الوَسَائِلُ المُفِيْدَةُ لِلحَيَاةِ السَّعِيْدَةِ
सौभाग्यशाली जीवन के उपयोगी साधन
الشَّيْخُ عَبْدُ الرَّحمَنِ بْنُ نَاصِرٍ السَّعْدِيُّ
رَحِمَهُ اللهُ
लेखक
शैख़ अब्दुर्रहमान बिन नासिर अस-सादी
अल्लाह उन पर दया करे
بِسْمِ اللهِ الرَّحمَنِ الرَّحِيمِ
लेखक का प्राक्कथन
हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो समस्त प्रकार की प्रशंसा के योग्य है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है, वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है। साथ ही मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे और उसके रसूल हैं। दुरूद एवं सलाम हो उनपर, उनके परिजनों पर तथा उनके समस्त साथियों पर।
अल्लाह की प्रशंसा और उसके रसूल पर दुरूद भेजने के बाद हम कहना चाहते हैं कि दुनिया में हर व्यक्ति की कामना होती है कि उसे दिल का चैन व सुकून नसीब हो और वह हर प्रकार के दुःख एवं चिंता से मुक्त रहे, क्योंकि यही आनंदमय एवं प्रसन्नचित जीवन की आधारशिला है। लेकिन इसके कुछ धार्मिक, कुछ भौतिक एवं कुछ व्यावहारिक साधन हैं। ये सारे साधन केवल उसी व्यक्ति के लिए एकत्र हो सकते हैं, जिसके पास ईमान की दौलत हो। दूसरे लोगों को यदि इनमें से कुछ साधन प्राप्त होते हैं, जिनके लिए उनका बुद्धिजीवी वर्ग रात-दिन प्रयत्न करता है, तो दूसरे साधन हाथ से निकल जाते हैं, जो कहीं अधिक महत्वपूर्ण, टिकाऊ और उत्कृष्ट होते हैं।
मैं अपनी इस पुस्तक में इस सर्वोच्च उद्देश्य के, जिसे हर व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है, कुछ साधनों को, जो इस समय मेरे ज़ेहन में हैं, बयान करना चाहता हूँ।
दुनिया में कुछ लोगों को इनमें से बहतु-से साधन प्राप्त हैं और वे आनंदमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं, कुछ लोगों को इनमें से कोई भी साधन प्राप्त नहीं है और वे दुर्भाग्यपूर्ण और असफल जीवन गुज़ार रहे हैं, जबकि कुछ लोग बीच वाली अवस्था में हैं और मध्यम जीवन जी रहे हैं। सच्चाई यह है कि जिसे अल्लाह ने जितना सुयोग प्रदान किया, उसे उतना ही कुछ मिला। क्योंकि, हर भलाई का सुयोग वही प्रदान करता है और हर बुराई से बचाता भी वही है। अतः. हमें उसी से सहायता माँगनी चाहिए।
अध्याय
1- सौभाग्यशाली जीवन का सबसे महान एवं उत्कृष्ट साधन और इसका मूल आधार अल्लाह पर विश्वास और सत्कर्म है। अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿مَنۡ عَمِلَ صَٰلِحٗا مِّن ذَكَرٍ أَوۡ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤۡمِنٞ فَلَنُحۡيِيَنَّهُۥ حَيَوٰةٗ طَيِّبَةٗۖ وَلَنَجۡزِيَنَّهُمۡ أَجۡرَهُم بِأَحۡسَنِ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ 97﴾
"जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी और ईमान वाला हो, तो हम उसे स्वच्छ जीवन व्यतीत कराएँगे और ऐसे लोगों को उनका पारिश्रमिक उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे।" [सूरा अन-नह़्ल, आयत संख्या : 97]
इस आयत में अल्लाह तआला ने यह बताया है और इस बात का वचन दिया है कि वह ईमान तथा पुण्य कार्य करने वालों को इस संसार में सुखमय जीवन के साथ-साथ दुनिया एवं आख़िरत में अच्छा प्रतिफल प्रदान करेगा।
इसका कारण यह है कि जो लोग अल्लाह पर विशुद्ध ईमान रखते हैं, ऐसा ईमान जो सत्कर्म की प्रेरणा देता है और इन्सान के दिल, चरित्र, दुनिया एवं आख़िरत को सँवार देता है, उनके पास ऐसे सिद्धाँत एवं आधार होते हैं कि वे जीवन के मार्ग में सामने आने वाली तमाम ख़ुशियों एवं सुखों के साथ-साथ चिंताओं एवं दुखों का भी स्वागत करते हैं।
वे प्रिय एवं आनंददायक चीज़ों को पूरे मन से ग्रहण करते हैं, उनपर अल्लाह का आभार व्यक्त करते हैं और उन्हें लाभकारी कार्यों में लगाते हैं। जब वे इतना कर लेते हैं, तो उन्हें उनसे जो आनंद मिलता है, उनको उन चीज़ों के बाक़ी रहने और उनके अंदर बरकत होने की जो आशा होती है और उनपर आभार व्यक्त करने के नतीजे में जिस प्रतिफल की उम्मीद होती है, वह उनकी वास्तविक खुशी से कई गुना बढ़कर होती है।
जबकि अप्रिय एवं कष्टदायक वस्तुओं में से जिनका प्रतिरोध करना संभव हो उनका प्रतिरोध करते हैं, जिनके प्रभाव को कम करना संभव हो उनके प्रभाव को कम करते हैं और जिनके आगे कोई बस न चलता हो उनके बारे में संपूर्ण धैर्य से काम लेते हैं। इस तरह उन्हें अप्रिय वस्तुओं के नतीजे में ऐसे लाभदायक प्रतिरोध, अनुभव, शक्ति, धैर्य और पुण्य की आशा प्राप्त होती है कि उसके आगे अप्रिय वस्तुओं का कष्ट फीका पड़ जाता है और दुःख के स्थान पर एक प्रकार की ख़ुशी, शुभ आशा एवं अल्लाह के प्रतिफल की उम्मीद प्राप्त होती है। इसी बात का उल्लेख एक सहीह हदीस में करते हुए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
(عَجَبًا لِأَمْرِ المُؤْمِنِ، إِنَّ أَمْرَهُ كُلَّهُ خَيْرٌ، إِنْ أَصَابَتْهُ سَرَّاءُ شَكَرَ فَكَانَ خَيْرًا لَهُ، وَإِنْ أَصَابَتْهُ ضَرَّاءُ صَبَرَ فَكَانَ خَيْرًا لَهُ وَلَيْسَ ذَلِكَ لِأَحَدٍ إِلَّا لِلْمُؤْمِنِ).
