التَّحْقِيْقُ وَالْإِيْضَاحُ
لِكَثِيْرٍ مِنْ مَسَائِلِ الحَجِّ وَالعُمْرَةِ وَالزِّيَارَةِ
عَلَى ضَوءِ الكِتَابِ وَالسُّنَّة
हज्ज, उमरा तथा ज़ियारत के अधिकांश मसलों का शोध एवं व्याख्या क़ुरआन एवं हदीस के आलोक में
لِسَمَاحَةِ الشَّيْخِ العَلَّامَةِ
عَبْدِ العَزِيزِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ بَازٍ
رَحِمَهُ اللهُ
अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़
अल्लाह उन पर दया करे
بِسْمِ اللهِ الرَّحمَنِ الرَّحِيمِ
यह पुस्तक क़ुरआन एवं हदीस के आलोक में हज्ज, उमरा तथा ज़ियारत से संबंधित आदेशों एवं निर्देशों की व्याख्या करती है, और हज्ज तथा उमरा के आवश्यक कार्यों को स्पष्ट करती है, इहराम के दौरान निषेध वस्तुओं को बयान करती है और मस्जिद -ए- नबवी की ज़ियारत के आदाब बताती है तथा इन इबादतों में पाई जाने वाली बिद्अतों से सावधान करती है।
लेखक का प्राक्कथन
अल्लाह के नाम से आरंभ करता हूँ, जो अत्यन्त कृपाशील तथा अति दयावान् है।
समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सारे संसार का रब है, तथा परहेज़गारों के लिए अच्छा परिणाम है, एवं दुरूद व सलाम अवतरित हो उसके बंदे और रसूल मुहम्मद पर, तथा उनके परिवार वालों और उनके सभी साथियों पर।
स्तुतिगान के पश्चातः
यह एक संक्षिप्त पुस्तिका है जो हज्ज, उसके महत्व, उसके आदाब, एवं उन बातों के बारे में है जो हज्ज की यात्रा करने वाले व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं, इसमें हज्ज, उमरा और ज़ियारत से संबंधित कई महत्वपूर्ण मुद्दों को संक्षेप और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया गया है, तथा इसमें मैंने वह बातें कही हैं जो अल्लाह की किताब और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत से प्रमाणित हैं, यह मैंने मुसलमानों को नसीहत के तौर पर और अल्लाह तआला के इस कथन पर अमल करते हुए संकलित किया है :
﴿وَذَكِّرْ فَإِنَّ الذِّكْرَى تَنْفَعُ الْمُؤْمِنِينَ 55﴾
"तथा आप नसीहत करें। क्योंकि निश्चय ही नसीहत ईमानवालों को लाभ देती है।" [सूरह ज़ारियात : 55]।
एक अन्य स्थान में फ़रमाया है :
﴿وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ لَتُبَيِّنُنَّهُ لِلنَّاسِ وَلَا تَكْتُمُونَهُ...﴾
"तथा (ऐ नबी! याद करो) जब अल्लाह ने किताब वालों से पक्का वचन लिया था कि तुम अवश्य इसे लोगों के सामने बयान करते रहोगे और इसे छुपाओगे नहीं...।" [सूरह आल-ए-इमरान : 187]। पूरी आयत देखें।
तथा उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन को सामने रखते हुए :
﴿...وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَى...﴾
"...तथा नेकी और परहेज़गारी पर एक-दूसरे का सहयोग करो...।" [सूरह माइदा : 2]।
तथा जैसा कि सहीह हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है कि आप ने फ़रमाया :
«الدِّينُ النَّصِيحَةُ، ثَلَاثًا، قِيلَ: لِمَنْ يَا رَسُولَ اللَّهِ؟ قَالَ: لِلَّهِ وَلِكِتَابِهِ وَلِرَسُولِهِ وَلِأَئِمَّةِ المُسْلِمِينَ وَعَامَّتِهِمْ».
"धर्म तो नसीहत (सदुपदेश) का नाम है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा तीन बार फ़रमाया, पूछा गया : हे अल्लाह के रसूल! किसके लिए? आप ने फ़रमाया : अल्लाह के लिए, उसकी किताब के लिए, उसके रसूल के लिए, मुसलमानों के इमामों (शासकों) एवं उनके आम लोगों के लिए।"(1)
तथा तबरानी ने हुज़ैफ़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«مَنْ لَمْ يَهْتَمَّ بِأَمْرِ المُسْلِمِينَ فَلَيْسَ مِنْهُمْ، وَمَنْ لَمْ يُصْبِحْ وَيُمْسِ نَاصِحًا لِلَّهِ وَلِرَسُولِهِ وَلِكِتَابِهِ وَلِإِمَامِهِ وَلِعَامَّةِ المُسْلِمِينَ فَلَيْسَ مِنْهُمْ».
"जो व्यक्ति मुसलमानों के मामलों की चिंता नहीं करता, वह उनमें से नहीं है, तथा जो सुबह एवं शाम अल्लाह, उसकी किताब, उसके रसूल, मुसलमानों के शासकों तथा उनके आम लोगों के लिए शुभचिंतक (नसीहत करने वाला) नहीं बनता, वह उनमें से नहीं है।"(2)
अल्लाह से प्रार्थना है कि वह इससे मुझे तथा मुसलमानों को लाभान्वित करे, एवं इस प्रयास को अपनी प्रसन्नता के लिए विशुद्ध बना दे, तथा इसे अपने पास आनंदमयी जन्नत में सफलता का कारण बना दे। निःसंदेह वह सुनने वाला और दुआ स्वीकार करने वाला है, और वही हमारे लिए पर्याप्त है तथा सबसे अच्छा कार्यसाधक है।
अध्याय
हज्ज एवं उमरा के वाजिब (अनिवार्य) होने तथा शीघ्रातिशीघ्र इसे अदा करने के प्रमाण के संबंध में
जब यह ज्ञात हो जाए, तो आप सभी को -अल्लाह मुझे और आपको सत्य जानने और उसका पालन करने की तौफीक़ दे- यह पता होना चाहिए कि अल्लाह ने अपने बंदों पर अपने पवित्र घर के हज्ज को अनिवार्य कर दिया है और इसे इस्लाम के स्तंभों में से एक महत्वपूर्ण स्तंभ करार दिया है, अल्लाह तआला का कथन है:
﴿...وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ﴾
"...तथा अल्लाह के लिए लोगों पर इस घर का हज्ज अनिवार्य है, जो वहाँ तक पहुँचने का सामर्थ्य रखता हो, और जिसने इनकार किया तो निःसंदेह अल्लाह (उससे, बल्कि) समस्त संसार से निस्पृह (बेनियाज़) है।" [सूरह आल-ए-इमरान : 97]।
सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«بُنِيَ الإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، وَإِقَامِ الصَّلَاةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ، وَحَجِّ بَيْتِ اللَّهِ الحَرَامِ».
"इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर रखी गई है : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और यह कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना, और अल्लाह के पवित्र घर (काबा) का हज्ज करना।"(3)
तथा सईद (बिन मन्सूर) ने अपनी सुनन में उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है, वह कहते हैं: "मैंने इरादा किया था कि मैं कुछ लोगों को इन छेत्रों में भेजूँ, ताकि वे देखें कि जिन लोगों ने हज्ज की क्षमता(4) होने पर भी हज्ज नहीं किया, उनपर जिज़्या (विशेष कर) लगाया जाए। वे मुसलमान नहीं हैं, वे मुसलमान नहीं हैं।"(5)
तथा अली रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने फ़रमाया: "जो व्यक्ति हज्ज करने की क्षमता रखने के बावजूद हज्ज न करे, तो इसकी कोई परवाह नहीं कि वह यहूदी हो कर मरे अथवा ईसाई होकर।"(6)
तथा जो व्यक्ति हज्ज करने में सक्षम है, किंतु उसने अभी तक हज्ज नहीं किया है, तो उसे तुरंत इस फ़र्ज़ को अदा कर लेना चाहिए, क्योंकि अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«تَعَجَّلُوا إِلَى الحَجِّ - يَعْنِي الفَرِيضَةَ - فَإِنَّ أَحَدَكُمْ لَا يَدْرِي مَا يَعْرِضُ لَهُ».
"हज्ज -अर्थात फ़र्ज़ हज्ज- की अदायगी में जल्दी करो, क्योंकि तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे साथ कब कौन सी घटना घट जाए।"(7)
और क्योंकि हज्ज का तुरंत अदा करना उन पर फ़र्ज़ है जो वहाँ तक जाने में सक्षम हैं, अल्लाह के इस कथन के ज़ाहिरी (स्पष्ट) अर्थ के अनुसार :
﴿...وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ﴾
"...तथा अल्लाह के लिए लोगों पर इस घर का हज्ज अनिवार्य है, जो वहाँ तक पहुँचने का सामर्थ्य रखता हो, और जिसने इनकार किया तो निःसंदेह अल्लाह (उससे, बल्कि) समस्त संसार से निस्पृह (बेनियाज़) है।" [सूरह आल-ए-इमरान : 97]।
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अपने ख़ुतबे (भाषण) में इस कथन के अनुसार :
«أَيُّهَا النَّاسُ، إِنَّ اللَّهَ فَرَضَ عَلَيْكُمُ الحَجَّ فَحُجُّوا».
"हे लोगो, अल्लाह ने तुम्हारे ऊपर हज्ज को फ़र्ज़ (अनिवार्य) किया है, अतः हज्ज करो।"(8)
तथा ऐसी बहुतेरी हदीसें वर्णित हैं जो उमरा के वाजिब होने को प्रमाणित करती हैं, जिन में से कुछ निम्नांकित हैं :
इस सिलसिले की एक हदीस में है कि जब जिब्रील अलैहिस्सलाम ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस्लाम के बारे में पूछा, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उत्तर दिया :
«الإِسْلَامُ أَنْ تَشْهَدَ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، وَتُقِيمَ الصَّلَاةَ، وَتُؤْتِيَ الزَّكَاةَ، وَتَحُجَّ البَيْتَ وَتَعْتَمِرَ، وَتَغْتَسِلَ مِنَ الجَنَابَةِ، وَتُتِمَّ الوُضُوءَ، وَتَصُومَ رَمَضَانَ»
"इस्लाम यह है कि तुम गवाही दो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, और तुम नमाज़ स्थापित करो, ज़कात अदा करो, हज्ज एवं उमरा करो, जनाबत (स्वप्नदोष या संभोग के कारण होने वाली अपवित्रता) से स्नान करो, वुज़ू पूरा करो, तथा रमज़ान के रोज़े रखो।"(9)
इब्न -ए- ख़ुज़ैमा एवं दारक़ुत्नी ने इसे उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है, तथा दारक़ुत्नी ने कहा है कि : इसकी सनद प्रमाणित सहीह है।
उन्ही में : आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस है कि उन्होंने पूछा :
«يَا رَسُولَ اللَّهِ، هَلْ عَلَى النِّسَاءِ مِنْ جِهَادٍ؟ قَالَ: عَلَيْهِنَّ جِهَادٌ لَا قِتَالَ فِيهِ: الحَجُّ وَالعُمْرَةُ».
"हे अल्लाह के रसूल! क्या महिलाओं पर भी जिहाद है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : उनके ऊपर ऐसा जिहाद है जिसमें लड़ाई नहीं है : हज्ज तथा उमरा।"(10) इस हदीस को अहमद एवं इब्ने माजह ने सहीह सनद से रिवायत किया है।
हज्ज एवं उमरा जीवन भर में केवल एक बार ही फ़र्ज़ है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहीह हदीस में फ़रमाया है :
«الحَجُّ مَرَّةٌ، فَمَنْ زَادَ فَهُوَ تَطَوُّعٌ».
"हज्ज केवल एक बार (फ़र्ज़) है, जो इससे अधिक करे, वह नफ़्ल है।"(11)
नफ़्ल के तौर पर अधिकाधिक हज्ज एवं उमरा करना सुन्नत है, क्योंकि सहीहैन (सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम) में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से प्रमाणित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«العُمْرَةُ إِلَى العُمْرَةِ كَفَّارَةٌ لِمَا بَيْنَهُمَا، وَالحَجُّ المَبْرُورُ لَيْسَ لَهُ جَزَاءٌ إِلَّا الجَنَّةُ».
"एक उमरा दूसरे उमरा तक के गुनाहों का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) है, तथा मबरूर (स्वीकार्य) हज्ज का प्रतिफल केवल जन्नत है।"(12)
अध्याय
पापों से तौबा करने एवं अत्याचारों से मुक्त होने की अनिवार्यता के संबंध में
जब मुसलमान हज्ज या उमरा की यात्रा के लिए दृढ़ निश्चय करे, तो उसके लिए मुस्तहब (वांछनीय) है कि वह अपने परिवार वालों एवं मित्रों को अल्लाह के तक़वा की नसीहत करे, तक़वा का अर्थ है : अल्लाह के आदेशों का पालन करना और उसकी निषेधाज्ञाओं से बचना।
उचित यह है कि वह अपने क़र्ज़ एवं लेन-देन को लिख कर उस पर गवाह बना ले, और उसे चाहिए कि वह सभी पापों से सच्चे दिल से तौबा करने में तत्परता दिखाए, अल्लाह तआला के इस कथन के अनुसार :
﴿...وَتُوبُوا إِلَى اللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ﴾
"...और ऐ ईमान वालो! तुम सब अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम सफल हो जाओ।" [सूरह नूर : 31]।
तौबा की वास्तविकता है : पापों से रुक जाना तथा उन्हें छोड़ देना, पिछले पापों पर लज्जा अनुभव करना, तथा पुनः उसको न दोहराने का संकल्प लेना, तथा यदि उसने किसी पर उसकी जान, माल अथवा सम्मान के संबंध में अत्याचार किया है तो यात्रा करने के पूर्व उन्हें लौटा देना या उनसे अपने आपको मुक्ति दिलाना, क्यूँकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहीह हदीस में फ़रमाया है :
«مَنْ كَانَتْ عِنْدَهُ مَظْلَمَةٌ لِأَخِيهِ مِنْ مَالٍ أَوْ عِرْضٍ فَلْيَتَحَلَّلِ اليَوْمَ قَبْلَ أَنْ لَا يَكُونَ دِينَارٌ وَلَا دِرْهَمٌ، إِنْ كَانَ لَهُ عَمَلٌ صَالِحٌ أُخِذَ مِنْهُ بِقَدْرِ مَظْلَمَتِهِ، وَإِنْ لَمْ تَكُنْ لَهُ حَسَنَاتٌ أُخِذَ مِنْ سَيِّئَاتِ صَاحِبِهِ فَحُمِلَ عَلَيْهِ».
"जिसने अपने भाई पर धन अथवा सम्मान के संबंध में कोई अन्याय किया हो, उसे आज क्षमा मांग लेना चाहिए, इससे पहले कि (जब क़ियामत के दिन) कोई दीनार या दिरहम न होगा। यदि उसके पास नेक काम होगा तो उसमें से उसके अन्याय के अनुपात में ले लिया जाएगा। परंतु यदि उसके पास कोई पुण्य नहीं होगा तो उसके साथी (जिस पर उसने अन्याय किया होगा, उस) का पाप ले कर उस पर लाद दिया जाएगा।"(13)
तथा उसके लिए उचित यह है कि अपने हज्ज और उमरा के लिए हलाल कमाई में से पवित्र धन चुने, क्योंकि सहीह हदीस में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«إِنَّ اللَّهَ تَعَالَى طَيِّبٌ لَا يَقْبَلُ إِلَّا طَيِّبًا».
"अल्लाह तआला पवित्र है तथा पवित्र को ही स्वीकार करता है।"(14)
तथा तबरानी ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«إِذَا خَرَجَ الرَّجُلُ حَاجًّا بِنَفَقَةٍ طَيِّبَةٍ وَوَضَعَ رِجْلَهُ فِي الغَرْزِ فَنَادَى: لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ، نَادَاهُ مُنَادٍ مِنَ السَّمَاءِ: لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ، زَادُكَ حَلَالٌ، وَرَاحِلَتُكَ حَلَالٌ، وَحَجُّكَ مَبْرُورٌ غَيْرُ مَأْزُورٍ، وَإِذَا خَرَجَ الرَّجُلُ بِالنَّفَقَةِ الخَبِيثَةِ فَوَضَعَ رِجْلَهُ فِي الغَرْزِ فَنَادَى: لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ، نَادَاهُ مُنَادٍ مِنَ السَّمَاءِ: لَا لَبَّيْكَ وَلَا سَعْدَيْكَ، زَادُكَ حَرَامٌ، وَنَفَقَتُكَ حَرَامٌ، وَحَجُّكَ غَيْرُ مَبْرُورٍ».
"जब कोई व्यक्ति पवित्र धन के साथ हज्ज के लिए निकलता है और अपनी सवारी पर पैर रखकर कहता है : लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक (हाज़िर हूँ ऐ अल्लाह! हाज़िर हूँ), तो आसमान से एक पुकारने वाला पुकारता है: लब्बैक व सअ्दैक, तुम्हारा पाथेय हलाल है, तुम्हारी सवारी हलाल है, और तुम्हारा हज्ज मबरूर (स्वीकार्य) है, तथा तुमपर कोई दोष नहीं है। और जब कोई व्यक्ति अवैध धन के साथ निकलता है और अपनी सवारी पर पैर रखकर कहता है : लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, तो आसमान से एक पुकारने वाला पुकारता है : ला लब्बैक व ला सअदैक, तुम्हारा सामान हराम है, तुम्हारा ख़र्च हराम है, और तुम्हारा हज्ज मबरूर नहीं है।"(15)
तथा हज्ज करने वाले व्यक्ति के लिए उचित है कि वह लोगों के हाथों में जो (धन इत्यादि) है उससे बेपरवाह रहे एवं उनसे मांगने से परहेज़ करे, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«وَمَنْ يَسْتَعْفِفْ يُعِفَّهُ اللَّهُ، وَمَنْ يَسْتَغْنِ يُغْنِهِ اللَّهُ».
"जो माँगने से बचेगा, अल्लाह उसे माँगने से बचाएगा, जो बेनियाज़ी दिखाएगा, अल्लाह उसे बेनियाज़ रखेगा।"(16)
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है :
«لَا يَزَالُ الرَّجُلُ يَسْأَلُ النَّاسَ حَتَّى يَأْتِيَ يَوْمَ القِيَامَةِ وَلَيْسَ فِي وَجْهِهِ مُزْعَةُ لَحْمٍ».
"आदमी लगातार लोगों से मांगता रहता है, यहाँ तक कि क़ियामत के दिन इस स्थिति में आएगा कि उसके चेहरे पर मांस का एक टुकड़ा भी नहीं होगा।"(17)
तथा हाजी के ऊपर अनिवार्य है कि वह अपने हज्ज एवं उमरा को केवल अल्लाह की प्रसन्नता एवं अंतिम घर (स्वर्ग) पाने के उद्देश्य से अंजाम दे, तथा उन पवित्र स्थानों में अल्लाह को प्रसन्न करने वाले कथनों एवं कार्यों के माध्यम से निकटता प्राप्त करे, एवं उसे अत्यंत सावधानी रखनी चाहिए कि वह अपने हज्ज को संसार एवं उसकी संपत्ति के लिए, या दिखावे और प्रसिद्धि के लिए, अथवा गर्व के लिए न करे, क्योंकि यह सबसे विकृत उद्देश्यों में से है और कार्य के नष्ट होने एवं स्वीकार न किए जाने का कारण बनता है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿مَنْ كَانَ يُرِيدُ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا وَزِينَتَهَا نُوَفِّ إِلَيْهِمْ أَعْمَالَهُمْ فِيهَا وَهُمْ فِيهَا لَا يُبْخَسُونَ 15 أُولَئِكَ الَّذِينَ لَيْسَ لَهُمْ فِي الآخِرَةِ إِلَّا النَّارُ وَحَبِطَ مَا صَنَعُوا فِيهَا وَبَاطِلٌ مَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ 16﴾
"जो व्यक्ति सांसारिक जीवन तथा उसकी शोभा चाहता हो, हम ऐसे लोगों को उनके कर्मों का बदला इसी (दुनिया) में दे देते हैं और इसमें उनके लिए कोई कमी नहीं की जाएगी। यही वे लोग हैं, जिनके लिए आख़िरत में आग के सिवा कुछ नहीं है और उनके दुनिया में किए हुए समस्त कार्य व्यर्थ हो जाएँगे और उनका सारा किया-धरा अकारत होकर रह जाएगा।" [सूरह हूद : 15 -16]।
एक अन्य स्थान पर अल्लाह तआला ने कहा है :
﴿مَّنْ كَانَ يُرِيدُ الْعَاجِلَةَ عَجَّلْنَا لَهُ فِيهَا مَا نَشَاءُ لِمَنْ نُرِيدُ ثُمَّ جَعَلْنَا لَهُ جَهَنَّمَ يَصْلَاهَا مَذْمُومًا مَدْحُورًا 18 وَمَنْ أَرَادَ الْآخِرَةَ وَسَعَى لَهَا سَعْيَهَا وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَئِكَ كَانَ سَعْيُهُمْ مَشْكُورًا 19﴾
"जो व्यक्ति जल्द प्राप्त होने वाली (दुनिया) चाहता है, तो हम उसे इसी (दुनिया) में से जो चाहते हैं, जिसके लिए चाहते हैं जल्द ही दे देते हैं। फिर हमने उसके लिए (परलोक में) जहन्नम बना रखी है, जिसमें वह निंदित और दुत्कारा हुआ प्रवेश करेगा। और जो आख़िरत चाहता है और उसके लिए वैसा ही प्रयास करता है, जबकि वह ईमान वाला है, तो ऐसे लोगों का प्रयास सराहा जाएगा।" [सूरह इसरा : 18-19]।
एक अन्य सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«قَالَ اللَّهُ تَعَالَى: أَنَا أَغْنَى الشُّرَكَاءِ عَنِ الشِّرْكِ، مَنْ عَمِلَ عَمَلًا أَشْرَكَ مَعِي فِيهِ غَيْرِي تَرَكْتُهُ وَشِرْكَهُ».
"उच्च एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया : मैं समस्त साझेदारों की साझेदारी से अधिक निस्पृह हूँ, जिसने कोई काम किया और उसमें किसी को मेरा साझी ठहराया, तो मैं उसको और उसके साझी बनाने के कार्य को छोड़ देता हूँ।"(18)
तथा उसके लिए यह भी उचित है कि वह अपनी यात्रा में अच्छे और धार्मिक, तक़वा वाले, एवं धर्म में गहरा ज्ञान रखने वाले लोगों की संगति अपनाए तथा मूर्खों एवं पापियों की संगति से बचे।
तथा उसके लिए उचित है कि हज्ज एवं उमरा के संबंध में जो चीज़ें उसके लिए शरई तौर पर अनिवार्य हैं, उन्हें सीखे, उसके विषय में अपने ज्ञान को बढ़ाए, तथा जो चीज़ उसे समझ में न आए उसके बारे में प्रश्न करे, ताकि वह ज्ञान और समझ प्राप्त कर सके। जब वह अपनी सवारी, जैसे कि ऊँट, गाड़ी, विमान या अन्य किसी प्रकार की सवारी के साधन पर सवार हो, तो उसके लिए यह मुस्तहब (वांछनीय) है कि वह पवित्र अल्लाह का नाम ले (बिस्मिल्लाह कहे), उसकी प्रशंसा करे (अल्हम्दुलिल्लाह कहे), फिर तीन बार तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहे, तत्पश्चात् यह कहे :
﴿...سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ 13 وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُونَ 14﴾
"...पवित्र है वह अल्लाह, जिसने इसे हमारे वश में कर दिया। हालाँकि हम इसे वश में करने वाले नहीं थे। तथा निःसंदेह हम अपने पालनहार की ओर अवश्य लौटकर जाने वाले हैं।" [सूरह ज़ुख़रुफ़ : 13-14]।
«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ فِي سَفَرِي هَذَا البِرَّ وَالتَّقْوَى، وَمِنَ العَمَلِ مَا تَرْضَى، اللَّهُمَّ هَوِّنْ عَلَيْنَا سَفَرَنَا هَذَا، وَاطْوِ عَنَّا بُعْدَهُ، اللَّهُمَّ أَنْتَ الصَّاحِبُ فِي السَّفَرِ، وَالخَلِيفَةُ فِي الأَهْلِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ وَعْثَاءِ السَّفَرِ، وَكَآبَةِ المَنْظَرِ، وَسُوءِ المُنْقَلَبِ فِي المَالِ وَالأَهْلِ».
"ऐ अल्लाह! हम अपनी इस यात्रा में तुझसे भलाई, धर्मपरायणता और ऐसा अमल माँगते हैं, जो तुझे पसंद हो। ऐ अल्लाह! हमारे लिए हमारी इस यात्रा को आसान कर दे और इसकी दूरी को समेट दे। ऐ अल्लाह! तू ही यात्रा में साथी और (अनुपस्थिति में) घर-परिवार की देख-भाल करने वाला है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ यात्रा की कठिनाइयों, बुरी हालत और धन तथा परिवार में बुरे परिवर्तन से।"(19)
यह बात नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सहीह तौर पर प्रमाणित है, जिसे मुस्लिम ने इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस से वर्णित किया है।
यात्रा के दौरान अधिक से अधिक ज़िक्र, क्षमा याचना, दुआ, क़ुरआन की तिलावत तथा उसके अर्थों पर विचार आदि करता रहे। पाबंदी से जमात के साथ नमाज़ पढ़े और अपनी ज़बान को बुराईयों, जैसे बेतुकी बातों में लिप्त होना, एवं अनावश्यक बहस में शामिल होना, तथा अत्यधिक हंसी-मज़ाक करना, आदि से बचाए रखे। अपनी ज़बान को झूठ, ग़ीबत, नफ़रत फैलाने और अपने दोस्तों एवं अन्य मुसलमान भाईयों का मजाक़ उड़ाने से भी बचाए रखे।
और उसे चाहिए कि वह अपने साथियों के साथ भलाई करे, उन्हें किसी भी प्रकार की तकलीफ न दे, तथा अपनी शक्ति के अनुसार, बुद्धिमानी और अच्छे उपदेश के साथ, उन्हें अच्छे कार्यों का आदेश दे एवं बुरे कार्यों से रोके।
अध्याय
जब मीकात (निर्धारित सीमा) पर पहुंचे, तो हाजी कौन से कार्य करे
जब वह मीक़ात पर पहुंचे, तो उसके लिए यह मुस्तहब (वांछनीय) है कि वह गुस्ल करे और इत्र लगाए; क्योंकि यह रिवायत आई है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इहराम के समय सिले हुए कपड़े उतार दिए और गुस्ल किया, और सहीह हदीस में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है, वह कहती हैं:
«كُنْتُ أُطَيِّبُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ لِإِحْرَامِهِ قَبْلَ أَنْ يُحْرِمَ، وَلِحَلِّهِ قَبْلَ أَنْ يَطُوفَ بِالبَيْتِ».
"मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उनके इहराम के लिए ख़ुशबू लगाती थी, इससे पहले कि आप इहराम बांधते तथा आपके हलाल होने लिए काबा का तवाफ़ करने के पूर्व ख़ुशबू लगाया करती थी।"(20)
आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने जब उमरा का इहराम बांधा था तथा उन्हें माहवारी आ गई थी तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें आदेश दिया कि वह स्नान करने के पश्चात हज्ज का इहराम बांध लें। तथा अस्मा बिन्ते उमैस रज़ियल्लाहु अन्हा ने जब ज़ुलहुलैफ़ा (नामक स्थान) पर बच्चे को जन्म दिया था, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें आदेश दिया कि वह स्नान करने के पश्चात, कपड़े का उपयोग करें और इहराम बांध लें।(21)
इससे यह प्रमाण मिलता है कि एक महिला जब मीक़ात पर पहुँचती है और वह मासिक धर्म या प्रसव की अवस्था में होती है, तो उसे स्नान करना चाहिए तथा लोगों के साथ इहराम बाँधना चाहिए, और हाजी जो कार्य करते हैं, वह सब कार्य करना चाहिए सिवाय काबा के चारों ओर तवाफ़ के। जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आइशा और अस्मा रज़ियल्लाहु अन्हुमा को इसका आदेश दिया था।
और जो व्यक्ति इहराम बांधने की इच्छा रखता है, उसके लिए यह मुस्तहब है कि वह अपनी मूंछ, नाखून, जघन बाल और बगल के बालों को देख ले तथा आवश्यकता के अनुसार उन्हें काट ले, ताकि इहराम के बाद उसे इसकी आवश्यकता न पड़े, जबकि यह उसके लिए (उस समय) वर्जित हो, तथा इसलिए भी कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुसलमानों को हर समय इन चीजों का अवलोकन करने का आदेश दिया है, जैसा कि सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में वर्णित अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
«الفِطْرَةُ خَمْسٌ: الخِتَانُ، وَالِاسْتِحْدَادُ، وَقَصُّ الشَّارِبِ، وَقَلْمُ الأَظْفَارِ، وَنَتْفُ الإِبْطِ».
"फितरत (प्रवृत्ति) के पाँच कार्य हैं : ख़त्ना करना, जघन बालों को हटाना, मूंछें काटना, नाखून काटना, तथा बगल के बालों को उखाड़ना।"(22)
तथा सहीह मुस्लिम में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं :
«وَقَّتَ لَنَا فِي قَصِّ الشَّارِبِ، وَقَلْمِ الأَظْفَارِ، وَنَتْفِ الإِبْطِ، وَحَلْقِ العَانَةِ: أَنْ لَا نَتْرُكَ ذَلِكَ أَكْثَرَ مِنْ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً».
"हमारे लिए (अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने) मूंछ काटने, नाखून काटने, बगल के बाल उखाड़ने, और जघन बाल काटने की अवधि निर्धारित की, कि इसे हम चालीस रातों से अधिक न छोड़ें।"(23)
तथा नसई ने इस हदीस को इन शब्दों के साथ रिवायत किया है:
«وَقَّتَ لَنَا رَسُولُ اللَّهِ ﷺ».
"हमारे लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अवधि निर्धारित कर दी।"(24)
इसे अहमद, अबू दावूद तथा तिर्मिज़ी ने नसई के शब्दों के साथ रिवायत किया है। जहां तक सिर की बात है, तो इहराम के समय सिर के बालों को काटना शरीअत सम्मत नहीं है। चाहे पुरुष हों या महिला।
जहां तक दाढ़ी की बात है, तो किसी भी समय उसको मूंडना अथवा उस में से कुछ काटना हराम है, बल्कि इसे जस का तस छोड़े रखना एवं बढ़ाना अनिवार्य है, जैसा कि सहीहैन (सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम) में इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से प्रमाणित है, वह कहते हैं: अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया:
«خَالِفُوا المُشْرِكِينَ، وَفِّرُوا اللِّحَى، وَأَحْفُوا الشَّوَارِبَ».
