التَّحْذِيرُ مِنَ البِدَعِ
बिद्अत (नवाचारों) से सावधान करना
لِسَمَاحَةِ الشَّيْخِ العَلَّامَةِ
عَبْدِ العَزِيزِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ بَازٍ
رَحِمَهُ اللهُ
लेखक आदरणीय शैख़
अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
पाँचवीं पुस्तिका :
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा किसी और का जन्म-दिन मनाने के बारे में शरई दृष्टिकोण
सारी प्रशंसा अल्लाह की है तथा दरूद एवं सलाम हो अल्लाह के रसूल पर, तथा आपके परिजनों, साथियों और उनके मार्ग पर चलने वालों पर।
इसके बाद अब मूल विषय पर आते हैं। बहुत-से लोगों द्वारा पूछा गया कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म दिन मनाना कैसा है और जन्म दिन मनाते समय आपके सम्मान में खड़ा होना और आपको सलाम करना आदि काम कैसे हैं?
उत्तर : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम या किसी और व्यक्ति का जन्म-दिन मनाना जायज़ नहीं है। क्योंकि यह दीन के नाम पर किया जाने वाला एक नया काम है। जन्म-दिन न तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मनाया है, न ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन ने मनाया है, न अन्य सहाबा ने मनाया है और न उनके मार्ग पर चलने वाले उत्कृष्ट दौरों के लोगों ने मनाया है। हालाँकि ये लोग बाद के लोगों की तुलना में सुन्नत की अधिक जानकारी रखने वाले, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अधिक प्रेम करने वाले और आपकी शरीयत का अधिक पालन करने वाले लोग थे। पवित्र एवं महान अल्लाह ने अपनी सुस्पष्ट किताब में कहा है :
﴿...وَمَآ ءَاتَىٰكُمُ ٱلرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَىٰكُمۡ عَنۡهُ فَٱنتَهُواْ...﴾
और रसूल तुम्हें जो कुछ दें, उसे ले लो और जिस चीज़ से रोक दें, उससे रुक जाओ।
[सूरा अल-हश्र : 7]। एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿...فَلۡيَحۡذَرِ ٱلَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنۡ أَمۡرِهِۦٓ أَن تُصِيبَهُمۡ فِتۡنَةٌ أَوۡ يُصِيبَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ﴾
अतः उन लोगों को डरना चाहिए, जो आपके आदेश का विरोध करते हैं कि उनपर कोई आपदा आ पड़े अथवा उनपर कोई दुःखदायी यातना आ जाए। [सूरा अल-नूर : 56], एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है :
﴿لَّقَدۡ كَانَ لَكُمۡ فِي رَسُولِ ٱللَّهِ أُسۡوَةٌ حَسَنَةٞ لِّمَن كَانَ يَرۡجُواْ ٱللَّهَ وَٱلۡيَوۡمَ ٱلۡأٓخِرَ وَذَكَرَ ٱللَّهَ كَثِيرٗا21﴾
निःसंदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है। उसके लिए, जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो, तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करता हो। [सूरा अल-अहज़ाब : 21], एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَٱلسَّٰبِقُونَ ٱلۡأَوَّلُونَ مِنَ ٱلۡمُهَٰجِرِينَ وَٱلۡأَنصَارِ وَٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُم بِإِحۡسَٰنٖ رَّضِيَ ٱللَّهُ عَنۡهُمۡ وَرَضُواْ عَنۡهُ وَأَعَدَّ لَهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي تَحۡتَهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدٗاۚ ذَٰلِكَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ100﴾
तथा सबसे पहले (ईमान की ओर) आगे बढ़ने वाले मुहाजिरीन और अंसार और जिन लोगों ने नेकी के साथ उनका अनुसरण किया, अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया और वे उससे प्रसन्न हो गए तथा उसने उनके लिए ऐसी जन्नतें तैयार कर रखी हैं, जिनके नीचे से नहरें बहती हैं। वे उनके अंदर हमेशा रहेंगे। यही बड़ी सफलता है। [सूरा अल-तौबा : 100], एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا...﴾
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया। [सूरत अल-माइदा : 3]। क़ुरआन के अंदर इस अर्थ की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنهُ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।" अर्थात : उसके इस अमल को उसी के मुँह पर मार दिया जाएगा। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक अन्य हदीस में है :
«عَلَيكُم بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الخُلَفَاءِ الرَّاشِدِينَ المَهْدِيَّينَ مِنْ بَعدِي، تَمَسَّكُوا بِهَا، وَعَضُّوا عَلَيهَا بِالنَّوَاجِذِ، وَإِيَّاكُمْ وَمُحْدَثَاتِ الأُمُورِ، فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٌ وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالةٌ».
"तुम मेरी सुन्नत तथा सत्य के मार्ग पर चलने वाले मेरे ख़लीफ़ा-गणों की सुन्नत का पानलन करना। इसे मज़बूती से पकड़े रहना और दीन के नाम पर सामने आने वाली नित-नई चीज़ों से बचे रहना। क्योंकि दीन के नाम पर सामने आने वाली हर नई चीज़ बिदअत है, और हर बिदअत गुमराही है।" इन दोनों हदीसों में दीन के नाम पर किसी नई चीज़ का आविष्कार एवं उसपर अमल करने से अत्यधिक सावधान किया गया है।
जबकि इस प्रकार से जन्म-दिन मनाने का अर्थ यह होता है कि अल्लाह ने इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन नहीं दिया है, और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वह सारी चीज़ें नहीं पहुँचाई हैं, जिनपर अमल किया जाना चाहिए। यहाँ तक कि बाद के दौर के कुछ लोग पैदा हुए और अल्लाह की शरीयत में कुछ ऐसी चीज़ों की वृद्धि की, जिनकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी थी। दावा यह है कि इन चीज़ों से अल्लाह की निकटता प्राप्त होगी। क्या इसमें कोई संदेह हो सकता है कि यह एक ख़तरनाक सोच है? यह तो दरअसल अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर आपत्ति है। सच्चाई यह है कि अल्लाह ने अपने बंदों को एक संपूर्ण दीन एवं संपूर्ण नेमत दी है, तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्पष्ट रूप से सब कुछ पहुँचा दिया है। आपने जन्नत की ओर ले जाने वाला और जहन्नम से दूर करने वाला हर रास्ता बता दिया है। अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अनहुमा से वर्णित एक सहीह हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَا بَعَثَ اللهُ مِن نَبِيٍ إِلَّا كَانَ حَقًّا عَلَيهِ أَن يَدُلَّ أُمَّتَهُ عَلَى خَيرِ مَا يَعْلَمُهُ لَهُم، وَيُنْذِرَهُمْ شَرَّ مَا يَعْلَمُهُ لَهُمْ».
"अल्लाह के भेजे हुए हर नबी का कर्तव्य था कि वह अपनी उम्मत को अपनी जानकारी के अनुसार तमाम अच्छी एवं बुरी चीज़ें बता दे।" इस ह़दीस को इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है।
यह बात बताने की ज़रूरत नहीं है कि हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सबसे उत्कृष्ट, अंतिम, इस्लाम का संदेश सबसे संपूर्ण रूप से पहुँचाने वाले और सबसे अधिक शुभचिंतन करने वाले नबी हैं। ऐसे में अगर जन्म-दिन मनाना दीन का कोई ऐसा काम होता, जिससे अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त हो सकती है, तो आप ख़ुद उम्मत को बता देते, अपने जीवन काल में उसपर अमल करके दिखाते या आपके सहाबा का उसपर अमल रहा होता। लेकिन, ऐसा कुछ भी न होना इस बात का प्रमाण है कि जन्म-दिन मनाना कोई इस्लामी कार्य नहीं, बल्कि दीन के नाम पर आविष्कृत उन कामों में से एक है, जिनसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी उम्मत को सावधान किया है। इस तरह की हदीसें पीछे गुज़र चुकी हैं। इस आशय की आयतें एवं हदीसें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
उलेमा के एक समूह ने उपर्युक्त तथा इस प्रकार के अन्य प्रमाणों के मद्देनज़र रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म-दिन मनाने का खंडन किया है, और इससे सावधान किया है। जबकि बाद के दौरों के कुछ उलेमा ने इसके विपरीत जाते हुए रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्मदिन मनाने की अनुमति दी है, जब उसमें कोई शरीयत विरोधी कार्य, जैसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में अतिशयोक्ति, स्त्रियों एवं पुरुषों का बिना रोक-टोक घुलना-मिलना और मनोरंजन के उपकरणों का इस्तेमाल आदि न पाया जाए। ये इसे बिदअत-ए-हसना यानी दीन के नाम पर आविष्कार किए जाने वाले अच्छे कामों में शुमार करते हैं।
ऐसी परिस्थिति में शरीयत के एक सिद्धांत पर अमल किया जाना चाहिए। सिद्धांत यह है कि जिस चीज़ में मतभेद हो जाए, उसे अल्लाह की किताब पवित्र क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत के आलोक में हल करना चाहिए। ख़ुद महान अल्लाह ने कहा है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ وَأُوْلِي ٱلۡأَمۡرِ مِنكُمۡۖ فَإِن تَنَٰزَعۡتُمۡ فِي شَيۡءٖ فَرُدُّوهُ إِلَى ٱللَّهِ وَٱلرَّسُولِ إِن كُنتُمۡ تُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ ذَٰلِكَ خَيۡرٞ وَأَحۡسَنُ تَأۡوِيلًا59﴾