"मोमिन का मामला बड़ा अनोखा है कि उसके प्रत्येक मामले में उसके लिए भलाई है। यदि उसे प्रसन्नता प्राप्त होती है और वह उसपर आभार प्रकट करता है, तो यह उसके लिए भला होता है, और यदि उसे कोई कष्ट पहुँचता है और वह उसपर धैर्य से काम लेता है तो यह उसके लिए भला होता है। यह विशेषता केवल मोमिन ही को प्राप्त है।" इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि एक मोमिन को उसके जीवन में आने वाली हर ख़ुशी एवं ग़म और प्रिय एवं अप्रिय वस्तु का प्रतिफल मिलता है। इसीलिए आप दो व्यक्तियों को पाएँगे कि उनके साथ कोई अच्छी अथवा बुरी घटना घटती है तो उसका स्वागत (सामना) करने में उनके बीच व्यापक अंतर पाया जाता है और यह अंतर उन दोनों के ईमान और पुण्य कार्य में अंतर के अनुसार होता है। इन दोनों विशेषताओं (ईमान और सत्कर्म) से सुसज्जित व्यक्ति भलाई और बुराई का सामना कृतज्ञता और धैर्य तथा उनसे संबंधित चीज़ों के साथ करता है, जिससे उसके अन्दर हर्ष और आनन्द उत्पन्न होता है और उसका शोक, चिन्ता, दुख, व्याकुलता, सीने की तंगी और जीवन का दुर्भाग्य समाप्त हो जाता है और उसे इस संसार में सम्पूर्णता एवं शुभ जीवन प्राप्त होता है। जबकि दूसरा व्यक्ति प्रिय वस्तुओं का स्वागत घमंड, गर्व और अहंकार के साथ करता है, जिसके कारण उसका चरित्र बिगड़ जाता है और वह उन प्रिय वस्तुओं पर टूट पड़ता है। लेकिन इससे उसे अंतरात्मा का सुख प्राप्त नहीं होता, बल्कि वह कई तरह के भय से भयाक्रांत रहता है। इस बात का भय कि कहीं उसे प्राप्त ये प्रिय वस्तुएँ छिन न जाएँ और इसके साथ ही सामानयतः इन सुख-सुविधाओं से उत्पन्न समस्याओं की बेचैनी। उसकी बेचैनी का एक कारण यह है कि इन्सान का मन किसी सीमा पर उसे रुकने नहीं देता, बल्कि हमेशा और अधिक प्राप्त करने के लिए बेचैन रखता है, जो कभी प्राप्त होता है और कभी नहीं भी होता है। अगर हो भी गया, तो फिर नए सिरे से बेचैनी का एक सिलसिला शुरू हो जाता है। इसके विपरीत वह अप्रिय वस्तुओं का स्वागत बेचैनी, घबराहट, भय और परेशानी के साथ करता है। ऐसे में उसे बेशुमार चिंताओं, मांसिक एवं शारीरिक रोगों तथा ऐसे भय का सामना करना पड़ता है, जो उसे सख़्त बुरी अवस्था में पहुँचा देता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि वह प्रतिफल की आशा नहीं रखता और धैर्य रखने पर विश्वास नहीं रखता, जो इन्सान को तसल्ली देने का काम करता है।
अनुभव इन सारी चीज़ों का साक्षी है। इस प्रकार के किसी एक उदाहरण पर यदि आप चिन्तन करें और उसे लोगों की दशाओं पर फिट करें, तो आप उस मोमिन के बीच जो अपने ईमान के तक़ाज़े के अनुसार कार्य करने वाला है तथा उस व्यक्ति के बीच जो ऐसा नहीं है, व्यापक अंतर पाएँगे। अंतर यह है कि इस्लाम धर्म अल्लाह की प्रदान की हुई जीविका और उसकी ओर से बन्दों को प्राप्त होने वाली कृपा और भिन्न प्रकार की अनुकम्पा पर संतुष्ट रहने पर अत्यन्त बल देता है।
अतः जब कोई मोमिन किसी बीमारी, निर्धनता या इस प्रकार की अन्य वस्तुओं का सामना करता है, जिनका सामना किसी न किसी रूप में हर इन्सान को करना पड़ता है, तो वह अपने ईमान एवं संतुष्टि की भावना के कारण चिंतामुक्त रहता है। उसके दिल में किसी ऐसी वस्तु का मोह नहीं होता, जो उसे दी न गई हो। वह उन लोगों को देखता है, जो उससे कमज़ोर अवस्था में हैं। उन लोगों को नहीं, जो उससे मज़बूत स्थिति में हैं। ऐसे में कभी-कभी वह तो उन लोगों से भी अधिक खुश रहता है, जिन्हें दुनिया के सारे ऐश व आराम मिले हुए हों, लेकिन संतुष्टि न मिली हो।
उदाहरणस्वरूप एक व्यक्ति, जो ईमान के तक़ाज़े के अनुरूप अमल नहीं करता, जब उसे निर्धनता का सामना होता है या उसकी कोई सांसारिक इच्छा पूरी नहीं होती, तो वह आपको बेहद दुखी एवं शोक में डूबा हुआ मिलेगा।
इसका एक दूसरा उदाहरण यह है कि जब किसी इन्सान के सामने भयभीत कर देने वाली बातें आती हैं और चिंताजनक स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, तो सही ईमान वाला व्यक्ति सुदृढ़ आत्मा, निश्चित और शक्ति भर अपनी सोच, कथन एवं कर्म द्वारा उससे निकलने का रास्ता ढूँढता हुआ नज़र आता है। घबराहट के समय वह शांत व्यवहार का प्रदर्शन करता है। ज़ाहिर सी बात है कि इससे इन्सान को राहत मिलती है और उसका दिल सुदृढ़ रहता है।