"मुश्रिकीन का विरोध करो, दाढ़ियों को बढ़ाओ तथा मूंछों को काटो।"(25)
तथा मुस्लिम ने अपनी सहीह में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सलल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«جُزُّوا الشَّوَارِبَ، وَأَرْخُوا اللِّحَى، خَالِفُوا المَجُوسَ».
"मूंछों को काटो और दाढ़ियों को बढ़ाओ तथा मजूसियों का विरोध करो।"(26)
आज के समय में यह बड़ी मुसीबत है कि बहुतेरे लोग इस सुन्नत का विरोध करते हैं और दाढ़ियों को काटते हैं, तथा काफिरों और महिलाओं की समानता को स्वीकार करते हैं, विशेष रूप से वे लोग जो ज्ञान एवं शिक्षा से जुड़े हुए हैं। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन (हम अल्लाह के हैं तथा उसी की ओर लौटने वाले हैं), हम अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें एवं सभी मुसलमानों को सुन्नत का अनुसरण करने और दृढ़ता के साथ उसे थामे रहने एवं लोगों को इसकी ओर आमंत्रण देने की तरफ़ मार्गदर्शित करे, भले ही अधिकांश लोग इसे नापसंद करें, तथा अल्लाह हमारे लिए पर्याप्त है और वही सबसे अच्छा संरक्षक है, एवं सर्वोच्च और महान अल्लाह की सहायता के बिना न बुराइयों को छोड़ने की क्षमता है और न ही पुन्य करने का सामर्थ्य।
फिर पुरुष इज़ार (तहबंद) और रिदा (चादर) पहनें, तथा मुस्तहब (पसंदीदा) यह है कि वे दोनों सफेद एवं साफ हों, और यह भी मुस्तहब है कि वो जूते पहनकर इहराम बाँधें, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«وَلْيُحْرِمْ أَحَدُكُمْ فِي إِزَارٍ وَرِدَاءٍ وَنَعْلَيْنِ، فَإِنْ لَمْ يَجِدْ نَعْلَيْنِ فَلْيَلْبَسْ خُفَّيْنِ وَلْيَقْطَعْهُمَا حَتَّى يَكُونَا أَسْفَلَ مِنَ الكَعْبَيْنِ».
"हर व्यक्ति लुंगी, चादर और जूते पहनकर इहराम बांधे। अगर जूते न मिल सकें, तो चमड़े के मोज़े पहन ले और उनको काटकर टखनों से नीचे तक कर ले।"(27) इस हदीस को इमाम अहमद रहिमहुल्लाह ने रिवायत किया है।
जहाँ तक महिलाओं की बात है, तो उन्हें इहराम बाँधने के लिए किसी भी रंग के कपड़े पहनने की अनुमति है, चाहे वह काला हो, हरा हो या अन्य कोई रंग, किंतु पुरुषों के कपड़ों की नकल करने से बचना चाहिए। इहराम के दौरान महिलाओं को नक़ाब और दस्ताना पहनने की अनुमति नहीं है। परंतु वह नक़ाब एवं दस्तानों को छोड़ किसी अन्य चीज़ से अपने चेहरे तथा हाथों को ढकेगी, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने महिलाओं को इहराम के दौरान नक़ाब और दस्ताना पहनने से मना किया है। जहाँ तक कुछ लोगों द्वारा महिलाओं के इहराम के लिए हरे या काले रंग को विशेष रूप से निर्धारित करने की बात है, तो इसका कोई आधार नहीं है।
फिर स्नान, सफाई एवं इहराम के कपड़े पहनने के बाद, अपने दिल में उस इबादत की निय्यत (इरादा) करे जिसे वह अंजाम देना चाहता है, चाहे वह हज्ज हो या उमरा, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
«إِنَّمَا الأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ، وَإِنَّمَا لِكُلِّ امْرِئٍ مَا نَوَى».
"सभी कार्यों का आधार निय्यतों पर है और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी निय्यत के अनुरूप ही परिणाम मिलेगा।"(28)
तथा उस ने जो निय्यत (इरादा) किया है, उसे ज़ुबान से भी कहना उसके लिए मशरूअ् (उचित) है। यदि उसकी निय्यत उमरा की है, तो वह कहेगा : "लब्बैक उमरतन" (मैं उपस्थित हूँ उमरा के लिए) अथवा "अल्लाहुम्मा लब्बैक उमरतन" (ऐ अल्लाह मैं उपस्थित हूँ उमरा के लिए) तथा यदि उसकी निय्यत हज्ज की है, तो वह कहेगा : "लब्बैक हज्जन" (मैं उपस्थित हूँ हज्ज के लिए) अथवा "अल्लाहुम्मा लब्बैक हज्जन" (ऐ अल्लाह मैं उपस्थित हूँ हज्ज के लिए) क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा किया था, और यदि उसने दोनों की निय्यत की है, तो वह इस तरह से कहेगा : अल्लाहुम्मा लब्बैक उमरतन व हज्जन (ऐ अल्लाह मैं उपस्थित हूँ उमरा एवं हज्ज के लिए)। उत्तम यह है कि इसे उस समय कहा जाए, जब वह अपनी सवारी के जानवर, गाड़ी या अन्य किसी वाहन पर स्थिर हो जाए। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी सवारी पर स्थिर होने एवं मीक़ात से चलने के लिए तैयार होने के बाद इसे कहा था। (इस विषय पर) विद्वानों के अनेक कथनों में से यह सबसे सही कथन है।
तथा इहराम को छोड़ कर किसी अन्य इबादत (उपासना) में निय्यत को ज़ुबान से उच्चारित करना मशरूअ् (वैध) नहीं है, क्योंकि ऐसा ही नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है।
जहाँ तक नमाज़, तवाफ़ एवं अन्य इबादतों का संबंध है, तो उन इबादतों को अंजाम देते समय निय्यत को ज़ुबान से बोल कर अदा नहीं किया जाएगा, अतः वह यह नहीं कहेगा : 'मैंने इस-इस प्रकार की नमाज़ पढ़ने की निय्यत की' अथवा 'मैंने इस प्रकार का तवाफ़ करने की निय्यत की', क्योंकि ऐसा करना नव-उद्भूत बिद्अतों में से है, तथा इसे ज़ोर से कहना और भी अधिक बुरा एवं संगीन पाप है, क्योंकि यदि निय्यत का ज़ुबान से इज़हार करना मशरूअ् होता, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसे स्पष्ट रूप से समझाया होता तथा अपने कर्म या कथन से इसे उम्मत के लिए स्पष्ट किया होता, इसके साथ-साथ सलफ-ए-सालेहीन भी इसे पहले ही अपना चुके होते।
किंतु जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम या उनके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से ऐसा करना वर्णित नहीं है, तो इस से यह स्पष्ट है कि यह एक बिदअ्त है, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
«وَشَرُّ الأُمُورِ مُحْدَثَاتُهَا، وَكُلُّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
"सबसे बुरी बात बिद्अत (दीन के नाम पर की गई नई चीज़) है एवं प्रत्येक बिद्अत गुमराही (पथभ्रष्टता) है।"(29) इसे इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है।
इसी तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।"(30) इस हदीस को इमाम बुख़ारी तथा इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।
जबकि सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है :
«مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके संबंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह अमान्य है।"(31)
अध्याय
स्थानीय मीक़ात एवं उनकी सीमाओं के बारे में
(स्थानीय) मीक़ात पाँच हैं :
प्रथम : ज़ुल-हुलैफ़ा, जो मदीना के निवासियों के लिए मीक़ात है, तथा आज-कल इसे लोग 'अब्यार -ए- अली' के नाम से जानते हैं।
द्वितीय : अल-जुह्फ़ह, जो शाम (सीरिया आदि) के निवासियों की मीक़ात है, यह एक खंडहर गाँव है जो राबिग़ के पास है, और आजकल लोग राबिग़ से इहराम बाँधते हैं, एवं जिसने राबिग़ से इहराम बाँधा, उसने वास्तव में मीक़ात से ही इहराम बाँधा, क्योंकि राबिग़ उससे थोड़ा ही पहले है।
तृतीय : क़र्न अल-मनाज़िल, जो नज्द के निवासियों का मीक़ात है, इसे आजकल 'अस-सैल' के नाम से जाना जाता है।
चतुर्थ : यलमलम, जो यमन के निवासियों का मीक़ात है।
पंचम : ज़ात-ए-इर्क़, यह इराक के निवासियों का मीक़ात है।
ये मवाक़ीत (स्थानीय सीमाएँ) नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन लोगों के लिए निर्धारित की हैं जिनका हमने पूर्व में उल्लेख किया है, तथा उन लोगों के लिए भी जो हज्ज या उमरा करने की निय्यत से इनमें से किसी मीक़ात से गुज़रें।
इन मीक़ातों से गुज़रने वालों पर वाजिब है कि वे वहीं से इहराम बाँधें तथा यदि वे हज्ज अथवा उमरा करने के उद्देश्य से मक्का जाने की इच्छा रखते हों, तो उनके लिए यह हराम (वर्जित) है कि वे बिना इहराम के उन्हें पार करें, चाहे उनका इन मवाक़ीत से गुज़रना ज़मीन के रास्ते से हो या हवाई मार्ग से, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इन मवाक़ीत को निर्धारित करते समय फ़रमाया था :
«هُنَّ لَهُنَّ، وَلِمَنْ أَتَى عَلَيْهِنَّ مِنْ غَيْرِ أَهْلِهِنَّ، مِمَّنْ أَرَادَ الحَجَّ وَالعُمْرَةَ».
"ये इन (स्थानों के निवासियों) के लिए हैं तथा उनके लिए भी जो यहाँ के निवासी नहीं हैं, परंतु इन (मार्गों) से हज्ज और उमरा के इरादे से गुज़रते हैं"।(32)
और जो व्यक्ति हज्ज या उमरा की निय्यत से हवाई मार्ग से मक्का जा रहा हो, उसके लिए शरीअत सम्मत यह है कि वह उड़ान से पहले ही इसके लिए स्नान एवं इस प्रकार की अन्य तैयारियां कर ले। ऐसे में जब मीक़ात पहुँचे तो अपना इज़ार (लुंगी) और रिदा (चादर) पहन ले। फिर यदि (उमरा करने के लिए) पर्याप्त समय हो तो उमरा के लिए लब्बैक कहे तथा यदि समय कम हो (जिसमें उमरा नहीं किया जा सकता हो), तो हज्ज के लिए लब्बैक कहे। यदि इज़ार और रिदा को सवारी पर चढ़ने के पूर्व ही अथवा मीक़ात के पास पहुँचने से पहले पहन लिया, तो इसमें आपत्ति की कोई बात नहीं है। परंतु इबादत में प्रवेश करने की निय्यत नहीं करेगा और न ही लब्बैक कहेगा, जब तक कि मीक़ात न पहुँच जाए अथवा उसके निकट न आ जाए। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मीक़ात से ही इहराम बाँधा था। और उम्मत पर वाजिब है कि वह अल्लाह के इस कथन को सामने रखते हुए अन्य धार्मिक मामलों की तरह इस मामले में भी नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का ही अनुसरण करे:
﴿لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ...﴾
"निःसंदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है...।" [सूरह अहज़ाब : 21]।
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्जतुल वदा के अवसर पर फ़रमाया था :
«خُذُوا عَنِّي مَنَاسِكَكُمْ».
"मुझसे अपने मनासिक (हज्ज के कार्य) सीख लो।"(33)
जहाँ तक बात है उस व्यक्ति की जो मक्का की ओर जा तो रहा हो परंतु उस का इरादा हज्ज या उमरा करने का न हो, जैसे व्यापारी, लकड़हारा, डाकिया एवं इसी तरह के अन्य लोग, तो उसके लिए इहराम बाँधना आवश्यक नहीं है जब तक कि वह स्वयं इसका इरादा न करे, जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पिछली हदीस में मीक़ात का वर्णन करते हुए फ़रमाया है :
«هُنَّ لَهُنَّ، وَلِمَنْ أَتَى عَلَيْهِنَّ مِنْ غَيْرِ أَهْلِهِنَّ، مِمَّنْ أَرَادَ الحَجَّ وَالعُمْرَةَ».
"ये इन (स्थानों के निवासियों) के लिए हैं तथा उनके लिए भी जो यहाँ के निवासी नहीं हैं, परंतु इन (मार्गों) से हज्ज और उमरा के इरादे से गुज़रते हैं"।(34)
इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति इस मीक़ात से गुजरता है परंतु उसका इरादा हज्ज अथवा उमरा करने का नहीं है, तो उस पर इहराम बाँधना वाजिब नहीं है।
यह अल्लाह की अपने बंदों पर दया एवं आसानी में से है, अतः इस पर उसके लिए हम्द (प्रशंसा) एवं शुक्र (धन्यवाद) है, इस बात की पुष्टि इस से भी होती है कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फ़त्ह (विजय) के साल मक्का आए, तो आपने इहराम नहीं बाँधा, बल्कि आप मक्का में मिग़्फ़र (लोहे की टोपी) पहनकर दाखिल हुए, क्योंकि उस समय आपका इरादा हज्ज या उमरा का नहीं था, बल्कि मक्का को फ़त्ह करना एवं उसमें मौजूद शिर्क को मिटाना था।
तथा जो लोग मीक़ात के अंदर रहते हों, जैसे जेद्दा, उम्म अस-सलम, बहरा, अश-शराइय, बद्र, मस्तूरा एवं इसी तरह के अन्य स्थानों के निवासी, तो उन्हें उन पूर्वोक्त पाँच मीक़ातों में से किसी पर भी जाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उनका निवास स्थान ही उनका मीक़ात है और वे वहीं से हज्ज या उमरा का इरादा करके इहराम बाँध सकते हैं। किंतु यदि किसी के पास मीक़ात से बाहर भी एक अन्य निवास स्थान हो, तो उसके लिए दो विकल्प हैं। यदि वह चाहे तो मीक़ात से इहराम बाँधे या फिर अपने उस निवास स्थान से जो मीक़ात की तुलना में मक्का से अधिक निकट है। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इब्न-ए-अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु द्वारा वर्णित हदीस में मीक़ात का वर्णन करते हुए फ़रमाया है :
«فَمَنْ كَانَ دُونَهُنَّ، فَمُهَلُّهُ مِنْ أَهْلِهِ، وَكَذَلِكَ حَتَّى أَهْلُ مَكَّةَ يُهِلُّونَ مِنْ مَكَّةَ».
"तथा जो कोई इस (मीक़ात) के अंदर रहता हो उसे अपने निवास स्थान से इहराम बांधना है(35), यहाँ तक कि मक्का के निवासी मक्का से ही इहराम बाँधेंगे।"(36) इस हदीस को बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
किंतु हरम (की सीमा) के अंदर उपस्थित व्यक्ति यदि उमरा करना चाहता हो तो उसे हिल्ल (हरम की सीमा के बाहर) जाना होगा तथा वह वहाँ से उमरा के लिए इहराम बांधेगा, क्योंकि जब आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से उमरा की अनुमति मांगी, तो आपने उनके भाई अब्दुर्रहमान को आदेश दिया कि वह उन्हें हिल्ल ले जाएं और वह वहां से इहराम बाँधें, इस से यह प्रमाणित होता है कि हरम के अंदर से उमरा के लिए इहराम नहीं बाँधा जाएगा, बल्कि हिल्ल से बाँधा जाएगा।
यह हदीस इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की पूर्वोक्त हदीस को ख़ास (उस के अर्थ को सीमित) करती है, तथा यह दर्शाती है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मंशा उनके इस कथन में :
«حَتَّى أَهْلُ مَكَّةَ يُهِلُّونَ مِنْ مَكَّةَ».
"यहाँ तक कि मक्का के निवासी मक्का से ही इहराम बाँधेंगे।"(37) यह है कि इस से अभिप्राय हज्ज लिए इहराम बांधना है न कि उमरा के लिए, क्योंकि यदि हरम (की सीमा) के अंदर से उमरा के लिए इहराम बांधना वैध होता, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा को इसकी अनुमति देते तथा उन्हें हिल्ल तक जाने का कष्ट नहीं देते। यह बिल्कुल स्पष्ट बात है, एवं अधिकांश विद्वानों का मत भी यही है, अल्लाह उन सब पर दया करे, मोमिनों के लिए इसका पालन करना अधिक सुरक्षित है, क्योंकि इसमें दोनों हदीसों पर अमल हो जाता है, और अल्लाह ही तौफ़ीक़ (अनुग्रह) देने वाला है।
जो लोग हज्ज के बाद तनईम या जइर्राना अथवा अन्य स्थानों से बार-बार उमरा करते हैं, जबकि उन्होंने हज्ज से पहले उमरा कर लिया होता है, तो इसके शरई होने का कोई प्रमाण नहीं है, अपितु प्रमाण यह दर्शाते हैं कि इसे छोड़ना बेहतर है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने हज्ज पूरा करने के बाद उमरा नहीं किया है। आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने तनईम से उमरा इसलिए किया था, क्योंकि मक्का में प्रवेश के समय उन्हें हैज़ (माहवारी) आ जाने के कारण वह लोगों के साथ उमरा नहीं कर पाईं थीं। अतः उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अनुरोध किया कि (उन्हें अनुमति दें कि) वह उस उमरा के बदले एक उमरा कर लें, जिसके लिए उन्होंने मीक़ात से इहराम बाँधा था। चुनांचे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें इसकी अनुमति दे दी। इस प्रकार उन्हें दो उमरे मिले : एक वह उमरा जो उन्होंने हज्ज के साथ किया था, तथा यह एकल उमरा। अतः जो कोई आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की स्थिति में हो, उसके लिए हज्ज के बाद उमरा करने में कोई आपत्ति नहीं है। इससे सभी प्रमाणों पर अमल भी हो जाएगा और मुसलमानों को आसानी भी होगी।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि हज्ज के बाद हाजियों का एक और उमरा करना, उस उमरा के अलावा जिसके लिए उन्होंने मक्का में प्रवेश किया था, सभी के लिए कठिनाई पैदा करता है, एवं अधिक भीड़ और हादसों का कारण बनता है, इसके साथ-साथ इसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ढ़ंग और सुन्नत का विरोध भी है। और अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है।
अध्याय
जो हज्ज के महीनों के अतिरिक्त अन्य समय में मीक़ात पर पहुँचे उसके हुक्म के संबंध में
जान लें कि मीक़ात पर पहुँचने वाले की दो स्थितियां होती हैं :
पहली स्थिति : वह हज्ज के महीनों के अलावा समय में मीक़ात पर पहुँचे, जैसे कि रमज़ान और श'अबान में, इस स्थिति में सुन्नत यह है कि वह उमरा के लिए इहराम बाँधे और अपने दिल में इसकी निय्यत करे तथा अपनी ज़बान से कहे : "लब्बैक उमरतन" (मैं उपस्थित हूँ उमरा के लिए) या "अल्लाहुम्मा लब्बैक उमरतन" (ऐ अल्लाह मैं उपस्थित हूँ उमरा के लिए), फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तलबिया कहे, जो कि यह है :
«لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالمُلْكَ، لَا شَرِيكَ لَكَ».
"लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैका ला शरीक लका लब्बैक, इन्नल-हम्दा वन-निअ्मता लका वल् मुल्क, ला शरीका लक।" (में उपस्थित हूँ। ऐ अल्लाह! मैं उपस्थित हूँ। तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ। सारी प्रशंसा, सारी नेमतें और सारा राज्य तेरा है। तेरा कोई साझी नहीं है)।"(38)
तथा वह अधिकाधिक इस तलबिया को एवं अल्लाह के ज़िक्र को करता रहे, यहाँ तक कि वह काबा पहुँच जाए, जब वह काबा तक पहुँच जाए, तो तलबिया कहना छोड़ दे और काबा के चारों ओर सात तवाफ़ (परिक्रमा) करे, फिर मक़ाम -ए- इब्राहीम के पीछे दो रक्अत नमाज़ पढ़े, इसके बाद सफ़ा की ओर जाए तथा सफ़ा और मरवा के बीच सात चक्कर लगाए, तत्पश्चात अपने सिर के बाल मुँडवाए या छोटे करवाए। इस प्रकार उसका उमरा पूरा हो जाएगा और इहराम के कारण जो भी चीज़ उसके लिए हराम थी, अब वह हलाल हो जाएगी।
दूसरी स्थिति : वह हज्ज के महीनों में मीक़ात पर पहुँचे, जो कि शव्वाल, ज़ुल-क़ादा तथा ज़ुल-हिज्जा के पहले दस दिन हैं।
ऐसे व्यक्ति के पास तीन विकल्प होते हैं : केवल हज्ज करना, केवल उमरा करना, या दोनों को एक साथ करना, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब हज्जतुल वदा के समय ज़ुल-क़ादा महीने में मीक़ात पर पहुंचे, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों को हज्ज की इन तीनों नुसुक (पद्धतियों) में से किसी एक को चुनने की स्वतंत्रता दी थी। किंतु यदि उसके पास क़ुर्बानी का जानवर नहीं हो, तो सुन्नत यह है कि वह उमरा के लिए इहराम बाँधे, तथा वही करे जो हमने हज्ज के अतिरिक्त अन्य महीनों में मीक़ात पर पहुँचने वाले के लिए उल्लेख किया है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा को मक्का के करीब पहुँचते ही इहराम को उमरा में बदलने का आदेश दिया तथा मक्का में इस पर और अधिक ज़ोर दिया। अतः उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश का पालन करते हुए तवाफ़ किया, सई की और अपने बाल छोटे किए एवं इहराम से बाहर आ गए। सिवाय उन लोगों के जिन्होंने क़ुर्बानी का जानवर साथ रखा था। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें आदेश दिया कि वे इहराम में रहें, जब तक कि क़ुर्बानी का दिन (दस ज़िलहिज्जा) न आ जाए। और जो व्यक्ति हद्य (क़ुर्बानी के जानवर) लेकर हज्ज कर रहा हो, उसके लिए सुन्नत यह है कि वह हज्ज और उमरा दोनों का इहराम बाँधे, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा ही किया था, कारण यह था कि आप हद्य लेकर आए थे, और आपने अपने उन सहाबा को भी आदेश दिया जो हद्य लेकर आए थे और उमरा का इहराम बाँधा था, कि वे हज्ज का भी इहराम बाँधें और यौम अन-नह्'र (दस ज़िलहिज्जा) तक दोनों से बाहर न आएं। और जो अपने साथ हद्य ले कर आए थे परंतु उन्होंने केवल हज्ज का इहराम बाँधा था, तो वह भी यौम अन-नह्'र तक इहराम में ही रहेंगे, हज्ज -ए- क़िरान करने वाले व्यक्ति के समान।
इस से यह ज्ञात हुआ कि : जिसने केवल हज्ज का इहराम बाँधा हो, या हज्ज और उमरा दोनों का इहराम बाँधा हो परंतु उसके पास हद्य नहीं है, तो उसके लिए अपने इहराम में बाक़ी रहना उचित नहीं है, बल्कि उसके लिए सुन्नत यह है कि वह अपने इहराम को उमरा में बदल दे, तवाफ़ करे, सई करे, बाल छोटे करवाए और इहराम से बाहर आ जाए, जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने उन साथियों को आदेश दिया था जो हद्य लेकर नहीं आए थे, सिवाय इसके कि देर से पहुँचने के कारण ऐसा करने से हज्ज के छूट जाने का डर हो, तो इसमें आपत्ति की कोई बात नहीं है कि वह अपने इहराम में ही रहे। और अल्लाह ही बेहतर जानता है।
यदि इहराम बांधने वाले व्यक्ति को यह भय हो कि वह अपने नुसुक (हज्ज अथवा उमरा) को पूर्ण नहीं कर पाएगा, किसी रोग के कारण अथवा उसे किसी शत्रु का भय हो, तो उसके लिए इहराम बांधते समय यह कहना मुस्तहब (पसंदीदा) है : "फ़'इन हबसनी हाबिसुन फ़महिल्ली हैसु हबस्तनी" (यदि कोई रोकने वाला मुझे रोक दे, तो मेरे इहराम खोलने का स्थान वही होगी जहाँ तू मुझे रोकेगा।) क्योंकि ज़बाआ बिंते ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस में है कि उन्होंने पूछा : हे अल्लाह के रसूल! मैं हज्ज करना चाहती हूँ परंतु मैं बीमार हूँ, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे कहा :
«حُجِّي وَاشْتَرِطِي أَنَّ مَحِلِّي حَيْثُ حَبَسْتَنِي».
"हज्ज करो और यह शर्त रख लो कि मेरे इहराम खोलने का स्थान वही होगा, जहाँ ऐ अल्लाह! तू मुझे रोक देगा।"(39) बुख़ारी एवं मुस्लिम।
इस शर्त का लाभ यह है कि: अगर इहराम बाँधने वाले को ऐसा कुछ हो जाए जो उसे उसकी नुसुक (इबादत) पूरी करने से रोक दे, जैसे कि बीमारी या दुश्मन का सामना, तो वह इहराम से बाहर आ सकता है और उस पर कोई दंड नहीं होगा।
अध्याय
क्या छोटे बच्चे का हज्ज करना, बड़ा होकर उस पर फर्ज़ हज्ज के लिए पर्याप्त होगा?
छोटे लड़के एवं छोटी लड़की का हज्ज सही है, जैसा कि सहीह मुस्लिम में, इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि एक महिला ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर एक बच्चे को उठाया और कहा : हे अल्लाह के रसूल! क्या इसके लिए हज्ज है? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«نَعَمْ، وَلَكِ أَجْرٌ».
"हाँ है, और तुम्हारे लिए प्रतिफल है।"(40)
तथा सहीह बुख़ारी में, साइब बिन यज़ीद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं : "मुझे (हज्जतुल वदा के अवसर पर) अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ हज्ज कराया गया, जबकि उस समय मेरी आयु सात साल थी।"(41) किंतु यह हज्ज, हज्जतुल इस्लाम (इस्लामी हज्ज, अर्थात वयस्क होने पर अनिवार्य होने वाला हज्ज) के स्थान पर उसके लिए काफ़ी नहीं होगा।
इसी प्रकार, दास एवं दासी का हज्ज सही है, किंतु यह इस्लामी हज्ज की जगह पर उनके लिए काफ़ी नहीं होगा, जैसा कि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस में वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«أَيُّمَا صَبِيٍّ حَجَّ، ثُمَّ بَلَغَ الحِنْثَ، فَعَلَيْهِ أَنْ يَحُجَّ حَجَّةً أُخْرَى، وَأَيُّمَا عَبْدٍ حَجَّ، ثُمَّ أُعْتِقَ، فَعَلَيْهِ حَجَّةٌ أُخْرَى».
"जो भी बच्चा हज्ज करे और फिर वयस्क हो जाए, तो उसे एक और हज्ज करना होगा। तथा जो भी दास हज्ज करे और फिर उसे मुक्त कर दिया जाए, तो उसे भी एक और हज्ज करना होगा।"(42) इस हदीस को इब्ने अबी शैबा एवं बैहक़ी ने हसन सनद के साथ रिवायत किया है।
फिर बच्चा यदि विवेक की उम्र से कम आयु का हो, तो उसका अभिभावक उसकी ओर से इहराम की निय्यत करेगा, उसके सिले हुए कपड़े उतार देगा और उसकी ओर से तलबिया कहेगा। इस प्रकार बच्चा मुहरिम हो जाएगा, तथा उसे उन चीजों से रोका जाएगा जिनसे बड़ी आयु के इहराम बाँधने वाले लोगों को रोका जाता है। इसी तरह, जो लड़की विवेक की उम्र से कम आयु की हो, तो उसका अभिभावक उसकी ओर से इहराम की निय्यत करेगा, उसकी ओर से तलबिया कहेगा, और इस प्रकार वह मुहरिमह हो जाएगी, तथा उसे उन चीज़ों से रोका जाएगा जिनसे बड़ी आयु की इहराम बाँधने वाली महिलाओं को रोका जाता है। यह आवश्यक है कि तवाफ़ के दौरान दोनों के कपड़े एवं शरीर पवित्र हों, क्योंकि तवाफ़ नमाज़ के समान है तथा पवित्रता उसके लिए शर्त है।
यदि बालक एवं बालिका विवेक की उम्र के हो गए हों, तो वे अपने अभिभावक की अनुमति से इहराम बाँधेंगे तथा इहराम बाँधते समय वही कार्य करेंगे जो बड़े लोग करते हैं। जैसे स्नान करना एवं इत्र लगाना आदि। उनका वली (अभिभावक) उनकी देखभाल और उनके हितों का ध्यान रखेगा। चाहे वह उनका पिता हो, माता हो या कोई अन्य व्यक्ति। यदि वे किसी कार्य को करने में असमर्थ हो जाएँ तो उनका अभिभावक उनके लिए उन कार्यों को पूरा करेगा, जैसे कंकड़ मारना आदि। तथा उन दोनों पर हज्ज के अन्य सभी कार्यों का पालन करना अनिवार्य होगा। जैसे अरफ़ा में रुकना, मिना और मुज़्दलिफ़ा में रात बिताना तथा तवाफ़ और सई करना। यदि वे तवाफ़ और सई करने में असमर्थ हो जाएं तो उन्हें उठाकर तवाफ़ और सई कराई जाएगी, तथा उत्तम यह है कि उन्हें उठाने वाला तवाफ़ और सई को उनके और अपने बीच साझा न करे, बल्कि केवल उनके लिए तवाफ़ और सई की निय्यत करे, और अपने लिए अलग से तवाफ़ और सई करे, इबादत के मामले में सतर्कता बरतते हुए तथा इस हदीस शरीफ़ का पालन करते हुए:
«دَعْ مَا يَرِيبُكَ إِلَى مَا لَا يَرِيبُكَ».
