सुयोग प्रदान करे। यह सब केवल उसी का काम है और उसके सामर्थ्य से कुछ भी बाहर नहीं है।
अल्लाह की दया, शांति एवं बरकतें अवतरित हों उसके बंदे एवं रसूल, हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, और आपके परिवार एवं साथियों पर।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
सातवीं पुस्तिका:
पंद्रहवीं शाबान की रात जश्न मनाना शरई दृष्टिकोण से
सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने हमें एक संपूर्ण दीन एवं पूरी नेमत प्रदान की। दुरुद व सलाम हो अल्लाह के नबी एवं रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, जो तौबा एवं दया के नबी हैं।
इसके बाद मूल विषय पर आते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا...﴾
"...आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया...।" [सूरा अल-माइदा : 3]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿أَمۡ لَهُمۡ شُرَكَٰٓؤُاْ شَرَعُواْ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمۡ يَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُ...﴾
"या इन (मुश्रिकों) के कुछ ऐसे साझीदार हैं, जिन्होंने उनके लिए धर्म का एक ऐसा नियम निर्धारित किया है जिसकी अल्लाह ने अनुमति नहीं दी है...?" [सूरा अल-शूरा : 21]।
सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ؛ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।"
सहीह मुस्लिम में जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जुमा के ख़ुतबे में कहा करते थे :
«أَمَّا بَعْدُ: فَإِنَّ خَيرَ الحَدِيثِ كِتَابُ اللهِ، وَخَيرَ الهَدْيِ هَدْيُ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللهُ عَلَيهِ وَسَلَّمَ، وَشَرَّ الأُمُورِ مُحْدَثَاتُهَا، وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
"तत्पश्चात, निःसंदेह सबसे अच्छी बात अल्लाह की किताब है, और सबसे उत्तम तरीक़ा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का तरीक़ा है, और सबसे बुरी चीज़ (धर्म के नाम पर निकाली जाने वाली) नई चीज़ें हैं और हर बिदअत (धर्म के नाम पर निकाली गई नई चीज़) गुमराही है।"
इस आशय की आयतें एवं हदीसें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। यह सारी आयतें एवं हदीसें स्पष्ट रूप से बताती हैं कि अल्लाह ने इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन एवं परिपूर्ण नेमत प्रदान की है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु अल्लाह का संदेश स्पष्ट रूप से पहुँचा देने और उम्मत को एक-एक शरई कार्य एवं कथन समझा देने के बाद ही हुई है। आपने साफ़-साफ़ बता दिया है कि आपके बाद इस्लाम धर्म के अंग के तौर पर जितने भी कार्य एवं कथनों का आविष्कार होगा, वो अल्लाह के यहाँ ग्रहण नहीं होंगे। चाहे करने वाले की नीयत अच्छी ही क्यों न हो। इस बात से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा और उनके बाद के इस्लामी उलमा अच्छी तरह अवगत थे। इसलिए, उन्होंने दीन के नाम पर रायज किए जाने वाले नव-आविष्कृत कार्यों का खंडन एवं उनसे सावधान किया। इसके लिए आप इब्न-ए-वज़्ज़ाह, तुरतूशी और अबू शामा जैसे लेखकों की किताबें पढ़ सकते हैं, जिन्होंने सुन्नत के महत्व और बिदअत के खंडन पर किताबें लिखी हैं।
कुछ लोगों द्वारा आविष्कृत बिदअतों में से एक बिदअत पंद्रहवीं शाबान की रात को जश्न मनाने और दिन में रोज़ा रखने की बिदअत है। दरअसल इस अमल का कोई ऐसा प्रमाण नहीं है, जिसपर भरोसा किया जा सके। इसकी फ़ज़ीलत में कुछ ज़ईफ़ हदीसें आई हुई हैं, जिनपर भरोसा करना जायज़ नहीं है।
इस रात नमाज़ पढ़ने के बारे में जो हदीसें आई हैं, वह सब की सब मौज़ू (मनगढ़ंत) हैं। बहुत-से इस्लामी विद्वानों ने यह बात कही है और इनमें से कुछ की बातें, इन शा अल्लाह, आगे आएँगी।
इस संबंध में शाम एवं अन्य क्षेत्रों के कुछ सलफ़ के आसार (कथन) भी आए हैं।
यहाँ जिस बात पर जुमहूर उलमा एकमत हैं, वह यह है कि इस रात को जश्न मनाना बिदअत है और इसकी फ़ज़ीलत में आई हुई हदीसें ज़ईफ़ हैं, कुछ तो मौज़ू (मनगढ़ंत) भी हैं। इन बातों का उल्लेख करने वालों में हाफ़िज़ इब्न-ए-रजब भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी किताब "लताइफ़ अल-मआरिफ़" में इन बातों का ज़िक्र किया है। जबकि सर्वविदित है कि ज़ईफ़ हदीसों पर अमल उन्हीं इबादतों के संबंध में किया जाएगा, जिनका मूल और आधार सही प्रमाणों से साबित हो। जहाँ तक पंद्रहवीं शाबान की रात को जश्न मनाने का प्रश्न है, तो उसका कोई सहीह आधार नहीं है कि उसको दुर्बल हदीसों से बल मिल सके। इस महत्वपूर्ण नियम का ज़िक्र इमाम अबुल अब्बास शैख़ुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया ने किया है।
यहाँ मैं अपने पाठकों के लिए कुछ मुस्लिम विद्वानों का कथन प्रस्तुत कर दूँगा, ताकि वह इनसे अवगत रहें।
उलमा इस बात पर एकमत हैं कि जिस मसले में लोगों के बीच विवाद हो जाए, उसे सर्वशक्तिमान अल्लाह की किताब और उसके रसूल की ओर लौटाना चाहिए। उसके बाद जिसका निर्णय दोनों या दोनों में से कोई एक दे दे, वही शरीअत है, और उसका अनुपालन ज़रूरी है, जो दोनों के विरुद्ध हो उससे दामन छुड़ा लेना आवश्यक है। लेकिन, जिस इबादत का ज़िक्र दोनों में न हो, वह बिदअत है। उसे करना जायज़ नहीं है। उसकी ओर बुलाने और उसका स्वागत करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ وَأُوْلِي ٱلۡأَمۡرِ مِنكُمۡۖ فَإِن تَنَٰزَعۡتُمۡ فِي شَيۡءٖ فَرُدُّوهُ إِلَى ٱللَّهِ وَٱلرَّسُولِ إِن كُنتُمۡ تُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ ذَٰلِكَ خَيۡرٞ وَأَحۡسَنُ تَأۡوِيلًا59﴾
"ऐ ईमान वालो! अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल का आज्ञापालन करो और अपने में से अधिकार वालों (शासकों) का। फिर यदि तुम आपस में किसी चीज़ में मतभेद कर बैठो, तो उसे अल्लाह और रसूल की ओर लौटाओ, यदि तुम अल्लाह तथा अंतिम दिन (परलोक) पर ईमान रखते हो। यह (तुम्हारे लिए) बहुत बेहतर है और परिणाम की दृष्टि से बहुत अच्छा है।" [सूरा अल-निसा : 59]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَا ٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِيهِ مِن شَيۡءٖ فَحُكۡمُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ...﴾
"और तुम जिस चीज़ के बारे में भी मतभेद करो, उसका निर्णय अल्लाह की ओर है...।" [सूरा अल-शूरा : 10]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है:
﴿قُلۡ إِن كُنتُمۡ تُحِبُّونَ ٱللَّهَ فَٱتَّبِعُونِي يُحۡبِبۡكُمُ ٱللَّهُ وَيَغۡفِرۡ لَكُمۡ ذُنُوبَكُمۡ...﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा तथा तुम्हारे पाप क्षमा कर देगा...।" [सूरा आल-ए-इमरान : 31]।
एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤۡمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيۡنَهُمۡ ثُمَّ لَا يَجِدُواْ فِيٓ أَنفُسِهِمۡ حَرَجٗا مِّمَّا قَضَيۡتَ وَيُسَلِّمُواْ تَسۡلِيمٗا65﴾
"तो (ऐ नबी!) आपके पालनहार की क़सम! वे कभी ईमान वाले नहीं हो सकते, जब तक अपने आपस के विवाद में आपको निर्णायक न बनाएँ, फिर आप जो निर्णय कर दें, उससे अपने दिलों में तनिक भी तंगी महसूस न करें और उसे पूरी तरह से स्वीकार कर लें।" [सूरा अल-निसा : 65]।
इस आशय की आयतें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जो स्पष्ट रूप से बताती हैं कि विवादित मसलों को किताब एवं सुन्नत की ओर लौटाना और दोनों के निर्णय से संतुष्ट होना ज़रूरी है। यही ईमान का तक़ाज़ा और बंदों के लिए दुनिया एवं आख़िरत में बेहतर है।
इस विषय में हाफ़िज़ इब्न-ए-रजब -रहिमहुल्लाह- अपनी किताब "लताइफ़ अल-मआरिफ़" में कहते हैं :
"पंद्रहवीं शाबान की रात को शाम के ताबिईगण, जैसे ख़ालिद बिन मादान, मकहूल और लुक़मान बिन आमिर आदि सम्मान देते थे और उसमें ख़ूब इबादत किया करते थे। उन्हीं से लोगों ने इस रात की फ़ज़ीलत जानी एवं सम्मान करना सीखा। कहा जाता है कि उनको इस संबंध में कुछ इसराईली रिवायतें मिली थीं। उनके बारे में जब लोगों में यह बात फैल गई, तो लोगों में मतभेद हो गया। कुछ लोगों ने उनसे इस बात को ग्रहण कर लिया और उन्हीं की तरह इस रात का सम्मान करने लगे। इसमें बसरा के कुछ इबादत-गुज़ार लोग तथा अन्य शामिल थे। जबकि हिजाज़ के उलमा जैसे अता, इब्न-ए-अबू मुलैका आदि ने इसका खंडन किया। अब्दुर रहमान बिन ज़ैद बिन असलम ने मदीने के फ़क़ीहों से भी खंडन नक़ल किया है। यही मत इमाम मालिक के मानने वालों और अन्य लोगों का है। इन तमाम लोगों का कहना है कि यह पूरे तौर पर बिदअत है।
इस रात को जागना कैसा है, इसमें शाम के उलमा के दो मत हैं :
1- मस्जिद में एकत्र होकर जागना मुस्तहब है। ख़ालिद बिन मादान और लुक़मान बिन आमिर आदि उस रात अच्छे कपड़े पहनते, खुशबू और सुर्मा लगाते और मस्जिद में रात भर क़ियाम करते। इसहाक़ बिन राहवैह भी इसमें उनसे सहमत हैं। एक गिरोह ने इस रात मस्जिद में जमात के साथ नमाज़ पढ़ने के बारे में कहा है कि यह बिदअत नहीं है। उनके इस मत को हर्ब अल-किर्मानी ने अपने मसायल में नक़ल किया है।
2- उस रात नमाज़, क़िस्से सुनने-सुनाने और दुआ आदि के लिए मस्जिद में जमा होना हराम है। लेकिन कोई अकेले नमाज़ पढ़ता है, तो हराम नहीं है। यह शाम वासियों के इमाम, फ़क़ीह और आलिम औज़ाई का कथन है। अल्लाह ने चाहा तो यह कथन सत्य से अधिक निकट है।" उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए आगे लिखा है : "पंद्रहवीं शाबान की रात के बारे में इमाम अहमद का कोई कथन नहीं मिलता। लेकिन उनके सिद्धांतों को देखते हुए उनसे इस रात नमाज़ पढ़ने के संबंध में दो मत निकाले जाते हैं। क्योंकि दोनों ईदों की रातों को नमाज़ पढ़ने के बारे में उनके दो कथन पाए जाते हैं। एक कथन के अनुसार उस रात जमात के साथ नमाज़ पढ़ना मुसतहब नहीं है। क्योंकि यह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा से वर्णित नहीं है। जबकि दूसरे कथन के अनुसार मुस्तहब है। क्योंकि अब्दुर रहमान बिन यज़ीद बिन असवद ने ऐसा किया है, जो ताबिई थे। यही हाल पंद्रहवीं शाबान की रात को नमाज़ पढ़ने का है। इस संबंध में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से कुछ भी साबित नहीं है। जबकि शाम के महत्वपूर्ण फ़क़ीहों में शुमार होने वाले कुछ ताबेईन से साबित है"। हाफ़िज़ इब्न-ए-रजब का कथन समाप्त हुआ।
इसमें वह स्पष्ट रूप से कहते हुए नज़र आते हैं कि पंद्रहवीं शाबान की रात के बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से कुछ भी साबित नहीं है।
जहाँ तक औज़ाई द्वारा व्यक्तिगत रूप से इस रात नमाज़ पढ़ने के मत को चुनने और इब्न-ए-रजब के भी इसे चयन करने की बात है, तो यह आश्चर्यजनक एवं एक दुर्बल मत है। क्योंकि जो चीज़ शरई प्रमाणों द्वारा शरीअत का हिस्सा बन नहीं पाती, उसे दीन का हिस्सा बना लेना जायज़ नहीं है। उसे अकेले किया जाए या जमात के साथ। चुपके से किया जाए या सब को दिखाकर। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन आम है :
«مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيهِ أَمْرُنَا؛ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके सम्बंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह अग्रहणीय है।"
साथ ही इसके अतिरिक्त भी बहुत-से प्रमाण हैं, जो बिदअत का खंडन करते और उससे सावधान एवं सचेत करते हैं।
इमाम अबू बक्र तुरतूशी अपनी किताब "अल-हवादिस व अल-बिदअ" में कहते हैं :
"इब्न-ए-वज़्ज़ाह का वर्णन है कि ज़ैद बिन असलम ने कहा है : हमने अपने गुरुओं एवं फ़क़ीहों में किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं पाया, जो पंद्रहवीं शाबान पर ध्यान देते हों, मकहूल की बात पर तवज्जो देते हों। यह लोग इस रात को अन्य रातों से अलग नहीं मानते थे।"
इब्न-ए-अबू मुलैका से कहा गया कि ज़ियाद नुमैरी कहते हैं : "शाबान की पंद्रहवीं रात का प्रतिफल लैलतुल क़द्र के प्रतिफल के बराबर है।" यह सुनकर उन्होंने कहा : "अगर मैं उसे यह बात कहते हुए सुनता और उस समय मेरे हाथ में कोई लाठी होती, तो मैं उसे उस लाठी से पीट देता।" ज़ियाद असल में क़िस्सा गो थे। अभिप्राय समाप्त हुआ।
अल्लामा शौकानी -रहिमहुल्लाह- ने "अल-फ़वाइद अल-मजमूआ" में कहा है :
"हदीस : "ऐ अली! जिसने पंद्रहवीं शाबान की रात को सौ रक्अतें पढ़ीं और हर रक्अत में सूरा फ़ातिहा और क़ुल हुवल्लाहु अहद दस बार पढ़ी, अल्लाह उसकी हर ज़रूरत पूरी करेगा....।" यह हदीस मौज़ू (मनगढंत) है। इस हदीस के अंदर जो प्रतिफल बयान किए गए हैं, उसी से हर समझदार इन्सान को विश्वास हो जाएगा कि यह हदीस मौज़ू (मनगढ़ंत) है। इस हदीस के वर्णनकर्ता अज्ञात हैं। यह हदीस दूसरी तथा तीसरी सनद से भी आई है, लेकिन सब की सब मौज़ू (मनगढ़ंत) हैं और सब के वर्णनकर्ता अज्ञात हैं। और शौकानी ने "अल-मुख़तसर" में कहा है : पंद्रहवीं शाबान की हदीस बातिल है। सहीह इब्न-ए-हिब्बान में अली रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है : "जब पंद्रहवीं शाबान की रात आए, तो तुम रात में नमाज़ पढ़ो और दिन में रोज़ा रखो।" लेकिन यह हदीस ज़ईफ़ है। जबकि "अल-लआली" में कहा है: दैलमी आदि में मौजूद हदीस, जिसमें "शाबान की पंद्रहवीं रात को सौ रक्अत नमाज़, दस-दस बार सूरा इख़लास के साथ" पढ़ने की बड़ी लंबी-चौड़ी फ़ज़ीलतें बयान की गई हैं, मौज़ू है। इसकी तीनों सनदों के अधिकतर वर्णनकर्ता अज्ञात एवं जईफ हैं। वह कहते हैं : "तीस बार सूरा इख़लास के साथ बारह रक्अत नमाज़" वाली हदीस भी मौज़ू है। इसी तरह चौदह रक्अत नमाज़ वाली हदीस भी मौज़ू है।
इस हदीस से फ़क़ीहों के एक समूह ने, जैसे "अल-इहया" के लेखक आदि ने धोखा खाया है। यही हाल कई मुफ़स्सिरों का भी है। शाबान की पंद्रहवी रात की नमाज़ विभिन्न ढ़ंगों से वर्णित हुई है, लेकिन यह सब के सब बातिल एवं मौज़ू हैं। लेकिन इससे आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित सुनन तिर्मिज़ी की उस हदीस का खंडन नहीं होता, जिसमें है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बक़ी क़ब्रिस्तान गए, और यह कि अल्लाह पंद्रहवीं शाबान की रात को पहले आकाश पर उतरता है तथा बनी कल्ब क़बीले की बकरियों के बालों से अधिक संख्या में लोगों को क्षमा करता है। क्योंकि यहाँ एक तो बात इस रात में मनगढ़ंत पढ़ी जाने वाली नमाज़ की हो रही है, और दूसरा यह कि आइशा रज़ियल्लहु अन्हा की इस हदीस में दुर्बलता एवं उसके वर्णनकर्ताओं की शृंखला में टूट है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे अली रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है, जो पीछे गुज़र चुकी है, उससे इस तथ्य का खंडन नहीं होता कि यह नमाज़ मनगढ़ंत है। हालाँकि वह हदीस भी दुर्बल है, जैसा कि हम पीछे बयान कर आए हैं।"
हाफ़िज़ इराक़ी कहते हैं : "पंद्रहवीं शाबान की रात की नमाज़ वाली हदीस मनगढ़ंत एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर बाँधा गया झूठ है।" इमाम नववी अपनी किताब "अल-मजमूअ" में कहते हैं : "सलात अल-रग़ाइब के नाम से मश्हूर नमाज़, जो रजब महीने के पहले जुमे की रात को मग़्रिब और इशा के बीच बारह रक्अत पढ़ी जाती है और इसी तरह पंद्रहवीं शाबान की रात को पढ़ी जाने वाली सौ रक्अत नमाज़, दोनों बिदअत और ग़ैर-शरई हैं। किसी को इस बात से धोखा नहीं खाना चाहिए कि इनका ज़िक्र "क़ूत अल-क़ुलूब" एवं "इहया उलूम अल-दीन" जैसी किताबों में हुआ है। इसी तरह इन दोनों के बारे में आई हुई हदीसों से भी धोखा नहीं खाना चाहिए। क्योंकि यह हदीसें सही नहीं हैं। इस बात से भी धोखा नहीं खाना चाहिए कि कुछ इमामों को इन नमाज़ों के बारे में शरई दृष्टिकोण जानने में ग़लती हुई और उन्होंने इनके मुस्तहब होने के बयान में कुछ पृष्ठ लिख डाले। क्योंकि यहाँ उनसे ग़लती हुई है।"
शैख़ इमाम अबू मुहम्मद अब्दुर रहमान बिन इस्माईल मक़दिसी ने इन दोनों नमाज़ों को बातिल (अमान्य) प्रमाणित करने के लिए एक बहुत ही मूल्यवान किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने इस मसले पर बड़ी अच्छी बात की है। दरअसल इस मसले में इस्लामी विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा और कहा है। अगर हम जो कुछ जानते हैं, सब नक़ल करने लगें, तो बात लंबी हो जाएगी। हम समझते हैं कि जितना हमने नक़ल कर दिया है, वह सत्य की तलाश करने वाले के लिए काफ़ी है।
अब तक नक़ल की गई आयतों, हदीसों और इस्लामी विद्वानों के कथनों से स्पष्ट है कि विशेष रूप से पंद्रहवीं शाबान की रात को नमाज़ आदि के लिए जागना और उस रोज़ दिन में रोज़ा रखना अधिकतर इस्लामी विद्वानों की नज़र में बिदअत एवं ग़ैर-शरई कार्य है। शरीअत में इसका कोई आधार नहीं है। इसकी शुरूआत सहाबा के दौर के बाद हुई। इस संबंध में सही क्या है, यह जानने के लिए तो बस अल्लाह का यह कथन :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ...﴾
"...आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया...।" [सूरा अल-माइदा : 3]।
तथा इस आशय की अन्य आयतें, एवं अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।"
और इस आशय की अन्य हदीसें ही काफ़ी हैं।
सहीह मुस्लिम में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَا تَخُصُّوا لَيْلَةَ الْجُمُعَةِ بِقِيَامٍ مِنْ بَيْنِ اللَّيَالِي، وَلَا تَخُصُّوا يَوْمَهَا بِالصِّيَامِ مِنْ بَيْنِ الْأَيَّامِ، إِلَّا أَنْ يَكُونَ فِي صَوْمٍ يَصُومُهُ أَحَدُكُمْ».