ऐ ईमान वालो! अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल का आज्ञापालन करो और अपने में से अधिकार वालों (शासकों) का। फिर यदि तुम आपस में किसी चीज़ में मतभेद कर बैठो, तो उसे अल्लाह और रसूल की ओर लौटाओ, यदि तुम अल्लाह तथा अंतिम दिन (परलोक) पर ईमान रखते हो। यह (तुम्हारे लिए) बहुत बेहतर है और परिणाम की दृष्टि से बहुत अच्छा है। [सूरा अल-निसा : 59], एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَا ٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِيهِ مِن شَيۡءٖ فَحُكۡمُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ ...﴾
और तुम जिस चीज़ के बारे में भी मतभेद करो, उसका निर्णय अल्लाह की ओर है ... [सूरा अल-शूरा : 10]।
जब हमने यह जानने का प्रयास किया कि जन्म-दिन मनाने के बारे में पवित्र क़ुरआन क्या कहता है, तो पाया कि पवित्र क़ुरआन हमें अल्लाह के रसूल की सिखाई हुई बातों का अनुसरण करने का आदेश देता है, आपकी मना की हुई बातों से सावधान करता है और बताता है कि अल्लाह ने इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन दिया है। ऐसे में चूँकि जन्म-दिन मनाना अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सिखाई हुई बातों का हिस्सा नहीं है, इसलिए उस संपूर्ण दीन का हिस्सा नहीं हो सकता, जो अल्लाह ने इस उम्मत को दिया है और जिसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हुए मानने का आदेश दिया है।
इसके बाद जब हमने यह जानने का प्रयास किया कि इस संबंध में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत क्या कहती है, तो पाया कि इसे न अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किया है, न आपने इसका आदेश दिया है, और न आपके सहाबा ने किया है। इससे यह पता चला कि यह दीन का हिस्सा नहीं है। यह दीन के नाम पर बाद के समय में सामने आने वाली चीज़ है। इसे मनाना यहूदियों एवं ईसाइयों के त्योहारों की नक़्क़ाली करना है।
इससे सत्य का पता लगाने की न्यूनतम इच्छा रखने वाले और इस संबंध में न्याय से काम लेने वाले व्यक्ति के लिए स्पष्ट हो जाता है कि जन्म-दिन मनाना इस्लाम धर्म का हिस्सा नहीं है। यह दीन के नाम पर किया जाने वाला एक नव-आविष्कृत कार्य है और इस प्रकार के तमाम कार्यों से दूर रहने और इनसे सावधान रहने का आदेश अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दिया है। किसी विवेकी व्यक्ति को इस धोखे में भी नहीं आना चाहिए कि दुनिया के हर भाग में बहुत बड़ी संख्या में लोग अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म-दिन मना रहे हैं। क्योंकि सही क्या है, इसे जानने के लिए उसका पालन करने वालों की संख्या नहीं, बल्कि शरई प्रमाण देखे जाएँगे। जैसा कि सर्वशक्तिमान अल्लाह ने यहूदियों एवं ईसाइयों के बारे में कहा है :
﴿وَقَالُواْ لَن يَدۡخُلَ ٱلۡجَنَّةَ إِلَّا مَن كَانَ هُودًا أَوۡ نَصَٰرَىٰۗ تِلۡكَ أَمَانِيُّهُمۡۗ قُلۡ هَاتُواْ بُرۡهَٰنَكُمۡ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ111﴾
तथा उन्होंने कहा जन्नत में हरगिज़ नहीं जाएँगे, परंतु जो यहूदी होंगे या ईसाई। ये उनकी कामनाएँ ही हैं। (उनसे) कहो : लाओ अपने प्रमाण, यदि तुम सच्चे हो। [सूरा अल-बक़रा : 111], एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَإِنْ تُطِعْ أَكْثَرَ مَنْ فِي الْأَرْضِ يُضِلُّوكَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ...﴾
और (ऐ नबी!) यदि आप उन लोगों में से अधिकतर का कहना मानें जो धरती पर हैं, तो वे आपको अल्लाह के मार्ग से भटका देंगे... [सूरा अल-अनआम : 116],
दूसरी बात यह है कि जन्म-दिन के ये आयोजन बिदअत होने के साथ-साथ आम तौर पर अन्य शरीयत विरोधी गतिविधियों से खाली नहीं होते। इनमें पुरुषों एवं स्त्रियों का बिना रोक-टोक मेल-जोल होता है, गानों और संगीत वाद्ययंत्रों का उपयोग होता है, नशीले पदार्थों का सेवन होता है तथा इस प्रकार की अन्य कई बुराइयाँ पाई जाती हैं। इन आयोजनों में इन सब से भी एक भयानक चीज़ देखने को मिलती है। और वह है बड़ा शिर्क, जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम या औलिया के बारे में अतिशयोक्ति एवं उनसे दुआ, फ़रियाद, मदद तलब करने और उनके ग़ैब की बातें जानने के दावे के रूप से प्रकट होता है। इस तरह के काम अल्लाह के नबी सल्लाहु अलैहि व सल्लम एवं तथाकथित वलियों का जन्म दिवस मनाते समय बहुत-से लोगों द्वारा किए जाते हैं। जबकि एक सही हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«إِيَّاكُم وَالغُلُوُّ فِي الدِّينِ، فَإِنَّمَا أَهْلَكَ مَن كَانَ قَبْلَكُم الغُلُوَّ فِي الدِّينِ».
"तुम दीन में अतिशयोक्ति से बचो। तुमसे पहले के लोगों का विनाश इसी अतिशयोक्ति ने किया है।" इसी तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَا تُطْرُونِي كَمَا أَطْرَتِ النَّصَارَى ابْنَ مَرْيَمَ، إِنَّمَا أَنَا عَبدٌ، فَقُولُوا: عَبدُ اللهِ وَرَسُولُه».
"तुम लोग मेरी प्रशंसा और तारीफ़ में उस प्रकार अतिशयोक्ति न करो, जिस प्रकार ईसाइयों ने मरयम के पुत्र के बारे में किया। मैं केवल एक बंदा हूँ। अतः मुझे अल्लाह का बंदा और उसका रसूल कहो।" इस हदीस को इमाम बुख़ारी ने अपनी सहीह में अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहु से नक़ल किया है।
एक आश्चर्यजनक बात यह है कि बहुत-से लोग इस प्रकार के नव-आविष्कृत आयोजनों में खूब दिल लगाकर शामिल होते हैं और इनका बचाव करते हैं, लेकिन जुमा एवं बा-जमात नमाज़ में शामिल नहीं होते, इसपर ध्यान नहीं देते और यह भी नहीं समझते कि उन्होंने कुछ बड़ा गुनाह का काम किया है। निश्चित रूप से यह ईमान एवं दूरदर्शिता की कमी तथा दिलों पर गुनाहों का ज़ंग लग जाने का नतीजा है। दुआ है कि अल्लाह हमें और तमाम मुसलमानों को इससे बचाए।
इस आयोजन से जुड़ी एक और बात यह कि कुछ लोगों के अनुसार अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने जन्म दिवस के आयोजन में शामिल होते हैं। इसी धारणा के कारण वे आपका स्वागत करने के लिए खड़े होते हैं और सलाम प्रस्तुत करते हैं । यह दरअसल बदतरीन अज्ञानता का नमूना है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़यामत से पहले अपनी क़ब्र से नहीं निकलेंगे। आप न किसी से मिलते हैं और न किसी सभा में उपस्थित होते हैं। क़यामत तक अपनी क़ब्र ही में रहेंगे। अलबत्ता आपकी आत्मा अपने रब के पास सम्मानित घर के सर्वोच्च भाग (आला-इल्लीईन) में है। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿ثُمَّ إِنَّكُمْ بَعْدَ ذَلِكَ لَمَيِّتُونَ15 ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ تُبْعَثُونَ16﴾
फिर निःसंदेह तुम इसके पश्चात् अवश्य मरने वाले हो।
फिर निःसंदेह तुम क़ियामत के दिन उठाए जाओगे। [सूरत अल-मोमिनून: 15,16]।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«أَنَا أَوَّلُ مَنْ يَنْشَقُّ عَنْهُ القَبْرُ يَومَ القِيَامَةِ، وَأَنَا أَوَّلُ شَافِعٍ، وَأَوًّلُ مُشَفَّعٍ».
"मैं क़यामत के दिन सबसे पहले क़ब्र से निकलूँगा। मैं सबसे पहले सिफ़ारिश करूँगा और मेरी ही सिफ़ारिश सबसे पहले क़बूल होगी।" आपपर अपने रब की ओर से कृपा एवं शांति की बरखा बरसे।
यह दोनों आयतें, यह हदीस और इस आशय की अन्य आयतें एवं हदीसें प्रमाणित करती हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा अन्य मरे हुए लोग अपनी क़ब्रों से क़यामत के दिन ही निकलेंगे। यह एक ऐसा तथ्य है कि इसपर तमाम मुस्लिम विद्वान एकमत हैं। किसी का कोई मतभेद नहीं है। इसलिए तमाम मुसलमानों को इन बातों को समझना चाहिए और अज्ञान लोगों के ऐसे आविष्कृत कार्यों से सचेत रहना चाहिए, जिनका अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा है। हमें इस प्रकार के कार्यों से अल्लाह बचाए। उसी पर हमारा भरोसा है। सच्चाई यह है कि उसके सिवा कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो भलाई की ओर ले जाए और बुराई से रोके।
जहाँ तक अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद व सलाम भेजने की बात है, तो यह एक उत्कृष्ट इबादत एवं नेकी का काम है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِيِّۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ صَلُّواْ عَلَيۡهِ وَسَلِّمُواْ تَسۡلِيمًا56﴾
निःसंदेह अल्लाह तथा उसके फ़रिश्ते नबी पर दुरूद भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम (भी) उनपर दुरूद तथा बहुत सलाम भेजा करो। [सूरा अल-अहज़ाब : 56], अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«مَنْ صَلَّى عَلَيَّ وَاحِدَةً؛ صَلَّى اللهُ عَلَيهِ بِهَا عَشْرًا».