"जिस कार्य में तुझे संदेह हो, उसे छोड़कर वह कार्य करो, जिसमें तुझे संदेह न हो।"(43)
यदि बालक अथवा बालिका को उठाने वाला तवाफ़ और सई में अपने और उठाए गए दोनों की निय्यत कर ले, तो सही कथन के अनुसार यह (दोनों के लिए) काफ़ी होगा। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस महिला को, जिसने बच्चे के हज्ज के बारे में पूछा था, यह नहीं कहा कि वह केवल बच्चे के लिए तवाफ़ करे। यदि यह अनिवार्य होता, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह स्पष्ट कर दिया होता। अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है।
तथा विवेकशील लड़के एवं विवेकशील लड़की को तवाफ़ आरंभ करने के पूर्व बड़ी आयु के लोगों के इहराम बांधने की तरह ही, हदस (अदृश्य एवं अनुभव न की जाने वाली अपवित्रता) एवं नजस (दृश्य एवं अनुभव की जाने वाली अपवित्रता) से पवित्र होने का आदेश दिया जाएगा, छोटे बच्चे और छोटी लड़की के लिए इहराम उनके अभिभावक पर वाजिब (अनिवार्य) नहीं है, बल्कि यह नफ्ल (निवार्य) है, यदि अभिभावक इसे करें, तो उसे अज्र (पुण्य) मिलेगा, और यदि छोड़ दें, तो उस पर कोई गुनाह नहीं है। और अल्लाह ही बेहतर जानने वाला है।
अध्याय
महज़ूरात -ए- इहराम (इहराम की अवस्था में वर्जित चीज़ें) तथा इहराम बाँधने वाले के लिए जिन चीज़ों का करना वैध है, उसकी व्याख्या के संबंध में
इहराम की निय्यत करने के बाद -चाहे वह पुरुष हो या महिला- उसके लिए यह उचित नहीं है कि वह अपने बाल या नाखून काटे अथवा इत्र लगाए।
विशेष रूप से, किसी पुरुष के लिए ऐसे कपड़े पहनना जायज़ नहीं है जो उसके पूरे शरीर के अनुरूप सिले गए हों, जैसे शर्ट, या जो उसके शरीर के कुछ हिस्सों के अनुरूप सिले गए हों, जैसे बनियान, पायजामा, मोज़े आदि, सिवाय इसके कि अगर उसे इज़ार (तहमद) न मिले, तो उसके लिए पायजामा पहनना जायज़ है। जिस व्यक्ति के पास जूते न हों, उसके लिए बिना काटे हुए (चमड़े के) मोज़े पहनना जायज़ (वैध) है, क्योंकि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की सहीहैन में वर्णित हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَنْ لَمْ يَجِدْ نَعْلَيْنِ، فَلْيَلْبَسْ خُفَّيْنِ، وَمَنْ لَمْ يَجِدْ إِزَارًا، فَلْيَلْبَسْ سَرَاوِيلَ».
"जो जूता न पाए, वह चमड़े का मोज़ा पहन ले और जो तहबंद न पाए, वह पायजामा पहन ले।"(44)
जहां तक इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की उस हदीस की बात है जिसमें वर्णित है कि जूतों के अभाव में चमड़े के मोज़े पहनने की आवश्यकता होने पर उन्हें काटने का आदेश दिया गया है, तो यह मंसूख़ (निरस्त) है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मदीना में इसके बारे में पूछे जाने पर ऐसा करने का आदेश दिया था। फिर जब अरफ़ा में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लोगों को संबोधित किया, तो जूतों के अभाव में चमड़े का मोज़ा पहनने की अनुमति दी और उन्हें काटने का आदेश नहीं दिया। यह उपदेश उन लोगों ने भी सुना था, जिन्होंने मदीना में इसका उत्तर नहीं सुना था, जबकि आवश्यकता के समय बयान एवं स्पष्टता को विलंबित करना अनुचित है। जैसा कि हदीस और फिक़्ह के उसूल (मूल सिद्धांतों) में ज्ञात है। अतः इससे काटने वाले आदेश के मंसूख़ (निरस्त) होने की पुष्टि होती है। यदि यह अनिवार्य होता, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इसे स्पष्ट कर देते। अल्लाह ही बेहतर जानने वाला है।
इहराम बाँधने वाले के लिए ऐसे चमड़े के मोज़े पहनना जायज़ है, जिनकी लम्बाई टखनों से नीचे तक हो, क्योंकि ये भी जूतों की श्रेणी में ही आते हैं।
इज़ार को धागे या इसी तरह की किसी अन्य चीज़ से बांधना भी जायज़ है, क्योंकि इस से रोकने का कोई प्रमाण नहीं है।
इहराम बाँधने वाले के लिए स्नान करना, सिर धोना तथा यदि आवश्यकता हो, तो उसे धीरे-धीरे खुजलाना जायज़ है, और यदि इस कारण से उसके सिर से कुछ बाल गिर जाएँ, तो उसपर कोई हर्ज नहीं है।
इहराम बाँधने वाली महिला के लिए यह हराम है कि वह चेहरे के लिए सिला हुआ कपड़ा, जैसे बुर्क़ा और नक़ाब, या हाथों के लिए, जैसे दस्ताने, पहने, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
«وَلَا تَنْتَقِبِ المَرْأَةُ المُحْرِمَةُ، وَلَا تَلْبَسِ القُفَّازَيْنِ».
"महिला नक़ाब नहीं पहनेगी और न ही क़ुफ़्फ़ाज़ान (दस्ताने) पहनेगी।"(45) इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
क़ुफ़्फ़ाज़ान (दस्ताने) : इससे अभिप्राय वह चीज़ें हैं जो ऊन या कपास या अन्य सामग्रियों से हाथों के नाप के अनुसार सिले या बुने जाते हैं।
महिलाओं को सिले हुए कपड़ों में से अन्य चीजें पहनने की अनुमति है, जैसे कमीज़, पायजामा, जूते, मोज़े आदि।
तथा इसी प्रकार, यदि आवश्यकता हो, तो वह बिना पट्टी के अपने चेहरे पर दुपट्टा डाल सकती है, और अगर दुपट्टा उसके चेहरे को छूता है, तो हर्ज की कोई बात नहीं है, क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस में वर्णित है : "राहगीर (सवार लोग) हमारे पास से गुजरते थे और हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ इहराम बाँधे हुए थे। जब वे हमारे पास आते, तो हम लोग अपने सिर की चादर से चेहरा ढक लेते तथा जब वे हमें पार कर जाते, तो हम उसे हटा देते थे।"(46) इस हदीस को अबू दावूद और इब्ने माजह ने रिवायत किया है, तथा दारक़ुत्नी ने उम्मे सलमा से भी इसी तरह वर्णित किया है।
इसी प्रकार, उसके लिए अपने हाथों को कपड़े या किसी अन्य चीज़ से ढकने में आपत्ति की कोई बात नहीं है, तथा उसके लिए अपने चेहरे एवं हाथों को ढकना वाजिब व अनिवार्य है यदि वह गैर-महरम (अजनबी) पुरुषों की उपस्थिति में हो, क्योंकि वे पर्दा के योग्य हैं, जैसा कि पवित्र व सर्वोच्च अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿...وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ...﴾
"...और अपने श्रृंगार का प्रदर्शन न करें, परंतु अपने पतियों के लिए...।" [सूरह नूर : 31]।
और इसमें कोई संदेह नहीं है कि चेहरा एवं हाथ सबसे अधिक शोभा के भाग होते हैं।
इसमें भी चेहरा सबसे महत्वपूर्ण एवं गंभीर है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿...وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا فَاسْأَلُوهُنَّ مِنْ وَرَاءِ حِجَابٍ ذَلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ...﴾
"...तथा जब तुम नबी की पत्नियों से कुछ माँगो, तो पर्दे के पीछे से माँगो। यह तुम्हारे दिलों तथा उनके दिलों के लिए अधिक पवित्रता का कारण है...।" [सूरह अहज़ाब : 53]।
कई महिलाओं की यह आदत होती है कि वे अपने दुपट्टे को चेहरे से ऊपर उठाने के लिए दुपट्टे के नीचे पट्टी रखती हैं, तो हमारे ज्ञान के अनुसार, इसका शरीअत में कोई आधार नहीं है, और अगर यह धार्मिक रूप से वैध होता, तो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी उम्मत के लिए इसको अवश्य स्पष्ट कर देते तथा इसके बारे में चुप नहीं रहते।
इहराम बाँधने वाले पुरुषों एवं महिलाओं के लिए, जिन कपड़ों में उन्होंने इहराम बाँधा है, उन कपड़ों को, गंदा हो जाने अथवा इसी प्रकार की किसी अन्य आवश्यकता के कारण, धोना जायज़ है, तथा इसको बदल कर इहराम का कोई दूसरा वस्त्र धारण करना भी जायज़ है।
उसके लिए ऐसा कोई कपड़ा पहनना जायज़ (वैध) नहीं है जो ज़ाफरान (केसर) या वरस (एक प्रकार का सुगंधित पौधा) से रंगा गया हो, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस में इससे मना किया है।
तथा मुहरिम (इहराम बाँधने वाले व्यक्ति) के लिए वाजिब (अनिवार्य) है कि वह अश्लील बातें, पाप एवं विवाद से बच कर रहे, क्योंकि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿الْحَجُّ أَشْهُرٌ مَّعْلُومَاتٌ فَمَنْ فَرَضَ فِيهِنَّ الْحَجَّ فَلَا رَفَثَ وَلَا فُسُوقَ وَلَا جِدَالَ فِي الْحَجِّ...﴾
"ह़ज्ज के चंद जाने-माने महीने हैं। फिर जो व्यक्ति इनमें ह़ज्ज अनिवार्य कर ले, तो ह़ज्ज के दौरान न कोई काम-वासना की बात हो और न कोई अवज्ञा और न कोई झगड़ा...।" [सूरह बक़रा : 197]।
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सहीह (सनद से) प्रमाणित है कि आप ने फ़रमाया है :
«مَنْ حَجَّ، فَلَمْ يَرْفُثْ، وَلَمْ يَفْسُقْ، رَجَعَ كَيَوْمِ وَلَدَتْهُ أُمُّهُ».
"जिसने हज्ज किया तथा हज्ज के दिनों में बुरी बात एवं बुरे कार्यों से बचा एवं अवज्ञा से दूर रहा, वह उस दिन की तरह लौटेगा, जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था।"(47)
'रफ़स' का शब्द : सहवास के अर्थ में प्रयोग किया जाता है, तथा शब्दों एवं कर्मों में अश्लीलता के अर्थ में भी बोला जाता है। तथा फ़ुसूक़ से अभिप्राय: पाप (अवज्ञा) के कार्य हैं। एवं जिदाल का अर्थ : असत्य के लिए झगड़ना है अथवा ऐसी चीज़ों के लिए जिनमें कोई लाभ नहीं हो, परंतु झगड़ना यदि सत्य को प्रमाणित करने तथा झूठ को खारिज करने के लिए उत्तम ढंग से हो, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है, बल्कि ऐसा करने का आदेश दिया गया है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है:
﴿ادْعُ إِلَى سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَجَادِلْهُمْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ...﴾
"(ऐ नबी!) आप उन्हें अपने पालनहार के मार्ग (इस्लाम) की ओर हिकमत तथा सदुपदेश के साथ बुलाएँ और उनसे ऐसे ढंग से वाद-विवाद करें, जो सबसे उत्तम है...।" [सूरह नह्ल: 125]।
और इहराम बाँधने वाले पुरुष के लिए अपने सिर को किसी ऐसे वस्त्र से ढकना हराम है जो उससे सटा हुआ हो, जैसे टोपी, ग़ुत्रा (शिमाग़), पगड़ी आदि, इसी प्रकार चेहरा भी, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अरफ़ात के दिन अपनी सवारी से गिरकर मरने वाले के बारे में कहा था :
«اغْسِلُوهُ بِمَاءٍ وَسِدْرٍ، وَكَفِّنُوهُ فِي ثَوْبَيْهِ، وَلَا تُخَمِّرُوا رَأْسَهُ، وَلَا وَجْهَهُ، فَإِنَّهُ يُبْعَثُ يَوْمَ القِيَامَةِ مُلَبِّيًا».
"इसे जल एवं बैरी के पत्ते से स्नान कराओ, तथा दो कपड़ों में कफ़न दो और इसके सिर एवं चेहरे को न ढांपो, क्योंकि यह क़ियामत के दिन तलबिया पढ़ता हुआ उठाया जाएगा।"(48) इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है, तथा उपरोक्त शब्द मुस्लिम द्वारा वर्णित हैं।
कार की छत या छाते या इसी प्रकार की चीज़ों, जैसे तंबू और पेड़ की छाया प्राप्त करने में कोई हर्ज नहीं है, क्योंकि सहीह हदीस में प्रमाणित है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब जमरा -ए- अक़बा पर कंकड़ी मार रहे थे तो आपके ऊपर कपड़ा डालकर छाया की गई थी। इसी प्रकार एक अन्य सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए नमिरा में एक खे़मा (तंबू) लगाया गया था और आप अरफ़ा के दिन का सूरज ढलने तक इसके अंदर रुके रहे।
तथा इहराम बाँधे हुए पुरुषों एवं महिलाओं के लिए थल के शिकार को मारना, इसमें सहायता करना, या उसे उसके स्थान से भगाना हराम है। इसी प्रकार, निकाह करना, सहवास करना, महिलाओं को विवाह का संदेश देना, तथा शहवत (कामवासना) के साथ महिलाओं को छूना हराम है, क्योंकि उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَا يَنْكِحُ المُحْرِمُ وَلَا يُنْكِحُ وَلَا يَخْطُبُ».
"इहराम बाँधने वाला व्यक्ति न तो निकाह करे, न निकाह कराए, और न ही निकाह का संदेश भेजे।"(49) इसे इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।
"और यदि इहराम बाँधने वाले ने भूलवश या अज्ञानता में सिले हुए कपड़े पहने, या अपने सिर को ढका, या इत्र लगाया, तो उस पर कोई जुर्माना नहीं है। और जब भी उसे याद आए या उसे ज्ञान हो, तो उसे तुरंत हटा दे। इसी प्रकार, जो व्यक्ति अपने सिर के बाल काटे, या अपने बालों में से कुछ निकाले, या अपने नाखून काटे भूल से या अज्ञानता में, तो सही बात यह है कि उस पर कोई जुर्माना नहीं है।"
मुसलमान के लिए, चाहे वह इहराम में हो या न हो, चाहे वह पुरुष हो अथवा महिला, हरम के शिकार को मारना तथा उसे मारने में किसी उपकरण या संकेत द्वारा सहायता करना हराम है।
शिकार को उसकी जगह से भगाना भी हराम है। हरम के पेड़ों और हरे पौधों को काटना भी हराम है। वहाँ पड़ी हुई चीजों को उठाना भी हराम है। हाँ, अगर कोई वहाँ पड़ी हुई किसी वस्तु को उसका एलान करके उसके मालिक तक पहुँचाने के लिए उठाए, तो बात अलग है। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है :
«فَإِنَّ هَذَا البَلَدَ - يَعْنِي مَكَّةَ - حَرَامٌ بِحُرْمَةِ اللَّهِ إِلَى يَوْمِ القِيَامَةِ، لَا يُعْضَدُ شَوْكُهُ، وَلَا يُنَفَّرُ صَيْدُهُ، وَلَا يُلْتَقَطُ لُقَطَتُهُ إِلَّا مَنْ عَرَفَهَا، وَلَا يُخْتَلَى خَلَاهَا».
"इस नगर, अर्थात मक्का, को अल्लाह ने क़ियामत के दिन तक के लिए हराम (सम्मानित) घोषित कर रखा है। न तो इसके पेड़ों को काटा जाएगा, न इसके शिकार को भगाया जाएगा और न ही इसकी गिरी हुई वस्तुओं को उठाया जाएगा। हाँ, अगर कोई वहाँ पड़ी हुई किसी वस्तु को उसका एलान करके उसके मालिक तक पहुँचाने के लिए उठाए, तो बात अलग है।"(50) बुख़ारी एवं मुस्लिम।
हदीस में वर्णित शब्द : "अल-मुंशिद" से अभिप्राय : वह व्यक्ति है जो पहचान करवाए, और "अल-ख़ला" से अभिप्राय : हरी घास है, तथा मिना और मुज़्दलिफ़ा हरम का हिस्सा हैं, जबकि अरफ़ा हरम के बाहर है।
अध्याय
मक्का में हाजी के प्रवेश करते समय, तथा मस्जिद -ए- हराम में प्रवेश करने के पश्चात किए जाने वाले कार्य, जैसे तवाफ़ एवं उसकी विधि के बारे में
जब इहराम बाँधने वाला व्यक्ति मक्का पहुँचे तो उसके लिए मक्का में प्रवेश करने से पहले स्नान करना मुस्तहब (पसंदीदा) है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा किया है। जब वह मस्जिद -ए- हराम पहुँचे तो उसके लिए अपने दाहिने पैर को आगे बढ़ाना एवं यह कहना सुन्नत है : "बिस्मिल्लाहि, वस्सलातु वस्सलामु अला रसूलिल्लाह, अऊज़ु बिल्लाहिल अज़ीम व बिवजहिहिल करीम व सुल्तानिहिल क़दीम मिनश-शैतानिर-रजीम, अल्लाहुम्म् इफ़्तह ली अबवाबा रहमतिक।" (अल्लाह के नाम से आरंभ करता हूँ, तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर प्रशंसा एवं शांति अवतरित हो, मैं महान अल्लाह की और उसके महिमामय चेहरे तथा उसके महा प्राचीन राज्य की शरण लेता हूँ धिक्कारित शैतान से। हे अल्लाह! मेरे लिए अपनी दया के द्वार खोल दे।)"
यह दुआ सभी मस्जिदों में प्रवेश करते समय पढ़ेगा। मेरे ज्ञान के अनुसार मस्जिद -ए- हराम में प्रवेश के लिए ऐसा कोई विशिष्ट जिक्र (प्रार्थना) नहीं है, जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित हो।
यदि हज्ज-ए-तमत्तुअ़ या उमरा कर रहा हो तो जब काबा के पास पहुंचे तो तवाफ़ शुरू करने से पहले तलबिया बंद कर दे। फिर हजर-ए-असवद (काले पत्थर) की ओर जाए और उसे सामने करके खड़ा हो जाए। फिर अपने दाहिने हाथ से उसका स्पर्श करे और यदि संभव हो तो उसे चूमे। परंतु लोगों को धक्का देकर कष्ट ना पहुँचाए। उसे स्पर्श करते समय 'बिस्मिल्लाहि वल्लाहु अकबर' (अल्लाह के नाम से (आरंभ करता हूँ) तथा अल्लाह सबसे महान है) या 'अल्लाहु अकबर' कहे। यदि चूमना कठिन हो, तो उसे हाथ या किसी छड़ी या अन्य चीज़ से स्पर्श करे और उस वस्तु को चूमे, जिससे उसे स्पर्श किया हो। अगर स्पर्श करना भी कठिन हो, तो उसकी ओर इशारा करे और 'अल्लाहु अकबर' कहे। इस अवस्था में जिस वस्तु से इशारा किया हो, उसे ना चूमे। तवाफ़ के सही होने के लिए तवाफ़ करने वाले का छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की नापाकियों से पाक होना शर्त है। क्योंकि तवाफ़ नमाज़ के समान है। अंतर इतना है कि इसमें बात करने की अनुमति दी गई है। तवाफ़ करते समय काबा को अपने बाईं तरफ रखना होता है। अगर वह अपने तवाफ़ की शुरुआत में यह कहे : "अल्लाहुम्मा ईमानन बिका, व तस्दीक़न बिकिताबिका, व वफ़ाअन बिअह्दिका, व इत्तिबाअन बिसुन्नति नबिय्यिका मुहम्मदिन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम।" (हे अल्लाह! तुझपर ईमान रखते हुए, तेरी किताब की पुष्टि करते हुए, तेरे साथ किए गए वादे को निभाते हुए और तेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत का पालन करते हुए हम तवाफ़ कर रहे हैं।)" तो बेहतर है। क्योंकि ऐसा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है। तवाफ़ के सात चक्कर लगाए। प्रथम तवाफ़ के पहले तीन चक्करों में रमल करे (अर्थात: तेज़ गति से चले)। यह वही तवाफ़ है जो मक्का पहुँचने के बाद सबसे पहले किया जाता है। पहुँचने वाला चाहे उमरा करने वाला हो, हज्ज-ए-तमत्तुअ़ करने वाला हो, केवल हज्ज करने वाला हो या उमरा और हज्ज को मिलाकर (हज्ज-ए-क़िरान) करने वाला हो। बचे हुए चार चक्करों में सामान्य चाल चले। हर चक्कर हजर-ए-असवद से आरंभ करे तथा उसी पर समाप्त करे।
और रमल कहते हैं : तेज़ गति से चलने को, जिसमें कदमों के बीच की दूरी कम हो, तथा उसके लिए मुस्तहब (वांछित) है कि इस समस्त तवाफ़ के दौरान इज़्तिबाअ् करे, इसके अतिरिक्त (दूसरे तवाफ़ों) में नहीं। इज़्तिबा से अभिप्राय यह है कि : चादर के मध्य भाग को दाहिने कंधे के नीचे रखा जाए तथा उसके दोनों सिरों को अपने बाएँ कंधे पर रखा जाए।
यदि चक्करों की संख्या में संदेह हो, तो यकीन को आधार बनाए, जिस का अर्थ है कि दो भ्रमित संख्याओं में से जो कम हो उस को आधार माने। उदाहरणस्वरूप यदि उसे संदेह हो कि उसने तीन चक्कर लगाए हैं या चार, तो तीन माने। सई में भी यही करे।
इस तवाफ़ को समाप्त करने के पश्चात, तवाफ़ की दो रक्अत नमाज़ पढ़ने से पहले वह अपनी चादर ओढ़ ले, उसे अपने दोनों कंधों पर रखे, और इसके दोनों किनारों को अपने सीने पर रखे।
महिलाओं को विशेष रूप से जिन चीज़ों से रोका जाना चाहिए एवं उन्हें सावधान करना चाहिए उन में से यह भी है कि तवाफ़ के दौरान वे बनाव-सिंगार एवं सुगंध का प्रयोग न करें, तथा पर्दा का ध्यान रखें क्योंकि वो ढकने की चीज़ हैं, अतः उन्हें पर्दे में रहना चाहिए, चाहे यह तवाफ़ के दौरान हो या अन्य परिस्थितियों में जहाँ पुरुष एवं महिला मिलते हैं, क्योंकि वे पर्दे की चीज़ एवं फ़ितना व फ़साद का कारण हैं, तथा महिला की शोभनीय वस्तुओं में उसका चेहरा उसका सबसे प्रमुख भाग है, अतः उन्हें इसे केवल अपने महरमों के सामने ही दिखाना चाहिए, क्योंकि अल्लाह ने फ़रमाया है :
﴿...وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ...﴾
"...और अपने श्रृंगार का प्रदर्शन न करें, परंतु अपने पतियों के लिए...।" [सूरह नूर : 31]।
अतः उनके लिए हजर-ए-असवद को चूमते समय अपना चेहरा खोलना जायज़ नहीं है यदि कोई पुरुष उन्हें देख रहा हो तो। अगर उनके लिए हजर-ए-असवद को छूने और चूमने की जगह नहीं हो, तो उन्हें पुरुषों के साथ धक्का-मुक्की नहीं करनी चाहिए। बल्कि पुरुषों के पीछे से तवाफ़ करना चाहिए। यह उनके लिए बेहतर और अधिक पुण्यकारी है। बजाय इसके कि वे पुरुषों के साथ धक्का-मुक्की करके काबा के करीब तवाफ़ करें। रमल (तेज़ गति से चलना) तथा इज़्तिबाअ (चादर के बीच वाले भाग को दाहिने कंधे के नीचे से निकाल कर दोनों किनारों को बाएँ कंधे पर डाल लेना) इस तवाफ़ को छोड़ कर किसी अन्य तवाफ़ में शरीअत सम्मत नहीं है। सफ़ा एवं मर्वा के बीच सई करते समय भी नहीं। महिलाओं को भी ऐसा करने की अनुमति नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने केवल अपने उस पहले तवाफ़ में ये दोनों काम किए थे, जो मक्का में प्रवेश करते समय किया था। तवाफ़ करते समय तवाफ़ करने वाले व्यक्ति को हर प्रकार की नापाकी से पाक होना चाहिए। उसके अंदर से अपने रब के लिए विनम्रता एवं विनयशीलता झलकनी चाहिए।
उसके लिए तवाफ़ के दौरान अधिकाधिक अल्लाह का ज़िक्र एवं दुआ करना मुस्तहब (पसंदीदा) है, यदि वह इस दौरान क़ुरआन की कुछ तिलावत भी करे तो यह अति उत्तम है। इस तवाफ़ में, या अन्य किसी तवाफ़ में, या सई में किसी विशेष ज़िक्र या विशेष दुआ को पढ़ना अनिवार्य नहीं है।
कुछ लोगों द्वारा तवाफ़ या सफ़ा-मर्वा के बीच सई के हर चक्कर के लिए विशेष ज़िक्र या विशेष दुआ निर्धारित कर लिया जाना निराधार है। बल्कि जो भी ज़िक्र और दुआ आसानी से हो सके, पर्याप्त है। जब रुक्न-ए-यमानी (यमनी कोना) के सामने हो, तो उसे अपने दाहिने हाथ से छूए और "बिस्मिल्लाहि, वल्लाहु अकबर" कहे। उसे चूमे नहीं। यदि छूना कठिन हो, तो इसे छोड़ दे और अपने तवाफ़ में आगे बढ़ जाए। न तो उसकी ओर इशारा करे और न ही उसके सामने "अल्लाहु अकबर" कहे। क्योंकि हमारी जानकारी के अनुसार ऐसा करना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित नहीं है। रुक्न-ए-यमानी एवं हजर-ए-असवद के बीच यह कहना मुस्तहब (पसंदीदा) है :
﴿...رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ 201﴾
"...ऐ हमारे पालनहार! हमें दुनिया में भलाई दे तथा आख़िरत में भी भलाई दे और हमें आग के अज़ाब से बचा।" [सूरह बक़रा : 201]।
और जब भी वह हजर-ए-असवद के सामने हो तो उसे छूए एवं चूमे और "अल्लाहु अकबर" कहे, यदि उसे छूना और चूमना संभव न हो, तो वह हर बार जब उसके सामने हो तो उसकी ओर इशारा करे और "अल्लाहु अकबर" कहे।
ज़मज़म तथा मक़ाम -ए- इब्राहीम के पीछे से तवाफ़ करने में कोई आपत्ति नहीं है, विशेष रूप से भीड़-भाड़ के समय में, पूरी मस्जिद तवाफ़ का स्थान है, तथा यदि कोई मस्जिद के छज्जों में भी तवाफ़ करे तो भी वह मान्य होगा, किंतु काबा के निकट तवाफ़ करना उत्तम है, यदि यह संभव हो सके तो।
जब तवाफ़ समाप्त हो जाए, तो यदि संभव हो तो मक़ाम-ए-इब्राहीम के पीछे दो रक्अत नमाज़ पढ़े। अगर भीड़-भाड़ या किसी और कारण से यह संभव न हो, तो वह मस्जिद में किसी भी स्थान पर यह नमाज़ पढ़े। सुन्नत यह है कि इन रक्अतों में सूरह फ़ातिहा के बाद पहली रक्अत में सूरह काफ़िरून और दूसरी रक्अत में सूरह इखलास पढ़े।
यही बेहतर है। परंतु यदि इन दो सूरतों के अतिरिक्त कुछ और भी पढ़ ले, तो कोई बात नहीं है। फिर हजर-ए-असवद की ओर बढ़े और यदि संभव हो तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हुए उसे अपने दाहिने हाथ से छूए।
फिर सफ़ा के द्वार से निकल कर सफ़ा पहाड़ी की ओर जाए, और उस पर चढ़ जाए अथवा उसके पास खड़ा हो जाए, और यदि संभव हो तो सफ़ा पर चढ़ना उत्तम है, तथा प्रथम चक्कर आरंभ करते समय अल्लाह तआला के इस कथन का पाठ करे :
﴿إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ...﴾
"इन्नस़्स़फ़ा वल्मर्वता मिन शआइरिल्लाहि... (निःसंदेह सफ़ा और मर्वा अल्लाह की निशानियों में से हैं...)।" [सूरह बक़रा : 158]।
सफ़ा पर क़िब्ला की ओर मुँह करके खड़े होकर अल्लाह की प्रशंसा एवं बड़ाई बयान करना और यह दुआ पढ़ना मुस्तहब है : "ला इलाहा इल्लल्लाहु, वल्लाहु अकबरु, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल्मुल्कु, व लहुल्मह़म्दु, युह़्यी व युमीतु वहुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु, अन्जज़ा वअ्दहु, व नस़रा अब्दहु, व हज़मल अह़ज़ाबा वह़्दहु (अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है तथा उसी की समस्त प्रशंसा है, वही जीवन देता है तथा वही मृत्यु देता है, वह हर चीज़ पर सक्षम है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसने अपने वादे को पूरा किया, अपने बंदे की सहायता की, तथा अकेले सेनाओं को परास्त कर दिया)।"
फिर दोनों हाथों को उठाकर, सहजता के साथ जो दुआ हो सके, करे। इस दुआ तथा अन्य दुआओं को (तीन-तीन बार) दोहराए। फिर नीचे उतर कर मर्वा की ओर चले और जब प्रथम (हरे) निशान पर पहुँचे तो वहाँ से दूसरे (हरे) निशान तक पुरुष तेज़ गति से चले। किंतु महिलाओं के लिए इन दोनों निशानों के मध्य दौड़ना शरीअत सम्मत नहीं है, क्योंकि उन्हें पर्दे का ध्यान रखना है। सफ़ा एवं मर्वा के बीच की पूरी दौड़ के अंदर उनके लिए चलना ही शरीअत सम्मत है। फिर चल कर मर्वा पहाड़ी पर चढ़ जाए अथवा उसके पास खड़ा हो जाए। यदि चढ़ना सरल हो, तो पहाड़ी पर चढ़ना उत्तम है। मर्वा पहाड़ी पर चढ़ कर वही कार्य करे एवं वही कुछ कहे, जो सफ़ा पहाड़ी पर कर चुका एवं कह चुका है। बस इस आयत को छोड़कर :
﴿إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ...﴾
"इन्नस़्स़फ़ा वल्मर्वता मिन शआइरिल्लाहि... (निःसंदेह सफ़ा और मर्वा अल्लाह की निशानियों में से हैं...)।" [सूरह बक़रा : 158]।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हुए, यह केवल पहले चक्कर में सफ़ा पर चढ़ते समय पढ़ा जाना मशरूअ (शरीअत सम्मत) है, फिर नीचे उतरे एवं उस स्थान पर चले जहाँ सामान्य रूप से चला जाता है, तथा उस स्थान पर तेज़ी से चले जिस स्थान पर तेज़ चला जाता है, यहाँ तक कि सफ़ा तक पहुँच जाए, और ऐसा सात बार करे, जाना एक चक्कर है, और वापस आना एक चक्कर है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसा ही किया था, और आप का फ़रमान है :
«خُذُوا عَنِّي مَنَاسِكَكُمْ».