दूसरी ओर ईमान रहित व्यक्ति की अवस्था इसके विपरीत होती है। जब उसके सामने भयभीत कर देने वाली घटनाएँ आती हैं, तो उससे दिल हिल उठता है, उसकी तंत्रिका टूटने लगती है, वह भयभीत हो जाता है और वह अंदर एवं बाहर से सहमा हुआ रहता है। इस प्रकार के लोगों को यदि कुछ प्राकृतिक साधन प्राप्त न हों, जिनके लिए बड़े अभ्यास की आवश्यकता होती है, तो उनकी शक्तियाँ नष्ट हो जाएँ और उनकी तंत्रिका जवाब दे जाए। यह इसलिए कि उनके पास वह ईमान नहीं होता है, जो उन्हें कठिन परिस्थितियों तथा कष्टदायक हालतों में सब्र करने पर उभारे।
इस प्रकार सदाचारी और दुराचारी, मोमिन और काफ़िर उपार्जित वीरता की प्राप्ति और उस स्वभाव में समान होते हैं, जो भयानक चीज़ों को आसान बनाने का काम करता है। लेकिन मोमिन इस मामले में विशिष्ट होता है कि उसके पास मज़बूत ईमान होता है, धैर्य की संपदा होती है, अल्लाह पर भरोसा होता है और अल्लाह से सवाब की आशा होती है। ये कुछ ऐसी बातें हैं, जिनसे इन्सान की बहादुरी में वृद्धि होती है, उसका भय घट जाता है और मुसीबत आसान हो जाती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿إِن تَكُونُواْ تَأۡلَمُونَ فَإِنَّهُمۡ يَأۡلَمُونَ كَمَا تَأۡلَمُونَۖ وَتَرۡجُونَ مِنَ ٱللَّهِ مَا لَا يَرۡجُونَ... ﴾
"यदि तुम्हें कष्ट होता है, तो उन्हें भी कष्ट होता है, और तुम अल्लाह से वह आशाएँ रखते हो, जो आशाएँ वो नहीं रखते।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 104] इसके साथ ही उन्हें अल्लाह की सहायता, उसकी मदद और सहयोग प्राप्त होता है, जो भय के वातावरण को समाप्त करता है। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿...وَٱصۡبِرُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّٰبِرِينَ﴾
"तथा धैर्य से काम लो। निःसंदेह अल्लाह धैर्यवानों के साथ है।" [सूरा अल-अनफ़ाल, आयत संख्या : 46]
2- चिंता, दुख एवं बेचैनी को दूर करने वाली चीज़ों में से एक चीज़ अपने कथन एवं कर्म द्वारा सृष्टि का उपकार करना भी है। इससे अल्लाह सदाचारी एवं दुराचारी बंदों की चिंताओं एवं दुखों को दूर करता है। लेकिन मोमिन को चिंता एवं दुख से मुक्ति अधिक पूर्ण रूप से मिलती है और उसकी एक विशेषता यह होती है कि वह उपकार केवल अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए उसके सवाब की आशा में करता है।
फलस्वरूप अल्लाह के यहाँ मिलने वाले प्रतिफल की आशा में उसके लिए उपकार करना आसान हो जाता है और इसके नतीजे में अल्लाह उसे अप्रिय चीज़ों से भी बचाता है। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿لَّا خَيۡرَ فِي كَثِيرٖ مِّن نَّجۡوَىٰهُمۡ إِلَّا مَنۡ أَمَرَ بِصَدَقَةٍ أَوۡ مَعۡرُوفٍ أَوۡ إِصۡلَٰحِۭ بَيۡنَ ٱلنَّاسِۚ وَمَن يَفۡعَلۡ ذَٰلِكَ ٱبۡتِغَآءَ مَرۡضَاتِ ٱللَّهِ فَسَوۡفَ نُؤۡتِيهِ أَجۡرًا عَظِيمٗا114﴾
"उनकी अधिकांश सरगोशी में कोई भलाई नहीं होती। परन्तु जो दान, सदाचार या लोगों में सुधार कराने का आदेश दे और जो कोई ऐसे कर्म अल्लाह की प्रसन्नता के लिए करेगा, तो हम उसे बहुत भारी प्रतिफल प्रदान करेंगे।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 114]
इस आयत में अल्लाह तआला ने यह सूचना दी है कि इन्सान द्वारा किए गए यह सारे कार्य भलाई के कार्य हैं और भलाई, भलाई को खींच लाती है और बुराई से बचाती है। जबकि पुण्य की आशा के साथ काम करने वाले मोमिन को अल्लाह बहुत बड़ा प्रतिफल देगा और बड़े प्रतिफल में चिंता, दुख एवं जीवन को कष्टमय बनाने वाली चीज़ों से मुक्ति भी शामिल है।
अध्याय
3- मांसपेशियों के तनाव और हृदय के कुछ कष्टदायक और दुखदायी चीज़ों में लीन होने के कारण उत्पन्न होने वाली व्याकुलता को दूर करने का एक साधन किसी लाभदायक कार्य या ज्ञान में व्यस्त होना भी है। क्योंकि ऐसा करने से इन्सान का हृदय उस चीज़ में व्यस्त होने से बच जाता है, जो उसकी व्याकुलता का कारण बनती है। कभी-कभी वह इसके कारण उन बातों को भूल जाता है, जो उसके लिए चिंता एवं दुख का कारण बनती है। अतः उसकी आत्मा प्रसन्न रहती है और उसकी चुस्ती-फुर्ती में वृद्धि हो जाती है। चिंता एवं दुख से मुक्ति का यह साधन मोमिन एवं काफ़िर दोनों के लिए समान है। लेकिन मोमिन को यह विशिष्टता प्राप्त है कि उसके पास ईमान, अल्लाह के प्रति निष्ठा, ज्ञान प्राप्त करने या देने के कार्य तथा अपने द्वारा किए गए भलाई के कार्य को सवाब का साधन समझने का अक़ीदा और यह आस्था होती है कि भलाई का कार्य यदि इबादत है, तो इबादत तो है ही, लेकिन यदि सांसारिक कार्य या आदत है, तो सच्ची नीयत से वह भी इबादत बन जाता है। साथ ही वह इसके द्वारा अल्लाह के आज्ञापालन की इच्छी भी रखता है। यही कारण है कि इसका, चिंता, दुख एवं गम को दूर करने में दूरगामी प्रभाव पड़ता है। बहुत-से ऐसे इन्सान हैं, जो परेशानी एवं अप्रिय परिस्थिति से गुज़रने के कारण विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो गए और इस परिस्थिति में आकर उनकी अचूक दवा यह ठहरी कि वे उस बात को भूल जाएँ, जिसका दुख उनको झेलना पड़ा है और अपने किसी काम में व्यस्त हो जाएँ।
