हिस्न अल-मुस्लिम (क़ुरआन एवं हदीस की दुआएँ) (हिन्दी)

हिस्नुल मुस्लिम (क़ुर्आन और हदीस की दुआयें) मुसलमान के दिन और रात के अज़कार और दुआओं के विषय में सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है।

  • earth भाषा
    (हिन्दी)
  • earth लेखक:
    الشيخ سعيد بن علي بن وهف القحطاني
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حِصْنُ المُسْلِمِ مِنْ أَذْكَارِ الكِتَابِ وَالسُّنَّةِ

 

 

हिस्न अल-मुस्लिम

(क़ुरआन एवं हदीस की दुआएँ)

 

 

 

الفقير إلى اللَّهِ تعالى

د. سَعِيدُ بْنُ عَلِيِّ بْنِ وَهْفٍ القَحْطَانِيُّ

 

सईद बिन अली बिन वह्फ़ क़हतानी

 

 

 


بِسْمِ اللهِ الرَّحمَنِ الرَّحِيمِ

हिस्न अल-मुस्लिम

(क़ुरआन एवं हदीस की दुआएँ)

अल्लाह का मोहताज

डॉक्टर सईद बिन अली बिन वह्फ़ अल-क़हतानी

अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं अति दयावान् है

भूमिका

हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह की है। हम उसी की प्रशंसा एवं स्तुति करते हैं, उसी से सहायता माँगते हैं और उसी से क्षमायाचना करते हैं। हम अपनी आत्माओं और अपने कर्मों की बुराइयों से अल्लाह की शरण माँगते हैं। वह जिसका मार्गदर्शन करे, उसे कोई पथ-भ्रष्ट नहीं कर सकता, और जिसे वह पथभ्रष्ट करे, उसका कोई मार्गदर्शक नहीं हो सकता। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है और उसका कोई शरीक नहीं। तथा मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे एवं उसके रसूल हैं। उनपर, उनके परिजनों पर और उनके साथियों पर, अल्लाह की अपार कृपा एवं शांति की बरखा बरसे। तत्पश्चात :

यह संक्षिप्त पुस्तक दरअसल मेरी कितबा "अज़-ज़िक्र वद-दुआ वल-इलाज बिर-रुक़ा मिनल-किताब वस-सुन्नह"1 का सार रूप है, जिसमें उसके अज़कार वाले भाग को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है, ताकि उसे यात्रा के दौरान आसानी से साथ रखा जा सके।

मैंने अपनी इस पुस्तक में केवल हदीस के मत्न (पाठ) को नक़ल किया है, और असल पुस्तक में उल्लिखित उसके संदर्भों में से महज़ एक-दो संदर्भ का उल्लेख किया है। जो वर्णन करने वाले सहाबी एवं अधिक संदर्भों से अवगत होना चाहे, उसे असल किताब का अध्ययन करना चाहिए। मैं सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह से, उसके सुंदर नामों एवं उच्च गुणों के वसीले से दुआ करता हूँ कि इस पुस्तक को अपनी प्रसन्नता की प्राप्ति का साधन बनाए, उसे मेरे जीवन में तथा मेरी मृत्यु के बाद मेरे साथ-साथ उसके पाठकों, प्रकाशकों और इस कार्य में सहयोग करने वाले सभी लोगों के लिए लाभदायक बनाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सारे कार्य वही करता है और इनकी शक्ति भी वही रखता है। अल्लाह की कृपा तथा शांति की बरखा बरसे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके परिजनों, साथियों तथा क़यामत के दिन तक निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करने वालों पर।

लेखक

इन शब्दों को सफ़र 1409 हिजरी में लिखा गया है।

ज़िक्र का महत्व

अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :

﴿فَٱذۡكُرُونِيٓ أَذۡكُرۡكُمۡ وَٱشۡكُرُواْ لِي وَلَا تَكۡفُرُونِ 152﴾

"अतः, तुम मुझे याद करो, मैं तुम्हें याद रखूँगा और मेरे आभारी रहो तथा मेरे कृतघ्न न बनो।"2

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ ذِكۡرٗا كَثِيرٗا41﴾

"हे ईमान वालो, अल्लाह को बहुत ज्यादा याद करते रहो।"3

﴿...وَالذَّاكِرِينَ اللَّهَ كَثِيراً وَالذَّاكِرَاتِ أَعَدَّ اللَّهُ لَهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْراً عَظِيماً﴾

"तथा अल्लाह को अत्याधिक याद करने वाले पुरुष और याद करने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह ने इन्हीं के लिए क्षमा तथा महान प्रतिफल तैयार कर रखा है।"4

﴿وَٱذۡكُر رَّبَّكَ فِي نَفۡسِكَ تَضَرُّعٗا وَخِيفَةٗ وَدُونَ ٱلۡجَهۡرِ مِنَ ٱلۡقَوۡلِ بِٱلۡغُدُوِّ وَٱلۡأٓصَالِ وَلَا تَكُن مِّنَ ٱلۡغَٰفِلِينَ 205﴾

"और (हे नबी!) अपने पालनहार का स्मरण विनय पूर्वक तथा डरते हुए और धीमे स्वर में प्रातः तथा संध्या करते रहो और उन लोगों में से न हो जाओ, जो अचेत रहते हैं।"5

तथा अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :

«مَثَلُ الَّذِي يَذْكُرُ رَبَّهُ، وَالَّذِي لَا يَذْكُرُ ربَّهُ، مَثَلُ الحَيِّ وَالمَيِّتِ».

"उस व्यक्ति का उदाहरण जो अपने रब को याद करता हो और जो अपने रब को याद न करता हो, जीवित और मृत की तरह है।"6

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«أَلَا أُنبِّئُكُم بِخَيْرِ أَعْمَالِكُمْ، وَأَزْكَاهَا عِنْدَ مَلِيكِكُمْ، وَأَرْفَعِهَا فِي دَرَجَاتِكُمْ، وَخَيْرٍ لَكُمْ مِنْ إِنْفَاقِ الذَّهَبِ وَالوَرِقِ، وَخَيْرٍ لَكُمْ مِنْ أَنْ تَلْقَوْا عَدُوَّكُمْ فَتَضْرِبُوا أَعْنَاقَهُمْ وَيَضْرِبُوا أَعْنَاقِكُم؟» قَالُوا بَلَى. «ذِكْرُ اللَّهِ تَعَالَى».

"क्या मैं तुम्हें तुम्हारा सबसे उत्तम कार्य न बताऊँ, जो तुम्हारे प्रभु के निकट सबसे ज़्यादा सराहनीय, तुम्हारे दरजे को सबसे ऊँचा करने वाला, तुम्हारे लिए सोना एवं चाँदी दान करने से बेहतर तथा इस बात से भी बेहतर है कि तुम अपने शत्रु से भिड़ जाओ और तुम उनकी गर्दन मार दो और वह तुम्हारी गर्दन मार दें?" सहाबा ने कहा : अवश्य ऐ अल्लाह के रसूल! तो फ़रमाया : "अल्लाह का ज़िक्र करना, जो उच्च एवं महान है।"7

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«يَقُولُ اللَّهُ تَعَالَى: أَنَا عِنْدَ ظَنِّ عَبْدِي بِي، وَأَنَا مَعَهُ إِذَا ذَكَرَنِي، فَإِنْ ذَكَرَنِي فِي نَفْسِهِ، ذَكَرْتُهُ فِي نَفْسِي، وَإِنْ ذَكَرَنِي فِي مَلَأٍ ، ذَكَرْتُهُ فِي مَلَأٍ خَيْرٍ مِنْهُمْ، وَإِنْ تَقَرَّبَ إِلَيَّ شِبْرًا، تَقَرَّبْتُ إِلَيْهِ ذِرَاعًا، وَإِنْ تَقَرَّبَ إِلَيَّ ذِرَاعًا، تَقَرَّبْتُ إِلَيْهِ بَاعًا، وَإِنْ أَتَانِي يَمْشِي أَتَيْتُهُ هَرْوَلَةً».

"महान अल्लाह कहता है : मैं अपने बंदे के साथ वही करता हूँ, जो वह मेरे बारे में गुमान रखता है, तथा जब वह मुझे याद करता है, तो मैं उसके साथ होता हूँ। अगर वह मुझे अपने नफस में याद करता है, तो मैं भी उसे अपने नफस में याद करता हूँ। अगर वह मुझे लोगों के बीच याद करता है, तो मैं उसे ऐसे लोगों में याद करता हूँ, जो उनसे अच्छे हैं। अगर वह मुझसे एक बित्ता क़रीब आता है, तो मैं उससे एक हाथ क़रीब आता हूँ और अगर वह मुझसे एक हाथ क़रीब आता है, तो मैं उससे दोनों हाथों को फैलाकर जितनी दूरी बनती है, उतना क़रीब आता हूँ और अगर वह मेरे पास चलकर आता है, तो मैं उसके पास दौड़ कर आता हूँ।"8

अब्दुल्लाह बिन बुस्र- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास एक व्यक्ति आया और कहने लगा कि ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे सामने इस्लाम के बहुत सारे अहकाम (विधान) मौजूद हैं। अतः, आप मुझे कोई ऐसा व्यापक कार्य बता दें, जिसे मैं मज़बूती से पकड़ लूँ। आपने फ़रमाया : "तेरी ज़बान हमेशा अल्लाह के ज़िक्र में लगी रहे।"

«لَا يَزَالُ لِسَانُكَ رَطْبًا مِنْ ذِكْرِ اللَّهِ».

“तुम्हारी ज़बान हमेशा अल्लाह के ज़िक्र से तर रहे।”9

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«مَنْ قَرَأَ حَرْفًا مِنْ كِتَابِ اللَّهِ فَلَهُ بِهِ حَسَنَةٌ، وَالحَسَنَةُ بِعَشْرِ أَمْثَالِهَا، لَا أَقُولُ: ﴿الــم﴾ حَرْفٌ، وَلَكِنْ: أَلِفٌ حَرْفٌ، وَلَامٌ حَرْفٌ، وَمِيْمٌ حَرْفٌ».

"जिसने अल्लाह की किताब का एक अक्षर पढ़ा, उसके बदले में उसे एक नेकी मिलेगी और अल्लाह यहाँ एक नेकी का बदला दस गुना मिलता है। मैं यह नहीं कहता कि अलिफ़, लाम, मीम एक अक्षर है। बल्कि अलिफ़ एक अक्षर है, लाम एक अक्षर है और मीम एक अक्षर है।"10

उक़बा बिन आमिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं : हम लोग सुफ़्फ़ा में उपस्थित थे कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- निकले और फरमाया : "तुममें से कौन पसंद करता है कि हर दिन सुबह बुतहान या अक़ीक़ जाए और वहाँ से किसी को कोई नुक़सान पहुँचाए या रिश्ता काटे बगैर दो मोटी तगड़ी-ऊँटनियाँ ले आए? हम लोगों ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! हम सब इस बात को पसंद करते हैं। आपने फरमाया : "फिर तुममें से कोई व्यक्ति सुबह मस्जिद क्यों नहीं जाता कि वह -सर्वशक्तिमान एवं महान- अल्लाह की किताब की दो आयतें सीखे या पढ़े, जो उसके लिए दो ऊँटनियों से बेहतर है? इसी प्रकार तीन आयतें पढ़ना तीन ऊँटनियों से उत्तम है एवं चार आयतें पढ़ना चार ऊँटनियों से उत्तम है। जितनी आयतें पढ़ी जाएँगी, वह उतनी संख्या में ऊँट से उत्त्म होंगी।".

«أَيُّكُمْ يُحِبُّ أَنْ يَغْدُوَ كُلَّ يَوْمٍ إِلَى بُطْحَانَ، أَوْ إِلَى العَقِيقِ، فَيَأْتيَ مِنْهُ بِنَاقَتَيْنِ كَوْمَاوَيْنِ فِي غَيْرِ إِثْمٍ وَلَا قَطِيعَةِ رَحِمٍ؟».

"तुममें से कौन यह पसंद करता है कि प्रत्येक सुबह बुतहान या अक़ीक़ जाए और बिना कोई गुनाह किए या किसी रिश्तेदार का हक़ मारे दो ऊँचे कोहान वाले ऊँट ले आए? हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! हममें से हर व्यक्ति को यह पसंद है। तब फ़रमाया :

«أَفَلَا يَغْدُو أَحَدُكُمْ إِلَى المَسْجِدِ فَيَعْلَمَ، أَوْ يَقْرَأَ آيَتَيْنِ مِنْ كِتَابِ اللَّهِ عز وجل خَيْرٌ لَهُ مِنْ نَاقَتَيْنِ، وَثَلاثٌ خَيْرٌ لَهُ مِنْ ثَلَاثٍ، وَأَرْبَعٌ خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَرْبَعٍ، وَمِنْ أَعْدَادِهِنَّ مِنَ الإِبِلِ».

"तुममें से कोई यदि मस्जिद जाए और सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की किताब की दो आयतें सीखे या पढ़े, तो यह उसके लिए दो ऊँटों से बेहतर है। यदि तीन आयतें सीखता या पढ़ता है तो तीन उँटों से बेहतर है, और यदि चार आयतें सीखता या पढ़ता है चार ऊँटों से बेहतर है। इस प्रकार जितनी आयतें वह सीखता या पढ़ता जाएगा, वह उतने ऊँटों से बेहतर होगा।"11

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«مَنْ قَعَدَ مَقْعَدًَا لَمْ يَذْكُرِ اللَّهَ فِيهِ، كَانَتْ عَلَيْهِ مِنَ اللَّهِ تِرَةٌ، وَمَنِ اضْطَجَعَ مَضْجِعًا لَمْ يَذْكُرِ اللَّهَ فِيهِ كَانَتْ عَلَيْهِ مِنَ اللَّهِ تِرَةٌ».

"जो किसी जगह बैठा और वहाँ अल्लाह को याद न किया, तो वह बैठना उसके लिए अल्लाह की ओर से पछतावे का कारण बनेगा, और जो किसी जगह लेटा और वहाँ अल्लाह को याद न किया, तो उसका वह लेटना उसके लिए अल्लाह की ओर से पछतावे का कारण बनेगा।"12

और आप-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-ने फ़रमाया :

«مَا جَلَسَ قَوْمٌ مَجْلِسًَا لَمْ يَذْكُرُوا اللَّهَ فِيهِ، وَلَمْ يُصَلُّوا عَلَى نَبِيِّهِمْ إِلَّا كَانَ عَلَيْهِمْ تِرَةً، فَإِنْ شَاءَ عذَّبَهُمْ، وَإِنْ شَاءَ غَفَرَ لَهُمْ».

"जो लोग किसी सभा में बैठते हैं और वहाँ अल्लाह को याद नहीं करते तथा अपने नबी पर दरूद नहीं भेजते, तो उनका वह बैठना उनके लिए पछतावे का कारण बनेगा। अब यदि अल्लाह चाहेगा, तो उन्हें यातना देगा और चाहेगा तो माफ़ करेगा।"13

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«مَا مِنْ قَوْمٍ يَقُومُونَ مِنْ مَجْلِسٍ لَا يَذْكُرُونَ اللَّهَ فِيهِ إِلَّا قَامُوا عَنْ مِثْلِ جِيفَةِ حِمَارٍ، وَكَانَ لهُمْ حَسْرةً».

"जो लोग किसी सभा से अल्लाह का ज़िक्र किए बिना उठ जाते हैं, वे जैसे मरे हुए गधे के पास से उठते हैं और यह उनके लिए पछतावे का कारण बनेगा।"14

1- नींद से जागने के अज़कार

«الحَمْدُ للَّهِ الَّذِي أَحْيَانَا بَعْدَ مَا أَمَاتَنَا، وَإِلَيْهِ النُّشُورُ».

"सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने हमें मृत्यु के पश्चात जीवन दिया और उसी की ओर लौटकर जाना है।"15

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَريكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالحَمْدُ للَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكبَرُ، وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ العَلِيِّ العَظِيمِ، رَبِّ اغْفرْ لِي».

"अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, पूर्ण स्वामित्व बस उसी को प्राप्त है, सारी प्रशंसा उसी के लिए है और वह हर चीज़ करने में सक्षम है। अल्लाह पाक है समस्त प्रशंसाएँ अल्लाह के लिए हैं, और अल्लाह के सिवा कोई भी सत्य पूज्य नहीं है, अल्लाह सबसे बड़ा है और उच्च एवं महान अल्लाह के अतिरिक्त न किसी के पास भलाई के मार्ग पर लगाने की शक्ति है, न बुराई से रोकने की क्षमता। हे मेरे प्रभु! मुझे क्षमा कर दे।"16

«الحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي عَافَانِي فِي جَسَدِي، وَرَدَّ عَلَيَّ رُوحِي، وَأَذِنَ لِي بِذِكْرِهِ».

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे शारीरिक रूप से स्वस्थ रखा, मुझे मेरा प्राण लौटा दिया और मुझे अपने ज़िक्र की अनुमति दी।"17

﴿إِنَّ فِي خَلۡقِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَٱخۡتِلَٰفِ ٱلَّيۡلِ وَٱلنَّهَارِ لَأٓيَٰتٖ لِّأُوْلِي ٱلۡأَلۡبَٰبِ 190 ٱلَّذِينَ يَذۡكُرُونَ ٱللَّهَ قِيَٰمٗا وَقُعُودٗا وَعَلَىٰ جُنُوبِهِمۡ وَيَتَفَكَّرُونَ فِي خَلۡقِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ رَبَّنَا مَا خَلَقۡتَ هَٰذَا بَٰطِلٗا سُبۡحَٰنَكَ فَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ 191 رَبَّنَآ إِنَّكَ مَن تُدۡخِلِ ٱلنَّارَ فَقَدۡ أَخۡزَيۡتَهُۥۖ وَمَا لِلظَّٰلِمِينَ مِنۡ أَنصَارٖ 192 رَّبَّنَآ إِنَّنَا سَمِعۡنَا مُنَادِيٗا يُنَادِي لِلۡإِيمَٰنِ أَنۡ ءَامِنُواْ بِرَبِّكُمۡ فَـَٔامَنَّاۚ رَبَّنَا فَٱغۡفِرۡ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرۡ عَنَّا سَيِّـَٔاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ ٱلۡأَبۡرَارِ 193 رَبَّنَا وَءَاتِنَا مَا وَعَدتَّنَا عَلَىٰ رُسُلِكَ وَلَا تُخۡزِنَا يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۖ إِنَّكَ لَا تُخۡلِفُ ٱلۡمِيعَادَ 194 فَٱسۡتَجَابَ لَهُمۡ رَبُّهُمۡ أَنِّي لَآ أُضِيعُ عَمَلَ عَٰمِلٖ مِّنكُم مِّن ذَكَرٍ أَوۡ أُنثَىٰۖ بَعۡضُكُم مِّنۢ بَعۡضٖۖ فَٱلَّذِينَ هَاجَرُواْ وَأُخۡرِجُواْ مِن دِيَٰرِهِمۡ وَأُوذُواْ فِي سَبِيلِي وَقَٰتَلُواْ وَقُتِلُواْ لَأُكَفِّرَنَّ عَنۡهُمۡ سَيِّـَٔاتِهِمۡ وَلَأُدۡخِلَنَّهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ ثَوَابٗا مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِۚ وَٱللَّهُ عِندَهُۥ حُسۡنُ ٱلثَّوَابِ 195 لَا يَغُرَّنَّكَ تَقَلُّبُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ فِي ٱلۡبِلَٰدِ 196 مَتَٰعٞ قَلِيلٞ ثُمَّ مَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُۖ وَبِئۡسَ ٱلۡمِهَادُ 197 لَٰكِنِ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوۡاْ رَبَّهُمۡ لَهُمۡ جَنَّٰتٞ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَا نُزُلٗا مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِۗ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيۡرٞ لِّلۡأَبۡرَارِ 198 وَإِنَّ مِنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ لَمَن يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡكُمۡ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِمۡ خَٰشِعِينَ لِلَّهِ لَا يَشۡتَرُونَ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ ثَمَنٗا قَلِيلًاۚ أُوْلَٰٓئِكَ لَهُمۡ أَجۡرُهُمۡ عِندَ رَبِّهِمۡۗ إِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلۡحِسَابِ 199 يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱصۡبِرُواْ وَصَابِرُواْ وَرَابِطُواْ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ 200﴾

"वस्तुतः आकाशों तथा धरती की रचना और रात्रि तथा दिवस के एक के पश्चात् एक आते-जाते रहने में, मतिमानों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं।

जो खड़े, बैठे तथा सोए (प्रत्येक स्थिति में,) अल्लाह को याद करते तथ आकाशों और धरती की रचना में विचार करते रहते हैं। (कहते हैं :) हे हमारे पालनहार! तू ने यह सब व्यर्थ नहीं रचा है। हमें अग्नि के दंड से बचा ले।

हे हमारे पालनहार! तू ने जिसे नरक में झोंक दिया, उसे अपमानित कर दिया और अत्याचारियों का कोई सहायक न होगा।

हे हमारे पालनहार! हमने एक पुकारने वाले को ईमान के लिए पुकारते हुए सुना कि अपने पालनहार पर ईमान लाओ, तो हम ईमान ले आए। हे हमारे पालनहार! हमारे पाप क्षमा कर दे तथा हमारी बुराइयों को अनदेखी कर दे तथा हमारी मौत पुनीतों (सदाचारियों) के साथ हो।

हे हमारे पालनहार! हमें, तू ने रसूलों द्वारा जो वचन दिया है, हमें वो प्रदान कर तथा क़यामत के दिन हमें अपमानित न कर। वास्तव में तू वचन विरोधी नहीं है।

तो उनके पालनहार ने उनकी (प्रार्थना) सुन ली, (तथा कहा कि) निःसंदेह मैं किसी कार्यकर्ता के कार्य को व्यर्थ नहीं करता, नर हो अथवा नारी। तो जिन्होंने हिजरत (प्रस्थान) की, अपने घरों से निकाले गए, मेरी राह में सताए गए और युद्ध किया तथा मारे गए, तो हम अवश्य उनके दोषों को क्षमा कर देंगे तथा उन्हें ऐसे स्वर्गों में प्रवेश देंगे, जिनमें नहरें बह रही हैं। यह अल्लाह के पास से उनका प्रतिफल होगा और अल्लाह ही के पास अच्छा प्रतिफल है।

(ऐ नबी!) नगरों में काफ़िरों का (सुविधा के साथ) चलना-फिरना आपको धोखे में न डा दे।

यह तनिक लाभ है। फिर उनका स्थान नरक है और वह क्या ही बुरा आवास है!

परन्तु जो अपने पालनहार से डरे, तो उनके लिए ऐसे स्वर्ग हैं, जिनमें नहरें प्रवाहित हैं। उनमें वे सदावासी होंगे। यह अल्लाह के पास से अतिथि सत्कार होगा तथा जो अल्लाह के पास है, पुनीतों के लिए उत्तम है।

और निःसंदेह अह्ले किताब (अर्थात यहूद और ईसाई) में से कुछ ऐसे भी हैं, जो अल्लाह पर तथा तुम्हारी ओर जो उतारा गया है उसपर ईमान रखते हैं, अल्लाह से डरे रहते हैं और उसकी आयतों को थोड़ी-थोड़ी क़ीमतों पर बेचते भी नहीं। उनका बदला उनके रब के पास है। निःसंदेह अल्लाह जल्दी ही हिसाब लेने वाला है।

हे ईमान वालो! तुम धैर्य रखो, एक-दूसरे को थामे रखो, जिहाद के लिए तैयार रहो और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम अपने उद्देश्य को पहुँचो।"

[सूरा आल-ए-इमरान : 190-200]18

2- कपड़ा पहनने की दुआ

«الحَمْدُ للَّهِ الَّذِي كَسَانِي هَذَا (الثَّوْبَ) وَرَزَقَنِيهِ مِنْ غَيْرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلَّا قُوَّة...».

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे यह कपड़ा पहनाया और मुझे कपड़ा प्रदान किया, जबकि मेरे पास न कोई शक्ति है और न सामर्थ्य..."19

3- नया कपड़ा पहनने की दुआ

«اللَّهُمَّ لَكَ الحَمْدُ أَنْتَ كَسَوْتَنِيهِ، أَسْأَلُكَ مِنْ خَيْرِهِ وَخَيْرِ مَا صُنِعَ لَهُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّهِ وَشَرِّ مَا صُنِعَ لَهُ».

"ऐ अल्लाह! सारी प्रशंसा तेरी है कि तू ने मुझे यह कपड़ा पहनाया। मैं तुझसे इस कपड़े की भलाई तथा जिस काम के लिए इसे बनाया गया है, उसकी भलाई माँगता हूँ। इसी तरह मैं इसकी बुराई तथा जिस काम के लिए इसे बनाया गया है, उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।"20

4- नया कपड़ा पहनने वाले को दी जाने वाली दुआ

«تُبْلِي وَيُخْلِفُ اللَّهُ تَعَالَى».

"तुम इसे पहन कर पुराना करो और इसके बाद तुम्हें सर्वशक्तिमान अल्लाह नया कपड़ा दे।"21

«اِلبَسْ جَدِيدًا وَعِشْ حَمِيدًا وَمُتْ شَهِيدًا».

"तुम नया कपड़ा पहनो, प्रशंसनीय जीवन व्यतीत करो और शहीद होकर मरो।"22

5- कपड़ा उतारने की दुआ

«بِسْمِ اللَّه».

"मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ।"23

6- शौचालय जाने की दुआ

«[بِسْمِ اللَّهِ] اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الخُبْثِ وَالخَبَائِثِ».

"अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! मैं नापाक जिन्नों एवं नापाक जिन्नियों से तेरी शरण माँगता हूँ।"24

7- शौचालय से निकलने की दुआ

«غُفْرَانَكَ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी क्षमा का प्रार्थी हूँ।"25

8- वज़ू से पहले की दुआ

«بِسْمِ اللَّهِ».

"मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ।"26

9- वज़ू के बाद की दुआ

«أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ..».

"मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है और गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।"27

«اللَّهُمَّ اجْعَلْنِي مِنَ التَّوَّابِينَ وَاجْعَلْنِي مِنَ المُتَطَهِّرِينَ».

"ऐ अल्लाह, मुझे बहुत ज़्यादा तौबा करने वालों में से बना और ख़ूब साफ़-सुथरा रहने वालों में से बना।"28

«سُبْحانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَسْتَغْفِرُكَ وَأَتوبُ إِلَيْكَ».

"ऐ अल्लाह, तू पाक है और तेरी ही प्रशंसा है। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी ओर लौटकर आता हूँ।"29

10- घर से निकलने की दुआ

«بِسْمِ اللَّهِ، تَوَكَّلْتُ عَلَى اللَّهِ، وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّّا بِاللَّهِ».

"मैं अल्लाह का नाम लेकर निकलता हूँ। मैंने अल्लाह पर भरोसा किया। अल्लाह के अतिरिक्त न कोई भलाई का सामर्थ्य प्रदान कर सकता है और न बुराई से रोक सकता है।"30

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَضِلَّ، أَوْ أُضَلَّ، أَوْ أَزِلَّ، أَوْ أُزَلَّ، أَوْ أَظْلِمَ، أَوْ أُظْلَمَ، أَوْ أَجْهَلَ، أَوْ يُجْهَلَ عَلَيَّ».

"ऐ अल्लाह! मैं इस बात से तेरी शरण में आता हूँ कि स्वयं सीधे मार्ग से भटक जाऊँ या कोई मुझे सीधे मार्ग से हटा दे, स्वयं गुनाह में पड़ जाऊँ या कोई मुझे गुनाह में डाल दे, खुद किसी पर अत्याचार करूँ या कोई मुझपर अत्याचार करे, खुद अज्ञानता दिखाऊँ या कोई मेरे साथ अज्ञानतापूर्ण व्यवहार करे।"31

11- घर में प्रवेश करने की दुआ

«بِسْمِ اللَّهِ وَلَجْنَا، وَبِسْمِ اللَّهِ خَرَجْنَا، وَعَلَى اللَّهِ رَبِّنَا تَوَكَّلْنَا، ثُمَّ لِيُسَلِّمْ عَلَى أَهْلِهِ».

"अल्लाह के नाम के साथ हम अंदर आए और अल्लाह के नाम के साथ हम बाहर निकले तथा अल्लाह ही पर हम ने भरोसा किया जो हमारा पालनहार है।" यह दुआ पढ़ने के बाद अपने घर वालों को सलाम करे।32

12- मस्जिद जाने की दुआ

«اللَّهُمَّ اجْعَلْ فِي قَلْبِي نُورًا، وَفِي لِسَانِي نُورًا، وَفِي سَمْعِي نُورًا، وَفِي بَصَرِي نُورًا، وَمِنْ فَوْقِي نُورًا، وَمِنْ تَحْتِي نُورًا، وَعَنْ يَمِينِي نُورًا، وَعَنْ شِمَالِي نُورًا، وَمِنْ أَمَامِي نُورًا، وَمِنْ خَلْفِي نُورًا، وَاجْعَلْ فِي نَفْسِي نُورًا، وَأَعْظِمْ لِي نُورًا، وَعَظِّمْ لِي نُورًا، وَاجْعَلْ لِي نُورًا، وَاجْعَلْنِي نُورًا، اللَّهُمَّ أَعْطِنِي نُورًا، وَاجْعَلْ فِي عَصَبِي نُورًا، وَفِي لَحْمِي نُورًا، وَفِي دَمِي نُورًا، وَفِي شَعْرِي نُورًا، وَفِي بَشَرِي نُورًا».