"जिसने मुझपर एक बार दरूद भेजा, उसके बदले में अल्लाह उसपर दस रहमतें उतारेगा।" वैसे तो दरूद व सलाम भेजने का काम किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन हर नमाज़ के अंत में दरूद व सलाम भेजने की ताकीद आई है, बल्कि कुछ इस्लामी विद्वानों के अनुसार हर नमाज़ के अंतिम तशह्हुद में यह वाजिब है। और बहुत सारी जगहों में सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। मसलन अज़ान के बाद, आपका ज़िक्र आने पर और जुमा के दिन एवं जुमे की रात को। जैसा कि बहुत-सी हदीसों से प्रमाणित होता है।
दुआ है कि अल्लाह हमें और तमाम मुसलमानों को दीन की सही समझ प्रदान करे, उसपर मज़बूती से क़ायम रखे, सुन्नत का पालन करने एवं बिदअत से सचेत रहने का सुयोग दे। सच यह है कि जिसको जो मिलता है, उसी के यहाँ से मिलता है।
दरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिवार और तमाम साथियों पर।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
छठी पुस्तिका:
इसरा एवं मेराज की रात जश्न मनाना शरई दृष्टिकोण से
समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है तथा दुरूद व सलाम (प्रशंसा व शांति) अवतरित हो अल्लाह के रसूल पर, तथा उनके परिवार वालों पर, एवं उनके साथियों पर और उनसे मित्रता रखने वालों पर।
इसके बाद अब मूल विषय पर आते हैं। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि इसरा एवं मेराज अल्लाह की एक बहुत बड़ी निशानी है, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सच्चे रसूल होने, अल्लाह के यहाँ बड़ा ऊँचा स्थान रखने तथा अल्लाह के असीम सामर्थ्य वाला एवं अपनी सृष्टि से ऊँचा होने को प्रमाणित करती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿سُبۡحَٰنَ ٱلَّذِيٓ أَسۡرَىٰ بِعَبۡدِهِۦ لَيۡلٗا مِّنَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ إِلَى ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡأَقۡصَا ٱلَّذِي بَٰرَكۡنَا حَوۡلَهُۥ لِنُرِيَهُۥ مِنۡ ءَايَٰتِنَآۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ1﴾
पवित्र है वह (अल्लाह) जो अपने बंदे को रातों-रात मस्जिदे-हराम (काबा) से मस्जिदे-अक़सा तक ले गया, जिसके चारों ओर हमने बरकत रखी है। ताकि हम उसे अपनी कुछ निशानियाँ दिखाएँ। निःसंदेह वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है। [सूरा अल-इसरा : 1]।
यह बात वर्णनकर्ताओं की बहुत बड़ी संख्या से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रातों-रात सातों आकाशों की सैर कराई गई और आपके लिए उनके द्वार खोले गए, यहाँ तक कि आप सातवें आकाश तक पहुँच गए। वहाँ आपके रब ने आपसे बात की और पाँच वक़्त की नमाज़ें फ़र्ज़ कीं। वैसे तो अल्लाह ने पहले पचास वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की थी, लेकिन आप बार-बार अपने रब के पास जाते रहे और बोझ हल्का करने की बात करते रहे, यहाँ तक कि शेष पाँच वक़्त की नमाज़ें ही रह गईं। इस तरह ये पढ़ने में तो पाँच नमाज़ें हैं, लेकिन प्रतिफल में पचास नमाज़ें हैं। क्योंकि अल्लाह के यहाँ एक नेकी का बदला दस मिलता है। हम अल्लाह की तमाम नेमतों पर उसका शुक्र अदा करते हैं।
वह रात, जिसमें अल्लाह के नबी सल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का से बैत अल-मक़दिस ले जाए गए और वहाँ से सात आकाशों की सैर कराए गए सही हदीसों से उसकी तिथि एवं महीने का निर्धारण नहीं होता। निश्चित नहीं है कि वह रात रजब महीने की थी या किसी और महीने की। इस संबंध में जो रिवायतें आई हैं, हदीस का ज्ञान रखने वालों के अनुसार वो साबित नहीं हैं। वैसे, निर्धारण हो भी जाता, तब भी उसमें विशेष रूप से कोई इबादत एवं सभा का आयोजन करना जायज़ नहीं होता। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा ने न तो उस रात कुछ विशेष कार्य किया है और न ही किसी सभा का आयोजन किया है। अगर उस रात सभा का आयोजन करना नेकी का काम होता, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उम्मत को बता देते। कथन द्वारा हो कि कार्य द्वारा। फिर, अगर आपने बताया होता, तो लोग उसे जानते और सहाबा हम तक पहुँचा देते। क्योंकि सहाबा ने अपने नबी की वह सारी बातें नक़ल की हैं, जिनकी उम्मत को ज़रूरत थी। उनसे इस मामले में कोई कोताही नहीं हुई। वह तो हर अच्छे काम में आगे रहने वाले लोग थे। अगर इस रात सभा का आयोजन करना नेकी का काम होता, तो वह इसमें भी सबसे आगे रहते। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों के सबसे अधिक शुभचिंतक थे। आपने अल्लाह का संदेश पहुँचा दिया है। दीन पहुँचाने की जो ज़िम्मेवारी आपके हवाले की गई थी, उसको भली-भाँति निभाया है। ऐसे में अगर इस रात का सम्मान और इसमें सभा का आयोजन दीन का काम होता, तो आप उसे नज़र अंदाज़ कर देते और बयान न करते यह संभव नहीं है। इसलिए आपका बयान न करना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इस रात का सम्मान करना और इसमें सभा का आयोजन करना दीन का हिस्सा नहीं है। अल्लाह ने तो इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन दिया है और दीन के अंदर किसी ऐसे काम का आविष्कार करने वाले का खंडन किया है, जिसकी अनुमति उसने न दी हो। उसने पवित्र क़ुरआन में कहा है :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا...﴾
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया। [सूरा अल-माइदा : 3], एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿أَمۡ لَهُمۡ شُرَكَٰٓؤُاْ شَرَعُواْ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمۡ يَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةُ ٱلۡفَصۡلِ لَقُضِيَ بَيۡنَهُمۡۗ وَإِنَّ ٱلظَّٰلِمِينَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ21﴾
या इन (मुश्रिकों) के कुछ ऐसे साझी हैं, जिन्होंने उनके लिए धर्म का एक ऐसा नियम निर्धारित किया है जिसकी अल्लाह ने अनुमति नहीं दी है? और यदि नियत की हुई बात न होती, तो अवश्य उनके बीच निर्णय कर दिया जाता तथा निश्चय ही अत्याचारियों के लिए दुखद यातना है। [सूरा अल-शूरा : 21]।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों में बिदअत से सचेत किया गया है, और उसे स्पष्ट रूप से गुमराही कहा गया है, जिससे साबित होता है कि यह एक हानिकारक वस्तु है और इससे बचने की ज़रूरत है। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ؛ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।" सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है :
«مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيهِ أَمْرَنَا؛ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके सम्बंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह अग्रहणीय है।" सहीह मुस्लिम में जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जुमे के दिन अपने ख़ुतबे में कहा करते थे :
«أَمَا بَعْدَ، فَإِنَّ خَيرَ الحَدِيثِ كِتَابُ اللهِ، وَخَيرَ الهَدْيِ هَدْيُ مُحَمَّدٍ ﷺ، وَشَرَّ الأُمُورِ مُحْدَثَاتُهَا، وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
"तत्पश्चात, निःसंदेह सबसे अच्छी बात अल्लाह की किताब है, और सबसे उत्तम तरीक़ा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का तरीक़ा है, और सबसे बुरी चीज़ (धर्म के नाम पर निकाली जाने वाली) नई चीज़ें हैं और हर बिदअत (धर्म के नाम पर निकाली गई नई चीज़) गुमराही है।" सुनन नसाई में जैयिद सनद से यह वृद्धि है :
«وَكُلَّ ضَلَالَةٍ فِي النَّارِ».
"और हर गुमराही जहन्नम में (ले जाने वाली) है।" सुनन की किताबों में इरबाज़ि बिन सारिया रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें ऐसा उपदेश दिया जिससे हृदय कांप उठे तथा नेत्रों से अश्रु की धारा बहने लगी। हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! यह तो विदाई लेने वाले का उपदेश प्रतीत होता है, हमें कुछ वसीयत कीजिए। तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया :
«أُوصِيكُم بِتَقْوَى اللهِ وَالسَّمعِ وَالطَّاعَةِ وَإِنْ تَأَمَّرَ عَلَيكُم عَبدٌ، فَإِنَّهُ مَنْ يَعِشْ مِنْكُم فَسَيَرَى اخْتِلَافًا كَثِيرًا، فَعَلَيكُم بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الخلُفَاءِ الرَّاشِدِينَ المَهْدِيِّينَ مِنْ بَعْدِي، تَمَسَّكُوا بِهَا وَعَضُّوا عَلَيْهَا بِالنَّوَاجِذِ، وَإِيَّاكُم وَمُحْدَثَاتِ الأُمُورِ، فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٍ وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
मैं तुम्हें अल्लाह का भय खाने, (शासक की बात) सुनने और (उसकी) आज्ञा पालन का करने की वसीयत करता हूँ, चाहे तुम्हारा शासक कोई दास ही क्यों न हो। जो तुम में से जीवित रहेगा, वह अनेक प्रकार के मतभेद देखेगा। इसलिए मेरी सुन्नत और मेरे सही मार्गदर्शित ख़लीफाओं (उत्तराधिकारियों) की सुन्नत को दृढ़ता से पकड़ लेना। इनको ढृढ़ता के साथ थाम लेना, तथा दीन के नाम पर समाने आने वाली नई चीज़ों से बचना, क्योंकि दीन के नाम पर सामने आने वाली हर नई चीज़ बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है।” इस आशय की बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा और उनके बाद सलफ़-ए-सालेह (सदाचारी पूर्वजों) ने बिदअतों से सचेत किया एवं डराया है। इसका कारण यह है कि बिदअतें दीन में वृद्धि करने, जिस चीज़ की अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है उसे दीन बनाने और यहूदियों एवं ईसाइयों जैसे अल्लाह के दुश्मनों की भांति व्यवहार करते हुए दीन के नाम पर नित-नई चीज़ों का आविष्कार करने का द्योतक हैं। दूसरी बात यह है कि बिदअत का आविष्कार इस्लाम धर्म का अपमान और उसपर एक असंपूर्ण धर्म होने का आरोप मढ़ना है। ज़ाहिर है कि यह एक बहुत बड़ा आरोप है, जो सर्वशक्तिमान अल्लाह के इस कथन से सीधे तौर पर टकराता हैं :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ...﴾