"मुझसे अपने मनासिक (हज्ज के कार्य) सीख लो।"(51)
सई के दौरान जहाँ तक संभव हो अधिकाधिक ज़िक्र एवं दुआ करना चाहिए, उसे छोटी एवं बड़ी हर प्रकार की अपवित्रता से पवित्र होना चाहिए, यदि बिना वुज़ू के सई करे तो यह मान्य होगा, इसी प्रकार यदि तवाफ़ के बाद महिला को मासिक धर्म आ जाए या वह निफास (प्रसव) की स्थिति में हो, तो वह सई कर सकती है और यह मान्य होगा, क्योंकि सई में तहारत (पवित्रता) शर्त नहीं है, बल्कि यह मुस्तहब (वांछनीय) है, जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है।
जब सफ़ा-मर्वा के बीच दौड़ने का कार्य पूरा कर ले तो सर के बाल मुंडवाए अथवा छोटा करवा ले। पुरुषों के लिए बाल मुंडवाना उत्तम है। परंतु यदि इस समय बाल छोटे करवा ले, ताकि हज्ज में मुंडवाए, तो यह भी अच्छा है। यदि मक्का आना हज्ज के समय के निकट हुआ हो, तो बाल छोटे करवाना उत्तम है, ताकि हज्ज में शेष बाल मुंडवा ले। इसलिए कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एवं आप के सहाबा जब 4 ज़िल-हिज्जा को मक्का आए तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन लोगों को, जो अपने साथ क़ुर्बानी का जानवर नहीं लाए थे, आदेश दिया कि वह हलाल हो जाएं तथा बाल छोटे करवा लें। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें बाल मुंडवाने का आदेश नहीं दिया था। बाल छोटा कराते समय पूरे सिर के बाल छोटे कराना आवश्यक है। केवल कुछ हिस्से का छोटा करना मान्य नहीं है। इसी प्रकार सिर के कुछ भागों को मुंडवाना एवं कुछ भागों को छोड़ देना भी मान्य नहीं है। महिला के लिए केवल बाल छोटे कराना ही शरीअत सम्मत है। उसे अपनी चोटी से उंगली के पोर के बराबर या उससे कम बाल काटना है। पोर उंगली के सिरा को कहते हैं। महिला इस से अधिक बाल न काटे।
मुहरिम (वह व्यक्ति जो इहराम की स्थिति में है) उपर्युक्त सभी कार्य कर ले, तो उसका उमरा पूरा हो गया और अब उसके लिए वह समस्त चीज़ें हलाल हो गईं जो इहराम में होने के कारण उसके लिए हराम थीं। परंतु जो व्यक्ति क़ुर्बानी का जानवर अपने साथ लाया हो, वह अपने इहराम में ही बाकी रहेगा तथा हज्ज एवं उमरा दोनों पूरा करने के बाद हलाल होगा।
किंतु जिस व्यक्ति ने केवल हज्ज का अथवा हज्ज एवं उमरा दोनों का इहराम बांधा हो उसके लिए सुन्नत यह है कि अपने इहराम को उमरा में बदल दे तथा जिस प्रकार हज्ज -ए- तमत्तुअ करने वाला करता है वह भी वैसा ही करे, परंतु हाँ, यदि जानवर साथ लाया हो तब नहीं, इसलिए कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा को इसी का आदेश देते हुए फ़रमाया था :
«لَوْلَا أَنِّي سُقْتُ الهَدْيَ لَأَحْلَلْتُ مَعَكُمْ».
"यदि मैं क़ुर्बानी का जानवर साथ नहीं लाया होता, तो मैं भी तुम सब के साथ हलाल हो जाता।"(52)
यदि कोई स्त्री इहराम बाँधने के बाद माहवारी या प्रसव के कारण अपवित्र हो जाए, तो वह तवाफ़ (काबा की परिक्रमा) और सई (सफा और मर्वा के बीच चलना) नहीं करेगी, जब तक कि वह पवित्र न हो जाए। पवित्र होने के बाद तवाफ़ और सई करेगी, अपने सिर के बाल छोटे कराएगी और इस प्रकार उसका उमरा पूरा हो जाएगा। यदि वह यौम-ए-तर्विया (हज्ज के लिए मिना जाने के दिन) से पहले पवित्र न हो, तो अपने ठहरने के स्थान से ही इहराम बाँधकर हज्ज का इरादा कर लेगी और लोगों के साथ मिना की ओर निकल जाएगी। इस स्थिति में वह हज्ज और उमरा दोनों को मिलाकर (हज्ज-ए-क़िरान) कर लेगी और हाजी के सभी कार्य, जैसे कि अरफ़ा में रुकना, मुज़्दलिफ़ा और मिना में समय बिताना, जमरा (शैतान के प्रतीकों) को कंकड़ मारना, जानवर की क़ुर्बानी करना तथा बाल छोटे करना, आदि करेगी। फिर जब वह पवित्र हो जाएगी, तो वह काबा का तवाफ़ करेगी और सफा-मर्वा के बीच सई करेगी। एक ही तवाफ़ और एक ही सई हज्ज और उमरा दोनों के लिए पर्याप्त होगी। जैसा कि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से प्रमाणित हदीस में है कि उन्हें उमरा के इहराम के बाद माहवारी आ गई थी, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे फ़रमाया था :
«افْعَلِي مَا يَفْعَلُ الحَاجُّ غَيْرَ أَنْ لَا تَطُوفِي بِالبَيْتِ حَتَّى تَطْهُرِي».
"जो कार्य हज्ज करने वाला करता है, वह सब करो, सिवाय इसके कि तुम पवित्र हो जाने तक तवाफ़ न करो।"(53) बुख़ारी एवं मुस्लिम।
और जब मासिक धर्म या प्रसव के कारण अपवित्र महिला यौमुन् नह्र (हज्ज के दिन) को जमरा (कंकड़ मारने का स्थान) पर कंकड़ मार ले और अपने बाल काट ले, तो उसके लिए हर वह चीज़ हलाल हो जाती है, जो इहराम की स्थिति में उसके लिए हराम थी, जैसे सुगंध एवं इसके समान अन्य चीजें, सिवाय अपने पति के, जब तक कि वह अपना हज्ज पूरा न कर ले, तथा जब वह पवित्र होने के बाद तवाफ़ और सई कर लेती है, तो उसके लिए पति के पास जाना भी हलाल हो जाता है।
अध्याय
आठवीं ज़िल-हिज्जा को हज्ज का इहराम बांधने तथा मिना के लिए निकलने के नियम के संबंध में
जब यौम-ए-तर्विया (आठवीं ज़िलहिज्जा) आए तो उमरा से हलाल हो कर मक्का में ठहरे हुए एवं मक्का वासियों में से जो लोग हज्ज करने की इच्छा रखते हों, उनके लिए मुस्तहब यह है कि अपने घरों से ही हज्ज का इहराम बाँधें, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम जो अब्त़ह (मक्का के पास एक स्थान) में ठहरे हुए थे, उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश पर यौम-ए-तर्विया को उसी स्थान से हज्ज का इहराम बांधा था। तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें यह आदेश नहीं दिया था कि वे बैतुल्लाह (काबा) जाएँ और वहाँ से इहराम बाँधें, अथवा मीज़ाब (काबा का परनाला, मोरी) के पास से इहराम बाँधें। इसी प्रकार, जब सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम मिना की ओर निकल रहे थे, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें तवाफ़-ए-वदा (विदाई तवाफ़) करने का आदेश नहीं दिया। यदि यह कार्य शरीअत सम्मत होता, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अवश्य उन्हें इसकी शिक्षा देते। सच्चाई यह है कि सारी भलाई नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के अनुसरण में है।
यह मुस्तहब (पसंदीदा) है कि हज्ज का इहराम बाँधने से पहले व्यक्ति स्नान करे, स्वच्छता अपनाए एवं सुगंध का उपयोग करे, जैसे कि वह मीक़ात से इहराम बाँधते समय करता है। हज्ज का इहराम बाँधने के बाद, लोगों के लिए सुन्नत यह है कि यौम-ए-तर्विया (आठवीं ज़िलहिज्जा) को सूरज ढलने से पहले या बाद में मिना की ओर प्रस्थान करें और अधिक से अधिक तलबिया पढ़ें, जब तक कि वे जम्रतुल अक़बा (शैतान को कंकड़ मारने) का कार्य पूरा न कर लें। मिना में उन्हें ज़ुह्र, अस्र, मग़्रिब, इशा और फ़ज्र की नमाज़ें पढ़नी चाहिए। सुन्नत यह है कि हर नमाज़ को जमा किए बिना उसके अपने निर्धारित समय पर अदा करें और उसे क़स्र कर के पढ़ें, सिवाय मग़्रिब और फ़ज्र की नमाज़ों के, जिन्हें क़स्र नहीं किया जाएगा।
इस संबंध में मक्का के निवासियों और अन्य लोगों के बीच कोई अंतर नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मिना, अरफ़ा और मुज़्दलिफ़ा में मक्का के निवासियों और अन्य लोगों को नमाज़ पढ़ाई और इसे क़स्र (संक्षिप्त) किया, आप ने मक्का के निवासियों को नमाज़ पूरी (इत्माम) करने का आदेश नहीं दिया, यदि यह उनके लिए अनिवार्य होता, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन्हें अवश्य इसकी सूचना देते।
फिर अरफ़ा के दिन (नौवीं ज़िलहिज्जा को) सूरज निकलने के बाद, हज्ज करने वाले मिना से अरफ़ा की ओर प्रस्थान करेंगे, तथा सुन्नत यह है कि वे ज़वाल (सूरज ढलने) तक निम्रा नामक स्थान पर ठहरे रहें, यदि यह संभव हो तो, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा ही किया था।
जब सूरज ढल जाए, तो सुन्नत यह है कि इमाम या उसका प्रतिनिधि लोगों को एक ऐसा ख़ुत्बा (भाषण) दे, जो परिस्थिति के अनुकूल हो। इसमें हज्ज के दिन और इसके बाद के शरीअत सम्मत कार्यों का वर्णन किया जाए, उन्हें अल्लाह से डरने, उसकी तौहीद (एकेश्वरवाद) पर अडिग रहने और हर कार्य में उसके लिए इख़लास (निष्ठा) बरतने का आदेश दिया जाए, उन्हें अल्लाह की मना की हुई चीज़ों से बचने को कहा जाए, अल्लाह की किताब और उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत को थामे रहने, एवं हर मामले में उनको ही निर्णायक मानने की प्रेरणा दी जाए, ताकि इन समस्त बातों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण हो। इसके बाद, ज़ुह्र और अस्र की नमाज़ को क़स्र और जमा करके पहले (नमाज़ के) समय में एक अज़ान और दो इक़ामतों के साथ पढ़े, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा ही किया था। इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
फिर लोग अरफ़ा में ठहरेंगे। याद रहे कि अरफ़ा का पूरा क्षेत्र ठहरने के लिए उपयुक्त है, सिवाय "बतन-ए-उरना" नामक स्थान के। यदि संभव हो तो मुस्तहब यह है कि लोग क़िबला तथा जबल-ए-रहमत की ओर मुँह करके खड़े हों। लेकिन यदि दोनों की ओर मुँह करना संभव न हो, तो केवल क़िबला की ओर मुँह करना काफ़ी है। भले ही जबल-ए-रहमत की ओर मुँह न किया जाए। इस वुक़ूफ़ (अरफ़ा में ठहरने) पर, हाजियों के लिए मुस्तहब यह है कि अल्लाह का अधिकाधिक ज़िक्र करें, उससे दुआ करें, गिड़गिड़ाएँ और विनम्रता दिखाएँ, दुआ करते समय अपने हाथ उठाएँ। यदि तलबिया पढ़ें या कुरआन का कुछ हिस्सा पढ़ें, तो यह भी अच्छा है। सुन्नत यह है कि इस दौरान यह वाक्य बार-बार कहें : "लाइलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लहू, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु, युह्'यी व युमीतु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझेदार नहीं, राज्य उसी का है, प्रशंसा उसी की है, वही जीवन देता है, वही मारता है, और वह हर चीज़ पर सक्षम है।)" क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है कि आपने फ़रमाया है :
«خَيْرُ الدُّعَاءِ دُعَاءُ يَوْمِ عَرَفَةَ، وَأَفْضَلُ مَا قُلْتُ أَنَا وَالنَّبِيُّونَ مِنْ قَبْلِي: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ، يُحْيِي وَيُمِيتُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ».
"सबसे अच्छी दुआ, अरफ़ा के दिन की दुआ है, और सबसे श्रेष्ठ बात, जिसे मैंने और मुझसे पहले के नबियों ने कहा है, यह है : लाइलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लहू, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु, युह्'यी व युमीतु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझेदार नहीं है, राज्य उसी का है, प्रशंसा उसी की है, वही जीवन देता है, वही मारता है और वह हर चीज़ पर सक्षम है)।"(54)
एक अन्य सहीह हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«أَحَبُّ الكَلَامِ إِلَى اللَّهِ أَرْبَعٌ: سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ».
"अल्लाह के निकट सबसे प्रिय शब्द चार हैं : 'सुब्हानल्लाह (अल्लाह पवित्र है), अल्हम्दु लिल्लाह (तमाम प्रशंसा अल्लाह के लिए है), ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है), एवं अल्लाहु अकबर (अल्लाह सब से बड़ा है)।"(55)
इस ज़िक्र को अधिक से अधिक निर्बाध रूप से विनम्रता और दिल की हाज़िरी के साथ बार-बार पढ़ना चाहिए। इसी तरह, शरई तौर पर वर्णित ज़िक्र और दुआओं को हर समय, विशेष रूप से इस स्थान (अरफ़ा) और इस महान दिन (यौम-ए-अरफ़ा) में अधिक से अधिक पढ़ना चाहिए। आदमी को चाहिए कि वह ज़िक्र और दुआ में से व्यापक एवं अर्थपूर्ण वाक्यों को चुने। जैसे :
* "सुब्हानल्लाहि व बिहम्दिही, सुब्हानल्लाहिल अज़ीम।" (मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ। मैं महान अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।)
* ﴿...لَا إِلَهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ 87﴾
* "ला इलाहा इल्ला अन्ता, सुब्हानका इन्नी कुन्तु मिन-अज़्जालिमीन (...तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, तू पवित्र है, निश्चय मैं ही अत्याचारियों में हो गया)।" [सूरह अल-अंबिया : 87]।
* "ला इलाहा इल्लल्लाहु वला नअ्’बुदु इल्ला इय्याहु, लहुन-निअ’मतु व लहुल-फ़ज़्लु व लहुस्सनाउल-ह़सन, ला इलाहा इल्लल्लाहु मुख़लिसीना लहुद्दीना व लौ करिहल-काफिरून (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। हम सब उसके सिवा किसी और की उपासना नहीं करते हैं। उसी की नेमत है, उसी का अनुग्रह है और उसी की अच्छी प्रशंसा है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। हम विशुद्ध रूप से उसी की इबादत करते हैं, चाहे काफ़िरों (अविश्वासियों) को बुरा ही क्यों न लगे)।"
* "ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि (अल्लाह की तौफ़ीक़ के बिना पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य की क्षमता)।"(56)
* ﴿...رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ 201﴾
* "...रब्बना आतिना फ़िद्दुनिया ह़सनतन्, व फ़िल आख़िरति ह़सनतन्, व क़िना अज़ाबन्नार (ऐ हमारे पालनहार! हमें दुनिया में भलाई दे तथा आख़िरत में भी भलाई दे और हमें आग के अज़ाब से बचा)।" [सूरह बक़रा: 201]।
* اللَّهُمَّ أَصْلِحْ لِي دِينِيَ الَّذِي هُوَ عِصْمَةُ أَمْرِي، وَأَصْلِحْ لِي دُنْيَايَ الَّتِي فِيهَا مَعَاشِي، وَأَصْلِحْ لِي آخِرَتِيَ الَّتِي فِيهَا مَعَادِي، وَاجْعَلِ الحَيَاةَ زِيَادَةً لِي فِي كُلِّ خَيْرٍ، وَالمَوْتَ رَاحَةً لِي مِنْ كُلِّ شَرٍّ.
* "अल्लाहुम्मा अस़्लिह ली दीनी अल्लज़ी हुवा अ़िस्मतु अम्री, व अस़्लिह ली दुनियाया अल्लती फीहा मआशी, व अस़्लिह ली आख़िरती अल्लती फीहा मआदी, व इजअ्लिल ह़याता ज़ियादतन् ली फी कुल्लि ख़ैरिन, वल-मौता राह़तन् ली मिन कुल्लि शर्रिन (ऐ अल्लाह मेरे लिए मेरे धर्म को सुधार दे जिसमें मेरी सुरक्षा है, और मेरे लिए मेरे संसार को सुधार दे जिसके अन्दर मेरा रहना-सहना है, और मेरे लिए मेरी आख़िरत को सुधार दे जिसकी ओर मुझे लौटकर जाना है, मेरे लिए जीवन को प्रत्येक भलाई में वृद्धि का कारण बना दे, तथा मृत्यु को मेरे लिए प्रत्येक बुराई से मुक्ति का साधन बना दे)।"(57)
* أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنْ جَهْدِ البَلَاءِ، وَدَرَكِ الشَّقَاءِ، وَسُوءِ القَضَاءِ، وَشَمَاتَةِ الأَعْدَاءِ.
* "अऊज़ु बिल्लाहि मिन जह्दिल बलाइ, व दरकिश्शक़ाइ, व सूइल क़ज़ाइ, व शमाततिल आअ़्दाइ (मैं अल्लाह की शरण लेता हूँ, कठिन परीक्षा, दुखद भाग्य, बुरे फैसले और शत्रुओं के हँसने से)।"(58)
* اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الهَمِّ وَالحَزَنِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ العَجْزِ وَالكَسَلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الجُبْنِ وَالبُخْلِ، وَمِنَ المَأْثَمِ وَالمَغْرَمِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ غَلَبَةِ الدَّيْنِ وَقَهْرِ الرِّجَالِ.
* "अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल् हम्मि वल् ह़ज़नि, व अऊज़ु बिका मिनल अज्'ज़ि वल कसलि, व अऊज़ु बिका मिनल् जुब्नि वल बुख़्लि, व मिनल मअ्स़मि वल मग़्'रमि, व अऊज़ु बिका मिन ग़लबतिद्दैनि व क़ह्'रिर्रिजालि (हे अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ, दुखः एवं चिंता से, मैं तेरी शरण माँगता हूँ असमर्थता एवं आलस्य से, तथा मैं तेरी शरण माँगता हूँ कायरता एवं कंजूसी से, पाप और कर्ज़ से और मैं तेरी शरण माँगता हूँ क़र्ज़ के प्रभाव एवं लोगों के दबाव से)।"(59)
* اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ البَرَصِ وَالجُنُونِ وَالجُذَامِ وَمِنْ سَيِّئِ الأَسْقَامِ.
* "अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल ब,र,-स़ि वल जुनूनि वल जुज़ामि व मिन सय्यिइल असक़ाम (ऐ अल्लाह! मैं सफ़ेद दाग़, पागलपन, कुष्ठ और सभी बुरी बीमारियों से तेरी शरण माँगता हूँ)।"(60)
* "अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका अल-अफ़्वा वल-आफ़ियता फ़िद्दुनिया वल-आखिरह (हे अल्लाह, मैं तुझसे दुनिया और आख़िरत में माफ़ी और स्वास्थ्य (अच्छी स्थिति) की दुआ करता हूँ)"।
* "अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका अल-अफ़्वा वल-आफ़ियता फ़ी दीनी व दुनियाया व अहली व माली (हे अल्लाह, मैं तुझसे, अपने धर्म, संसार, परिवार एवं संपत्ति में माफ़ी और आफ़ियत (अच्छी स्थिति) की दुआ करता हूँ)।"
* اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوْرَتِي وَآمِنْ رَوْعَاتِي، اللَّهُمَّ احْفَظْنِي مِنْ بَيْنِ يَدَيَّ وَمِنْ خَلْفِي، وَعَنْ يَمِينِي وَعَنْ شِمَالِي، وَمِنْ فَوْقِي، وَأَعُوذُ بِعَظَمَتِكَ أَنْ أُغْتَالَ مِنْ تَحْتِي.
* "अल्लाहुम्मस्तुर औरती, व आमिन रौआती, अल्लाहुम्मा इह़्फ़ज़्नी मिम् बैनि यदय्या व मिन ख़ल्फ़ी, व अन् यमीनी, व अन् शिमाली, व मिन फ़ौक़ी, व अऊज़ु बिअज़मतिका अन् उग़्ताला मिन् तह़्ती (ऐ अल्लाह, मेरे दोष को छुपा ले, और मुझे भय से सुरक्षित रख। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे सामने, पीछे, दाहिने, बाएँ, तथा ऊपर से सुरक्षित रख। और मैं तेरी महानता की शरण माँगता हूँ कि मैं नीचे से उचक लिया जाऊँ)।"(61)
* اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي جِدِّي وَهَزْلِي، وَخَطَئِي وَعَمْدِي، وَكُلَّ ذَلِكَ عِنْدِي، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ وَمَا أَخَّرْتُ، وَمَا أَسْرَرْتُ وَمَا أَعْلَنْتُ، وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي، أَنْتَ المُقَدِّمُ وَأَنْتَ المُؤَخِّرُ، وَأَنْتَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ.
* "अल्लाहुम्मा इग़्फिर ली जिद्दी व हज़्ली, व ख़त़ई व अम्दी, व कुल्ला ज़ालिका इन्दी, अल्लाहुम्मा इग़्फिर ली मा क़द्दम्तु व मा अख़्ख़र्तु व मा अस्'रर्रतु व मा अअ़्लन्तु, व मा अन्ता अअ़्लमु बिहि मिन्नी, अन्ता अल-मुक़द्दिमु व अन्ता अल-मुअख़्ख़िरु, व अन्ता अ'ला क़ुल्लि शै'इन क़दीर (ऐ अल्लाह! मेरी गंभीरता से, मज़ाक़ से, गलती से और जान-बूझकर की गई गलती, सभी को माफ़ कर दे, तथा ये सब ही मेरे पास हैं। ऐ अल्लाह! जो कुछ मैंने पहले किया और जो बाद में किया, जो मैंने छुपा कर किया और जो मैंने सार्वजनिक रूप से किया, और जो कुछ तू मुझसे अधिक जानता है, उसे माफ़ कर दे। तू ही आगे करने वाला है और तू ही पीछे करने वाला है और तू हर वस्तु पर सक्षम है)।"(62)
* اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الثَّبَاتَ فِي الأَمْرِ وَالعَزِيمَةَ عَلَى الرُّشْدِ، وَأَسْأَلُكَ شُكْرَ نِعْمَتِكَ وَحُسْنَ عِبَادَتِكَ، وَأَسْأَلُكَ قَلْبًا سَلِيمًا وَلِسَانًا صَادِقًا، وَأَسْأَلُكَ مِنْ خَيْرِ مَا تَعْلَمُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا تَعْلَمُ، وَأَسْتَغْفِرُكَ لِمَا تَعْلَمُ، إِنَّكَ عَلَّامُ الغُيُوبِ.
* "अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका अस़-स़बाता फ़िल् अम्रि वल-अज़ीमति अलर-रुश्दि, व असअलुका शुक्रा निअ्मतिका व हुस्ना इबादतिका, व असअलुका क़ल्बन सलीमन व लिसानन सादिक़न, व असअलुका मिन ख़ैरी मा तअ्लमु, व अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा तअलमु, व अस्तग़फिरुका लिमा तअलमु, इन्नका अल्लामुल-ग़ुयूब (ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस बात की दुआ करता हूँ कि तू मुझे कामों में स्थिरता दे और सही मार्ग पर चलने की इच्छा शक्ति दे, और तेरी नेमतों का आभार प्रकट करने तथा अच्छे ढंग से तेरी इबादत (उपासना) करने की शक्ति दे। मैं तुझसे साफ दिल और सच्ची ज़बान की दुआ करता हूँ, और मैं तुझसे उस अच्छाई की दुआ करता हूँ जो तू जानता है, और मैं उस बुराई से तेरी शरण मांगता हूँ जो तू जानता है, और मैं तुझसे उस बात के लिए माफी मांगता हूँ जो तू जानता है। निश्चय ही, तू ही ग़ैब (परोक्ष) का जानने वाला है)।"(63)
* اللَّهُمَّ رَبَّ النَّبِيِّ مُحَمَّدٍ عَلَيْهِ الصَّلَاةُ وَالسَّلَامُ، اغْفِرْ لِي ذَنْبِي، وَأَذْهِبْ غَيْظَ قَلْبِي وَأَجِرْنِي مِنْ مُضِلَّاتِ الفِتَنِ مَا أَحْيَيْتَنَا.
* "अल्लाहुम्मा रब्बन् नबिय्यि मुह़म्मदिन अलैहिस़्स़लातु वस्सलामु, इग़्फ़िर ली ज़ंबी, व अज़्हिब ग़ैज़ा क़ल्बी, व अजिर्नी मिन् मुज़िल्लातिल-फ़ितन् मा अह़यैतना (हे अल्लाह! नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रब, मेरे पापों को माफ़ कर दे, मेरे दिल के ग़ुस्से को दूर कर दे, और मुझे गुमराह करने वाले फित्नों से बचा ले, जब तक तू मुझे ज़िन्दा रख)।"(64)
* اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَاوَاتِ وَرَبَّ الأَرْضِ وَرَبَّ العَرْشِ العَظِيمِ، رَبَّنَا وَرَبَّ كُلِّ شَيْءٍ، فَالِقَ الحَبِّ وَالنَّوَى، وَمُنْزِلَ التَّوْرَاةِ وَالإِنْجِيلِ وَالفُرْقَانِ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ كُلِّ شَيْءٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهِ، اللَّهُمَّ أَنْتَ الأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الآخِرُ فَلَيْسَ بَعْدَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الظَّاهِرُ فَلَيْسَ فَوْقَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ البَاطِنُ فَلَيْسَ دُونَكَ شَيْءٌ، اقْضِ عَنَّا الدَّيْنَ وَأَغْنِنَا مِنَ الفَقْرِ.
* "अल्लाहुम्मा रब्बस-समावाति व रब्बल-अर्ज़ि व रब्बल-अर्शिल-अज़ीमि, रब्बना व रब्बा क़ुल्लि शै'इन, फालिक़ल-ह़ब्बि वन-नवा, व मुन्ज़िलत-तौराति वल-इंजीलि वल-फ़ुर्क़ानि, अउज़ु बिका मिन-शर्रि कुल्लि शैइन अन्ता आख़िज़ुम् बिनास़ियतिहि, अल्लाहुम्मा अंतल-अव्वलु फ़लैसा क़ब्लका शै'उन, व अन्ता अल-आख़िरु फ़लैसा बअ्दका शै'उन, व अन्ता अज़-ज़ाहिरु फ़लैसा फौक़का शै'उन, व अन्ता अल-बात़िनु फ़लैसा दूनका शै'उन, इक़्ज़ि अन्ना अद-दैना व अग़्निना मिनल-फक़्रि (ऐ अल्लाह! आकाशों के रब, धरती के रब, महान सिंहासन के रब, हमारे रब और हर चीज़ के रब, दाने एवं गुठली को फाड़ने वाले और तौरात, इंजील तथा फ़ुर्क़ान (क़ुरआन) उतारने वाले! मैं हर उस चीज़ की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, जिसकी पेशानी को तू पकड़े हुए है। ऐ अल्लाह! तू अव्वल (प्रथम एवं आदि) है, तुझसे पहले कोई चीज़ नहीं, तू आख़िर (अंत एवं अनादि) है, तेरे बाद कोई चीज़ नहीं, तू ज़ाहिर (प्रत्यक्ष व उच्च) है, तेरे ऊपर कोई चीज़ नहीं और तू बातिन (अप्रत्यक्ष व गुप्त) है, तेरे परे कोई चीज़ नहीं। हमारे क़र्ज़ अदा कर दे और हमें निर्धनता से मुक्ति प्रदान कर)।"(65)
* اللَّهُمَّ أَعْطِ نَفْسِي تَقْوَاهَا، وَزَكِّهَا أَنْتَ خَيْرُ مَنْ زَكَّاهَا، أَنْتَ وَلِيُّهَا وَمَوْلَاهَا، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ العَجْزِ وَالكَسَلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الجُبْنِ وَالهَرَمِ وَالبُخْلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ.
* "अल्लाहुम्मा अअ्त़ि नफ़्सी तक्वाहा, व ज़क्किहा अन्ता ख़ैरु मन ज़क्काहा, अन्ता वलिय्युहा व मौलाहा, अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन अल-अज्ज़ि वल-कसलि, व अऊज़ु बिका मिन अल-जुब्नि वल-हरमि वल-बुख़्लि, व अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिल-क़ब्रि (ऐ अल्लाह! मेरी आत्मा को परहेज़गारी दे, और इसे शुद्ध कर, तू ही इसे सबसे बेहतर शुद्ध करने वाला है, तू ही इसका दोस्त और मददगार है। ऐ अल्लाह! मैं विवशता एवं आलस्य से तेरी शरण मांगता हूँ, और कायरता, अति वृद्धावस्था एवं कंजूसी से तेरी शरण मांगता हूँ, तथा मैं तुझसे क़ब्र के अज़ाब से शरण मांगता हूँ)।"(66)
* اللَّهُمَّ لَكَ أَسْلَمْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ، وَإِلَيْكَ أَنَبْتُ، وَبِكَ خَاصَمْتُ، أَعُوذُ بِعِزَّتِكَ أَنْ تُضِلَّنِي، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَنْتَ الحَيُّ الَّذِي لَا يَمُوتُ، وَالجِنُّ وَالإِنْسُ يَمُوتُونَ.
* "अल्लाहुम्मा लका अस्लम्तु, व बिका आमन्तु, व अलैका तवक्कलतु, व इलैका अनब्तु, व बिका ख़ास़म्तु, अऊज़ु बिइज़्ज़तिका अन् तुज़िल्लनी, ला इलाहा इल्ला अन्ता, अन्ता अल-ह़ैयुल्लज़ी ला यमूतु, वल-जिन्नु वल-इन्सु यमूतून (ऐ अल्लाह! मैंने तेरे समक्ष समर्पण कर दिया, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर ही भरोसा किया, तेरी ओर ही मैंने रुख़ किया, और तेरे ही सहारे लड़ा, मैं तेरी महानता के साथ शरण मांगता हूँ कि तू मुझे गुमराह न कर दे, तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू वह अमर है जो कभी नहीं मरता, जबकि जिन्न और इंसान मर जाते हैं)।"(67)
* اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عِلْمٍ لَا يَنْفَعُ، وَمِنْ قَلْبٍ لَا يَخْشَعُ، وَمِنْ نَفْسٍ لَا تَشْبَعُ، وَمِنْ دَعْوَةٍ لَا يُسْتَجَابُ لَهَا.