"ऐ अल्लाह! मेरे हृदय में उजाला कर दे, मेरी ज़बान में उजाला कर दे, मेरे कान में उजाला कर दे, मेरी आँख में उजाला कर दे, मेरे ऊपर उजाला कर दे, मेरे नीचे उजाला कर दे, मेरे दाएँ उजाला कर दे, मेरे बाएँ उजाला कर दे, मेरे आगे उजाला कर दे, मेरे पीछे उजाला कर दे, मेरी अंतरात्मा में उजाला कर दे, मेरे लिए उजाला बड़ा कर दे तथा मेरे लिए उजाला को बहुत बड़ा कर दे और मुझे उजाला प्रदान करदे और मुझे स्वयं उजाला बना दे। ऐ अल्लाह! मुझे उजाला प्रदान कर, मेरे पट्ठों में उजाला कर दे, मेरे मांस में उजाला कर दे, मेरे रक्त में उजाला कर दे, मेरे बालों में उजाला कर दे और मेरी त्वचा में उजाला कर दे।"33

«اللَّهُمَّ اجْعَلْ لِي نُورًا فِي قَبْرِي... وَنُورًا فِي عِظَامِي» «وَزِدْنِي نُورًا، وَزِدْنِي نُورًا، وَزِدْنِي نُورًا» «وَهَبْ لِي نُورًا عَلَى نُورٍ».

"ऐ अल्लाह! मेरी क़ब्र में उजाला कर दे... और मेरी हड्डियों में उजाला कर दे।"34 "मेरे उजाले को बढ़ा दे, मेरे उजाले को बढ़ा दे, मेरे उजाले को बढ़ा दे।"35 "मुझे उजाला ही उजाला प्रदान कर।"36

13- मस्जिद में प्रवेश करने की दुआ

20- पहले अपना दायाँ पाँव अंदर रखेगा37 और कहेगा :

«أَعُوذُ بِاللَّهِ العَظِيمِ، وَبِوَجْهِهِ الكَرِيمِ، وَسُلْطَانِهِ القَدِيمِ، مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ» «بِسْمِ اللَّهِ، وَالصَّلَاةُ» «وَالسَّلَامُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ» «اللَّهُمَّ افْتَحْ لِي أَبْوَابَ رَحْمَتِكَ».

"मैं महान अल्लह, उसके सम्मानित मुख मंडल तथा उसके आद्य सत्ता की शरण में आता हूँ धुतकारे हुए शैतान से।"38 "मैं अल्लाह के नाम से प्रवेश करता हूँ, तथा अल्लाह की कृपा39 एवं शांति की बरखा बरसे उसके रसूल पर।"40 "ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी कृपा के द्वार खोल दे।"41

14- मस्जिद से निकलने की दुआ

"पहला अपना बायाँ पाँव बाहर निकाले।"42 और कहे : "मैं अल्लाह के नाम से प्रवेश करता हूँ। अल्लाह की कृपा एवं शांति की बरखा बरसे उसके रसूल पर। ऐ अल्लाह! मैं तेरे अनुग्रह का प्रार्थी हूँ। ऐ अल्लाह! मुझे धुतकारे हुए शैतान से बचा।"

«بِسْمِ اللَّهِ وَالصَّلَاةُ وَالسَّلَامُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِك، اللَّهُمَّ اعْصِمْنِي مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ».

"मैं अल्लाह के नाम से प्रवेश करता हूँ। अल्लाह की कृपा एवं शांति की बरखा बरसे उसके रसूल पर। ऐ अल्लाह! मैं तेरे अनुग्रह का प्रार्थी हूँ। ऐ अल्लाह! मुझे धुतकारे हुए शैतान से बचा।"43

15- अज़ान के अज़कार

22- (1) अज़ान सुनने वाला वही कुछ कहे जो अज़ान देने वाला कह रहा हो। अंतर बस यह है कि सुनने वाला "हय्या अलस्सलाह " तथा "हय्या अललफ़लाह" के उत्तर में कहेगा :

«لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ».

"अल्लाह की तौफ़ीक़ के बिना ना पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य की क्षमता।"44

23- (2) तथा यह दुआ पढ़े : "मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है। साथ ही इस बात की भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। मैं अल्लाह को प्रभु, मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को रसूल और इस्लाम को धर्म मानकर संतुष्ट हूँ।" यह दुआ मुअज़्ज़िन के "अशहदु अल ला इलाहा इल्लल्लाह" एवं "अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह" कहने के बाद कहे।

«وَأَنَا أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، رَضِيتُ بِاللَّهِ رَبًَّا، وَبِمُحَمَّدٍ رَسُولًا، وَبِالإِسْلَامِ دِينًَا»

"मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है। साथ ही इस बात की भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। मैं अल्लाह को प्रभु, मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को रसूल और इस्लाम को धर्म मानकर संतुष्ट हूँ।"45 (यह दुआ मुअज़्ज़िन के "अशहदु अल ला इलाहा इल्लल्लाह" एवं "अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह" कहने के बाद कहे।)46

24- (3) "मुअज़्ज़िन का उत्तर देने के बाद अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजे।"47

25- (4) इसके साथ यह दुआ भी पढ़े :

«اللَّهُمَّ رَبَّ هَذِهِ الدَّعْوَةِ التَّامَّةِ، وَالصَّلَاةِ القَائِمَةِ، آتِ مُحَمَّدًا الوَسِيلَةَ وَالفَضِيلَةَ، وَابْعَثْهُ مَقَامًَا مَحمُودًا الَّذِي وَعَدْتَهُ، [إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ المِيعَادَ]».

"ऐ अल्लाह! इस संपूर्ण आह्वान तथा खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को वसीला (जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान) और श्रेष्ठतम दर्जा प्रदान कर और उन्हें वह प्रशंसनीय स्थान प्रदान कर, जिसका तू ने उन्हें वचन दिया है। [निश्चय तू वचन नहीं तोड़ता]।"48

26- (5) अज़ान तथा इक़ामत के बीच अपने लिए दुआ करेगा, क्योंकि इस समय की जाने वाली दुआ रद्द नहीं की जाती।49

16- नमाज़ आरंभ करने की दुआ

«اللَّهُمَّ بَاعِدْ بَيْنِي وَبَيْنَ خَطَايَايَ كَمَا بَاعَدْتَ بَيْنَ المَشْرِقِ وَالمَغْرِبِ، اللَّهُمَّ نَقِّنِي مِنْ خَطَايَايَ كَمَا يُنَقَّى الثَّوْبُ الأَبْيَضُ مِنَ الدَّنَسِ، اللَّهُمَّ اغْسِلْني مِنْ خَطَايَايَ، بِالثَّلْجِ وَالماءِ وَالبَرَدِ».

"ऐ अल्लाह! मेरे तथा मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी पैदा कर दे, जितनी दूरी पूरब और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह! मुझे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे गुनाहों से पानी, बर्फ और ओले से धो दे।"50

«سُبْحانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَى جَدُّكَ، وَلَا إِلَهَ غَيْرُكَ».

"ऐ अल्लाह! तू पवित्र है। हम तेरी प्रशंशा करते हैं, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है और तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।"51

«وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ حَنِيفًَا وَمَا أَنَا مِنَ المُشْرِكِينَ، إِنَّ صَلَاتِي، وَنُسُكِي، وَمَحْيَايَ، وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ العَالَمِينَ، لَا شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا مِنَ المُسْلِمِينَ، اللَّهُمَّ أَنْتَ المَلِكُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَنْتَ رَبِّي وَأَنَا عَبْدُكَ، ظَلَمْتُ نَفْسِي وَاعْتَرَفْتُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي ذُنُوبي جَمِيعًَا إِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلَّا أَنْتَ، وَاهْدِنِي لِأَحْسَنِ الأَخْلاقِ لَا يَهْدِي لِأَحْسَنِها إِلَّا أَنْتَ، وَاصْرِفْ عَنِّي سَيِّئَهَا، لَا يَصْرِفُ عَنِّي سَيِّئَهَا إِلَّا أَنْتَ، لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ، وَالخَيْرُ كُلُّهُ بِيَـــــــدَيْكَ، وَالشَّـــــرُّ لَيْسَ إِلَيْــــــكَ، أَنَا بِكَ وَإِلَيْكَ، تَبارَكْتَ وَتَعَالَيْتَ، أَسْتَغْفِرُكَ وَأَتوبُ إِلَيْكَ».

"मैंने अपना मुख एकाग्र होकर, उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों तथा धरती की रचना की है और मैं मुश्रिकों में से नहीं हूँ। निश्चय मेरी नमाज़, मेरी क़ुर्बानी तथा मेरा जीवन-मरण संसार के पालनहार अल्लाह के लिए है, जिसका कोई साझी नहीं तथा मुझे इसी का आदेश दिया गया है और मैं मुसलमानों में से हूँ। ऐ अल्लाह तू ही बादशाह है और तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तू मेरा पालनहार है और मैं तेरा बंदा। मैंने अपने प्राण पर अत्याचार किया है और मैं अपने गुनाह का एतराफ़ करता हूँ। अतः, मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे। तेरे सिवा कोई क्षमा करने वाला नहीं है। मुझे सर्वोत्तम व्यवहार का मार्ग दिखा, जो कि तेरे अतिरिक्त कोई और दिखा नहीं सकता। मुझे कुव्यवहार से बचा, जिससे तेरे सिवा कोई बचा नहीं सकता। मैं तेरे आदेश के अनुपालन के लिए तत्पर हूँ और तेरे धर्म के अनुसरण के प्रति उत्साहित हूँ। सारी भलाइयाँ तेरे हाथ में हैं। जबकि बुराई की निसबत तेरी ओर नहीं की जा सकती। मुझे तू ही सामर्थ्य प्रदान करता है और मुझे तेरी ही ओर लौटकर जाना है। तू बड़ी भलाइयों वाला है और तेरी हस्ती बड़ी ऊँची है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी और लौटकर आता हूँ।"52

«اللَّهُمَّ رَبَّ جِبْرَائِيلَ، وَمِيْكَائِيلَ، وَإِسْرَافِيلَ، فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ، عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ أَنْتَ تَحْكُمُ بَيْنَ عِبَادِكَ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ، اهْدِنِي لِمَا اخْتُلِفَ فِيهِ مِنَ الحَقِّ بِإِذْنِكَ إِنَّكَ تَهْدِي مَنْ تَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقيمٍ».

"ऐ अल्लाह! ऐ जिबरील, मीकाईल तथा इसराफ़ील के रब! आकाश तथा धरती को बनाने वाले और हाज़िर और ग़ायब का ज्ञान रखने वाले! तू ही अपने बन्दों के मतभेदों का निर्णय करने वाला है। जिस सत्य के बारे में लोगों में मतभेद हो गया है, उसके बारे में मेरा मार्गदर्शन कर। निश्चय तू जिसे चाहता है, सीधा रास्ता दिखाता है।"53

«اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيرًَا، اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيرًا، اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيرًا، وَالحَمْدُ لِلَّهِ كَثيرًا، وَالحَمْدُ لِلَّهِ كَثيرًا، وَالحَمْدُ لِلَّهِ كَثيرًا، وَسُبْحَانَ اللَّهِ بُكْرَةً وَأَصِيلًا» ثَلاثًا «أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ: مِنْ نَفْخِهِ، وَنَفْثِهِ، وَهَمْزِهِ».

"अल्लाह बहुत बड़ा है, अल्लाह बहुत बड़ा है, अल्लाह बहुत बड़ा है। अल्लाह की अत्यधिक प्रशंसा है, अल्लाह की अत्यधिक प्रशंसा है, अल्लाह की अत्यधिक प्रशंसा है। मैं सुबह एवं शाम अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।" इस वाक्य को (भी ऊपर के दोनों वाक्यों की तरह) तीन बार कहेगा। मैं अल्लाह की शरण में आता हूँ शैतान; उसके अभिमान, शर और उन्माद से।"54

«اللَّهُمَّ لَكَ الحَمْدُ، أَنْتَ نُورُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ، وَلَكَ الحَمْدُ أَنْتَ قَيِّمُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ، [وَلَكَ الحَمْدُ أَنْتَ رَبُّ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ] [وَلَكَ الحَمْدُ لَكَ مُلْكُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ] [وَلَكَ الحَمْدُ أَنْتَ مَلِكُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ] [وَلَكَ الحَمْدُ] [أَنْتَ الحَقُّ، وَوَعْدُكَ الحَقُّ، وَقَوْلُكَ الحَقُّ، وَلِقاؤُكَ الحَقُّ، وَالجَنَّةُ حَقٌّ، وَالنَّارُ حَقٌّ، وَالنَّبِيُّونَ حَقٌّ، وَمحَمَّدٌ ﷺ حَقٌّ، وَالسَّاعَةُ حَقٌّ] [اللَّهُمَّ لَكَ أَسْلَمتُ، وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَإِلَيْكَ أَنَبْتُ، وَبِكَ خاصَمْتُ، وَإِلَيْكَ حاكَمْتُ. فَاغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ، وَمَا أَخَّرْتُ، وَمَا أَسْرَرْتُ، وَمَا أَعْلَنْتُ] [وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي] [أَنْتَ المُقَدِّمُ، وَأَنْتَ المُؤَخِّرُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ] [أَنْتَ إِلَهِي لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ] [وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ]».

"ऐ अल्लाह! सारी प्रशंसा तेरी है55 कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का प्रकाश है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का संरक्षक है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का पालनहार है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का प्रभु है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का शासक है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू सत्य है, तेरा वचन सत्य है, तेरा कथन सत्य है, तुझसे मिलना सत्य है, जन्नत सत्य है, जहन्नम सत्य है, सारे नबी-गण सत्य हैं, मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सत्य हैं और क़यामत सत्य है। ऐ अल्लाह! मैंने तेरे आगे सिर झुकाया, तेरे ऊपर भरोसा किया, तुझपर ईमान रखा, तुझसे नाता जोड़ा, तेरे ज़रिए वाद-विवाद किया और अपने सारे मामलों को तेरे सामने रखा। अतः, मैंने जो भी बुरे कर्म किए, जो भी अच्छे कर्म छोड़े, जो कुछ छुपा कर किया और जिसे तू मुझसे अधिक जानता है, उन सब को माफ़ कर दे। तू ही आगे करने वाला और तू ही पीछे करने वाला है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तू मेरा पूज्य है और तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। अल्लाह की तौफीक के बिना न किसी के पास अच्छा काम करने की क्षमता है और न बुरे काम से बचने की शक्ति है।"56

17- रुकू की दुआ

«سُبْحانَ رَبِّيَ العَظِيمِ». ثلاث مرَّاتٍ.

33- (1) "मैं अपने महान पालनहार की पवित्रता बयान करता हूँ।" तीन बार।57

«سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي».

"ऐ अल्लाह! तू पाक है। ऐ हमारे पालनहार! तेरी प्रशंसा है। ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे।"58

«سُبُّوُحٌ، قُدُّوسٌ، رَبُّ المَلَائِكَةِ وَالرُّوحِ».

"ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है।"59

«اللَّهُمَّ لَكَ رَكَعْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَلَكَ أَسْلَمْتُ، خَشَعَ لَكَ سَمْعِي، وَبَصَرِي، وَمُخِّي، وَعَــــظْمِي، وَعَصَبِي، [وَمَا استَقَلَّتْ بِهِ قَدَمِي]».

"ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रुकू किया, तुझपर ईमान रखा और तेरे आगे सिर झुकाया। तेरे सामने नत्मस्तक हुआ मेरा कान, मेरी आँख, मेरा विवेक, मेरी हड्डी, मेरा पट्ठा और मेरा पूरा शरीर।"60

«سُبْحَانَ ذِي الجَبَرُوتِ، وَالمَلَكُوتِ، وَالكِبْرِيَاءِ، وَالعَظَمَةِ».

"पवित्र है वह अल्लाह, जो प्रबलता , प्रभुत्व , महानता और विशालता से विसेषित है।"61

18- रुकू से उठाने की दुआ

«سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ».

"अल्लाह ने उस बंदे की सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की।"62

«رَبَّنَا وَلَكَ الحَمْدُ، حَمْدًا كَثيرًا طَيِّبًا مُبارَكًا فِيهِ».

"ऐ हमारे रब, तेरी ही प्रशंसा है, अत्यधिक, पवित्र तथा बरकत वाली प्रशंसा।"63

«مِلْءَ السَّمَوَاتِ وَمِلْءَ الأَرْضِ، وَمَا بَيْنَهُمَا، وَمِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيءٍ بَعْدُ. أَهلَ الثَّناءِ وَالمَجْدِ، أَحَقُّ مَا قَالَ العَبْدُ، وَكُلُّنَا لَكَ عَبْدٌ، اللَّهُمَّ لَا مَانِعَ لِمَا أَعْطَيْتَ، وَلَا مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ، وَلَا يَنْفَعُ ذَا الجَدِّ مِنْكَ الجَدُّ».

"आकाशों एवं धरती, उन दोनों के बीच की सारी चीज़ों और इसके बाद तू जो कुछ चाहे, उसकी समाई के बराबर। ऐ प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा के मालिक! तू बंदे की प्रशंसा का सबसे अधिक हक़दार है और हम सब तेरे बंदे हैं। ऐ अल्लाह! जो कुछ तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है और जो कुछ तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है तथा किसी प्रतिष्ठावान व्यक्ति की प्रतिष्ठा तेरे यहाँ कुछ काम नहीं दे सकती।"64

19- सजदे की दुआ

«سُبْحَانَ رَبِّيَ الأَعْلَى» ثَلاثَ مَرَّاتٍ.

41- (1) "मैं अपने उच्च पालनहार की पवित्रता बयान करता हूँ।" तीन बार।65

«سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي».

"ऐ अल्लाह! तू पाक है। ऐ हमारे पालनहार! तेरी प्रशंसा है। ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे।"66

«سُبُّوحٌ، قُدُّوسٌ، رَبُّ المَلَائِكَةِ وَالرُّوحِ».

"ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है।"67

«اللَّهُمَّ لَكَ سَجَدْتُ وَبِكَ آمَنْتُ، وَلَكَ أَسْلَمْتُ، سَجَدَ وَجْهِيَ لِلَّذِي خَلَقَهُ، وَصَوَّرَهُ، وَشَقَّ سَمْعَهُ وَبَصَرَهُ، تَبَارَكَ اللَّهُ أَحْسَنُ الخَالِقِينَ».

"ऐ अल्लाह! मैंने तेरे सामने सजदा किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तेरे सामने नत्मस्तक हुआ। मेरा चेहरा उसके लिए सजदे में गया, जिसने उसे पैदा किया, उसे आकृति दी और उसकी सुनवाई और उसकी दृष्टि के लिए जगह बनाया । बड़ी बरकत वाला है अल्लाह, जो सबसे अच्छा उत्पत्तिकार है।"68

«سُبْحَانَ ذِي الجَبَرُوتِ، وَالمَلَكُوتِ، وَالكِبْرِيَاءِ، وَالعَظَمَةِ».

"पवित्र है वह अल्लाह, जो प्रबलता , प्रभुत्व , महानता और विशालता से विसेषित है।"69

«اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي ذَنْبِي كُلَّهُ: دِقَّهُ وَجِلَّهُ، وَأَوَّلَهُ وَآخِرَهُ، وَعَلَانِيَّتَهُ وَسِرَّهُ».

"ऐ अल्लाह! तू मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे; छोटे-बड़े, अगले-पिछले तथा खुले एवं छुपे सभी को।"70

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقوبَتِكَ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْكَ، لَا أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरे क्रोध से तेरी प्रसन्नता की शरण माँगता हूँ, तेरी सज़ा से तेरे क्षमादान की शरण माँगता हूँ और तुझसे तेरी शरण में आता हूँ। मैं तेरी समपूर्ण प्रशंसा नहीं कर सकता। तू वैसा ही है, जैसा तूने अपनी प्रशंसा स्वयं की है।"71

20- दो सजदों के बीच बैठने की अवस्था में पढ़ी जाने वाली दुआ

«رَبِّ اغْفِرْ لِي، رَبِّ اغْفِرْ لِي».

"ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे। ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे।"72

«اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي، وَارْحَمْنِي، وَاهْدِنِي، وَاجْبُرْنِي، وَعَافِنِي، وَارْزُقْنِي، وَارْفَعْنِي».

"ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा प्रदान कर, मुझपर दया कर, मुझे सत्य का मार्ग दिखा, मेरी चारागरी कर, मुझे हर विपत्ति से सुरक्षित रख, मुझे रोज़ी प्रदान कर और मुझे ऊँचा कर दे।"73

21- सजदा-ए-तिलावत की दुआ

«سَجَدَ وَجْهِيَ لِلَّذِي خَلَقَهُ، وَشَقَّ سَمْعَهُ وَبَصَرَهُ بِحَوْلِهِ وَقُوَّتِهِ، ﴿...فَتَبارَكَ اللَّهُ أَحْسَنُ الخَالِقِينَ﴾».

"मेरे चेहरे ने उसके सामने सजदा किया, जिसने उसे पैदा किया तथा अपने सामर्थ्य एवं शक्ति के बल पर उसकी सुनवाई और उसकी दृष्टि के लिए जगह बनाया। बड़ी बरकत वाला है अल्लाह, जो सबसे अच्छा पैदा करने वाला है।"

[सूरा मोमिनून : 14]74.

«اللَّهُمَّ اكْتُبْ لِي بِهَا عِنْدَكَ أَجْرًا، وَضَعْ عَنِّي بِهَا وِزْرًا، وَاجْعَلْهَا لِي عِنْدَكَ ذُخْرًا، وَتَقَبَّلْهَا مِنِّي كَمَا تَقَبَّلْتَهَا مِنْ عَبْدِكَ دَاوُدَ».

"ऐ अल्लाह! तू अपने यहाँ मेरे लिए इस सजदे का प्रतिफल लिख ले, इसके बदले में मेरा गुनाह मिटा दे, इसे अपने यहाँ मेरा कोश बना दे और इसे मेरी ओर से उसी तरह ग्रहण कर ले, जैसे अपने बंदे दाऊद की ओर से ग्रहण किया था।"75

22- तशह्हुद

«التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ، وَالصَّلَواتُ، وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسولُهُ».

"हर प्रकार का सम्मान, समग्र दुआ़एँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। हे नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो। हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उस के रसूल हैं।"76

 

23- तशह्हुद के बाद अल्लाह के नबी-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-पर दरूद

«اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ، وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ».

"हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जिस प्रकार से तू ने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति की प्रशंसा की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तू ने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है।"77

«اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى أَزْوَاجِهِ وَذُرِّيَّتِهِ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، وَبَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى أَزْواجِهِ وَذُرِّيَّتِهِ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ».

"ऐ अल्लाह! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की और उनकी पत्नियों तथा संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जैसे इबराहीम -अलैहिस्सलाम- की संतान-संतति की प्रशंसा की है। निश्चय ही, तू प्रशंसायोग्य और सम्मानित है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और आपकी पत्नियों तथा संतान-संतति में उसी प्रकार बरकत दे, जैसे इबराहीम -अलैहिस्सलाम- के अंदर बरकत रखी थी। निश्चय ही, तू प्रशंसा-योग्य और सम्मानित है।"78

24- अंतिम तशह्हुद के बाद सलाम से पहले की दुआ

«اللَّهُــمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ، وَمِنْ عَذَابِ جَهَنَّمَ، وَمِنْ فِتْنَةِ المَحْيَا وَالمَمَاتِ، وَمِنْ شَرِّ فِتْنَةِ المَسِيحِ الدَّجَّالِ».

"हे अल्लाह! मैं तेरी शरण चाहता हूँ, क़ब्र के अज़ाब से, नरक की यातना से, क़ब्र के अज़ाब से, जीवन और मृत्यु के फितने से और मसीह दज्जाल के फितने से।"79

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ المَسِيحِ الدَّجَّالِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ المَحْيَا وَالمَمَاتِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ المَأْثَمِ وَالمَغْرَمِ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ क़ब्र की यातना से, मैं तेरी शरण माँगता हूँ मसीह दज्जाल के फ़ितने से और मैं तेरी शरण माँगता हूँ जीवन-मरण के फ़ितने से। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ गुनाह तथा क़र्ज़ से।"80

«اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْمًا كَثِيرًا، وَلَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ، فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِي، إِنَّكَ أَنْتَ الغَفُورُ الرَّحِيمُ».

"ऐ अल्लाह! मैंने अपने आप पर बड़ा अत्याचार किया है और तेरे सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं कर सकता। इसलिए मुझे अपनी ओर से क्षमा प्रदान कर और मुझपर दया कर। निःसंदेह तू ही क्षमा करने वाला, अति दयालु है।"81

«اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ، وَمَا أَخَّرْتُ، وَمَا أَسْرَرْتُ، وَمَا أَعْلَنْتُ، وَمَا أَسْرَفْتُ، وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي، أَنْتَ المُقَدِّمُ، وَأَنْتَ المُؤَخِّرُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ».

"हे अल्लाह, तू मेरे पापों तथा कोताहियों को क्षमा कर दे, मेरे छिपाकर किए गए गुनाहों को माफ़ कर दे, मेरे दिखाकर किए गए गुनाहों को माफ़ कर दे, मेरी ओर से की गई ज़्यादतियों को माफ़ कर दे तथा उन गुनाहों को भी माफ़ कर दे, जिन्हें तू मुझसे अधिक जानता है। तू ही आगे करने वाला और तू ही पीछे करने वाला है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं"82

«اللَّهُمَّ أَعِنِّي عَلَى ذِكْرِكَ، وَشُكْرِكَ، وَحُسْنِ عِبادَتِكَ».

"ऐ अल्लाह! अपने ज़िक्र, शुक्र और अच्छी तरह इबादत करने के संबंध में मेरी मदद फ़रमा।"83

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ البُخْلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الجُبْنِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ أَنْ أُرَدَّ إِلَى أَرْذَلِ العُمُرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الدُّنْيَا وَعَذَابِ القَبْرِ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ कृपणता से, मैं तेरी शरण में आता हूँ कायरता से, मैं तेरी शरण में आता हूँ लाचारी की आयु में लौटाए जाने से तथा मैं तेरी शरण में आता हूँ दुनिया के फ़ितने एवं क़ब्र की यातना से।"84

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الجَنَّةَ وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत माँगता हूँ और जहन्नम से तेरी शरण में आता हूँ।"85

«اللَّهُمَّ بِعِلْمِكَ الغَيْبَ وَقُدْرَتِكَ عَلَى الخَلقِ أَحْيِنِي مَا عَلِمْتَ الحَيَاةَ خَيْرًا لِي، وَتَوَفَّنِي إِذَا عَلِمْتَ الْوَفَاةَ خَيْرًا لِي، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَشْيَتَكَ فِي الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ، وَأَسْأَلُكَ كَلِمَةَ الحَقِّ فِي الرِّضَا وَالغَضَبِ، وَأَسْأَلُكَ القَصْدَ فِي الغِنَى وَالفَقْرِ، وَأَسْأَلُكَ نَعِيمًا لَا يَنْفَدُ، وَأَسْأَلُكَ قُرَّةَ عَيْنٍ لَا تَنْقَطِعُ، وَأَسْأَلُكَ الرِّضَا بَعْدَ القَضَاءِ، وَأَسْــــأَلُكَ بَرْدَ العَيْشِ بَعْدَ المَوْتِ، وَأَسْأَلُكَ لَذَّةَ النَّظَرِ إِلَى وَجْهِكَ، وَالشَّوْقَ إِلَى لِقَائِكَ فِي غَيرِ ضَرَّاءَ مُضِرَّةٍ، وَلَا فِتْنَةٍ مُضِلَّةٍ، اللَّهُمَّ زَيِّنَا بِزِينَةِ الإِيمَانِ، وَاجْعَلْنَا هُدَاةً مُهْتَدِينَ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरे ग़ैब की बात जानने तथा सृष्टि पर तेरे सामर्थ्य का वास्ता देकर तुझसे विनती करता हूँ कि मुझे उस समय तक जीवित रख जब तक तेरे ज्ञान के अनुसार जीना मेरे लिए अच्छा हो, तथा उस समय मौत दे दे जब तेरे ज्ञान के अनुसार मर जाना ही मेरे लिए अच्छा हो। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरा ऐसा भय माँगता हूँ जो ज़ाहिर एवं बातिन में हो, शांत तथा क्रोधित स्थिति में सत्य बात कहने का सुयोग माँगता हूँ, संपन्नता तथा दरिद्रता जैसी अवस्थाओं में संतुलन माँगता हूँ, ऐसी नेमत माँगता हूँ जो कभी ख़त्म न हो, आँखों की ऐसी ठंडक माँगता हूँ जिसका सिलसिला कभी न टूटे। मैं तेरा निर्णय सामने आने के बाद उससे संतुष्ट रहने का सुयोग माँगता हूँ, मृत्यु के बाद सुखी जीवन माँगता हूँ, तेरे मुखमंडल को देखने का सौभाग्य माँगता हूँ और तुझसे मिलने की अभिलाषा माँगता हूँ। ऐसी अभिलाषा, जिसमें न विनाशकारी हानि हो और न पथभ्रष्ट कर देने वाला फ़ितना। ऐ अल्लाह! हमें ईमान की शोभा से सुशोभित कर तथा हमें सत्य के मार्ग पर चलने वाला तथा उसका प्रचारक बना।"86

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ يَا أَللَّهُ بِأَنَّكَ الوَاحِدُ الأَحَدُ الصَّمَدُ الَّذِي لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ، وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ، أَنْ تَغْفِرَ لِي ذُنُوبِي إِنَّكَ أَنْتَ الغَفُورُ الرَّحِّيمُ».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस बात के आधार पर कि तू अकेला और बेनियाज़ है, न तेरी कोई संतान है और न तू किसी की संतान है और न कोई तेरा समकक्ष है, विनती करता हूँ कि मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे। निःसंदेह तू बहुत क्षमा करने वाला और दयालु है।"87

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِأَنَّ لَكَ الحَمْدَ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ وَحْدَكَ لَا شَرِيكَ لَكَ، المَنَّانُ، يَا بَدِيعَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ يَا ذَا الجَلَالِ وَالإِكْرَامِ، يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ إِنِّي أَسْأَلُكَ الجَنَّةَ وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस आधार पर विनती करता हूँ कि सारी प्रशंसा तेरी है, तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं है, और तू बड़ा उपकारी एवं दाता है। ऐ आकाशों तथा धरती के रचयिता! ऐ विशाल प्रभु एवं दाता! ऐ जीवित तथा नित्य स्थायी! मैं तुझसे जन्नत माँगता हूँ और जहन्नम से तेरी शरण माँगता हूँ।"88

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِأَنَّي أَشْهَدُ أَنَّكَ أَنْتَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ الأَحَدُ الصَّمَدُ الَّذِي لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे विनती करता हूँ, क्योंकि मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू अकेला है, बेनियाज़ है, न तेरी कोई संतान है और न तू किसी की संतान है और न कोई तेरा समकक्ष है।"89

25- सलाम फेरने के बाद के अज़कार

«أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ (ثَلَاثًا) اللَّهُمَّ أَنْتَ السَّلَامُ، وَمِنْكَ السَّلَامُ، تَبَارَكْتَ يَا ذَا الجَلَالِ وَالإِكْرَامِ».