फिर काम भी ऐसा होना चाहिए जो उसके दिल को अच्छा लगे। क्योंकि इससे इस लाभकारी उद्देश्य की प्राप्ति की संभावना बढ़ जाती है।
4- चिंता एवं दुख से छुटकारे का एक तरीक़ा यह है कि इन्सान पूरी एकाग्रता के साथ आज के काम पर ध्यान दे। भविष्य़ को लेकर चिंतित न रहे और भूतकाल को लेकर दुखित न रहे। यही कारण है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक हदीस में, जिसे इमाम बुखारी तथा इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है, चिंता एवं दुख से अल्लाह की शरण माँगी है। जो कुछ हो चुका है उसे लौटाया नहीं जा सकता तथा उससे होने वाली क्षति की पूर्ति नहीं हो सकती, उसके बारे में दुखी रहने से कुछ हाथ नहीं आएगा, जबकि भविष्य से भय के कारण होने वाला दुख हानिकारक सिद्ध होता है। इसलिए इन्सान को अपने आज पर ध्यान देना चाहिए और उसे बेहतर बनाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि इससे एक तो इन्सान का कर्म बेहतर से बेहतर होगा और दूसरे उसे चिंता एवं दुख से मुक्ति मिलेगी। अल्लाह के नबी सल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम जब कोई दुआ करते या अपनी उम्मत को कोई दुआ सिखाते, तो अल्लाह की सहायता माँगने और उसके अनुग्रह की आशा रखने की प्रेरणा देने के साथ-साथ, जिस चीज़ की प्राप्ति के लिए आदमी दुआ करे, उसे प्राप्त करने की पूरी कोशिश करने की भी प्रेरणा देते थे। इसी तरह जिस चीज़ को टालने के लिए दुआ करे, उससे बचने का पूर्ण प्रयास करने पर भी बल देते थे। क्योंकि दुआ कर्म के साथ जुड़ी हुई है। अतः बन्दे को चाहिए कि उन चीज़ों के लिए प्रयास करता रहे, जो उसके लिए लोक और परलोक में लाभकारी हों और अपने पालनहार से अपने उद्देश्य में सफलता की दुआ करे और उससे इस काम में सहायता माँगे। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
(احْرِصْ عَلَى مَا يَنْفَعُكَ وَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ وَلَا تَعْجِزْ، وَإِذَا أَصَابَكَ شَيْءٌ فَلَا تَقُلْ: لَوْ أَنِّي فَعَلْتُ كَذَا كَانَ كَذَا وَكَذَا، وَلَكِنْ قُلْ: قَدَرُ اللَّهِ وَمَا شَاءَ فَعَلَ، فَإِنَّ لَوْ تَفْتَحُ عَمَلَ الشَّيْطَانِ).
"अपने लाभ की चीज़ के इच्छुक बनो तथा अल्लाह तआला से सहायता माँगो और हरगिज़ विवश होकर न बैठो। यदि तुम्हें कोई विपत्ति पहुँचे, तो यह न कहो कि यदि मैंने ऐसा किया होता, तो ऐसा और ऐसा होता। बल्कि यह कहो कि "قَدر اللَّه وَمَا شَاءَ فَعَلَ" (अर्थात् अल्लाह तआला ने ऐसा ही भाग्य में लिख रखा था और वह जो चाहता है, करता है।) क्योंकि ‘अगर’ शब्द शैतान के कार्य का द्वार खोलता है।" इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। इस हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जहाँ एक ओर हर अवस्था में लाभदायक कामों का इच्छुक रहने, अल्लाह से मदद माँगने और सुस्ती का शिकार न होने का आदेश दिया है, वहीं पिछली बातों के पीछे न पड़ने और अल्लाह के निर्णय तथा तक़दीर को सामने रखने की बात कही है।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सारी चीज़ों को दो भागों में बाँट दिया है। एक भाग वह, जिसे अथवा जिसके कुछ अंश को प्राप्त करना या फिर टालना या हल्का करना बंदे के लिए संभव हो। इस तरह के कामों के लिए बंदे को कोशिश करनी चाहिए तथा अपने पालनहार से मदद माँगनी चाहिए। दूसरा भाग वह है जिसके बारे में ऐसा संभव न हो। इस प्रकार के कामों के प्रति बंदे को संतुष्ट तथा अल्लाह के निर्णय पर राज़ी रहना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस नियम का पालन करने से बंदे को प्रसन्नता प्राप्त होगी और वह चिंताओं एवं दुखों से मुक्त रहेगा।
अध्याय
5- आंतरिक शांति का एक महत्वपूर्ण साधन अल्लाह का अधिक से अधिक ज़िक्र करना है। ज़िक्र की, आत्मा को शांति प्रदान करने एवं चिंतामुक्त बनाने में आशचर्यजनक भूमिका रहती है। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है :
﴿...أَلَا بِذِكۡرِ ٱللَّهِ تَطۡمَئِنُّ ٱلۡقُلُوبُ﴾