"सभी रातों के बीच में से विशेष रूप से जुमे की रात को जागकर नमाज़ न पढ़ा करो। सभी दिनों के बीच में से विशेष रूप से जुमे के दिन को रोज़ा न रखा करो। हाँ, जुमे का दिन अगर ऐसे रोज़े के बीच में आ जाए जिसको तुम में से कोई रखने का आदी हो, तो कोई बात नहीं है।"
अगर किसी रात को विशेष रूप से कोई इबादत करना जायज़ होता, तो जुमे की रात का नम्बर पहले आता। क्योंकि जुमे का दिन सबसे बेहतर दिन है, जिसमें सूरज निकलता है। यह बात अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह हदीसों से साबित है। लेकिन जब इसके बावजूद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने विशेष रूप से कोई इबादत करने से मना कर दिया, तो पता यह चला कि अन्य रातों में विशेष रूप से कोई इबादत करने की मनाही तो और ज़्यादा होगी। हाँ, अगर इसका कोई सही प्रमाण मौजूद हो, तो बात अलग है।
मसलन चूँकि लैलतुल क़द्र और रमज़ान महीने की रातों में जागकर इबादत करना एक शरई कार्य है, इसलिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसकी ओर लोगों को ध्यान दिलाया, उसकी प्रेरणा दी और ख़ुद किया भी। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ قَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ، وَمَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ».
"जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए रमज़ान महीने की रातों को जागकर इबादत की, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। और जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए लैलतुल क़द्र में जागकर इबादत की, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।"
ऐसे में अगर पंद्रहवीं शाबान की रात, रजब महीने के पहले जुमे की रात या इसरा एवं मेराज की रात को जश्न मनाना, सभा का आयोजन करना या कोई भी इबादत करना शरई कार्य होता, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसकी ओर उम्मत को तवज्जो दिला देते या ख़ुद करके दिखा देते। और अगर ऐसा कुछ भी हुआ होता, तो सहाबा उसे ज़रूर नक़ल करते। छुपाते तो हरगिज़ नहीं। क्योंकि वह नबियों के बाद सबसे उत्तम लोग और लोगों के सबसे बड़े शुभचिंतक थे।
जबकि आपने अभी-अभी उलमा के कथनों द्वारा जाना कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और इसी तरह आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से रजब महीने के पहले जुमे की रात और पंद्रहवीं शाबान की रात की फ़ज़ीलत में कुछ भी साबित नहीं है। इसलिए स्पष्ट है कि इन दोनों रातों को सभा का आयोजन करना बिदअत और दीन के नाम पर किया जाने वाला एक नया काम है। इसी तरह इन दोनों रातों में विशेष रूप से कोई भी इबादत करना बिदअत एवं ग़ैर-शरई कार्य है। यही हाल रजब महीने की सत्ताईसवीं रात का भी है, जिसे कुछ लोग इसरा एवं मेराज की रात समझते हैं। उस रात को भी विशेष रूप से कोई इबादत करना जायज़ नहीं है। सभा का आयोजन भी जायज़ नहीं है। दलीलें वही हैं, जो पीछे गुज़र चुकी हैं। यह भी उस समय है, जब इसरा एवं मेराज की रात का पता होता। उलमा के सही मत के अनुसार तो पता ही नहीं है कि वह रात किस महीने की थी और तिथि कौन-सी थी। अगर किसी ने कहा है कि वह रजब महीने की सत्ताईसवीं रात थी, तो उसका कथन ग़लत एवं बेबुनियाद है। सहीह हदीसों में ऐसा कुछ भी नहीं है। किसी ने क्या ही अच्छा कहा है :
सबसे अच्छी चीज़ें वह हैं, जो सलफ़ के यहाँ हिदायत अनुरूप पाई जाती थीं और सबसे बुरी चीज़ें वह हैं, जो दीन के नाम पर बाद में जारी कर दी गईं।
दुआ है कि अल्लाह हमें और तमाम मुसलमानों को सुन्नत को पकड़े रहने, उसपर जमे रहने और सुन्नत विरोधी चीज़ों से सावधान रहने का सुयोग प्रदान करे। जिसको जो भी मिलता है, उसी के यहाँ से मिलता है।
दुरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिवार और तमाम साथियों पर।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
आठवीं पुस्तिका:
एक झूठी वसीयत के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें जो हरम-ए-नबवी के सेवक शैख़ अहमद के नाम पर प्रचलित है
अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ की ओर से इससे अवगत होने वाले तमाम मुसलमानों के नाम। अल्लाह इस्लाम द्वारा हम सब की रक्षा करे और हम सब को अनाप-शनाप बोलने वाले अज्ञानी लोगों से सुरक्षित रखे।
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू, (आप पर शांति, अल्लाह की दया एवं बरकतें उतरें।)
अब मूल विषय पर आते हैं। मैं हरम-ए-नबवी के ख़ादिम शैख़ अहमद की ओर मंसूब एक लेख से अवगत हुआ, जिसका शीर्षक है : "यह मदीना मुनव्वरा से हरम-ए-नबवी के ख़ादिम शैख़ अहमद की एक वसीयत है"। उसमें कहा गया है :
"जुमे की रात को मैं जगा हुआ था। मैं क़ुरआन पढ़ता रहा और अल्लाह के नामों का जाप करता रहा। इन कार्यों को संपन्न करने के बाद सोने की तैयारी कर रहा था कि मैंने देखा चमकदार चेहरे वाले मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को, जो क़ुरआन एवं विधि-विधानों के साथ संसार वासियों के लिए दया बनकर आए थे। आपने कहा : ऐ शैख़ अहमद! मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! ऐ सर्वश्रेष्ठ सृष्टि! मैं उपस्थित हूँ। आपने मुझसे कहा : मैं लोगों के कुकर्मों पर शर्मिंदा हूँ। मैं अपने रब एवं फ़रिश्तों के सामने खड़ा नहीं हो सकता। पिछले जुमा से इस जुमा तक एक लाख साठ हज़ार लोग इस्लाम धर्म का पालन किए बिना ही मर गए। फिर लोगों द्वारा किए जा रहे कुछ गुनाहों का ज़िक्र किया। उसके बाद फ़रमाया : यह वसीयत सर्वशक्तिमान एवं बलशाली अल्लाह की ओर से दया के तौर पर की जा रही है। फिर क़ियामत की कुछ निशानियों का ज़िक्र किया और उसके बाद कहा : ऐ शैख़ अहमद! आप इस वसीयत की सूचना लोगों को दे दें। क्योंकि इसे लौह-ए-महफ़ूज़ से तक़दीर की क़लम से नक़ल किया गया है। जो व्यक्ति इसे लिखकर एक देश से दूसरे देश एवं एक स्थान से दूसरे स्थान भेजेगा, उसके लिए जन्नत में एक महल बनाया जाएगा। जो इसे लिखने एवं भेजने से पीछे हटेगा, क़ियामत के दिन उसपर मेरी सिफ़ारिश हराम होगी। जो निर्धन व्यक्ति इसे लिखेगा, अल्लाह इस वसीयत की बरकत से उसे धनवान बना देगा। क़र्ज़ हो तो अल्लाह उतार देगा। गुनाह हो, तो उसे और उसके माता-पिता को क्षमा कर देगा। जो इसे नहीं लिखेगा, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसका चेहरा काला करेगा। अंत में कहा : मैं अल्लाह की क़सम खाकर कहता हूँ कि यहाँ जितनी बातें कही गई हैं, सब सत्य हैं। अगर मैंने कोई बात झूठी कही है, तो मैं इस दुनिया से इस्लाम से हाथ धोकर निकलूँगा। जो इस वसीयत को सच जानेगा, वह जहन्नम की यातना से मुक्ति पा लेगा और जो इसे झुठलाएगा, वह काफ़िर हो जाएगा।"
यह सारांश है अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हवाले से नक़ल की जाने वाली इस झूठी वसीयत का। यह वसीयत पिछले कुछ सालों से कई बार सुनने को मिली है। शब्दों के कुछ फेर-बदल के साथ इसे बीच-बीच में प्रचारित किया जाता रहा है। इस झूठी वसीयत को तैयार करने वाला व्यक्ति कहता रहा है कि उसने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को स्वप्न में देखा और आप ने उसे इस वसीयत का बोझ सौंपा। लेकिन इस आखरी प्रकाशन में वह कहता है कि वह सोने की तैयारी कर रहा था कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नज़र आए। इसका अर्थ यह है कि उसने आपको जागने की अवस्था में देखा है।
इस वसीयत के अंदर इस झूठे इन्सान ने बहुत-सी ऐसी बातें कही हैं, जो स्पष्ट रूप से झूठी एवं असत्य हैं। अल्लाह ने चाहा, तो मैं आगे उनके बारे में बात करूँगा। मैंने पिछले वर्षों में भी उनके बारे में बताया है और कहा है कि यह सारी बातें बिल्कुल झूठी हैं। यही कारण है कि इस बार यह वसीयत छपी, तो मैं इसके बारे में लिखने में आगे-पीछे हो रहा था। मुझे लग रहा था कि इसका ग़लत होना इतना स्पष्ट है कि कोई भी समझदार एवं स्वच्छ प्रकृति का व्यक्ति इसपर विश्वास नहीं करेगा। लेकिन मुझे मेरे कई दीनी भाइयों ने बताया है कि यह बहुत-से लोगों तक पहुँच गई है और कुछ लोगों ने इसे सच मान भी लिया है। इसलिए मैंने ज़रूरी समझा कि मुझ जैसे व्यक्ति को इसके बारे में कुछ लिखना चाहिए, ताकि लोगों को पता चल जाए कि यह झूठी वसीयत है और इससे धोखा न खाएँ। इसे ग़ौर से पढ़ने वाला हर ज्ञान, ईमान, स्वच्छ प्रवृत्ति एवं विवेक रखने वाले व्यक्ति को पता चल जाएगा कि यह झूठी वसीयत है। इसके बहुत सारे कारण भी हैं।
मैंने शैख़ अहमद, जिनके हवाले से यह झूठी वसीयत की गई है, के एक निकट सम्बन्धी व्यक्ति से इसके बारे में पूछा, तो उसने मुझसे कहा कि शैख़ अहमद की ओर इसकी निस्बत झूठी है। उन्होंने इस प्रकार की कोई बात कही या लिखी नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि उक्त शैख़ अहमद की मृत्यु काफ़ी समय पहले हो चुकी है। लेकिन अगर मान भी लिया जाए कि शैख़ अहमद या उनसे किसी बड़े आदमी ने कह दिया कि उसने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को स्वप्न में या जागते हुए देखा है और आपने उसे यह वसीयत की है, तब भी पूरे विश्वास के साथ कहेंगे कि वह या तो झूठा है या फिर उससे यह बातें शैतान ने कही हैं। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नहीं। इसके बहुत-से कारण हैं। जैसे :
1- पहला कारण यह है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपकी मृत्यु के बाद जागते हुए देखा नहीं जा सकता। अगर किसी अज्ञानी सूफ़ी ने दावा किया कि वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को जागते हुए देखता है, या आप अपने जन्म-दिन के आयोजन में आते हैं, तो उसने बहुत बड़ी ग़लत बयानी से काम लिया और अल्लाह की किताब, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत एवं उलमा के इजमा (मतैक्य) के विरुद्ध चला गया। क्योंकि मरे हुए लोग अपनी क़ब्रों से क़ियामत के दिन ही निकलेंगे। दुनिया में नहीं। जो इससे हटकर कुछ बोल रहा है, वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर उस सच्चे इस्लाम से अवगत नहीं है, जिससे इस उम्मत के सदाचारी पूर्वज अवगत थे और जिसपर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एवं उनके मार्ग पर सच्चाई के साथ चलने वाले लोगों ने चलकर दिखाया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿ثُمَّ إِنَّكُم بَعۡدَ ذَٰلِكَ لَمَيِّتُونَ15 ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ تُبْعَثُونَ16﴾
"फिर निःसंदेह तुम इसके पश्चात् अवश्य मरने वाले हो। फिर निःसंदेह तुम क़ियामत के दिन उठाए जाओगे।" [सूरा अल-मोमिनून : 15, 16]।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«أَنَا أَوَّلُ مَنْ تَنْشَقُّ عَنْهُ الْأَرْضُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ، وَأَنَا أَوَّلُ شَافِعٍ وَأَوَّلُ مُشَفَّعٍ».