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया [सूरा अल-माइदा : 3], इसी तरह यह व्यवहार उन हदीसों के विरुद्ध है, जो बिदअत से सचेत करती और डराती है।
हमें आशा है कि हमारे द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाण इसरा एवं मेराज की रात का जश्न मनाने के संबंध में शरीयत का दृष्टिकोण जानने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए काफ़ी हैं। इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि इस कृत्य का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है।
चूँकि मुसलमानों का शुभचिंतन और उनको दीन की सही जानकारी देना आवश्यक और ज्ञान छुपाना हराम है, इसलिए मैंने सोचा कि अपने मुसलमान भाइयों को इस बिदअत के बारे में सचेत कर दिया जाए, जो बहुत-से इलाक़ों में फैल चुकी है और कुछ लोगों ने उसे दीन का हिस्सा समझ लिया है।
दुआ है कि अल्लाह तमाम मुसलमानों की हालत दुरुस्त कर दे, उनको दीन की सही समझ प्रदान करे और हमें तथा उनको सत्य को मज़बूती से पकड़ने तथा उसपर सुदृढ़ रहने और उसके विपरीत चीज़ों से अलग रहने का सुयोग प्रदान करे। यह सब केवल उसी का काम है और उसके सामर्थ्य से कुछ भी बाहर नहीं है।
अल्लाह की दया, शांति एवं बरकतें अवतरित हों उसके बंदे एवं रसूल, हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, और आपके परिवार एवं साथियों पर।
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بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
सातवीं पुस्तिका:
पंद्रहवीं शाबादन की रात जश्न मनाना शरई दृष्टिकोण से
सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने हमें एक संपूर्ण दीन एवं पूरी नेमत प्रदान की। दरुद व सलाम हो अल्लाह के नबी एवं रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, जो तौबा एवं दया के नबी हैं।
इसके बाद मूल विषय पर आते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا...﴾
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया। [सूरा अल-माइदा : 3], एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿أَمۡ لَهُمۡ شُرَكَٰٓؤُاْ شَرَعُواْ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمۡ يَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُ...﴾
या इन (मुश्रिकों) के कुछ ऐसे साझी हैं, जिन्होंने उनके लिए धर्म का एक ऐसा नियम निर्धारित किया है जिसकी अल्लाह ने अनुमति नहीं दी है? [सूरा अल-शूरा : 21], सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ؛ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।" सहीह मुस्लिम में जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जुमा के ख़ुतबे में कहा करते थे :
«أَمَّا بَعْدُ: فَإِنَّ خَيرَ الحَدِيثِ كِتَابُ اللهِ، وَخَيرَ الهَدْيِ هَدْيُ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللهُ عَلَيهِ وَسَلَّمَ، وَشَرَّ الأُمُورِ مُحْدَثَاتُهَا، وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
"तत्पश्चात, निःसंदेह सबसे अच्छी बात अल्लाह की किताब है, और सबसे उत्तम तरीक़ा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का तरीक़ा है, और सबसे बुरी चीज़ (धर्म के नाम पर निकाली जाने वाली) नई चीज़ें हैं और हर बिदअत (धर्म के नाम पर निकाली गई नई चीज़) गुमराही है।" इस आशय की आयतें एवं हदीसें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। यह सारी आयतें एवं हदीसें स्पष्ट रूप से बताती हैं कि अल्लाह ने इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन एवं परिपूर्ण नेमत प्रदान की है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु अल्लाह का संदेश स्पष्ट रूप से पहुँचा देने और उम्मत को एक-एक शरई कार्य एवं कथन समझा देने के बाद ही हुई है। आपने साफ़-साफ़ बता दिया है कि आपके बाद इस्लाम धर्म के अंग के तौर पर जितने भी कार्य एवं कथनों का आविष्कार होगा, वो अल्लाह के यहाँ ग्रहण नहीं होंगे। चाहे करने वाले की नीयत अच्छी ही क्यों न हो। इस बात से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा और उनके बाद के इस्लामी उलेमा अच्छी तरह अवगत थे। इसलिए, उन्होंने दीन के नाम पर रायज किए जाने वाले नव-आविष्कृत कार्यों का खंडन एवं उनसे सावधान किया। इसके लिए आप इब्न-ए-वज़्ज़ाह, तरतूशी और अबू शामा जैसे लेखकों की किताबें पढ़ सकते हैं, जिन्होंने सुन्नत के महत्व और बिदअत के खंडन पर किताबें लिखी हैं।
कुछ लोगों द्वारा आविष्कृत बिदअतों में से एक बिदअत पंद्रहवीं शाबान की रात को जश्न मनाने और दिन में रोज़ा रखने की बिदअत है। दरअसल इस अमल का कोई ऐसा प्रमाण नहीं है, जिसपर भरोसा किया जा सके। इसकी फ़ज़ीलत में कुछ ज़ईफ़ हदीसें आई हुई हैं, जिनपर भरोसा करना जायज़ नहीं है।
इस रात नमाज़ पढ़ने के बारे में जो हदीसें आई हैं, वह सब की सब मौज़ू (मनगढ़ंत) हैं। बहुत-से इस्लामी विद्वानों ने यह बात कही है और इनमें से कुछ की बातें, इन शा अल्लाह , आगे आएँगी।
इस संबंध में शाम एवं अन्य क्षेत्रों के कुछ सलफ़ के आसार (कथन) भी आए हैं।
यहाँ जिस बात पर जमहूर उलेमा एकमत हैं, वह यह है कि इस रात को जश्न मनाना बिदअत है और इसकी फ़ज़ीलत में आई हुई हदीसें ज़ईफ़ हैं, कुछ तो मौज़ू (मनगढ़ंत) भी हैं। इन बातों का उल्लेख करने वालों में हाफ़िज़ इब्न-ए-रजब भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी किताब "लताइफ़ अल-मआरिफ़" में इन बातों का ज़िक्र किया है। जबकि सर्वविदित है कि ज़ईफ़ हदीसों पर अमल उन्हीं इबादतों के संबंध में किया जाएगा, जिनका मूल और आधार सही प्रमाणों से साबित हो। जहाँ तक पंद्रहवें शाबान की रात को जश्न मनाने का प्रश्न है, तो उसका कोई सहीह आधार नहीं है कि उसको दुर्बल हदीसों से बल मिल सके। इस महत्वपूर्ण नियम का ज़िक्र इमाम अबुल अब्बास शैख़ुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया ने किया है।
यहाँ मैं अपने पाठकों के लिए कुछ मुस्लिम विद्वानों का कथन प्रस्तुत कर दूँगा, ताकि वह इनसे अवगत रहें।
उलेमा इस बात पर एकमत हैं कि जिस मसले में लोगों के बीच विवाद हो जाए, उसे सर्वशक्तिमान अल्लाह की किताब और उसेक रसूल की ओर लौटाना चाहिए। उसके बाद जिसका निर्णय दोनों या दोनों में से कोई एक दे दे, वही शरीयत है, और उसका अनुपालन ज़रूरी है, जो दोनों के विरुद्ध हो उससे दामन छुड़ा लेना आवश्यक है। लेकिन, जिस इबादत का ज़िक्र दोनों में न हो, वह बिदअत है। उसे करना जायज़ नहीं है। उसकी ओर बुलाने और उसका स्वागत करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ وَأُوْلِي ٱلۡأَمۡرِ مِنكُمۡۖ فَإِن تَنَٰزَعۡتُمۡ فِي شَيۡءٖ فَرُدُّوهُ إِلَى ٱللَّهِ وَٱلرَّسُولِ إِن كُنتُمۡ تُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ ذَٰلِكَ خَيۡرٞ وَأَحۡسَنُ تَأۡوِيلًا59﴾
ऐ ईमान वालो! अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल का आज्ञापालन करो और अपने में से अधिकार वालों (शासकों) का। फिर यदि तुम आपस में किसी चीज़ में मतभेद कर बैठो, तो उसे अल्लाह और रसूल की ओर लौटाओ, यदि तुम अल्लाह तथा अंतिम दिन (परलोक) पर ईमान रखते हो। यह (तुम्हारे लिए) बहुत बेहतर है और परिणाम की दृष्टि से बहुत अच्छा है। [सूरा अल-निसा : 59], एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है :
﴿وَمَا ٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِيهِ مِن شَيۡءٖ فَحُكۡمُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ...﴾
और तुम जिस चीज़ के बारे में भी मतभेद करो, उसका निर्णय अल्लाह की ओर है... [सूरा अल-शूरा : 10], एक अन्य स्थान में अल्लाह ने कहा है:
﴿قُلۡ إِن كُنتُمۡ تُحِبُّونَ ٱللَّهَ فَٱتَّبِعُونِي يُحۡبِبۡكُمُ ٱللَّهُ وَيَغۡفِرۡ لَكُمۡ ذُنُوبَكُمۡ...﴾
(ऐ नबी!) कह दीजिए : यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा तथा तुम्हें तुम्हारे पाप क्षमा कर देगा... [सूरा आल-ए-इमरान : 31], एक दूसरी जगह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤۡمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيۡنَهُمۡ ثُمَّ لَا يَجِدُواْ فِيٓ أَنفُسِهِمۡ حَرَجٗا مِّمَّا قَضَيۡتَ وَيُسَلِّمُواْ تَسۡلِيمٗا65﴾
तो (ऐ नबी!) आपके पालनहार की क़सम! वे कभी ईमान वाले नहीं हो सकते, जब तक अपने आपस के विवाद में आपको निर्णायक न बनाएँ, फिर आप जो निर्णय कर दें, उससे अपने दिलों में तनिक भी तंगी महसूस न करें और उसे पूरी तरह से स्वीकार कर लें। [सूरा अल-निसा : 65], इस आशय की आतयें बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जो स्पष्ट रूप से बताती हैं कि विवादित मसलों को किताब एवं सुन्नत की ओर लौटाना और दोनों के निर्णय से संतुष्ट होना ज़रूरी है। यही ईमान का तक़ाज़ा और बंदों के लिए दुनिया एवं आख़िरत में बेहतर है।
इस विषय में हाफ़िज़ इब्न-ए-रजब -रहिमहुल्लाह- अपनी किताब "लताइफ़ अल-मआरिफ़" में कहते हैं :
"पंद्रहवीं शाबान की रात को शाम के ताबिईगण, जैसे ख़ालिद बिन मादान, मकहूल और लुक़मान बिन आमिर आदि सम्मान देते थे और उसमें ख़ूब इबादत किया करते थे। उन्हीं से लोगों ने इस रात की फ़ज़ीलत जानी एवं सम्मान करना सीखा। कहा जाता है कि उनको इस संबंध में कुछ इसराईली रिवायतें मिली थीं। उनके बारे में जब लोगों में यह बात फैल गई, तो लोगों में मतभेद हो गया। कुछ लोगों ने उनसे इस बात को ग्रहण कर लिया और उन्हीं की तरह इस रात का सम्मान करने लगे। इसमें बसरा के कुछ इबादत-गुज़ार लोग तथा अन्य शामिल थे। जबकि हिजाज़ के उलेमा जैसे अता, इब्न-ए-अबू मुलैका आदि ने इसका खंडन किया। अब्दुर रहमान बिन ज़ैद बिन असलम ने मदीने के फ़क़ीहों से भी खंडन नक़ल किया है। यही मत इमाम मालिक के मानने वालों और आदि का है। इन तमाम लोगों का कहना है कि यह पूरे तौर पर बिदअत है।
इस रात को जागना कैसा है, इसमें शाम के उलेमा के दो मत हैं :