* "अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन इल्मिन् ला यन्फ़उ, व मिन क़ल्बिन ला यख़्शउ, व मिन नफ़्सिन ला तश्बउ, व मिन दअ्वतिन् ला युस्तजाबु लहा (ऐ अल्लाह, मैं तेरी शरण मांगता हूँ उस ज्ञान से जो लाभकारी न हो, उस दिल से जो विनम्र न हो, उस आत्मा से जो संतुष्ट न हो, और उस दुआ से जो स्वीकार न हो)।"(68)
* اللَّهُمَّ جَنِّبْنِي مُنْكَرَاتِ الأَخْلَاقِ وَالأَعْمَالِ وَالأَهْوَاءِ وَالأَدْوَاءِ.
* "अल्लाहुम्मा जन्निब्नी मुन्करातिल-अख़लाक़ि वल-आअ्मालि वल-अह्'वाइ वल-अद्'वाइ (ऐ अल्लाह! मुझे बुरे व्यवहार, बुरे कर्मों, बुरी आकांक्षाओं और बुरी बीमारियों से बचा)।"(69)
* اللَّهُمَّ أَلْهِمْنِي رُشْدِي، وَأَعِذْنِي مِنْ شَرِّ نَفْسِي.
* "अल्लाहुम्मा अल्हिम्नी रुशदी, व अइज़्नि मिन् शर्रि नफ़्सी (ऐ अल्लाह! मुझे सही मार्ग दिखा, और मेरी आत्मा के बुरे प्रभाव से मेरी सुरक्षा कर)।"(70)
* اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ.
* "अल्लाहुम्मकफ़िनी बि ह़लालिका अन् ह़रामिका व अग़निनी बि फ़ज़्लिका अम्मन् सिवाका। (ऐ अल्लाह! मुझे अपनी हलाल चीज़ों के द्वारा अपनी हराम चीज़ों से बचा ले, और मुझे अपने अनुग्रह से अपने अतिरिक्त अन्य लोगों से बेनियाज़ कर दे)।"(71)
* اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الهُدَى وَالتُّقَى وَالعَفَافَ وَالغِنَى.
* "अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका अल-हुदा वत्तुक़ा वल-अफ़ाफ़ा वल-ग़िना (ऐ अल्लाह! मैं तुझसे हिदायत, तक़्वा, पवित्रता और बेनियाज़ी मांगता हूँ)।"(72)
* اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الهُدَى وَالسَّدَادَ.
* "अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका अल-हुदा वस्सदाद (ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मार्गदर्शन एवं सही मार्ग पर स्थिरता माँगता हूँ)।"(73)
* اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنَ الخَيْرِ كُلِّهِ، عَاجِلِهِ وَآجِلِهِ، مَا عَلِمْتُ مِنْهُ وَمَا لَمْ أَعْلَمْ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الشَّرِّ كُلِّهِ، عَاجِلِهِ وَآجِلِهِ، مَا عَلِمْتُ مِنْهُ وَمَا لَمْ أَعْلَمْ، وَأَسْأَلُكَ مِنْ خَيْرِ مَا سَأَلَكَ مِنْهُ عَبْدُكَ وَنَبِيُّكَ مُحَمَّدٌ ﷺ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا اسْتَعَاذَ مِنْهُ عَبْدُكَ وَنَبِيُّكَ مُحَمَّدٌ ﷺ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الجَنَّةَ وَمَا قَرَّبَ إِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ أَوْ عَمَلٍ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ وَمَا قَرَّبَ إِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ أَوْ عَمَلٍ، وَأَسْأَلُكَ أَنْ تَجْعَلَ كُلَّ قَضَاءٍ قَضَيْتَهُ لِي خَيْرًا.
* "अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका मिनल-ख़ैरि कुल्लिहि, आ़जिलिहि व आजिलिहि, मा अ़लिम्तु मिन्हु व मा लम अअ़्लम, व अऊज़ु बिका मिनश-शर्रि कुल्लिहि, आ़जिलिहि व आजिलिहि, मा अलिम्तु मिन्हु व मा लम आलम, व असअलुका मिन ख़ैरि मा स'अ'ल'का मिन्हु अब्दुका व नबिय्युक मुह़म्मदुन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, व अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा इस्तआज़ा मिन्हु अब्दुका व नबिय्युका मुह़म्मदुन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका अल-जन्नता व मा क़र्रबा इलैहा मिन क़ौलिन औ अ़मलिन, व अऊज़ु बिका मिनन-नारि व मा क़र्रबा इलैहा मिन क़ौलिन औ अ़मलिन, व अस'अलुका अन तज्अ़ला कुल्ला क़ज़ाइन् क़ज़ैतहु ली ख़ैरन (ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जल्द तथा देर से मिलने वाली हर प्रकार की भलाई माँगता हूँ, जो मैं जानता हूँ और जो नहीं जानता। और मैं जल्द तथा देर से आने वाली हर प्रकार की बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ, जो मैं जानता हूँ और जो नहीं जानता। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे उस भलाई का प्रश्न करता हूँ, जो तेरे बंदे और तेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तुझसे तलब की है, और मैं उस बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ जिससे तेरे बंदे और तेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शरण चाही है। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत तथा उससे निकट करने वाले कार्य एवं कथन माँगता हूँ, तथा मैं जहन्नम और उससे निकट कर देने वाले कार्य एवं कथन से तेरी शरण चाहता हूँ। और मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि तूने मेरे लिए जो भी फैसला किया है, उसे बेहतर कर दे)।" (74)
* لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ، يُحْيِي وَيُمِيتُ بِيَدِهِ الخَيْرُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ، وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ العَلِيِّ العَظِيمِ.
* "ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल्मुल्कु, व लहुल्मह़म्दु, युह़्यी व युमीतु बियदिहिल् ख़ैरु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, सुब्ह़ानल्लाहि, वल-ह़म्दु लिल्लाहि, व ला इलाहा इल्लल्लाहु, वल्लाहु अकबर, व ला ह़ौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल-अलीय्यिल-अज़ीम (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, पूर्ण स्वामित्व बस उसी को प्राप्त है, सारी प्रशंसा उसी की है, वही जीवन देता है तथा वही मारता है, हर प्रकार की भलाई उसी के हाथ में है और वह हर चीज़ करने में सक्षम है। अल्लाह पाक है, समस्त प्रशंसाएँ अल्लाह के लिए हैं, और अल्लाह के सिवा कोई भी सत्य पूज्य नहीं है। अल्लाह सबसे बड़ा है और उच्च एवं महान अल्लाह के अतिरिक्त न किसी के पास भलाई के मार्ग पर लगाने की शक्ति है, न बुराई से रोकने की क्षमता)।"(75)
* اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ، وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، وَبَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ، وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ.
* "अल्लाहुम्मा स़ल्ले अला मुह़म्मद, व अला आले मुह़म्मद, कमा स़ल्लैता अला इब्राहीमा व अला आले इब्राहीमा, इन्नका ह़मीदुम् मजीद, व बारिक अला मुह़म्मद, व अला आले मुह़म्मद, कमा बारक्ता अला इब्राहीमा व अला आले इब्राहीमा, इन्नका ह़मीदुम मजीद (ऐ अल्लाह! मुह़म्मद एवं उनके परिवार पर उसी प्रकार अपनी रहमत भेज, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनके परिवार पर अपनी रहमत भेजी थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनके परिवार पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनके परिवार पर की थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है)।"(76)
* ﴿...رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ 201﴾
* "...रब्बना आतिना फ़िद्दुनिया ह़सनतन्, व फ़िल आख़िरति ह़सनतन्, व क़िना अज़ाबन्नारि (...ऐ हमारे पालनहार! हमें दुनिया में भलाई दे तथा आख़िरत में भी भलाई दे और हमें आग के अज़ाब से बचा)।" [सूरह बक़रा: 201]।
अरफ़ा के इस महान अवसर पर, हाजी के लिए मुस्तहब (वांछनीय) यह है कि वह पूर्वोल्लिखित ज़िक्रों एवं दुआओं को बारंबार पढ़ता रहे, तथा इसी अर्थ के अन्य ज़िक्र एवं दुआएं भी पढ़े और नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजे, दुआ में आग्रह करे एवं गिड़गिड़ाए, और अपने रब से लोक-परलोक का कल्याण मांगे। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब दुआ करते थे, तो उसे तीन बार कहते थे, अतः हमें भी इस मामले में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करना चाहिए।
इस अवसर पर, मुसलमान को अपने रब के प्रति विनम्र, उसके सामने विनीत, उसके प्रति समर्पित और उसके सामने झुका हुआ होना चाहिए, उसकी दया और क्षमा की आशा करते हुए, उसके दंड और क्रोध से डरते हुए, अपने आप का आत्म-मूल्यांकन करते हुए और सच्चे मन से तौबा करते हुए। यह एक महान दिन और बड़ी सभा है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों पर उदारता दिखाता है, अपने फ़रिश्तों के सामने उन पर गर्व करता है और इस दिन बहुत से लोगों को जहन्नम से मुक्त करता है। अरफ़ा के दिन के सिवा शैतान को कभी इतना घटिया, अपमानित एवं तुच्छ नहीं देखा गया जितना कि अरफ़ा के दिन वह होता है, सिवाय बद्र के दिन के। यह इसलिए क्योंकि शैतान देखता है कि अल्लाह अपने बंदों पर दया कर रहा है, उनके गुनाहों को क्षमा कर रहा है और उन्हें जहन्नम से आज़ाद कर रहा है।
तथा सहीह मुस्लिम में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है, कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«مَا مِنْ يَوْمٍ أَكْثَرَ مِنْ أَنْ يُعْتِقَ اللَّهُ فِيهِ عَبْدًا مِنَ النَّارِ مِنْ يَوْمِ عَرَفَةَ، وَإِنَّهُ لَيَدْنُو ثُمَّ يُبَاهِي بِهِمُ المَلَائِكَةَ، فَيَقُولُ: مَا أَرَادَ هَؤُلَاءِ؟».
"अरफ़ा के दिन से बढ़कर कोई ऐसा दिन नहीं जिसमें अल्लाह अपने बंदों को जहन्नम से अधिक मुक्त करता हो। वह निकट आता है, फिर फ़रिश्तों के सामने उन पर गर्व करता है और कहता है : ये लोग क्या चाहते हैं?"(77)
अतः मुसलमानों को चाहिए कि अपनी ओर से अल्लाह को भलाई दिखाएँ, अपने शत्रु शैतान को अपमानित करें और उसे ज़्यादा से ज़्यादा ज़िक्र, दुआ, तौबा और सभी गुनाहों व पापों से तौबा व क्षमा याचना करके दुखी करें। हज्ज करने वाले लोग इस स्थान पर सूरज डूबने तक ज़िक्र, दुआ और गिड़गिड़ाने में व्यस्त रहें। जब सूरज डूब जाए, तो शांति एवं गंभीरता के साथ मुज़्दलिफ़ा की ओर रवाना हों और तल्बिया (लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक...) को अधिक से अधिक पढ़ें तथा खुली जगह में तेज़ चलें, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा ही किया था। सूरज डूबने से पहले रवाना होना जायज़ नहीं है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सूरज डूबने तक वहीं रुके रहे और आपने फ़रमाया :
«خُذُوا عَنِّي مَنَاسِكَكُمْ».
"मुझसे अपने हज्ज के कार्य सीख लो।"(78)
जब मुज़्दलिफ़ा पहुँचें, तो वहाँ मग़्रिब की तीन रक्अतें और इशा की दो रक्अतें पढ़ें। दोनों को एकत्र करके (जमा करके) एक अज़ान और दो इक़ामतों के साथ वहाँ पहुँचते ही अदा किया जाए, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा ही किया था। चाहे मुज़्दलिफ़ा मग़्रिब के वक़्त में पहुँचें या इशा का वक़्त दाखिल होने के बाद।
जो लोग मुज़्दलिफ़ा पहुँचने के बाद नमाज़ से पहले जमरात (कंकड़) इकट्ठा करने लगते हैं तथा उनमें से कई का यह मानना होता है कि यह एक शरीअत सम्मत कार्य है, तो ऐसा करना गलत है और इसका कोई आधार नहीं है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मश्अर के बाद मिना की ओर जाते हुए कंकड़ इकट्ठा करने का आदेश दिया था। जिस स्थान से भी कंकड़ चुन लिया जाए काफ़ी है। कंकड़ मुज़्दलिफ़ा से इकट्ठा करना अनिवार्य नहीं है, बल्कि इसे मिना से भी इकट्ठा किया जा सकता है। इस दिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हुए केवल जमरा -ए- अक़बा को मारने हेतु सात कंकड़ इकट्ठा करना सुन्नत है। शेष तीन दिनों में मिना से ही प्रत्येक दिन इक्कीस कंकड़ इकट्ठा किए जाएं और तीनों जमरात को मारी जाएं।
कंकड़ों को धोना सुन्नत नहीं है, बल्कि उन्हें बिना धोए ही फेंकना चाहिए, क्योंकि कंकड़ों को धोना न तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित है एवं न ही आपके सहाबा से। परंतु कंकड़ को एक बार फेंक देने के बाद पुनः प्रयोग नहीं करना चाहिए।
हज्ज करने वाला यह रात मुज़्दलिफ़ा में बिताएगा। कमजोर लोग जैसे महिलाएँ, बच्चे और उनके जैसे अन्य लोग रात के अंतिम भाग में मिना की ओर रवाना हो सकते हैं, जैसा कि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा एवं उम्म -ए- सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा इत्यादि की हदीस में इस का वर्णन है। किंतु उनके अतिरिक्त अन्य हज्ज करने वालों के लिए यह जरूरी है कि वे मुज़्दलिफ़ा में फज्र की नमाज़ तक रहें, फिर मश्अर -ए- हराम में रुक कर क़िब्ला की ओर मुँह करके अल्लाह का ज़िक्र, तकबीर और दुआ करते रहें जब तक पूरी तरह दिन का उजाला न हो जाए। तथा यहाँ दुआ के समय हाथ उठाना मुस्तहब (पसंदीदा) है, और मुज़्दलिफ़ा में जहाँ भी वे ठहरें, वही पर्याप्त है, उनके लिए मश्अर के करीब जाना या उस पर चढ़ना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«وَقَفْتُ هَاهُنَا - يَعْنِي عَلَى المَشْعَرِ الحَرَامِ - وَجَمْعٌ كُلُّهَا مَوْقِفٌ».
"मैं यहाँ -अर्थात मश्अर पर- ठहरा हुआ हूँ, तथा पूरा मुज़्दलिफ़ा ही ठहरने की जगह है।"(79) इसे मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है, तथा हदीस के शब्द "जम्अ्" से अभिप्राय मुज़्दलिफ़ा है।
जब भोर में पूर्णरूपेण उजाला हो जाए, तो वे सूरज के उगने से पहले मिना की ओर रवाना हो जाएं और अपने सफ़र में तल्बिया (लब्बैक...) का अधिक से अधिक उच्चारण करें। जब मुहस्सिर की घाटी में पहुँचें, तो वहाँ थोड़ा तेज़ चलना मुस्तहब (पसंदीदा) है।
जब मिना पहुँचें, तो जमरा -ए- अक़बा के पास तल्बिया पढ़ना बंद कर दें। फिर वहाँ पहुँचते ही जमरा को निर्बाध सात कंकड़ियां मारें। प्रत्येक कंकड़ को फेंकते समय हाथ उठाएँ और तकबीर कहें। मुस्तहब यह है कि काबा को अपनी बाईं ओर तथा मिना को दाईं ओर रख कर वादी के अंदर से कंकड़ मारें। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा ही किया था। यदि किसी ने कंकड़ को दूसरी ओर से भी मार दिया तथा कंकड़ लक्ष्य (मर्मा) में गिर जाए, तो यह पर्याप्त है। यह शर्त नहीं है कि कंकड़ वहाँ रुके, बल्कि शर्त यह है कि कंकड़ वहाँ गिर जाए। अगर कंकड़ जमरे में गिर जाए और फिर वहाँ से बाहर निकल जाए, तो वह पर्याप्त होगा, जैसा कि उलमा के कथनों से स्पष्ट होता है। और इमाम नववी ने अपनी किताब (शर्ह अल-मुहज़्जब) में इसका स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है। जमरों के लिए कंकड़ अंगूठे और तर्जनी के बीच रखकर फेंके जाने वाले कंकड़ों के बराबर होने चाहिएं, जो चने से कुछ बड़े होते हैं।
फिर कंकड़ मारने के बाद, अपना कुर्बानी का जानवर ज़बह करे। ज़बह करते समय : "बिस्मिल्लाहि वल्लाहु अकबर, अल्लाहुम्मा हाज़ा मिन्का व लका (अल्लाह के नाम से आरंभ है तथा अल्लाह सब से बड़ा है। ऐ अल्लाह! यह तुझ से है और तेरे लिए है)।" कहना मुस्तहब है। जानवर (के मुँह) को क़िब्ला की दिशा में रखना चाहिए। सुन्नत यह है कि ऊंट को खड़ा करके उसकी बायीं अगली टांग को बांधकर नह्'र किया जाए और गाय व बकरी को उनके बाएं पहलू पर लिटाकर ज़बह किया जाए। यदि ज़बह करते समय जानवर को क़िब्ला की ओर मुँह न कर के किसी दूसरी तरफ कर दिया, तो सुन्नत छूट जाएगी, किंतु उसका ज़बह सही माना जाएगा, क्योंकि ज़बह के समय क़िब्ला की ओर मुँह करना सुन्नत है, वाजिब (अनिवार्य) नहीं। मुस्तहब यह है कि अपने कुर्बानी के जानवर का मांस खुद खाए, उपहार स्वरूप दे तथा दान करे, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿...فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْبَائِسَ الْفَقِيرَ﴾
"...फिर उनमें से स्वयं खाओ तथा तंगहाल निर्धन को खिलाओ।" [सूरह हज्ज : 28]।
ज़बह करने का समय इस्लामी विद्वानों के सब से सटीक कथन के अनुसार, तश्रीक के दिनों के तीसरे दिन के सूर्यास्त तक रहता है, इस प्रकार, ज़बह की अवधि यौम-उन-नह्'र (कुर्बानी के दिन) और उसके बाद के तीन दिनों तक रहती है।
फिर हद्य (कुर्बानी का जानवर) ज़बह करने के बाद वह अपने सिर को मुंडवाए या बाल छोटे करवाए। सिर मुंडवाना बेहतर है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सिर मुंडवाने वालों के लिए तीन बार रहमत और माफी की दुआ की, जबकि बाल छोटे करने वालों के लिए एक बार। केवल सिर के कुछ हिस्से के बाल काटना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे सिर के बाल छोटे करना अनिवार्य है, जैसे मुंडवाने में होता है, तथा महिला अपनी चोटियों में से उंगली के पोर के बराबर या उससे कम काटे।
जमर -ए- अक़बा को कंकड़ियां मारने और सिर मुंडवाने या बाल छोटे करवाने के बाद, मुहरिम (इहराम की स्थिति में रहने वाले व्यक्ति) के लिए हर वह चीज़ हलाल (वैध) हो जाती है जो इहराम की वजह से उस पर हराम (अवैध) थी, सिवाय औरतों के, इस हलाल होने को "पहला तहल्लुल" कहा जाता है। इसके बाद सुन्नत यह है कि वह इत्र लगाए और मक्का की ओर रवाना हो, ताकि तवाफ़ -ए- इफ़ाज़ा करे, जैसा कि हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने फ़रमाया है :
«كُنْتُ أُطَيِّبُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ لِإِحْرَامِهِ قَبْلَ أَنْ يُحْرِمَ، وَلِحَلِّهِ قَبْلَ أَنْ يَطُوفَ بِالبَيْتِ».
"मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उनके इहराम के लिए ख़ुशबू लगाती थी, इससे पहले कि आप इहराम बांधते तथा आपके हलाल होने लिए काबा का तवाफ़ करने के पूर्व ख़ुशबू लगाया करती थी।"(80) इस हदीस को बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस तवाफ़ कोः तवाफ़ -ए- इफ़ाज़ा एवं तवाफ़ -ए- ज़ियारत कहा जाता है, यह हज्ज के अरकान (स्तंभों ) में से एक है, और इसके बिना हज्ज पूरा नहीं होता, यही वह तवाफ़ है जिसकी ओर अल्लाह तआला ने इस आयत में इशारा किया है :
﴿ثُمَّ لْيَقْضُوا تَفَثَهُمْ وَلْيُوفُوا نُذُورَهُمْ وَلْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ29﴾
"फिर वे अपना मैल-कुचैल दूर करें तथा अपनी मन्नतें पूरी करें और इस प्राचीन घर का तवाफ़ (परिक्रमा) करें।" [सूरह हज्ज : 29]।
फिर तवाफ़ करने और मक़ाम -ए- इब्राहीम के पीछे दो रक्अत नमाज़ पढ़ने के बाद, यदि वह हज्ज -ए- तमत्तुअ् करने वाला है, तो सफा और मर्वा के बीच सई करेगा, यह सई हज्ज के लिए है, और प्रथम सई उसके उमरा के लिए थी।
उलमा के सर्वश्रेष्ठ राय के अनुसार, एक सई पर्याप्त नहीं है, क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा कहती हैं : "हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ निकले" फिर उन्होंने पूरी हदीस बयान की, जिसमें है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
«وَمَنْ كَانَ مَعَهُ هَدْيٌ فَلْيُهِلَّ بِالحَجِّ مَعَ العُمْرَةِ ثُمَّ لَا يَحِلُّ حَتَّى يَحِلَّ مِنْهُمَا جَمِيعًا»...
"और जो व्यक्ति अपने साथ कुर्बानी का जानवर लेकर आया हो, वह उमरा के साथ हज्ज की निय्यत करे। फिर वह तब तक हलाल नहीं होगा जब तक दोनों (उमरा और हज्ज) से हलाल न हो जाए।"... यहाँ तक कि आगे वह कहती हैं :
«فَطَافَ الَّذِينَ أَهَلُّوا بِالعُمْرَةِ بِالبَيْتِ وَبِالصَّفَا وَالمَرْوَةِ ثُمَّ حَلُّوا ثُمَّ طَافُوا طَوَافًا آخَرَ بَعْدَ أَنْ رَجَعُوا مِنْ مِنًى لِحَجِّهِمْ».
"फिर जिन्होंने उमरा के साथ हज्ज का इहराम बांधा था, उन्होंने पहले काबा का तवाफ़ किया और सफ़ा और मर्वा के बीच सई की, फिर हलाल हो गए और फिर मिना से लौटने के बाद हज्ज का दूसरा तवाफ़ किया।"(81) इस हदीस को बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
उमरा का इहराम बांधने वालों के बारे में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के कहे गए इस कथन : "फिर उन्होंने मिना से लौटने के बाद हज्ज के लिए एक और तवाफ़ किया" में तवाफ़ से अभिप्रायः सफ़ा और मर्वा के बीच की सई है। यही इस हदीस की व्याख्या में सबसे सही कथन है। जो लोग कहते हैं कि इससे उनका अभिप्राय "तवाफ़ -ए- इफ़ाज़ा" है, वह सही नहीं है, क्योंकि तवाफ़ -ए- इफ़ाज़ा, हज्ज का एक रुक्न (स्तंभ) है, जिसे सभी हाजियों ने किया था। अतः इससे अभिप्राय हज्ज -ए- तमत्तुअ करने वाले का विशेष तवाफ़ है। अर्थात सफ़ा एवं मर्वा की दोबारा सई, जो हज्ज पूरा हो जाने के बाद मिना से वापस लौटने के बाद की जाती है। यह मसला बिल्कुल स्पष्ट है और यही अधिकांश विद्वानों की राय भी है।
इस बात के सही होने की पुष्टि उस हदीस से भी होती है, जिसे इमाम बुख़ारी ने अपनी सहीह में पुष्टि वाले शब्द के साथ सनद के बिना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है कि उनसे हज्ज -ए- तमत्तुअ के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया : "मुहाजिरों और अंसारियों तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियों ने हज्जतुल-वदा में इहराम बांधा और हम लोगों ने भी इहराम बांधा। जब हम मक्का पहुंचे, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : अपने हज्ज के इहराम को उमरा के इहराम में बदल दो, सिवाय उन लोगों के जो हद्य (अर्थात कुर्बानी का जानवर) लेकर आए हों। फिर हमने काबा का तवाफ़ किया, सफ़ा तथा मर्वा के बीच सई की, हम अपनी पत्नियों के पास भी गए और (सिले हुए) कपड़े पहने। जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने (उन लोगों के बारे में जिन के पास जानवर थे) फ़रमाया था : जो क़ुर्बानी का जानवर लेकर आया है, वह तब तक हलाल नहीं हो सकता, जब तक उसका हद्य निर्धारित स्थान तक न पहुँच जाए। फिर तर्विया (आठ ज़ुल-हिज्जा के दिन) की शाम को हमें हज्ज की निय्यत करने का आदेश दिया। जब हम हज्ज के कार्य पूरे कर चुके, तो फिर से काबा का तवाफ़ किया और सफा एवं मर्वा के बीच सई की।"(82)
इस स्पष्टिकरण से हमारा उद्देश्य पूरा हो गया, और वह यह कि इस में हज्ज -ए- तमत्तुअ करने वाले के दो बार सई करने का स्पष्ट रूप से उल्लेख है। और अल्लाह ही बेहतर जानता है।
जहां तक उस रिवायत की बात है जिसे मुस्लिम ने जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि :
"अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनके सहाबा ने सफ़ा और मर्वा के बीच केवल एक ही तवाफ़ किया था।"(83)
जो उनका पहला तवाफ़ था, तो यह उन सहाबा पर लागू होता है जो कुर्बानी का जानवर साथ लाए थे, क्योंकि वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ अपने इहराम में ही बने रहे, यहाँ तक कि हज्ज और उमरा दोनों से एक साथ हलाल हुए। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्ज और उमरा दोनों की निय्यत की थी। जो लोग कुर्बानी का जानवर साथ लाए थे, उन्हें आपने आदेश दिया था कि वे उमरा के साथ हज्ज की भी निय्यत करें और तब तक हलाल न हों जब तक दोनों से एक साथ हलाल न हो जाएं। हज्ज एवं उमरा को एक साथ करने वाले (क़ारिन) के ऊपर एक ही सई है, जैसाकि जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु की इस हदीस से तथा दूसरी सहीह हदीसों से प्रमाणित होता है।
इसी प्रकार जिसने केवल हज्ज की निय्यत की हो और अपने इहराम में यौम -ए- नह्र तक बाकी रहा हो, उस पर केवल एक ही सई वाजिब है। अतः यदि क़ारिन (हज्ज और उमरा दोनों की निय्यत करने वाला) और मुफ़्रिद (सिर्फ़ हज्ज की निय्यत करने वाला) तवाफ़ -ए- क़ुदूम के बाद सई कर लें, तो यह तवाफ़ -ए- इफ़ाज़ा के बाद की सई के लिए पर्याप्त होगी। यही आइशा, इब्न -ए- अब्बास और जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हुम की हदीसों के बीच सामंजस्य बैठाने का तरीका है। इस प्रकार सभी हदीसों पर अमल किया जा सकता है और उनमें कोई विरोधाभास भी नहीं रहेगा।
इस सामंजस्य की पुष्टि इस बात से होती है कि आइशा और इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीसें सही हैं और इन दोनों हदीसों ने मुतमत्तिअ् (जो उमरा और हज्ज अलग-अलग करता है) के लिए दूसरी सई को साबित किया है, जबकि जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस का ज़ाहिरी (ऊपरी, प्रत्यक्ष) अर्थ इसे नकारता है, तथा पुष्टि करने वाली हदीस को नकारने वाली हदीस पर वरीयता मिलती है, जैसा कि उसूल -ए- हदीस विज्ञान में यह बात तय है, पवित्र और महान अल्लाह ही सही मार्गदर्शन देने वाला है, और अल्लाह की मदद के बिना किसी बुराई से फिरने तथा किसी नेकी के करने की किसी में ताकत और शक्ति नहीं।
अध्याय
हज्ज करने वाले के लिए यौम अन-नह्'र (क़ुर्बानी के दिन) किए जाने वाले श्रेष्ठ कार्यों के बारे में स्पष्टीकरण
हज्ज करने वाले के लिए बेहतर यह है कि क़ुर्बानी के दिन इन चार कार्यों को उसी क्रम में करे, जैसे बताया गया है : सबसे पहले जमरा -ए- अक़बा को कंकड़ी मारना, फिर क़ुर्बानी करना, उसके बाद सिर मुंडवाना या बाल कटवाना, फिर बैतुल्लाह का तवाफ़ और उसके बाद हज्ज -ए- तमत्तुअ करने वाले के लिए सई करना। इसी तरह मुफ़्रिद और क़ारिन के लिए भी, यदि उन्होंने क़ुदूम के तवाफ़ के साथ सई नहीं की हो। लेकिन यदि इनमें से किसी कार्य को दूसरे से पहले कर लिया, तो वह भी मान्य होगा, क्योंकि इस मामले में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रुख़्सत (छूट) साबित है। इसमें सई को तवाफ़ से पहले करना भी शामिल है, क्योंकि यह भी क़ुर्बानी के दिन किए जाने वाले कार्यों में से एक कार्य है। अतः यह सहाबी के इस कथन में शामिल होगा कि उस दिन आपसे जिस चीज़ के भी आगे-पीछे करने के बारे में पूछा गया, आपने उत्तर में बस इतना कहा :
«افْعَلْ وَلَا حَرَجَ».
"तुम कर लो, कोई हर्ज (आपत्ति) नहीं है।"(84)
साथ ही इसलिए भी कि यह उन मामलों में से एक है जिनमें भूल या अज्ञानता हो सकती है, अतः यह इस आम छूट के दायरे में आ जाता है, क्योंकि इसमें आसानी और सुविधा रखी गई है।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि तवाफ़ से पहले सई के बारे में पूछा गया, तो आपने फ़रमाया :
«لَا حَرَجَ».
"इसमें कोई हर्ज नहीं है।"(85) इसे अबू दावूद ने उसामा बिन शरीक की हदीस के रूप में सहीह सनद से रिवायत किया है।
अतः इससे स्पष्ट है कि निस्संदेह यह व्यापकता के अंदर दाख़िल है। अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है।
हज्ज करने वाले के पूरे तौर पर हलाल होने के लिए तीन कार्य करने आवश्यक हैं : जमरा -ए- अक़बा को कंकड़ मारना, सिर मुंडवाना या बाल कतरवाना और इफ़ाज़ा के तवाफ़ के साथ-साथ सई करना, जैसाकि अभी उल्लेख किया गया है। इन तीनों कार्यों को कर लेने के बाद वह सब कुछ हलाल हो जाता है जो इहराम के कारण हराम था। जैसे स्त्रियाँ तथा इत्र आदि। लेकिन यदि वह इनमें से केवल दो कार्य करता है, तो उसके लिए वह सब कुछ हलाल हो जाता है जो इहराम के कारण हराम था, सिवाय स्त्रियों के, और इसे "तहल्लुल -ए- अव्वल" कहा जाता है।
हज्ज करने वाले के लिए यह मुस्तहब (पसंदीदा) है कि वह ज़मज़म के पानी को पिए और जी भर कर तथा जितनी हो सके पिए, एवं लाभकारी दुआएँ करे। क्योंकि
«مَاءُ زَمْزَمَ لِمَا شُرِبَ لَهُ».