"मैं पहला व्यक्ति हूँगा, जिसकी क़ब्र क़ियामत के दिन खुलेगी। इसी तरह मैं पहला सिफ़ारिश करने वाला हूँगा और पहला व्यक्ति हूँगा, जिसकी सिफ़ारिश स्वीकार की जाएगी।"
इस आशय की आयतें और हदीसें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
2- दूसरा कारण यह है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सत्य के विपरीत कोई बात नहीं कहते। न तो जीवन काल में और न मृत्यु को प्राप्त होने के बाद। जबकि इस वसीयत में आपकी शरीअत के विरुद्ध बहुत-सी बातें मौजूद हैं। इसी प्रकार अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को केवल स्वप्न में ही देखा जा सकता है। जिसने आपको स्वप्न में आपकी असली शक्ल एवं सूरत में देखा, उसने आपको देखा। क्योंकि शैतान आपका रूप धारण नहीं कर सकता। यह बात एक सहीह हदीस में आई हुई है। लेकिन असल मामला देखने वाले के ईमान, सच्चाई, विश्वसनीयता, सही समझने और सही से याद रखने की क्षमता, दीनदारी और अमानतदारी का है। बात यह भी है कि क्या सच-मुच उसने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपकी असल शक्ल सूरत में देखा है या नहीं?
अगर आपके जीवन काल में कही हुई कोई बात भी अविश्वसनीय एवं कमज़ोर याद-दाश्त वाले वर्णनकर्ताओं की शृंखला से वर्णित हो, तो उसपर भरोसा नहीं किया जा सकता है, तथा उसे प्रमाण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। इसी तरह यदि कोई हदीस विश्वसनीय एवं याद रखने की क्षमता वाले वर्णनकर्ताओं की शृंखला से वर्णित हो, लेकिन किसी ऐसी हदीस के विरुद्ध हो, जिसे इनसे भी अधिक विश्वसनीय एवं याद रखने की क्षमता वाले वर्णनकर्ताओं ने नक़ल किया हो और दोनों के बीच सामंजस्य बिठाना संभव न हो, तो पहली हदीस को निरस्त माना जाएगा और दूसरी हदीस को निरस्त करने वाला। लेकिन अगर सामंजस्य बिठाने के साथ-साथ निरस्त होने का निर्णय लेना भी संभव न हो, तो याद रखने की कम क्षमता रखने वाले और कम विश्वसनीय वर्णनकर्ता की रिवायत को परे रख दिया जाएगा और उसके बारे में यह निर्णय लिया जाएगा कि यह विसंगति है, उसके अनुसार अमल नहीं किया जाएगा।
ऐसे में किसी ऐसी वसीयत का क्या हाल हो सकता है, जिसके बारे में पता ही न हो कि उसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से किसने नक़ल किया है? वह विश्वसनीय एवं अमानतदार है भी या नहीं? इस प्रकार की वसीयत में कोई शरीअत विरोधी बात न भी हो, तब भी उसपर ध्यान नहीं दिया जा सकता। तो उस वसीयत को तो छोड़ ही दीजिए, जिसके अंदर कही गई बहुत-सी बातें साफ़ तौर पर बताती हों कि वह झूठी है और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर उसकी निस्बत ग़लत है। उसमें एक ऐसा दीन खड़ा किया गया है, जिसकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है।
जबकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ قَالَ عَلَيَّ مَا لَمْ أَقُلْ؛ فَلْيَتَـبَوَّأْ مَقْعَدَهُ مِنَ النَّارِ».
"जिसने जान-बूझकर मुझपर झूठ बोला, वह अपना ठिकाना जहन्नम बना ले।"
इस वसीयत के लेखक ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का हवाला देकर ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं, जो आपने कही नहीं हैं। उसने आपके हवाले से स्पष्ट झूठी बातें लिखी हैं। इसलिए वह इस हदीस में दी गई चेतावनी का बहुत ज़्यादा हक़दार है, अगर फ़ौरन तौबा न कर ले और लोगों को बता न दे कि उसने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का हवाला देकर झूठी बातें लिखी और फैलाई हैं। क्योंकि जिसने दीन का हवाला देकर ग़लत बात फैलाई, उसकी तौबा उस समय तक स्वीकार नहीं की जाएगी, जब तक लोगों के अंदर इस बात की घोषणा न कर दे कि वह अपने कहे हुए झूठ को वापस लेता है। क्योंकि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡتُمُونَ مَآ أَنزَلۡنَا مِنَ ٱلۡبَيِّنَٰتِ وَٱلۡهُدَىٰ مِنۢ بَعۡدِ مَا بَيَّنَّٰهُ لِلنَّاسِ فِي ٱلۡكِتَٰبِ أُوْلَٰٓئِكَ يَلۡعَنُهُمُ ٱللَّهُ وَيَلۡعَنُهُمُ ٱللَّٰعِنُونَ159 إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُواْ وَأَصۡلَحُواْ وَبَيَّنُواْ فَأُوْلَٰٓئِكَ أَتُوبُ عَلَيۡهِمۡ وَأَنَا ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ160﴾
"निःसंदेह जो लोग उसको छिपाते हैं जो हमने स्पष्ट प्रमाणों और मार्गदर्शन में से उतारा है, इसके बाद कि हमने उसे लोगों के लिए किताब में स्पष्ट कर दिया है, उनपर अल्लाह लानत करता है और सब लानत करने वाले उनपर लानत करते हैं। परंतु वे लोग जिन्होंने तौबा कर ली और सुधार कर लिया और खोलकर बयान कर दिया, तो ये लोग हैं जिनकी मैं तौबा स्वीकार करता हूँ और मैं ही बहुत तौबा क़बूल करने वाला, अत्यंत दयावान् हूँ।" [सूरा अल-बक़रा : 159, 160]।
इस आयत में पवित्र एवं महान अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया है कि जिसने कोई सत्य छुपाया, उसकी तौबा उस समय तक स्वीकार नहीं होगी, जब तक अपने आपको सुधार न ले और सब कुछ खोलकर बयान न कर दे। दरअसल अल्लाह ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रसूल बनाकर और उनपर एक संपूर्ण शरीअत उतारकर अपने बंदों को एक संपूर्ण दीन एवं परिपूर्ण नेमत दी है। अल्लाह ने आपको दुनिया से दीन को पूरा करने और सब कुछ खोल कर बयान कर देने के बाद ही उठाया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا...﴾
"...आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया तथा तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया...।" [सूरा अल-माइदा : 3]।
इस झूठी वसीयत का लेखक चौदहवीं सदी में पैदा हुआ, जो लोगों को एक नए दीन के मकड़जाल में फँसाना चाहता है, जिसका पालन करने वाला जन्नत जाएगा और जिससे मुँह मोड़ने वाला जहन्नम। वह अपनी इस झूठी वसीयत को क़ुरआन से भी महान एवं उत्कृष्ट दिखाना चाहता है। उसके अनुसार इसे लिखकर एक नगर से दूसरे नगर या एक स्थान से दूसरे स्थान भेजने वाले के लिए जन्नत में महल बनाया जाएगा और इसे लिखने एवं आगे भेजने से कतराने वाला क़ियामत के दिन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सिफ़ारिश से वंचित हो जाएगा। यह एक बदतरीन झूठ है, जो स्पष्ट रूप से बता देता है कि यह वसीयत झूठी है और इसे लिखने वाला एक बेशर्म इन्सान है। क्योंकि अगर किसी ने क़ुरआन को लिखा और उसे एक नगर से दूसरे नगर या एक स्थान से दूसरे स्थान भेजा, तो इतने मात्र से वह जन्नत में महल का हक़दार नहीं बन पाएगा, अगर वह क़ुरआन पर अमल नहीं करता है। तो फिर इस झूठी वसीयत को लिखने और उसे एक नगर से दूसरे नगर भेजने मात्र से इन्सान इसका हक़दार कैसे बन जाएगा? इसी तरह जिसने क़ुरआन को लिखने और उसे एक नगर से दूसरे नगर भेजने से गुरेज़ किया, वह इतने मात्र से अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सिफ़ारिश से वंचित नहीं हो जाएगा, अगर वह आप पर ईमान रखता और आपकी शरीअत का पालन करता हो। बस यही एक झूठ इस वसीयत के असत्य होने तथा इसके प्रकाशक के झूठे, बेशर्म, मूर्ख और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई शरीअत से उसके अनभिज्ञ एवं दूर होने को बताने के लिए काफ़ी है।
इस वसीयत के अंदर इसके अतिरिक्त भी कई अन्य बातें हैं, जो इसके असत्य एवं झूठे होने को प्रमाणित करती हैं। भले ही इसके लिखने वाले ने इसे सही दिखाने के लिए हज़ार क़समें खा ली हों, और भले ही झूठे होने की स्थिति में अपने लिए बड़ी भयानक यातना की बद-दुआ कर ली हो, उसकी इन क़समों एवं बद-दुआओं से उसकी यह वसीयत सही नहीं हो सकती। अल्लाह की क़सम, यह एक बदतरीन प्रकार का झूठ है। हम गवाह बनाते हैं पवित्र अल्लाह को, तथा हमारे साथ उपस्थित फ़रिश्तों को, और हमारे ये शब्द जितने मुसलमानों तक पहुँचेंगे उन सभों को, -इस दृढ़ विश्वास के साथ गवाह बनाते हैं कि एक दिन महान अल्लाह के सामने हमें उपस्थित होना है- यह कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हवाले से की गई यह वसीयत झूठी है। अल्लाह इस झूठ के लिखने वाले को रुस्वा करे और उसके साथ वही व्यवहार करे, जिसका वह हक़दार है।
अब तक जो कुछ आपने पढ़ा, उसके अतिरिक्त और भी बहुत-सी बातें हैं, जो इस वसीयत के असत्य होने पर मुहर लगाती हैं। जैसे :
1- उसके अंदर कहा गया है : "पिछले जुमा से इस जुमा तक एक लाख साठ हज़ार लोग इस्लाम धर्म का पालन किए बिना ही मर गए।" क्योंकि इस दावे का संबंध ग़ैब की बात जानने से है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु के बाद आप पर वह्य आने का सिलसिला बंद हो चुका है। वैसे, तो जीवन काल में भी आप ग़ैब का ज्ञान नहीं रखते थे, तो फिर मृत्यु के बाद इस तरह की बात कैसे कह सकते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿قُل لَّآ أَقُولُ لَكُمۡ عِندِي خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعۡلَمُ ٱلۡغَيۡبَ...﴾
"(ऐ नबी!) आप कह दें : मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, और न मैं परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान रखता हूँ...।" [सूरा अल-अनआम : 50]।
एक अन्य स्थान में फ़रमाया है :
﴿قُل لَّا يَعۡلَمُ مَن فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ ٱلۡغَيۡبَ إِلَّا ٱللَّهُ...﴾
"आप कह दें : अल्लाह के सिवा, आकाशों और धरती में जो भी है, ग़ैब (परोक्ष की बात) नहीं जानता...।" [सूरा अल-नम्ल : 65]।
सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«يُذَادُ رِجَالٌ عَنْ حَوْضِي يَوْمَ القِيَامَةِ، فَأَقُولُ: يَا رَبِّ! أَصْحَابِي أَصْحَابِي، فَيُقَالُ لِي: إِنَّكَ لَا تَدْرِي مَا أَحْدَثُوا بَعْدَكَ، فَأَقُولُ كَمَا قَالَ العَبْدُ الصَّالِحُ: ﴿وَكُنتُ عَلَيۡهِمۡ شَهِيدٗا مَّا دُمۡتُ فِيهِمۡۖ فَلَمَّا تَوَفَّيۡتَنِي كُنتَ أَنتَ ٱلرَّقِيبَ عَلَيۡهِمۡۚ وَأَنتَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ شَهِيدٌ﴾ [المائدة: 117]».
"क़ियामत के दिन कुछ लोगों को मेरे हौज़ से दूर हटा दिया जाएगा। यह देख मैं कहूँगा : ऐ अल्लाह! ये तो मेरे लोग हैं, ये तो मेरे लोग हैं? इस पर अल्लाह कहेगा : तुझे पता नहीं है कि इन लोगों ने तेरे बाद क्या-क्या किया। उस समय मैं वही कहूँगा, जो अल्लाह के नेक बंदे (यानी ईसा अलैहिस्सलाम) ने कहा था : {जब तक मैं उनके बीच रहा, उनपर गवाह रहा। फिर जब तूने मुझे उठा लिया तो तू ही उनसे अवगत रहा और तू हर चीज़ की पूरी सूचना रखता है।}" [सूरा अल-माइदा : 117]।
2- इसकी वसीयत के झूठ की पोल उसके इस वाक्य से भी खुलती है : "जो निर्धन व्यक्ति इसे लिखेगा, अल्लाह इस वसीयत की बरकत से उसे धनवान बना देगा। क़र्ज़ हो तो अल्लाह उतार देगा। गुनाह हो, तो उसे और उसके माता-पिता को क्षमा कर देगा।" यह एक बहुत बड़ा झूठ है, जो बताता है कि इसे लिखने वाला बेशर्मी की सारी हदें पार कर चुका है। क्योंकि यह तीन चीज़ें तो केवल पवित्र क़ुरआन को लिखने मात्र से भी प्राप्त नहीं होतीं, भला इस झूठी वसीयत को लिखने से कैसे प्राप्त हो सकती हैं?! दरअसल इसका लेखक लोगों को भ्रमित करके उन्हें इस वसीयत में अटका देना चाहता है कि इसे लिखते रहें, इसकी तथाकथित फ़ज़ीलत से चिपके रहें, उन कार्यों को छोड़ दें, जिन्हें करने का आदेश अल्लाह ने बंदों को दिया है और जिन्हें धन की प्राप्ति, क़र्ज़ की अदायगी और गुनाहों की क्षमा का साधन बनाया है। हम विफलता की ओर ले जाने वाली इन चीज़ों और इच्छा एवं शैतान के अनुसरण से अल्लाह की शरण माँगते हैं।
3- इस वसीयत के ग़लत होने का एक प्रमाण उसमें दर्ज यह वाक्य भी है: "जो इसे नहीं लिखेगा, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसका चेहरा काला करेगा।" यह भी एक बदतरीन झूठ एवं स्पष्ट प्रमाण है इस बात की कि यह वसीयत असत्य है और इसे लिखने वाला कोई झूठा इन्सान है। भला कोई समझदार ऐसा कैसे हो सकता है कि चौदह सदियों बाद पैदा होने वाले एक अज्ञान व्यक्ति द्वारा तैयार किए गए एक वसीयत को लिख कर बाँटे, जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हवाले से झूठ बोलता हो और कहता हो कि जो इसे लिख कर नहीं बाँटेगा, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसके चेहरे को काला करेगा और अगर किसी निर्धन ने उसे लिखकर बाँटा तो धनवान हो जाएगा, क़र्ज़ में डूबे हुए व्यक्ति ने यह काम किया, तो क़र्ज़ उतर जाएगा और उसके सारे गुनाह माफ़ हो जाएँगे!!
यह एक बहुत बड़ा मिथ्या आरोप है। प्रमाण एवं वास्तविकता दोनों बताते हैं कि इस प्रकार की बात करने वाला व्यक्ति झूठा, अल्लाह के प्रति दुस्साहस करने वाला और निर्लज्जता की सारी सीमाओं को पार करने वाला है। दुनिया में बेशुमार लोगों ने इसे लिख कर नहीं बाँटा फिर भी उनके चेहरे काले नहीं हुए। अनगिनत लोगों ने इसे बहुतों बार लिखकर बाँटा, लेकिन उनका क़र्ज़ अदा नहीं हुआ। वह आज भी निर्धन हैं। हम दिलों की गुमराहियों और गुनाहों के ज़ंग से अल्लाह की शरण माँगते हैं। ये ऐसी विशेषताएं और ऐसे प्रतिफल हैं, जो अल्लाह ने सबसे उत्कृष्ट ग्रंथ यानी क़ुरआन लिखने वाले को भी नहीं दिए। किसी झूठी एवं ग़लत-सलत बातों से भरी हुई वसीयत को लिखने वाले को कैसे दे सकता है?