1- मस्जिद में एकत्र होकर जागना मुसतहब है। ख़ालिद बिन मादान और लुक़मान बिन आमिर आदि उस रात अच्छे कपड़े पहनते, खुशबू और सुर्मा लगाते और मस्जिद में रात भर क़ियाम करते। इसहाक़ बिन राहवैह भी इसमें उनसे सहमत हैं। एक गिरुह ने इस रात मस्जिद में जमात के साथ नमाज़ पढ़ने के बारे में कहा है कि यह बिदअत नहीं है। उनके इस मत को हर्ब अल-किर्मानी ने अपने मसायल में नक़ल किया है।
2- उस रात नमाज़, क़िस्से सुनने-सुनाने और दुआ आदि के लिए मस्जिद में जमा होना हराम है। लेकिन कोई अकेले नमाज़ पढ़ता है, तो हराम नहीं है। यह शाम वासियों के इमाम, फ़क़ीह और आलिम औज़ाई का कथन है। अल्लाह ने चाहा तो यह कथन सत्य से अधिक निकट है।" उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए आगे लिखा है : "पंद्रहवीं शाबान की रात के बारे में इमाम अहमद का कोई कथन नहीं मिलता। लेकिन उनके सिद्धांतों को देखते हुए उनसे इस रात नमाज़ पढ़ने के संबंध में दो मत निकाले जाते हैं। क्योंकि दोनों ईदों की रातों को नमाज़ पढ़ने के बारे में उनके दो कथन पाए जाते हैं। एक कथन के अनुसार उस रात जमात के साथ नमाज़ पढ़ना मुसतहब नहीं है। क्योंकि यह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा से वर्णित नहीं है। जबकि दूसरे कथन के अनुसार मुसतहब है। क्योंकि अब्दुर रहमान बिन यज़ीद बिन असवद ने ऐसा किया है, जो ताबिई थे। यही हाल पंद्रहवीं शाबान की रात को नमाज़ पढ़ने का है। इस संबंध में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम से कुछ भी साबित नहीं है। जबकि शाम के महत्वपूर्ण फ़क़ीहों में शुमार होने वाले कुछ ताबिईन से साबित है"।
हाफ़िज़ इब्न-ए-रजब का कथन समाप्त हुआ। इसमें वह स्पष्ट रूप से कहते हुए नज़र आते हैं कि पंद्रहवीं शाबान की रात के बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम से कुछ भी साबित नहीं है।
जहाँ तक औज़ाई द्वारा व्यक्तिगत रूप से इस रात नमाज़ पढ़ने के मत को चुनने और इब्न-ए-रजब के भी इसे चयन करने की बात है, तो यह आश्चर्यजनक एवं एक दुर्बल मत है। क्योंकि जो चीज़ शरई प्रमाणों द्वारा शरीयत का हिस्सा बन नहीं पाती, उसे दीन का हिस्सा बना लेना जायज़ नहीं है। उसे अकेले किया जाए या जमात के साथ। चुपके से किया जाए या सब को दिखाकर। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन आम है :
«مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيهِ أَمْرُنَا؛ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके सम्बंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह अग्रहणीय है।" साथ ही इसके अतिरिक्त भी बहुत-से प्रमाण हैं, जो बिदअत का खंडन करते और उससे सावधान एवं सचेत करते हैं।
इमाम अबू बक्र तरतूशी अपनी किताब "अल-हवादिस व अल-बिदअ" में कहते हैं :
"इब्न-ए-वज़्ज़ाह का वर्णन है कि ज़ैद बिन असलम ने कहा है : हमने अपने गुरुओं एवं फ़क़ीहों में किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं पाया, जो पंद्रवीं शाबान पर ध्यान देते हों, मकहूल की बात पर तवज्जो देते हों। यह लोग इस रात को अन्य रातों से अलग नहीं मानते थे।"
इब्न-ए-अबू मुलैका से कहा गया कि ज़ियाद नुमैरी कहते हैं : "शाबान की पंद्रहवीं रात का प्रतिफल लैलतुल क़द्र के प्रतिफल के बराबर है।" यह सुनकर उन्होंने कहा : "अगर मैं उसे यह बात कहते हुए सुनता और उस समय मेरे हाथ में कोई लाठी होती, तो मैं उसे उस लाठी से पीट देता।" ज़ियाद असल में क़िस्सा गो थे। अभिप्राय समाप्त हुआ।
अल्लामा शौकानी -रहिमहुल्लाह- ने "अल-फ़वाइद अल-मजमूआ" में कहा है :
"हदीस : "ऐ अली! जिसने पंद्रहवीं शाबान की रात को सौ रकातें पढ़ीं और हर रकात में सूरा फ़ाहिता और क़ुल हुव-ल्लाहु अहद दस बार पढ़ी, अल्लाह उसकी हर ज़रूरत पूरी करेगा....।" यह हदीस मौज़ू (मनगढंत) है। इस हदीस के अंदर जो प्रतिफल बयान किए गए हैं, उसी से हर समझदार इन्सान को विश्वास हो जाएगा कि यह हदीस मौज़ू (मनगढ़ंत) है। इस हदीस के वर्णनकर्ता अज्ञात हैं। यह हदीस दूसरी तथा तीसरी सनद से भी आई है, लेकिन सब की सब मौज़ू (मनगढ़ंत) हैं और सब के वर्णनक्ता अज्ञात हैं। और शौकानी ने "अल-मुख़तसर" में कहा : पंद्रहवीं शाबान की हदीस बातिल है। इब्न-ए-हिब्बान में अली रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है : "जब पंद्रहवीं शाबान की रात आए, तो तुम रात में नमाज़ पढ़ो और दिन में रोज़ा रखो।" लेकिन यह हदीस ज़ईफ़ है। जबकि "अल-लआली" में कहा है : दैलमी आदि में मौजूद हदीस, जिसमें "शाबान की पंद्रहवीं रात को सौ रकात नमाज़, दस-दस बार सूरा इख़लास के साथ" पढ़ने की बड़ी लंबी-चौड़ी फ़ज़ीलतें बयान की गई हैं, मौज़ू है। इसकी तीनों सनदों के अधिकतर वर्णनकर्ता अज्ञात एवं जईफ हैं। वह कहते हैं : "तीस बार सूरा इख़लास के साथ बारह रकात नमाज़" वाली हदीस भी मौज़ू है। इसी तरह चौदह रकात नमाज़ वाली हदीस भी मौज़ू है।
इस हदीस से फ़क़ीहों के एक गिरुह ने, जैसे "अल-इहया" के लेखक आदि ने धोखा खाया है। यही हाल कई मुफ़स्सिरों का भी है। शाबान की पंद्रहवी रात की नमाज़ विभिन्न ढ़ंगों से वर्णित हुई है, लेकिन यह सब के सब बातिल एवं मौज़ू हैं। लेकिन इससे आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से वर्णित सुनन तिर्मिज़ी की उस हदीस का खंडन नहीं होता, जिसमें है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बक़ी क़ब्रिस्तान गए, और यह कि अल्लाह पंद्रहवीं शाबान की रात को पहले आकाश पर उतरता है तथा बनी कल्ब क़बीले की बकरियों के बालों से अधिक संख्या में लोगों को क्षमा करता है। क्योंकि यहाँ एक तो बात इस रात में मनगढ़ंत पढ़ी जाने वाली नमाज़ की हो रही है, और दूसरा यह कि आइशा रज़ियल्लहु अनहा की इस हदीस में दुर्बलता एवं उसके वर्णनकर्ताओं की शृंखला में टूट है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे अली रज़ियल्लाहु अनहु की हदीस भी, जो पीछे गुज़र चुकी है, उससे इस तथ्य का खंडन नहीं होता कि यह नमाज़ मनगढ़ंत है। हालाँकि वह हदीस भी दुर्बल है, जैसा कि हम पीछे बयान कर आए हैं।"
हाफ़िज़ इराक़ी कहते हैं : "पंद्रहवीं शाबान की रात की नमाज़ वाली हदीस मनगढ़ंत एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर बाँधा गया झूठ है।" इमाम नववी अपनी किताब "अल-मजमूअ" में कहते हैं : "सलात अल-रग़ाइब के नाम से मश्हूर नमाज़, जो रजब महीने के पहले जुमे की रात को मग़्रिब और इशा के बीच बारह रकात पढ़ी जाती है और इसी तरह पंद्रहवीं शाबान की रात को पढ़ी जाने वाली सौ रकात नमाज़, दोनों बिदअत और ग़ैर-शरई हैं। किसी को इस बात से धोखा नहीं खाना चाहिए कि इनका ज़िक्र "क़ूत अल-क़ुलूब" एवं "इहया उलूम अल-दीन" जैसी किताबों में हुआ है। इसी तरह इन दोनों के बारे में आई हुई हदीसों से भी धोखा नहीं खाना चाहिए। क्योंकि यह हदीसें सही नहीं हैं। इस बात से भी धोखा नहीं खाना चाहिए कि कुछ इमामों को इन नमाज़ों के बारे में शरई दृष्टिकोण जानने में ग़लती हुई और उन्होंने इनके मुसतहब होने के बयान में कुछ पृष्ट लिख डाले। क्योंकि यहाँ उनसे ग़लती हुई है।"
शैख़ इमाम अबू मुहम्मद अब्दुर रहमान बिन इस्माईल मक़दिसी ने इन दोनों नमाज़ों को बातिल (अमान्य) प्रमाणित करने के लिए एक बहुत ही मूल्यवान किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने इस मसले पर बड़ी अच्छी बात की है। दरअसल इस मसले में इस्लामी विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा और कहा है। अगर हम जो कुछ जानते हैं, सब नक़ल करने लगें, तो बात लंबी हो जाएगी। हम समझते हैं कि जितना हमने नक़ल कर दिया है, वह सत्य की तलाश करने वाले के लिए काफ़ी है।
अब तक नक़ल की गई आयतों, हदीसों और इस्लामी विद्वानों के कथनों से स्पष्ट है कि विशेष रूप से पंद्रहवीं शाबान की रात को नमाज़ आदि के लिए जागना और उस रोज़ दिन में रोज़ा रखना अधिकतर इस्लामी विद्वानों की नज़र में बिदअत एवं ग़ैर-शरई कार्य है। शरीयत में इसका कोई आधार नहीं है। इसकी शुरूआत सहाबा के दौर के बाद हुई। इस संबंध में सही क्या है, यह जानने के लिए तो बस अल्लाह का यह कथन :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ...﴾
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया [सूरत अल-माइदा : 3]। तथा इस आशय की अन्य आयतें, एवं अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।" और इस आशय की अन्य हदीसें ही काफ़ी हैं।
सहीहम मुस्लिम में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَا تَخُصُّوا لَيْلَةَ الْجُمُعَةِ بِقِيَامٍ مِنْ بَيْنِ اللَّيَالِي، وَلَا تَخُصُّوا يَوْمَهَا بِالصِّيَامِ مِنْ بَيْنِ الْأَيَّامِ، إِلَّا أَنْ يَكُونَ فِي صَوْمٍ يَصُومُهُ أَحَدُكُمْ».
"सभी रातों के बीच में से विशेष रूप से जुमे की रात को जागकर नमाज़ न पढ़ा करो। सभी दिनों के बीच में से विशेष रूप से जुमे के दिन को रोज़ा न रखा करो। हाँ, जुमे का दिन अगर ऐसे रोज़े के बीच में आ जाए जिसको तुम में से कोई रखने का आदी हो , तो कोई बात नहीं है।" अगर किसी रात को विशेष रूप से कोई इबादत करना जायज़ होता, तो जुमे की रात का नम्बर पहले आता। क्योंकि जुमे का दिन सबसे बेहतर दिन है, जिसमें सूरज निकलता है। यह बात अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह हदीसों से साबित है। लेकिन जब इसके बावजूद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने विशेष रूप से कोई इबादत करने से मना कर दिया, तो पता यह चला कि अन्य रातों में विशेष रूप से कोई इबादत करने की मनाही तो और ज़्यादा होगी। हाँ, अगर इसका कोई सही प्रमाण मौजूद हो, तो बात अलग है।
मसलन चूँकि लैलतुल क़द्र और रमज़ान महीने की रातों में जागकर इबादत करना एक शरई कार्य है, इसलिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसकी ओर लोगों को ध्यान दिलाया, उसकी प्रेरणा दी और ख़ुद किया भी। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ قَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ، وَمَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ».
"जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए रमज़ान महीने की रातों को जागकर इबादत की, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। और जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए लैलतुल क़द्र में जागकर इबादत की, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।" ऐसे में अगर पंद्रहवीं शाबान की रात, रजब महीने के पहले जुमे की रात या इसरा एवं मेराज की रात को जश्न मनाना, सभा का आयोजन करना या कोई भी इबादत करना शरई कार्य होता, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसकी ओर उम्मत को तवज्जो दिला देते या ख़ुद करके दिखा देते। और अगर ऐसा कुछ भी हुआ होता, तो सहाबा उसे ज़रूर नक़ल करते। छुपाते तो हरगिज़ नहीं। क्योंकि वह नबियों के बाद सबसे उत्तम लोग और लोगों के सबसे बड़े शुभचिंतक थे।
जबकि आपने अभी-अभी उलेमा के कथनों द्वारा जाना कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और इसी तरह आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम से रजब महीने के पहले जुमे की रात और पंद्रहवीं शाबान की रात की फ़ज़ीलत में कुछ भी साबित नहीं है। इसलिए स्पष्ट है कि इन दोनों रातों को सभा का आयोजन करना बिदअत और दीन के नाम पर किया जाने वाला एक नया काम है। इसी तरह इन दोनों रातों में विशेष रूप से कोई भी इबादत करना बिदअत एवं ग़ैर-शरई कार्य है। यही हाल रजब महीने की सत्ताइसवीं रात का भी है, जिसे कुछ लोग इसरा एवं मेराज की रात समझते हैं। उस रात को भी विशोष रूप से कोई इबादत करना जायज़ नहीं है। सभा का आयोजन भी जायज़ नहीं है। दलीलें वही हैं, जो पीछे गुज़र चुकी हैं। यह भी उस समय है, जब इसरा एवं मेराज की रात का पता होता। उलेमा के सही मत अनुसार तो पता ही नहीं है कि वह रात किस महीने की थी और तिथि कौन-सी थी। अगर किसी ने कहा है कि वह रजब महीने की सत्ताइसवीं रात थी, तो उसका कथन ग़लत एवं बेबुनियाद है। सहीह हदीसों में ऐसा कुछ भी नहीं है। किसी ने क्या ही अच्छा कहा है :
सबसे अच्छी चीज़ें वह हैं, जो सलफ़ के यहाँ हिदायत अनुरूप पाई जाती थीं और सबसे बुरी चीज़ें वह हैं, जो दीन के नाम पर बाद में जारी कर दी गईं।
दुआ है कि अल्लाह हमें और तमाम मुसलमानों को सुन्नत को पकड़े रहने, उसपर जमे रहने और सुन्नत विरोधी चीज़ों से सावधान रहने का सुयोग प्रदान करे। जिसको जो भी मिलता है, उसी के यहाँ से मिलता है।
दरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिवार और तमाम साथियों पर।
***
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
आठवीं पुस्तिका :
एक झूठी वसीयत के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें
जो हरम-ए-नबवी के सेवक शैख़ अहमद के नाम पर प्रचलित है
अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ की ओर से इससे अवगत होने वाले तमाम मुसलमानों के नाम। अल्लाह इस्लाम द्वारा हम सब की रक्षा करे और हम सब को अनाप-शनाप बोलने वाले अज्ञान लोगों से सुरक्षित रखे।
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह, (आप पर शांति, अल्लाह की दया एवं बरकतें उतरें।)
अब मूल विषय पर आते हैं। मैं हरम-ए-नबवी के ख़ादिम शैख़ अहमद की ओर मंसूब एक लेख से अवगत हुआ, जिसका शीर्षक है : "यह मदीना मुनव्वरा से हरम-ए-नबवी के ख़ादिम शैख़ अहमद की एक वसीयत है"। उसमें कहा गया है :
"जुमे की रात को मैं जगा हुआ था। मैं क़ुरआन पढ़ता रहा और अल्लाह के नामों का जाप करता रहा। इन कार्यों को संपन्न करने के बाद सोने की तैयारी कर रहा था किन मैं ने देखा चमकदार चेहरे वाले मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को, जो क़ुरआन एवं विधि-विधानों के साथ संसार वासियों के लिए दया बनकर आए थे। आपने कहा : ऐ शैख़ अहमद! मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! ऐ सर्वश्रेष्ट सृष्टि! मैं उपस्थित हूँ। आपने मुझसे कहा : मैं लोगों के कुकर्मों पर शर्मिंदा हूँ। मैं अपने रब एवं फ़रिश्तों के सामने खड़ा नहीं हो सकता। पिछले जुमा से इस जुमा तक एक लाख साठ हज़ार लोग इस्लाम धर्म का पालन किए बिना ही मर गए। फिर लोगों द्वारा किए जा रहे कुछ गुनाहों का ज़िक्र किया। उसके बाद फ़रमाया : यह वसीयत सर्वशक्तिमान एवं बलशाली अल्लाह की ओर से दया के तौर पर की जा रही है। फिर क़यामत की कुछ निशानियों का ज़िक्र किया और उसके बाद कहा : ऐ शैख़ अहमद! आप इस वसीयत की सूचना लोगों को दे दें। क्योंकि इसे लौह-ए-महफ़ूज़ से तक़दीर की क़लम से नक़ल किया गया है। जो व्यक्ति इसे लिखकर एक देश से दूसरे देश एवं एक स्थान से दूसरे स्थान भेजेगा, उसके लिए जन्नत में एक महल बनाया जाएगा। जो इसे लिखने एवं भेजने से पीछे हटेगा, क़यामत के दिन उसपर मेरी सिफ़ारिश हराम होगी। जो निर्धन व्यक्ति इसे लिखेगा, अल्लाह इस वसीयत की बरकत से उसे धनवान बना देगा। क़र्ज़ हो तो अल्लाह उतार देगा। गुनाह हो, तो उसे और उसके माता-पिता को क्षमा कर देगा। जो इसे नहीं लिखेगा, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसका चेहरा काला करेगा। अंत में कहा : मैं अल्लाह की क़सम खाकर कहता हूँ कि यहाँ जितनी बातें कही गई हैं, सब सत्य हैं। अगर मैंने कोई बात झूठी कही है, तो मैं इस दुनिया से इस्लाम से हाथ धोकर निकलूँगा। जो इस वसीयत को सच जानेगा, वह जहन्नम की यातना से मुक्ति पा लेगा और जो इसे झुठलाएगा, वह काफ़िर हो जाएगा।"
यह सारांश है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हवाले से नक़ल की जाने वाली इस झूठी वसीयत का। यह वसीयत पिछले कुछ सालों से कई बार सुनने को मिली है। शब्दों के कुछ फेर-बदल के साथ इसे बीच-बीच में प्रचारित किया जाता रहा है। इस झूठी वसीयत को तैयार करने वाला व्यक्ति कहता रहा है कि उसने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को स्वप्न में देखा और आप ने उसे इस वसीयत का बोझ सौंपा। लेकिन इस आखरी प्रकाशन में वह कहता है कि वह सोने की तैयारी कर रहा था कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नज़र आए। इसका अर्थ यह है कि उसने आपको जागने की अवस्था में देखा है।
इस वसीयत के अंदर इस झूठे इन्सान ने बहुत-सी ऐसी बातें कही हैं, जो स्पष्ट रूप से झूठी एवं असत्य हैं। अल्लाह ने चाहा, तो मैं आगे उनके बारे में बात करूँगा। मैंने पिछले वर्षों में भी उनके बारे में बताया है और कहा है कि यह सारी बातें बिल्कुल झूठी हैं। यही कारण है कि इस बार यह वसीयत छपी, तो मैं इसके बारे में लिखने में आगे-पीछे हो रहा था। मुझे लग रहा था कि इसका ग़लत होना इतना स्पष्ट है कि कोई भी समझदार एवं स्वच्छ प्रकृति का व्यक्ति इसपर विश्वास नहीं करेगा। लेकिन मुझे मेरे कई दीनी भाइयों ने बताया है कि यह बहुत-से लोगों तक पहुँच गई है और कुछ लोगों ने इसे सच मान भी लिया है। इसलिए मैंने ज़रूरी समझा कि मुझ जैसे व्यक्ति को इसके बारे में कुछ लिखना चाहिए, ताकि लोगों को पता चल जाए कि यह झूठी वसीयत है और इससे धोखा न खाएँ। इसे ग़ौर से पढ़ने वाला हर ज्ञान, ईमान, स्वच्छ प्रवृत्ति एवं विवेक रखने वाले व्यक्ति को पता चल जाएगा कि यह झूठी वसीयत है। इसके बहुत सारे कारण भी हैं।
मैंने शैख़ अहमद, जिनके हवाले से यह झूठी वसीयत की गई है, के एक निकट सम्बन्धी व्यक्ति से इसके बारे में पूछा, तो उसने मुझसे कहा कि शैख़ अहमद की ओर इसकी निस्बत झूठी है। उन्होंने इस प्रकार की कोई बात कही या लिखी नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि उक्त शैख़ अहमद की मृत्यु काफ़ी समय पहले हो चुकी है। लेकिन अगर मान भी लिया जाए कि शैख़ अहमद या उनसे किसी बड़े आदमी ने कह दिया कि उसने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को स्वप्न में या जागते हुए देखा है और आपने उसे यह वसीयत की है, तब भी पूरे विश्वास के साथ कहेंगे कि वह या तो झूठा है या फिर उससे यह बातें शैतान ने कही हैं। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नहीं। इसके बहुत-से कारण हैं। जैसे :
1- पहला कारण यह है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपकी मृत्यु के बाद जागते हुए देखा नहीं जा सकता। अगर किसी अज्ञान सूफ़ी ने दावा किया कि वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को जागते हुए देखता है, या आप अपने जन्म-दिन के आयोजन में आते हैं, तो उसने बहुत बड़ी ग़लत बयानी से काम लिया और अल्लाह की किताब, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत एवं उलेमा के इजमा (मतैक्य) के विरुद्ध चला गया। क्योंकि मरे हुए लोग अपनी क़ब्रों से क़यामत के दिन ही निकलेंगे। दुनिया में नहीं। जो इससे हटकर कुछ बोल रहा है, वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर उस सच्चे इस्लाम से अवगत नहीं है, जिससे इस उम्मत के सदाचारी पूर्वज अवगत थे और जिसपर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एवं उनके मार्ग पर सच्चाई के साथ चलने वाले लोगों ने चलकर दिखाया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿ثُمَّ إِنَّكُم بَعۡدَ ذَٰلِكَ لَمَيِّتُونَ15 ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ تُبْعَثُونَ16﴾
फिर निःसंदेह तुम इसके पश्चात् अवश्य मरने वाले हो।
फिर निःसंदेह तुम क़ियामत के दिन उठाए जाओगे। [सूरा अल-मोमिनून : 15, 16], अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«أَنَا أَوَّلُ مَنْ تَنْشَقُّ عَنْهُ الْأَرْضُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ، وَأَنَا أَوَّلُ شَافِعٍ وَأَوَّلُ مُشَفَّعٍ».