"ज़मज़म का पानी उस उद्देश्य के लिए होता है, जिसके लिए उसे पिया जाए।"(86)
जैसा कि सहीह मुस्लिम में अबू ज़र्र रज़ियल्लाहु अन्हु द्वारा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत किया गया है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़मज़म के पानी के बारे में फ़रमाया है :
«إِنَّهُ طَعَامُ طُعْمٍ».
"यह खाने के लिए भोजन है।"(87)
अबू दावूद में इतना अधिक है :
«وَشِفَاءُ سُقْمٍ».
"और यह बीमारी का इलाज है।"(88)
इफ़ाज़ा का तवाफ़ और जिन लोगों पर सई वाजिब है, उनके सफा-मर्वा की सई कर लेने के पश्चात, हाजी लोग मिना लौट जाएं, तथा वहाँ तीन दिन और तीन रातें बिताएं, और तीनों दिन सूरज ढलने के बाद हर दिन तीनों जमरों को क्रमवार ढंग से कंकड़ी मारें, तथा कंकड़ी मारने में क्रम का पालन करना अनिवार्य है।
सबसे पहले जमरा -ए- ऊला (शैतान को कंकड़ मारने का पहला स्थान) से आरंभ करे, जो मस्जिद अल-ख़ैफ़ के पास है। उसे लगातार सात कंकड़ी मारे और हर कंकड़ी मारने के साथ अपने हाथ उठाए। सुन्नत यह है उसे मारने के बाद थोड़ा आगे बढ़ जाए, उसे अपनी बाईं ओर कर ले, क़िब्ला की ओर मुंह करे और अपने हाथ उठाकर तल्लीनता के साथ दुआ करे और रोए गिड़गिड़ाए।
फिर दूसरे जमरा को पहले ही की तरह कंकड़ी मारे। सुन्नत यह है कि कंकड़ी मारने के बाद थोड़ा आगे बढ़े और उसे अपनी दाहिनी तरफ़ रखे, क़िब्ला की दिशा में मुंह करके अपने हाथ ऊपर उठाए और ज़्यादा से ज़्यादा दुआ करे।
फिर तीसरे जमरे को कंकड़ी मारे, किंतु ,वहाँ ठहरे नहीं।
फिर वह अय्याम -ए- तशरीक़ के दूसरे दिन सभी जमरों को सूरज ढलने के बाद वैसे ही कंकड़ी मारे जैसे पहले दिन मारा था, तथा जिस प्रकार से पहले एवं दूसरे जमरे के पास किया था वैसे ही दूसरे दिन भी करे, ताकि पूर्णतः नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण किया जा सके।
तशरीक़ के पहले दो दिनों में जमरा को कंकड़ी मारना हज्ज के वाजिबात (अनिवार्य कार्यों) में से एक है, और इसी तरह पहली और दूसरी रात मिना में रहना वाजिब है, सिवाय पानी पिलाने वालों एवं चरवाहों के तथा जो इन दोनों के समान हों, उनके लिए मिना में रात बितना वाजिब नहीं है।
फिर इन दो दिनों में रमी (कंकड़ी मारने) के बाद, जो मिना से जल्दी निकलना चाहे, उसके लिए यह जायज़ है, किंतु उसको सूर्यास्त से पहले निकलना होगा, और जो देर तक रुके और तीसरी रात मिना में बिताए एवं तीसरे दिन जमरा को कंकड़ी मारे, तो यह उत्तम एवं अधिक पुण्यदायक है, जैसा कि अल्लाह ने कहा है :
﴿وَاذْكُرُوا اللَّهَ فِي أَيَّامٍ مَعْدُودَاتٍ فَمَنْ تَعَجَّلَ فِي يَوْمَيْنِ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ وَمَنْ تَأَخَّرَ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ لِمَنِ اتَّقَى...﴾
"तथा अल्लाह को चंद गिने हुए दिनों में याद करो। फिर जो दो दिनों में (मिना से) जल्द चला जाए, तो उस पर कोई दोष नहीं और जो देर से निकले, तो उस पर भी कोई दोष नहीं, उस व्यक्ति के लिए जो (अल्लाह से) डरे...।" [सूरह बक़रा : 203]।
(विलंब करना इसलिए भी उत्तम है) क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लोगों को जल्दी लौटने की अनुमति दी, किंतु आप ने स्वयं जल्दी नहीं की, बल्कि आप मिना में रहे और तीसरे दिन, तेरहवीं ज़िल्हिज्जा को सूरज ढलने के बाद जमरात को कंकड़ी मारा, फिर ज़ुह्र पढ़ने के पूर्व मिना से निकले।
और छोटे बच्चे, जो खुद से कंकड़ी नहीं मार सकते, उनके लिए उनके वली (अभिभावक) को यह अनुमति है कि वह उनकी तरफ से जमरा -ए- अक़बा और अन्य जमरात को कंकड़ी मारें, लेकिन पहले वह खुद के लिए कंकड़ी मारेंगे, इसी तरह, जो छोटी बच्ची कंकड़ी नहीं मार सकती, उसके लिए भी उसके अभिभावक को कंकड़ी मारने की अनुमति है, और यह जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत की गई हदीस से प्रमाणित है, जिसमें उन्होंने कहा है :
«حَجَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ، وَمَعَنَا النِّسَاءُ وَالصِّبْيَانُ، فَلَبَّيْنَا عَنِ الصِّبْيَانِ وَرَمَيْنَا عَنْهُمْ».
"हमने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ हज्ज किया। हमारे साथ महिलाएं और छोटे बच्चे भी मौजू थे। हमने बच्चों की तरफ़ से तल्बिया (लब्बैक...) कहा और उनकी तरफ से कंकड़ी मारे।"(89) इसे इब्ने माजह ने रिवायत किया है।
तथा जो व्यक्ति अपनी बीमारी अथवा बुढ़ापा के कारण या जो महिला गर्भावस्था की वजह से कंकड़ नहीं मार सकती, तो ऐसे लोग अपनी ओर से कंकड़ मारने के लिए किसी अन्य को नियुक्त कर सकते हैं, जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है :
﴿فَاتَّقُوا اللَّهَ مَا اسْتَطَعْتُمْ...﴾
"अतः अल्लाह से डरते रहो, जितना तुमसे हो सके...।" [सूरह तग़ाबुन: 16]।
चूँकि ये लोग जमरा को कंकड़ी मारने के स्थान पर लोगों की भीड़ को झेल नहीं सकते और कंकड़ी मारने का समय निकल जाएगा तथा इसे कज़ा (बाद में) करना शरीअत सम्मत नहीं है, अतः उनके लिए अपने स्थान पर किसी को नियुक्त करना जायज़ है, जबकि हज्ज के अन्य कार्यों को अदा करने के लिए अपने स्थान पर किसी दूसरे को नियुक्त करना जायज़ नहीं है, चाहे वह हज्ज नफ़्ली ही क्यों न हो, क्योंकि, जिसने भी हज्ज या उमरा का इहराम बाँधा है, चाहे वह नफ़्ली ही क्यों न हों, उसे पूरा करना आवश्यक है, जैसा कि अल्लाह ने कहा है :
﴿وَأَتِمُّوا الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلَّهِ...﴾
"तथा ह़ज्ज और उमरा अल्लाह के लिए पूरा करो...।" [सूरह बक़रा : 196]।
तवाफ़ और सई का समय सीमित न होने के कारण यह छूटता नहीं है, जबकि कंकड़ मारने का समय सीमित होने के कारण छूट सकता है।
जहाँ तक अरफा में ठहरने, मुज़्दलिफा और मिना में रात बिताने की बात है, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसका समय सीमित है और गुजर जाता है, किंतु इन स्थानों पर अक्षम व्यक्ति का उपस्थित होना संभव है, चाहे कठिनाई के साथ ही क्यों न हो, रमी (कंकड़ मारने) के विपरीत, इसके अतिरिक्त रमी के लिए सक्षम न होने की स्थिति में सलफ़ (सदाचारी पूर्वजों) के यहाँ अपने स्थान पर किसी दूसरे को नियुक्त करने की प्रथा भी रही है।
और इबादत (उपासना) तौक़ीफ़ी (निर्धारित) हैं, किसी के लिए यह उचित नहीं है कि वह बिना किसी प्रमाण के उनमें कुछ भी नया जोड़े, और नायब (प्रतिनिधि) के लिए यह जायज़ है कि वह पहले अपनी ओर से रमी (कंकड़ मारने का कार्य) करे और फिर उसी स्थान पर खड़े होकर अपने मुवक्किल के लिए तीनों जमरात में से प्रत्येक को कंकड़ मारे, यह आवश्यक नहीं है कि पहले वह अपनी तरफ से तीनों जमरा की रमी पूरी करे इसके बाद फिर अपने मुवक्किल के लिए रमी करने हेतु वापस लौटे, विद्वानों के दो कथनों में से सब से सही कथन यही है, क्योंकि इसके विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं है, और इसके विपरीत में कठिनाई एवं परेशानी भी है, जबकि सर्वोच्च व पवित्र अल्लाह फ़रमाता है :
﴿...وَمَا جَعَلَ عَلَيْكُمْ فِي الدِّينِ مِنْ حَرَجٍ...﴾
"...और धर्म के मामले में तुम पर कोई तंगी नहीं रखी...।" [सूरह हज्ज : 78]।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«يَسِّرُوا وَلَا تُعَسِّرُوا».
"आसानी करो, कठिनाई में मत डालो।"(90)
और क्योंकि इस प्रकार की बात नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा से वर्णित नहीं है जब उन्होंने अपने छोटे बच्चों और बीमार लोगों की ओर से कंकड़ मारे, और अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो वह बात नकल हो कर हम तक अवश्य ही पहुँचती, क्योंकि ऐसी घटनाएं ऐसी होती हैं जिनका प्रसारण लोगों के बीच आसानी से होता है। और अल्लाह ही बेहतर जानने वाला है।
अध्याय
हज्ज -ए- तमत्तुअ एवं क़िरान करने वालों पर रक्त (अर्थात: जानवर की क़ुर्बानी) के अनिवार्य होने के बारे में
यदि हाजी मुतमत्तिअ् अथवा क़ारिन हो -और वह मस्जिदे हराम का निवासी न हो- तो उस पर रक्त (जानवर की क़ुर्बानी) अनिवार्य है, और दम चाहे : एक बकरा हो, अथवा ऊँट या गाय का सातवां भाग। और अनिवार्य है कि यह क़ुर्बानी शुद्ध एवं पवित्र ढंग से कमाए गए माल में से हो, क्योंकि अल्लाह तआला पाक है और वह केवल पाक (शुद्ध) चीज़ ही स्वीकार करता है।
और मुसलमानों को चाहिए कि वह लोगों से, चाहे वे राजा हों या अन्य, कुछ भी दान या अन्य कोई चीज़ मांगने से बचें, यदि अल्लाह तआला ने उसे इतना धन प्रदान किया हो जिससे वह अपनी जरूरतों को पूरी कर सकते हों और दूसरों के आगे हाथ फैलाने से बच सकते हों, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित अनेक हदीसों में मांगने की निंदा और उसकी बुराई की गई है, तथा उसे छोड़ने वाले की प्रशंसा की गई है।
यदि मुतमत्तिअ् और क़ारिन हद्य (क़ुर्बानी) देने में असमर्थ हों, तो उन पर हज्ज के दौरान तीन दिन रोज़ा रखना अनिवार्य है, और जब वे अपने घर लौटें तो शेष सात दिन रोज़ा रखें, तथा वह तीन दिनों के रोज़े में से, यदि चाहें तो नह्'र (कुर्बानी के दिन) से पहले रख सकते हैं, और यदि चाहें तो तश्रीक़ के तीन दिनों में से किसी भी दिन रख सकते हैं। अल्लाह तआला फरमाता है :
﴿...فَمَنْ تَمَتَّعَ بِالْعُمْرَةِ إِلَى الْحَجِّ فَمَا اسْتَيْسَرَ مِنَ الْهَدْيِ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ فِي الْحَجِّ وَسَبْعَةٍ إِذَا رَجَعْتُمْ تِلْكَ عَشَرَةٌ كَامِلَةٌ ذَلِكَ لِمَنْ لَمْ يَكُنْ أَهْلُهُ حَاضِرِي الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ...﴾
"...जो व्यक्ति हज्ज (के इहराम बाँधने) तक उमरे से लाभ उठाए, तो क़ुर्बानी में से जो उपलब्ध हो, करे। फिर जिसके पास (क़ुर्बानी) उपलब्ध न हो, तो वह तीन रोज़े हज्ज के दौरान रखे और सात दिन के उस समय रखे, जब तुम (घर) वापस जाओ। ये पूरे दस हुए। ये उसके लिए हैं, जो मस्जिदे-ह़राम के निवासी न हों...।" [सूरह बक़रा : 196] पूरी आयत देखें।
तथा सहीह बुख़ारी में आइशा एवं इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, दोनों कहते हैं :
«لَمْ يُرَخَّصْ فِي أَيَّامِ التَّشْرِيقِ أَنْ يُصَمْنَ إِلَّا لِمَنْ لَمْ يَجِدِ الهَدْيَ».
"(हज्ज के दौरान) ज़ुल-हिज्जा महीने की ग्यारहवीं, बारहवीं तथा तेरहवीं तारीख़ों को रोज़ा रखने की अनुमति केवल उसे दी गई है, जिसके पास क़ुर्बानी का जानवर न हो।"(91)
यह हदीस सीधे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित (मरफ़ूअ) हदीस के समान मानी जाएगी। बेहतर यह है कि तीन दिनों का रोज़ा यौम -ए- अरफ़ा से पहले रख लिया जाए, ताकि हज्ज कर रहा व्यक्ति अरफ़ा के दिन रोज़ा से न हो, क्योंकि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अरफ़ा के दिन रोज़ा नहीं रखा और आपने अरफ़ा के दिन अरफ़ा में रोज़ा रखने से मना किया है। वैसे, इस दिन रोज़ा न रखना इन्सान को ज़िक्र और दुआ के लिए अधिक सक्षम बनाता है। तीन दिनों का रोज़ा लगातार या अलग-अलग रखा जा सकता है। इसी तरह सात दिनों का रोज़ा भी लगातार रखना आवश्यक नहीं है। बल्कि इन्हें एक साथ या अलग-अलग दोनों तरह से रखा जा सकता है, क्योंकि अल्लाह ने इन (रोज़ों) में लगातार रखने की शर्त नहीं लगाई है और न ही उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा बताया है। बेहतर यह है कि सात दिनों के रोज़े को तब तक टाल दे, जब तक कि व्यक्ति अपने घर न लौट जाए, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया है:
﴿...وَسَبْعَةٍ إِذَا رَجَعْتُمْ...﴾
"...और सात दिन के (रोज़े) उस समय रखे, जब तुम (घर) वापस जाओ...।" [सूरह बक़रा : 196]।
जो व्यक्ति कुर्बानी देने में असमर्थ हो, उसके लिए रोज़ा रखना, राजा या अन्य लोगों से कुर्बानी के लिए मदद मांगने से, बेहतर है। लेकिन जिसे बिना मांगे अथवा अपनी इच्छा जाहिर किए बिना कुर्बानी का जानवर या अन्य चीज़ मिल जाए, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। चाहे वह हज्ज किसी दूसरे की तरफ़ से ही क्यों न कर रहा हो। लेकिन यह उस समय की बात है, जब प्रतिनिधि बनाने वाले व्यक्ति ने अपने दिए गए धन से ही कुर्बानी का जानवर ख़रीदने की शर्त न रखी हो। जहाँ तक उन लोगों की बात है, जो सरकार या किसी और से किसी व्यक्ति का नाम लेकर झूठ बोलकर क़ुर्बानी का जानवर माँगते हैं, तो निस्संदेह यह हराम है, क्योंकि यह झूठ बोलकर खाने का एक रूप है। अल्लाह हमें और मुसलमानों को इससे बचाए रखे।
अध्याय
हाजियों और अन्य लोगों पर अम्र बिल मारूफ (नेकी का आदेश) की अनिवार्यता के विषय में
हाजियों और अन्य लोगों पर सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक अम्र बिल मारूफ (नेकी का आदेश) और नह्य अनिल मुन्कर (बुराई से रोकना) है, और पांचों वक्त की नमाज़ें जमात के साथ पढ़ना है, जैसा कि अल्लाह ने अपनी किताब में आदेश दिया है, और अपने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़ुबान से भी।
मक्का के निवासी तथा अन्य जगहों के बहुत से लोग जो मस्जिदों को छोड़ कर अपने घरों में नमाज़ पढ़ते हैं, यह उनकी बहुत बड़ी ग़लती एवं शरीअत का विरोध है, अतः इससे बचना अनिवार्य है, लोगों को इससे रोका जाना चाहिए और उन्हें मस्जिदों में पाबंदी के साथ नमाज़ पढ़ने का आदेश देना चाहिए, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि जब इब्ने उम्मे मक्तूम रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह अनुमति माँगी थी कि वे अपने घर में नमाज़ पढ़ लें क्योंकि वे अंधे थे और मस्जिद से उनका घर दूर था, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«هَلْ تَسْمَعُ النِّدَاءَ بِالصَّلَاةِ؟ قَالَ: نَعَمْ، قَالَ: فَأَجِبْ».
"क्या तुम नमाज़ की पुकार (अर्थात: अज़ान) सुनते हो? उन्होंने कहा : हाँ। तो आपने फ़रमाया : तो (अज़ान का) जवाब दो (अर्थातः मस्जिद आओ)।"(92)
एक अन्य रिवायत के शब्द इस प्रकार हैं :
«لَا أَجِدُ لَكَ رُخْصَةً».
"मैं तुम्हारे लिए कोई छूट नहीं पाता।"(93)
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन भी है कि :
«لَقَدْ هَمَمْتُ أَنْ آمُرَ بِالصَّلَاةِ فَتُقَامَ، ثُمَّ آمُرَ رَجُلًا فَيَؤُمَّ النَّاسَ، ثُمَّ أَنْطَلِقَ إِلَى رِجَالٍ لَا يَشْهَدُونَ الصَّلَاةَ فَأُحَرِّقَ عَلَيْهِمْ بُيُوتَهُمْ بِالنَّارِ».
"मैंने इरादा किया कि नमाज़ का आदेश दूँ और जब नमाज़ (जमात) खड़ी हो जाए, तो किसी आदमी को आदेश दूँ कि वह लोगों को नमाज़ पढ़ाए। फिर मैं उन लोगों के पास जाऊँ, जो नमाज़ में उपस्थित नहीं होते और उनके घरों को आग से जला दूँ।"(94)
तथा सुनन इब्ने माजह में इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से हसन सनद के साथ वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«مَنْ سَمِعَ النِّدَاءَ فَلَمْ يَأْتِ فَلَا صَلَاةَ لَهُ إِلَّا مِنْ عُذْرٍ».
"जिसने अज़ान सुनी और (मस्जिद) नहीं आया, उसकी नमाज़ नहीं (होगी)। हाँ किसी के पास न आने का कोई उचित कारण हो, तो बात अलग है।"(95)
तथा सहीह मुस्लिम में इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, कहते हैं : "जो व्यक्ति चाहता है कि वह कल अल्लाह से मुसलमान होने की हालत में मिले, उसे चाहिए कि इन नमाज़ों को उस जगह (मस्जिद) में पढ़ने की पाबंदी करे, जहाँ उनके लिए अज़ान दी जाती है, क्योंकि अल्लाह ने तुम्हारे नबी के लिए हिदायत का तरीका निर्धारित किया है और ये नमाज़ें हिदायत के तरीकों में से हैं। अगर तुम अपने घरों में नमाज़ पढ़ोगे, जैसे यह पीछे रहने वाला अपने घर में नमाज़ पढ़ता है, तो तुम अपने नबी की सुन्नत को छोड़ दोगे। और अगर तुम अपने नबी की सुन्नत को छोड़ दोगे, तो गुमराह हो जाओगे। जब भी कोई व्यक्ति वुज़ू करता है और अच्छी तरह से वुज़ू करता है, फिर इन मस्जिदों में से किसी मस्जिद की ओर चल देता है, तो अल्लाह उसके हर कदम पर एक नेकी लिखता है, एक दर्जा ऊँचा करता है और एक गुनाह माफ़ करता है। हमने देखा है कि हममें से कोई भी इससे पीछे नहीं रहता था, सिवाय उसके जो खुले तौर पर मुनाफ़िक़ हो, जिसके निफ़ाक का सबको पता होता था। ऐसा भी होता था कि एक आदमी को (कमज़ोरी या बीमारी के कारण) दो आदमियों के सहारे लाकर क़तार में खड़ा कर दिया जाता था।"(96)
हज्ज करने वालों और अन्य लोगों के लिए आवश्यक है कि वे अल्लाह तआला के द्वारा हराम की गई चीज़ों से बचें और उन्हें करने से सावधान रहें। जैसेः व्यभिचार, समलैंगिकता, चोरी, सूद खाना, अनाथ का धन खाना, लेन-देन में धोखा देना, अमानत में ख़यानत करना, नशीली चीज़ों का सेवन करना, धूम्रपान करना, कपड़ों को टख़नों के नीचे तक लटकाना, घमंड, जलन, दिखावा, पीठ पीछे बुराई करना, चुग़ली करना, मुसलमानों का मज़ाक़ उड़ाना, मनोरंजन के उपकरणों, जैसे रिकॉर्ड प्लेयर, वीणा, सारंगी, बांसुरी आदि का उपयोग करना, गाने सुनना, संगीत के उपकरणों का इस्तेमाल करना, चाहे वह रेडियो से हो या अन्य किसी माध्यम से, पासे (डाइस) खेलना, शतरंज खेलना, जुए के माध्यम से लेन-देन करना, और जानदारों (मानव या अन्य प्राणियों) की तस्वीरें बनाना और इस पर राज़ी होना। ये सारी चीज़ें उन वर्जित बुराइयों में शामिल हैं, जिन्हें अल्लाह ने अपने बंदों पर हर समय और हर स्थान में हराम ठहराया है। अतः हज्ज करने वालों तथा मक्का के आस-पास रहने वालों को अन्य लोगों की तुलना में इन चीज़ों से अधिक बच कर रहना चाहिए, क्योंकि, इस पवित्र स्थान में ग़लतियाँ करने का गुनाह ज्यादा बड़ा होता है और सज़ा भी अधिक होती है।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :
﴿...وَمَنْ يُرِدْ فِيهِ بِإِلْحَادٍ بِظُلْمٍ نُّذِقْهُ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ 25﴾
"...और जो भी उसमें किसी अत्याचार के साथ सत्य से दूरी का इरादा करेगा, हम उसे दुःखदायी यातना चखाएँगे।" [सूरह हज्ज : 25]।
यदि अल्लाह ने काबा में अनीति और ज़ुल्म करने की इच्छा रखने वालों को सज़ा की धमकी दी है, तो जो व्यक्ति ऐसा करेगा, उसकी सज़ा निश्चित रूप से अधिक और कठोर होगी, अतः इससे बचने और अन्य सभी ग़लतियों से दूर रहने की पूरी कोशिश करनी चाहिए।
हज्ज करने वालों को हज्ज का सवाब और पापों की माफ़ी तभी मिलेगी जब वे इन ग़लतियों और दूसरी उन चीज़ों से बचेंगे, जिन्हें अल्लाह ने उन पर हराम किया है, जैसा कि उस हदीस में आया है, जिसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«مَنْ حَجَّ فَلَمْ يَرْفُثْ وَلَمْ يَفْسُقْ رَجَعَ كَيَوْمِ وَلَدَتْهُ أُمُّهُ».
"जिसने हज्ज किया तथा हज्ज के दिनों में बुरी बात एवं बुरे कार्यों से बचा एवं अवज्ञा से दूर रहा, वह उस दिन की तरह लौटेगा, जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था।"(97)
इन मना की गई चीज़ों से भी अधिक गंभीर और बड़ी बुराईयां हैं : मरे हुए लोगों से दुआ मांगना, उनसे मदद की गुहार लगाना, उनके नाम पर मन्नतें मानना, तथा उनके लिए बलि चढ़ाना, यह उम्मीद करते हुए कि वे अपने से मांगने वाले लोगों के लिए अल्लाह के पास शफ़ाअत (सिफ़ारिश) करेंगे, या किसी के मरीज़ को ठीक करेंगे, या किसी के ग़ायब (लापता) को वापस लाएंगे, और इसी प्रकार की अन्य चीज़ें।
यह सबसे बड़ा शिर्क है, जिसे अल्लाह ने हराम किया है, यह जाहिलिय्यत (अज्ञानता) युग में मुशरिकों का धर्म था, अल्लाह ने इसी से रोकने एवं इसे निषेध करने के लिए पैग़म्बर भेजे और किताबें उतारीं।
अतः हरेक हज्ज करने वाले और अन्य सभी व्यक्तियों पर यह अनिवार्य है कि वे इससे सावधान रहें, और यदि भूतकाल में उनसे ऐसा कुछ हुआ हो तो अल्लाह से तौबा करें, तथा इस प्रकार की चीज़ों से तौबा करने के पश्चात एक नया हज्ज करें, क्योंकि महा शिर्क (शिर्क -ए- अकबर) सारे अमल (कर्म) को नष्ट कर देता है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया है :
﴿...وَلَوْ أَشْرَكُوا لَحَبِطَ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ 88﴾
"...और यदि ये लोग शिर्क करते, तो निश्चय उनसे वह सब नष्ट हो जाता जो वे किया करते थे।" [सूरह अनआम : 88]।
तथा शिर्क -ए- असग़र (छोटा शिर्क) का एक प्रकार : ग़ैरुल्लाह की क़सम खाना भी है, जैसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़सम खाना, काबा की क़सम खाना तथा अमानत की क़सम खाना इत्यादि।
इसी प्रकार : रियाकारी (दिखावा), प्रसिद्धि की लालसा (सुम्आ), तथा यह कहना: जो अल्लाह और आप चाहें, एवं यदि अल्लाह और आप न होते, तथा यह अल्लाह और आप की ओर से है, एवं इसी प्रकार की अन्य बातें भी शिर्क -ए- असग़र में से हैं।
इस तरह के समस्त शिर्क से संबंधित बुराइयों से बचना आवश्यक है, तथा इन्हें छोड़ने की नसीहत करनी भी ज़रूरी है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि आप ने फ़रमाया :
«مَنْ حَلَفَ بِغَيْرِ اللهِ فَقَدْ كَفَرَ أَوْ أَشْرَكَ».
"जिसने अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की क़सम खाई, उसने क़ुफ़्र अथवा शिर्क किया।"(98) इसे अहमद, अबू दावूद एवं तिर्मिज़ी ने सहीह सनद के साथ रिवायत किया है।
तथा सहीह में उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«مَنْ كَانَ حَالِفًا فَلْيَحْلِفْ بِاللهِ أَوْ لِيَصْمُتْ».
"जिसे क़सम खानी ही हो, उसे केवल अल्लाह की क़सम खानी चाहिए या फिर चुप रहना चाहिए।"(99)
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह भी फ़रमाया है :
«مَنْ حَلَفَ بِالأَمَانَةِ فَلَيْسَ مِنَّا».
"जिसने अमानत की क़सम खाई, वह हम में से नहीं है।"(100) इसे अबू दावूद ने रिवायत किया है।
एक और हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«أَخْوَفُ مَا أَخَافُ عَلَيْكُمُ الشِّرْكَ الأَصْغَرَ، فَسُئِلَ عَنْهُ فَقَالَ: الرِّيَاءُ».
"सबसे अधिक जिस चीज़ का मुझे तुम लोगों पर भय है, वह छोटा शिर्क है। आपसे इसके बारे में पूछा गया, तो आपने फ़रमाया : रियाकारी अर्थात दिखावा।"(101)
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक और अवसर पर फ़रमाया है:
«لَا تَقُولُوا: مَا شَاءَ اللهُ وَشَاءَ فُلَانٌ، وَلَكِنْ قُولُوا مَا شَاءَ اللهُ ثُمَّ شَاءَ فُلَانٌ».
"तुम 'जो अल्लाह चाहे एवं अमुक चाहे' न कहो, बल्कि 'जो अल्लाह चाहे फिर अमुक चाहे' कहो।"(102)
इमाम नसई ने अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है कि एक व्यक्ति ने कहा किः ऐ अल्लाह के रसूल! वही होगा जो अल्लाह चाहे और आप चाहें। यह सुन कर आपने कहा :
«أَجَعَلْتَنِي لِلَّهِ نِدًّا، بَلْ مَا شَاءَ اللهُ وَحْدَهُ».