4- इस वसीयत के असत्य एवं झूठे होने का एक प्रमाण उसका यह वाक्य भी है : "जो इस वसीयत को सच जानेगा, वह जहन्नम की यातना से मुक्ति पा लेगा और जो इसे झुठलाएगा, वह काफ़िर हो जाएगा।" यह भी एक बहुत बड़ा दुस्साहस और बदतरीन झूठ है। यह झूठा इन्सान तमाम लोगों से कहता है कि उसके झूठ को सच मान लें और दावा करता है कि इसके नतीजे में जहन्नम की यातना से मुक्ति मिल जाएगी। जबकि उसकी बात को झुठलाने वाला काफ़िर हो जाएगा। अल्लाह की क़सम, इस झूठे ने अल्लाह पर एक बहुत बड़ा झूठ बाँधा है, और बड़ी अनुचित बात कही है। काफ़िर तो इसकी पुष्टि करने वाले को होना चाहिए, झुठलाने वाले को नहीं। क्योंकि यह एक बेबुनियाद बात है। हम अल्लाह को गवाह बनाकर कहते हैं कि यह झूठ है और इसे लिखने वाला बहुत बड़ा झूठा है। उसकी मंशा शरीअत में ऐसी बातें दाख़िल करना है, जिनकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है। जबकि अल्लाह चौदह सौ साल पहले ही इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन दे चुका है। अतः अपने पाठकों एवं भाईयों से मेरा अनुरोध है कि सचेत रहें, इस प्रकार की झूठी बातों को हरगिज़ सच न मानें और इन्हें समाज में प्रचलित होने का अवसर न दें। क्योंकि सत्य एक नूर है। उसे ढूँढ निकालने में कोई परेशानी नहीं होती। सत्य को उसके प्रमाणों के साथ तलाश करें। जो बात समझ में न आए, उसे उलमा से पूछ लें। झूठे लोगों की क़समों के धोखे में न आएँ। इबलीस ने भी आपके पिता एवं माता यानी आदम एवं हव्वा के सामने क़समें खाई थीं और कहा था कि वह उनका शुभचिंतक है। जबकि वह सबसे बड़ा मक्कार एवं झूठा था। अल्लाह ने उस घटना को बयान करते हुए कहा है :
﴿وَقَاسَمَهُمَآ إِنِّي لَكُمَا لَمِنَ ٱلنَّٰصِحِينَ21﴾
"तथा उसने उन दोनों से क़सम खाकर कहा : निःसंदेह मैं तुम दोनों का निश्चित रूप से हितैषी हूँ।" [सूरा अल-आ'राफ़ : 21]।
अतः शैतान एवं उसके झूठे अनुयायियों से सावधान रहें। पथभ्रष्ट करने के लिए झूठी क़समें खाना, मिथ्या वचन देना और लच्छेदार बातें करना इनके चरित्र का हिस्सा है। हाँ, इस झूठे ने समाज के अंदर बुराइयों के आम होने की जो बात कही है, वह अपनी जगह पर सही है। ख़ुद क़ुरआन एवं हदीस ने भी इन बुराइयों से सावधान रहने को कहा है। हमारे लिए इन दोनों में लिखी हुई बातें ही काफ़ी हैं।
रही बात क़ियामत की निशानियों की, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों में सपष्ट रूप से उनका ज़िक्र हुआ है और कुछ निशानियों की ओर इशारा पवित्र क़ुरआन में भी किया गया है। इसलिए जिसे इनके बारे में जानना हो, उसे हदीस की किताबें, ज्ञान तथा ईमान वाले लेखकों की पुस्तकें पढ़नी चाहिए। हमें इस प्रकार के झूठे एवं फ़रेबी इन्सान की लिखी हुई चीज़ें पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। अल्लाह मुझे, आपको और तमाम मुसलमानों को शैतान की बुराई, गुमराही में डालने वालों के फ़ितने और अल्लाह के दुश्मनों के फ़रेब से बचाए, जो अल्लाह के नूर को अपनी फूँक से बुझाना चाहते हैं। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। क्योंकि अल्लाह अपने दीन की रक्षा करता रहेगा और उसे फलने-फूलने का अवसर देता रहेगा। चाहे यह बात अल्लाह के दुश्मनों को बुरी ही क्यों न लगे। दुआ है कि अल्लाह मुसलमानों के हालात ठीक कर दे, उनको सच्चे मार्ग पर चलाए, उसपर सुदृढ़ रखे और तमाम गुनाहों से तौबा करने का सुयोग प्रदान करे। निश्चय ही वह बहुत ज़्यादा तौबा ग्रहण करने वाला, दयावान एवं सब कुछ करने की शक्ति रखने वाला है। अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वह बेहतर काम बनाने वाला है। अल्लाह की तौफ़ीक़ के बिना न पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य की क्षमता।
तमाम प्रशंसाएँ अल्लाह की हैं, जो सारे संसार का रब है। दुरूद व सलाम हो अल्लाह के बंदे एवं रसूल पर, जो सच्चे एवं अमानतदार हैं। साथ ही उनके परिजनों, साथियों एवं क़ियामत के दिन तक उनका अनुसरण करने वालों पर भी।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
नवीं पुस्तिका:
जादू, ग़ैब की बात बताने और इससे संबंधित बातों के बारे में इस्लामी दृष्टिकोण(18)
समस्त प्रशंसा केवल अल्लाह के लिए है, तथा दया एवं शांति अवतरित हो उनपर जिनके पश्चात कोई नबी नहीं (आने वाला) है, स्तुतिगान के पश्चात:
यह देखते हुए कि इन दिनों जादू-टोना करने वाले कुछ लोग दिन प्रति दिन बढ़ते और कुछ नगरों में फैलते जा रहे हैं, जो चिकित्सा की जानकारी रखने का दावा करते हैं और जादू एवं ग़ैबदानी के दावे के ज़रिए इलाज करते हैं तथा इस तरह सीधे सादे आम लोगों को, जो शरीअत की समुचित जानकारी नहीं रखते, अपने छल का शिकार बना लेते हैं, मैं चाहता हूँ कि इस कार्य में निहित, जो अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश के विरोध पर आधारित है, इस्लाम तथा मुसलमानों की अपूर्णीय क्षति का उल्लेख कर दूँ।
अतः मैं अल्लाह से सहायता माँगते हुए अपनी बात का आरंभ करता हूँ। सबसे पहले यह बात ज़ेहन में रहे कि दवा-इलाज करने के जायज़ होने में किसी का कोई मतभेद नहीं है। सब लोग यह मानते हैं कि एक मुसलमान उपचार के लिए गुप्त रोगों, सर्जरी तथा मानसिक रोगों आदि के डॉक्टर के पास जा सकता है, जो उसकी बीमारी की पहचान करे और चिकित्सा विज्ञान के अनुसार वांछित वैध दवाओं से उसका इलाज करे। क्योंकि यह साधारण साधनों के प्रयोग का ही एक भाग है, और अल्लाह पर भरोसा के विपरीत नहीं है। क्योंकि अल्लाह ने जो भी रोग उतारा है, उसके साथ उसकी दवा भी उतारी है, यह और बात है कि कुछ लोगों के पास उसकी जानकारी होती है और कुछ लोगों के पास नहीं होती। हाँ, यह अच्छी तरह याद रहे कि अल्लाह ने किसी ऐसी चीज़ के अंदर बंदों के लिए शिफ़ा नहीं रखी है, जिसे उनके हक़ में अवैध घोषित किया हो।
अतः किसी रोगी के लिए यह जायज़ न होगा कि वह ग़ैब की बात जानने का दावा करने वाले काहिनों के पास जाए, उनसे अपने रोग की पहचान कराए और उनकी कही हुई बातों को सच मान ले। क्योंकि इस प्रकार के लोग या तो तुक्केबाज़ी से काम लेते हैं या फिर जिन्नात के सहयोग से काम करते हैं। जबकि यह लोग जब गैब की बात जानने का दावा करते हैं, तो कुफ़्र एवं पथभ्रष्टता के शिकार हो जाते हैं।
इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَتَى عَرَّافًا فَسَأَلَهُ عَنْ شَيْءٍ، لَمْ تُقْبَلْ لَهُ صَلَاةٌ أَرْبَعِينَ يَوْمًا».
"जिसने किसी गैब के बारे में बताने का दावा करने वाले के पास जाकर उससे कुछ पूछा, उसकी चालीस दिन की नमाज़ ग्रहण नहीं होगी।"
"जो किसी भविष्य की बात या दिल की बात बताने का दावा करने वाले के पास गया और उसकी कही हुई बात को सच माना, उसने उस धर्म का इनकार किया, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा गया है।"
«مَنْ أَتَى كَاهِنًا فَصَدَّقَهُ بِمَا يَقُولُ، فَقَدْ كَفَرَ بِمَا أُنْزِلَ عَلَى مُحَمَّدٍ ﷺ».
"जिस व्यक्ति ने किसी काहिन (ज्योतिषी) के पास जाकर (उससे कुछ पूछा और) उसकी कही हुई बात को सच माना, उसने उस दीन (धर्म) का इनकार किया जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरा है"।
इस हदीस को इमाम अबू दावूद, इमाम तिरमिज़ी, इमाम नसई और इमाम इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया है और इमाम हाकिम ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस हदीस को इन शब्दों के साथ सहीह कहा है :
«مَنْ أَتَى عَرَّافًا أَوْ كَاهِنًا فَصَدَّقَهُ بِمَا يَقُولُ، فَقَدْ كَفَرَ بِمَا أُنْزِلَ عَلَى مُحَمَّدٍ ﷺ».
"जो किसी गैब की बात के बारे में बताने का दावा करने वाले अथवा भविष्य की बात या दिल की बात बताने का दावा करने वाले के पास गया और उसकी कही हुई बात को सच माना, उसने उस धर्म का इनकार किया, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा गया है।"
तथा इमरान बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :
«لَيْسَ مِنَّا مَنْ تَطَيَّرَ أَوْ تُطُيِّرَ لَهُ، أَوْ تَكَهَّنَ أَوْ تُكُهِّنَ لَهُ، أَوْ سَحَرَ أَوْ سُحِرَ لَهُ، وَمَنْ أَتَى كَاهِنًا فَصَدَّقَهُ بِمَا يَقُولُ، فَقَدْ كَفَرَ بِمَا أُنْزِلَ عَلَى مُحَمَّدٍ ﷺ».
"वह व्यक्ति हममें से नहीं है, जिसने अपशगुन लिया अथवा जिसके लिए अपशगुन लिया गया, काहिन वाला काम किया या उसके लिए काहिन वाला काम किया गया, जादू किया या जादू करवाया। जिसने किसी भविष्य की बात या दिल की बात बताने का दावा करने वाले के पास जाकर उसकी बात को सच माना, उसने उस शरीअत का इनकार किया, जो मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर उतारी गई है।" इसे बज़्ज़ार ने जय्यिद सनद के साथ रिवायत किया है।
इन हदीसों के अंदर गैब बताने का दावा करने वालों, भविष्य की बात या दिल की बात बताने का दावा करने वालों तथा जादूगरों आदि के पास जाने, उनसे कुछ पूछने तथा उनकी कही हुई बात को सच मानने की मनाही के साथ-साथ इससे सावधान भी किया गया है।
अतः इन्सान को इस धोखे में नहीं पड़ना चाहिए कि उनकी कुछ बातें कभी-कभी सही निकल जाती हैं और उनके पास बड़ी संख्या में लोग आते हैं। क्योंकि यह लोग अज्ञानी हैं और लोगों को इनके धोखे में नहीं आना चाहिए। साथ ही यह कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इनके पास जाने, इनसे कुछ पूछने और इनकी बात को सच मानने से मना किया है। वैसे है भी यह बहुत ही बुरा, अनिष्टकर और कड़वे परिणामों वाला कार्य और इसे करने वाले लोग झूठे एवं दुश्चरित्र हुआ करते हैं।
इसी तरह इन हदीसों से भविष्य की बात या दिल की बात बताने का दावा करने वाले और जादूगर के काफ़िर होने का भी प्रमाण मिलता है। इसका कारण यह है कि यह दोनों लोग ग़ैब की बात जानने का दावा करते हैं और इस तरह का दावा करना कुफ़्र है। दूसरी बात यह है कि यह दोनों अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जिन्नात की सेवा लेते हैं तथा उनकी इबादत करते हैं, और ऐसा करना भी कुफ़्र एवं शिर्क है। इसी प्रकार उनके ग़ैब जानने के दावे को सच मानने वाला भी उन्हीं की तरह है। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस प्रकार के लोगों से अपना कोई संबंध न होने की बात कही है।
साथ ही इलाज के नाम पर इनके द्वारा किए जाने वाले पाखंडों, जैसे जादुई लकीरें खींचना तथा तहरीरें लिखना अथवा सीसा उंडेलना आदि को मान्यता देना भी जायज़ नहीं है। क्योंकि यह सारी चीज़ें गैब जानने का दवा करने एवं फ़रेब के दायरे में आती हैं और इन्हें मान्यता देना इन्हें करने वालों के असत्य एवं कुफ़्र पर आधारित कार्यों को बढ़ावा देने के दायरे में आता है।
इसी तरह किसी मुसलमान के लिए जायज़ नहीं है कि उनके पास जाकर उनसे यह पूछे कि अपने पुत्र अथवा रिश्तेदार की शादी किससे कराए या फिर उनसे यह जानने का प्रयास करे कि पति-पत्नी एवं उनके परिवारों के बीच प्रेम एवं सद्भाव रहेगा या शत्रुता एवं अलगाव पैदा हो जाएगा? क्योंकि इस तरह की बातें गैब के दायरे में आती हैं, जिन्हें पवित्र एवं महान अल्लाह के अतिरिक्त कोई नहीं जानता।
अतः शासनकर्ता एवं प्रशासन के लोग और अन्य जिनके पास शक्ति और अधिकार है उनका कर्तव्य है कि इस तरह के लोगों के पास जाने का सख़्ती से खंडन करें, और हाट-बाज़ारों में इस प्रकार का कुछ भी काम करने वालों को सख़्ती से रोकें तथा उनके पास जाने वालों को भी सख़्ती के साथ रोकें।
यही हाल जादू का है। जादू उन हराम कार्यों में से है, जो कुफ़्र पर आधारित हैं। अल्लाह तआला ने जादू सिखाने वाले दो फ़रिश्तों का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया है :
﴿...وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنۡ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَآ إِنَّمَا نَحۡنُ فِتۡنَةٞ فَلَا تَكۡفُرۡۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنۡهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِۦ بَيۡنَ ٱلۡمَرۡءِ وَزَوۡجِهِۦۚ وَمَا هُم بِضَآرِّينَ بِهِۦ مِنۡ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذۡنِ ٱللَّهِۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمۡ وَلَا يَنفَعُهُمۡۚ وَلَقَدۡ عَلِمُواْ لَمَنِ ٱشۡتَرَىٰهُ مَا لَهُۥ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنۡ خَلَٰقٖۚ وَلَبِئۡسَ مَا شَرَوۡاْ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمۡۚ لَوۡ كَانُواْ يَعۡلَمُونَ﴾
"हालाँकि वे दोनों किसी को भी नहीं सिखाते थे, यहाँ तक कि कह देते कि हम केवल एक आज़माइश हैं, इसलिए तू कुफ़्र न कर। फिर वे उन दोनों से वह चीज़ सीखते, जिसके द्वारा वे आदमी और उसकी पत्नी के बीच जुदाई डाल देते। और वे अल्लाह की अनुमति के बिना उसके द्वारा किसी को हानि पहुँचाने वाले न थे। और वे ऐसी चीज़ सीखते थे, जो उन्हें हानि पहुँचाती और उन्हें लाभ न देती थी। हालाँकि निःसंदेह वे भली-भाँति जान चुके थे कि जिसने इसे ख़रीदा, आख़िरत में उसका कोई भाग नहीं। और निःसंदेह बुरी है वह चीज़ जिसके बदले उन्होंने अपने आपको बेच डाला। काश! वे जानते होते।" [सूरह अल-बक़रा : 102]।
इन हदीसों से स्पष्ट रूप से मालूम होता है कि जादू कुफ़्र है और जादूगर पति-पत्नी के बीच अलगाव पैदा करने का काम करते हैं। इसी तरह इनसे यह भी मालूम होता है कि जादू स्वयं प्रभावकारी नहीं है। न वह किसी का भला कर सकता है, न बुरा। उसका प्रभाव अल्लाह की नियत अनुमति पर निहित है। क्योंकि पवित्र एवं महान अल्लाह ही भलाई एवं बुराई का स्रष्टा है।
इसी तरह इन आयतों से यह बात भी मालूम हुई कि जादू सीखने वाले जो कुछ सीखते हैं, वह उनके लिए लाभदायक नहीं, बल्कि हानिकारक है और इस प्रकार के लोगों का अल्लाह के निकट कोई भाग नहीं है। दरअसल यह एक बहुत बड़ी चेतावनी है, जो यह बताती है कि इस प्रकार के लोग दुनिया एवं आख़िरत में घाटे में रहेंगे और इन्होंने स्वयं का सौदा कौड़ी के भाव में कर लिया है। यही कारण है कि पवित्र एवं महान अल्लाह ने उनके इस सौदे की निंदा करते हुए कहा है :
﴿...وَلَبِئۡسَ مَا شَرَوۡاْ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمۡۚ لَوۡ كَانُواْ يَعۡلَمُونَ﴾
"...और निःसंदेह बुरी है वह चीज़ जिसके बदले उन्होंने अपने आपको बेच डाला। काश! वे जानते होते।" [सूरह अल-बक़रा: 102]।
याद रहे कि यहाँ आयत में प्रयुक्त शब्द "अश-शराउ" बेचने के अर्थ में आया है।
लेकिन आज शरीअत को प्रदूषित करने वाले इन पापियों के कारण, जिन्होंने मुश्रिकों से इन आडंबरों को सीखा है और इनके ज़रिए आम लोगों को पथभ्रष्ट किया है, मामला काफ़ी संगीन हो चुका है और हालात काफ़ी बिगड़ चुके हैं।
हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि वह हमें जादूगरों, ग़ैब का दावा करने वालों और सभी छल एवं फरेब से काम लेने वालों की बुराई से सुरक्षित रखे, मुसलमानों को उनकी बुराई से बचाए, मुस्लिम शासकों को उनसे सावधान रहने और उनके बारे में अल्लाह के आदेश को लागू करने का सुयोग प्रदान करे कि लोग उनकी हानि और कुकर्मों से सुरक्षित रहें। निश्चय ही वह दाता एवं दयावान है।
पवित्र एवं महान अल्लाह की दया एवं उपकार ही का नतीजा है कि उसने बंदों को जादू से बचाव का तरीक़ा भी बता दिया है और उसके उपचार की पद्धति भी।
अब आइए जादू के कुप्रभाव से बचाव और जादू किए हुए व्यक्ति के उपचार के कुछ जायज़ तरीक़े बताते हैं, जो स्वयं अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताए हैं। जिसका विवरण निम्नलिखित है:
1- इस सिलसिले का आरंभ जादू का कुप्रभाव होने से पहले उससे बचाव के तरीक़ों से करते हैं। इसका सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक तरीका यह है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित शरई अज़कार, दुआओं तथा अल्लाह की शरण लेने पर आधारित वाक्यों का सहारा लिया जाए। मसलन हर फ़र्ज़ नमाज़ से सलाम फेरने तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बताए हुए अज़कार पढ़ने के बाद आयत अल-कुरसी पढ़ी जाए, जो कि क़ुरआन की सबसे महान आयत है। उसके शब्द हैं :
﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُۚ لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِۦۚ يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيۡءٖ مِّنۡ عِلۡمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَۚ وَسِعَ كُرۡسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفۡظُهُمَاۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ255﴾
"अल्लाह (वह है कि) उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। (वह) जीवित है, हर चीज़ को सँभालने (क़ायम रखने) वाला है। न उसे कुछ ऊँघ पकड़ती है और न नींद। उसी का है जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) करे? वह जानता है जो कुछ उनके सामने और जो कुछ उनके पीछे है। और वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ को (अपने ज्ञान से) नहीं घेर सकते, परंतु जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाशों और धरती को व्याप्त है और उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। और वही सबसे ऊँचा, सबसे महान है।" [अल-बक़रा : 255]।
इसी तरह सोते समय उसे पढ़ा जाए। एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ قَرَأَ آيَةَ الْكُرْسِيِّ فِي لَيْلَةٍ، لَمْ يَزَلْ عَلَيْهِ مِنَ اللَّهِ حَافِظٌ، وَلَا يَقْرَبُهُ شَيْطَانٌ حَتَّى يُصْبِحَ».