"मैं अल्लाह से क्षमा याचना करता हूँ (तीन बार)। ऐ अल्लाह! तू ही सुरक्षा तथा शांति का मालिक है और तेरी ही ओर से सुरक्षा एवं शांति प्राप्त होती है। हे महानता और भलाई वाले ! तू बड़ी बरकतों वाला है।"90

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ [ثَلاثًا]، اللَّهُمَّ لَا مَانِعَ لِمَا أَعْطَيْتَ، وَلَا مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ، وَلَا يَنْفَعُ ذَا الجَدِّ مِنْكَ الجَدُّ».

"अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम में सक्षम है (तीन बार)। ऐ अल्लाह! जो कुछ तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है और जो कुछ तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है तथा किसी प्रतिष्ठावान व्यक्ति की प्रतिष्ठा तेरे यहाँ कुछ काम नहीं दे सकती।"91

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ، وَلَهُ الحَمدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَلَا نَعْبُدُ إِلَّا إِيَّاهُ لَهُ النِّعْمَةُ وَلَهُ الفَضْلُ وَلَهُ الثَّنَاءُ الحَسَنُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الكَافِرُونَ».

"अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम में सक्षम है। अल्लाह के अतिरिक्त न कोई भलाई का सामर्थ्य प्रदान कर सकता है और न बुराई से रोकने की क्षमता रखता है। अल्लाह के सिवा कोई सच्चा उपास्य नहीं है, हम केवल उसी की उपासना करते हैं, उसी की सब नेमतें हैं और उसी का सब पर उपकार है और उसी के लिए समस्त अच्छी प्रशंसाएँ हैं। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, हम उसी के लिए धर्म को शुद्ध करते हैं, चाहे ये बात काफिरों को नागवार लगती हो।"92

«سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالحَمْدُ لِلَّهِ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ (ثلاثًا وثلاثين) لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ».

अल्लाह पवित्र है, सारी प्रशंसा अल्लाह की है और अल्लाह सबसे बड़ा है (तेंतीस बार)। अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम में सक्षम है।" [93}93

﴿قُلۡ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ1 ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ2 لَمۡ يَلِدۡ وَلَمۡ يُولَدۡ3 وَلَمۡ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدُۢ4﴾

“(आप) कह दीजिए कि अल्लाह एक है।

अल्लाह निःछिद्र है।

न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।

और न उसके बराबर कोई है।

[सूरा इख़लास : 1-4]

﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلۡفَلَقِ1 مِن شَرِّ مَا خَلَقَ2 وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ3 وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّٰثَٰتِ فِي ٱلۡعُقَدِ4 وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ5﴾

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं भोर के रब की शरण लेता हूँl

हर उस चीज़ की बुराई से, जिसे उसने पैदा किया।

तथा रात की बुराई से, जब उसका अंधेरा छा जाए।

तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से।

तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।

[सूरा फ़लक़ : 1-5]

﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ1 مَلِكِ ٱلنَّاسِ2 إِلَٰهِ ٱلنَّاسِ3 مِن شَرِّ ٱلۡوَسۡوَاسِ ٱلۡخَنَّاسِ4 ٱلَّذِي يُوَسۡوِسُ فِي صُدُورِ ٱلنَّاسِ5 مِنَ ٱلۡجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ6﴾

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं मनुष्यों के रब की शरण में आता हूँ l

जो सारे इन्सानों का स्वामी है।

जो सारे इन्सानों का पूज्य है।

भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले (शैतान ) की बुराई से।

जो लोगों के दिलों में भ्रम डालता रहता है।

जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी।

[सूरा नास : 1-6]

हर नमाज़ के बाद।94

﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُۚ لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِۦۚ يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيۡءٖ مِّنۡ عِلۡمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَۚ وَسِعَ كُرۡسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفۡظُهُمَاۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ255﴾

“अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह जीवित तथा नित्य स्थायी है। ना उसे ऊँघ आती है और ना निद्रा आती है। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, उन सब को अल्लाह जानता है। लोग उसके ज्ञान में से उतना ही जान सकते हैं, जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोए हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च, महान है।”

[सूरा बक़रा : 255] इसे हर नमाज़ के बाद पढ़ा जाए।95

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ يُحْيِي وَيُمِيتُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ» عَشْرَ مَرَّاتٍ بَعْدَ صَلَاةِ المَغْرِبِ وَالصُّبْحِ.

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य और उसी की सब प्रशंसा है, वह जीवन और मृत्यु देता है और वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है।" इसे मग़्रिब एवं सुबह की नमाज़ के बाद दस बार पढ़ा जाए।96

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلًا مُتَقَبَّلًا» بَعْدَ السَّلامِ مِنْ صَلَاةِ الفَجْرِ.

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभकारी ज्ञान, पवित्र रोज़ी एवं ग्रहण होने वाला अमल माँगता हूँ।" इस दुआ को फ़ज्र की नमाज़ से सलाम फेरने के बाद पढ़ा जाए।97

26- इस्तिख़ारा की नमाज़ की दुआ

जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमें सभी कामों के लिए उसी प्रकार इस्तिख़ारा सिखाते थे, जिस प्रकार हमें क़ुरआन की सूरा सिखाते थे। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फरमाते हैं:

«إِذَا هَمَّ أَحَدُكُمْ بِالأَمْرِ فَلْيَرْكَعْ رَكْعَتَيْنِ مِنْ غَيْرِ الفَرِيضَةِ، ثُمَّ لْيَقُلْ: اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْتَخِيرُكَ بِعِلْمِكَ، وَأَسْتَقْدِرُكَ بِقُدْرَتِكَ، وَأَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ العَظِيمِ؛ فَإِنَّكَ تَقْدِرُ وَلَا أَقْدِرُ، وَتَعْلَمُ وَلَا أَعْلَمُ، وَأَنْتَ عَلَّامُ الغُيُوبِ، اللَّهُمَّ إِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هَذَا الأمْرَ - وَيُسَمِّي حَاجَتَهُ - خَيْرٌ لِي فِي دِينِي وَمَعَاشِي وَعَاقِبَةِ أَمْرِي – أَوْ قَالَ: عَاجِلِهِ وَآجِلِهِ - فَاقْدُرْهُ لِي وَيَسِّرْهُ لِي ثمَّ بَارِكْ لِي فِيهِ، وَإِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هَذَا الْأَمْرَ شَرٌّ لِي فِي دِينِي وَمَعَاشِي وَعَاقِبَةِ أَمْرِي – أَوْ قَالَ: عَاجِلِهِ وَآجِلِهِ – فَاصْرِفْهُ عَنِّي وَاصْرِفْنِي عَنْهُ وَاقْدُرْ لِيَ الْخَيْرَ حَيْثُ كَانَ، ثُمَّ أَرْضِنِي بِهِ».

"जब तुममें से कोई व्यक्ति किसी काम का इरादा करे, तो दो रकात नफ़ल नमाज़ पढ़े और उसके बाद यह दुआ पढ़े : ऐ अल्लाह! मैं तेरे अपार ज्ञान के कारण तुझसे भलाई माँगता हूँ, तेरे असीम सामर्थ्य के कारण तुझसे सामर्थ्य माँगता हूँ, और तुझसे तेरे बड़े अनुग्रह का प्रार्थी हूँ। क्योंकि तू सामर्थ्यवान है, मैं सामर्थ्य नहीं रखता और तू जानता है, मैं नहीं जानता। ऐ अल्लाह! यदि तू जानता है कि यह कार्य (यहाँ कार्य का नाम लेकर बताए) मेरे धर्म, मेरी दुनिया और मेरी आख़िरत के लिए बेहतर है, (या यूँ कहे कि मेरी इस दुनिया और उस दुनिया के लिए बेहतर है) तो इसे मेरे लिए निर्धारित कर दे तथा इसे करना मेरे लिए सरल बना दे और फिर मेरे लिए उसमें बरकत भी रख दे। लेकिन यदि तू जानता है कि यह कार्य मेरे धर्म, मेरी दुनिया और मेरी आख़िरत के लिए बेहतर नहीं है, (या यूँ कहे कि मेरी इस दुनिया और उस दुनिया के लिए बेहतर नहीं है) तो उसको मुझसे और मुझको उससे दूर फ़रमा और मेरे लिए भलाई निश्चित कर दे, जहाँ कहीं भी हो और फिर मुझे उसपर संतुष्टि प्रदान कर।"98

याद रहे कि जिसने अल्लाह से भलाई तलब की, इमानदार लोगों का परामर्श लिया और पूरी लगन के साथ काम किया, वह शर्मिंदा नहीं हो सकता। उच्च एवं पाक अल्लाह का फ़रमान है :

﴿...وَشَاوِرۡهُمۡ فِي ٱلۡأَمۡرِۖ فَإِذَا عَزَمۡتَ فَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱللَّهِ...﴾.

"तथा उनसे भी मामले में परामर्श करो, फिर जब कोई दृढ़ संकल्प ले लो, तो अल्लाह पर भरोसा करो।"99

27- सुबह तथा शाम के अज़कार

«الحَمْدُ لِلَّهِ وَحْدَهُ، وَالصَّلَاةُ وَالسَّلَامُ عَلَى مَنْ لَا نَبِيَّ بَعْدَهُ».

"हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए है तथा उसकी दया और शांति अवतरित हो उसके अंतिम संदेष्टा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर।"100

"मैं धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।"

﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُۚ لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِۦۚ يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيۡءٖ مِّنۡ عِلۡمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَۚ وَسِعَ كُرۡسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفۡظُهُمَاۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ255﴾

“अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, वह जीवित तथा नित्य स्थायी है। ना उसे ऊँघ आती है और ना निद्रा आती है। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, उन सब को अल्लाह जानता है। लोग उसके ज्ञान में से उतना ही जान सकते हैं, जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोए हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च, महान है।”

[सूरा बक़रा : 255]101

﴿قُلۡ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ1 ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ2 لَمۡ يَلِدۡ وَلَمۡ يُولَدۡ3 وَلَمۡ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدُۢ4﴾

“(आप) कह दीजिए कि अल्लाह एक है।

अल्लाह निःछिद्र है।

न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।

और न उसके बराबर कोई है।

[सूरा इख़लास : 1-4]

﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلۡفَلَقِ1 مِن شَرِّ مَا خَلَقَ2 وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ3 وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّٰثَٰتِ فِي ٱلۡعُقَدِ4 وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ5﴾

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं भोर के रब की शरण लेता हूँl

हर उस चीज़ की बुराई से, जिसे उसने पैदा किया।

तथा रात की बुराई से, जब उसका अंधेरा छा जाए।

तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से।

तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।

[सूरा फ़लक़ : 1-5]

﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ1 مَلِكِ ٱلنَّاسِ2 إِلَٰهِ ٱلنَّاسِ3 مِن شَرِّ ٱلۡوَسۡوَاسِ ٱلۡخَنَّاسِ4 ٱلَّذِي يُوَسۡوِسُ فِي صُدُورِ ٱلنَّاسِ5 مِنَ ٱلۡجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ6﴾

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं मनुष्यों के रब की शरण में आता हूँ l

जो सारे इन्सानों का स्वामी है।

जो सारे इन्सानों का पूज्य है।

भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले (शैतान ) की बुराई से।

जो लोगों के दिलों में भ्रम डालता रहता है।

जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी।

[सूरा नास : 1-6] तीन बार।102

«أَصْبَحْنَا وَأَصْبَحَ المُلْكُ لِلَّهِ، وَالحَمْدُ لِلَّهِ، لَا إِلَهَ إلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، رَبِّ أَسْأَلُكَ خَيْرَ مَا فِي هَذَا اليَوْمِ وَخَيرَ مَا بَعْدَهُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِي هَذَا اليَوْمِ وَشَرِّ مَا بَعْدَهُ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنَ الكَسَلِ وَسُوءِ الكِبَرِ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابٍ فِي النَّارِ وَعَذَابٍ فِي القَبْرِ».

"हमने तथा अल्लाह के राज्य ने सुबह की103, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, सारा राज्य उसी का है और सब प्रशंसा उसी की है और वह हर बात की क्षमता रखता है। ऐ मेरे पालनहार! मैं तुझसे इस दिन की तथा इसके बाद की भलाइयाँ माँगता हूँ104। इसी तरह इस दिन की तथा इसके बाद की बुराइयों से तेरी शरण में आता हूँ। ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण में आता हूँ सुस्ती तथा बुढ़ापे की बुराई से। ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण माँगता हूँ आग की यातना और क़ब्र के अज़ाब से।"105

«اللَّهُمَّ بِكَ أَصْبَحْنَا، وَبِكَ أَمْسَيْنَا، وَبِكَ نَحْيَا، وَبِكَ نَمُوتُ وَإِلَيْكَ النُّشُورُ».

"ऐ अल्लाह, हमने तेरे (अनुग्रह के) साथ सुबह की और तेरे ही (अनुग्रह के) साथ शाम की106 और हम तेरे ही अनुग्रह से जीते हैं और तेरे ही नाम से मरते हैं, और हमें तेरी ही ओर उठकर जाना है।"107

«اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ».

"ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तूने ही मेरी रचना की है और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं तुझसे की हुई प्रतिज्ञा एवं वादे को हर संभव पूरा करने का प्रयत्न करूँगा। मैं अपने हर उस कृत्य से तेरी शरण में आता हूँ, जिसके कारण मैं तेरी रह़मत से दूर हो जाऊँ। मैं तेरी ओर से दी जाने वाली नेमतों (अनुग्रहों) का तथा अपनी ओर से किए जाने वाले पापों का इक़रार करता हूँ108। तू मुझे माफ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा पापों को क्षमा करने वाला कोई नहीं है।"109

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَصْبَحْتُ أُشْهِدُكَ، وَأُشْهِدُ حَمَلَةَ عَرْشِكَ، وَمَلَائِكَتِكَ، وَجَمِيعَ خَلْقِكَ، أَنَّكَ أَنْتَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ وَحْدَكَ لَا شَرِيكَ لَكَ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُكَ وَرَسُولُكَ» أَرْبَعَ مَرَّاتٍ.

"ऐ अल्लाह! मैंने सुबह की110। मैं तुझे, तेरा अर्श उठाने वाले फ़रिश्तों को, अन्य फ़रिश्तों को तथा तेरी सारी सृष्टि को गवाह बनाता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं है और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तेरे बंदे और रसूल हैं।" इसे चार बार पढ़ा जाए।111.

«اللَّهُمَّ مَا أَصْبَحَ بِي مِنْ نِعْمَةٍ أَوْ بِأَحَدٍ مِنْ خَلْقِكَ فَمِنْكَ وَحْدَكَ لَا شَرِيكَ لَكَ، فَلَكَ الحَمْدُ وَلَكَ الشُّكْرُ».

"ऐ अल्लाह! सुबह के समय112 मेरे तथा तेरी हर सृष्टि के साथ जो भी नेमत है, वह केवल तेरी ओर से है और उसमें तेरा कोई साझी नहीं है। अतः तेरी ही प्रशंसा है और तेरा ही शुक्र है।"113

«اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَدَنِي، اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي سَمْعِي، اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَصَرِي، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الكُفْرِ، وَالفَقْرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ» ثلاثَ مرَّاتٍ.

"ऐ अल्लाह! मुझे शारीरिक कुशलता प्रदान कर। ऐ अल्लाह! मुझे सुनने की कुशलता प्रदान कर। ऐ अल्लाह! मुझे दृष्टि की कुशलता प्रदान कर। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ कुफ़्र (अविश्वास) और निर्धनता से और तेरी शरण में आता हूँ क़ब्र की यातना से। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।" इसे तीन बार पढ़ा जाए।114

«حَسْبِيَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ عَلَيهِ تَوَكَّلتُ وَهُوَ رَبُّ العَرْشِ العَظِيمِ» سَبْعَ مَرَّاتٍ.

"मेरे लिए अल्लाह ही काफ़ी है, उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मेरा उसी पर भरोसा है और वह महान सिंहासन का स्वामी है।" इसे सात बार पढ़ा जाए115

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ العَفْوَ وَالعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالآخِرَةِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ العَفْوَ وَالعَافِيَةَ: فِي دِينِي وَدُنْيَايَ وَأَهْلِي، وَمَالِي، اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي، وَآمِنْ رَوْعَاتِي، اللَّهُمَّ احْفَظْنِي مِنْ بَينِ يَدَيَّ، وَمِنْ خَلْفِي، وَعَنْ يَمِينِي، وَعَنْ شِمَالِي، وَمِنْ فَوْقِي، وَأَعُوذُ بِعَظَمَتِكَ أَنْ أُغْتَالَ مِنْ تَحْتِي».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया एवं आख़िरत में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अपने धर्म, अपने संसार, अपने परिवार और अपने धन के संबंध में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मेरे ऐबों को छुपा दे और मुझे भय से सुरक्षा प्रदान कर। ऐ अल्लाह! तू मेरी, मेरे आगे, मेरे पीछे, मेरे दाएँ, मेरे बाएँ और मेरे ऊपर से रक्षा कर। साथ ही मैं इस बात से तेरी महानता की शरण में आता हूँ कि मुझे नीचे से धर दबोचा जाए।"116

«اللَّهُمَّ عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ، رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي، وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطانِ وَشَرَكِهِ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءًا، أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ».

"ऐ अल्लाह, छिपी तथा खुली बातों का जानने वाला, आकाशों तथा धरती का रचयिता, हर चीज़ का पालनहार और प्रभु! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मैं तेरी शरण में आता हूँ अपने प्राण की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके फ़रेब से तथा इस बात से कि मैं अपने साथ या किसी मुसलमान के साथ कोई बुरा व्यवहार करूँ।"117

«بِسْمِ اللَّهِ الَّذِي لَا يَضُرُّ مَعَ اسْمِهِ شَيْءٌ فِي الأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاءِ وَهُوَ السَّمِيعُ العَلِيمُ» ثَلاثَ مرَّاتٍ.

"शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ धरती और आकाश में कोई वस्तु हानि नहीं पहुँचा सकती तथा वह सब सुनने वाला और सब जानने वाला है।" इसे तीन बार पढ़ा जाए।118

«رَضِيتُ بِاللَّهِ رَبًَّا، وَبِالإِسْلَامِ دِينًا، وَبِمُحَمَّدٍ ﷺ نَبِيًّا» ثَلاثَ مرَّاتٍ.

"मैं अल्लाह को रब, इस्लाम को धर्म और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को नबी के रूप में मान कर संतुष्ट हो गया।" इसे तीन बार पढ़ा जाए।119

«يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ بِرَحْمَتِكَ أَسْتَغيثُ أَصْلِحْ لِي شَأْنِيَ كُلَّهُ وَلَا تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ».

"हे जीवित एवं नित्य स्थायी प्रभु! मैं तेरी कृपा के वसीले से तुझसे फ़रियाद करता हूँ कि मेरा सारा हाल ठीक रख और मुझे क्षण भर के लिए भी मेरे नफ़्स के हवाले न कर।"120

«أَصْبَحْنَا وَأَصْبَحَ المُلْكُ لِلَّهِ رَبِّ العَالَمِينَ، اللَّهُـمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَ هَذَا اليَوْمِ: فَتْحَهُ، وَنَصْرَهُ، وَنورَهُ، وَبَرَكَتَهُ، وَهُدَاهُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِيهِ وَشَرِّ مَا بَعْدَهُ».

"हमने तथा सारे संसार के पालनहार अल्लाह के राज्य ने सुबह की121। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस दिन122 की भलाई; इसकी विजय, सहायता, प्रकाश, बरकत और मार्गदर्शन माँगता हूँ। इसी तरह इस दिन की कोख में जो कुछ है उसकी बुराई तथा इसके बाद की बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।"123

«أَصْبَحْنا عَلَى فِطْرَةِ الإِسْلَامِ، وَعَلَى كَلِمَةِ الإِخْلَاصِ، وَعَلَى دِينِ نَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ ﷺ، وَعَلَى مِلَّةِ أَبِينَا إِبْرَاهِيمَ، حَنِيفًا مُسْلِمًا وَمَا كَانَ مِنَ المُشرِكِينَ».

"हमने इस्लाम की फितरत (अर्थाथ सत्य धर्म ) पर124, इखलास (विशुद्धता ) के कलिमा पर, अपने नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के धर्म पर तथा अपने पिता इबराहीम -अलैहिस्सलाम- जो मुश्रिकों में से नहीं थे, के संप्रदाय पर एकाग्र रूप से मुसलमान होकर सुबह की।"125

«سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ» مِائَةَ مرَّةٍ.

"मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ।" इसे सौ बार पढ़ा जाए।126

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ» عشرَ مرَّات، أَوْ مرَّةً واحدةً عِنْدَ الكَسَلِ.

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।" इसे दस बार पढ़ा जाए।127 सुस्ती के समय एक बार भी पढ़ा जा सकता है।128

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ» مِائَةَ مرَّةٍ إذا أَصْبَحَ.

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए राज्य और उसी के लिए सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।" सुबह के समय सौ बार।129

«سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ: عَدَدَ خَلْقِهِ، وَرِضَا نَفْسِهِ، وَزِنَةَ عَرْشِهِ، وَمِدَادَ كَلِمَاتِهِ» ثَلاثَ مَرَّاتٍ إِذا أَصْبَحَ.

"मैं अल्लाह की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता बयान करता हूँ, उसकी सृष्टियों की संख्या के समान, उसकी प्रसन्नता की प्राप्ति के समान, उसके सिंहासन के वज़न के बराबर और उसके शब्दों की संख्या के बराबर।" सुबह के समय तीन बार।130

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلًا مُتَقَبَّلًا» إِذا أَصْبَحَ.

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभकारी ज्ञान, स्वच्छ रोज़ी तथा ग्रहणयोग्य अमल माँगता हूँ।" सुबह के समय।131

«أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ» مِائَةَ مَرَّةٍ فِي اليَوْمِ.

"मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसी की ओर लौटता हूँ।" दिन में सौ बार।132

«أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ» ثَلاثَ مَرَّاتٍ إِذَا أَمْسَى.

"मैं अल्लाह की पैदा की हुई वस्तुओं की बुराई से, उसके पूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ।" शाम को तीन बार।133

«اللَّهُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ عَلَى نَبَيِّنَا مُحَمَّدٍ» عَشْرَ مَرَّاتٍ.

"ऐ अल्लाह! हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की प्रशंसा अपने निकटवर्ती फ़रिश्तों के बीच कर और उनपर शांति की जलधारा बरसा।" दस बार।134

28- सोने के अज़कार

99- (1) दोनों हथेलियों को जमा करके उनमें फूँक मारे और उनमें इन सूरतों को पढ़े :

﴿قُلۡ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ1 ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ2 لَمۡ يَلِدۡ وَلَمۡ يُولَدۡ3 وَلَمۡ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدُۢ4﴾

“(आप) कह दीजिए कि अल्लाह एक है।

अल्लाह बेनियाज़ है।

न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।

और न उसके बराबर कोई है। [सूरा इख़लास :1-4]

﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلۡفَلَقِ1 مِن شَرِّ مَا خَلَقَ2 وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ3 وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّٰثَٰتِ فِي ٱلۡعُقَدِ4 وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ5﴾

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं भोर के रब की शरण लेता हूँl

हर उस चीज़ की बुराई से, जिसे उसने पैदा किया।

तथा रात की बुराई से, जब उसका अंधेरा छा जाए।

तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से।

तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।

[सूरा फ़लक़: 1-5]

﴿قُلۡ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ1 مَلِكِ ٱلنَّاسِ2 إِلَٰهِ ٱلنَّاسِ3 مِن شَرِّ ٱلۡوَسۡوَاسِ ٱلۡخَنَّاسِ4 ٱلَّذِي يُوَسۡوِسُ فِي صُدُورِ ٱلنَّاسِ5 مِنَ ٱلۡجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ6﴾

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं मनुष्यों के रब की शरण में आता हूँ l

जो सारे इन्सानों का स्वामी है।

जो सारे इन्सानों का पूज्य है।

भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले (शैतान ) की बुराई से।

जो लोगों के दिलों में भ्रम डालता रहता है।

जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी।

[सूरा नास : 1-6]

फिर दोनों हाथों को जहाँ तक हो सके, अपने शरीर पर फेरे और इसका आरंभ अपने सर, चेहरा तथा शरीर के अगले भाग से करे। ऐसा तीन बार करे।135

﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُۚ لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِۦۚ يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيۡءٖ مِّنۡ عِلۡمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَۚ وَسِعَ كُرۡسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفۡظُهُمَاۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ255﴾

“अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह जीवित तथा नित्य स्थायी है। ना उसे ऊँघ आती है और ना निद्रा आती है। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, उन सब को अल्लाह जानता है। लोग उसके ज्ञान में से उतना ही जान सकते हैं, जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोए हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च, महान है।”

[सूरा बक़रा : 255]136

﴿ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّن رُّسُلِهِۦۚ وَقَالُواْ سَمِعۡنَا وَأَطَعۡنَاۖ غُفۡرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيۡكَ ٱلۡمَصِيرُ285 لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفۡسًا إِلَّا وُسۡعَهَاۚ لَهَا مَا كَسَبَتۡ وَعَلَيۡهَا مَا ٱكۡتَسَبَتۡۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذۡنَآ إِن نَّسِينَآ أَوۡ أَخۡطَأۡنَاۚ رَبَّنَا وَلَا تَحۡمِلۡ عَلَيۡنَآ إِصۡرٗا كَمَا حَمَلۡتَهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِنَاۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلۡنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِۦۖ وَٱعۡفُ عَنَّا وَٱغۡفِرۡ لَنَا وَٱرۡحَمۡنَآۚ أَنتَ مَوۡلَىٰنَا فَٱنصُرۡنَا عَلَى ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡكَٰفِرِينَ286﴾

"रसूल उस चीज़ पर ईमान लाया, जो उसके लिए अल्लाह की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले उसपर ईमान लाए। वे सब अल्लाह तथा उसके फ़रिश्तों और उसकी सब ग्रन्थों एवं रसूलों पर ईमान लाए। (वे कहते हैं :) हम उसके रसूलों में से किसी के बीच अन्तर नहीं करते। हमने सुना और हम आज्ञाकारी हो गए। ऐ हमारे पालनहार! हमें क्षमा कर दे और हमें तेरे ही पास आना है।

अल्लाह किसी प्राणी पर उसकी क्षमता से अधिक (दायित्व का) भार नहीं रखता। जो सदाचार करेगा, उसका लाभ उसी को मिलेगा और जो दुराचार करेगा, उसकी हानि भी उसी को होगी। हे हमारे पालनहार! यदि हम भूल चूक जाएँ, तो हमें न पकड़। हे हमारे पालनहार! हमारे ऊपर इतना बोझ न डाल, जितना हमसे पहले के लोगों पर डाला गया। हे हमारे पालनहार! हमारे पापों की अनदेखी कर दे, हमें क्षमा कर दे तथा हमपर दया कर। तू ही हमारा स्वामी है तथा काफ़िरों के विरुद्ध हमारी सहायता कर।"

[सूरा बक़रा : 285-286]137

«بِاسْمِكَ رَبِّي وَضَعْتُ جَنْبِي، وَبِكَ أَرْفَعُهُ، فَإِنْ أَمْسَكْتَ نَفْسِي فَارْحَمْهَا، وَإِنْ أَرْسَلْتَهَا فَاحْفَظْهَا، بِمَا تَحْفَظُ بِهِ عِبَادَكَ الصَّالِحِينَ».