"क्या तुमने मुझे अल्लाह का समकक्ष बना दिया? केवल 'जो अल्लाह चाहे' कहो।"(103)
ये हदीसें इस बात का प्रमाण हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तौहीद (एकेश्वरवाद) की उत्तम सुरक्षा की और अपनी उम्मत को बड़े और छोटे शिर्क (बहुदेववाद) से सावधान किया, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी उम्मत के ईमान की सुरक्षा एवं अल्लाह के अज़ाब और ग़ज़ब (क्रोध) से उन्हें बचाने हेतु अत्यंत चिंतित रहते थे, अल्लाह तआला आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को इसका सर्वोत्तम बदला प्रदान करे। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस्लाम का संदेश पूरी तरह पहुँचा दिया, सावधान कर दिया, और अल्लाह तथा उसके बंदों के लिए ख़ैरख़्वाही (शुभचिंतन) की, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर क़ियामत के दिन तक लगातार सलामती और रहमत (शांति व दया) नाज़िल होती रहे।
हज्ज करने वाले एवं मक्का-मदीना में रहने वाले उलमा (विद्वानों) की ज़िम्मेदारी है कि लोगों को वह बातें सिखाएँ, जो उन्हें करना है और उन्हें विभिन्न प्रकार के शिर्क एवं गुनाह आदि उन चीज़ों से सावधान करें जो उन्हें नहीं करना है। उन्हें प्रमाणों के साथ स्पष्ट रूप से इन बातों को समझाना चाहिए, ताकि लोग अंधेरे से उजाले की ओर आ सकें और ख़ुद अल्लाह के दीन को पहुँचाने की ज़िम्मेवारी को सही ढंग से अदा कर सकें। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ لَتُبَيِّنُنَّهُ لِلنَّاسِ وَلَا تَكْتُمُونَهُ...﴾
"तथा (ऐ नबी! याद करो) जब अल्लाह ने किताब वालों से पक्का वचन लिया था कि तुम अवश्य इसे लोगों के सामने बयान करते रहोगे और इसे छुपाओगे नहीं...।" [सूरह आल-ए-इमरान : 187]।
इस (आयत) का उद्देश्य यह है कि इस उम्मत के उलमा (विद्वानों) को अहल -ए- किताब (यहूद व नस़ारा) में से उन लोगों के रास्ते पर चलने से सावधान किया जाए जिन्होंने हक़ (सत्य) को छिपाया, संसार के तात्कालिक जीवन को आख़िरत (परलोक) पर वरीयता दी, चुनाँचे अल्लाह तआला ने फरमाया है :
﴿إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ وَالْهُدَى مِنْ بَعْدِ مَا بَيَّنَّاهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتَابِ أُولَئِكَ يَلْعَنُهُمُ اللَّهُ وَيَلْعَنُهُمُ اللَّاعِنُونَ159 إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا وَأَصْلَحُوا وَبَيَّنُوا فَأُولَئِكَ أَتُوبُ عَلَيْهِمْ وَأَنَا التَّوَّابُ الرَّحِيمُ 160﴾
"निःसंदेह जो लोग उसको छिपाते हैं जो हमने स्पष्ट प्रमाणों और मार्गदर्शन में से उतारा है, इसके बाद कि हमने उसे लोगों के लिए किताब में स्पष्ट कर दिया है, उन पर अल्लाह लानत करता है और सब लानत करने वाले उन पर लानत करते हैं। परंतु वे लोग जिन्होंने तौबा कर लिया और सुधार कर लिया और खोलकर बयान कर दिया, तो ये वो लोग हैं जिनकी मैं तौबा स्वीकार करता हूँ और मैं बहुत ही तौबा क़बूल करने वाला, अत्यंत दयावान् हूँ।" [सूरह बक़रा : 159-160]।
क़ुरआनी आयतों और हदीसों ने इस बात की ओर इशारा किया है कि अल्लाह की ओर दावत देना और इंसानों को उनके उद्देश्य (अर्थात अल्लाह की इबादत) की ओर मार्गदर्शन करना, अल्लाह का नैकट्य प्राप्त करने का सबसे उत्कृष्ट माध्यम तथा सबसे महत्वपूर्ण फ़र्ज़ है, यह पैग़म्बरों और उनके अनुयायियों का रास्ता है, जो क़ियामत तक जारी रहेगा, जैसाकि अल्लाह तआला ने फरमाया है :
﴿وَمَنْ أَحْسَنُ قَوْلًا مِمَّنْ دَعَا إِلَى اللَّهِ وَعَمِلَ صَالِحًا وَقَالَ إِنَّنِي مِنَ الْمُسْلِمِينَ 33﴾
"और उस व्यक्ति से अच्छी बात किस की हो सकती है, जिसने अल्लाह की ओर बुलाया तथा सत्कर्म किया और कहा : निःसंदेह मैं मुसलमानों (आज्ञाकारियों) में से हूँ।" [सूरह फ़ुस्सिलत : 33]।
एक अन्य स्थान में सर्वोच्च अल्लाह का फ़रमान है :
﴿قُلْ هَذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ عَلَى بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ 108﴾
"(ऐ नबी!) आप कह दें : यही मेरा रास्ता है। मैं और मेरा अनुसरण करने वाले पूर्ण अंतर्दृष्टि तथा स्पष्ट प्रमाण के साथ अल्लाह की ओर बुलाते हैं। तथा अल्लाह पवित्र है और मैं मुश्रिकों (बहुदेववादियों) में से नहीं हूँ।" [सूरह यूसुफ़ : 108]।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«مَنْ دَلَّ عَلَى خَيْرٍ فَلَهُ مِثْلُ أَجْرِ فَاعِلِهِ».
"जिसने किसी अच्छे काम की राह दिखाई, उसे उसके करने वाले के बराबर सवाब मिलेगा।"(104)
«لَأَنْ يَهْدِيَ اللهُ بِكَ رَجُلًا وَاحِدًا خَيْرٌ لَكَ مِنْ حُمْرِ النَّعَمِ».
"यदि अल्लाह तुम्हारे द्वारा एक व्यक्ति को भी मार्गदर्शन दे दे, तो यह तुम्हारे लिए लाल रंग के ऊंटों से बेहतर है।"(105)
इस आशय की आयतें और हदीसें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
अतः ज्ञान एवं ईमान वाले लोगों पर यह ज़िम्मेदारी है कि वे अल्लाह की ओर दावत देने में अपनी मेहनत को और भी बढ़ा दें, लोगों को मुक्ति के रास्तों की ओर मार्गदर्शन करें, और उन्हें विनाश के कारणों से सावधान करें, विशेष रूप से इस युग में जहां वासना का प्रभुत्व है, विध्वंसकारी सिद्धांत और भ्रामक नारे फैल चुके हैं, और जहां हिदायत की ओर बुलाने वाले लोग कम हो गए हैं तथा नास्तिकता और अश्लीलता की ओर बुलाने वाले बढ़ गए हैं, अल्लाह ही मदद करने वाला है, और उच्च एवं महान अल्लाह की मदद के बिना न बुराई से फिरने की कोई शक्ति है और न ही नेकी करने का सामर्थ्य।
अध्याय
आज्ञाकारिता के कार्यों में अधिकाधिक लगे रहने के मुस्तहब (प्रिय) होने के विषय में
हज्ज करने वालों के लिए यह मुस्तहब है कि वे मक्का में अपने निवास की अवधि के दौरान अल्लाह का ज़िक्र, आज्ञाकारिता एवं सदाचारिता के कार्यों को अधिकाधिक अंजाम दें, उन्हें नमाज़ और तवाफ़ (काबा के चारों ओर चक्कर लगाना) में अधिक से अधिक समय बिताना चाहिए, क्योंकि हरम (पवित्र क्षेत्र) में अच्छे कर्मों का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है, और बुरे कर्मों का पाप भी बहुत बड़ा होता है, साथ ही, यह भी मुस्तहब है कि वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अधिकाधिक दुरूद व सलाम भेजते रहा करें।
जब हज्ज करने वाले लोग मक्का छोड़ने का इरादा करें, तो उनके लिए काबा का तवाफ़ -ए- वदा करना वाजिब (अनिवार्य) है, ताकि काबा के साथ उनका आखिरी संबंध इस तवाफ़ के माध्यम से हो, किंतु जो महिलाएं हैज़ (माहवारी) या निफ़ास (प्रसव) की स्थिति में हों, उन पर तवाफ़ -ए- वदा अनिवार्य नहीं है, जैसा कि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित हदीस में आया है कि :
«أُمِرَ النَّاسُ أَنْ يَكُونَ آخِرُ عَهْدِهِمْ بِالبَيْتِ، إِلَّا أَنَّهُ خُفِّفَ عَنِ المَرْأَةِ الحَائِضِ».
"लोगों को आदेश दिया गया है कि उनका अंतिम कार्य काबा का तवाफ़ हो। हाँ, मगर माहवारी के दिनों वाली स्त्री के लिए इस से छूट रखी गई है।"(106)
जब वह काबा का तवाफ़ -ए- वदा पूरा कर ले और मस्जिद से बाहर जाने का इरादा करे, तो उसे सीधे मुंह चलते हुए मस्जिद से निकल जाना चाहिए, उसके लिए कदापि उचित नहीं है कि उल्टे पाँव चल कर मस्जिद से बाहर निकले, क्योंकि यह न तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से और न ही उनके सहाबा से प्रमाणित है, बल्कि यह एक नई चीज़ (बिद्'अत) है, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके संबंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह अग्रहणीय है।"(107)
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है :
إِيَّاكُمْ وَمُحْدَثَاتِ الأُمُورِ، فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٌ، وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
''दीन के मामले में नई चीज़ें आविष्कार करने से बचो, क्योंकि प्रत्येक नई चीज़ बिद्अत है, एवं हर बिद्अत गुमराही (पथभ्रष्टता) है।''(108)
दुआ है कि अल्लाह हमें अपने दीन पर सुदृढ़ तथा दीन विरोधी चीज़ों से सुरक्षित रखे। निश्चय ही वह दाता एवं कृपावान है।
अध्याय
मस्जिद -ए- नबवी की ज़ियारत (दर्शन) के अहकाम एवं उसके शिष्टाचार के विषय में
हज्ज से पहले या बाद में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मस्जिद की ज़ियारत (दर्शन) करना सुन्नत है, जैसा कि सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«صَلَاةٌ فِي مَسْجِدِي هَذَا خَيْرٌ مِنْ أَلْفِ صَلَاةٍ فِيمَا سِوَاهُ إِلَّا المَسْجِدَ الحَرَامَ».
"मेरी इस मस्जिद में पढ़ी गई एक नमाज़ मस्जिद -ए- हराम को छोड़ अन्य मस्जिदों में पढ़ी गई एक हज़ार नमाज़ों से उत्तम है।"(109)
तथा इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
«صَلَاةٌ فِي مَسْجِدِي هَذَا أَفْضَلُ مِنْ أَلْفِ صَلَاةٍ فِيمَا سِوَاهُ إِلَّا المَسْجِدَ الحَرَامَ».
"मेरी इस मस्जिद में पढ़ी गई एक नमाज़ मस्जिद -ए- हराम को छोड़ अन्य मस्जिदों में पढ़ी गई एक हज़ार नमाज़ों से अफ़ज़ल (बेहतर) है।"(110) इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
तथा अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«صَلَاةٌ فِي مَسْجِدِي هَذَا أَفْضَلُ مِنْ أَلْفِ صَلَاةٍ فِيمَا سِوَاهُ إِلَّا المَسْجِدَ الحَرَامَ، وَصَلَاةٌ فِي المَسْجِدِ الحَرَامِ أَفْضَلُ مِنْ مِائَةِ صَلَاةٍ فِي مَسْجِدِي هَذَا».
"मेरी इस मस्जिद (मस्जिद -ए- नबवी) में पढ़ी गई एक नमाज़, अन्य किसी मस्जिद में पढ़ी गई एक हज़ार नमाज़ों से बेहतर है, सिवाय मस्जिद -ए- हराम के, तथा मस्जिद -ए- हराम में पढ़ी गई एक नमाज़, मेरी इस मस्जिद में पढ़ी गई सौ नमाज़ों से बेहतर है।"(111) इस हदीस को इमाम अहमद, इब्ने ख़ुज़ैमा एवं इब्ने हिब्बान ने रिवायत किया है।
तथा जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«صَلَاةٌ فِي مَسْجِدِي هَذَا أَفْضَلُ مِنْ أَلْفِ صَلَاةٍ فِيمَا سِوَاهُ، إِلَّا المَسْجِدَ الحَرَامَ، وَصَلَاةٌ فِي المَسْجِدِ الحَرَامِ أَفْضَلُ مِنْ مِائَةِ أَلْفِ صَلَاةٍ فِيمَا سِوَاهُ».
"मेरी इस मस्जिद (मस्जिद -ए- नबवी) में पढ़ी गई एक नमाज़, अन्य किसी मस्जिद में पढ़ी गई एक हज़ार नमाज़ों से बेहतर है, सिवाय मस्जिद -ए- हराम के, तथा मस्जिद -ए- हराम में पढ़ी गई एक नमाज़, अन्य किसी मस्जिद में पढ़ी गई एक लाख नमाज़ों से बेहतर है।"(112) इसे अहमद एवं इब्न -ए- माजह ने रिवायत किया है।
हदीस की किताबों में इस आशय की अनेक हदीसें मौजूद हैं।
ज़ियारत करने वाला जब मस्जिद -ए- नबवी पहुँचे, तो प्रवेश के समय पहले अपना दाया पाँव अंदर रखे और यह दुआ पढ़े : "बिस्मिल्लाहि, वस़्स़लातु वस्सलामु अला रसूलिल्लाहि, अऊज़ुबिल्लाहिल अज़ीम व बिवज्हिहिल करीम व सुल्त़ानिहिल क़दीम मिनश्शैत़ानिर्रजीम, अल्लाहुम्मा इफ़्तह़ ली अब्वाबा रह़मतिका (मैं अल्लाह के नाम से प्रवेश करता हूँ, तथा अल्लाह की कृपा एवं शांति की बरखा बरसे उसके रसूल पर। मैं महान अल्लाह, उसके महिमामय चेहरे तथा उसके आदिम राज्य की शरण लेता हूँ धिक्कारित शैतान से। ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी दया के द्वार खोल दे)।"
यही दुआ अन्य मस्जिदों में प्रवेश करते समय भी पढ़ी जाती है। मस्जिद -ए- नबवी में प्रवेश करते समय कोई विशेष दुआ प्रमाणित नहीं है। फिर दो रक्अत नमाज़ पढ़े, तथा इन दो रक्अतों में अल्लाह से अपनी इच्छा के अनुसार दुनिया और आख़िरत की भलाई मांगे। यदि इन दोनों रक्अतों को रौज़ा -ए- शरीफ़ा में पढ़े, तो ज़्यादा अच्छा है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«مَا بَيْنَ بَيْتِي وَمِنْبَرِي رَوْضَةٌ مِنْ رِيَاضِ الجَنَّةِ».
"मेरे घर और मेरे मिंबर (मंच) के बीच का भाग जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ है।"(113)
फिर नमाज़ के बाद पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत करे, तथा उनके साथी अबू बक्र और उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की क़ब्रों की भी ज़ियारत करे, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र के सामने आदर एवं धीमी आवाज़ के साथ खड़े हो कर उन्हें सलाम करते हुए इस प्रकार कहे : 'अस्सलामु अलैका, या रसूलल्लाहि व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु (हे अल्लाह के रसूल, आप पर अल्लाह की ओर से शांति, दया एवं कल्याण का अवतरण हो), जैसा कि सुनन अबू दावूद में हसन सनद के साथ अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«مَا مِنْ أَحَدٍ يُسَلِّمُ عَلَيَّ إِلَّا رَدَّ اللهُ عَلَيَّ رُوحِي حَتَّى أَرُدَّ عَلَيْهِ السَّلَامَ».
"जब कोई बंदा मुझ पर सलाम पढ़ता है, तो अल्लाह मुझे मेरी आत्मा लौटा देता है, ताकि मैं उसे सलाम का उत्तर दे दूँ।"(114)
तथा यदि ज़ियारत करने वाला अपने सलाम में कहे : "शांति हो आप पर ऐ अल्लाह के नबी! शांति हो आप पर ऐ अल्लाह की सर्वोत्तम सृष्टि! शांति हो आप पर ऐ रसूलों के सरदार! मैं गवाही देता हूँ कि आप ने संदेश पहुँचा दिया है, अमानत अदा कर दी है, उम्मत का शुभचिंतन कर दिया है तथा अल्लाह के बारे में उसी प्रकार का प्रयास किया है, जिस प्रकार का प्रयास होना चाहिए।", तो इसमें आपत्ति की कोई बात नहीं है। क्योंकि यह सब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के गुण हैं। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजे एवं आप के लिए दुआ करे, क्योंकि शरीअत में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद एवं सलाम को एक साथ पढ़ने की वैधता स्पष्ट रूप से प्रमाणित है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :
﴿إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا 56﴾
"निःसंदेह अल्लाह तथा उसके फ़रिश्ते नबी पर दुरूद भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम (भी) उन पर दुरूद तथा बहुत सलाम भेजा करो।" [सूरह अहज़ाब: 56]।
फिर अबू बक्र और उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा पर सलाम भेजे तथा उन दोनों के लिए दुआ करे एवं उन दोनों के लिए अल्लाह से यह प्रार्थना करे कि अल्लाह उन से राज़ी हो जाए।
तथा इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनके दोनों साथियों पर सलाम भेजते, तो प्रायः यह कहने के अतिरिक्त कुछ नहीं कहते : "अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह, अस्सलामु अलैका या अबा बक्र, अस्सलामु अलैका या अबताह" (अर्थात : आप पर सलाम हो, ऐ अल्लाह के रसूल, आप पर सलाम हो, ऐ अबू बक्र एवं आप पर सलाम हो, हे मेरे पिता।) फिर लौट जाते।
तथा यह ज़ियारत विशेष रूप से केवल पुरुषों के लिए मशरूअ् (वैध) है, और जहां तक महिलाओं की बात है तो उनके लिए किसी भी क़ब्र की ज़ियारत करना वैध नहीं है, जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि आपने:
«لَعَنَ زُوَّارَاتِ القُبُورِ مِنَ النِّسَاءِ وَالمُتَّخِذِينَ عَلَيْهَا المَسَاجِدَ وَالسُّرُجَ».
"क़ब्रों की बहुत ज़्यादा ज़ियारत करने वाली महिलाओं और क़ब्रों पर मस्जिदें बनाने वालों तथा चिराग जलाने वालों पर लानत (धिक्कार) भेजी है।"(115)
जहां तक मस्जिद -ए- नबवी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम में नमाज़ पढ़ने, दुआ करने तथा ऐसे सभी कार्यों को करने के उद्देश्य से मस्जिद -ए- नबवी की यात्रा करने की बात है, जो अन्य मस्जिदों में भी मशरूअ् (वैध) हैं तो ऐसा करना सभी लोगों के लिए जायज़ है, जैसा कि इस संबंध में पूर्वोल्लेखित हदीसें इस को प्रमाणित करती हैं।
ज़ियारत करने वाले के लिए सुन्नत है कि वह मस्जिद -ए- नबवी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम में पांचों वक्त की नमाज़ें अदा करे, और वहां अधिक से अधिक ज़िक्र, दुआ और नफ्ल नमाज़ पढ़े, ताकि इस अमल के बड़े सवाब से लाभ उठा सके।
तथा यह मुस्तहब है कि वह रौज़ा शरीफ़ में अधिक से अधिक नफ्ल नमाज़ पढ़े, क्योंकि इससे पहले सही हदीस में इसकी फज़ीलत का उल्लेख आ चुका है, जो कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान है :
«مَا بَيْنَ بَيْتِي وَمِنْبَرِي رَوْضَةٌ مِنْ رِيَاضِ الجَنَّةِ».
"मेरे घर और मेरे मिंबर के बीच का भाग जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ है।"(116)
जहां तक फ़र्ज़ नमाज़ का सवाल है, तो ज़ियारत करने वाले तथा अन्य लोगों पर यह ज़िम्मेदारी है कि वे इन्हें अदा करने हेतु आगे बढ़ें, तथा जहाँ तक संभव हो पहले सफ़्फ़ (प्रथम पंक्ति) में नमाज़ पढ़ने का प्रयास करें, यद्यपि प्रथम पंक्ति वह हो जिसका क़िबला की ओर विस्तार हुआ है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित सहीह हदीसों में आप ने पहली पंक्ति में रहने के लिए प्रोत्साहित एवं प्रेरित किया है, जैसे कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन है :
«لَوْ يَعْلَمُ النَّاسُ مَا فِي النِّدَاءِ وَالصَّفِّ الأَوَّلِ ثُمَّ لَمْ يَجِدُوا إِلَّا أَنْ يَسْتَهِمُوا عَلَيْهِ لَاسْتَهَمُوا».
''यदि लोग जानते कि अज़ान एवं पहली पंक्ति की क्या नेकी है, तो यदि इसे पाने के लिए उनको क़ुरआ (लॉटरी) निकालना पड़ता तो वह ऐसा भी करते।''(117) बुख़ारी व मुस्लिम।
इसी प्रकार आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा से फ़रमाया :
«تَقَدَّمُوا فَأْتَمُّوا بِي وَلْيَأْتَمَّ بِكُمْ مَنْ بَعْدَكُمْ، وَلَا يَزَالُ الرَّجُلُ يَتَأَخَّرُ عَنِ الصَّلَاةِ حَتَّى يُؤَخِّرَهُ اللهُ».
"आगे बढ़ो तथा मेरा अनुसरण करो एवं तुम्हारा अनुसरण तुम्हारे बाद वाले करें। आदमी जब निरंतर नमाज़ में पीछे होता रहता है, तो अल्लाह भी उसे पीछे कर देता है।"(118) इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू दावूद ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से हसन सनद के साथ रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«لَا يَزَالُ الرَّجُلُ يَتَأَخَّرُ عَنِ الصَّفِّ المُقَدَّمِ حَتَّى يُؤَخِّرَهُ اللهُ فِي النَّارِ».
"आदमी पहली पंक्ति से लगातार पीछे होता रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह उसे पीछे करके जहन्नम में डाल देगा।"(119)
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि आप ने अपने सहाबा से फ़रमाया :
«أَلَا تَصُفُّونَ كَمَا تَصُفُّ المَلَائِكَةُ عِنْدَ رَبِّهَا؟ قَالُوا: يَا رَسُولَ اللهِ، وَكَيْفَ تَصُفُّ المَلَائِكَةُ عِنْدَ رَبِّهَا؟ قَالَ: يُتِمُّونَ الصُّفُوفَ الأُوَلَ، وَيَتَرَاصُّونَ فِي الصَّفِّ».
"तुम उस प्रकार से पंक्ति क्यों नहीं बनाते जिस प्रकार से फ़रिश्ते अपने रब के पास बनाते हैं!? उन्होंने पूछा : "ऐ अल्लाह के रसूल! फरिश्ते अपने रब के पास कैसी पंक्तियाँ बनाते हैं!? नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : सर्वप्रथम पहली पंक्तियों को पूरा करते हैं, और पंक्तियों में एक दूसरे से मिल कर खड़े होते हैं।"(120) इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस संदर्भ में हदीसें बहुतायत से हैं, जो कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मस्जिद एवं अन्य मस्जिदें, दोनों पर लागू होती हैं। विस्तार से पहले भी और विस्तार के बाद भी। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह भी प्रमाणित है कि आप अपने साथियों को सफ़ों के दाहिने हिस्सों में खड़ा होने के लिए प्रेरित करते थे तथा यह विदित है कि प्राचीन मस्जिद -ए- नबवी की पंक्तियों के दाहिने भाग रियाज़ुल जन्नत के बाहर हुआ करते थे। इससे पता चलता है कि प्रथम पंक्ति तथा पंक्तियों के दाहिने भागों में नमाज़ पढ़ने की पाबंदी करना, रियाज़ुल जन्नत में नमाज़ पढ़ने की पाबंदी करने से उत्तम है। जो व्यक्ति इस संबंध में वर्णित हदीसों पर विचार करेगा, उसके लिए यह बात स्पष्ट हो जाएगी। सुयोग तो बस अल्लाह ही प्रदान करता है।
और किसी को भी हुजरा (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर) से चिपकने, उसे चूमने या उसके चारों ओर तवाफ़ करने की अनुमति नहीं है, क्योंकि ऐसा करना सलफ सालेह (सदाचारी पूर्वजों) से वर्णित नहीं है, बल्कि यह बिद्अत (नवाचार) है जो कि नकारने योग्य है।
किसी के लिए जायज़ नहीं है कि वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से किसी आवश्यकता की पूर्ति, चिंता को दूर करने या बीमार के ठीक होने आदि की दुआ मांगे। क्योंकि यह चीज़ें केवल अल्लाह से मांगी जानी चाहिए। दरअसल मरे हुए लोगों से मांगना अल्लाह के साथ शिर्क (साझेदारी) करना और ग़ैरुल्लाह की इबादत करना है। ध्यान रहे कि इस्लाम धर्म दो मूल सिद्धांतों पर क़ायम है :
एक यह कि : अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की इबादत न की जाए।
और दूसरा यह कि : इबादत केवल अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बताए हुए तरीक़े के अनुसार की जाए।
तथा यही "ला इलाहा इलल्लाह" और "मुहम्मदुर् रसूलुल्लाह" की गवाही का अर्थ है।
तथा इसी प्रकार, किसी को भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से शफाअत (सिफ़ारिश) की मांग नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह अल्लाह के स्वामित्व में है, अतः उसे केवल अल्लाह से ही मांगा जा सकता है, जैसा कि अल्लाह तआला ने कहा है :
﴿قُلْ لِلَّهِ الشَّفَاعَةُ جَمِيعًا...﴾
"आप कह दें कि सिफ़ारिश तो सब अल्लाह के अधिकार में है...।" [सूरह ज़ुमर : 44]।
किंतु आप इस प्रकार कह सकते हैं: "हे अल्लाह! अपने नबी को मेरा सिफारिशी बना, हे अल्लाह! अपने फ़रिश्तों को मेरा सिफारिशी बना, और अपने ईमानवाले बंदों को मेरा सिफारिशी बना, हे अल्लाह! मेरे बच्चों को मेरा सिफारिशी बना।" तथा इसी प्रकार के अन्य वाक्य कह सकते हैं। और जहां तक मृतकों का सवाल है, तो उनसे कुछ भी नहीं मांगा जा सकता, न शफाअत और न कुछ दूसरी चीज़, चाहे वे नबी हों या अन्य, क्योंकि यह शरीअत में वैध नहीं किया गया है, और इसलिए भी कि मृत व्यक्ति का कार्य समाप्त हो चुका है, सिवाय उसके जिसे शरीअत ने अपवाद के रूप में निर्धारित किया हो।
सहीह मुस्लिम में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«إِذَا مَاتَ ابْنُ آدَمَ انْقَطَعَ عَمَلُهُ إِلَّا مِنْ ثَلَاثٍ: صَدَقَةٍ جَارِيَةٍ، أَوْ عِلْمٍ يُنْتَفَعُ بِهِ، أَوْ وَلَدٍ صَالِحٍ يَدْعُو لَهُ».
"जब इन्सान की मौत हो जाती है, तो तीन चीज़ों के अलावा उसके सारे कर्म रुक जाते हैं; जारी रहने वाला सदक़ा, ऐसा ज्ञान जिससे लाभ उठाया जाए अथवा ऐसी नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करे।"(121)
केवल नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन काल में शफाअत का प्रश्न करना जायज़ था तथा क़ियामत के दिन भी जायज़ होगा, क्योंकि उन्हें इसकी क्षमता प्राप्त है, वे आगे बढ़कर अपने रब से मांग सकते हैं, जहाँ तक इस संसार में आप से शफाअत (सिफारिश) की बात है तो यह स्पष्ट है, यह केवल आप के साथ विशिष्ट नहीं है, अपितु सभी के लिए है, अतः एक मुसलमान के लिए जायज़ है कि वह अपने भाई से कह सकता है : 'मेरे लिए मेरे रब से ऐसी-ऐसी शफाअत कर दो, अर्थात : मेरे लिए अल्लाह से दुआ कर दो, और जिससे यह कहा जाए उसके लिए भी जायज़ है कि वह अल्लाह से दुआ कर सकता है और अपने भाई के लिए शफाअत कर सकता है, जब तक वह मांग उस चीज़ से संबंधित हो, जिसे अल्लाह ने मांगने की अनुमति दी है।
और जहां तक क़ियामत के दिन की बात है, तो उस दिन किसी को भी अल्लाह की अनुमति के बिना सिफारिश करने का अधिकार नहीं होगा, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया है :
﴿...مَنْ ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ...﴾
"...कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) करे...?" [सूरह बक़रा : 255]।
जहां तक मृत्यु की स्थिति की बात है, तो यह एक विशेष स्थिति है जिसे मानव की मृत्यु से पहले या पुनरुत्थान एवं पुनः जीवित होने के बाद की स्थिति से नहीं जोड़ा जा सकता। क्योंकि मृतक का कार्य समाप्त हो जाता है, और उसका पारिश्रमिक उसकी कमाई पर आधारित होता है, सिवाय उन चीजों के जो शरीअत द्वारा इस दायरे से अलग रखे गए हैं। जबकि मृतकों से सिफ़ारिश तलब करना उन चीजों में से नहीं है, जिन्हें शरीअत ने इस दायरे से अलग रखा है। अतः इसे उससे जोड़ना उचित नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी मृत्यु के बाद बर्ज़खी (मध्यवर्ती) जीवन में जीवित हैं, जो शहीदों के जीवन से अधिक पूर्ण है। लेकिन यह जीवन उनकी मौत से पहले के जीवन जैसा नहीं है, और न ही यह क़ियामत के दिन के जीवन जैसा है। बल्कि, यह एक ऐसा जीवन है जिसकी वास्तविकता एवं स्थिति को केवल अल्लाह ही जानता है। यही कारण है कि एक हदीस आप पीछे पढ़ आए हैं, जिसमें है :
«مَا مِنْ أَحَدٍ يُسَلِّمُ عَلَيَّ إِلَّا رَدَّ اللهُ عَلَيَّ رُوحِي حَتَّى أَرُدَّ عَلَيْهِ السَّلَامَ».