"जिसने रात में आयत अल-कुर्सी पढ़ ली, अल्लाह की ओर से एक सुरक्षाकर्मी उसके लिए नियुक्त होता है और सुबह तक शैतान उसके निकट नहीं जाता।"
जादू से बचाए रखने वाली चीज़ों में से इन को भी पढ़ना चाहिए :
﴿قُلۡ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ1﴾
"(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है।"
﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلۡفَلَقِ1﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के पालनहार की शरण लेता हूँ।"
﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ1﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के पालनहार की।" [सूरह अन्-नास : 1]।
हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद एक-एक बार तथा दिन के आरंभ में फ़ज्र की नमाज़ के बाद और रात के आरंभ में मग़्रिब की नमाज़ के बाद एवं सोते समय तीन-तीन बार पढ़ना भी शामिल है।
इसी तरह इसमें सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतों को रात के प्रथम भाग में पढ़ना भी शामिल है। यह दोनों आयतें इस प्रकार हैं :
﴿ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّن رُّسُلِهِۦۚ وَقَالُواْ سَمِعۡنَا وَأَطَعۡنَاۖ غُفۡرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيۡكَ ٱلۡمَصِيرُ285﴾
"रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनकी तरफ़ उनके पालनहार की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले भी। हर एक अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी पुस्तकों और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (वे कहते हैं) हम उसके रसूलों में से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते। और उन्होंने कहा हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। हम तेरी क्षमा चाहते हैं ऐ हमारे पालनहार! और तेरी ही ओर लौटकर जाना है।" यहाँ से सूरा के अंत तक पढ़ना है।
क्योंकि एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ قَرَأَ الآيَتَيْنِ مِنْ آخِرِ سُورَةِ البَقَرَةِ فِي لَيْلَةٍ كَفَتَاهُ».
"जिसने सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें रात में पढ़ लीं, वह उसके लिए काफ़ी हो जाती हैं।"
इसका अर्थ यह है -और अल्लाह बेहतर जानता है-: कि यह दोनों आयतें हर बुराई से बचाव के लिए पर्याप्त होंगी। इसी प्रकार रात एवं दिन में अधिक से अधिक (अल्लाह के संपूर्ण शब्दों द्वारा उसकी पैदा की हुई चीज़ों की बुराई से) पनाह माँगे। साथ ही किसी आबादी वाले क्षेत्र, गैरआबाद इलाक़े, आकाश एवं समुद्र के किसी स्थान में रुकते समय भी ऐसा करे। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَن نَزَلَ مَنْزِلًا فَقالَ: أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللهِ التَّامَّاتِ مِن شَرِّ ما خَلَقَ، لَمْ يَضُرَّهُ شَيءٌ حتَّى يَرْتَحِلَ مِن مَنْزِلِهِ ذَلِكَ».
"जिसने किसी स्थान में उतरते समय यह दुआ पढ़ी : "मैं अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ों की बुराई से उसके संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ", उसे कोई वस्तु वह स्थान छोड़ने तक नुक़सान नहीं पहुँचा सकती।"
इसी तरह जादू के कुप्रभाव से बचाव का एक तरीका यह है कि मुसलमान दिन एवं रात के आरंभिक भाग में तीन बार यह दुआ पढ़े :
«بِسْمِ اللهِ الَّذِي لَا يَضُرُّ مَعَ اسْمِهِ شَيءٌ فِي الأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاءِ، وَهُوَ السَّمِيعُ العَلِيمُ».
"शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ धरती और आकाश में कोई वस्तु हानि नहीं पहुँचा सकती तथा वह सब कुछ सुनने वाला और सब कुछ जानने वाला है।"
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक सहीह हदीस में इसकी प्रेरणा दी है और बताया है कि यह हर बुराई से सुरक्षा प्राप्त होने का कारण है।
2- वह चीज़ें जिनके द्वारा जादू हो जाने के बाद जादू का इलाज किया जा सकता है। यह चीज़ें कई हैं :
क- अल्लाह से गिड़गिड़ाना, उससे दुआ करना कि क्षति एवं परेशानी को दूर करदे।
ख- उस भूमि अथवा पहाड़ आदि का पता लगाने का प्रयास करना, जहाँ वह वस्तुएँ रखी हुई हैं, जिनके द्वारा जादू किया गया है। यदि स्थान का पता लगा लिया जाए और उन चीज़ों को निकालकर नष्ट कर दिया जाए, तो जादू का प्रभाव खत्म हो जाता है। यह जादू के इलाज का एक बहुत ही लाभकारी तरीक़ा है।
ग- शरई अज़कार द्वारा झाड़-फूँक करना। इस प्रकार के अज़कार बड़ी संख्या में मौजूद हैं। जैसे -
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित यह दुआ :
«اللَّهُمَّ رَبَّ النَّاسِ، أَذْهِبِ الْبَأْسَ، وَاشْفِ أَنْتَ الشَّافِي، لَا شِفَاءَ إِلَّا شِفَاؤُكَ، شِفَاءً لَا يُغَادِرُ سَقَمًا»
"ऐ अल्लाह, लोगों के रब! कष्ट दूर कर दे तथा रोग से मुक्ति प्रदान कर। तू ही रोग से मुक्ति प्रदान करता है। तेरे सिवा कोई रोग से मुक्ति प्रदान करने वाला नहीं है। रोग से ऐसा छुटकारा प्रदान कर कि फिर कोई रोग शेष न रहे।"
इस दुआ को तीन बार पढ़े।
इस शृंखला की एक कड़ी वह दुआ भी है, जिसके द्वारा जिबरील अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दम किया था। उसके शब्द हैं :
«بِسْمِ اللَّهِ أَرْقِيكَ، مِنْ كُلِّ شَيْءٍ يُؤْذِيكَ، وَمِنْ شَرِّ كُلِّ نَفْسٍ أَوْ عَيْنِ حَاسِدٍ، اللَّهُ يَشْفِيكَ، بِسْمِ اللَّهِ أَرْقِيكَ»
"अल्लाह का नाम लेकर मैं तुम पर दम करता हूँ, तुम्हें कष्ट देने वाली प्रत्येक वस्तु से, प्रत्येक प्राणी की बुराई से अथवा ईर्ष्या करने वाली हर आँख से। अल्लाह तुम्हें आरोग्य प्रदान करे। अल्लाह का नाम लेकर मैं तुमपर दम करता हूँ।"
इसे भी तीन बार पढ़ा जाए।
इसी तरह, जादू के कारण जब कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से संभोग करने की क्षमता खो बैठे, तो उसका एक लाभकारी इलाज यह है कि आदमी बेरी के सात हरे पत्ते ले, उन्हें पत्थर आदि द्वारा पीसकर एक बर्तन में रख दे और उसमें स्नान के लिए पर्याप्त पानी डाल दे और उसमें निम्नलिखित आयतों और सूरतों को पढ़ ले :
आयत अल-कुर्सी
﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلۡكَٰفِرُونَ1﴾
"(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ काफ़िरो!" [सूरह अल-काफ़िरून : 1]। और
﴿قُلۡ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ1﴾
"(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है।" [सूरह इखलास : 1]।
और
﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلۡفَلَقِ1﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के पालनहार की शरण लेता हूँ।" [सूरह फ़लक़ : 1]।
और
﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ1﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के पालनहार की।" [सूरह अन्-नास: 1]।
तथा सूरा आराफ़ की जादू से संबंधित आयतें, जो इस प्रकार हैं :
﴿وَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنۡ أَلۡقِ عَصَاكَۖ فَإِذَا هِيَ تَلۡقَفُ مَا يَأۡفِكُونَ117 فَوَقَعَ ٱلۡحَقُّ وَبَطَلَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ118 فَغُلِبُواْ هُنَالِكَ وَٱنقَلَبُواْ صَٰغِرِينَ119﴾
"और हमने मूसा को वह़्य की कि अपनी लाठी फेंको, तो अचानक वह उन चीज़ों को निगलने लगी, जो वे झूठ-मूठ बना रहे थे। अतः सत्य सिद्ध हो गया और जो कुछ वे कर रहे थे, व्यर्थ होकर रह गया। अंततः वे उस जगह पराजित हो गए और अपमानित होकर लौटे।" [सूरह अल-आराफ़: 117-119]।
सूरा यूनुस की आयतें, जिनमें सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿وَقَالَ فِرۡعَوۡنُ ٱئۡتُونِي بِكُلِّ سَٰحِرٍ عَلِيمٖ79 فَلَمَّا جَآءَ ٱلسَّحَرَةُ قَالَ لَهُم مُّوسَىٰٓ أَلۡقُواْ مَآ أَنتُم مُّلۡقُونَ80 فَلَمَّآ أَلۡقَوۡاْ قَالَ مُوسَىٰ مَا جِئۡتُم بِهِ ٱلسِّحۡرُۖ إِنَّ ٱللَّهَ سَيُبۡطِلُهُۥٓ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُصۡلِحُ عَمَلَ ٱلۡمُفۡسِدِينَ81 وَيُحِقُّ ٱللَّهُ ٱلۡحَقَّ بِكَلِمَٰتِهِۦ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡمُجۡرِمُونَ82﴾
"और फ़िरऔन ने कहा : हर कुशल जादूगर को मेरे पास लेकर आओ। फिर जब जादूगर आ गए, तो मूसा ने उनसे कहा : जो कुछ तुम फेंकने वाले हो, फेंको। फिर जब उन्होंने फेंक दिया, तो मूसा ने कहा : तुम जो कुछ लाए हो, वह तो जादू है। निश्चय ही अल्लाह उसे शीघ्र ही निष्फल कर देगा। निःसंदेह अल्लाह बिगाड़ पैदा करने वालों के कर्म नहीं सुधारता। और अल्लाह सत्य को, अपने आदेशों से, सत्य कर दिखाता है, यद्यपि अपराधियों को बुरा लगे।" [सूरा यूनुस : 79-82]।
और सूरा ताहा की निम्नलिखित आयतें :
﴿قَالُواْ يَٰمُوسَىٰٓ إِمَّآ أَن تُلۡقِيَ وَإِمَّآ أَن نَّكُونَ أَوَّلَ مَنۡ أَلۡقَىٰ65 قَالَ بَلۡ أَلۡقُواْۖ فَإِذَا حِبَالُهُمۡ وَعِصِيُّهُمۡ يُخَيَّلُ إِلَيۡهِ مِن سِحۡرِهِمۡ أَنَّهَا تَسۡعَىٰ66 فَأَوۡجَسَ فِي نَفۡسِهِۦ خِيفَةٗ مُّوسَىٰ67 قُلۡنَا لَا تَخَفۡ إِنَّكَ أَنتَ ٱلۡأَعۡلَىٰ68 وَأَلۡقِ مَا فِي يَمِينِكَ تَلۡقَفۡ مَا صَنَعُوٓاْۖ إِنَّمَا صَنَعُواْ كَيۡدُ سَٰحِرٖۖ وَلَا يُفۡلِحُ ٱلسَّاحِرُ حَيۡثُ أَتَىٰ69﴾
"उन्होंने कहा : ऐ मूसा! या तो तुम फेंको या यह कि हम पहले फेंकने वाले हो जाएँ। (मूसा ने) कहा : बल्कि तुम्हीं फेंको। फिर उनकी रस्सियाँ तथा लाठियाँ, उसकी कल्पना में आता था कि उनके जादू के कारण सचमुच दौड़ रही हैं। तो मूसा ने अपने मन में एक डर महसूस किया। हमने कहा : डरो मत, निश्चित रूप से तू ही प्रबल होगा। और फेंक दे, जो तेरे दाहिने हाथ में है, वह निगल जाएगा जो कुछ उन्होंने रचा है। निःसंदेह उन्होंने जो कुछ रचा है, वह जादूगर की चाल है और जादूगर जहाँ भी आए, सफल नहीं होता।" [सूरह ताहा: 65-69]।
इन सारी आयतों को पानी पर पढ़ने के बाद उसमें से तीन घूँट पानी पी ले और शेष पानी से स्नान कर ले। इससे अल्लाह ने चाहा तो परेशानी ख़त्म हो जाएगी। यदि आवश्यकता हो तो ऐसा दो या उससे अधिक बार भी परेशानी दूर होने तक किया जा सकता है।
ये अज़कार, अल्लाह की शरण माँगने के शब्द और इलाज के तरीके़ जादू की बुराई तथा अन्य बुराइयों से सुरक्षा के बड़े महत्वपूर्ण साधन हैं। साथ ही जादू हो जाने पर उसे दूर करने का सबसे बड़ा हथियार हैं, यदि सच्चे मन, विशुद्ध ईमान, अल्लाह पर भरोसा और उन शब्दों के अंदर कही गई बातों पर विश्वास के साथ उन्हें पढ़ा जाए तथा उनपर अमल किया जाए।
ये, जादू से बचाव और उसके उपचार से संबंधित कुछ बातें हैं, जो अल्लाह की अनुमति से फ़िलहाल बयान की जा सकी हैं और सुयोग प्रदान तो वही करता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण मसला सामने आता है। मसला है जादू का उपचार जादू के ज़रिए करने का, यानी जिन्नात को प्रसन्न करने के लिए जानवर ज़बह करने या चढ़ावा चढ़ाने का। तो याद रहे कि इसकी अनुमति नहीं है। क्योंकि यह शैतान का अमल, बल्कि महा शिर्क है। इसी तरह उसका इलाज भविष्य की बात या दिल की बात बताने का दावा करने वालों, गैब का दावा करने वालों तथा हाथ की सफाई और नज़रबंदी का करतब दिखाने वालों, द्वारा करवाने और उनके बताए हुए उपचार पद्धति का प्रयोग करने की भी अनुमति नहीं है। क्योंकि एक तो यह लोग अल्लाह पर ईमान नहीं रखते और दूसरे यह कि ग़ैब की बात जानने का दावा करते हैं, और लोगों को फ़रेब में डालते हैं। यही कारण है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनके पास जाने, उनसे कुछ पूछने और उनकी बताई हुई बात को सच मानने से मना किया है, जिसका उल्लेख इस पुस्तिका के आरंभ में हो चुका है। अतः इस तरह की चीज़ों से सावधान रहना ज़रूरी है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह हदीस में है कि आपसे जादू के द्वारा जादू के उपचार के बारे में पूछा गया, तो आपने फ़रमाया :
«هِيَ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ».