"मैं पहला व्यक्ति हूँगा, जिसकी क़ब्र क़यामत के दिन खुलेगी। इसी तरह मैं पहला सिफ़ारिश करने वाला हूँगा और पहला व्यक्ति हूँगा, जिसकी सिफ़ारिश स्वीकार की जाएगी।" इस आशय की आयतें और हदीसें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
2- दूसरा कारण यह है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सत्य के विपरीत कोई बात नहीं कहते। न तो जीवन काल में और न मृत्यु को प्राप्त होने के बाद। जबकि इस वसीयत में आपकी शरीयत के विरुद्ध बहुत-सी बातें मौजूद हैं। इसी प्रकार अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को केवल स्वप्न में ही देखा जा सकता है। जिसने आपको स्वप्न में आपकी असली शक्ल एवं सूरत में देखा, उसने आपको देखा। क्योंकि शैतान आपका रूप धारण नहीं कर सकता। यह बात एक सही हदीस में आई हुई है। लेकिन असल मामला देखने वाले के ईमान, सच्चाई, विश्वसनीयता, सही समझने और सही से याद रखने की क्षमता, दीनदारी और अमानतदारी का है। बात यह भी है कि क्या सच-मुच उसने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपकी असल शक्ल सूरत में देखा है या नहीं?
अगर आपके जीवन काल में कही हुई कोई बात भी अविश्वसनीय एवं कमज़ोर याद-दाश्त वाले वर्णनकर्ताओं की शृंखला से वर्णित हो, तो उसपर भरोसा नहीं किया जा सकता है, तथा उसे प्रमाण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। इसी तरह यदि कोई हदीस विश्वसनीय एवं याद रखने की क्षमता वाले वर्णनकर्ताओं की शृंखला से वर्णित हो, लेकिन किसी ऐसी हदीस के विरुद्ध हो, जिसे इनसे भी अधिक विश्वसनीय एवं याद रखने की क्षमता वाले वर्णनकर्ताओं ने नक़ल किया हो और दोनों के बीच सामंजस्य बिठाना संभव न हो, तो पहली हदीस को निरस्त माना जाएगा और दूसरी हदीस को निरस्त करने वाला। लेकिन अगर सामंजस्य बिठाने के साथ-साथ निरस्त होने का निर्णय लेना भी संभव न हो, तो याद रखने की कम क्षमता रखने वाले और कम विश्वसनीय वर्णनकर्ता की रिवायत को परे रख दिया जाएगा और उसके बारे में यह निर्णय लिया जाएगा कि यह विसंगति है, उसके अनुसार अमल नहीं किया जाए गा।
ऐसे में किसी ऐसी वसीयत का क्या हाल हो सकता है, जिसके बारे में पता ही न हो कि उसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से किसने नक़ल किया है? वह विश्वसनीय एवं अमानतदार है भी या नहीं? इस प्रकार की वसीयत में कोई शरीयत विरोधी बात न भी हो, तब भी उसपर ध्यान नहीं दिया जा सकता। तो उस वसीयत को तो छोड़ ही दीजिए, जिसके अंदर कही गई बहुत-सी बातें साफ़ तौर पर बताती हों कि वह झूठी है और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर उसकी निस्बत ग़लत है। उसमें एक ऐसा दीन खड़ा किया गया हो, जिसकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है।
जबकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ قَالَ عَلَيَّ مَا لَمْ أَقُلْ؛ فَلْيَتَـبَوَّأْ مَقْعَدَهُ مِنَ النَّارِ».
"जिसने जान-बूझकर मुझपर झूठ बोला, वह अपना ठिकाना जहन्नम बना ले।" इस वसीयत के लेखक ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का हवाला देकर ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं, जो आपने कही नहीं हैं। उसने आपके हवाले से स्पष्ट झूठी बातें लिखी हैं। इसलिए वह इस हदीस में दी गई चेतावनी का बहुत ज़्यादा हक़दार है, अगर फ़ौरन तौबा न कर ले और लोगों को बता न दे कि उसने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का हवाला देकर झूठी बातें लिखी और फैलाई हैं। क्योंकि जिसने दीन का हवाला देकर ग़लत बात फैलाई, उसकी तौबा उस समय तक स्वीकार नहीं की जाएगी, जब तक लोगों के अंदर इस बात की घोषणा न कर दे कि वह अपने कहे हुए झूठ को वापस लेता है। क्योंकि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡتُمُونَ مَآ أَنزَلۡنَا مِنَ ٱلۡبَيِّنَٰتِ وَٱلۡهُدَىٰ مِنۢ بَعۡدِ مَا بَيَّنَّٰهُ لِلنَّاسِ فِي ٱلۡكِتَٰبِ أُوْلَٰٓئِكَ يَلۡعَنُهُمُ ٱللَّهُ وَيَلۡعَنُهُمُ ٱللَّٰعِنُونَ159 إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُواْ وَأَصۡلَحُواْ وَبَيَّنُواْ فَأُوْلَٰٓئِكَ أَتُوبُ عَلَيۡهِمۡ وَأَنَا ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ160﴾
निःसंदेह जो लोग उसको छिपाते हैं जो हमने स्पष्ट प्रमाणों और मार्गदर्शन में से उतारा है, इसके बाद कि हमने उसे लोगों के लिए किताब में स्पष्ट कर दिया है, उनपर अल्लाह लानत करता है और सब लानत करने वाले उनपर लानत करते हैं।
परंतु वे लोग जिन्होंने तौबा कर ली और सुधार कर लिया और खोलकर बयान कर दिया, तो ये लोग हैं जिनकी मैं तौबा स्वीकार करता हूँ और मैं ही बहुत तौबा क़बूल करने वाला, अत्यंत दयावान् हूँ। [सूरा अल-बक़रा : 159, 160], इस आयत में पवित्र एवं महान अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया है कि जिसने कोई सत्य छुपाया, उसकी तौबा उस समय तक स्वीकार नहीं होगी, जब तक अपने आपको सुधार न ले और सब कुछ खोलकर बयान न कर दे। दरअसल अल्लाह ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रसूल बनाकर और उनपर एक संपूर्ण शरीयत उतारकर अपने बंदों को एक संपूर्ण दीन एवं परिपूर्ण नेमत दी है। अल्लाह ने आपको दुनिया से दीन को पूरा करने और सब कुछ खोल कर बयान कर देने के बाद ही उठाया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا...﴾
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया। [सूरत अल-माइदा : 3],
इस झूठी वसीयत का लेखक चौदहवीं सदी में पैदा हुआ, जो लोगों को एक नए दीन के मकड़जाल में फँसाना चाहता है, जिसका पालन करने वाला जन्नत जाएगा और जिससे मुँह मोड़ने वाला जहन्नम। वह अपनी इस झूठी वसीयत को क़ुरआन से भी महान एवं उत्कृष्ट दिखाना चाहता है। उसके अनुसार इसे लिखकर एक नगर से दूसरे नगर या एक स्थान से दूसरे स्थान भेजने वाले के लिए जन्नत में महल बनाया जाएगा और इसे लिखने एवं आगे भेजने से कतराने वाला क़यामत के दिन अल्लाह के नबी सल्ल्ललाहु अलैहि व सल्लम की सिफ़ारिश से वंचित हो जाएगा। यह एक बदतरीन झूठ है, जो स्पष्ट रूप से बता देता है कि यह वसीयत झूठी है और इसे लिखने वाला एक बेशर्म इन्सान है। क्योंकि अगर किसी ने क़ुरआन को लिखा और उसे एक नगर से दूसरे नगर या एक स्थान से दूसरे स्थान भेजा, तो इतने मात्र से वह जन्नत में महल का हक़दार नहीं बन पाएगा, अगर वह क़ुरआन पर अमल नहीं करता है। तो फिर इस झूठी वसीयत को लिखने और उसे एक नगर से दूसरे नगर भेजने मात्र से इन्सान इसका हक़दार कैसे बन जाएगा? इसी तरह जिसने क़ुरआन को लिखने और उसे एक नगर से दूसरे नगर भेजने से गुरेज़ किया, वह इतने मात्र से अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिफ़ारिश से वंचित नहीं हो जाएगा, अगर वह आपपर ईमान रखता और आपकी शरीयत का पालन करता हो। बस यही एक झूठ इस वसीयत के असत्य होने तथा इसके प्रकाशक के झूठे, बेशर्म, मूर्ख और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई शरीयत से उसके अनभिज्ञ एवं दूर होने को बताने के लिए काफ़ी है।
इस वसीयत के अंदर इसके अतिरिक्त भी कई अन्य बातें हैं, जो इसके असत्य एवं झूठे होने को प्रमाणित करती हैं। भले ही इसके लिखने वाले ने इसे सही दिखाने के लिए हज़ार क़समें खा ली हों, और भले ही झूठे होने की स्थिति में अपने लिए बड़ी भयानक यातना की बद-दुआ कर ली हो, उसकी इन क़समों एवं बद-दुआओं से उसकी यह वसीयत सही नहीं हो सकती। अल्लाह की क़सम, यह एक बदतरीन प्रकार का झूठ है। हम गवाह बनाते हैं पवित्र अल्लाह को, तथा हमारे साथ उपस्थित फ़रिश्तों को, और हमारे ये शब्द जितने मुसलमानों तक पहुँचेंगे उन सभों को, -इस दृढ़ विश्वास के साथ गवाह बनाते हैं कि एक दिन महान अल्लाह के सामने हमें उपस्थित होना है- यह कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हावाले से की गई यह वसीयत झूठी है। अल्लाह इस झूठ के लिखने वाले को रुस्वा करे और उसके साथ वही व्यवहार करे, जिसका वह हक़दार है।
अब तक जो कुछ आपने पढ़ा, उसके अतिरिक्त और भी बहुत-सी बातें हैं, जो इस वसीयत के असत्य होने पर मुहर लगाती हैं। जैसे :
1- उसके अंदर कहा गया है : "पिछले जुमा से इस जुमा तक एक लाख साठ हज़ार लोग इस्लाम धर्म का पालन किए बिना ही मर गए।" क्योंकि इस दावे का संबंध ग़ैब की बात जानने से है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु के बाद आप पर वह्य आने का सिलसिला बंद हो चुका है। वैसे, तो जीवन काल में भी आप ग़ैब का ज्ञान नहीं रखते थे, तो फिर मृत्यु के बाद इस तरह की बात कैसे कह सकते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿قُل لَّآ أَقُولُ لَكُمۡ عِندِي خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعۡلَمُ ٱلۡغَيۡبَ...﴾
(ऐ नबी!) आप कह दें : मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, और न मैं परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान रखता हूँ... [सूरा अल-अनआम : 50], एक अन्य स्थान में फ़रमाया है :
﴿قُل لَّا يَعۡلَمُ مَن فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ ٱلۡغَيۡبَ إِلَّا ٱللَّهُ...﴾
आप कह दें : अल्लाह के सिवा, आकाशों और धरती में जो भी है, ग़ैब (परोक्ष की बात) नहीं जानता... [सूरा अल-नम्ल : 65], सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«يُذَادُ رِجَالٌ عَنْ حَوْضِي يَوْمَ القِيَامَةِ، فَأَقُولُ: يَا رَبِّ! أَصْحَابِي أَصْحَابِي، فَيُقَالُ لِي: إِنَّكَ لَا تَدْرِي مَا أَحْدَثُوا بَعْدَكَ، فَأَقُولُ كَمَا قَالَ العَبْدُ الصَّالِحُ: ﴿وَكُنتُ عَلَيۡهِمۡ شَهِيدٗا مَّا دُمۡتُ فِيهِمۡۖ فَلَمَّا تَوَفَّيۡتَنِي كُنتَ أَنتَ ٱلرَّقِيبَ عَلَيۡهِمۡۚ وَأَنتَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ شَهِيدٌ﴾ [المائدة: 117]».