"याद रखो, अल्लाह के स्मरण से ही दिलों को संतुष्टि प्राप्ति होती है।" [सूरा अर-राद, आयत संख्या : 28] अतः अल्लाह के ज़िक्र का इस अद्देश्य की प्राप्ति में व्यापक प्रभाव पड़ता है। क्योंकि एक तो खुद इसके अंदर ही यह विशेषता मौजूद है और दूसरे बंदा सवाब एवं प्रतिफल की आशा भी रखता है।
6- इसी प्रकार अल्लाह की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष नेमतों का वर्णन भी दुख एवं चिंता से इन्सान को मुक्त रखता है और शुक्र की प्रेरणा देता है, जो कि सबसे ऊँची श्रेणी है। बंदा अगर निर्धन या बीमार हो या इस तरह की किसी और मुसीबत का सामना कर रहा हो और इस अवस्था में भी अल्लाह की ओर से प्राप्त अनगिनत नेमतों और अपनी परेशानी के बीच तुलना करे, तो नेमतों के मुक़ाबले में परेशानी कहीं नहीं ठहरेगी।
अपितु अल्लाह जब बंदे को अप्रिय चीज़ों तथा विपत्तियों के द्वारा आज़माता है और बंदा इस परीक्षा की घड़ी में सब्र, संतुष्टि और आज्ञापालन का कर्तव्य पूरा करता है, तो इन विपत्तियों की तीव्रता कम हो जाती है, इनका सहन करना आसान हो जाता है और प्रतिफल, सवाब एवं सब्र तथा संतुष्टि द्वारा आज्ञापालन की आशा कड़वी चीज़ों को मीठा बना देती है।
7- इस स्थान पर एक बहुत ही लाभदायक कार्य वह है, जिसकी ओर मार्गदर्शन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी इस हदीस में फ़रमाया है :
(انْظُرُوا إِلَى مَنْ هُوَ أَسْفَلُ مِنْكُمْ وَلَا تَنْظُرُوا إِلَى مَنْ هُوَ فَوْقَكُمْ فَإِنَّهُ أَجْدَرُ أَنْ لَا تَزْدَرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ).
"उस व्यक्ति को देखो जो तुमसे नीचे हो और उस व्यक्ति को न देखो, जो तुमसे ऊपर हो। क्योंकि ऐसा करना इस बात के अधिक योग्य है कि तुम अल्लाह की दी हुई नेमतों का अनादर न कर बैठो।" इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है। क्योंकि जब बंदा इस महत्वपूर्ण निर्देश को अपनी आँखों के सामने रखेगा, तो वह स्वयं को शांति और उससे संबंधित चीज़ों में तथा जीविका और उससे जुड़ी हुई चीज़ों में बहुत-से लोगों से उत्तम और श्रेष्ठ पाएगा, चाहे उसकी हालत जो भी रहे। ऐसा करने से उसकी चिंता एवं दुख समाप्त हो जाएगा और अल्लाह की दी हुई उन नेमतों पर उसका हर्ष और उल्लास बढ़ जाएगा, जिन्हें प्राप्त करने के मामले में वह ऐसे बहुत-से लोगों से आगे है, जो इस विषय में उससे कमतर हैं।
बंदा अल्लाह की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष तथा सांसारिक एवं धार्मिक नेमतों पर जितना चिंतन करता जाएगा, उतना ही वह देखेगा कि उसके रब ने उसे बहुत-सी अच्छी चीज़ें दे रखी हैं और बहुत-सी बुरी चीज़ों से बचाए रखा है। ज़ाहिर सी बात है कि इससे दुख दूर होगा और हर्ष एवं आनंद प्राप्त होगा।
अध्याय
8- प्रसन्नता की प्राप्ति तथा शोक एवं चिंता से मुक्ति का एक साधन यह है कि इन्सान शोक एवं दुःख के कारणों को दूर करने तथा प्रन्नता के कारणों को प्राप्त करने का प्रयास करे। इसका तरीक़ा यह है कि इन्सान उन अप्रिय बातों को भूल जाए, जो उसके साथ पहले घट चुकी हैं और जिनका वह निदान नहीं कर सकता और दिल में यह बैठा ले कि उन बातों को सोचते रहने से कोई फ़ायदा नहीं होने वाला। बल्कि यह एक तरह की अज्ञानता एवं पागलपन है। अतः अपने दिल को इन बातों से दूर रखने का भरपूर प्रयास करे। इसी तरह भविष्य में उसके सामने जो समस्याएँ, जैसे निर्धनता एवं भय आदि आ सकती हैं, उनकी चिंता में पड़ने से भी अपने दिल को रोकने का पूरा प्रयास करे। वह इस बात को जान ले कि भविष्य में सामने आने वाली भलाइयों और बुराइयों, आशाओं और वेदनाओं का ज्ञान किसी को नहीं है। यह बातें सर्वशक्तिमान एवं हिकमत वाले अल्लाह के हाथ में हैं। बंदों के हाथ में कुछ नहीं है। अगर कुछ है, तो बस भलाइयों को प्राप्त करने तथा बुराइयों से बचने का प्रयास करना। अतः बंदे को याद रखना चाहिए कि अगर वह अपने किसी काम के भविष्य को लेकर चिंतित रहना छोड़ देगा और अल्लाह पर भरोसा रखेगा कि वह अल्लाह जो कुछ करेगा अच्छा ही करेगा, तो उस कार्य को करते समय वह निश्चिंत रहेगा, उसकी हालत अच्छी रहेगी और उसका सारा दुःख दूर हो जाएगा।
9- भविष्य की बातों के संबंध में एक बहुत ही लाभदायक काम यह है कि बंदा यह दुआ करता रहे, जो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किया करते थे :
(اللَّهُمَّ أَصْلِحْ لِي دِينِيَ الَّذِي هُوَ عِصْمَةُ أَمْرِي وَأَصْلِحْ لِي دُنْيَايَ الَّتِي فِيهَا مَعَاشِي، وَأَصْلِحْ لِي آخِرَتِيَ الَّتِي إِلَيْهَا مَعَادِي، وَاجْعَلِ الْحَيَاةَ زِيَادَةً لِي فِي كُلِّ خَيْرٍ، وَالْمَوْتَ رَاحَةً لِي مِنْ كُلِّ شَرٍّ).