"ऐ अल्लाह! तेरे नाम से मैंने अपना पहलू रखा और तेरे ही अनुग्रह से उसे उठाऊँगा। यदि तू ने मेरे प्राण को रोक लिया, तो उसपर दया करना और अगर वापस कर दिया, तो उस चीज़ के द्वारा उसकी रक्षा करना जिसके द्वारा अपने सदाचारी बंदों की रक्ष करता है।"138139

«اللَّهُمَّ إِنَّكَ خَلَقْتَ نَفْسِي وَأَنْتَ تَوَفَّاهَا، لَكَ مَمَاتُهَا وَمَحْياهَا، إِنْ أَحْيَيْتَهَا فَاحْفَظْهَا، وَإِنْ أَمَتَّهَا فَاغْفِرْ لَهَا، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ العَافِيَةَ».

"ऐ अल्लाह! तू ने मेरे प्राण की रचना की है और तू ही उसे मृत्यु देगा। मृत्यु तथा जीवन दोनों तेरे हाथ में हैं। यदि तू ने उसे जीवित रखा, तो उसकी रक्षा करना और यदि मृत्यु दे दी, तो उसे क्षमा कर देना। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे स्वास्थ्य तथा सुरक्षा माँगता हूँ।"140

«اللَّهُمَّ قِنِي عَذَابَكَ يَوْمَ تَبْعَثُ عِبَادَكَ».

"ऐ अल्लाह! मुझे उस दिन अपनी याताना से सुरक्षित रखना141, जिस दिन अपने बंदों को जीवित करके उठाएगा।"142

«بِاسْمِكَ اللَّهُمَّ أَمُوتُ وَأَحْيَا».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरे ही नाम से मरता और जीता हूँ।"143

«سُبْحَانَ اللَّهِ (ثَلاثًا وَثَلاثِينَ) وَالحَمْدُ لِلَّهِ (ثَلاثًا وَثَلاثِينَ) وَاللَّهُ أَكْبَرُ (أَرْبَعًا وَثَلاثِينَ)».

"सुबहान अल्लाह तैंतीस बार, अल-हमदु लिल्लाह तैंतीस बार और अल्लाहु अकबर चौंतीस बार।"144

«اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَوَاتِ السَّبْعِ وَرَبَّ الأَرْضِ، وَرَبَّ العَرْشِ العَظِيمِ، رَبَّنَا وَرَبَّ كُلِّ شَيْءٍ، فَالِقَ الحَبِّ وَالنَّوَى، وَمُنْزِلَ التَّوْرَاةِ وَالإِنْجِيلِ، وَالفُرْقَانِ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ كُلِّ شَيْءٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهِ، اللَّهُمَّ أَنْتَ الأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الآخِرُ فَلَيسَ بَعْدَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الظَّاهِرُ فَلَيْسَ فَوْقَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ البَاطِنُ فَلَيْسَ دُونَكَ شَيْءٌ، اقْضِ عَنَّا الدَّيْنَ وَأَغْنِنَا مِنَ الفَقْرِ».

"ऐ अल्लाह! आकाशों के स्वामी, धरती के स्वामी, महान सिंहासन के स्वामी, हमारे स्वामी और हर चीज़ के स्वामी, दाने एवं गुठली को फाड़ने वाले और तौरात, इंजील तथा क़ुरआन उतारने वाले! मैं हर उस चीज़ की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, जिसकी पेशानी को तू पकड़े हुए है। ऐ अल्लाह! तू प्रथम है अतः तुझसे पहले कोई चीज़ नहीं है तथा तू आख़िर (अंतिम) अतः तेरे बाद कोई चीज़ नहीं है, तू ज़ाहिर (प्रत्यक्ष एवं उच्च) है अतः तेरे ऊपर कोई चीज़ नहीं और तू बातिन (अप्रत्यक्ष एवं गुप्त) है अतः तुझसे परे कोई चीज़ नहीं है।तू हमारा क़र्ज़ अदा कर दे और हमें निर्धनता से मुक्ति प्रदान कर।"145

«الحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنَا وَسَقَانَا، وَكَفَانَا، وَآوَانَا، فَكَمْ مِمَّنْ لَا كَافِيَ لَهُ وَلَا مُؤْوِيَ».

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने हमें खिलाया, पिलाया, पर्याप्ति प्रदान की तथा शरण दी। कितने ऐसे लोग हैं, जिनको न कोई पर्याप्ति प्रदान करने वाला है, न शरण देने वाला।"146

«اللَّهُمَّ عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ، رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي، وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطانِ وَشِرْكِهِ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءًا، أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ».

"ऐ अल्लाह, छिपी तथा खुली बातों का जानने वाला, आकाशों तथा धरती का रचयिता, हर चीज़ का पालनहार और मालिक ! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मैं तेरी शरण में आता हूँ अपने प्राण की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके फ़रेब से तथा इस बात से कि मैं अपने साथ या किसी मुसलमान के साथ कोई बुरा व्यवहार करूँ।"147

«يَقْرَأُ ﴿الــم﴾ تَنْزِيلَ السَّجْدَةِ، وَتَبَارَكَ الَّذي بِيَدِهِ المُلْكُ».

110- अलिफ़ लाम मीम तनज़ीलस्सजदह और तबारकल्लज़ी बि-यदिहिलमुल्क, दोनों सूरतों को पढ़े।148

«اللَّهُمَّ أَسْلَمْتُ نَفْسِي إِلَيْكَ، وَفَوَّضْتُ أَمْرِي إِلَيْكَ، وَوَجَّهْتُ وَجْهِي إِلَيْكَ، وَأَلْجَأْتُ ظَهْرِي إِلَيْكَ، رَغْبَةً وَرَهْبَةً إِلَيْكَ، لَا مَلْجَأَ وَلَا مَنْجَا مِنْكَ إِلَّا إِلَيْكَ، آمَنْتُ بِكِتَابِكَ الَّذِي أَنْزَلْتَ، وَبِنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ».

"ऐ अल्लाह149! मैंने अपने प्राण को तेरे हवाले कर दिया, अपना मामला तुझे सौंप दिया, अपना चेहरा तेरी ओर कर दिया, तेरे ही ऊपर भरोसा किया और यह सब तेरी नेमतों की चाहत और तेरी यातना के भय से किया। क्योंकि स्वयं तेरे दरबार के अतिरिक्त न तेरी पकड़ से भाग कर जाने का कोई स्थान है और न शरण लेने की कोई जगह। मैं ईमान लाया तेरी उतारी हुई किताब और तेरे भेजे हुए नबी पर।"150

29- रात को करवट बदलते समय की दुआ

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ الوَاحِدُ القَهّارُ، رَبُّ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا العَزيزُ الغَفَّارُ».

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, बलशाली है, आकाशों तथा धरती और उन दोनों के बीच स्थित सारी चाज़ों का रब है, शक्तिमान है और अत्यधिक क्षमा करने वाला है।"151

30- नींद में बेचैनी तथा घबराहट की दुआ

«أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ غَضَبِهِ وَعِقَابِهِ، وَشَرِّ عِبَادِهِ، وَمِنْ هَمَزَاتِ الشَّياطِينِ وَأَنْ يَحْضُرُونِ».

"मैं अल्लाह के संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ उसके क्रोध, दंड, उसके बंदों की बुराई और शैतानों के द्वारा डाले गए बुरे ख़यालों से और इस बात से कि वे मेरे पास आजाएं ।"152

31- कोई व्यक्ति बुरा स्वप्न देखे तो क्या करे?

114- (1) अपनी बाईं ओर तीन बार थूके153

(2) शैतान से तथा अपने इस स्वप्न की बुराई से तीन बार अल्लाह की शरण माँगे।154

(3) स्वप्न में क्या कुछ देखा है, किसी को न बताए।155

(4) पहलू बदल ले और दूसरे करवट पर लेटे।156

115- (5) यदि इच्छा हो, तो उठकर नमाज़ पढ़े।157

32- वित्र की दुआ-ए-क़ुनूत

«اللَّهُمَّ اهْدِنِي فِيمَنْ هَدَيْتَ، وَعَافِنِي فِيمَنْ عَافَيْتَ، وَتَوَلَّنِي فِيمَنْ تَوَلَّيْتَ، وَبَارِكْ لِي فِيمَا أَعْطَيْتَ، وَقِنِي شَرَّ مَا قَضَيْتَ؛ فَإِنَّكَ تَقْضِي وَلَا يُقْضَى عَلَيْكَ، إِنَّهُ لَا يَذِلُّ مَنْ وَالَيْتَ، [وَلاَ يَعِزُّ مَنْ عَادَيْتَ]، تَبارَكْتَ رَبَّنا وَتَعَالَيْتَ».

"ऐ अल्लाह जिन लोगों को तू ने हिदायत दी है उनके संग मुझे भी हिदायत दे, जिन लोगों को तू ने आफियत दी है उनके संग मुझे भी आफियत दे, जिनको तू ने अपना मित्र बनाया है उनके संग मुझे भी अपना मित्र बना, जो कुछ तू ने हमें दे रखा है उसमें बरकत प्रदान कर, और जो फैसला तू ने कर रखा है उसकी बुराई से हमें बचाए रख, (क्योंकि) फैसला तू करता है और तेरे विरुद्ध फैसला नहीं किया जा सकता, जिसको तू अपना मित्र बना ले उसे कोई अपमानित नहीं कर सकता। हे हमारे रब! तू बरकत वाला तथा महान है।"158

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقُوبَتِكَ، وَأَعُــــوذُ بِكَ مِنْكَ، لَا أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरे क्रोध से तेरी प्रसन्नता की शरण माँगता हूँ, तेरी सज़ा से तेरे क्षमादान की शरण माँगता हूँ और तुझसे तेरी शरण में आता हूँ। मैं तेरी प्रशंसा संपूर्ण रूप से नहीं कर सकता । तू वैसा ही है, जैसा तूने अपनी प्रशंसा की है।"159

«اللَّهُمَّ إِيَّاكَ نعْبُدُ، وَلَكَ نُصَلِّي وَنَسْجُدُ، وَإِلَيْكَ نَسْعَى وَنَحْفِدُ، نَرْجُو رَحْمَتَكَ، وَنَخْشَى عَذَابَكَ، إِنَّ عَذَابَكَ بِالكَافِرِينَ مُلْحِقٌ، اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْتَعِينُكَ، وَنَسْتَغْفِرُكَ، وَنُثْنِي عَلَيْكَ الخَيْرَ، وَلَا نَكْفُرُكَ، وَنُؤْمِنُ بِكَ، وَنَخْضَعُ لَكَ، وَنَخْلَعُ مَنْ يَكْفرُكَ».

"ऐ अल्लाह! हम तेरी ही बंदगी करते हैं, तेरे ही लिए नमाज़ पढ़ते और तुझी को सजदा करते हैं, तेरी ओर तेज़ी से भागते और दौड़ते हैं, तेरी कृपा की आश रखते हैं, तेरी यातना से भयभीत रहते हैं, निश्चय ही तेरी यातना काफ़िरों को पहुँच कर रहेगी। ऐ अल्लाह! हम तुझसे सहयोग माँगते हैं, तुझसे क्षमा याचना करते हैं, तेरी अच्छी प्रशंसा करते हैं, तेरे प्रति अविश्वास का भाव नहीं रखते, तुझपर ईमान रखते हैं, तेरे सामने नत्मस्तक होते हैं और तेरे प्रति अविश्वास व्यक्त करने वालों से अलग होने की घोषणा करते हैं।"160

33- वित्र से सलाम फेरने के बाद का ज़िक्र

«سُبْحَانَ المَلِكِ القُدُّوسِ» ثلاثَ مرَّاتٍ والثَّالِثَةُ يَجْهَرُ بها ويَمُدُّ بِهَا صَوتَهُ يَقُولُ: «رَبِّ المَلَائِكَةِ وَالرُّوحِ».

119- तीन बार कहे : "मैं उस अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ, जो शासनकर्ता और हर दोष तथा कमी से पवित्र है।" तीसरी बार ऊँची आवाज़ से तथा खींचकर कहे। उसके साथ यह भी कहे : "जो फ़रिश्तों तथा जिबरील का पालनहार है।"161

34- ‏शोक तथा चिंता के समय की दुआएँ

«اللَّهُمَّ إِنِّي عَبْدُكَ، ابْنُ عَبْدِكَ، ابْنُ أَمَتِكَ، نَاصِيَتِي بِيَدِكَ، مَاضٍ فِيَّ حُكْمُكَ، عَدْلٌ فِيَّ قَضَاؤُكَ، أَسْأَلُكَ بِكُــــلِّ اسْمٍ هُوَ لَكَ، سَمَّيْتَ بِهِ نَفْسَكَ، أَوْ أَنْزَلْتَهُ فِي كِتَابِكَ، أَوْ عَلَّمْتَهُ أَحَدًا مِنْ خَلْقِكَ، أَوِ اسْتَأْثَرْتَ بِهِ فِي عِلْمِ الغَيْبِ عِنْدَكَ، أَنْ تَجْعَلَ القُرْآنَ رَبِيعَ قَلْبِي، وَنُورَ صَدْرِي، وَجَلَاءَ حُزْنِي، وَذَهَابَ هَمِّي».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरा बंदा और तेरे बंदे एवं बंदी का बेटा हूँ। मेरी पेशानी तेरे हाथ में है। मेरे बारे में तेरा आदेश चलता है। मेरे बारे में तेरा निर्णय न्याय पर आधारित है। मैं तुझसे तेरे हर उस नाम का वास्ता देकर माँगता हूँ, जिससे तूने ख़ुद को नामित किया है, या उसे अपनी किताब में उतारा है, या उसे अपनी किसी सृष्टि को सिखाया है, या उसे अपने पास अपने परोक्ष ज्ञान में सुरक्षित कर रखा है, कि क़ुरआन को मेरे दिल का वसंत, मेरे सीने की रोशनी, मेरे दुःख का मोचन और मेरी व्याकुलता को समाप्त करने वाला बना दे।"162

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الهَمِّ وَالحَزَنِ، وَالعَجْزِ وَالكَسَلِ، وَالبُخْلِ وَالجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ चिंता तथा शोक से, विवशता तथा सुस्ती से, कंजूसी तथा कायरता से और क़र्ज़ के बोझ तथा लोगों के वर्चस्व से।"163

35- बेचैनी की दुआ

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ العَظِيمُ الحَلِيمُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ رَبُّ العَرْشِ العَظِيمِ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ رَبُّ السَّمَوَاتِ وَرَبُّ الأَرْضِ وَرَبُّ العَرْشِ الكَرِيمِ».

"अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं, जो महान और सहनशील है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जो महान अर्श (सिंहासन) का मालिक है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जो आकाशों का रब , धरती का रब और सम्मानित सिंहासन (अर्श) का रब है।"164

«اللَّهُمَّ رَحْمَتَكَ أَرْجُو، فَلَا تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ، وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّهُ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ».

“ऐ अल्लाह मैं तेरी ही कृपा की आशा रखता हूँ। अतः तू मुझे क्षण भर के लिए मेरी आत्मा के हवाले न कर। तथा मेरे लिए मेरे सारे कार्यों को ठीक कर दे। तेरे अतिरिक्त कोई वास्तविक उपास्य नहीं है।”165

«لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ».

"तेरे सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। तू पवित्र है। निःसंदेह मैं ही ज़ालिमों में से था।"166

«اللَّهُ اللَّهُ رَبِّي لَا أُشْرِكُ بِهِ شَيْئًا».

"अल्लाह, अल्लाह, मेरा रब , मैं किसी को उसका साझी नहीं बनाऊँगा।"167

36- शत्रु तथा शासक से मिलने की दुआ

«اللَّهُمَّ إِنَّا نَجْعَلُكَ فِي نُحُورِهِم، وَنَعُوذُ بِكَ مِنْ شُرُورِهِمْ».

"ऐ अल्लाह, हम तुझे उनके मुक़ाबले में पेश करते हैं और उनकी विषैलेपन से तेरी पनाह चाहते हैं।"168

«اللَّهُمَّ أَنْتَ عَضُدِي، وَأَنْتَ نَصِيرِي، بِكَ أَحُولُ وَبِكَ أَصُولُ، وَبِكَ أُقاتِلُ».

"ऐ अल्लाह तू ही मेरा बाज़ू और सहायक है। तेरे ही सहारे मैं स्थान बदलता हूँ, तेरी ही मदद से शत्रु पर आक्रमण करता हूँ और तेरी सहायता से युद्ध करता हूँ।"169

«حَسْبُنا اللَّهُ وَنِعْمَ الوَكِيلُ».

"अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वही सबसे अच्छा कार्य-साधक है।"170

37- शासक के अत्याचार से डरे हुए व्यक्ति की दुआएँ

«اللَّهُمَّ ربَّ السَّمَوَاتِ السَّبْعِ، وَرَبَّ العَرْشِ العَظِيمِ، كُنْ لِي جَارًا مِنْ فُلَانِ بْنِ فُلَانٍ، وَأَحْزَابِهِ مِنْ خَلَائِقِكَ، أَنْ يَفْرُطَ عَلَيَّ أَحَدٌ مِنْهُمْ أَوْ يَطْغَى، عَزَّ جَارُكَ، وَجَلَّ ثَنَاؤُكَ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ».

"ऐ अल्लाह, सातों आकाशों के रब तथा महान सिंहासन के रब ! मुझे अमुक से जो अमुक का पुत्र है तथा उसके जत्थों से शरण देने वाला बन जा कि उनमें से कोई मुझपर अत्याचार अथवा अतिक्रमण करे। तेरी शरण पाने वाला बलवान है, तेरी प्रशंसा बहुत बड़ी है और तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।"171

«اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَعَزُّ مِنْ خَلْقِهِ جَمِيعًا، اللَّهُ أَعَزُّ مِمَّا أَخَافُ وَأَحْذَرُ، أَعُوذُ بِاللَّهِ الَّذِي لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ، المُمْسِكِ السَّمَوَاتِ السَّبْعِ أَنْ يَقَعْنَ عَلَى الأَرْضِ إِلَّا بِإِذْنِهِ، مِنْ شَرِّ عَبْدِكَ فُلَانٍ، وَجُنُودِهِ وَأَتْبَاعِهِ وَأَشْيَاعِهِ، مِنَ الجِنِّ وَالإِنْسِ، اللَّهُمَّ كُنْ لِي جَارًا مِنْ شَرِّهِمْ، جَلَّ ثَنَاؤُكَ وَعَزَّ جَارُكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَلَا إِلَهَ غَيْرُكَ» ثَلاثَ مَرَّاتٍ.

"अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह अपनी सारी सृष्टि से अधिक बलशाली है। अल्लाह उससे भी बलशाली है, जिससे मैं डर रहा हूँ तथा भय महसूस कर रहा हूँ। मैं उस अल्लाह की शरण में आता हूँ, जिसके अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, जिसने सातों आकाशों को धरती के ऊपर गिरने से रोक रखा है, और जिसकी अनुमति मिलने पर आकाशों का बंधन टूट जाएगा, उसके अमुक बंदे, उसकी सेनाओं और उसके अनुसरणकारी जिन्नों एवं इनसानों की बुराई से। ऐ अल्लाह! मुझे उनकी बुराई से शरण देने वाला बन जा। तेरी प्रशंसा बहुत बड़ी है, तेरी शरण में आने वाला बलवान हो जाता है, तेरा नाम बरकत वाला है और तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।" इसे तीन बार पढ़े।172

 

38- शत्रु के लिए बददुआ

«اللَّهُمَّ مُنْزِلَ الكِتَابِ، سَرِيعَ الحِسَابِ، اهْزِمِ الأَحْزَابَ، اللَّهُمَّ اهزِمْهُمْ وَزَلْزِلْهُمْ».

"ऐ अल्लाह! किताब उतारने वाले और जल्दी हिसाब लेने वाले! इन जत्थों को पराजित कर। ऐ अल्लाह! इन्हें पराजित कर और इन्हें हिलाकर रख दे।"173

39- जिसे लोगों का डर हो, वह यह दुआ पढ़े

«اللَّهُمَّ اكْفِنِيهِمْ بِمَا شِئْتَ».

"ऐ अल्लाह! तू जैसे चाहे, मेरी ओर से उनसे निमट ले।"174

40- जिसे अपने ईमान में संदेह होने लगे, उसके लिए दुआ

133- (1)अल्लाह की शरण माँगे।175

(2) इस संदेह से खुद को अलग कर ले।176

134- (3) वह कहे : मैं अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाया।177

135- (4) यह आयत पढ़े :

﴿هُوَ ٱلۡأَوَّلُ وَٱلۡأٓخِرُ وَٱلظَّٰهِرُ وَٱلۡبَاطِنُۖ وَهُوَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٌ 3﴾

"वही प्रथम, वही अन्तिम और प्रत्यक्ष तथा गुप्त है और वह प्रत्येक वस्तु का जानने वाला है।" [सूरा हदीद : 3]178

41- क़र्ज़ की अदायगी के लिए दुआ

«اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكِ عَمَّنْ سِوَاكَ».

"ऐ अल्लाह! मुझे अपने हलाल चीज़ों के द्वारा अपनी हराम चीज़ों से बचा ले और मुझे अपने अनुग्रह से अपने अतिरिक्त अन्य लोगों से बेनियाज़ कर दे।"179

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الهَمِّ وَالحَزَنِ، وَالعَجْزِ وَالكَسَلِ، وَالبُخْلِ وَالجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ चिंता तथा शोक से, विवशता तथा सुस्ती से, कंजूसी तथा कायरता से और क़र्ज़ के बोझ तथा लोगों के वर्चस्व से।"180

 

42- नमाज़ में अथवा क़ुरआन पढ़ते समय आने वाले बुरे ख़यालों से बचने की दुआ

«أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيطَانِ الرَّجِيمِ، وَاتْفُلْ عَلَى يَسَارِكَ (ثَلاثًا)».

"मैं अल्लाह की शरण में आता हूँ धुतकारे हुए शैतान से" तथा अपने बाएं ओर तीन बार थुतकारे181

43- उस व्यक्ति की दुआ, जिसे कोई कार्य कठिन दिखाई पड़े

«اللَّهُمَّ لَا سَهْلَ إِلَّا مَا جَعَلْتَهُ سَهْلاً، وَأَنْتَ تَجْعَلُ الحَزْنَ إِذَا شِئْتَ سَهْلاً».

"ऐ अल्लाह! आसान केवल वही कार्य है, जिसे तू आसान बनाए और तू जब चाहे तो कठिन कार्य को भी आसान बना दे।"182

44- आदमी गुनाह कर बैठे, तो कौन-सी दुआ पढ़े और क्या करे?

«مَا مِنْ عَبْدٍ يُذنِبُ ذَنْبًا فَيُحْسِنُ الطُّهُورَ، ثُمَّ يَقُومُ فَيُصَلِّي رَكْعَتَيْنِ، ثُمَّ يَسْتَغْفِرُ اللَّهَ إِلَّا غَفَرَ اللَّهُ لَهُ».

"जब कोई बंदा कोई गुनाह कर बैठे, फिर अच्छी तरह वज़ू करे, फिर उठकर दो रकात नमाज़ पढ़े और अल्लाह से क्षमा माँगे, तो अल्लाह उसे क्षमा कर देता है।"183

45- शैतान और उसके बुरे ख़यालों को दूर करने की दुआ

141- (1) अल्लाह से उसकी शरण माँगना।184

142- (2) अज़ान देना।185

143- (3) अज़कार एवं क़ुरआन की तिलावत में व्यस्त होना186

46- जब कोई अप्रिय घटना घटित हो जाए या आदमी विवश दिखाई दे, उस समय की दुआ

«قَدَرُ اللَّهُ وَمَا شَاءَ فَعَلَ».

"यही अल्लाह का निर्णय है और अल्लाह जो चाहे करता है।"187

47- जिसके घर नया बच्चा पैदा हुआ हो, उसके लिए मुबारकबाद तथा उसका उत्तर

«بَارَكَ اللَّهُ لَكَ فِي المَوْهُوبِ لَكَ، وَشَكَرْتَ الوَاهِبَ، وَبَلَغَ أَشُدَّهُ، وَرُزِقْتَ بِرَّهُ». وَيَرُدُّ عَلَيْهِ الْمُهَــــــنَّأُ فَيَقُولُ: «بَارَكَ اللَّهُ لَكَ وَبَارَكَ عَلَيْكَ، وَجَزَاكَ اللَّهُ خَيْرًا، وَرَزَقَكَ اللَّهُ مِثْلَهُ، وَأَجْزَلَ ثَوَابَكَ».

145- "अल्लाह ने तुझे जो बच्चा दिया है, उसमें तेरे लिए बरकत दे, तू बच्चा देने वाले का शुक्र अदा करे, बच्चा युवावस्था को पहुँचे और तुझे उसके अच्छे व्यवहार का लाभ मिले।"188 जबकि मुबारकबाद प्राप्त करने वाला उत्तर में कहेगा : "अल्लाह तुझपर बरकतों की बारिश करे, तुझे इसका अच्छा बदला दे, इसके समान तुझे भी दे और ख़ूब प्रतिफल दे।"189

48- बच्चों को अल्लाह की शरण में देने के शब्द

146- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हसन और हुसैन -रज़ियल्लाहु अनहुमा- को इन शब्दों द्वारा अल्लाह की शरण में देते थे :

«أُعِيذُكُمَا بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّةِ مِنْ كُلِّ شَيْطَانٍ وَهَامَّةٍ، وَمِنْ كُلِّ عَيْنٍ لَامَّةٍ».

"मैं तुम दोनों को अल्लाह के संपूर्ण शब्दों द्वारा अल्लाह की शरण में देता हूँ हर शैतान, ज़हरीले जानवर एवं लग जाने वाली नज़र से।"190

49- रोगी का हाल जानने जाते समय उसके लिए की जाने वाली दुआ

«لَا بأْسَ طَهُورٌ إِنْ شَاءَ اللَّهُ».

"कोई बात नहीं है। अल्लाह ने चाहा तो यह (बीमारी) पाक-साफ करने वाली है।"191

«أَسْأَلُ اللَّهَ العَظِيمَ رَبَّ العَرْشِ العَظِيمِ أَنْ يَشْفيَكَ» سَبْعَ مَرَّاتٍ.

"मैं विशाल सिंहासन के रब महान अल्लाह से विनती करता हूँ कि तुम्हें स्वास्थ्य लाभ कराए।" सात बार।192

50- बीमार व्यक्ति का हाल जानने के लिए जाने की फ़ज़ीलत

149- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«إِذَا عَادَ الرَّجُلُ أَخَاهُ الْمُسْلِمَ مَشَى فِي خِرَافَةِ الجَنَّةِ حَتَّى يَجْلِسَ، فَإِذَا جَلَسَ غَمَرَتْهُ الرَّحْمَةُ، فَإِنْ كَانَ غُدْوَةً صَلَّى عَلَيْهِ سَبْعُونَ أَلْفَ مَلَكٍ حَتَّى يُمْسِيَ، وَإِنْ كَانَ مَسَاءً صَلَّى عَلَيْهِ سَبْعُونَ أَلْفَ مَلَكٍ حَتَّى يُصْبِحَ».

"जब कोई व्यक्ति अपने बीमार मुसलमान भाई को देखने जाता है, तो जब तक उसके पास जाकर बैठ नहीं जाता, उस समय तक जन्नत के फलों को चुनने के लिए चल रहा होता है। फिर जब वह बैठ जाता है, तो उसे अल्लाह की कृपा ढाँप लेती है। अगर वह सुबह के समय निकला होता है, तो शाम तक उसके लिए सत्तर हज़ार फ़रिश्ते अल्लाह की कृपा की दुआ करते रहते हैं, और अगर शाम के समय निकला होता है, तो सुबह तक सत्तर हज़ार फ़रिश्ते उसके लिए रहमत की दुआ करते रहते हैं।"193

51- जीवन से निराश रोगी की दुआ

«اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي، وَارْحَمْنِي، وَأَلْحِقْنِي بِالرَّفِيقِ الأَعْلَى».

"ऐ अल्लाह, तू मुझे माफ कर दे और मुझपर दया कर तथा मुझे रफ़ीक़-ए-आला (उच्च मित्र अर्थात नबियों, शहीदों, सिद्दीक़ों तथा नेक लोगों) से मिला दे।"194

मृत्यु के समय अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने दोनों हाथ पानी में डालकर उनको अपने चेहरे पर फेरने लगे और यह दुआ करने लगे : अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। निश्चय मृत्यु के समय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।"

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ إِنَّ لِلْمَوْتِ سَكَرَاتٍ».

"अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। बेशक मौत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।"195

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَاللَّهُ أَكْبَرُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ».

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह सबसे बड़ा है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, उसी का सारा राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है तथा अल्लाह की मदद के बिना न किसी के पास पुण्य करने की क्षमता है, न गुनाह से बचने की शक्ति।"196

52- मृत्यु के निकट व्यक्ति को कलिमा पढ़ने की प्रेरणा देना

«مَنْ كَانَ آخِرُ كَلَامِهِ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ دَخَلَ الجَنَّة».

"जिसकी ज़बान से निकलने वाली अंतिम बात ला इलाहा इल्लल्लाह होगी, वह जन्नत में प्रवेश करेगा।"197

53- विपत्ति के शिकार व्यक्ति की दुआ

«إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ، اللَّهُمَّ أْجُرْنِي فِي مُصِيبَتِي، وَأَخْلِفْ لِي خَيْرًَا مِنْهَا».

"निश्चय ही हम अल्लाह के लिए हैं और हमें उसी की ओर लौटकर जाना है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी इस मुसीबत का प्रतिफल प्रदान करना तथा मुझे इसके स्थान पर इससे अच्छी चीज़ देना।"198

54- मृतक की आँखें बंद करते समय की दुआ

«اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِفُلَانٍ (بِاسْمِهِ) وَارْفَعْ دَرَجَتَهُ فِي المَهْدِيِّينَ، وَاخْلُفْهُ فِي عَقِبِهِ فِي الغَابِرِينَ، وَاغْفِرْ لَنَا وَلَهُ يَا رَبَّ العَالَمِينَ، وَافْسَحْ لَهُ فِي قَبْرِهِ، وَنَوِّرْ لَهُ فِيهِ».

ऐ अल्लाह! अमुक (उसका नाम लेकर कहे) को क्षमा कर दे, सुपथगामी लोगों में उसका पद ऊँचा कर दे, उसके जाने के बाद उसके छोड़े हुए लोगों में उसका प्रतिनिधि बन जा। हे सारे संसार के पालनहार! हमें और उसे क्षमा कर दे, उसके लिए उसकी क़ब्र को खूब फैला दे और उसके लिए उसमें प्रकाश का प्रबंध कर दे।"199

55- जनाज़े की नमाज़ में मृतक के लिए दुआ

«اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ، وَعَافِهِ، وَاعْفُ عَنْهُ، وَأَكْرِمْ نُزُلَهُ، وَوَسِّعْ مُدْخَلَهُ، وَاغْسِلْهُ بِالمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالبَرَدِ، وَنَقِّهِ مِنَ الخَطَايَا كَمَا نَقَّيْتَ الثَّوْبَ الأَبْيَضَ مِنَ الدَّنَسِ، وَأَبْدِلْهُ دَارًا خَيْرًا مِنْ دَارِهِ، وَأَهْلاً خَيْرًا مِنْ أَهْلِهِ، وَزَوْجًَا خَيًْرا مِنْ زَوْجِهِ، وَأَدْخِلْهُ الجَنَّةَ، وَأَعِذْهُ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ [وَعَذَابِ النَّارِ]».

"ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे, इसपर दया कर, इसे सकुशल रख, इसे माफ़ कर, इसका ससम्मान सत्कार कर, इसकी क़ब्र को फैला दे, इसे पानी, बर्फ और ओले से धो दे, इसे गुनाहों से उस तरह स्वच्छ एवं साफ़ कर, जैसे तू ने उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया है, इसे अपने घर के बदले में उससे उत्तम घर प्रदान कर, अपने घर वालों से अच्छे घर वाले दे और अपने जीवन साथी से अच्छा जीवन साथी दे, इसे जन्नत में दाख़िल कर और क़ब्र की यातना तथा आग के अज़ाब से बचा।"200

«اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا، وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا، وَصَغِيرِنَا وَكَبِيرِنَا، وَذَكَرِنَا وَأُنْثَانَا، اللَّهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ عَلَى الإِسْلَامِ، وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَى الإِيمَانِ، اللَّهُمَّ لَا تَحْرِمْنَا أَجْرَهُ، وَلَا تُضِلَّنَا بَعْدَهُ».

"ऐ अल्लाह, हमारे जीवित तथा मृत, छोटे तथा बड़े, पुरुष तथा स्त्री और उपस्थित तथा अनुपस्थित सबको क्षमा कर दे। ऐ अल्लाह, हममें से जिसे जीवित रखना हो, इस्लाम पर जीवित रख और हममें से जिसे मारना हो, उसे ईमान की अवस्था में मौत दे। ऐ अल्लाह, हमें उसके प्रतिफल से वंचित न कर और हमें उसके बाद पथ-भ्रष्ट मत कर।"201

«اللَّهُمَّ إِنَّ فُلَانَ بْنَ فُلَانٍ فِي ذِمَّتِكَ، وَحَبْلِ جِوَارِكَ، فَقِهِ مِنْ فِتْنَةِ القَبْرِ، وَعَذَابِ النَّارِ، وَأَنْتَ أَهْلُ الوَفَاءِ وَالحَقِّ، فَاغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ إِنَّكَ أَنْتَ الغَفُورُ الرَّحيمُ».

"ऐ अल्लाह, अमुक पुत्र अमुक तेरी शरण तथा तेरी सुरक्षा में है। अतः उसे क़ब्र की आज़माइश और आग के अज़ाब से बचा। तू दाता और प्रशंसायोग्य है। ऐ अल्लाह, इसे क्षमा कर दे और इसपर दया कर। निश्चय ही तू अति क्षमाशील और दयावान है।"202

«اللَّهُمَّ عَبْدُكَ وَابْنُ أَمَتِكَ احْتَاجَ إِلَى رَحْمَتِكَ، وَأَنْتَ غَنِيٌّ عَنْ عَذَابِهِ، إِنْ كَانَ مُحْسِنًا فَزِدْ فِي حَسَنَاتِهِ، وَإِنْ كَانَ مُسِيئًا فَتَجَاوَزْ عَنْهُ».

"ऐ अल्लाह! यह तेरा बंदा और तेरी दासी का बेटा है, जो तेरी दया का मोहताज है और तुझे उसे यातना देने की आवश्यकता नहीं है। अगर यह सदाचारी है, तो तू इसकी नेकियों को बढ़ा दे और अगर दुराचारी है, तो इसे क्षमा कर दे।"203

56- जनाज़े की नमाज़ में बच्चे के लिए की जाने वाली दुआएँ

«اللَّهُمَّ أَعِذْهُ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ».

"ऐ अल्लाह! इसे क़ब्र की यातना से बचा।"204

وإن قال: «اللَّهُمَّ اجْعَلْهُ فَرَطًا وَذُخْرًا لِوَالِدَيْهِ، وَشَفِيعًا مُجَابًا، اللَّهُمَّ ثَقِّلْ بِهِ مَوَازِينَهُمَا، وَأَعْظِمْ بِهِ أُجورَهُمَا، وَأَلْحِقْهُ بِصَالِحِ المُؤْمِنِينَ، وَاجْعَلْهُ فِي كَفَالَةِ إِبْرَاهِيمَ، وَقِهِ بِرَحْمَتِكَ عَذَابَ الجَحِيمِ، وَأَبْدِلْهُ دَارًا خَيْرًا مِنْ دَارِهِ، وَأَهْلًا خَيْرًا مِنْ أَهْلِهِ، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِأَسْلَافِنَا، وَأَفْرَاطِنَا، وَمَنْ سَبَقَنَا بِالإِيمَانِ» فَحَسَنٌ.

और अगर यह दुआ भी पढ़ ले तो अच्छा है: "ऐ अल्लाह! इसे अपने माता-पिता के लिए गंतव्य में पहले से पहुँचकर प्रबंध करने वाला, प्रतिफल का कोष एवं ऐसा सिफ़ारिशी बना दे, जिसकी सिफ़ारिश ग्रहण की जाती हो। ऐ अल्लाह! इसके ज़रिए उन दोनों के तराज़ू के पलड़े को भारी कर दे, इसके ज़रिए उनका प्रतिफल बड़ा कर दे, इसे सदाचारी मोमिनों के साथ मिला، इबराहीम -अलैहिस्सलाम- की कफ़ालत (अभिभावक्ता) प्रदान कर, जहन्नम की यातना से बचाने की कृपा कर तथा इसे अपने घर से बेहतर घर प्रदान कर और अपने परिवार से बेहतर परिवार प्रदान कर। ऐ अल्लाह! हमारे गुज़रे हुए, गंतव्य में पहले से पहुँचे हुए एवं ईमान के साथ हमसे आगे बढ़ चुके लोगों को क्षमा कर।"205

«اللَّهُمَّ اجْعَلْهُ لَنَا فَرَطًا، وَسَلَفًا، وَأَجْرًا».

"ऐ अल्लाह! इसे हमारे लिए गंतव्य में पहले पहुँचकर तैयारी करने वाला,हमारे लिए हम से पहले जन्नत की तरफ जाने वाला और प्रतिफल का साधन बना।"206

57- मृतक के परिजन को सांत्वना देने के शब्द

«إِنَّ للَّهِ مَا أَخَذَ، وَلَهُ مَا أَعْطَى، وَكُلُّ شَيْءٍ عِنْدَهُ بِأَجَلٍ مُسَمَّى... فَلْتَصْبِرْ وَلْتَحْتَسِبْ».

"बेशक अल्लाह ही का है, जो उसने ले लिया और उसी का है, जो उसने दिया। उसके निकट प्रत्येक वस्तु का समय निश्चित है। अतः अब तू सब्र कर तथा अल्लाह से प्रतिफल की उम्मीद रख।"207

यदि यह दुआ भी पढ़ ले तो बेहतर है: "अल्लाह तुम्हें बड़ा प्रतिफल दे, हिम्मत से काम लेने की शक्ति दे और तुम्हारे मृतक को क्षमा करे।"

«أَعْظَمَ اللَّهُ أَجْرَكَ، وَأَحْسَنَ عَزَاءَكَ، وَغَفَرَ لِمَيِّتِكَ» فَحَسَنٌ.

"यदि यह दुआ भी पढ़ ले तो बेहतर है : "अल्लाह तुम्हें बड़ा प्रतिफल दे, हिम्मत से काम लेने की शक्ति दे और तुम्हारे मृतक को क्षमा करे।"208

 

58- मृतक को क़ब्र में दाखिल करते समय की दुआ

«بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَى سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ».

"हम इसे अल्लाह के नाम से और उसके रसूल की सुन्नत के अनुरूप क़ब्र में रख रहे हैं।"209

59- मृतक को दफ़न करने के बाद पढ़ी जाने वाली दुआ

«اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ، اللَّهُمَّ ثَبِّتْهُ».

"ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे और सुदृढ़ रख।"210

60- क़ब्रों की ज़ियारत की दुआ

«السَّلاَمُ عَلَيْكُمْ أَهْلَ الدِّيَارِ، مِنَ المُؤْمِنِينَ وَالمُسْلِمِينَ، وَإِنَّا إِنْ شَاءَ اللَّهُ بِكُمْ لَاحِقُونَ، [وَيَرْحَمُ اللَّهُ المُسْتَقدِمِينَ مِنَّا وَالمُسْتأْخِرِينَ] أَسْاَلُ اللَّهَ لَنَا وَلَكُمُ العَافِيَةَ».

"ऐ इस स्थान के रहने वाले मोमिनो और मुसलमानो, अल्लाह तुमपर शांति की जलधारा बरसाए और हम भी इन शा अल्लाह तुमसे मिलने वाले हैं। अल्लाह हममें से आगे जाने वालों और पीछे आने वालों पर दया करे। मैं अल्लाह से हमारे तथा तुम्हारे लिए कल्याण की प्रार्थना करता हूँ।"211

61- आँधी के समय की दुआ

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْــــــأَلُكَ خَيْرَهَا، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّهَا».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस तेज़ हवा (आँधी) की भलाई माँगता हूँ और इसकी बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।"212

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَهَا، وَخَيْرَ مَا فِيهَا، وَخَيْرَ مَا أُرْسِلَتْ بِهِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّهَا، وَشَرِّ مَا فِيهَا، وَشَرِّ مَا أُرْسِلَتْ بِهِ».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इसकी भलाई, इसमें जो कुछ है उसकी भलाई तथा इसे जिसके साथ भेजा गया है उसकी भलाई माँगता हूँ। तथा इसकी बुराई, इसमें जो कुछ है उसकी बुराई और इसे जिसके साथ भेजा गया है उसकी बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।"213

 

 

62- बादल गरजते समय की दुआ

«سُبْحَانَ الَّذِي يُسَبِّحُ الرَّعْدُ بِحَمْدِهِ وَالمَلَائِكَةُ مِنْ خِيفَتِهِ».

"मैं पवित्रता बयान करता हूँ उस प्रभु की, बिजली की कड़क जिसकी प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करती है और फ़रिश्ते उसके भय से काँपते हैं।"214

63- बारिश माँगने की कुछ दुआएँ

«اللَّهُمَّ اسْقِنَا غَيْثًا مُغِيثًا مَرِيئًا مَرِيعًا، نَافِعًا غَيْرَ ضَارٍّ، عَاجِلًا غَيْرَ آجِلٍ».

"ऐ अल्लाह! हमें ऐसी बारिश दे, जो सहायक, अनुकूल और हरियाली लाने वाली हो। हानीकारक होने की बजाए लाभदायक हो, और देर न करे, बल्कि जल्दी आए।"215

«اللَّهُمَّ أَغِثْنَا، اللَّهُمَّ أَغِثْنَا، اللَّهُمَّ أَغِثْنَا».

"ऐ अल्लाह! हमें बारिश दे, ऐ अल्लाह! हमें बारिश दे, ऐ अल्लाह! हमें बारिश दे।"216

«اللَّهُمَّ اسْقِ عِبَادَكَ، وَبَهَائِمَكَ، وَانْشُرْ رَحْمَتَكَ، وَأَحْيِي بَلَدَكَ المَيِّتَ».

"ऐ अल्लाह! अपने बंदों तथा अन्य प्राणियों की पियास दूर कर दे, अपनी कृपा की चादर फैला दे और अपने मृत नगर को फिर से जीवित कर दे।"217

64- बारिश होते देखते समय की दुआ

«اللَّهُمَّ صَيِّبًا نَافِعًا».

"ऐ अल्लाह! इसे लाभदायक बारिश बना दे।"218

65- बारिश होने के बाद की दुआ

«مُطِرْنَا بِفَضْلِ اللَّهِ وَرَحْمَتِهِ».

"हमें अल्लाह के अनुग्रह तथा उसकी कृपा से वर्षा प्राप्त हुई।"219

66- बारिश रुकवाने की दुआ

«اللَّهُمَّ حَوَالَيْنَا وَلَا عَلَيْنَا، اللَّهُمَّ عَلَى الآكَامِ وَالظِّرَابِ، وَبُطُونِ الأَوْدِيَةِ، وَمَنَابِتِ الشَّجَرِ».

"ऐ अल्लाह! हमारे आस-पास बारिश बरसा, हमपर नहीं। ऐ अल्लाह! टीलों पर, पहाड़ियों पर, घाटियों में और पेड़ों के उगने की जगहों पर बारिश बरसा।"220

67- नया चाँद देखने की दुुआ

«اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُمَّ أَهِلَّهُ عَلَيْنَا بِالأَمْنِ وَالإِيمَانِ، وَالسَّلَامَةِ وَالإِسْلَامِ، وَالتَّوْفِيقِ لِمَا تُحِبُّ رَبَّنَا وَتَرْضَى، رَبُّنَا وَرَبُّكَ اللَّهُ».

"अल्लाह सबसे बड़ा है। ऐ अल्लाह! तू इसे हमारे सामने शांति, ईमान, सुरक्षा और इस्लाम के साथ ला तथा उस चीज़ के सुयोग के साथ, जिसे तू ऐ हमारे रब प्रिय जानता और पसंद करता है। (ऐ चाँद!) हमारा तथा तुम्हारा पालनहार अल्लाह है।"221

68- रोज़ा इफ़तार करते समय की दुआ

«ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ العُرُوقُ، وَثَبَتَ الأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ».

"प्यास दूर हो गई, रगें तर हो गईं और अल्लाह ने चाहा तो प्रतिफल भी सिद्ध हो गया।"222

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِرَحْمَتِكَ الَّتِي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْءٍ أَنْ تَغْفِرَ لِي».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी उस कृपा का वास्ता देकर विनती करता हूँ, जिसने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है, कि मुझे क्षमा कर दे।"223

69- खाने से पहले की दुआ

«إِذَا أَكَلَ أَحَدُكُمْ طَعَامًا فَلْيَقُلْ بِسْمِ اللَّهِ، فَإِنْ نَسِيَ فِي أَوَّلِهِ فَلْيَقُلْ بِسْمِ اللَّهِ فِي أَوَّلِهِ وَآخِرِهِ».

"जब तुममें से कोई व्यक्ति कोई चीज़ खाए, तो बिस्मिल्लाह कहे। यदि शुरू में कहना भूल जाए, तो कहे : मैं इसके शुरू तथा अंत में अल्लाह का नाम लेता हूँ।"224

«مَنْ أَطْعَمَهُ اللَّهُ الطَّعَامَ فَلْيَقُلْ: اللَّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيهِ وَأَطْعِمْنَا خَيْرًا مِنْهُ، وَمَنْ سَقَاهُ اللَّهُ لَبَنًا فَلْيَقُلْ اللَّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيهِ وَزِدْنَا مِنْهُ».

"जिसे अल्लाह कोई खाना खिलाए, वह कहे : ऐ अल्लाह! हमारे लिए इसमें बरकत दे और हमें इससे उत्तम भोजन खिला। और जिसे अल्लाह दूध पिलाए, वह कहे : ऐ अल्लाह! हमारे लिए इसमें बरकत दे और इससे अधिक दे।"225

 

70- खाना खा लेने के बाद की दुआ

«الحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنِي هَذَا، وَرَزَقَنِيهِ، مِنْ غَيْرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلَا قُوَّةٍ».

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे यह खाना खिलाया और मुझे यह भोजन प्रदान किया, जबकि मेरे पास न कोई शक्ति है और न सामर्थ्य।"226

«الْحَمْدُ لِلَّهِ حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ [مَكْفِيٍّ وَلَا] مُوَدَّعٍ، وَلَا مُسْتَغْنَىً عَنْهُ رَبَّنَا».

"मैं अल्लाह की अत्यधिक, स्वच्छ और बरकत वाली प्रशंसा करता हूँ। अल्लाह को छोड़ न प्रयाप्ति प्राप्त की जा सकती है, न उसे छोड़ा जा सकता है और न उससे बेनियाज़ी बरती जा सकती है, ऐ हमारे रब !"227

71- अतिथि की दुआ आतिथेय के लिए

«اللَّهُمَّ بَارِكْ لَهُمْ فِيمَا رَزَقْتَهُم، وَاغْفِرْ لَهُمْ وَارْحَمْهُمْ».

"ऐ अल्लाह! तू ने इन्हें जो रोज़ी दी है, उसमें बरकत दे, इन्हें क्षमा कर और इनपर कृपा कर।"228

72- दुआ के माध्यम से खाने या पीने की चीज़ माँगने का इशारा

«اللَّهُمَّ أَطْعِمْ مَنْ أَطْعَمَنِي، وَاسْقِ مَنْ سَقَانِي».

"ऐ अल्लाह! तू उसे खिला जो मुझे खिलाए और उसे पिला जो मुझे पिलाए।"229

73- किसी के घर में रोज़ा इफ़तार करने के समय की दुआ

«أَفْطَرَ عِنْدَكُمُ الصَّائِمُونَ، وَأَكَلَ طَعَامَكُمُ الأَبْرَارُ، وَصَلَّتْ عَلَيْكُمُ المَلَائِكَةُ».

"तुम्हारे यहाँ रोज़ेदार इफ़तार करें , तुम्हारा खाना नेक लोग खायें और फ़रिश्ते तुम्हारे लिए दुआ करें ।"230

74- रोज़ेदार की दुआ जब खाना उपस्थित हो और वह रोज़ा न तोड़े

«إِذَا دُعِيَ أَحَدُكُمْ فَلْيُجِبْ، فَإِنْ كَانَ صَائِمًا فَلْيُصَلِّ، وَإِنْ كَانَ مُفْطِرًا فَلْيَطْعَمْ»،

"जब तुममें से किसी को निमंत्रण दिया जाये , तो वह निमंत्रण स्वीकार करे। अगर रोज़ेदार हो, तो दुआ दे दे और अगर रोज़े से न हो, तो खाए।"231

इस हदीस में आए हुए शब्द "فَلْيُصَلِّ" का अर्थ है, दुआ दे दे।

75- रोज़ेदार को जब कोई गाली दे, तो वह क्या कहे?

«إِنِّي صَائِمٌ، إِنِّي صَائِمٌ».

"मैं रोज़े से हूँ। मैं रोज़े से हूँ।"232

76- पहला फल देखने के समय की दूआ

«اللَّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِي ثَمَرِنَا، وَبَارِكْ لَنَا فِي مَدِينَتِنَا، وَبَارِكْ لَنَا فِي صَاعِنَا، وَبَارِكْ لَنَا فِي مُدِّنَا».

"ऐ अल्लाह! हमारे लिए हमारे फलों में बरकत दे, हमारे लिए हमारे नगर में बरकत दे, हमारे लिए हमारे साअ् में बरकत दे और हमारे लिए हमारे मुद्द में बरकत दे।"233

77- छींक की दुआ

«إِذَا عَطَسَ أَحَدُكُم فَلْيَقُلِ الحَمْدُ لِلَّهِ، وَلْيَقُلْ لَهُ أَخُوهُ أَوْ صَاحِبُهُ: يَرْحَمُكَ اللَّهُ، فَإِذَا قَالَ لَهُ: يَرحَمُكَ اللَّهُ، فَلْيَقُلْ: يَهْدِيكُمُ اللَّهُ وَيُصْلِحُ بَالَكُم».

"जब तुममें से कोई छींके, तो 'अल-हम्दु लिल्लाह' (सारी प्रशंसा अल्लाह की है) कहे और उसका भाई अथवा उसका साथी 'यर्हमुकल्लाह' (अल्लाह तुझपर दया करे) कहे। फिर, जब उसका साथी 'यर्हमुकल्लाह' कहे, तो वह 'यहदीकुमुल्लाहु व युसलिहु बालकुम' (अल्लाह तुम्हें हिदायत दे और तुम्हारा हाल सही कर दे) कहे।"234

78- यदि कोई काफ़िर छींकने के बाद अल्लाह की प्रशंसा करे, तो क्या कहा जाए?

«يَهْدِيكُمُ اللَّهُ وَيُصْلِحُ بَالَكُمْ».

"अल्लाह तुम्हें हिदायत दे और तुम्हारी दशा ठीक कर दे।"235

79- नवव्याहता के लिए दुआ

«بَارَكَ اللَّهُ لَكَ، وَبَارَكَ عَلَيْكَ، وَجَمَعَ بَيْنَكُمَا فِي خَيْرٍ».

"अल्लाह तेरे लिए और तुझपर बरकत की बरखा बरसाए और तुम दोनों को अच्छाई के कामों में एकमत रखे।"236

80- नवव्याहता तथा जानवर खरीदने वाले के लिए दुआ

जब तुममें से कोई शादी करे या कोई सेवक खरीदे, तो यह दुआ पढ़े : "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा इसकी रचना के समय तू ने इसके अंदर जो विशेषताएँ रखी हैं, उनकी भलाई माँगता हूँ। तथा मैं इसकी बुराई एवं इसकी रचना के समय तू ने इसके अंदर जो विशेषताएँ रखी हैं, उनकी बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।" इसी तरह जब कोई ऊँट खरीदे, तो उसके कोहान का ऊपरी भाग पकड़कर यह दुआ पढ़े।

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَهَا، وَخَيْرَ مَا جَبَلْتَهَا عَلَيْهِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّهَا، وَشَرِّ مَا جَبَلْتَهَا عَلَيْهِ، وَإِذَا اشْتَرَى بَعِيرًا فَلْيَأْخُذْ بِذِرْوَةِ سَنَامِهِ وَلْيَقُلْ مِثْلَ ذَلِكَ».

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा इसकी रचना के समय तू ने इसके अंदर जो विशेताएँ रखी हैं, उनकी भलाई माँगता हूँ। तथा मैं इसकी बुराई एवं इसकी रचना के समय तू ने इसके अंदर जो विशेषताएँ रखी हैं, उनकी बुराई से तेरी शरण में आता हूँ। इसी तरह जब कोई ऊँट खरीदे, तो उसके कोहान का ऊपरी भाग पकड़कर यह दुआ पढ़े।"237

81- स्त्री से संभोग से पहले की दुआ

«بِسْمِ اللَّهِ، اللَّهُمَّ جَنِّبْنَا الشَّيْطَانَ، وَجَنِّبِ الشَّيْطَانَ مَا رَزَقْتَنَا».

"अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! हमें शैतान से बचा और हमें जो संतान दे उसे भी शैतान से बचा।"238

82- क्रोध के समय की दुआ

«أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ».

"मैं धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।"239

83- किसी विपत्ति में पड़े हुए व्यक्ति को देखकर पढ़ने की दुआ

«الحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي عَافَانِي مِمَّا ابْتَلَاكَ بِهِ، وَفَضَّلَنِي عَلَى كَثِيرٍ مِمَّنْ خَلَقَ تَفْضِيلًا».

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे उस विपत्ति से सुरक्षित रखा, जिसके साथ तुम को आज़माईश में डाला , और मुझे अपनी बहुत-सी सृष्टियों से स्रेष्ठ बनाया।"240

84- सभा में पढ़ने की दुआ

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि उनकी गिनती के अनुसार अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक ही सभा में खड़े होने से पहले-पहले यह दुआ सौ बार पढ़ लिया करते थे : "ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मेरी तौबा क़बूल कर ले। निश्चय ही तू बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला और क्षमा करने वाला है।"

«رَبِّ اغْفِرْ لِي، وَتُبْ عَلَيَّ، إِنَّكَ أَنْتَ التَّوَّابُ الغَفُورُ».

"ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मेरी तौबा क़बूल कर ले। निश्चय ही तू बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला और क्षमा करने वाला है।"241

85- सभा का प्रायश्चित

«سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَسْتَغْفِرُكَ وَأَتُوبُ إِلَيْكَ».

"ऐ अल्लाह, तू पाक है और तेरी ही प्रशंसा है। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी ओर लौटकर आता हूँ।"242

86- उसके लिए दुआ, जिसने कहा : "अल्लाह तुझे क्षमा करे"

«وَلَكَ».

197- "और तुझे भी।"243

87- कोई उपकार करने वाले के लिए दुआ

«جَزَاكَ اللَّهُ خَيْرًا».

"अल्लाह तुझे अच्छा बदला दे।"244

88- दज्जाल के फ़ितने से बचाव के उपाय

«مَنْ حَفِظَ عَشْرَ آيَاتٍ مِنْ أَوَّلِ سُورَةِ الكَهْفِ عُصِمَ مِنَ الدَّجَّالِ».

199- "जिसने सूरा अल-कह्फ़ के आरंभ से दस आयतें याद कर लीं, उसे दज्जाल के फ़ितने से बचा लिया जाएगा।"245

इसी तरह हर नमाज़ के अंतिम तशह्हुद के बाद दज्जाल के फ़ितने से अल्लाह की शरण माँगने से भी उससे सुरक्षा प्राप्त होगी।

इसी तरह हर नमाज़ के अंतिम तशह्हुद के बाद दज्जाल के फ़ितने से अल्लाह की शरण माँगने से भी उससे सुरक्षा प्राप्त होगी।246

89- "मुझे तुमसे अल्लाह के लिए प्रेम है" कहने वाले के लिए दुआ

«أَحَبَّكَ الَّذِي أَحْبَبْتَنِي لَهُ».

"तुझसे भी वह प्रेम रखे, जिसके लिए तू मुझसे प्रेम रखता है।"247

90- अपना धन प्रस्तुत करने वाले के लिए दुआ

«بَارَكَ اللَّهُ لَكَ فِي أَهْلِكَ وَمَالِكَ».

"अल्लाह तेरे परिवार एवं धन-संपत्ति में बरकत दे।"248

91- क़र्ज़ अदा करते समय क़र्ज़ देने वाले के लिए दुआ

«بارَكَ اللَّهُ لَكَ فِي أَهْلِكَ وَمَالِكَ، إِنَّمَا جَزَاءُ السَّلَفِ الحَمْدُ وَالأَدَاءُ».

"अल्लाह तेरे लिए तेरे धन एवं परिवार में बरकत दे। क़र्ज़ का बदला यह है कि देने वाले की प्रशंसा की जाए और लिए हुए क़र्ज़ को अदा कर दिया जाए।"249

92- शिर्क से भय की दुआ

«اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أُشْرِكَ بِكَ وَأَنَا أَعْلَمُ، وَأَسْتَغْفِرُكَ لِمَا لَا أَعْلَمُ».