"क़यामत के दिन कुछ लोगों को मेरे हौज़ से दूर हटा दिया जाएगा। यह देख मैं कहूँगा : ऐ अल्लाह! ये तो मेरे लोग हैं, ये तो मेरे लोग हैं? इसपर अल्लाह कहेगा : तुझे पता नहीं है कि इन लोगों ने तेरे बाद क्या-क्या किया। उस समय मैं वही कहूँगा, जो अल्लाह के नेक बंदे (यानी ईसा अलैहिस्सलाम) ने कहा था : {जब तक मैं उनके बीच रहा, उनपर गवाह रहा। फिर जब तूने मुझे उठा लिया तो तू ही उनसे अवगत रहा और तू हर चीज़ की पूरी सूचना रखता है।}" [सूरा अल-माइदा : 117]।
2- इसके वसीयत के झूठ का पोल उसके इस वाक्य से भी खुलता है : "जो निर्धन व्यक्ति इसे लिखेगा, अल्लाह इस वसीयत की बरकत से उसे धनवान बना देगा। क़र्ज़ हो तो अल्लाह उतार देगा। गुनाह हो, तो उसे और उसके माता-पिता को क्षमा कर देगा।" यह एक बहुत बड़ा झूठ है, जो बताता है कि इसे लिखने वाला बेशर्मी की सारी हदें पार कर चुका है। क्योंकि यह तीन चीज़ें तो केवल पवित्र क़ुरआन को लिखने मात्र से भी प्राप्त नहीं होतीं, भला इस झूठी वसीयत को लिखने से कैसे प्राप्त हो सकती हैं?! दरअसल इसका लेखक लोगों को भ्रमित करके उन्हें इस वसीयत में अटका देना चाहता है कि इसे लिखते रहें, इसकी तथाकथित फ़ज़ीलत से चिपके रहें, उन कार्यों को छोड़ दें, जिन्हें करने का आदेश अल्लाह ने बंदों को दिया है और जिन्हें धन की प्राप्ति, क़र्ज़ की अदायगी और गुनाहों की क्षमा का साधन बनाया है। हम विफलता की ओर ले जाने वाली इन चीज़ों और इच्छा एवं शैतान के अनुसरण से अल्लाह की शरण माँगते हैं।
3- इस वसीयत के ग़लत होने का एक प्रमाण उसमें दर्ज यह वाक्य भी है : "जो इसे नहीं लिखेगा, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसका चेहरा काला करेगा।" यह भी एक बदतरीन झूठ एवं स्पष्ट प्रमाण है इस बात की कि यह वसीयत असत्य है और इसे लिखने वाला कोई झूठा इन्सान है। भला कोई समझदार ऐसा कैसे हो सकता है कि चौदह सदियों बाद पैदा होने वाले एक अज्ञान व्यक्ति द्वारा तैयार किए गए एक वसीयत को लिख कर बाँटे, जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हवाले से झूठ बोलता हो और कहता हो कि जो इसे लिखर नहीं बाँटेगा, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसके चेहरे को काला करेगा और अगर किसी निर्धन ने उसे लिखकर बाँटा तो धनवान हो जाएगा, क़र्ज़ में डूबे हुए व्यक्ति ने यह काम किया, तो क़र्ज़ उतर जाएगा और उसके सारे गुनाह माफ़ हो जाएँगे!!
यह एक बहुत बड़ा मिथ्या आरोप है। प्रमाण एवं वास्तविकता दोनों बताते हैं कि इस प्रकार की बात करने वाला व्यक्ति झूठा, अल्लाह के प्रति दुस्साहस करने वाला और निर्लज्जता की सारी सीमाओं को पार करने वाला है। दुनिया में बेशुमार लोगों ने इसे लिखकर नहीं बाँटा फिर भी उनके चेहरे काले नहीं हुए। अनगिनत लोगों ने उसे बहुतों बार लिखकर बाँटा, लेकिन उनका क़र्ज़ अदा नहीं हुआ। वह आज भी निर्धन हैं। हम दिलों की गुमराहियों और गुनाहों के ज़ंग से अल्लाह की शरण माँगते हैं। ये ऐसी विशेषताएं और ऐसे प्रतिफल हैं, जो अल्लाह ने सबसे उत्कृष्ट ग्रंथ यानी क़ुरआन लिखने वाले को भी नहीं दिए। किसी झूठी एवं ग़लत-सलत बातों से भरी हुई वसीयत को लिखने वाले को कैसे दे सकता है?
4- इस वसीयत के असत्य एवं झूठे होने का एक प्रमाण उसका यह वाक्य है : "जो इस वसीयत को सच जानेगा, वह जहन्नम की यातना से मुक्ति पा लेगा और जो इसे झुठलाएगा, वह काफ़िर हो जाएगा।" यह भी एक बहुत बड़ा दुस्साहस और बदतरीन झूठ है। यह झूठा इन्सान तमाम लोगों से कहता है कि उसके झूठ को सच मान लें और दावा करता है कि इसके नतीजे में जहन्नम की यातना से मुक्ति मिल जाएगी। जबकि उसकी बात को झुठलाने वाला काफ़िर हो जाएगा। अल्लाह की क़सम, इस झूठे ने अल्लाह पर एक बहुत बड़ा झूठ बाँधा है, और बड़ी अनुचित बात कही है। काफ़िर तो इसकी पुष्टि करने वाले को होना चाहिए, झुठलाने वाले को नहीं। क्योंकि यह एक बेबुनियाद बात है। हम अल्लाह को गवाह बनाकर कहते हैं कि यह झूठ है और इसे लिखने वाला बहुत बड़ा झूठा है। उसकी मंशा शरीयत में ऐसी बातें दाख़िल करना है, जिनकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है। जबकि अल्लाह चौदह सौ साल पहले ही इस उम्मत को एक संपूर्ण दीन दे चुका है। अतः अपने पाठकों एवं भाईओं से मेरा अनुरोध है कि सचेत रहें, इस प्रकार की झूठी बातों को हरगिज़ सच न मानें और इन्हें समाज में प्रचलित होने का अवसर न दें। क्योंकि सत्य एक नूर है। उसे ढूँढ निकालने में कोई परेशानी नहीं होती। सत्य को उसके प्रमाणों के साथ तलाश करें। जो बात समझ में न आए, उसे उलेमा से पूछ लें। झूठे लोगों की क़समों के धोखे में न आएँ। इबलीस ने भी आपके पिता एवं माता यानी आदम एवं हव्वा के सामने क़समें खाई थीं और कहा था कि वह उनका शुभचिंतक है। जबकि वह सबसे बड़ा मक्कार एवं झूठा था। अल्लाह ने उस घटना को बयान करते हुए कहा है :
﴿وَقَاسَمَهُمَآ إِنِّي لَكُمَا لَمِنَ ٱلنَّٰصِحِينَ21﴾
तथा उसने उन दोनों से क़सम खाकर कहा : निःसंदेह मैं तुम दोनों का निश्चित रूप से हितैषी हूँ। [सूरा अल-आ'राफ़ : 21]। अतः शैतान एवं उसके झूठे अनुयायियों से सावधान रहें। पथभ्रष्ट करने के लिए झूठी क़समें खाना, मिथ्या वचन देना और लच्छेदार बातें करना इनके चरित्र का हिस्सा है। हाँ, इस झूठे ने समाज के अंदर बुराइयों के आम होने की जो बात कही है, वह अपनी जगह पर सही है। ख़ुद क़ुरआन एवं हदीस ने भी इन बुराइयों से सावधान रहने को कहा है। हमारे लिए इन दोनों में लिखी हुई बातें ही काफ़ी हैं।
रही बात क़यामत की निशानियों की, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों में सपष्ट रूप से उनका ज़िक्र हुआ है और कुछ निशानियों की ओर इशारा पवित्र क़ुरआन में भी किया गया है। इसलिए जिसे इनके बारे में जानना हो, उसे हदीस की किताबें, ज्ञान तथा ईमान वाले लेखकों की पुस्तकें पढ़नी चाहिए। हमें इस प्रकार के झूठे एवं फ़रेबी इन्सान की लिखी हुई चीज़ें पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। अल्लाह मुझे, आपको और तमाम मुसलमानों को शैतान की बुराई, गुमराही में डालने वालों के फ़ितने और अल्लाह के दुश्मनों के फ़रेब से बचाए, जो अल्लाह के नूर को अपनी फूँक से बुझाना जाहते हैं। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। क्योंकि अल्लाह अपने दीन की रक्षा करता रहेगा और उसे फलने-फूलने का अवसर देता रहेगा। चाहे यह बात अल्लाह के दुश्मनों को बुरी ही क्यों न लगे। दुआ है कि अल्लाह मुसलमानों के हालात ठीक कर दे, उनको सच्चे मार्ग पर चलाए, उसपर सुदृढ़ रखे और तमाम गुनाहों से तौबा करने का सुयोग प्रदान करे। निश्चय ही वह बहुत ज़्यादा तौबा ग्रहण करने वाला, दयावान एवं सब कुछ करने की शक्ति रखने वाला है। अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वह बेहतर काम बनाने वाला है। अल्लाह की तौफ़ीक़ के बिना न पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य की क्षमता।
तमाम प्रशंसाएँ अल्लाह की हैं, जो सारे संसार का रब है। दरूद व सलाम हो अल्लाह के बंदे एवं रसूल पर, जो सच्चे एवं अमानतदार हैं। साथ ही उनके परिजनों, साथियों एवं क़यामत के दिन तक उनका अनुसरण करने वालों पर भी।
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