"ऐ अल्लाह मेरे लिए मेरे धर्म को सुधार दे जिसमें मेरी मुक्ति छिपी हुई है, मेरे लिए मेरे संसार को सुधार दे जिसके अंदर मुझे जीवन व्यतीत करना है, मेरे लिए मेरी आखिरत (परलोक) को सुधार दे जिसकी ओर मुझे लौटना है, मेरे लिए मेरे जीवन को प्रत्येक भलाई में वृद्धि का कारण बना दे तथा मृत्यु को मेरे लिए प्रत्येक बुराई से मुक्ति का साधन बना दे।" इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। इसी प्रकार आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की यह दुआ भी है:
(اللَّهُمَّ رَحْمَتَكَ أَرْجُو فَلَا تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّهُ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنتَ).
"ऐ अल्लाह, मैं तेरी ही रहमत की आशा रखता हूँ। अतः मुझे पलक झपकने भर के लिए भी मेरी आत्मा के हवाले न कर और मेरे सारे कार्य सुधार दे, क्योंकि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है।" इसे अबू दावूद ने 'अल्-मरासील' में सहीह सनद से रिवायत किया है। जब बंदा इस दुआ को, जिसमें उसके भविष्य का धार्मिक एवं सांसारिक लाभ निहित है, सच्चे मन से करेगा और उसे प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करेगा, तो अल्लाह उसकी आशा को पूर्ण कर देगा और उसका दुख, सुख में बदल जाएगा।
अध्याय
10- जब कोई व्यक्ति किसी विपत्ति में पड़े, तो शोक और चिंता के निवारण का एक बहुत ही लाभदायक साधन यह है कि वह उसको हल्का करने के लिए विपत्ति का अंत जिन संभावनाओं पर हो सकता है, उनमें से सबसे बुरी संभावना का अनुमान लगाए और उसका सामना करने के लिए अपने हृदय को तैयार कर ले। यह करने के पश्चात उसे चाहिए कि जहाँ तक हो सके, उस चीज़ को हल्का करने का प्रयास करे, जिसका हल्का करना संभव हो। इस लाभकारी प्रयास से उसके शोक दूर हो जाएँगे, उसे कई लाभ प्राप्त होंगे तथा कई प्रकार की हानि से छुटकारा मिल जाएगा।
जब आदमी भय, बीमारी, निर्धनता और विभिन्न प्रिय वस्तुओं से वंचित रहने जैसे हालात का सामना करे, तो उसे उन चीज़ों का सामना संतोष और सहन शक्ति के साथ करना चाहिए। क्योंकि ऐसी परिस्थिति में सहन शक्ति का प्रदर्शन करने से मुसीबत आसान हो जाती है और उसकी तीव्रता घट जाती है। विशेष रूप से उस समय, जब इन्सान जहाँ तक हो सके, इन हालात का मुक़ाबला करने का प्रयास करे। क्योंकि उस समय सहन शक्ति के प्रदर्शन के साथ-साथ एक लाभकारी प्रयास भी पाया जाता है, जो इन्सान को मुसीबतों से बेपरवाह बना देता है और वह अप्रिय वस्तुओं का सामना करने की शक्ति नए सिरे से प्राप्त करने के लिए अपने नफ़्स से लड़ाई शुरू कर देता है। साथ ही अल्लाह पर भरोसा भी रखे। इन बातों का स्वयं को खुश रखने के संबंध में बड़ा फ़ायदा होता है और बंदे को दुनिया एवं आख़िरत में प्रतिफल की आशा भी रहती है। अनुभव इसका साक्ष्य प्रस्तुत करता है और अनुभव करने वाले को इस तरह की बहुत-सी घटनाएँ देखने को मिलती हैं।
अध्याय
11- दिल की तंत्रिका संबंधी बीमारियों, बल्कि शारीरिक रोगों का एक महत्वपूर्ण इलाज दिल को बलशाली रखना, उसे घबराने न देना और उन भ्रमों एवं खयालों से प्रभावित न होना है, जो दुश्चिंता के नतीजे में जन्म लेते हैं। क्रोध तथा चिंता कष्टदायक चीज़ें हैं। जिसे अप्रिय घटनाओं के घटित होने और प्रिय चीज़ों के छिन जाने का भय होता है, वह चिंताओं, दुखों, हृदय संबंधित तथा शारीरिक बीमारियों एवं तंत्रिका ह्रास का शिकार हो जाता है, जिसके कुप्रभावों के नुक़सानों से लोग अवगत हैं।
12- जब इन्सान का हृदय अल्लाह पर भरोसा करता है, भ्रमों के सामने आत्म-समर्पण नहीं करता है, दुष्ट विचारों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता है, अल्लाह पर विश्वास रखता है और उसकी अनुकंपा की आशा रखता है, तो इसके कारण उसकी चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं, उसकी बहुत-सी हृदय संबंधी और शारीरिक बीमारियाँ दूर हो जाती हैं और उसके हृदय को वह शक्ति, प्रफुल्लता तथा आनंद प्राप्त होता है, जिसका वर्णन करना असंभव है। कितने ही अस्पताल भ्रमों और दुष्ट विचारों के शिकार रोगियों से भरे पड़े हैं, कमज़ोरों की बात तो दूर, न जाने कितने शक्तिशाली लोगों के दिलों को इन बातों ने प्रभावित किया है और न जाने कितने लोगों को मूर्ख एवं पागल बनाने का काम किया है!! बचा हुआ वही है, जिसे अल्लाह ने बचा रखा है और उसे लाभकारी तथा हृदय को सशक्त बनाने वाले साधनों को प्राप्त करने और बेचैनी से मुक्ति प्रदान करने वाली चीज़ों से बचने का सुयोग प्रदान किया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَمَن يَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱللَّهِ فَهُوَ حَسۡبُهُۥٓ...﴾
"और जो व्यक्ति अल्लाह पर भरोसा करेगा, अल्लाह उसके लिए पर्याप्त होगा।" [सूरा अत-तलाक़, आयत संख्या : 3] अर्थात उसके सभी धार्मिक एवं सांसारिक मामलों को हल करने के लिए वही काफ़ी होगा।
अल्लाह पर भरोसा रखने वाला सशक्त हृदय का मालिक होता है, जिसपर भ्रमों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और न ही घटनाएँ उसे व्याकुल करती हैं। क्योंकि वह जानता है कि वही इन्सान भ्रम तथा व्याकुलता का शिकार होता है, जिसका हृदय कमज़ोर और आत्मा निर्बल एवं कायर होती है। इसके साथ ही उसे यह भी पता होता है कि अल्लाह तआला ने अपने ऊपर भरोसा रखने वाले को इस बात की गारंटी दे रखी है कि वह उसके लिए संपूर्ण रूप से पर्याप्त होगा। अतः वह अल्लाह पर भरोसा और उसके वायदे पर विश्वास रखता है, जिसके बाद उसकी सारी चिंताएँ दूर हो जाती हैं, उसकी हर मुश्किल आसान हो जाती है, उसका ग़म खुशी में और उसका भय शांति में बदल जाता है। अतः हम अल्लाह से कुशलता माँगते हैं और उससे प्रार्थना करते हैं कि हमें अपनी कृपा से हृदय की शक्ति एवं दृढ़ता तथा संपूर्ण विश्वास प्रदान करे, जो हर भलाई का स्रोत तथा हर बुराई से बचाव का साधन है।
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अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के कथन :
(لَا يَفْرَكْ مُؤْمِنٌ مُؤْمِنَةً إِنْ كَرِهَ مِنْهَا خُلُقًا رَضِيَ مِنْهَا خُلُقًا آخَرَ).