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ इस बात से कि जान-बूझकर किसी को तेरा साझी बनाऊँ और तुझसे क्षमा माँगता हूँ उस शिर्क के लिए जो अनजाने में हो जाए।"250

93-यह दुआ (अल्लाह तुझ में बरकत दे) देने वाले के लिए दुआ

«وَفِيكَ بَارَكَ اللَّهُ».

"अल्लाह तुझ में भी बरकत दे।"251

94- अपशगुन को अप्रिय जानने की दुआ

«اللَّهُمَّ لَا طَيْرَ إِلَّا طَيْرُكَ، وَلَا خَيْرَ إِلَّا خَيْرُكَ، وَلَا إِلَهَ غَيْرُكَ».

"ऐ अल्लाह! तेरे शगुन के अतिरिक्त कोई शगुन नहीं है, तेरी भलाई के अतिरिक्त कोई भलाई नहीं है और तेरे अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं है।"252

95- सवारी पर सवार होने की दुआ

«بِسْمِ اللَّهِ، وَالحَمْدُ للَّهِ

206- "मैं अल्लाह के नाम से सवार होता हूँ। और सारी प्रशंसा अल्लाह की है।

﴿سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ

{पवित्र है वह, जिसने इसे हमारे वश में कर दिया। अन्यथा हम इसे अपने वश में नहीं कर सकते थे।

وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ﴾،

तथा हम अवश्य ही अपने पालनहार की ओर फिरकर जाने वाले हैं।}

الحَمْدُ لِلَّهِ، الحَمْدُ لِلَّهِ، الحَمْدُ لِلَّهِ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي؛ فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ».

"सारी प्रशंसा अल्लाह की है। सारी प्रशंसा अल्लाह की है। सारी प्रशंसा अल्लाह की है। अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह सबसे बड़ा है। तू पवित्र है। ऐ अल्लाह! मैंने अपने ऊपर अत्याचार किया है। अतः मुझे क्षमा कर दे। क्योंकि तेरे अतिरिक्त कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता।"253

96- यात्रा की दुआ

«اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ،

207- अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है।

﴿سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ

{पवित्र है वह, जिसने इसे हमारे वश में कर दिया। अन्यथा हम इसे अपने वश में नहीं कर सकते थे।

وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ﴾

तथा हम अवश्य ही अपने पालनहार की ओर फिरकर जाने वाले हैं।}

اللَّهُمَّ إِنّا نَسْأَلُكَ فِي سَفَرِنَا هَذَا البِرَّ وَالتَّقْوَى، وَمِنَ العَمَلِ مَا تَرْضَى، اللَّهُمَّ هَوِّنْ عَلَيْنَا سَفَرَنَا هَذَا وَاطْوِ عَنَّا بُعْدَهُ، اللَّهُمَّ أَنْتَ الصَّاحِبُ فِي السَّفَرِ، وَالخَليفَةُ فِي الأَهْلِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ وَعْثَاءِ السَّفَرِ، وَكَآبَةِ المَنْظَرِ، وَسُوءِ المُنْقَلَبِ فِي المَالِ وَالأَهْلِ»،

"ऐ अल्लाह! हम अपनी इस यात्रा में तुझसे भलाई, धर्मपरायणता और ऐसा अमल माँगते हैं, जो तुझे पसंद हो। ऐ अल्लाह! हमारे लिए हमारी इस यात्रा को आसान कर दे और इसकी दूरी को समेट दे। ऐ अल्लाह! तू ही यात्रा में साथी और अनुपस्थिति में घर-परिवार की देखभाल करने वाला है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ यात्रा की कठिनाइयों, बुरी हालत और धन तथा परिवार में बुरे परिवर्तन से।" जब यात्रा से वापस आए, तो इन वाक्यों के साथ-साथ यह वृद्धि भी करे :

«آيِبُونَ، تائِبُونَ، عَابِدُونَ، لِرَبِّنَا حَامِدُونَ».

"हम लौट आए तौबा करते हुए तथा अपने रब की इबादत और उसकी प्रशंसा करते हुए।"254

97- गाँव या नगर में दाख़िल होने की दुआ

«اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَوَاتِ السَّبْعِ وَمَا أَظْلَلْنَ، وَرَبَّ الأَرَضِينَ السَّبْعِ وَمَا أَقْلَلْنَ، وَرَبَّ الشَّياطِينِ وَمَا أَضْلَلْنَ، وَرَبَّ الرِّيَاحِ وَمَا ذَرَيْنَ، أَسْأَلُكَ خَيْرَ هَذِهِ القَرْيَةِ، وَخَيْرَ أَهْلِهَا، وَخَيْرَ مَا فِيهَا، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّهَا، وَشَرِّ أَهْلِهَا، وَشَرِّ مَا فِيهَا».

"ऐ अल्लाह! सातों आकाशों तथा उनके नीचे की सारी चीज़ों के रब ! सातों धरतियों और उनके ऊपर की सारी चीज़ों के रब! शैतानों तथा उनके बहकावे में आए हुए लोगों के रब तथा हवाओं एवं उनके द्वारा उड़ाई गई वस्तुओं के रब! मैं तुझसे इस गाँव, इसके निवासियों और इसमें मौजूद चीज़ों की भलाई माँगता हूँ तथा मैं इस गाँव, इसके रहने वालों और इसमें मौजूद चीज़ों से तेरी शरण माँगता हूँ।"255

98- बाज़ार में प्रवेश करने की दुआ

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ، وَلَهُ الحَمْدُ، يُحْيِي وَيُمِيتُ، وَهُوَ حَيٌّ لَا يَمُوتُ، بِيَدِهِ الخَيْرُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ».

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य और उसी की सब प्रशंसा है, वह जीवन और मृत्यु देता है और वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है।"256

99- सवारी के फिसलने के समय की दुआ

«بِسْمِ اللَّهِ».

"मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ।"257

 

 

100- यात्री की मुक़ीम (ठहरे हुए) के लिए दुआ

«أَسْتَوْدِعُكُمُ اللَّهَ الَّذِي لَا تَضِيعُ وَدَائِعُهُ».

"मैं तुम्हें अल्लाह के हवाले करता हूँ, जिसके हवाले की हुई चीज़ें नष्ट नहीं होती हैं।"258

101- ठहरे हुए व्यक्ति की यात्री के लिए दुआ

«أَسْتَوْدِعُ اللَّهَ دِينَكَ، وَأَمَانَتَكَ، وَخَوَاتِيمَ عَمَلِكَ».

"मैं तेरे धर्म, तेरी अमानत और तेरे अंतिम कर्मों को अल्लाह के हवाले करता हूँ।"259

«زَوَّدَكَ اللَّهُ التَّقْوَى، وَغَفَرَ ذَنْبَكَ، وَيَسَّرَ لَكَ الخَيْرَ حَيْثُ ما كُنْتَ».

"अल्लाह तुम्हें धर्मपरायणता का पाथेय प्रदान करे, तुम्हारे गुनाह माफ़ करे और जहाँ भी रहो, तुम्हारे लिए भलाई को प्राप्त करना आसान करे।"260

102- यात्रा के करने के दौरान अल्लाह की बड़ाई और पवित्रता बयान करना

जाबिर -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : "जब हम ऊपर चढ़ते तो अल्लाहु अकबर कहते और जब नीचे उतरते तो सुबहान अल्लाह कहते थे।" जब हम ऊपर चढ़ते तो अल्लाहु अकबर कहते और जब नीचे उतरते तो सुबहान अल्लाह कहते थे।"261

103- यात्री के लिए सुबह के समय पढ़ने की दुआ

«سَمَّعَ سَامِعٌ بِحَمْدِ اللَّهِ، وَحُسْنِ بَلَائِهِ عَلَيْنَا، رَبَّنَا صاحِبْنَا، وَأَفْضِلْ عَلَيْنَا، عَائِذًا بِاللَّهِ مِنَ النَّارِ».

"एक सुनने वाले ने हमारी ओर से अल्लाह की प्रशंसा करने और नेमतों द्वारा उसकी हमारी परीक्षा लेने को दूसरों तक पहुँचाया। ऐ हमारे पालनहार! तू हमारे साथ रह और हमपर अनुग्रह फ़रमा। मैं यह बात जहन्नम से अल्लाह की शरण में आते हुए कह रहा हूँ।"262

104- यात्रा के दौरान या बिना यात्रा के भी किसी जगह ठहरने की दुआ

«أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ».

"मैं अल्लाह की पैदा की हुई वस्तुओं की बुराई से, उसके पूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ।"263

105- यात्रा से वापसी की दुआ

«يُكَبِّرُ عَلَى كُلِّ شَرَفٍ ثَلَاثَ تَكْبِيرَاتٍ ثُمَّ يَقُولُ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ، وَلَهُ الحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، آيِبُونَ، تَائِبُونَ، عَابِدُونَ، لِرَبِّنا حَامِدُونَ، صَدَقَ اللَّهُ وَعْدَهُ، وَنَصَرَ عَبْدَهُ، وَهَزَمَ الأَحْزابَ وَحْدَهُ».

"हर ऊँची जगह पर तीन बार अल्लाहु अकबर कहे और उसके बाद कहे : अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम की शक्ति रखता है। हम वापस हो रहे हैं, तौबा करते हुए और अपने रब की इबादत तथा उसकी प्रशंसा करते हुए। अल्लाह ने अपना वचन सच कर दिखाया, अपने बंदे की मदद की और अकेले ही सारे जत्थों को पराजित कर दिया।"264

106- कोई प्रिय अथवा अप्रिय घटना घटित होते समय की दुआ

218- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सामने जब कोई ऐसी बात आती, जो आपको पसंद होती, तो फ़रमाते :

«الحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي بِنِعْمَتِهِ تَتِمُّ الصَّالِحَاتُ»

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसके अनुग्रह से सब अच्छे काम संपन्न होते हैं।" और जब सामने कोई ऐसी बात आती, जो पसंद न होती, तो फ़रमाते :

«الحَمْدُ لِلَّهِ عَلَى كُلِّ حَالٍ».

"सारी प्रशंसा हर हाल में अल्लाह की है।"265

107- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजने की फ़ज़ीलत

149- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«مَنْ صَلَّى عَلَيَّ صَلَاةً صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ بِهَا عَشْرًا».

"जिसने मुझपर एक बार दरूद भेजा , उसके बदले में अल्लाह उसपर दस रहमतें उतारेगा।"266

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«لَا تَجْعَلُوا قَبْرِي عِيدًا وَصَلُّوا عَلَيَّ؛ فَإِنَّ صَلَاتَكُم تَبْلُغُنِي حَيْثُ كُنْتُمْ».

" मेरी क़ब्र को मेला स्थल बनाओ।और मुझपर दुरूद भेजते रहो, क्योंकि तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा दुरूद मुझे पहुँच जाएगा।"267

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«البَخِيلُ مَنْ ذُكِرْتُ عِنْدَهُ فَلَمْ يُصَلِّ عَلَيَّ».

"असल कंजूस वह व्यक्ति है, जिसके सामने मेरा नाम लिया जाए और वह मुझपर दरूद न भेजे।"268

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«إِنَّ لِلَّهِ مَلَائِكَةً سَيَّاحِينَ فِي الأَرْضِ يُبَلِّغُونِي مِنْ أُمَّتِي السَّلَامَ».

"अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते हैं, जो धरती में घूमते फिरते हैं। वे मुझे मेरी उम्मत का सलाम पहुँचाते हैं।"269

और आप-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-ने फ़रमाया :

«مَا مِنْ أَحَدٍ يُسَلِّمُ عَلَيَّ إِلَّا رَدَّ اللَّهُ عَلَيَّ رُوحِيَ حَتَّى أَرُدَّ عَلَيْهِ السَّلَامَ».

"जब कोई बंदा मुझपर सलाम पढ़ता है, अल्लाह मुझे मेरी आत्मा लौटा देता है, यहाँ तक कि मैं उसे सलाम का उत्तर दे दों।"270

108- सलाम को आम करना

24- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है :

«لَا تَدْخُلُوا الجَنَّةَ حَتَّى تُؤْمِنُوا، وَلَا تُؤْمِنُوا حَتَّى تَحَابُّوا، أَوَلَا أَدُلُّكُم عَلَى شَيْءٍ إِذَا فَعَلْتُمُوهُ تَحَابَبْتُم، أَفْشُوا السَّلَامَ بَيْنَكُمْ».

"तुम जन्नत मेें उस समय तक प्रवेश नहीं कर सकते, जब तक ईमान न लाओ, और तुम उस समय तक मोमिन नहीं हो सकते, जब तक एक-दूसरे से प्रेम न करने लगो। क्या मैं तुम्हारा मार्गदर्शन ऐसे कार्य की ओर न कर दूँ, जिसे यदि तुम करोगे तो एक-दूसरे से प्रेम करने लगोगे? अपने बीच में सलाम को आम करो।"271

«ثَلَاثٌ مَنْ جَمَعَهُنَّ فَقَدْ جَمَعَ الإِيمَانَ: الإِنْصَافُ مِنْ نَفْسِكَ، وَبَذْلُ السَّلَامِ لِلْعَالَمِ، وَالإِنْفَاقُ مِنَ الإِقْتَارِ».

"तीन बातें ऐसी हैं कि जिसने उन्हें एकत्र कर लिया, उसने ईमान को एकत्र कर लिया : अपने साथ न्याय करना, तमाम लोगों को सलाम करना और तंगी होने के बावजूद खर्च करना।"272

अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से रिवायत है कि एक आदमी ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि इस्लाम का कौन-सा कार्य सबसे अच्छा है ? आपने फ़रमाया : "तुम (भूखों को) खाना खिलाओ और परिचित और अपरिचित हर एक को सलाम करो।"

«تُطْعِمُ الطَّعَامَ، وَتَقْرأُ السَّلَامَ عَلَى مَنْ عَرَفْتَ وَمَنْ لَمْ تَعْرِفْ».

"तुम खाना खिलाओ और सलाम करो। जिसे जानते हो उसे भी और जिसे न जानते हो उसे भी।"273

109- यदि काफ़िर सलाम करे, तो उसका उत्तर कैसे दिया जाए?

«إذَا سَلَّمَ عَلَيْكُمْ أَهْلُ الكِتَابِ فَقُولُوا: وَعَلَيْكُمْ».

"जब अह्ले किताब तुम्हें सलाम करें, तो कहो : व अलैकुम (तुमपर भी)।"274

110- मुर्गे के बाँग देने और गधे के रेंकने के समय की दुआ

«إِذَا سَمِعْتُمْ صِيَاحَ الدِّيَكَةِ فَاسْأَلُوا اللَّهَ مِنْ فَضْلِهِ؛ فَإِنَّهَا رَأَتْ مَلَكًا، وَإِذَا سَمِعْتُمْ نَهِيقَ الحِمَارِ فَتَعَوَّذُوا بِاللَّهِ مِنَ الشَّيطَانِ؛ فَإِنَّهُ رَأَى شَيْطَانًا».

"जब तुम मुर्गे की बाँग सुनो तो अल्लाह से उसका अनुग्रह माँगों, क्योंकि उसने किसी फ़रिश्ते को देखा है। लेकिन जब गधे का रेंकना सुनो तो शैतान से अल्लाह की शरण माँगो, क्योंकि उसने किसी शैतान को देखा है।"275

111- रात को कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनते समय की दुआ

«إِذَا سَمِعْتُمْ نُبَاحَ الكِلَابِ وَنَهِيقَ الحَمِيرِ بِاللَّيْلِ فَتَعَوَّذُوا بِاللَّهِ مِنْهُنَّ؛ فَإِنَّهُنَّ يَرَيْنَ مَا لَا تَرَوْنَ».

"जब तुम रात में कुत्ते के भौंकने तथा गधे के रेंकने की आवाज़ सुनो, तो तुम उनसे अल्लाह की शरण माँगो, क्योंकि ये जानवर वह देखते हैं, जो तुम नहीं देखते।"276

112- उस व्यक्ति के हक़ में दुआ, जिसे तुमने गाली दी हो

149- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«اللَّهُمَّ فَأَيُّمَا مُؤْمِنٍ سَبَبْتُهُ فَاجْعَلْ ذَلِكَ لَهُ قُرْبَةً إِلَيْكَ يَوْمَ القِيَامَةِ».

"ऐ अल्लाह! जिस किसी ईमान वाले को मैंने गाली दी है, उसके लिए इसे क़यामत के दिन तेरी निकटता की प्राप्ति का साधन बना दे।"277

113- मुसलमान किसी मुसलमान की प्रशंसा में क्या कहे?

149- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«إِذَا كَانَ أَحَدُكُم مَادِحًا صَاحِبَهُ لَا مَحَالَةَ فَلْيَقُلْ: أَحْسِبُ فُلَانًا وَاللَّهُ حَسِيبُهُ، وَلَا أُزَكِّي عَلَى اللَّهِ أَحَدًا، أَحْسِبُهُ –إِنْ كَانَ يَعْلَمُ ذَاكَ – كَذَا وَكَذَا».

"जब तुममें से किसी को अपने साथी की प्रशंसा करनी ही हो, तो कहे : "मैं अमुक को (ठीक) समझता हूँ, हालाँकि उसका हिसाब अल्लाह ही लेगा और मैं किसी को अल्लाह के सामने पवित्र नहीं कहता।" मैं अमुक को ऐसा और ऐसा समझता हूँ -अगर वह जानता हो कि उसके अंदर यह बात सचमुच मौजूद है-।"278

114- जब कोई मुसलमान अपनी प्रशंसा सुने तो क्या कहे?

«اللَّهُمَّ لَا تُؤَاخِذْنِي بِمَا يَقُولُونَ، وَاغْفِرْ لِي مَا لَا يَعْلَمُونَ، [وَاجْعَلْنِي خَيْرًا مِمَّا يَظُّنُّونَ]».

"ऐ अल्लाह! लोग जो कुछ कह रहे हैं, उसके आधार पर मेरी पकड़ न करना और मेरी उन बातों को क्षमा कर देना जो लोग नहीं जानते और मुझे उनकी कल्पना से भी उत्तम बना देना।"279

115- हज या उमरा का एहराम बाँधा हुआ व्यक्ति तलबिया कैसे कहे?

«لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الحَمْدَ، وَالنِّعْمَةَ، لَكَ وَالمُلْكَ، لَا شَرِيكَ لَكَ».

"में उपस्थित हूँ। ऐ अल्लाह! मैं उपस्थित हूँ। तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ। सारी प्रशंसा, सारी नेमतें और सारा राज्य तेरा है। तेरा कोई साझी नहीं है।"280

116- हजर-ए-असवद के पास आते समय तकबीर कहना

«طَافَ النَّبيُّ ﷺ بِالْبَيْتِ عَلَى بَعِيرٍ كُلَّمَا أَتَى الرُّكْنَ أَشَارَ إِلَيْهِ بِشَيْءٍ عِنْدَهُ وَكَبَّرَ».

"अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक ऊँट पर सवार होकर काबा का तवाफ़ किया। इस दौरान आप जब-जब हजर-ए-असवद वाले कोने के पास आते, तो अपने पास मौजूद किसी चीज़ से उसकी ओर इशारा करते और अल्लाहु अकबर कहते।"281

117- रुक्न-ए-यमानी और हजर-ए-असवद के बीच की दुआ

﴿...رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِي ٱلدُّنۡيَا حَسَنَةٗ وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِ حَسَنَةٗ وَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ﴾.

"ऐ हमारे रब , हमें दुनिया में भी भलाई प्रदान कर और आख़िरत में भी भलाई प्रदान कर और हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा।"282

118- सफ़ा और मरवा पर ठहरने समय की दुआ

"अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सफ़ा के निकट आए, तो यह आयत पढ़ी : {बेशक सफ़ा और मरवा पहाड़ियाँ अल्लाह के धर्म की निशानियों में से हैं।} मैं उसी से दौड़ का आरंभ करूँगा, जिसे अल्लाह ने इस आयत में पहले बयान किया है।"

«﴿إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَآئِرِ اللَّهِ...﴾ أَبْدَأُ بِمَا بَدَأَ اللَّهُ بِهِ»

"निस्संदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं...", " मैं उसी से आरंभ करता हूँ, जिससे अल्लाह ने आरंभ किया है।" चुनांचे आप पहले सफ़ा पहाड़ी के पास जाकर उसपर चढ़ गए, यहाँ तक कि जब काबा दिखने लगा, तो क़िबले की ओर मुँह करके खड़े हो गए, अल्लाह का एकत्व और उसकी बड़ाई बयान की तथा फ़रमाया :

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ، أَنْجَزَ وَعْدَهُ، وَنَصَرَ عَبْدَهُ، وَهَزَمَ الأَحْزَابَ وَحْدَهُ، ثُمَّ دَعَا بَيْنَ ذلكَ، قَالَ مِثْلَ هَذَا ثَلَاثَ مَرَّاتٍ»

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम करने की क्षमता रखता है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसने अपना वचन पूरा कर दिखाया है, अपने बंदे की मदद की है और अकेले ही सारे जत्थों को पराजित कर दिया। फिर इसके बीच आपने दुआ फ़रमाई। इसी तरह आपने तीन बार कहा।" हदीस लंबी है और उसमें आगे है : "फिर आपने मरवा पर वैसा ही किया, जैसा सफ़ा में किया था।" इस हदीस में आगे है : उन्होंने मरवा पर वैसा ही किया, जैसा सफ़ा पर किया था।283

119- अरफ़ा के दिन की दुआ

149- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«خَيْرُ الدُّعَاءِ دُعَاءُ يَوْمِ عَرَفَةَ، وَخَيْرُ مَا قُلْتُ أَنَا وَالنَّبيُّونَ مِنْ قَبْلِي: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ وَلَهُ الحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ».

"सबसे अच्छी दुआ अरफ़ा के दिन की दुआ है और मैंने तथा मुझसे पहले नबियों ने जो सबसे अच्छी बात कही है, वह यह है : لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير अर्थात अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम करने की क्षमता रखता है।”284 "अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- क़सवा पर सवार होकर मशअर-ए-हराम आए और क़िबला की ओर मुँह करके दुआ की, अल्लाह की बड़ाई बयान की, उसके अतिरिक्त कोई अन्य पूज्य न होने का ऐलान किया और उसके एकत्व को बयान किया। आप अच्छी तरह भोर होने तक यहीं रुके रहे और सूरज निकलने से पहले यहाँ से चल पड़े।"285 "तीनों जमरात के पास हर कंकड़ी फेंकने के साथ अल्लाहु अकबर कहे। फिर पहले तथा दूसरे जमरे के बाद थोड़ा-सा आगे बढ़े और क़िबला की ओर मुँह करके खड़े होकर तथा दोनों हाथों को उठाकर दुआ करे। रही बात जमरा अक़बा की, तो उसमें हर बार कंकड़ी मारते समय अल्लाहु अकबर कहे और उसके बाद वहाँ रुके बिना ही वापस लौट जाए।"286

 

120- मशअर-ए-हराम के निकट का ज़िक्र

121- कंकड़ी मारते समय हर कंकड़ के साथ अल्लाहु अकबर कहना

122- आश्चर्यचकित करने वाली तथा प्रसन्नतापूर्ण बात सामने आने के समय की दुआ

«سُبْحَانَ اللَّهِ!».

"मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।"287

«اللَّهُ أَكْبَرُ!».

"अल्लाह सबसे बड़ा है।"288

123- कोई प्रसन्नतापूर्ण बात सामने आने पर आदमी क्या करे?

«كَانَ النَّبيُّ ﷺ إِذَا أَتَاهُ أَمْرٌ يَسُرُّهُ أَوْ يُسَرُّ بِهِ خَرَّ سَاجِدًا شُكْرًا لِلَّهِ تَبَارَكَ وَتَعَالَى».

"अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सामने जब कोई प्रसन्न करने वाली बात आती, तो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के शुक्र के तौर सजदे में गिर जाते।"289

124- शरीर में कोई दर्द होने पर आदमी क्या करे और क्या कहे?

«ضَعْ يَدَكَ عَلَى الَّذِي تَألَّمَ مِنْ جَسَدِكَ وَقُلْ: بِسْمِ اللَّهِ، ثَلَاثًا، وَقُلْ سَبْعَ مَرَّاتٍ: أَعُوذُ بِاللَّهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ».

"शरीर के जिस भाग में दर्द हो, वहाँ अपना हाथ रखो और उसके बाद तीन बार बिस्मिल्लाह कहो तथा सात बार यह दुआ पढ़ो : मैं अल्लाह तथा उसके सामर्थ्य की शरण में आता हूँ, उस चीज़ से जो मैं पाता हूँ और जिससे मैं डरता हूँ।"290

125- जिसे भय हो कि उसकी नज़र किसी वस्तु को लग सकती है ,तो वह आदमी क्या कहे?

«إِذَا رَأَى أَحَدُكُم مِنْ أَخِيهِ، أَوْ مِنْ نَفْسِهِ، أَوْ مِنْ مَالِهِ مَا يُعْجِبُهُ [فَلْيَدْعُ لَهُ بِالْبَرَكَةِ] فَإِنَّ العَيْنَ حَقٌّ».

"जब तुममें से कोई अपने भाई के अंदर, स्वयं अपने अंदर या अपने धन में कोई ऐसी बात देखे, जो उसके मन को भा जाए, तो उसके लिए बरकत की दुआ करे। क्योंकि नज़र लगना सत्य है।"291

126- घबराहट के समय का ज़िक्र

«لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ!».

"अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है।"292

127- ऊँट अथवा अन्य जानवरों को ज़बह करते समय क्या कहा जाए?

«بِسْمِ اللَّهِ وَاللَّهُ أَكْبَرُ [اللَّهُمَّ مِنْكَ وَلَكَ] اللَّهُمَّ تَقَبَّلْ مِنِّي».

"मैं अल्लाह के नाम से ज़बह करता हूँ और अल्लाह सबसे बड़ा है। ऐ अल्लाह! यह तेरी ओर से है और तेरे लिए है। ऐ अल्लाह! इसे मेरी ओर से ग्रहण कर ले।"293

128- सरकश शैतानों के फ़रेब से बचने की दुआ

«أَعُوذُ بكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ الَّتِي لَا يُجَاوِزُهُنَّ بَرٌّ وَلَا فَاجِرٌ: مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ، وَبَرَأَ وَذَرَأَ، وَمِنْ شَرِّ مَا يَنْزِلُ مِنَ السَّمَاءِ، وَمِنْ شَرِّ مَا يَعْرُجُ فيهَا، وَمِنْ شَرِّ مَا ذَرَأَ فِي الأَرْضِ، وَمِنْ شَرِّ مَا يَخْرُجُ مِنْهَا، وَمِنْ شَرِّ فِتَنِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ، وَمِنْ شَرِّ كُلِّ طَارِقٍ إِلَّا طَارِقًا يَطْرُقُ بِخَيْرٍ يَا رَحْمَنُ».

"मैं अल्लाह के उन संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ, जिनसे कोई अच्छा या बुरा इनसान आगे नहीं बढ़ सकता, जिसे उसने पैदा किया, अस्तित्व प्रदान किया, और फैला दिया, उन तमाम चीज़ों की बुराई से। इसी तरह मैं उसकी शरण में आता हूँ उन तमाम चीज़ों की बुराई से, जो आकाश से नीचे आती हैं, नीचे से आकाश की ओर जाती हैं, जिनको उसने धरती में फैलाया है और जो धरती से निकलती हैं। इसी तरह रात और दिन के फ़ितनों की बुराई से और हर रात में आने वाले की बुराई से, सिवाय उस रात में आने वाले के, जो भलाई के साथ आता हो। ऐ रहमान!"294

129- तौबा तथा क्षमा याचना

24- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है :

«وَاللَّهِ إِنِّي لأَسْتَغفِرُ اللَّهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ فِي اليَوْمِ أَكْثَرَ مِنْ سَبْعِينَ مَرَّةٍ».

"अल्लाह की क़सम! मैं दिन में सत्तर बार से अधिक अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसके सामने तौबा करता हूँ।"295

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«يَا أَيُّهَا النَّاسُ تُوبُوا إِلَى اللَّهِ فَإِنِّي أَتُوبُ فِي اليَوْمِ إِلَيْهِ مِائَةَ مَرَّةٍ».

"ऐ लोगो! अल्लाह के सामने तौबा करो और उससे क्षमा माँगो, क्योंकि खुद मैं दिन में सौ बार तौबा करता हूँ।"296

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«مَنْ قَالَ: أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ العَظيمَ الَّذِي لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الحَيُّ القَيُّوُمُ وَأَتُوبُ إِلَيهِ، غَفَرَ اللَّهُ لَهُ وَإِنْ كَانَ فَرَّ مِنَ الزَّحْفِ».

"जिसने कहा : मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ, जिसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह जीवित है, सारी कायनात को संभालने वाला है और मैं उसी की ओर लौटता हूँ, उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, यद्यपि वह युद्ध के मैदान से भाग खड़ा ही क्यों ने हुआ हो।"297

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«أَقْرَبُ مَا يَكُونُ الرَّبُّ مِنَ العَبْدِ فِي جَوْفِ اللَّيْلِ الآخِرِ فَإِنِ اسْتَطَعْتَ أَنْ تَكُونَ مِمَّنْ يَذْكُرُ اللَّهَ فِي تِلْكَ السَّاعَةِ فَكُنْ».