"यह एक शैतानी कार्य है।" इस हदीस को इमाम अहमद एवं इमाम अबू दावूद ने जय्यिद सनद के साथ रिवायत किया है।
इस हदीस में आए हुए शब्द "अन-नुशरह" का अर्थ है, जादू से प्रभावित व्यक्ति से जादू के असर को ख़त्म करना। इस हदीस से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मुराद जादू का असर ख़त्म करने का वह तरीक़ा है, जो अज्ञान काल के लोगों में रायज था, यानी स्वयं जादू करने वाले के द्वारा जादू का प्रभाव ख़त्म करवाना या फिर किसी दूसरे जादूगर की मदद से जादू के द्वारा ही उसके असर को ख़त्म करना।
अब रहा प्रश्न शरई झाड़-फूँक और वैध दवाओं एवं उपचार के ज़रिए उसके इलाज का, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है, जैसा कि पीछे बयान किया जा चुका है। यह बात स्पष्ट रूप से महान इस्लामिक विद्वान इब्न-अल-क़य्यिम ने तथा एक और विद्वान अब्दुर रहमान बिन हसन ने अपनी किताब "फ़त्ह अल-मजीद" में कही है। इसी तरह अन्य विद्वानों ने भी इसका उल्लेख किया है।
दुआ है कि अल्लाह मुसलमानों को हर बुराई से बचाए, उनके धर्म की सुरक्षा करे, उन्हें धर्म का विशुद्ध ज्ञान प्रदान करे तथा उन्हें शरीअत विरोधी हर काम से बचाए।
दुरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिवार और तमाम साथियों पर।
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بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
दसवीं पुस्तिका:
क़ब्रों पर मस्जिद बनाने से चेतावनी
अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, दुरूद एवं सलाम हो अल्लाह के रसूल पर।
अब मूल विषय पर आते हैं। मुझे सूचना मिली कि इस्लामी शास्त्र लीग की पत्रिका के तीसरे अंक के मुसलमानों की ख़बरों के भाग में प्रकाशित हुआ है कि जॉर्डन की इस्लामी शास्त्र लीग उस गुफा के ऊपर एक मस्जिद बनाने का इरादा रखती है, जो हाल ही में अल-रहीब नामी एक गाँव में खोज निकाली गई है। कहा जाता है कि यह वही गुफा है, जिसके अंदर वह गुफा वाले (अस्हाब-ए-कह्फ) सोए हुए थे, जिनका ज़िक्र क़ुरआन में हुआ है।
चूँकि मुसलमानों का शुभचिंतन एक अनिवार्य कार्य है, इसलिए मैंने उचित समझा कि जॉर्डन के इस्लामी शास्त्र लीग की उसी पत्रिका में कुछ बातें प्रस्तुत कर लीग को उक्त गुफा पर मस्जिद बनाने के संबंध में उचित मार्गदर्शन दिया जाए। क्योंकि नबियों एवं सदाचारी लोगों की क़ब्रों पर मस्जिद बनाने से शरीअत ने मना एवं सावधान किया है और ऐसा करने वाले पर लानत की है। कारण यह है कि यह कार्य शिर्क एवं नबियों के बारे में अतिशयोक्ति की ओर ले जाता है। वस्तुस्थिति भी यही कहती है कि इस संबंध में शरीअत ने जो कहा है वह बिल्कुल सही है, यह एक आकाशीय शरीअत है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई सारी शिक्षाएँ सच्ची हैं। इस्लामी दुनिया के हालात और उसमें मज़ारों पर मस्जिद के निर्माण, उनके सम्मान, उनको पुख़्ता एवं सुंदर बनाने तथा मुजाविर नियुक्त करने के कारण फैले हुए शिर्क एवं अतिशयोक्ति पर जो भी ग़ौर करेगा, उसे विश्वास हो जाएगा कि यह चीज़ें निश्चित रूप से शिर्क की ओर ले जाती हैं। यह इस्लामी शरीअत की एक बड़ी ख़ूबी है कि उसने इन चीज़ों से मना एवं सावधान किया है।
इस संबंध में जो हदीसें आई हैं, उनमें से एक सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है। वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَعَنَ اللَّهُ الْيَهُودَ وَالنَّصَارَى، اتَّخَذُوا قُبُورَ أَنْبِيَائِهِمْ مَسَاجِدَ، قالَتْ عَائِشَةُ: يُحَذِّرُ مَا صَنَعُوا، قالَتْ: وَلَوْلَا ذَلِكَ لَأُبْرِزَ قَبْرُهُ، غَيْرَ أَنَّهُ خُشِيَ أَنْ يُتَّخَذَ مَسْجِدًا».
"यहूदियों और ईसाइयों पर अल्लाह की धिक्कार है। उन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों को मस्जिद बना लिया।"
आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा कहती हैं : आप दरअसल उनके इस कृत्य से सावधान कर रहे थे। वह आगे कहती हैं : यदि ऐसा न होता, तो आपकी क़ब्र बाहर बनाई जाती। आपको इस बात का डर था कि कहीं उसे मस्जिद न बना लिया जाए। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम ही में है कि उम्म-ए-सलमा एवं उम्म-ए-हबीबा रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने हबशा में देखे हुए एक चर्च तथा उसकी तस्वीरों का ज़िक्र किया, तो आपने कहा :
«أُولَئِكَ إِذَا مَاتَ فِيهِمُ الرَّجُلُ الصَّالِحُ؛ بَنَوْا عَلَى قَبْرِهِ مَسْجِدًا، وَصَوَّرُوا فِيهِ تِلْكَ الصُّوَرَ، أُولَئِكَ شِرَارُ الْخَلْقِ عِنْدَ اللَّهِ».
"उन लोगों के अंदर जब कोई सदाचारी व्यक्ति मर जाता, तो उसकी कब्र के ऊपर मस्जिद बना लेते और उसमें वह चित्र बना देते। वे अल्लाह के निकट सबसे बुरे लोग हैं।"
सहीह मुस्लिम में जुन्दुब बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपकी मृत्यु से पाँच दिन पहले कहते हुए सुना है :
«إِنِّي أَبْرَأُ إِلَى اللَّهِ أَنْ يَكُونَ لِي مِنْكُمْ خَلِيلٌ، فَإِنَّ اللَّهَ قَدِ اتَّخَذَنِي خَلِيلًا، كَمَا اتَّخَذَ إِبْرَاهِيمَ خَلِيلًا، وَلَوْ كُنْتُ مُتَّخِذًا مِنْ أُمَّتِي خَلِيلًا، لَاتَّخَذْتُ أَبَا بَكْرٍ خَلِيلًا، أَلَا وَإِنَّ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ كَانُوا يَتَّخِذُونَ قُبُورَ أَنْبِيَائِهِمْ وَصَالِحِيهِمْ مَسَاجِدَ، أَلَا فَلَا تَتَّخِذُوا الْقُبُورَ مَسَاجِدَ، فَإِنِّي أَنْهَاكُمْ عَنْ ذَلِكَ».
"मैं अल्लाह के यहाँ इस बात से बरी होने का एलान करता हूँ कि तुममें से कोई मेरा 'ख़लील' (अनन्य मित्र) हो। क्योंकि अल्लाह ने जैसे इब्राहीम को 'ख़लील' बनाया था, वैसे मुझे भी 'ख़लील' बना लिया है। हाँ, अगर मैं अपनी उम्मत के किसी व्यक्ति को 'ख़लील' बनाता, तो अबू बक्र को बनाता। सुन लो, तुमसे पहले के लोग अपने नबियों की क़ब्रों को मस्जिद बना लिया करते थे। सुन लो, तुम कब्रों को मस्जिद न बनाना। मैं तुम्हें इससे मना करता हूँ।"
इस आशय की हदीसें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
इस्लामी इमामों, जिसमें चारों पंथों के उलमा भी शामिल हैं, ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत पर अमल करते हुए, उम्मत के लिए शुभचिंतन से काम लेते हुए और उसे इस बात से सचेत करते हुए कि कहीं वह भी उसी चीज़ में संलिप्त न हो जाए, जिसमें यहूदी, ईसाई तथा इन जैसी अन्य क़ौमें संलिप्त हो चुकी हैं, स्पष्ट रूप से क़ब्रों के ऊपर मस्जिद बनाने से मना एवं सावधान किया है।
अतः इस्लामी शास्त्र लीग जॉर्डन तथा अन्य तमाम मुसलमानों को चाहिए कि सुन्नत पर अमल करें, इमामों के मार्ग पर चलें और उन तमाम चीज़ों से बचें जिनसे अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सावधान किया है। इसमें दुनिया एवं आख़िरत में बंदों की भलाई, खुशी और मोक्ष निहित है। ध्यान देने योग्य है कि कुछ लोगों ने इस संबंध में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के इस कथन से दलील बनाने का प्रयास किया है, जो गुफ़ा वालों के बारे में आया है :
﴿...قَالَ ٱلَّذِينَ غَلَبُواْ عَلَىٰٓ أَمۡرِهِمۡ لَنَتَّخِذَنَّ عَلَيۡهِم مَّسۡجِدٗا﴾
"...जो लोग उनके मामले में प्रभावी रहे, उन्होंने कहा : हम तो उन (की गुफा के स्थान) पर अवश्य एक मस्जिद बनाएँगे।" [सूरा अल-कह्फ़ : 21]।
लेकिन इसका जवाब यह है कि अल्लाह ने उस समय के शासकों और सत्ताधारी लोगों के बारे में बताया है कि उन्होंने यह बात कही थी। अल्लाह ने उनकी इस बात को नक़ल उससे अपनी पसंदीदगी व्यक्त करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी निंदा और उससे नफ़रत दिलाने के लिए की है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, जिनपर यह आयत उतरी थी और इस आयत की व्याख्या से सबसे अधिक अवगत थे, ने क़ब्रों पर मस्जिद बनाने से मना किया और इससे सावधान किया है, ऐसा करने वाले पर लानत एवं उसकी निंदा की है।
अगर यह कार्य जायज़ होता, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इसके बारे में इतना कठोर रवैया न अपनाते, इसमें संलिप्त होने पर लानत न करते और उसे अल्लाह के निकट सबसे बुरी सृष्टि न बताते। यहाँ जो कुछ बता दिया गया है, वह सत्य की खोज में लगे हुए व्यक्ति के लिए काफ़ी है। अगर मान भी लें कि क़ब्रों पर मस्जिद बनाने का काम हमसे पहले की शरीअतों में जायज़ था, तब भी उनका अनुसरण करते हुए हमारे लिए ऐसा करना जायज़ नहीं होगा। क्योंकि हमारी शरीअत ने पिछली शरीअतों को निरस्त कर दिया है, हमारे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रसूलों के सिलसिले की अंतिम कड़ी हैं और आपकी शरीअ संपूर्ण एवं व्यापक शरीअत है। इसलिए जब आपने हमें क़ब्रों पर मस्जिद बनाने से मना कर दिया, तो हमारे लिए यह जायज़ नहीं होगा। हमें आपका अनुसरण करना है। आपकी शिक्षाओं को पकड़े रहना है। पिछली शरीअतों की इसके विपरीत बातों एवं रीति-रिवाजों से दूर रहना है। क्योंकि अल्लाह की शरीअत से कोई संपूर्ण शरीअत नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े से कोई सुंदर तरीक़ा नहीं है।
दुआ है कि अल्लाह हमें और तमाम मुसलमानों को अपने दीन पर मज़बूती से जमे रहने और अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत को थामे रहने का सुयोग प्रदान करे। हमारे कथन एवं कार्य इसी के अनुरूप हों। हमारा अंदर और बाहर इसी रंग में रंगा हुआ हो। हमारे तमाम मामलात इसी खाँचे में बैठते हों। निश्चय ही अल्लाह सब की सुनने वाला और सबसे निकट है।
दुरूद व सलाम हो अल्लाह के बंदे और रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, आपके परिजनों, साथियों और क़ियामत के दिन तक आपके मार्ग पर चलने वालों पर।
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بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
ग्यारहवीं पुस्तिका:
मरे हुए लोगों को मस्जिदों में दफ़न करना
अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ। सारी प्रशंसा अल्लाह की है। दुरूद व सलाम हो अल्लाह के रसूल पर, तथा आपके परिवारजन एवं आप के मार्ग पर चलने वालों पर। तत्पश्चात:
मैंने 17/04/1415 हिजरी के "अल-ख़रतूम" अख़बार का अध्ययन किया, तो पाया कि उसमें, उम्म-ए-दरमान नगर की मस्जिद में सैयद मुहम्मद हसन इद्रीसी को उनके पिता के बगल में दफ़न करने के संबंध में एक बयान छपा है...।
चूँकि अल्लाह ने मुसलमानों का शुभचिंतन एवं ग़लत चीज़ों का खंडन ज़रूरी क़रार दिया है, इसलिए मैंने यह बताना ज़रूरी समझा कि मस्जिद में किसी को दफ़न करना जायज़ नहीं है, इससे शिर्क फैलता है, और यहूदियों एवं ईसाइयों ने यह काम किया, तो अल्लाह ने उनका खंडन किया और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनपर लानत फ़रमाई। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम की आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَعَنَ اللَّهُ الْيَهُودَ وَالنَّصَارَى، اتَّخَذُوا قُبُورَ أَنْبِيَائِهِمْ مَسَاجِدَ».
"यहूदियों तथा ईसाइयों पर अल्लाह की धिक्कार हो। उन लोगों ने नबियों की क़ब्रों को मस्जिद बना लिया।"
तथा सहीह मुस्लिम में जुन्दुब बिन अब्दुल्लाह से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«أَلَا وَإِنَّ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ كَانُوا يَتَّخِذُونَ قُبُورَ أَنْبِيَائِهِمْ وَصَالِحِيهِمْ مَسَاجِدَ، أَلَا فَلَا تَتَّخِذُوا الْقُبُورَ مَسَاجِدَ؛ فَإِنِّي أَنْهَاكُمْ عَنْ ذَلِكَ».