"कोई मोमिन पुरुष किसी मोमिन स्त्री से नफ़रत न करे। यदि उसकी कोई बात उसे अप्रिय लगे, तो दूसरी बात अच्छी लगेगी।" इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। में दो महत्वपूर्ण लाभ हैं :
पहला : इस बात की ओर मार्गदर्शन कि पत्नी, निकटवर्ती, साथी, साथ में काम करने वाले और हर उस व्यक्ति के साथ, जिसके और आपके बीच कोई संबंध और नाता हो, किस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए? आपको अपने दिल में यह बात बिठा लेनी चाहिए कि उसके अंदर कोई न कोई ऐब, कमी या ऐसी बात होगी ही, जो आपको पसंद न हो। अतः जब इस तरह की कोई बात देखें, तो उसकी अच्छाइयों और उससे जुड़े हुए खास एवं आम उद्देश्यों को याद करते हुए उसकी इन कमियों एवं उसके साथ अपने गहरे रिश्ते एवं प्रेम के बीच तुलना करें, जिसे आपको निभाना चाहिए। इस प्रकार, अपने साथी की कमियों को नज़रअंदाज़ एवं अनदेखा करने और अच्छाइयों को सामने रखने से संबंध बना रहेगा और जीवन का अनंद मिल सकेगा।
दूसरा : शोक एवं चिंता की समाप्ति, साफ़-सुथरे संबंध की स्थापना, वाजिब एवं मुसतहब अधिकारों को अदा करना तथा दोनों ओर शांति एवं सुकून की प्राप्ति। इसके विपरीत जो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के इस मार्गदर्शन पर अमल नहीं करेगा तथा अपने साथी की अच्छाइयों की अनदेखी करते हुए केवल बुराइयों को सामने रखेगा, वह परेशान रहेगा, अपने संबंधियों के प्रेम से हाथ धो बैठेगा और उनमें से बहुत-से अधिकारों का हनन होगा, जिनकी रक्षा दोनों को करनी थी।
बहुत-से बड़ी हिम्मत वाले और मज़बूत लोगों को देखा गया है कि बड़ी-बड़ी घटनाओं तथा परेशानियों के समय तो सब्र कर लेते हैं, लेकिन साधारण और छोटी-छोटी बातों से घबरा जाते हैं और परेशान होने लगते हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने बड़ी-बड़ी मुसीबतों पर सब्र करने की तो आदत डाली, लेकिन साधारण घटनाओं पर धैर्य रखने का खुद को आदी नहीं बनाया, जिसके कारण ये छोटी घटनाएँ उनका सुकून बर्बाद कर देती हैं। अतः बुद्धिमान व्यक्ति अपने आपको बड़ी घटनाओं के साथ-साथ छोटी घटनाओं पर भी सब्र करने का आदी बनाता है और अल्लाह से इसके लिए मदद माँगता है। वह अल्लाह से दुआ करता है कि उसे एक क्षण के लिए भी उसके नफ़्स (आत्मा) के हवाले न करे। इसके बाद बड़ी घटनाओं के साथ-साथ छोटी घटनाओं का सामना करना भी उसके लिए आसान हो जाता है। फिर, आदमी इत्मीनान के साथ आनंद भरा जीवन गुज़ारता है।
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14- बुद्धिमान व्यक्ति यह जानता है कि उसका स्वस्थ जीवन, ख़ुशी और इत्मीनान का जीवन है और यह जीवन बड़ा छोटा है। इसलिए ग़म एवं चिंता में पड़कर उसे और छोटा नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह छोटे जीवन के विपरीत व्यवहार है। वह नहीं चाहता कि इस छोटे जीवन का अधिकतर हिस्सा ग़मों एवं चिंताओं की भेंट चढ़ जाए। याद रहे कि इस मामले में नेक तथा गुनहगार बंदे के बीच कोई अंतर नहीं है। लेकिन इतना ज़रूर है कि एक मोमिन के अंदर यह गुण अधिक मात्रा में पाया जाता है और उसे दुनिया एवं आख़िरत में इसका लाभ भी अधिक मिलता है।
15- इन्सान को एक और बात का ध्यान रखना चाहिए। उसके सामने जब कोई अप्रिय बात आए या उसे किसी अप्रिय बात का भय हो, तो वह उस अप्रिय बात की तुलना उसे प्राप्त अन्य धार्मिक एवं सांसारिक नेमतों से करे। इस तुलना से स्पष्ट हो जाएगा कि उसे जो नेमतें प्राप्त हैं, वह बहुत ज़्यादा हैं और उसके सामने जो अप्रिय बात है, वह बहुत ही कम है।
इसी प्रकार उसे चाहिए कि जिस हानि से पीड़ित होने का उसे भय है उसके बीच और उस हानि से सुरक्षित रहने की जो बहुत-सी संभावनाएँ हैं, उनके बीच तुलना करे और दुर्बल संभावना को प्रबल संभावनाओं पर हावी न होने दे। ऐसा करने से उसकी चिंता और भय समाप्त हो जाएगा और वह सबसे बड़ी संभावनाओं का अनुमान लगाकर अपने आपको उनका सामने करने के लिए तैयार रखेगा तथा उनमें से जो सामने आ चुकी है, उसका मुक़ाबला करने और जो सामने नहीं आई है उससे अपना बचाव करने का प्रयास करेगा।