"अल्लाह अपने बंदे से सबसे निकट रात के अंतिम भाग में होता है। अतः यदि उस समय अल्लाह का स्मरण करने वालों में शामिल हो सको, तो हो जाओ।"298

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«أَقْرَبُ مَا يَكُونُ العَبْدُ مِنْ رَبِّهِ وَهُوَ سَاجِدٌ فَأَكثِرُوا الدُّعَاءَ».

"बंदा अपने रब से सबसे अधिक निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। अतः, तुम उसमें अधिक दुआएँ किया करो।"299

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«إِنَّهُ لَيُغَانُ عَلَى قَلْبِي وَإِنِّي لأَسْتَغْفِرُ اللَّهَ فِي اليَوْمِ مِائَةَ مَرَّةٍ».

"मेरे दिल पर पर्दा सा आ जाता है और मैं दिन में सौ बार अल्लाह से क्षमा याचना करता हूँ।"300

130- सुबहान अल्लाह, अलहम्दु लिल्लाह, ला इलाह इल्लल्लाह तथा अल्लाहु अकबर कहने की फ़ज़ीलत

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिसने दिन में सौ बार कहा : मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ, उसके सब गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, यद्यपि वे समुद्र की झाग के बराबर ही क्यों न हों।"

«مَنْ قَالَ: سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ فِي يَوْمٍ مِائَةَ مَرَّةٍ حُطَّتْ خَطَايَاهُ وَلَوْ كَانَتْ مِثْلَ زَبَدِ البَحْر».

“जिसने दिन में सौ बार 'सुबहानल्लाहि व बिह़म्दिहि' (मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ) कहा, उसके सारे पाप क्षमा कर दिए जाएँगे, यद्यपि वे समुद्र के झाग के बराबर ही क्यों न हों।”301

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«مَنْ قَالَ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ، وَلَهُ الحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ عَشْرَ مِرَارٍ، كَانَ كَمَنْ أَعْتَقَ أَرْبَعَةَ أَنْفُسٍ مِنْ وَلَدِ إِسْمَاعِيلَ».

"जिसने दस बार कहा : अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम करने की शक्ति रखता है, वह उस व्यक्ति के समान है जिसने इस्माईल -अलैहिस्सलाम- की औलाद में से चार दासों को मुक्त किया।"302

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«كَلِمَتَانِ خَفِيفَتَانِ عَلَى اللِّسَانِ، ثَقِيلَتَانِ فِي المِيزَانِ، حَبِيبَتَانِ إِلَى الرَّحْمَنِ: سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ، سُبْحانَ اللَّهِ العَظِيمِ».

"दो शब्द ऐसे हैं, जो बोलते समय ज़बान पर हल्के हैं और तराज़ू में भारी हैं :( سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ، سُبْحانَ اللَّهِ الْعَظِيمِ) अर्थात : मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ, मैं महान अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।"303

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«لَأَنْ أَقُولَ: سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ، أَحَبُّ إِلَيَّ مِمَّا طَلَعَتْ عَلَيْهِ الشَّمسُ».

यह कहना; "मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और अल्लाह सबसे बड़ा है" मुझे उन सारी वस्तुओं से अधिक प्रिय है, जिनपर सूरज निकलता है।"304

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«أَيَعْجِزُ أَحَدُكُم أَنْ يَكْسِبَ كُلَّ يَوْمٍ أَلْفَ حَسَنَةٍ»

"क्या तुममें से कोई इस बात से विवश है कि प्रत्येक दिन एक हज़ार नेकियाँ प्राप्त करे? आपके पास बैठे लोगों में से एक व्यक्ति ने पूछा : आदमी एक हज़ार नेकियाँ कैसे प्राप्त कर सकता है? आपने फ़रमाया : सौ बार 'सुबहानल्लाह' कहने से उसके लिए एक हज़ार नेकियाँ लिखी जाएँगी अथवा उसके एक हज़ार गुनाह मिटा दिए जाएँगे।" आपके पास बैठे लोगों में से एक व्यक्ति ने पूछा : आदमी एक हज़ार नेकियाँ कैसे प्राप्त कर सकता है? आपने फ़रमाया :

«يُسَبِّحُ مِائَةَ تَسْبِيحَةٍ، فَيُكتَبُ لَهُ أَلْفُ حَسَنَةٍ أَوْ يُحَطُّ عَنْهُ أَلْفُ خَطِيئَةٍ».

“सौ बार 'सुबहानल्लाह' कहने से उसके लिए एक हज़ार नेकियाँ लिखी जाएँगी अथवा उसके एक हज़ार गुनाह मिटा दिए जाएँगे।”305

«مَنْ قَالَ: سُبْحَانَ اللَّهِ العَظِيمِ وَبِحَمْدِهِ غُرِسَتْ لَهُ نَخْلَةٌ فِي الجَنَّةِ».

"जिसने कहा : "मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ", उसके लिए जन्नत में एक खजूर का पेड़ लगा दिया जाता है।"306

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«يَا عَبْدَ اللَّهِ بْنَ قَيْسٍ أَلَا أَدُلُّكَ عَلَى كَنْزٍ مِنْ كُنُوزِ الجَنَّةِ؟»

"ऐ अब्दुल्लाह बिन क़ैस! क्या मैं तुमको जन्नत के ख़ज़ानों में से एक ख़ज़ाने के बारे में न बता दूँ?" उनका कहना है कि मैंने कहा : अवश्य बताए, ऐ अल्लाह के रसूल! आपने कहा : "अल्लाह की तौफ़ीक़ के बिना पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य करने की क्षमता।" मैंने कहा : अवश्य, ऐ अल्लाह के रसूल। आपने फ़रमाया :

«قُلْ: لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ».

कहो :«لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ» अर्थात अल्लाह की तौफ़ीक़ के बिना ना पाप से बचने की शक्ति है, ना पुण्य की क्षमता।"307.

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«أَحَبُّ الكَلَامِ إِلَى اللَّهِ أَرْبَعٌ: سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ، لَا يَضُرُّكَ بِأَيِّهِنَّ بَدَأتَ».

"अल्लाह के निकट सबसे प्रिय वाक्य चार हैं : सुबहान अल्लाह (मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ), अल-हमदु लिल्लाह (सारी प्रशंसा अल्लाह की है), ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है) तथा अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है)। इनमें से किसी भी वाक्य को पहले पढ़ा जा सकता है।"308

एक देहाती, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और बोला : मुझे कोई ऐसी बात सिखा दीजिए, जो मैं कहता रहूँ। आपने फ़रमाया @: "तुम कहते रहा करो : अल्लाह के अतिरिक्त कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह के लिए अत्याधिक प्रशंसा है। पवित्र है वह अल्लाह, जो सारे जहानों का रब है। पाप से दूर रहने की शक्ति एवं नेकी का सामर्थ्य केवल उसी शक्तिशाली एवं हिकमत वाले अल्लाह से प्राप्त होती है।* उस देहाती ने कहा : यह सारे शब्द तो मेरे रब के लिए हैं, मेरे लिए क्या है? आपने फ़रमाया : तुम कहा करो : ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे, मुझपर दया कर, मुझे सीधा रास्ता दिखा और मुझे रोज़ी प्रदान कर।"

«قُلْ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيرًا، وَالحَمْدُ لِلَّهِ كَثِيرًا، سُبْحَانَ اللَّهِ رَبِّ العَالَمِينَ، لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ العَزِيزِ الحَكِيمِ»

"तुम कहो : अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह बहुत बड़ा है। उसकी अत्यधिक प्रशंसा है। मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ, जो सारे संसार का पालनहार है। सर्वशक्तिमान एवं हिकमत वाले अल्लाह को छोड़ न किसी के पास भलाई के मार्ग पर लगाने की शक्ति है, न बुराई के मार्ग से रोकने की क्षमता। उसने कहा : यह बातें तो मेरे रब के लिए हैं। मेरे लिए क्या है? आपने कहा :

«قُلْ: اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي، وَارْحَمْنِي، وَاهْدِنِي، وَارْزُقْنِي».

"तुम कह लिया करो : ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा प्रदान कर, मुझपर दया कर, मुझे सत्य का मार्ग दिखा और मुझे रोज़ी प्रदान कर।"309

263- (10) जब कोई व्यक्ति इस्लाम ग्रहण करता, तो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उसे नमाज़ सिखाते और फिर उसेआज्ञा देते कि इन शब्दों द्वारा दुआ करे:

«اللَّهُمَّ اغْفِرِ لِي، وَارْحَمْنِي، وَاهْدِنِي، وَعَافِنِي وَارْزُقْنِي».

"ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा प्रदान कर, मुझपर दया कर, मुझे सत्य का मार्ग दिखा, मुझे हर विपत्ति से सुरक्षित रख और मुझे रोज़ी प्रदान कर।"310

«إِنَّ أَفْضَلَ الدُّعَاءِ الحَمْدُ لِلَّهِ، وَأَفْضَلَ الذِّكْرِ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ».

"सबसे उत्तम दुआ अल-हम्दु लिल्लाह है और सबसे उत्तम ज़िक्र ला इलाहा इल्लल्लाह है।"311

«البَاقِيَاتُ الصَّالِحَاتُ: سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ، وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّه».

"शेष रहने वाले सत्कर्म हैं : मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, अल्लाह सबसे बड़ा है और अल्लाह के अतिरिक्त न किसी के पास सत्य के मार्ग में लगाने की शक्ति है, न बुराई के मार्ग से बचाने की क्षमता।"312

131- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तसबीह कैसे पढ़ते थे?

266- अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है, वह कहते हैं :

«رَأَيْتُ النَّبيَّ ﷺ يَعْقِدُ التَّسْبِيحَ» وفي زيادةٍ: «بِيَمِينِهِ».

"मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को अपनी उँगलियों से तसबीह गिनते देखा।" जबकि एक जगह यह वृद्धि है : "दाएँ हाथ की ।"313

132- विभिन्न प्रकार के पुण्य एवं व्यापक शिष्टाचार

149- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

«إِذَا كَانَ جُنْحُ اللَّيْلِ – أَوْ أَمْسَيْتُم – فَـكُفُّوا صِبْيَانَـكُم، فَإِنَّ الشَّيَاطِينَ تَنْتَشِرُ حِينَئِذٍ، فَإِذَا ذَهَبَ سَاعَةٌ مِنَ اللَّيلِ فَخَلُّوهُمْ، وَأَغْلِقُوا الأَبْوَابَ وَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ؛ فَإِنَّ الشَّيطَانَ لَا يَفْتَحُ بَابًا مُغلَقًا، وَأَوْكُوا قِرَبَكُمْ، وَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ، وَخَمِّرُوا آنِيَتَكُم، وَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ، وَلَوْ أَنْ تَعْرُضُوا عَلَيْهَا شَيْئًا، وَأَطْفِئُوا مَصَابِيحَكُمْ».

"जब रात आने लगे या फिर शाम होने लगे, तो अपने बच्चों को रोक लो। क्योंकि इस समय सारे शैतान फैल जाते हैं। फिर जब रात का कुछ भाग गुज़र जाए, तो उन्हें छोड़ दो और अपने घरों के द्वार बंद कर लो तथा अल्लाह का नाम ले लिया करो। क्योंकि शैतान बंद द्वार नहीं खोलता। इसी तरह अपने मशकीज़ों का मुँह रस्सी से बाँध दो और अल्लाह का नाम ले लिया करो। इसी प्रकार अपने बरतनों को ढाँप दो और अल्लाह का नाम ले लिया करो। कुछ नहीं तो चौड़ाई में कोई चीज़ ही रख दो। साथ ही अपने चराग भी बुझा दिया करो।" [314'314

अल्लाह की दया और शांति की बरखा बरसे हमारे नबी मुह़म्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, आपके परिजनों और सभी साथियों पर।

 

 

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सूची

 

(क़ुरआन एवं हदीस की दुआएँ) 2

भूमिका 2

ज़िक्र का महत्व 3

1- नींद से जागने के अज़कार 10

2- कपड़ा पहनने की दुआ 14

3- नया कपड़ा पहनने की दुआ 14

4- नया कपड़ा पहनने वाले को दी जाने वाली दुआ 15

5- कपड़ा उतारने की दुआ 15

6- शौचालय जाने की दुआ 15

7- शौचालय से निकलने की दुआ 16

वज़ू से पहले की दुआ 16

वज़ू के बाद की दुआ 16

10- घर से निकलने की दुआ 17

11- घर में प्रवेश करने की दुआ 18

12- मस्जिद जाने की दुआ 18

13- मस्जिद में प्रवेश करने की दुआ 20

14- मस्जिद से निकलने की दुआ 21

15- अज़ान के अज़कार 22

16- नमाज़ आरंभ करने की दुआ 24

17- रुकू की दुआ 29

रुकू से उठाने की दुआ 30

19- सजदे की दुआ 31

20- दो सजदों के बीच बैठने की अवस्था में पढ़ी जाने वाली दुआ 33

21- सजदा-ए-तिलावत की दुआ 34

22- तशह्हुद 35

23- तशह्हुद के बाद अल्लाह के नबी-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-पर दरूद 36

24- अंतिम तशह्हुद के बाद सलाम से पहले की दुआ 37

25- सलाम फेरने के बाद के अज़कार 42

26- इस्तिख़ारा की नमाज़ की दुआ 47

27- सुबह तथा शाम के अज़कार 49

28- सोने के अज़कार 62

29- रात को करवट बदलते समय की दुआ 70

30- नींद में बेचैनी तथा घबराहट की दुआ 70

31- कोई व्यक्ति बुरा स्वप्न देखे तो क्या करे? 71

32- वित्र की दुआ-ए-क़ुनूत 71

33- वित्र से सलाम फेरने के बाद का ज़िक्र 73

34- शोक तथा चिंता के समय की दुआएँ 74

35- बेचैनी की दुआ 75

36- शत्रु तथा शासक से मिलने की दुआ 76

37- शासक के अत्याचार से डरे हुए व्यक्ति की दुआएँ 77

38- शत्रु के लिए बददुआ 79

39- जिसे लोगों का डर हो, वह यह दुआ पढ़े 79

40- जिसे अपने ईमान में संदेह होने लगे, उसके लिए दुआ 79

41- क़र्ज़ की अदायगी के लिए दुआ 80

42- नमाज़ में अथवा क़ुरआन पढ़ते समय आने वाले बुरे ख़यालों से बचने की दुआ 81

43- उस व्यक्ति की दुआ, जिसे कोई कार्य कठिन दिखाई पड़े 81

44- आदमी गुनाह कर बैठे, तो कौन-सी दुआ पढ़े और क्या करे? 81

45- शैतान और उसके बुरे ख़यालों को दूर करने की दुआ 82

46- जब कोई अप्रिय घटना घटित हो जाए या आदमी विवश दिखाई दे, उस समय की दुआ 82

47- जिसके घर नया बच्चा पैदा हुआ हो, उसके लिए मुबारकबाद तथा उसका उत्तर 83

48- बच्चों को अल्लाह की शरण में देने के शब्द 84

49- रोगी का हाल जानने जाते समय उसके लिए की जाने वाली दुआ 84

50- बीमार व्यक्ति का हाल जानने के लिए जाने की फ़ज़ीलत 85

51- जीवन से निराश रोगी की दुआ 86

52- मृत्यु के निकट व्यक्ति को कलिमा पढ़ने की प्रेरणा देना 87

53- विपत्ति के शिकार व्यक्ति की दुआ 87

54- मृतक की आँखें बंद करते समय की दुआ 87

15- जनाज़े की नमाज़ में मृतक के लिए दुआ 88

15- जनाज़े की नमाज़ में बच्चे के लिए की जाने वाली दुआएँ 90

57- मृतक के परिजन को सांत्वना देने के शब्द 92

58- मृतक को क़ब्र में दाखिल करते समय की दुआ 93

49- मृतक को दफ़न करने के बाद पढ़ी जाने वाली दुआ 93

60- क़ब्रों की ज़ियारत की दुआ 93

61- आँधी के समय की दुआ 94

62- बादल गरजते समय की दुआ 95

63- बारिश माँगने की कुछ दुआएँ 95

64- बारिश होते देखते समय की दुआ 96

65- बारिश होने के बाद की दुआ 96

66- बारिश रुकवाने की दुआ 96

67- नया चाँद देखने की दुुआ 97

68- रोज़ा इफ़तार करते समय की दुआ 97

69- खाने से पहले की दुआ 98

70- खाना खा लेने के बाद की दुआ 99

71- अतिथि की दुआ आतिथेय के लिए 99

72- दुआ के माध्यम से खाने या पीने की चीज़ माँगने का इशारा 100

73- किसी के घर में रोज़ा इफ़तार करने के समय की दुआ 100

74- रोज़ेदार की दुआ जब खाना उपस्थित हो और वह रोज़ा न तोड़े 100

75- रोज़ेदार को जब कोई गाली दे, तो वह क्या कहे? 101

76- पहला फल देखने के समय की दूआ 101

77- छींक की दुआ 101

78- यदि कोई काफ़िर छींकने के बाद अल्लाह की प्रशंसा करे, तो क्या कहा जाए? 102

79- नवव्याहता के लिए दुआ 102

80- नवव्याहता तथा जानवर खरीदने वाले के लिए दुआ 102

81- स्त्री से संभोग से पहले की दुआ 103

82- क्रोध के समय की दुआ 104

83- किसी विपत्ति में पड़े हुए व्यक्ति को देखकर पढ़ने की दुआ 104

84- सभा में पढ़ने की दुआ 104

85- सभा का प्रायश्चित 105

86- उसके लिए दुआ, जिसने कहा : "अल्लाह तुझे क्षमा करे" 105

87- कोई उपकार करने वाले के लिए दुआ 106

88- दज्जाल के फ़ितने से बचाव के उपाय 106

89- "मुझे तुमसे अल्लाह के लिए प्रेम है" कहने वाले के लिए दुआ 106

90- अपना धन प्रस्तुत करने वाले के लिए दुआ 107

91- क़र्ज़ अदा करते समय क़र्ज़ देने वाले के लिए दुआ 107

92- शिर्क से भय की दुआ 107

93-यह दुआ (अल्लाह तुझ में बरकत दे) देने वाले के लिए दुआ 108

94- अपशगुन को अप्रिय जानने की दुआ 108

95- सवारी पर सवार होने की दुआ 109

96- यात्रा की दुआ 110

97- गाँव या नगर में दाख़िल होने की दुआ 111

98- बाज़ार में प्रवेश करने की दुआ 112

99- सवारी के फिसलने के समय की दुआ 112

100- यात्री की मुक़ीम (ठहरे हुए) के लिए दुआ 113

101- ठहरे हुए व्यक्ति की यात्री के लिए दुआ 113

102- यात्रा के करने के दौरान अल्लाह की बड़ाई और पवित्रता बयान करना 113

103- यात्री के लिए सुबह के समय पढ़ने की दुआ 114

104- यात्रा के दौरान या बिना यात्रा के भी किसी जगह ठहरने की दुआ 114

105- यात्रा से वापसी की दुआ 115

106- कोई प्रिय अथवा अप्रिय घटना घटित होते समय की दुआ 115

107- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजने की फ़ज़ीलत 116

108- सलाम को आम करना 118

109- यदि काफ़िर सलाम करे, तो उसका उत्तर कैसे दिया जाए? 119

110- मुर्गे के बाँग देने और गधे के रेंकने के समय की दुआ 119

111- रात को कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनते समय की दुआ 120

112- उस व्यक्ति के हक़ में दुआ, जिसे तुमने गाली दी हो 120

113- मुसलमान किसी मुसलमान की प्रशंसा में क्या कहे? 121

114- जब कोई मुसलमान अपनी प्रशंसा सुने तो क्या कहे? 121

115- हज या उमरा का एहराम बाँधा हुआ व्यक्ति तलबिया कैसे कहे? 122

116- हजर-ए-असवद के पास आते समय तकबीर कहना 122

117- रुक्न-ए-यमानी और हजर-ए-असवद के बीच की दुआ 123

118- सफ़ा और मरवा पर ठहरने समय की दुआ 123

119- अरफ़ा के दिन की दुआ 124

120- मशअर-ए-हराम के निकट का ज़िक्र 126

121- कंकड़ी मारते समय हर कंकड़ के साथ अल्लाहु अकबर कहना 126

122- आश्चर्यचकित करने वाली तथा प्रसन्नतापूर्ण बात सामने आने के समय की दुआ 126

123- कोई प्रसन्नतापूर्ण बात सामने आने पर आदमी क्या करे? 126

124- शरीर में कोई दर्द होने पर आदमी क्या करे और क्या कहे? 127

125- जिसे भय हो कि उसकी नज़र किसी वस्तु को लग सकती है ,तो वह आदमी क्या कहे? 127

126- घबराहट के समय का ज़िक्र 128

127- ऊँट अथवा अन्य जानवरों को ज़बह करते समय क्या कहा जाए? 128

128- सरकश शैतानों के फ़रेब से बचने की दुआ 128

129- तौबा तथा क्षमा याचना 129

130- सुबहान अल्लाह, अलहम्दु लिल्लाह, ला इलाह इल्लल्लाह तथा अल्लाहु अकबर कहने की फ़ज़ीलत 132

131- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तसबीह कैसे पढ़ते थे? 138

132- विभिन्न प्रकार के पुण्य एवं व्यापक शिष्टाचार 139

 

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सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 152

सूरा अल-अह़ज़ाब, आयत संख्या : 41

सूरा अल-अह़ज़ाब, आयत संख्या : 35

सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 205

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/208, हदीस संख्या : 6407 तथा सहीह मुस्लिम 1/539, हदीस संख्या : 779। सहीह मुस्लिम के शब्द हैं : "उस घर का उदाहरण जिसमें अल्लाह को याद किया जाए और उस घर का उदाहरण जिसमें अल्लाह को याद न किया जाए, ऐसे है, जैसे जीवित और मृत।"

सुनन तिरमिज़ी 5/459, हदीस संख्या : 3377 तथा सुनन इब्न माजा 2/124, हदीस संख्या : 3790। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/316 तथा सुनन तिरमिज़ी 3/139।

सहीह बुख़ारी 8/171, हदीस संख्या : 7405 तथा सहीह मुस्लिम 4/2061, हदीस संख्या : 2675। शब्द सहीह बुख़ारी के हैं।

सुनन तिरमिज़ी 5/458, हदीस संख्या : 3375 तथा सुनन इब्न-माजा 2/1246,3793। अलबानी ने इसे सहीह तिरमिज़ी 3/139 और सहीह इब्न-ए-माजा 2/317 में सहीह कहा है।

सुनन तिरमिज़ी 5/175, हदीस संख्या : 2910, अलबानी ने इसे सहीह तिरमिज़ी 3/9 और सहीह अल-जामे अस-सग़ीर 5/340 में सहीह कहा है।

सहीह मुस्लिम, 1/553, हदीस संख्या : 803।

सुनन अबू दाऊद 4/264, हदीस संख्या : 4856, आदि, और देखिए : सहीह अल-जामे 5/342 ।

सुनन तिरमिज़ी 5/461। हदीस संख्या : 3380। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/140 ।

सुनन अबू दाऊद 4/264, हदीस संख्या : 4855 तथा मुसनद-ए-अहमद 2/389, हदीस संख्या : 10680। देखिए : सहीह अल-जामे 5/176 ।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/113, हदीस संख्या : 6314 और सहीह मुस्लिम 4/2083, हदीस संख्या : 2711 ।

जिसने यह दुआ पढ़ी, उसे क्षमा कर दिया जाएगा। उसके बाद यदि अल्लाह से कुछ माँगा, तो उसकी माँग पूरी की जाएगी। फिर यदि उठकर वज़ू किया और नमाज़ पढ़ी, तो उसकी नमाज़ क़बूल कर ली जाएगी। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/39, हदीस संख्या : 1154 आदि। शब्द इब्न-ए-माजा के हैं। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/335।

सुनन तिरमिज़ी 5/473। हदीस संख्या : 3401। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/144।

आयतें सूरा आल-ए-इमरान (190-200) की हैं। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 8/337, हदीस संख्या : 4569 तथा सहीह मुस्लिम 1/530, हदीस संख्या : 256।

इसे अबू दाऊद हदीस संख्या : 4023, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3458 और इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3285 ने रिवायत किया है, और अलबानी ने इरवा अल-ग़लील 7/47 में हसन कहा है।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 4020, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 1767, बग़वी 12/40 तथा अलबानी की किताब मुख़्तसर शमाइल तिरमिज़ी पृष्ठ : 47।

सुनन अबू दाऊद 4/41, हदीस संख्या : 4020 तथा देखिए : सहीह अबू दाऊद 2/760।

इब्न-ए-माजा 2/1178, हदीस संख्या : 3558 तथा बग़वी 41/12। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/275।

सुनन तिरमिज़ी 2/505, हदीस संख्या : 606। देखिए : इरवा अल-ग़लील हदीस संख्या : 50 तथा सहीह अल-जामे 3/203।

सहीह बुख़ारी 1/45 हदीस संख्या : 142 तथा सहीह मुस्लिम 1/283 हदीस संख्या : 375। शुरू में "अल्लाह के नाम से" की वृद्धि सईद बिन मनसूर से की गई है। देखिए : फ़त्ह अल-बारी 1/244।

इसे नसई के अतिरिक्त सुनन के तीनों संकलनकर्ताओं यानी अबू दाऊद ने हदीस संख्या : 30, तिरमिज़ी ने हदीस संख्या : 7 और इब्न-ए-माजा ने हदीस संख्या : 300 के तहत रिवायत किया है। इसी तरह नसई ने "अमल अल-यौम वल-लैलह" में हदीस संख्या : 79 के तहत रिवायत किया है और अलबानी ने सहीह सुनन अबू दाऊद 1/19 में सहीह कहा है।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 101, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 397 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 9418। देखिए : इरवा अल-ग़लील 1/122।

सहीह मुस्लिम 1/209, हदीस संख्या : 234।

सुनन तिरमिज़ी 1/78, हदीस संख्या : 55। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/18।

नसई की "अमल अल यौम व अल-लैलह" पृष्ठ : 173। देखिए : इरवा अल-ग़लील 1/135 तथा 3/94।

सुनन अबू दाऊद 4/325, हदीस संख्या : 5095 तथा तिरमिज़ी 5/490 हदीस संख्या : 3426। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/151।

अबू दाऊद हदीस संख्या : 5094, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3427, नसई हदीस संख्या : 5501 तथा इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3884। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/152 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 2/336।

सुनन अबू दाऊद 4/325, हदीस संख्या : 5096। शैख़ बिन बाज़ ने अपनी पुस्तक "तोहफ़ा अल-अख़यार" पृष्ठ : 28 में इसकी सनद को हसन कहा है। जबकि सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या : 2018) में है : "जब इनसान घर में प्रेवेश करते समय तथा खाना खाते समय अल्लाह का स्मरण करता है, तो शैतान कहता है कि यहाँ तुम्हारे लिए (शैतान के लिए) रात बिताना और रात के भोजन में सम्मिलित होना असंभव होगया।"

इन सारे शब्दों के लिए देखिए : सहीह बुख़ारी 11/116, हदीस संख्या : 6316 तथा सहीह मुस्लिम 1/526, 529 और 530, हदीस संख्या : 763।

सुनन तिरमिज़ी 5/483, हदीस संख्या : 3419।

इसे इमाम बुखारी ने अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 695, पृष्ठ : 258 में रिवायत किया है। एवं अलबानी ने सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 538 में इसकी सनद को सहीह कहा है।

इसका उल्लेख इब्न-ए-हजर ने फ़त्ह अल-बारी में किया है, और किताब अद-दुआ में उसकी निस्बत इब्न अबू आसिम की ओर किया है। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 11/118। उन्होंने कहा है : "विभिन्न रिवायतों को मिलाने के बाद पच्चीस चीज़ें एकत्र हो जाती हैं।"

क्योंकि अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : "सुन्नत यह है कि मस्जिद में प्रवेश करते समय पहले अपना दायाँ पाँव अंदर रखो और बाहर निकलते समय पहले बायाँ निकालो।" इसे हाकिम ने मुसतदरक 1/218 में नक़ल किया है और इमाम मुस्लिम की शर्त पर सहीह कहा है। ज़हबी ने भी उनकी पुष्टि की है। जबकि बैहक़ी ने भी (2/442) में इसे नक़ल किया है और अलबानी ने सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा (5/624, हदीस संख्या : 2478) में हसन कहा है।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 466, देखिए : सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 4591।

इसे इब्न अस-सुन्नी ने हदीस संख्या : 88 के तहत सहीह कहा है, और अलबानी ने अष-षमर अल-मुसतताब पृष्ठ : 607 में हसन कहा है।

सुनन अबू दाऊद 1/126, हदीस संख्या : 465, देखिए : सहीह अल-जामे 1/528।

सहीह मुस्लिम 1/494, हदीस संख्या : 713। जबकि सुनन इब्न-ए-माजा में फ़ातिमा -रज़ियल्लाहु अनहा- की हदीस में है : "ऐ अल्लाह मेरे गुनाह क्षमा कर दे और मेरे लिए अपनी दया के द्वार खोल दे।" और इस हदीस के कई शवाहिद (साक्षी हदीसों) के कारण अलबानी ने इसे सही कहा है। देखिए : सहीह इब्न-माजा 1/128-129।