''देखो! तुमसे पहली उम्मतों के लोग अपने नबियों और सदाचारी बंदों की क़ब्रों को मस्जिद बना लिया करते थे। देखो! तुम क़ब्रों को मस्जिद न बनाना, क्योंकि मैं तुम्हें इससे मना करता हूँ।"
इस आशय की बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं।
इसलिए हर जगह के मुसलमानों, हुकूमत हो कि आम जनता, को चाहिए कि अल्लाह से डरें, उसकी मना की हुई चीज़ों से बचें और अपने मुर्दों को मस्जिद के बाहर दफ़न करें। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा आपके सहाबा मुर्दों को मस्जिद के बाहर ही दफ़न करते थे, और सहाबा के पद्चिह्नों पर भलाई के साथ चलने वाले लोग भी ऐसा ही करते रहे।
जहाँ तक अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके दोनों साथियों अबू बक्र तथा उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की क़ब्रों के मस्जिद-ए-नबवी के अंदर मौजूद होने की बात है, तो इसे मस्जिद के अंदर मुर्दे को दफ़न करने की दलील नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने घर अर्थात : आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के घर में दफ़न हुए थे और फिर आपके दोनों साथियों को आपके पास दफ़न किया गया। बाद में जब वलीद बिन अब्दुल मलिक ने पहली सदी हिजरी के आख़िर में मस्जिद का विस्तार किया, तो उसने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के घर को मस्जिद में दाख़िल कर दिया। उस समय मुस्लिम विद्वानों ने वलीद के इस कार्य को ग़लत बताया था, लेकिन वलीद को लगता था कि इसके कारण मस्जिद का विस्तार नहीं रुकना चाहिए और मामला इतना स्पष्ट है कि इससे कोई शंका पैदा नहीं होगी।
इससे हर मुसलमान के लिए स्पष्ट है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके दोनों साथी मस्जिद के अंदर दफ़न नहीं हुए थे तथा उनकी क़ब्रों का मस्जिद के विस्तार के कारण मस्जिद के अंदर आ जाने को मस्जिद में मुर्दे को दफ़न करने का प्रमाण नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि उनको मस्जिद के अंदर दफ़न नहीं किया गया था। वो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर में दफ़न हुए थे। दूसरी बात यह है कि वलीद का अमल इस संबंध में किसी के लिए प्रमाण नहीं बन सकता। प्रमाण तो बस अल्लाह की किताब, रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत और इस उम्मत के सलफ़ (सदाचारी पूर्वजों) का इजमा (मतैक्य) है, अल्लाह उनसे प्रसन्न हो और हम को उनके सच्चे अनुयायियों में से बना दे।
अतः शुभचिंतन एवं अपनी ज़िम्मेवारी अदा करने के लिए ये शब्द 14-5-1415 हिजरी को लिखे गए।
अल्लाह ही सुयोग देने वाला है। अल्लाह की कृपा एवं शांति की धारा बरसे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिवारजनों, साथियों और भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वालों पर।
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بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
बारहवीं पुस्तिका:
ऐसे व्यक्ति की पथभ्रष्टता और कुफ्र का बयान, जो कहता हो कि किसी के लिए मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत से बाहर निकलना जायज़ है
सभी प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है, तथा दया और शांति अवतरित हो सब से प्रतिष्ठित रसूल एवं संदेष्टा हमारे नबी मुहम्मद पर, तथा उनके समस्त परिवार और सभी साथियों पर।
तत्पश्चात: मुझे अल-शर्क़ अल-औसत समाचार पत्र, अंक संख्या (5824), दिनांक 5/6/1415 हिजरी में प्रकाशित एक लेख की सूचना मिली, जिसे स्वयं को अब्दुल फ़त्ताह अल-हायिक कहने वाले किसी व्यक्ति द्वारा (ग़लत सोच) शीर्षक के तहत लिखा गया था।
लेख का सारांश : उसने एक ऐसी बात का इनकार किया है, जिसका क़ुरआन एवं सुन्नत तथा इजमा (मतैक्य) द्वारा इस्लाम धर्म का अभिन्न अंग होना बिल्कुल स्पष्ट है। वह बात यह है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को इस दुनिया के तमाम लोगों के लिए रसूल बनाकर भेजा गया था। उसने इस तथ्य का इनकार करते हुए कहा है कि जिसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण नहीं किया और यहूदी एवं ईसाई बनकर रह गया, वह भी सत्य पर है। फिर उसने इस संसार के रब के प्रति अशिष्टता दिखाते हुए कहा है कि अविश्वासियों एवं अवज्ञाकारियों को यातना देने जैसी बातें बेकार की बातें हैं।
उसने क़ुरआनी आयतों एवं हदीसों के साथ छेड़-छाड़ की, उनको ग़लत परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया, उनकी ग़लत व्याख्या की और ऐसे शरई प्रमाणों एवं क़ुरआन की स्पष्ट आयतों तथा हदीसों से आँखें मूंद रखीं, जो प्रमाणित करते हैं कि मुहम्मद सल्ल्ललाहु अलैहि व सल्लम तमाम इन्सानों के लिए रसूल बनाकर भेजे गए थे, आपके बारे में सुनने के बावजूद आपका अनुसरण न करने वाला अविश्वासी है, और अल्लाह इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को ग्रहण नहीं करता। उसने इन प्रमाणों तथा इस तरह के अन्य प्रमाणों से आँखें इसलिए मूंद रखीं, ताकि ऐसे लोगों को धोखा दे सके, जो दीन का पर्याप्त ज्ञान नहीं रखते। उसका यह कृत्य स्पष्ट कुफ़्र, इस्लाम का परित्याग और अल्लाह एवं उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाना है। उसके लेख को पढ़ने वाला कोई भी दीन का ज्ञान एवं ईमान रखने वाला व्यक्ति इसको जान सकता है।
शासन को चाहिए कि उसे अदालत के हवाले कर दे ताकि उससे तौबा कराया जाए और पवित्र शरीअत के आलोक में उसके बारे में निर्णय लिया जाए।
दरअसल उच्च एवं महान अल्लाह ने स्पष्ट रूप से बता दिया है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रसूल सारे इन्सानों एवं जिन्नात की ओर बनाकर भेजा गया था। इस बात से अनभिज्ञ कोई भी मुसलमान नहीं हो सकता, जो दीन का थोड़ा-बहुत भी ज्ञान रखता हो।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنِّي رَسُولُ ٱللَّهِ إِلَيۡكُمۡ جَمِيعًا ٱلَّذِي لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُۖ فَـَٔامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِ ٱلنَّبِيِّ ٱلۡأُمِّيِّ ٱلَّذِي يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَكَلِمَٰتِهِۦ وَٱتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ158﴾
"(ऐ नबी!) आप कह दें कि ऐ मानव जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जिसके लिए आकाशों तथा धरती का राज्य है। उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। वही जीवन देता और मारता है। अतः तुम अल्लाह पर और उसके रसूल उम्मी नबी पर ईमान लाओ, जो अल्लाह पर और उसकी सभी वाणियों (पुस्तकों) पर ईमान रखता है और उसका अनुसरण करो, ताकि तुम सीधा मार्ग पाओ।" [सूरा अल-आराफ़ : 158]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَأُوحِيَ إِلَيَّ هَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانُ لِأُنذِرَكُم بِهِۦ وَمَنۢ بَلَغَ...﴾
"...तथा मेरी ओर यह क़ुरआन वह़्य (प्रकाशना) द्वारा भेजा गया है, ताकि मैं तुम्हें इसके द्वारा डराऊँ और उसे भी जिस तक यह पहुँचे...।" [सूरा अल-अनआम : 19]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿قُلۡ إِن كُنتُمۡ تُحِبُّونَ ٱللَّهَ فَٱتَّبِعُونِي يُحۡبِبۡكُمُ ٱللَّهُ وَيَغۡفِرۡ لَكُمۡ ذُنُوبَكُمۡۚ وَٱللَّهُ غَفُورٞ رَّحِيمٞ31﴾
"(ऐ नबी!) कह दीजिए : यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा तथा तुम्हारे पाप क्षमा कर देगा और अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत दयावान् है।" [आल-ए-इमरान : 31]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡهُ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ85﴾
"और जो इस्लाम के अलावा कोई और धर्म तलाश करे, तो वह उससे हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा।" [सूरा आल-ए-इमरान : 85]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَآ أَرۡسَلۡنَٰكَ إِلَّا كَآفَّةٗ لِّلنَّاسِ بَشِيرٗا وَنَذِيرٗا...﴾
"तथा हमने आपको समस्त मनुष्यों के लिए शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला ही बनाकर भेजा है...।" [सूरा सबा : 28]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَآ أَرۡسَلۡنَٰكَ إِلَّا رَحۡمَةٗ لِّلۡعَٰلَمِينَ107﴾
"और (ऐ नबी!) हमने आपको समस्त संसार के लिए दया बनाकर भेजा है।" [सूरा अल-अंबिया : 107]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَقُل لِّلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡأُمِّيِّـۧنَ ءَأَسۡلَمۡتُمۡۚ فَإِنۡ أَسۡلَمُواْ فَقَدِ ٱهۡتَدَواْۖ وَّإِن تَوَلَّوۡاْ فَإِنَّمَا عَلَيۡكَ ٱلۡبَلَٰغُۗ وَٱللَّهُ بَصِيرُۢ بِٱلۡعِبَادِ﴾
"तथा उन लोगों से जिन्हें किताब दी गई और अनपढ़ लोगों से कह दो कि क्या तुम आज्ञाकारी हो गए? यदि वे आज्ञाकारी हो जाएँ, तो निःसंदेह मार्गदर्शन पा गए और यदि वे मुँह फेर लें, तो आपका दायित्व केवल (संदेश) पहुँचा देना है तथा अल्लाह बंदों को ख़ूब देखने वाला है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 20]।
एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :
﴿تَبَارَكَ ٱلَّذِي نَزَّلَ ٱلۡفُرۡقَانَ عَلَىٰ عَبۡدِهِۦ لِيَكُونَ لِلۡعَٰلَمِينَ نَذِيرًا1﴾
"बहुत बरकत वाला है वह (अल्लाह), जिसने अपने बंदे पर फ़ुरक़ान उतारा, ताकि वह समस्त संसार-वासियों को सावधान करने वाला हो।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 1]।
बुख़ारी और मुस्लिम ने जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«أُعْطِيتُ خَمْسًا لَمْ يُعْطَهُنَّ أَحَدٌ قَبْلِي: نُصِرْتُ بِالرُّعْبِ مَسِيرَةَ شَهْرٍ، وَجُعِلَتْ لِيَ الْأَرْضُ مَسْجِدًا وَطَهُورًا، فَأَيُّمَا رَجُلٍ مِنْ أُمَّتِي أَدْرَكَتْهُ الصَّلَاةُ، فَلْيُصَلّ، وَأُحِلَّتْ لِيَ الْمَغَانِمُ، وَلَمْ تُحَلَّ لِأَحَدٍ قَبْلِي، وَأُعْطِيتُ الشَّفَاعَةَ، وَكَانَ النَّبِيُّ يُبْعَثُ إِلَى قَوْمِهِ خَاصَّةً، وَبُعِثْتُ إِلَى النَّاسِ عَامَّةً».
"मुझे पाँच चीज़ें ऐसी दी गई हैं, जो मुझसे पहले किसी नबी को नहीं दी गई थीं। एक महीने की मसाफ़त तक जाने वाले प्रताप द्वारा मेरा सहयोग किया गया है। मेरे लिए धरती को नमाज़ पढ़ने का स्थान एवं पवित्रता प्राप्त करने का साधन बनाया गया है, इसलिए मेरी उम्मत का जो व्यक्ति जहाँ नमाज़ का समय पाए, वह वहीं नमाज़ अदा कर ले। मेरे लिए ग़नीमत का धन हलाल किया गया है, मुझसे पहले किसी के लिए ग़नीमत का धन हलाल न था। मुझे सिफ़ारिश करने का अधिकार दिया गया है। दूसरे नबी अपने-अपने समुदायों की ओर नबी बनाकर भेजे जाते थे, लेकिन मुझे तमाम इन्सानों की ओर नबी बनाकर भेजा गया है।"
इससे बिलकुल स्पष्ट है कि अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तमाम इन्सानों के लिए रसूल बनाकर भेजे गए थे, आपके रसूल बन जाने के बाद पिछली तमाम शरीअतें निरस्त हो चुकी हैं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण न करने वाला काफ़िर, अवज्ञाकारी एवं अल्लाह के दंड का हक़दार है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَمَن يَكۡفُرۡ بِهِۦ مِنَ ٱلۡأَحۡزَابِ فَٱلنَّارُ مَوۡعِدُهُۥ...﴾
"...और इन समूहों में से जो व्यक्ति भी इसका इनकार करेगा, तो उसके वादा की जगह (ठिकाना) दोज़ख है...।" [सूरा हूद : 17]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...فَلۡيَحۡذَرِ ٱلَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنۡ أَمۡرِهِۦٓ أَن تُصِيبَهُمۡ فِتۡنَةٌ أَوۡ يُصِيبَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ﴾
"अतः उन लोगों को डरना चाहिए, जो आपके आदेश का विरोध करते हैं कि उनपर कोई आपदा आ पड़े अथवा उनपर कोई दुःखदायी यातना आ जाए।" [सूरा अल-नूर : 63]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَن يَعۡصِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَيَتَعَدَّ حُدُودَهُۥ يُدۡخِلۡهُ نَارًا خَٰلِدٗا فِيهَا وَلَهُۥ عَذَابٞ مُّهِينٞ14﴾
"और जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा तथा उसकी सीमाओं का उल्लंघन करेगा, (अल्लाह) उसे आग (नरक) में डालेगा, जिसमें वह सदैव रहेगा और उसके लिए अपमानजनक यातना है।" [सूरा अल-निसा: 14]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَمَن يَتَبَدَّلِ ٱلۡكُفۡرَ بِٱلۡإِيمَٰنِ فَقَدۡ ضَلَّ سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ﴾
"और जो कोई ईमान के बदले कुफ़्र को अपना ले, तो निःसंदेह वह सीधे मार्ग से भटक गया।" [सूरा अल-बक़रा : 108]।
क़ुरआन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
अल्लाह ने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अनुसरण को अपने अनुसरण से जोड़ा है और बताया है कि जिसने इस्लाम को छोड़ किसी और दीन पर आस्था रखी, वह घाटे में रहेगा। उसकी न कोई अनिवार्य इबादत ग्रहण होगी, न स्वेच्छा से की गई इबादत। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَنْ يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَنْ يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ 85﴾
"और जो इस्लाम के अलावा कोई और धर्म तलाश करे, तो वह उससे हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा।" [सूरा आल-ए-इमरान : 85]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿مَنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ...﴾
"जिसने रसूल की आज्ञा का पालन किया, (वास्तव में) उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया...।" [सूरा अन-निसा : 80]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ فَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُمْ مَا حُمِّلْتُمْ وَإِنْ تُطِيعُوهُ تَهْتَدُوا...﴾
"(ऐ नबी!) आप कह दें कि अल्लाह की आज्ञा का पालन करो तथा रसूल की आज्ञा का पालन करो, और यदि तुम विमुख हो जाओ, तो उस (रसूल) का कर्तव्य केवल वही है, जिसका उसपर भार डाला गया है, और तुम्हारे ज़िम्मे वह है, जिसका भार तुमपर डाला गया है, और यदि तुम उसका आज्ञापालन करोगे, तो मार्गदर्शन पा जाओगे...।" [सूरा अल-नूर : 54]।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ وَالْمُشْرِكِينَ فِي نَارِ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا أُولَئِكَ هُمْ شَرُّ الْبَرِيَّةِ 6﴾
"निःसंदेह किताब वालों और मुश्रिकों में से जो लोग काफ़िर हो गए, वे सदा जहन्नम की आग में रहने वाले हैं, वही लोग सबसे बुरे प्राणी हैं।" [सूरा अल-बय्यिना : 6]।
इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ؛ لَا يَسْمَعُ بِي أَحَدٌ مِنْ هَذِهِ الْأُمَّةِ، يَهُودِيٌّ وَلَا نَصْرَانِيٌّ، ثُمَّ يَمُوتُ وَلَمْ يُؤْمِنْ بِالَّذِي أُرْسِلْتُ بِهِ؛ إِلَّا كَانَ مِنْ أَهْلِ النَّارِ».