"जब कोई बंदा मुझ पर सलाम भेजता है, तो अल्लाह मुझे मेरी आत्मा लौटा देता है, ताकि मैं उसके सलाम का उत्तर दे दूँ।"(122)
इससे यह प्रमाणित होता है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु हो चुकी है तथा आपकी आत्मा आपके शरीर का साथ छोड़ चुकी है, किंतु वह सलाम के समय लौटाई जाती है। क़ुरआन एवं हदीस में आप की मृत्यु के प्रमाण स्पष्ट हैं, तथा यह विद्वानों के बीच सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया है, परंतु यह आप के बर्ज़खी (मृत्यु के बाद की) जीवन के विरुद्ध नहीं है, जैसे शहीदों की मृत्यु उनके बर्ज़खी जीवन के विरुद्ध नहीं है, जैसा कि अल्लाह तआला ने कहा है :
﴿وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا بَلْ أَحْيَاءٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَ 169﴾
"जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे गए हैं, उन्हें कदापि मृत न समझो, बल्कि वे जीवित हैं, अपने पालनहार के पास रोज़ी दिए जाते हैं।" [सूरह आल-ए-इमरान : 169]।
इस मसले को विस्तार से समझाने का उद्देश्य यह है कि इस संबंध में कई भ्रमित लोग मौजूद हैं, जो इस मुद्दे में गलती करते हैं और लोगों को, अल्लाह को छोड़ कर, मृतकों की इबादत करने तथा शिर्क की ओर बुलाते हैं। हम अल्लाह तआला से अपनी और समस्त मुसलमानों की सुरक्षा की दुआ करते हैं, ताकि हम सभी उस चीज़ से बच सकें जो उसकी शरीअत के विरुद्ध है।
और जहां तक कुछ ज़ाइरीन (तीर्थयात्रियों) द्वारा नबी सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम की क़ब्र पर आवाज़ ऊंची करने और वहां लंबे समय तक खड़ा रहने की बात है, तो यह सही नहीं है, क्योंकि अल्लाह तआला ने उम्मत को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आवाज़ से ऊपर आवाज़ उठाने से मना किया है, और एक-दूसरे से बात करते समय जिस तरह वे आवाज़ ऊँची करते हैं उस तरह से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ ज़ोर से बात करने से भी रोका है, और उन्हें आदेश दिया है कि उनके सामने अपनी आवाज़ को नीची रखें, जैसा कि अल्लाह तआला ने इस आयत में फरमाया है :
﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَنْ تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنْتُمْ لَا تَشْعُرُونَ 2 إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَى لَهُمْ مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ3﴾
"ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! अपनी आवाज़ें, नबी की आवाज़ से ऊँची न करो और न आप से ऊँची आवाज़ में बात करो, जैसे तुम एक-दूसरे से ऊँची आवाज़ में बात करते हो। ऐसा न हो कि तुम्हारे कर्म व्यर्थ हो जाएँ और तुम्हें पता (भी) न हो। निःसंदेह जो लोग अल्लाह के रसूल के पास अपनी आवाज़ें धीमी रखते हैं, यही लोग हैं, जिनके दिलों को अल्लाह ने परहेज़गारी के लिए जाँच लिया है। उनके लिए बड़ी क्षमा तथा महान प्रतिफल है।" [सूरह हुजुरात : 2 - 3]।
और क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र पर लंबे समय तक खड़ा होना और सलाम को बार-बार दोहराना, भीड़-भाड़, शोर-शराबा एवं आवाज़ों के ऊँचे होने का कारण बनता है, जो उनकी क़ब्र के पास इस्लामिक शरीअत के अनुसार निर्धारित नियमों के विरुद्ध है, तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान उनके जीवन और मरण दोनों स्थितियों में अनिवार्य है, अतः एक मोमिन व्यक्ति को उनकी क़ब्र के पास ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जो शरई आचार-विचार के विरुद्ध हो।
और इसी तरह कुछ ज़ाइरीन (दर्शनकारियों) तथा अन्य लोगों द्वारा उनकी क़ब्र के सामने खड़े होकर क़िब्ला की ओर मुँह करके हाथ उठाकर दुआ करना, यह सब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा एवं उनके अच्छे अनुयायियों (ताबेईन) जैसे सलफ सालेह (सदाचारी पूर्वजों) के मार्ग के विरुद्ध है, अपितु यह एक आविष्कृत बिद्अत (नया और गलत कार्य) है, तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है :
«فَعَلَيْكُمْ بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الخُلَفَاءِ الرَّاشِدِينَ المَهْدِيِّيْنَ مِنْ بَعْدِي، تَمَسَّكُوا بِهَا وَعَضُّوا عَلَيْهَا بِالنَّوَاجِذِ، وَإِيَّاكُمْ وَمُحْدَثَاتِ الأُمُورِ، فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٌ وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ».
"तुम मेरी सुन्नत तथा सत्य के मार्ग पर चलने वाले मेरे ख़लीफ़ा-गणों की सुन्नत का पालन करना। इसे मज़बूती से पकड़े रहना और दीन के नाम पर सामने आने वाली नित-नई चीज़ों से बचे रहना। क्योंकि दीन के नाम पर सामने आने वाली हर नई चीज़ बिद्अत है और हर बिद्अत गुमराही है।"(123)
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक और अवसर पर फ़रमाया है:
«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।"(124)
«مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهُوَ رَدٌّ».
"जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके संबंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह अग्रहणीय है।"(125)
अली बिन हुसैन ज़ैन अल-आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र के पास एक आदमी को दुआ करते देखा, तो उन्होंने उसे ऐसा करने से मना किया और कहा : क्या मैं तुम्हें एक हदीस न बता दूँ, जो मैंने अपने पिता से सुनी है और उन्होंने उसे मेरे दादा से वर्णित किया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَا تَتَّخِذُوا قَبْرِي عِيدًا، وَلَا بُيُوتَكُمْ قُبُورًا، وَصَلُّوا عَلَيَّ، فَإِنَّ تَسْلِيمَكُمْ يَبْلُغُنِي أَيْنَمَا كُنْتُمْ».
"मेरी क़ब्र को त्योहार स्थल न बनाना, और न अपने घरों को क़ब्रिस्तान बनाना। हाँ, मुझ पर दुरूद भेजते रहना, क्योंकि तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा सलाम मुझे पहुँच जाएगा।"(126)
और इसी तरह कुछ ज़ाइरीन (दर्शनकारियों) द्वारा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सलाम भेजते समय दाहिने हाथ को बाएं हाथ पर रखकर सीने पर या उसके नीचे नमाज़ पढ़ने वाले की तरह रखने का जो तरीका अपनाया जाता है, वह न तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सलाम भेजते समय और न ही किसी अन्य सम्राट, नेताओं या अन्य लोगों को सलाम करते समय सही है, क्योंकि यह तरीका एक प्रकार से आत्मसमर्पण, विनम्रता एवं उपासना का प्रतीक है जो केवल अल्लाह के लिए अपनाना ही उचित है, जैसा कि हाफ़िज़ इब्ने हजर रहिमहुल्लाह ने "फ़त्हुलबारी" में उलमा से यह बयान किया है, तथा इस बारे में जो भी सोच-विचार करेगा उसके लिए यह मुद्दा पूर्णतः स्पष्ट हो जाएगा, शर्त यह है कि उसका उद्देश्य सही तरीके से सलफ के मार्ग का अनुसरण करना हो।
और जो लोग अंध अनुकरण, पूर्वाग्रह, और दुष्ट मानसिकता से प्रेरित होकर सच्चे मार्गदर्शकों के प्रति बुरा सोचते हैं, उनका मामला अल्लाह के हाथ में है। हम अल्लाह से हमारे और उनके लिए सन्मार्ग पर चलने की प्रार्थना करते हैं और यह भी कि वह हमें सत्य को स्वीकारने का सामर्थ्य दे। वह सर्वोत्तम प्रश्नों का उत्तर देने वाला है।
इसी तरह कुछ लोगों का (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की) पवित्र क़ब्र की ओर मुंह करके सलाम या प्रार्थना के लिए अपने होंठ हिलाना भी पूर्व में उल्लेख की गई दीन में आने वाली नई चीज़ों की श्रेणी में आता है। मुसलमानों को धर्म में ऐसा कुछ भी नया नहीं जोड़ना चाहिए, जिसकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है। इस कार्य से वह सच्ची निष्ठा और पवित्रता के बजाय, उदासीनता के करीब हो जाता है। इमाम मालिक ने इस कार्य एवं इस जैसे अन्य कार्यों का खंडन किया है। उन्होंने कहा है : "इस उम्मत (मुस्लिम समुदाय) के अंतिम लोगों का सुधार केवल उन्हीं चीजों के माध्यम से संभव है जिनसे इस उम्मत के आरंभिक लोगों का सुधार हुआ था"।(127)
तथा यह सर्वविदित है कि इस उम्मत (मुस्लिम समुदाय) के उम्मत के आरंभिक लोगों का सुधार, पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, उनके मार्गदर्शित उत्तराधिकारियों (ख़ुलफ़ा -ए- राशिदीन), उनके साथियों (सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम) एवं भलाई के साथ सहाबा की पैरवी करने वालों, के अनुकरण से हुआ था, और इस उम्मत के अंत का सुधार भी तभी संभव है जब वे इसी अनुकरण पर कायम रहें और इस का पालन करें।
अल्लाह समस्त मुसलमानों को दुनिया और आख़िरत (लोक-परलोक) में उनके उद्धार, सुख और सम्मान की ओर ले जाए। वह महान दानी है।
चेतावनी
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत के संबंध में शरई दृष्टिकोण
हज्ज के दौरान नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत करना न तो अनिवार्य है और न ही हज्ज के सही होने की शर्त है, इसके विपरीत जैसाकि कुछ आम लोग तथा उनके समान कुछ अन्य लोग समझते हैं, अपितु यह उन लोगों के लिए वांछित (मुस्तहब) है जिन्होंने मस्जिद -ए- नबवी की यात्रा की हो या उसके आस-पास हों।
परंतु जो लोग मदीना से दूर हैं, उनके लिए विशेष रूप से क़ब्र की ज़ियारत के लिए यात्रा करना गलत है, परंतु मस्जिद -ए- नबवी की ज़ियारत के लिए यात्रा करना वांछित (मुस्तहब) है, और जब वे मस्जिद -ए- नबवी पहुँचें तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र एवं आप के दोनों साथियों की कब्रों की ज़ियारत भी कर लें, यह (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र एवं आप के दोनों साथियों की कब्रों की) ज़ियारत मस्जिद -ए- नबवी की यात्रा के अंतर्गत आती है, जैसा कि सहीह हदीस में उल्लेखित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
«لَا تُشَدُّ الرِّحَالُ إِلَّا إِلَى ثَلَاثَةِ مَسَاجِدَ: المَسْجِدِ الحَرَامِ، وَمَسْجِدِي هَذَا، وَالمَسْجِدِ الأَقْصَى».
"केवल तीन मस्जिदों के लिए ही यात्रा करना उचित है : मस्जिद अल-हराम, मेरी यह मस्जिद तथा मस्जिद अल-अक़्सा।"(128)
तथा यदि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम या किसी अन्य व्यक्ति की कब्र की यात्रा करना सही होता, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसे अपनी उम्मत (मुस्लिम समुदाय) को बताया होता, तथा उनके महत्व की ओर मार्गदर्शन किया होता, क्योंकि वे सबसे बड़े शुभचिंतक, अल्लाह के बारे में सबसे अधिक जानकार, और सबसे अधिक डरने वाले थे, उन्होंने स्पष्ट रूप से धर्म को पहुँचा दिया, एवं अपनी उम्मत को हर भलाई की ओर मार्गदर्शित कर दिया, तथा हर बुराई से सावधान कर दिया। ऐसा क्यों न हो, जबकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तीन मस्जिदों के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्थान के लिए यात्रा करने से मना किया है, तथा फ़रमाया है:
«لَا تَتَّخِذُوا قَبْرِي عِيْدًا، وَلَا بُيُوتَكُمْ قُبُوْرًا، وَصَلُّوا عَلَيَّ، فَإِنَّ صَلَاتَكُمْ تَبْلُغُنِي حَيْثُ كُنتُمْ».
"मेरी क़ब्र को त्योहार की जगह न बनाओ और अपने घरों को कब्रिस्तान न बनाओ, तथा मुझ पर दुरूद भेजो, क्योंकि तुम्हारा दुरूद मुझ तक पहुँचता है, तुम चाहे जहाँ कहीं भी रहो।"(129)
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत के लिए यात्रा करने की अनुमति देने की बात कहना, आपकी कब्र को त्योहार स्थल बना लेने की ओर ले जाता है, और वही खतरा उत्पन्न करता है जिससे आप ने डराया था, अर्थात अति श्रद्धा और अतिश्योक्ति, जैसा कि कई लोग इस में पड़ चुके हैं, केवल इस विश्वास के कारण कि वे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत करने के लिए यात्रा करने को मशरूअ् (वैध) समझते हैं।
जो लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत के लिए यात्रा करने की अनुमति देने का समर्थन करते हैं, तथा वे जिन हदीसों का हवाला देते हैं, वे हदीसें कमजोर सनद वाली हैं, बल्कि कुछ तो गढ़ी गई हैं, जैसे कि दारक़ुतनी, बैहक़ी एवं हाफ़िज़ इब्ने हजर रहिमहुमुल्लाह जैसे विद्वानों ने उनकी कमजोरी की ओर इशारा किया है, इस कारण, इन कमजोर हदीसों को तीन मस्जिदों के अलावा किसी अन्य स्थान के लिए यात्रा करने की मनाही वाली सहीह हदीसों के विरुद्ध पेश नहीं किया जा सकता।
हे पाठक, यहाँ आपके लिए उन में से कुछ गढ़ी गई हदीसें प्रस्तुत हैं, ताकि आप उन्हें पहचान सकें और उन पर भरोसा करने से बच सकें :
प्रथम : "जिसने हज्ज किया और मेरी ज़ियारत नहीं की, उसने मेरी उपेक्षा की"।
द्वितीय : "जो मेरी मृत्यु के बाद मेरी (क़ब्र की) ज़ियारत करता है, मानो उसने मेरे जीवन में मेरी ज़ियारत की हो"।
तृतीय : "जो एक ही साल में मेरी (क़ब्र) और मेरे पिता इब्राहीम की (क़ब्र की) ज़ियारत करता है, उसके लिए मैंने अल्लाह से जन्नत की गारंटी ली है"।
चतुर्थ : "जो मेरी (क़ब्र) की ज़ियारत करता है, उसके लिए मेरी सिफारिश (अनुशंसा) अनिवार्य हो जाती है"।
ये हदीसें तथा इन जैसी अन्य हदीसों का कोई प्रमाण नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से नहीं मिलता है।
हाफ़िज़ इब्न -ए- हजर ने "अल-तलख़ीस" में अधिकतर रिवायतों का ज़िक्र करने के बाद कहा है : इस हदीस की सारी वर्णन शृंखलाएँ दुर्बल हैं।
हाफ़िज़ अल-उक़ैली कहते हैं : इस विषय की कोई भी हदीस सहीह नहीं है।
तथा शैख़ुल इस्लाम इब्ने तैमिय्यह रहमतुल्लाह अलैह ने दृढ़ता से कहा है कि ये सारी हदीसें गढ़ी हुई हैं, और उनके ज्ञान, हिफ़्ज़ (स्मरण शक्ति) एवं विस्तृत जानकारी को देखते हुए, उनका यह कथन इसे सत्यापित करने के लिए पर्याप्त है।
यदि इनमें से कोई भी बात सत्य होती, तो सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम सबसे पहले इस पर अमल करते, और उम्मत को इसके बारे में बताते तथा इस की ओर बुलाते, क्योंकि वे नबियों के बाद सबसे अच्छे लोग हैं, और अल्लाह के आदेशों एवं उसकी शरीअत के सर्वाधिक जानकार हैं, और अल्लाह एवं उसकी सृष्टि के सबसे बड़े शुभचिंतक हैं, अतः जब उनके द्वारा इस तरह की कोई बात नहीं बताई गई, तो इससे यह स्पष्ट होता है कि यह शरई (धार्मिक) रूप से स्वीकृत नहीं है।
यदि इनमें से कोई भी बात सत्य होती, तो उसे केवल क़ब्र की ज़ियारत के इरादे से यात्रा करने के स्थान पर शरई (धार्मिक) यात्रा पर लागू किया जाना चाहिए था, ताकि सभी हदीसों के बीच सामंजस्य बना रहता। और अल्लाह ही सर्वाधिक जानने वाला है।
अध्याय
मस्जिद -ए- क़ुबा एवं बक़ीअ् की ज़ियारत (दर्शन) के मुस्तहब (वांछित) होने के विषय में
मदीना की यात्रा करने वाले के लिए मस्जिद -ए- क़ुबा की ज़ियारत करना तथा उसमें नमाज़ पढ़ना मुस्तहब (वांछित) है, जैसा कि सहीहैन में इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की रिवायत में है, वह कहते हैं :
«كَانَ النَّبِيُّ ﷺ يَزُورُ مَسْجِدَ قُبَاءٍ رَاكِبًا وَمَاشِيًا وَيُصَلِّي فِيهِ رَكْعَتَيْنِ».
"अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सवार हो कर एवं पैदल चल कर क़ुबा जाते और वहाँ दो रक्अत नमाज़ पढ़ते थे।"(130)
तथा सह्ल बिन हुनैफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
«مَنْ تَطَهَّرَ فِي بَيْتِهِ ثُمَّ أَتَى مَسْجِدَ قُبَاءٍ فَصَلَّى فِيهِ صَلَاةً كَانَ لَهُ كَأَجْرِ عُمْرَةٍ».
"जो अपने घर में वुज़ू करे, फिर मस्जिद -ए- क़ुबा जाए और वहाँ नमाज़ पढ़े, तो उसे उमरा के बराबर सवाब मिलेगा।"(131)
और उसके लिए बक़ीअ् की कब्रों, शुहदा (-ए- उहुद) की कब्रों, तथा हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु की कब्र की ज़ियारत करना सुन्नत है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनकी ज़ियारत करते और उनके लिए दुआएं करते थे, तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन भी है :
«زُوْرُوا القُبُورَ فَإِنَّهَا تُذَكِّرُكُمْ بِالآخِرَةِ».
"कब्रों की ज़ियारत करो, क्योंकि ये तुम्हें आख़िरत की याद दिलाती हैं।"(132) इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने साथियों को यह दुआ सिखाते थे, कि जब वे क़ब्रों की ज़ियारत (भ्रमण) करें तो इसे पढ़ें :
«السَّلَامُ عَلَيْكُمْ أَهْلَ الدِّيَارِ مِنَ المُؤْمِنِينَ وَالمُسْلِمِينَ، وَإِنَّا إِنْ شَاءَ اللهُ بِكُمْ لَاحِقُونَ، نَسْأَلُ اللهَ لَنَا وَلَكُمُ العَافِيَةَ».
"अस्सलामु अलैकुम अहलद-दियारि मिनल-मोमिनीना वल-मुसलिमीन, व इन्ना इंशा अल्लाहु बिकुम लाहिकून, नस्अलुल्लाहा लना व लकुम अल-आफियह (ऐ मोमिन व मुसलमान क़ब्र वासियों! तुम पर शान्ति की जलधारा बरसे। यदि अल्लाह चाहे, तो हम तुमसे भेंट करने वाले हैं। हम अपने तथा तुम्हारे लिए शांति एवं सुरक्षा की दुआ करते हैं)।"(133) सहीह मुस्लिम, इस हदीस के वर्णनकर्ता-सुलैमान बिन बुरैदा हैं जो अपने पिता से रिवायत करते हैं।
तथा तिर्मिज़ी ने अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा से रिवायत किया है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीने की क़ब्रों के पास से गुज़रे, तो उनकी ओर मुँह करके फ़रमाया :
«السَّلَامُ عَلَيْكُمْ يَا أَهْلَ القُبُورِ، يَغْفِرُ اللهُ لَنَا وَلَكُمْ، أَنْتُمْ سَلَفُنَا وَنَحْنُ بِالأَثَرِ».
"अस्सलामु अलैकुम या अहलल-क़ुबूरि, यग़्फ़िरुल्लाहु लना व लकुम, अंतुम सलफ़ुना व नह़्नु बिल-अस़रि (ऐ क़ब्र वासियो! तुम पर शांति हो। अल्लाह हमें और तुम्हें माफ़ करे। तुम हमारे पूर्वज हो और हम तुम्हारे पीछे आ रहे हैं)।"(134)
इन हदीसों से यह स्पष्ट होता है कि शरई (धार्मिक) रूप से कब्रों की ज़ियारत करने का उद्देश्य आखिरत (परलोक) को याद करना, मृतकों के प्रति भलाई करना, उनके लिए दुआएं करना और उन पर रहमत की दुआ करना है।
जहां तक बात है क़ब्रों की ज़ियारत, उनसे दुआ करने, वहाँ ठहरने, उनसे आवश्यकताओं की पूर्ति कराने, बीमारों के ठीक होने की दुआ करने अथवा अल्लाह से उनके माध्यम से मांगने या उनकी प्रतिष्ठा के माध्यम से मांगने की, तो यह एक निन्दात्मक बिदअती यात्रा है जिसे अल्लाह और उसके रसूल ने शरई रूप से स्वीकृत नहीं किया है, यह सलफ़ सालेह (धर्मी पूर्वजों) ने भी नहीं किया है, बल्कि यह उसी तरह की यात्रा है जिससे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मना किया है, जैसे कि आप ने फरमाया है :
«زُورُوا القُبُورَ، وَلَا تَقُولُوا هُجْرًا».
"कब्रों की ज़ियारत करो, तथा बेकार बातें मत कहो।"(135)
ये समस्त वर्णित चीज़ें बिदअत में शामिल हैं, किंतु उनकी श्रेणियां भिन्न-भिन्न हैं, इनमें से कुछ चीज़ें बिदअत तो हैं लेकिन शिर्क नहीं हैं, जैसे कि कब्रों के पास अल्लाह से दुआ करना और मृतक के हक़ और प्रतिष्ठा के माध्यम से उस (अल्लाह) से कुछ मांगना, जबकि कुछ बड़े शिर्क (महा बहुदेववाद) हैं, जैसे कि मृतकों से दुआ करना एवं उनसे मदद मांगना इत्यादि।
इसके संबंध में पूर्व में विस्तार से उल्लेख किया जा चुका है, अतः ध्यान दें और सावधान रहें, और अपने रब से सच्चे मार्गदर्शन और सफलता के लिए प्रार्थना करें। वह अल्लाह ही है जो सही मार्गदर्शन देने वाला है, उसके अलावा कोई अन्य सत्य पूज्य नहीं है, तथा उसके अतिरिक्त कोई अन्य रब नहीं है।
यह वह अंतिम बात है जो हम लिखवाना चाहते थे, और अल्लाह ही के लिए आरंभ तथा अंत में प्रशंसा है, और अल्लाह की ओर से प्रशंसा एवं कृपा हो उसके बंदे और रसूल मुहम्मद पर, और उनके परिवार और सहाबा (साथियों) पर, और उन पर जो भलाई के साथ क़ियामत के दिन तक उनका अनुसरण करते रहेंगे।
***
सूची
अध्याय 5
हज्ज एवं उमरा के वाजिब (अनिवार्य) होने तथा शीघ्रातिशीघ्र इसे अदा करने के प्रमाण के संबंध में 5
अध्याय 10
पापों से तौबा करने एवं अत्याचारों से मुक्त होने की अनिवार्यता के संबंध में 10
अध्याय 17
जब मीकात (निर्धारित सीमा) पर पहुंचे, तो हाजी कौन से कार्य करे 17
अध्याय 24
स्थानीय मीक़ात एवं उनकी सीमाओं के बारे में 24
अध्याय 30
जो हज्ज के महीनों के अतिरिक्त अन्य समय में मीक़ात पर पहुँचे उसके हुक्म के संबंध में 30
अध्याय 34
क्या छोटे बच्चे का हज्ज करना, बड़ा होकर उस पर फर्ज़ हज्ज के लिए पर्याप्त होगा? 34
अध्याय 37
महज़ूरात -ए- इहराम (इहराम की अवस्था में वर्जित चीज़ें) तथा इहराम बाँधने वाले के लिए जिन चीज़ों का करना वैध है, उसकी व्याख्या के संबंध में 37
अध्याय 46
मक्का में हाजी के प्रवेश करते समय, तथा मस्जिद -ए- हराम में प्रवेश करने के पश्चात किए जाने वाले कार्य, जैसे तवाफ़ एवं उसकी विधि के बारे में 46
अध्याय 56
आठवीं ज़िल-हिज्जा को हज्ज का इहराम बांधने तथा मिना के लिए निकलने के नियम के संबंध में 56
अध्याय 83
हज्ज करने वाले के लिए यौम अन-नह्'र (क़ुर्बानी के दिन) किए जाने वाले श्रेष्ठ कार्यों के बारे में स्पष्टीकरण 83
अध्याय 91
हज्ज -ए- तमत्तुअ एवं क़िरान करने वालों पर रक्त (अर्थात: जानवर की क़ुर्बानी) के अनिवार्य होने के बारे में 91
अध्याय 94
हाजियों और अन्य लोगों पर अम्र बिल मारूफ (नेकी का आदेश) की अनिवार्यता के विषय में 94
अध्याय 105
आज्ञाकारिता के कार्यों में अधिकाधिक लगे रहने के मुस्तहब (प्रिय) होने के विषय में 105
अध्याय 107
मस्जिद -ए- नबवी की ज़ियारत (दर्शन) के अहकाम एवं उसके शिष्टाचार के विषय में 107
चेतावनी 124
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत के संबंध में शरई दृष्टिकोण 124
अध्याय 128
मस्जिद -ए- क़ुबा एवं बक़ीअ् की ज़ियारत (दर्शन) के मुस्तहब (वांछित) होने के विषय में 128
***
() तबरानी की अल-औसत, हदीस संख्या : 7469।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 8, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 16।
() यानी आर्थिक सक्षमता।
() जामे अल-अहादीस (हदीस संख्या : 31221) में इसे सईद बिन मंसूर की सुनन के हवाले से नक़ल किया गया है, लेकिन यह हदीस उपलब्ध प्रति में मुझे नहीं मिल सकी।
() सुनन तिर्मिज़ी , हदीस संख्या : 812।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 1732।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1337।
() इसे इब्न-ए-ख़ुज़ैमा ने हदीस संख्या (1) के अंतर्गत रिवायत किया है।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1520।
() सुनन नसई, हदीस संख्या : 2620।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1773, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1349।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2449।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1015।
() तबरानी ने इसे अल-कबीर में रिवायत किया है, हदीस संख्या : 2989।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1427, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1035।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1474, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 4040।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2985।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1342।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1539, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1189।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1218।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5891, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 257।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 258।
() सुनन नसई, हदीस संख्या : 14।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2892, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 259।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 260।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1177।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1907।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 867।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2697, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1718।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2550, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1718।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1524, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1181।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1297।
() इसका हवाला पीछे गुज़र चुका है।
() (हदीस में वर्णित शब्द) 'فمهله' का अर्थ है : इहराम बाँधने के स्थान से तलबिया के साथ उसका इहराम बांधना।
() यह पिछली हदीस का एक भाग है।
() इसका हवाला पीछे गुज़र चुका है।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1549, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1184।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्याः 5089, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्याः 1207।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1336।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1858।
() इब्न-ए-अबी शैबा 4/444।
() सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 2518।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1841, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1179।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1838।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 1833।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1521, वर्णनकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1350।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1521, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1350।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1409।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1834, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1353।
() इसका संदर्भ पीछे गुज़र चुका है।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1568।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 305, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1211।
() सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 3585।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2137।
() सहीह मुस्लिम : 594, इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हुमा हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2720, इस हदीस के वर्णनकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6347, इस हदीस के वर्णकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 1554। इस हदीस के वर्णकर्ता अबू उमामा अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु हैं। शब्द सुनन अबू दावूद के हैं। लेकिन उसमें "ومن المأثم والمغرم" के शब्द नहीं हैं।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 1554। इस हदीस के वर्णनकर्ता अनस रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 5074। इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा हैं।
() सहीह मुस्लिम में मौजूद एक हदीस (हदीस संख्याः 2719) का एक अंश। इस हदीस के वर्णनकर्ता अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 3407। इस हदीस के वर्णनकर्ता शद्दाद बिन औस रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() मुस्नद अहमद 6/301। इस हदीस की वर्णनकर्त्री उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2713। इस हदीस के वर्णनकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2722। इस हदीस के वर्णनकर्ता ज़ैद बिन अरक़म रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2717। इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा हैं।
() यह ज़ैद बिन अरक़म रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस का टुकड़ा है, जिसका हवाला पूर्व में हदीस संख्या 2722 के तहत दिया जा चुका है।
() सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 3591। इस हदीस के वर्णनकर्ता ज़ियाद बिन अलाक़ा हैं, जो अपने चचा से रिवायत करते हैं।
() सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 3483। इस हदीस के वर्णनकर्ता इमरान बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 3563। इस हदीस के वर्णनकर्ता अली रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2721। इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2725। इस हदीस के वर्णनकर्ता अली रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन इब्न-ए-माजह, हदीस संख्या : 3846। इस हदीस की वर्णनकर्त्री आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा हैं।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1154। इस हदीस के वर्णनकर्ता उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3370। इस हदीस के वर्णनकर्ता कअ्ब बिन उजरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1348। इस हदीस की वर्णनकर्ता आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा हैं।
() इसका हवाला पीछे गुज़र चुका है।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1218। इस हदीस के वर्णनकर्ता जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1539, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1189।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या :1556, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1211।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1572।
() यह रिवायत सहीह मुस्लिम (1215) की है।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 83, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1306।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 2015।
() सुनन इब्न-ए-माजह, हदीस संख्या : 3062। इस हदीस के वर्णनकर्ता जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2473।
() अर्थातः अबू दावूद तयालिसी। उन्होंने इस हदीस को अबू ज़र्र रज़ियल्लाहु अन्हु के इस्लाम ग्रहण करने के क़िस्से के तहत नक़ल किया है। देखिए : मुस्नद अबू दावूद तयालिसी, हदीस संख्या : 459।
() सुनन इब्न -ए- माजह, हदीस संख्या : 3038।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 69। इस हदीस के वर्णनकर्ता अनस रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1998।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2420, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 651।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 653। इस हदीस के वर्णनकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 552। इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन उम्म -ए- मकतूम रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 654।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 551। इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा हैं।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1521, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1350। इस हदीस के वर्णनकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 3251।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 3253।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2679, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1646। इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() मुसनद अहमद (5/428)।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 4980।
() सुनन इब्न -ए- माजह, हदीस संख्या : 2117।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1893।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3009, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2406।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1755, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1328।
() इसका हवाला पीछे गुज़र चुका है।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 867। इस हदीस के वर्णनकर्ता जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1190, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1394।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1395।
() मुस्नद अहमद 4/5।
() सुनन इब्न -ए- माजह, हदीस संख्या :1406।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1195, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1390। इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन ज़ैद माज़िनी रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 2041।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 3236।
() इसका हवाला पीछे गुज़र चुका है।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 438। इस हदीस के वर्णनकर्ता अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 615, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 437।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 430। इस हदीस के वर्णनकर्ता जाबिर बिन समुरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 679। तथा उसके शब्द हैं : "जब कुछ लोग लगातार पहली सफ़्फ़ से पीछे रहने लगते हैं, तो अल्लाह उनको पीछे करके जहन्नम में डाल देता है।"
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1631। इस हदीस के वर्णनकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 2041।
() सुनन अबू दावूद, हदीस संख्या : 4607। इस हदीस के वर्णनकर्ता इर्बाज़ बिन सारिया रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।
() इसका हवाला पीछे गुज़र चुका है।
() इसका हवाला पीछे गुज़र चुका है।
() ज़ैन अल-आबिदीन की रिवायत की निस्बत शैख़ ने हाफ़िज़ मक़दिसी की ओर की है। लेकिन उन्होंने इस हदीस को उसके साथ मौजूद क़िस्से के बिना रिवायत किया है। तथा इसे इमाम अहमद ने अपनी मुस्नद 2/367 में भी रिवायत किया है।
() इग़ासह अल-लहफ़ान फ़ी मसायिद अल-शैतान 1/363।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1189, इस हदीस के वर्णनकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1397।
() इसका हवाला पीछे गुज़र चुका है।
() सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1193, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1399।
() सुनन इब्न -ए- माजह, हदीस संख्या : 1412।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 976।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 975।
() सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 1035।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 977। इब्न -ए- बुरैदा ने इस हदीस को अपने पिता से रिवायत किया है।
() सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 55।