16- लाभदाय बातों में से एक यह है कि आप इस बात को जान जाएँ कि यदि लोग आपको कष्ट देते हैं, खास तौर से अपनी ज़बान से आपका दिल दुखाते हैं, तो इससे आपका नहीं, खुद उनका नुक़सान होगा। हाँ, यदि आपने उन बातों को तवज्जो देना शुरू कर दिया और उनको अपने दिल पर ले लिया, तो नुक़सान उनके साथ-साथ आपको भी होगा। लेकिन यदि आपने उनपर ध्यान नहीं दिया, तो उससे आपका कुछ नहीं बिगड़ने वाला।
17- आप यह बात भी जान लें कि आपका जीवन आपके विचारों के अधीन है। यदि आपके विचार ऐसे हैं कि उनका लाभ आपके धर्म अथवा आपकी दुनिया को होता हो, तो आपका जीवन सौभाग्यशाली और सुखदायक है। अन्यथा, मामला इसके विपरित है।
18- शोक और चिन्ता को दूर रखने के सर्वाधिक लाभदायक उपायों में से एक यह है कि आप स्वयं को इस बात का आदी बना लें कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य से कृतज्ञता की उम्मीद नहीं रखेंगे। जब आप किसी ऐसे व्यक्ति का उपकार करें, जिसका आप पर कोई अधिकार हो अथवा अधिकार न भी हो, तो उस समय दिल में यह बात बिठा लें कि यह उपकार आपने अल्लाह के लिए किया है। अतः जिसका आपने उपकार किया है, उसकी कृतज्ञता की परवाह न करें। अल्लाह ने अपने विशिष्ट लोगों के बारे में बताया है कि वे किसी को कुछ खाने के लिए देने के बाद कहते हैं :
﴿إِنَّمَا نُطۡعِمُكُمۡ لِوَجۡهِ ٱللَّهِ لَا نُرِيدُ مِنكُمۡ جَزَآءٗ وَلَا شُكُورًا9﴾
"हम तो तुम्हें केवल अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए खिलाते हैं, न तुमसे प्रतिफल चाहते हैं न कृतज्ञता।" [सूरा अल-इनसान, आयत संख्या : 9]
इसकी ज़रूरत परिवार, बच्चों एवं संबंधियों के साथ व्यवहार में भी है। जब आप खुद को इस बात का आदी बना लेंगे कि उनको कोई कष्ट नहीं होने देंगे, तो खुद भी चैन से रहेंगे और उनको भी चैन से रहने का अवसर मिलेगा। चैन एवं सुकून प्राप्त करने का एक माध्यम फ़ज़ीलत (प्रधानता) वाले कामों को करना भी है। लेकिन यह भी अंतरात्मा की चाहत के अनुरूप होना चाहिए। इतना तकल्लुफ़ एवं औपचारिकता नहीं करना चाहिए कि आप परेशान हो जाएँ और सब छोड़-छाड़कर बैठ जाएँ। यही हिकमत है। इसी तरह चैन व सुकून प्राप्त करने का एक अन्य माध्यम यह है कि आप ग़लत चीज़ों में से सही चीज़ों का चयन करना सीखें। इससे जीवन का आनंद प्राप्त होगा और चिंताएँ दूर होंगी।
19- लाभकारी चीज़ों को अपना उद्देश्य बनाएँ, उनकी प्राप्ति के लिए कार्य करें और हानिकारक चीज़ों की ओर ध्यान न दें , ताकि शोक और खेद उत्पन्न करने वाली बातों से निश्चिंत रह सकें। साथ ही आराम करें और महत्वपूर्ण कार्यों पर ध्यान केंद्रित रखें।
20- एक लाभकारी बात कार्यों को समय पर निबटाना और कल के लिए न छोड़ना भी है। क्योंकि कार्यों को समय पर न निबटाने की स्थिति में आने वाले कार्यों के साथ-साथ पिछले कार्यों का बोझ भी इन्सान के कंधों पर आएगा, जिससे दबकर वह परेशान हो जाएगा। लेकिन जब आप हर काम को समय पर निबटा लेंगे, तो आने वाले कामों के लिए अधिक एकाग्र होकर एवं अधिक ऊर्जा के साथ काम करने का अवसर मिलेगा।
21- आपको चाहिए कि लाभकारी बातों में जो अधिक महत्वपूर्ण हों, उन्हें पहले चुनें और उन कार्यों का चयन कर लें, जिनकी ओर आपका झुकाव हो और जिन में आपकी रुचि हो। क्योंकि इनके विपरीत बातें थकावट, उकताहट और मनस्ताप का कारण बनती हैं। इसके लिए सही रूप से चिंतन भी करें और परामर्श भी लें। क्योंकि परामर्श लेने के बाद इन्सान को पछताना नहीं पड़ता। साथ ही जिस काम को आप करना चाहते हैं, उसका ठीक से अध्ययन कीजिए। फिर जब लगे कि वह आपके हित में है और आप उसका इरादा भी कर लें, तो अल्लाह पर भरोसा करें। निश्चय ही अल्लाह अपने ऊपर भरोसा रखने वालों को प्रिय जानता है।
सारी प्रशंसा अल्लाह ही की है, जो सारे संसार का पालनहार है।
अल्लाह की कृपा एवं शांति हो हमारे संदेष्टा मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और आपके परिजनों तथा साथियों पर।
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