"क़सम है उस ज़ात की जिसके हाथ में मुहम्मद की जान है, मेरे विषय में इस उम्मत का जो व्यक्ति भी सुने, चाहे वह यहूदी हो या ईसाई, फिर वह उस चीज़ पर ईमान न लाए, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ, तो वह जहन्नमी होगा।"
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने कथन एवं कर्म द्वारा बता दिया है कि जिसने इस्लाम ग्रहण नहीं किया, वह असत्य धर्म का पालन करने वाला माना जाएगा। आपने अन्य काफ़िरों की तरह ही यहूदियों एवं ईसाइयों से भी युद्ध किया और उनमें से जिसने जिज़्या दिया, उसका जिज़्या स्वीकार किया, ताकि ये लोग शेष लोगों तक आह्वान पहुँचने की राह में बाधा न डालें और उनमें से जो लोग इस्लाम ग्रहण करना चाहें, वह अपनी जाति से डरे बिना इस्लाम ग्रहण कर सकें।
बुख़ारी एवं मुस्लिम ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है, वह कहते हैं : एक दिन हम मस्जिद के अंदर मौजूद थे कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (अपने घर से) बाहर निकले और फ़रमाया :
«انْطَلِقُوا إِلَى يَهُودَ، فَخَرَجْنَا مَعَهُ حَتَّى جِئْنَا بَيْتَ الْمِدْرَاسِ، فَقَامَ النَّبِيُّ ﷺ، فَنَادَاهُمْ فَقَالَ : يَا مَعْشَرَ يَهُودَ، أَسْلِمُوا تَسْلَمُوا، فَقَالُوا: قَدْ بَلَّغْتَ يَا أَبَا الْقَاسِمِ، فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: ذَلِكَ أُرِيدُ، أَسْلِمُوا تَسْلَمُوا، فَقَالُوا: قَدْ بَلَّغْتَ يَا أَبَا الْقَاسِمِ، فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: ذَلِكَ أُرِيدُ، ثُمَّ قَالَهَا الثَّالِثَةَ...».
"यहूदियों की ओर चलो।" तब हम आपके साथ निकल पड़े और बैत अल-मिद्रास पहुँचे। वहाँ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खड़े हो गए और उनसे पुकार कर कहा : "ऐ यहूदियो! मुसलमान हो जाओ, सुरक्षित रहोगे।" उन्होंने कहा : ऐ अबुल क़ासिम! आपने संदेश पहुँचा दिया। यह सुन आपने कहा : "यही मैं चाहता हूँ, तुम मुसलमान हो जाओ, सुरक्षित रहोगे।" उन्होंने फिर कहा : ऐ अबुल क़ासिम! आपने संदेश पहुँचा दिया है। इसपर आपने दोबारा कहा : "यही मैं चाहता हूँ।" फिर तीसरी बार यही बात आपने कही। पूरी हदीस देखें।
इस हदीस को प्रस्तुत करने का उद्देश्य यह है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यहूदी धर्म का पालन करने वाले लोगों के पास उनके बैत अल-मिद्रास में गए, उनको इस्लाम की ओर बुलाया और फ़रमाया : "मुसलमान हो जाओ, सुरक्षित रहोगे।" आपने इस बात को कई बार दोहराया भी।
इसी तरह आपने (रूमी सम्राट) हिरक़्ल की ओर अपना पत्र भेजकर उसे इस्लाम की ओर बुलाया और बताया कि अगर वह मुसलमान नहीं हुआ, तो उसके मुसलमान न होने के कारण जो लोग इस्लाम धर्म से वंचित रहेंगे, उन सब के गुनाह का बोझ उसे उठाना पड़ेगा। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम की एक हदीस में है कि हिरक़्ल ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का पत्र मंगवाया और पढ़ा। उसमें लिखा था :
«بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ، مِنْ مُحَمَّدٍ رَسُولِ اللَّهِ إِلَى هِرَقْلَ عَظِيمِ الرُّومِ، سَلَامٌ عَلَى مَنِ اتَّبَعَ الْهُدَى، أَمَّا بَعْدُ: فَإِنِّي أَدْعُوكَ بِدِعَايَةِ الْإِسْلَامِ، أَسْلِمْ تَسْلَمْ، وَأَسْلِمْ يُؤْتِكَ اللَّهُ أَجْرَكَ مَرَّتَيْنِ، فَإِنْ تَوَلَّيْتَ، فَإِنَّ عَلَيْكَ إِثْمَ الْأَرِيسِيِّينَ وَ
"अल्लाह के नाम से आरंभ करता हूँ, जो बड़ा दयालु एवं कृपावान है। यह पत्र अल्लाह के रसूल मुहम्मद की ओर से रूम के महान सम्राट हिरक़्ल के नाम लिखा गया है। उसपर शांति हो, जिसने सच्चे धर्म का पालन किया। इसके बाद मूल विषय पर आता हूँ। मैं तुम्हें इस्लाम धर्म ग्रहण करने का आह्वान करता हूँ। मुसलमान हो जाओ, सुरक्षित रहोगे। मुसलान हो जाओ, अल्लाह तुम्हें दोगुना प्रतिफल देगा। अगर तुमने मुँह फेरा, तो तुमपर तुम्हारी जनता के गुनाह का बोझ भी होगा। तथा
﴿يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ تَعَالَوۡاْ إِلَىٰ كَلِمَةٖ سَوَآءِۭ بَيۡنَنَا وَبَيۡنَكُمۡ أَلَّا نَعۡبُدَ إِلَّا ٱللَّهَ وَلَا نُشۡرِكَ بِهِۦ شَيۡـٔٗا وَلَا يَتَّخِذَ بَعۡضُنَا بَعۡضًا أَرۡبَابٗا مِّن دُونِ ٱللَّهِۚ فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَقُولُواْ ٱشۡهَدُواْ بِأَنَّا مُسۡلِمُونَ64﴾
"ऐ किताब वालो! आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे बीच और तुम्हारे बीच समान (बराबर) है; यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें और उसके साथ किसी चीज़ को साझी न बनाएँ तथा हममें से कोई किसी को अल्लाह के सिवा रब न बनाए। फिर यदि वे मुँह फेर लें, तो कह दो कि तुम गवाह रहो कि हम (अल्लाह के) आज्ञाकारी हैं।" [सूरा आल-ए-इमरान : 64]।
फिर, जब इन लोगों ने मुँह फेरा और इस्लाम ग्रहण करने से इनकार कर दिया, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके साथियों ने उनसे युद्ध किया और उनपर जिज़्या (विशेष कर) लागू कर दिया।
साथ ही इस बात की पुष्टि के लिए कि मुहम्मद सल्ल्ललाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनकर आ जाने के बाद आपका अनुसरण न करने वाले यह लोग गुमराह एवं असत्य धर्म का पालन करने वाले लोग हैं, अल्लाह ने हर मुसलमान को आदेश दिया है कि वह हर दिन, हर नमाज़ की हर रक्अत में अल्लाह से सीधे, सही एवं ग्रहणयोग्य राह यानी इस्लाम पर चलने की दुआ माँगे। उन लोगों की राह से बचाने की दुआ करे, जिनको अल्लाह के क्रोध का सामना करना पड़ा है। यानी यहूदी एवं इन जैसे अन्य लोग, जो ये जानते हुए कि उनका धर्म असत्य है, उसी पर जमे रहते हैं। इसी तरह उन लोगों की राह से बचाने की भी दुआ करे, जो बिना ज्ञान के इबादत करते हैं और समझते हैं कि सच्चे धर्म का पालन कर रहे हैं। हालाँकि ग़लत राह पर चल रहे हैं। यानी ईसाई एवं उनके जैसे अन्य समुदाय, जो गुमराही एवं अज्ञानता के साथ अल्लाह की इबादत करते हैं। ये सारी शिक्षाएँ इसलिए दी गई हैं, ताकि हर मुसलमान निश्चित रूप से जान ले कि इस्लाम के अलावा सारे धर्म असत्य हैं। इस्लाम धर्म के अलावा किसी और धर्म का पालन करके अल्लाह की इबादत करने वाला गुमराह है। इस धर्म पर विश्वास न रखने वाला मुसलमान नहीं है। इस विषय पर क़ुरआन एवं सुन्नत के प्रमाण बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
इसलिए इस लेख के लेखक अब्दुल फ़त्ताह को चाहिए कि फ़ौरन सच्ची तौबा करे और एक अन्य लेख लिखकर अपनी तौबा का एलान कर दे। क्योंकि अल्लाह हर सच्ची तौबा करने वाले की तौबा क़बूल करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَتُوبُوٓاْ إِلَى ٱللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ لَعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ﴾
"...और ऐ ईमान वालो! तुम सब अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम सफल हो जाओ।" [सूरा अल-नूर : 31]।
उसका एक और कथन है :
﴿وَٱلَّذِينَ لَا يَدۡعُونَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ وَلَا يَقۡتُلُونَ ٱلنَّفۡسَ ٱلَّتِي حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلۡحَقِّ وَلَا يَزۡنُونَۚ وَمَن يَفۡعَلۡ ذَٰلِكَ يَلۡقَ أَثَامٗا68 يُضَٰعَفۡ لَهُ ٱلۡعَذَابُ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ وَيَخۡلُدۡ فِيهِۦ مُهَانًا69 إِلَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ عَمَلٗا صَٰلِحٗا فَأُوْلَٰٓئِكَ يُبَدِّلُ ٱللَّهُ سَيِّـَٔاتِهِمۡ حَسَنَٰتٖۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورٗا رَّحِيمٗا70﴾
"और जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे पूज्य को नहीं पुकारते, और न उस प्राण को क़त्ल करते हैं, जिसे अल्लाह ने ह़राम ठहराया है परंतु हक़ के साथ और न व्यभिचार करते हैं। और जो ऐसा करेगा, वह पाप का भागी बनेगा। क़ियामत के दिन उसकी यातना दुगुनी कर दी जाएगी और वह अपमानित होकर उसमें हमेशा रहेगा। परंतु जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और अच्छे काम किए, तो ये लोग हैं जिनके बुरे कामों को अल्लाह नेकियों में बदल देगा और अल्लाह हमेशा बहुत बख़्शने वाला, अत्यंत दयावान् है।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 68-70]।
इसी तरह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
«الإِسْلَامُ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ، وَالتَّوبَةُ تَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهَا».
"इस्लाम पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है और तौबा पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देती है।"
इसी तरह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस हदीस से भी इस आयत की व्याख्या होती है :
«التَّائِبُ مِنَ الذَّنْبَ كَمَنْ لَا ذَنْبَ لَهُ».
"गुनाह से तौबा करने वाला ऐसा हो जाता है, जैसे उसका कोई गुनाह ही न हो।"
इस आशय की आयतें और हदीसें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
दुआ है कि अल्लाह हमें सत्य को सत्य समझने और उसका अनुसरण करने तथा असत्य को असत्य देखने एवं उससे बचे रहने का सुयोग प्रदान करे, हमें, इस लेख के लेखक अब्दुल फ़त्ताह एवं तमाम मुसलमानों को सच्ची तौबा का सुयोग प्रदान करे, हम सब को गुमराह करने वाले फ़ितनों और इच्छा एवं शैतान के अनुसरण से बचाए। ये सारे कार्य उसी के हैं और उसी के पास इनका सामर्थ्य है।
अल्लाह की कृपा तथा शांति की बरखा बरसे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिजनों, साथियों एवं क़ियामत के दिन तक निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करने वालों पर।
***
सूची
पहला सिद्धांत : अल्लाह तआला पर ईमान लाना। 6
दूसरा मूल आधार : फ़रिश्तों पर ईमान। 20
तीसरा मूल आधार : किताबों पर ईमान 22
चौथा मूल आधार : रसूलों पर ईमान 24
पाँचवाँ मूल आधार : आख़िरत के दिन पर ईमान 26
छठा मूल आधार : तक़दीर पर ईमान 27
शुद्ध अक़ीदे के विरुद्ध चीजें 33
दूसरी पुस्तिका: अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से फ़रियाद के संबंध में शरई दृष्टिकोण 42
तीसरी पुस्तिका: जिन्नों और शैतानों से फ़रियाद और उनके लिए मन्नत मानने के बारे में शरई दृष्टिकोण 61
चौथी पुस्तिका: नवरचित तथा शिर्क की मिलावट वाले विर्दों के साथ इबादत करने के बारे में शरई दृष्टिकोण 84
पाँचवीं पुस्तिका: अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा किसी और का जन्म-दिन मनाने के बारे में शरई दृष्टिकोण 111
छठी पुस्तिका: इसरा एवं मेराज की रात जश्न मनाना शरई दृष्टिकोण से 123
सातवीं पुस्तिका: पंद्रहवीं शाबान की रात जश्न मनाना शरई दृष्टिकोण से 130
आठवीं पुस्तिका: एक झूठी वसीयत के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें जो हरम-ए-नबवी के सेवक शैख़ अहमद के नाम पर प्रचलित है 144
नवीं पुस्तिका: जादू, ग़ैब की बात बताने और इससे संबंधित बातों के बारे में इस्लामी दृष्टिकोण 159
दसवीं पुस्तिका: क़ब्रों पर मस्जिद बनाने से चेतावनी 177
ग्यारहवीं पुस्तिका: मरे हुए लोगों को मस्जिदों में दफ़न करना 183
बारहवीं पुस्तिका: ऐसे व्यक्ति की पथभ्रष्टता और कुफ्र का बयान, जो कहता हो कि किसी के लिए मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत से बाहर निकलना जायज़ है 186
***
() इस हदीस को बुख़ारी (2856) और मुस्लिम (30) ने रिवायत किया है।
() इसे लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (735) और इब्ने अब्दुलबर्र ने जामे अल-इल्म व फ़ज़्लिहि (1801) में रिवायत किया है। लेकिन उसमें गुणों से संबंधित आयतों के स्थान पर गुणों से संबंधित हदीसों का ज़िक्र है। उसके शब्द हैं : "इन हदीसों को उसी तरह रिवायत करो, जिस तरह यह आई हुई हैं और इनके बारे में बहस मत करो।
() इसे बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (865) में रिवायत किया है और इसकी सनद को इब्न-ए-तैमिया ने अल-हमवियह (पृष्ठ 269) में सहीह कहा है। जबकि ज़हबी ने अल-अर्श (2/223) में कहा है कि इसके वर्णनकर्ता इमाम एवं विश्वसनीय हैं।
() इसे लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (930) और बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (955) में रिवायत किया है।
() इसे लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (665) और बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (868) में रिवायत किया है।
() इसे लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (664), अबू नुऐम ने हिलयह अल-औलिया (6/325) और बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (867) में रिवायत किया है।
() इसे अल-मुज़क्की ने अल-मुज़क्कियात (29), इब्न-ए-बत्ता ने अल-इबानह (120) तथा लालकाई ने शर्ह उसूल अल-ऐतिक़ाद (663) में रिवायत किया है।
() इसे दारिमी ने अल-रद्द अला अल-जहमिय्यह (67) तथा बैहक़ी ने अल-असमा व अल-सिफ़ात (903) में रिवायत किया है।
() इसे ज़हबी ने अल-उलू (464) में रिवायत किया है, जबकि अलबानी ने मुख़तसर अल-उलू (पृष्ठ-184) में कहा है : इसकी सनद सहीह है, इसके वर्णनकर्ता विश्वसनीय एवं परिचित हैं।
() तफ़सीर इब्न-ए-कसीर (3/426,427)।
() इसे बुख़ारी ने (22) में अबू सईद खु़दरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
() सहीह मुस्लिम : (2996), वर्णनकर्ता आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा।
() सहीह बुख़ारी : (3651), सहीह मुस्लिम : (2533), वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु।
() सहीह मुस्लिम : (1920), वर्णनकर्ता सौबान रज़ियल्लाहु अन्हु।
() सुनन इब्न-ए-माजा : (3952), वर्णनकर्ता सौबान रज़ियल्लाहु अन्हु। इसे इब्न-ए-हिब्बान (7614) ने एवं हाकिम (8653) ने सहीह कहा है।
() इसे तिर्मिज़ी ने (2641) में अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है और मुनावी ने फ़ैज़ अल-क़दीर (5/347) में कहा है : "इसमें अब्दुर रहमान बिन ज़ियाद अफ़्रीक़ी है, जिसके बारे में ज़हबी ने कहा है कि इसे मुहद्दिसों ने ज़ईफ़ (दुर्बल) कहा है।" जबकि अलबानी ने इस हदीस को सहीह अल-जामे (5343) में सहीह कहा है।
() इसे मुस्लिम (8) ने रिवायत किया है।
() इस हदीस को बुख़ारी (2856) और मुस्लिम (30) ने रिवायत किया है।