मुसतदरक हाकिम 1/218, बैहक़ी 2/442। अलबानी ने सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा 5/624, हदीस संख्या : 2478 में इसे हसन कहा है। इससे पहले इसके संदर्भों का उल्लेख हो चुका है।

मस्जिद में प्रवेश के समय पढ़ी जाने वाली दुआ से संबंधित उल्लिखित हदीस की विभिन्न रिवायतों के संदर्भ हदीस क्रम संख्या 20 में देख लीजिए। "ऐ अल्लाह! मुझे धुतकारे हुए शैतान से बचा।" की वृद्धि इब्न-ए-माजा से ली गई है। देखिए : सहीह सुनन इब्न-ए-माजा 1/129।

सहीह अल-बुख़ारी 1/152, हदीस संख्या : 611 एवं 613 तथा सहीह मुस्लिम 1/288, हदीस संख्या : 383।

सहीह मुस्लिम 1/290, हदीस संख्या : 386।

इब्न-ए-ख़ुज़ैमा 1/220।

सहीह मुस्लिम 1/288, हदीस संख्या : 384।

सहीह बुख़ारी 1/152, हदीस संख्या : 614। दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग बैहक़ी 10/410 से लिया गया है। इसकी सनद को शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़यार पृष्ठ : 38 में हसन कहा है।

सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3594, 3595, सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 525 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 12200। देखिए : इरवा अल-ग़लील 1/262।

सहीह बुख़ारी 1/181, हदीस संख्या : 744 तथा सहीह मुस्लिम 1/419, हदीस संख्या : 598।

सही मुस्लिम हदीस संख्या : 399, अबू दाऊद हदीस संख्या : 775, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 243, इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 806 तथा नसई : 899, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/177 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 1/135।

सहीह मुस्लिम 1/534, हदीस संख्या : 771।

सहीह मुस्लिम 1/534, हदीस संख्या : 770।

सुनन अबू दाऊद 1/203, हदीस संख्या : 764, इब्न-ए-माजा 1/265, हदीस संख्या : 807 तथा मुसनद-ए-अहमद 4/85, हदीस संख्या : 16739, शोऐब अरनाऊत ने इसे इसकी विभिन्न सनदों को मिलाकर हसन कहा है, जबकि अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने इब्न-ए-तैमिया की किताब "अल-कलिम अत-तय्यिब" की हदीसों के संदर्भों का उल्लेख करते समय इसे इस अर्थ की अन्य रिवायतों के आधार पर सहीह कहा है। इसी तरह अलबानी ने इसे "सहीह अल-कलिम अत-तय्यिब" में हदीस संख्या : 62 के तहत दर्ज किया है। इसी तरह इमाम मुस्लिम ने अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से इसी आशय की एक हदीस नक़ल की है, जिसमें एक घटना भी है। देखिए : सहीह मुस्लिम 1/420, हदीस संख्या : 601।

नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब रात में तहज्जुद के लिए उठते, तो यह दुआ पढ़ते थे।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/3, 11/116, 13/371, 423 तथा 465, हदीस संख्या : 1120, 6317, 7385, 7442 तथा 7499। इमाम मुस्लिम ने भी संक्षिप्त रूप से इसी जैसी हदीस रिवायत की है। देखिए : 1/532, हदीस संख्या : 769।

अबू दाऊद हदीस संख्या : 870, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 262, नसई हदीस संख्या : 1007, इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 897 तथा अहमद हदीस संख्या : 3514, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/63।

सहीह बुख़ारी 1/99 हदीस संख्या : 794 तथा सहीह मुस्लिम 1/350 हदीस संख्या : 484।

सहीह मुस्लिम 1/353 हदीस संख्या : 487 तथा अबू दाऊद 1/230 हदीस संख्या : 872।

सहीह मुस्लिम 1/534 हदीस संख्या : 771, अबू दाऊद हदीस संख्या : 760 तथा 761, तिरमिज़ी हदीस संख्या 3421 और नसई हदीस संख्या : 1049। दोनों कोष्ठकों के बीच के शब्द इब्न-ए-खुज़ैमा हदीस संख्या : 607 तथा इब्न-ए-हिब्बान हदीस संख्या : 1901 से लिए गए हैं।

सुनन अबू दाऊद 1/230 हदीस संख्या : 873, सुनन नसई हदीस संख्या : 1131 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 23980। इसकी सनद हसन है।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/282, हदीस संख्या : 796।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/282, हदीस संख्या : 796।

सहीह मुस्लिम 1/346, हदीस संख्या : 477।

अबू दाऊद हदीस संख्या : 870, तिरमिज़ी : 262, नसई हदीस संख्या : 1007, इब्न-ए-माज़ा हदीस संख्या : 897 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 3514, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/83।

सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 794 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 484। यह हदीस पीछे हदीस क्रमांक 34 के तहत गुज़र चुकी है।

सहीह मुस्लिम 1/533 हदीस संख्या : 487 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 872। यह हदीस इससे पहले हदीस क्रमांक 35 के तहत गुज़र चुकी है।

सहीह मुस्लिम 1/534 हदीस संख्या : 771 आदि।

अबूद दाऊद 1/230 हदीस संख्या : 873, नसई हदीस संख्या : 1131 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 23980। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/166 में सहीह कहा है। इसके संदर्भों का उल्लेख इससे पहले हदीस संख्या 37 के तहत हो चुका है।

सहीह मुस्लिम 1/230 हदीस संख्या : 483।

सहीह मुस्लिम 1/352 हदीस संख्या : 486।

सुनन अबू दाऊद 1/231 हदीस संख्या : 874 तथा सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 897। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/148।

सुनन अबू दाऊद 1/231 हदीस संख्या : 850, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 284 तथा 285 और सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 898। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/90 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 1/148।

सुनन तिरमिज़ी 2/474, हदीस संख्या : 3425, मुसनद-ए-अहमद 6/30, हदीस संख्या : 24022 और मुसतदरक हाकिम 1/220। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनके कथन से सहमति व्यक्त की है। वृद्धि वाला भाग मुसतदरक हाकिम ही से लिया गया है। जबकि आयत सूरा अल-मोमिनून, आयत संख्या : 14 से ली गई है।

सुनन तिरमिज़ी 2/473 तथा हाकिम 1/219। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनके कथन की पुष्टि की है।

सहीह बुख़ारी 2/311, हदीस संख्या : 831 तथा मुस्लिम 1/301, हदीस संख्या : 402।

बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/408, हदीस संख्या : 3370 तथा मुस्लिम : 406।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/407, हदीस संख्या : 3369, तथा मुस्लिम 1/306, हदीस संख्या : 407। शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

सहीह बुख़ारी 2/102, हदीस संख्या : 1377 तथा मुस्लिम 1/412, हदीस संख्या : 588, शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

सहीह बुख़ारी 1/202, हदीस संख्या : 832, तथा मुस्लिम 1/412, हदीस संख्या : 587।

सहीह बुख़ारी 8/168, हदीस संख्या : 834 तथा सहीह मुस्लिम 4/2078, हदीस संख्या : 2705।

सहीह मुस्लिम 1/534, हदीस संख्या : 771।

सुनन अबू दाऊद 2/86, हदीस संख्या : 1522 और सुनन नसई 3/53, हदीस संख्या : 2302। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/284 में सहीह कहा है।

बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/35, हदीस संख्या : 2822 तथा 6390।

सहीह अबू दाऊद हदीस संख्या 792 तथा इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 910, देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/328।

सुनन नसई 3/54,55, हदीस संख्या : 1304 तथा मुसनद-ए-अहमद 4/364, हदीस संख्या : 21666, अलबानी ने इसे सहीह सुनन नसई 1/281 में सहीह कहा है।

सुनन नसई 3/52, हदीस संख्या : 1300। शब्द उसी के हैं। मुसनद-ए-अहमद 4/338, हदीस संख्या : 18974। अलबानी ने इसे सहीह नसई 1/280 में सहीह कहा है।

अबू दाऊद हदीस संख्या : 1495, तिरमिज़ी : 3544, इब्न-ए-माजा : 3858 और नसई हदीस संख्या : 1299। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/329।

सुनन अबू दाऊद 2/62 हदीस संख्या : 1493, सुनन तिरमिज़ी 5/515 हदीस संख्या : 3475, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 2/1267, सुनन नसई हदीस संख्या : 1300 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 18974। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/329 तथा सहीह तिरमिज़ी 3/163।

सहीह मुस्लिम 1/414, हदीस संख्या : 591।

सहीह बुख़ारी 1/255 हदीस संख्या : 844 तथा सहीह मुस्लिम 1/414 हदीस संख्या : 593। दोनों कोष्ठकों के बीच की वृद्ध सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 6473 से ली गई है।

सहीह मुस्लिम 1/415 हदीस संख्या : 594।

सहीह मुस्लिम 1/418 हदीस संख्या : 597। उसमें आगे है : "जिसने हर नमाज़ के बाद इस ज़िक्र की पाबंदी की, उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, चाहे वह समुद्र की झाग के समान ही क्यों न हों।"

सुनन अबू दाऊद 2/86 हदीस संख्या : 1523, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 2903 तथा सुनन नसई 3/68 हदीस संख्या : 1335। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 2/8। इन तीन सूरतों को "अल-मुअव्वज़ात" कहा जाता है। यानी ऐसी सूरतें जिनकी ज़रिए अल्लाह की शरण माँगी जाए। देखिए : फ़त्ह अल-बारी 9/62।

जिसने हर नमाज़ के बाद इसे पढ़ा, उसे जन्नत में प्रवेश से मृत्यु के अतिरिक्त कोई चीज़ बचा नहीं सकती। देखिए : नसई की किताब अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 100 तथा इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 121। अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 5/339 तथा सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा 2/697 हदीस संख्या : 972 में सहीह कहा है। इसमें दर्ज आयत सूरा अल-बक़रा की आयत संख्या : 255 से ली गई है।

सुनन तिरमिज़ी 5/515 हदीस संख्या : 3474 तथा मुसनद-ए-अहमद 4/227 हदीस संख्या : 17990। इसके विस्तृत संदर्भों के लिए देखिए : ज़ाद अल-मआद 1/300।

सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 925 तथा नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह हदीस संख्या : 102। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/152 तथा मजमा अज़-ज़वाइद 10/11। आगे यह हदीस हदीस संख्या : 95 के तहत भी आएगी।

सहीह बुख़ारी 7/162, हदीस संख्या : 1162।

सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 159

अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से रिवायत करते हुए कहते हैं : मुझे ऐसे लोगों के साथ बैठना, जो फ़ज्र की नमाज़ से सूर्य निकलते समय तक अल्लाह का ज़िक्र करते हैं, इस बात से अधिक प्रिय है कि इसमाईल -अलैहिस्सलाम- की नस्ल के तीन दासों को मुक्त कर दूँ। इसी तरह ऐसे लोगों के साथ बैठना, जो अस्र की नमाज़ से सूरज डूबने तक अल्लाह का ज़िक्र करते हैं, इस बात से अधिक प्रिय है कि चार दास मुक्त करूँ। सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 3667। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 2/698 में हसन कहा है।

सूरा अल-बक़रा, आयत : 255। जिसने सुबह इसे कहा उसे शाम तक शैतान से बचाया जाएगा, और जिसने शाम को इसे कहा उसे सुबह तक शैतान से बचाया जाएगा। मुसतदरक हाकिम 1/562। अलबानी ने इसे सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/273 में सहीह कहा है और नसई तथा तबरानी की ओर मनसूब किया है और कहा है कि तबरानी की इसनाद जय्यिद है।

जिसने सुबह या शाम को इन सूरतों को पढ़ लिया, उसे यह सूरतें हर चीज़ से बचाने के लिए काफ़ी होंगी। सुनन अबू दाऊद 4/322 हदीस संख्या : 5082 और सुनन तिरमिज़ी 5/567 हदीस संख्या : 3575, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/182।

शाम के समय कहे : "हमने और अल्लाह के राज्य ने शाम की।"

शाम के समय कहे : "ऐ मेरे पालनहार! मैं तुझसे इस रात्रि की तथा इसके बाद की भलाइयाँ माँगता हूँ। इसी तरह इस रात्रि की तथा इसके बाद की बुराइयों से तेरी शरण में आता हूँ।"

सहीह मुस्लिम 4/2088, हदीस संख्या : 2723।

शाम के समय कहे :ऐ अल्लाह हमने तेरे (अनुग्रह के) साथ शाम की, तेरे ही (अनुग्रह के) साथ सुबह की, तेरे ही नाम से जीते हैं और तेरे ही नाम से मरते हैं, और तेरी ओर ही लौटकर जाना है।

सुनन तिरमिज़ी 5/466 हदीस संख्या : 3391, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/142।

أَبُوءُ का अर्थात है मैं इक़रार एवं एतराफ़ करता हूँ।

जिसने विश्वास के साथ शाम को यह दुआ पढ़ी और उसी रात मर गया, वह जन्नत में दाख़िल होगा। यही हाल सुबह का भी है। सहीह बुख़ारी 7/150, हदीस संख्या : 6306।

शाम को कहे : ऐ अल्लाह! मैंने शाम की।

जिसने सुबह या शाम को चार बार यह दुआ पढ़ी, उसे अल्लाह आग से मुक्ति प्रदान करेगा। अबू दाऊद 4/317, हदीस संख्या : 5071, तथा इमाम बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 1201, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह हदीस संख्या : 9 तथा इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 70। शैख़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़्यार पृष्ठ : 23 में नसई तथा अबू दाऊद की सनद को हसन कहा है।

शाम के समय कहे : ऐ अल्लाह! शाम के समय मेरे ...

जिसने सुबह यह दुआ पढ़ी, उसने उस दिन का शुक्र अदा कर लिया। इसी तरह जिसने शाम को यह दुआ पढ़ी, उसने उस रात का शुक्र अदा कर लिया। अबू दाऊद 4/318, हदीस संख्या : 5075, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह हदीस संख्या : 7, इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 41 तथा इब्न-ए-हिब्बान (मवारिद) हदीस संख्या : 2361। शैख़ बिन बाज़ ने तौहफ़ा अल-अख़्यार पृष्ठ : 24 में इसकी सनद को हसन कहा है।

अबू दाऊद 4/324 हदीस संख्या : 5092, अहमद 5/42 हदीस संख्या 20430, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह हदीस संख्या : 22, इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 69 तथा इमाम बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 701। शैख़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़्यार पृष्ठ : 26 में इसकी सनद को हसन कहा है।

जिसने सुबह एवं शाम यह दुआ सात बार पढ़ी, उसे अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत के दुखों से बचाएगा। इब्न-अस-सुन्नी ने इसे हदीस संख्या : 71 के तहत अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के कथन के रूप में नक़ल किया है। जबकि अबू दाऊद ने 4/321, हदीस संख्या : 5081 में इसे सहाबी के कथन के रूप में नक़ल किया है। शोऐब अरनाऊत तथा अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने इसकी सनद को सहीह कहा है। देखिए : ज़ाद अल-मआद 2/376।

अबू दाऊद, हदीस संख्या : 5074 और इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 3871। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/332।

सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3392, और सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 5067, देखिए :सहीह तिरमिज़ी 3/142।

जिसने सुबह को तीन बार और शाम को तीन बार यह दुआ पढ़ी, उसे कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकती। सुनन अबू दाऊद 4/323 हदीस संख्या : 5088, सुनन तिरमिज़ी 5/465 हदीस संख्या : 3388, इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3869 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 446। देखिए सहीह इब्न-ए-माजा 2/332। शैख़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़यार पृष्ठ : 39 में इसकी सनद को हसन कहा है।

जिसने सुबह को तीन बार और शाम को तीन बार यह दुआ पढ़ी, उसे क़यामत के दिन संतुष्ट करना अल्लाह पर अनिवार्य हो जाता है। मुसनद अहमद 4/337, हदीस संख्या : 18967, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 4, और इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 68, सुनन अबू दाऊद 4/318, हदीस संख्या : 1531 और सुनन तिरमिज़ी 5/465, हदीस संख्या : 3389। शैख़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़्यार पृष्ठ : 39 में इसकी सनद को हसन कहा है।

मुसतदरक हाकिम 1/545, और ज़हबी ने इसकी पुष्टि की है। देखिए : सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/273।

तथा शाम के समय कहे : हमने तथा सारे संसार के पालनहार अल्लाह के राज्य ने शाम की।

तथा शाम के समय कहे : ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस रात की भलाई; इसकी विजय, सहायता, प्रकाश, बरकत और मार्गदर्शन माँगता हूँ। इसी तरह इस रात की कोख में जो कुछ है उसकी बुराई तथा इसके बाद की बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।

सुनन अबू दाऊद 4/322, हदीस संख्या : 5084। इसकी सनदों को शोऐब तथा अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने ज़ाद अल-मआद की हदीसों को संदर्भित करते समय हसन कहा है। देखिए ज़ाद अल-मआद 2/373।

तथा शाम के समय कहे : हमने इस्लाम की फितरत (अर्थाथ सत्य धर्म ) पर शाम की।

मुसनद-ए-अहमद 3/406, 407, हदीस संख्या : 15360, 15363 तथा इब्न अस-सुन्नी की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 34। देखिए : सहीह अल-जामे 4/209।

जिसने सुबह एवं शाम को सौ बार इसे कहा, क़यामत के दिन उससे उत्तम अमल के साथ केवल वही व्यक्ति उपस्थित होगा, जिसने उसी की तरह सौ बार या उससे अधिक बार इसे कहा होगा। सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या : 2692।

नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 24, देखिए : सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/272 तथा शैख़ बिन बाज़ की किताब तोहफ़ा अल-अख़यार पृष्ठ : 44,तथा इसकी फ़ज़ीलत के लिए देखिए पृष्ठ : 146, हदीस संख्या : 255।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 5077 तथा इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 3798 तथा मुसनद-ए-अहमद, हदीस संख्या : 8719। देखिए : सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/270, सहीह अबू दाऊद 3/957, सहीह इब्न-ए-माजा 2/331 तथा ज़ाद अल-मआद 2/377।

जिसने दिन में सौ बार इसे कहा, उसे दस दासों को मुक्त करने के बराबर पुण्य मिलेगा, उसके लिए सौ नेकियाँ लिखी जाएँगी, उसके सौ गुनाह मिटा दिए जाएँगे, उसे उस दिन शाम तक शैतान से सुरक्षा प्राप्त होगी और उससे उत्तम अमल के साथ केवल वही व्यक्ति उपस्थित होगा, जिसने इससे अधिक बार इसे कहा हो। सहीह बुख़ारी 4/95, हदीस संख्या : 3293 तथा सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या : 2691।

सहीह मुस्लिम 4/2090, हदीस संख्या : 2726।

इब्न अस-सुन्नी की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 54 और इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 925, शोऐब तथा अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने ज़ाद अल-मआद की हदीसों को संदर्भित करते समय इसकी सनद को हसन कहा है। देखिए ज़ाद अल-मआद 2/375। यह हदीस इससे पीछे हदीस संख्या : 73 के तहत गुज़र चुकी है।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/101, हदीस संख्या : 6307 तथा सहीह मुस्लिम 4/2702, हदीस संख्या : 2775 एवं 2702।

जिसने शाम को तीन बार इसे कहा, उसे उस रात किसी ज़हरीले कीड़े के डंक मारने से कोई हानि नहीं होगी। मुसनद-ए-अहमद 2/290 हदीस संख्या : 7898, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 590 तथा इब्न अस-सुन्नी, हदीस संख्या : 68। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/187, सहीह इब्न-ए-माजा 2/266 तथा इब्न-बाज़ की किताब तोहफ़ा अल-अख़यार पृष्ठ : 45।

"जिसने सुबह को दस बार तथा शाम को दस बार मुझपर दरूद भेजा , उसे क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश प्राप्त होगी।" तबरानी ने इसे दो सनदों से नक़ल किया है, जिनमें से एक जय्यिद है। देखिए : मजमा अज़-ज़वाइद 10/120 तथा सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/273।

बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 9/62, हदीस संख्या : 5017 तथा मुस्लिम, हदीस संख्या : 2192।

सूरा अल-बक़रा, आयत संखअया : 255, जिसने बिस्तर में जाते समय इसे पढ़ लिया, उसकी रक्षा के लिए अल्लाह की ओर से एक फ़रिश्ता नियुक्त रहता है और सुबह तक शैतान उसके निकट नहीं जाता। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 4/487, हदीस संख्या : 2311।

जिसने रात में इन दोनों आयतों को पढ़ लिया, दोनों आयतें उसके लिए काफ़ी होंगी। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 9/94, हदीस संख्या : 4008 तथा सहीह मुस्लिम 1/554, हदीस संख्या : 807। दोनों आयतें सूरा अल-बक़रा की हैं। आयत संख्या : 285-286।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/126, हदीस संख्या : 6320 और सहीह मुस्लिम 4/2084, हदीस संख्या : 2714।

"जब तुममें से कोई अपने बिस्तर से उठने के बाद दोबारा बिस्तर में जाए, तो उसे अपनी लुंगी को किनारे से तीन बार झाड़े और अल्लाह का नाम ले। क्योंकि वह नहीं जानता कि उसके बिस्तर में कौन आया था। फिर जब लेटे तो कहे :..." इस हदीस में आए हुए शब्द "صَنِفة إزاره" का अर्थ है : लुंगी का किनारा। देखिए : अन-निहायह फ़ी ग़रीब अल-हदीस वल-असर (صنف)।

सहीह मुस्लिम 4/2083, हदीस संख्या : 2712 तथा मुसनद-ए-अहमद 2/79, हदीस संख्या : 5502 अपने शब्द के साथ।

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सोने का इरादा करते, तो अपने दाएँ गाल के नीचे अपना हाथ रख लेते और उसके बाद कहते :...

सुनन अबू दाऊद 4/311 हदीस संख्या : 5045 अपने शब्द के साथ, तथा सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3398। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/143 तथा सहीह अबू दाऊद 3/240।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/113, हदीस संख्या : 6324 और सहीह मुस्लिम 4/2083, हदीस संख्या : 2711।

जिसने बिस्तर पर जाते समय यह अज़कार पढ़े, यह उसके लिए एक सेवक से उत्तम होंगे। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 7/71, हदीस संख्या : 3705 तथा सहीह मुस्लिम 4/2091, हदीस संख्या : 2726।

सहीह मुस्लिम 4/2084, हदीस संख्या : 2713।

सहीह मुस्लिम 4/2085, हदीस संख्या : 2715।

सुनन अबू दाऊद 4/317 हदीस संख्या : 5067 तथा सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3629। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/142।

सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3404 तथा नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 707। देखिए : सहीह अल-जामे 4/255।

"जब तुम सोने के स्थान में जाने लगो, तो उसी तरह वज़ू करो, जैसे नमाज़ के लिए वज़ू करते हो, फिर बाएँ करवट पर लेट जाओ और उसके बाद कहो : ...।"

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यह दुआ पढ़ने वाले के बारे में कहा है : "अब अगर तुम मर गए, तो इस्लाम पर मरोगे।" सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/113, हदीस संख्या : 6313 तथा सहीह मुस्लिम 4/2081, हदीस संख्या : 2710।

रात को जब करवट बदले तो यह दुआ पढ़े। मुसतदरक हाकिम 1/540 हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है।, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 202 तथा इब्न अस-सुन्नी, हदीस संख्या : 757। तथा देखिए : सहीह अल-जामे 4/213।

सुनन अबू दाऊद 4/12 हदीस संख्या : 3893 तथा सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3528। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/171।

सहीह मुस्लिम 4/1772, हदीस संख्या : 2261।

सहीह मुस्लिम 4/1773, 1773, हदीस संख्या : 2261 तथा 2262।

सहीह मुस्लिम 4/1772 हदीस संख्या : 2261 तथा 2263।

सहीह मुस्लिम 4/1773, हदीस संख्या : 2261।

सहीह मुस्लिम 4/1773, हदीस संख्या : 2263।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 1425, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 464, सुनन नसई हदीस संख्या : 1744, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1178, मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 1718, दारिमी हदीस संख्या : 1592, हाकिम 3/172 और बैहक़ी 2/209। दोनों कोष्ठकों के बीच के शब्द बैहक़ी के हैं। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/144, सहीह इब्न-ए-माजा 1/194 तथा अलबानी की किताब इरवा अल-ग़लील 2/172।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 1427, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3566, सुनन नसई हदीस संख्या : 1746, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1179 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 751। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/180, सहीह इब्न-ए-माजा 1/194 तथा इरवा अल-ग़लील 2/175।

इसे बैहक़ी ने अस-सुनन अल-कुबरा 2/211 में नक़ल किया है और इसकी सनद को सही कहा है। जबकि अलबानी ने इरवा अल-ग़लील 2/170 में कहा है : "यह सनद सही है।" हालाँकि यह उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- का कथन ही है।

सुनन नसई 3/244, हदीस संख्या : 1734 तथा दारक़ुतनी 2/31 आदि। दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग दारक़ुतनी 2/31, हदीस संख्या : 2 से लिया गया है और उसकी सनद सहीह है। देखिए : ज़ाद अल-मआद 1/337, शोऐब अरनाऊत तथा अब्दुल क़ादिर अरनाऊत के अनुसंधान के साथ।

मुसनद-ए-अहमद 1/391, हदीस संख्या : 3712, अलबानी सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा 1/337 में इसे सहीह कहा है।

सहीह बुख़ारी 7/158, हदीस संख्या : 2893, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- यह दुआ बहुत ज़्यादा पढ़ा करते थे। देखिए : सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/173। यह हदीस आगे भी पृष्ठ : 89 में हदीस संख्या : 137 के तहत आएगी।

सहीह बुख़ारी 7/154 हदीस संख्या : 6345 तथा सहीह मुस्लिम 4/2092, हदीस संख्या : 2730।

सुनन अबू दाऊद 4/324 हदीस संख्या : 5090 तथा अहमद 5/42 हदीस संख्या : 20430, अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/959 में हसन कहा है।

सुनन तिरमिज़ी 5/529, हदीस संख्या : 3505 तथा मुसतदरक हाकिम 1/505। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। तथा देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/168।

सुनन अबू दाऊद 2/87 हदीस संख्या : 1525 तथा इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 3882। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/335।

सुनन अबू दाऊद 2/89, हदीस संख्या : 1537। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। देखिए : मुसतदरक हाकिम 2/142।

सुनन अबू दाऊद 3/42, हदीस संख्या : 2632 तथा सुनन तिरमिज़ी 5/572, हदीस संख्या : 3584। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/183।

सहीह बुख़ारी 5/172, हदीस संख्या : 4563।

इमाम बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद 707। अलबानी ने इसे सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद, हदीस संख्या : 545 में सहीह कहा है।

अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या :708। अलबानी ने सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 546 में इसे सहीह कहा है।

सहीह मुस्लिम 3/1362, हदीस संख्या : 1742।

सहीह मुस्लिम 4/2300, हदीस संख्या : 3005।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/336, हदीस संख्या : 3276 तथा सहीह मुस्लिम 1/120, हदीस संख्या : 134।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/336, हदीस संख्या : 3276 तथा सहीह मुस्लिम 1/120, हदीस संख्या : 134।

सहीह मुस्लिम 1/119-120, हदीस संख्या : 134।

सूरा अल-हदीद आयत संख्या : 3। सुनन अबू दाऊद 4/329, हदीस संख्या : 5110। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/962 में सहीह कहा है।

सुनन तिरमिज़ी 5/560। हदीस संख्या :3563। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/180।

सहीह बुख़ारी 7/158, हदीस संख्या : 2893। यह हदीस पहले भी पृष्ठ : 83 में हदीस संख्या : 121 के तहत गुज़र चुकी है।

सहीह मुस्लिम 4/1729, हदीस संख्या : 2203। वर्णनकर्ता उसमान बिन अबू अल-आस -रज़ियल्लाहु अनहु- हैं। इसमें उनका यह कथन भी है कि मैंने ऐसा किया, तो अल्लाह की कृपा से बुरे ख़याल दूर हो गए।

सहीह इब्न-ए-हिब्बान, हदीस संख्या : 2427 (मवारिद) तथा इब्न अस-सुन्नी, हदीस संख्या : 351। हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर कहते हैं : "यह एक सहीह हदीस है।" अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने भी इसे इमाम नववी की अल-अज़कार की हदीसों को संदर्भित करने के क्रम में पृष्ठ संख्या : 106 में सहीह कहा है।

सुनन अबू दाऊद 2/86, हदीस संख्या : 1521 और सुनन तिरमिज़ी 2/257, हदीस संख्या : 406। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/283 में सहीह कहा है।

सुनन अबू दाऊद 1/203 तथा सुनन इब्न-ए-माजा 1/265, हदीस संख्या : 807। पीछे पृष्ठ संख्या : 31 के तहत इसके संदर्भों का उल्लेख किया जा चुका है। देखिए : सूरा अल-मोमिनून, आयत संख्या : 97-98।

सहीह मुस्लिम 1/291, हदीस संख्या : 389 तथा सहीह बुख़ारी 1/151, हदीस संख्या : 608।

"तुम अपने घरों को क़ब्रिस्तान न बनाओ। निस्संदेह शैतान उस घर से दूर भागता है, जिसमें सूरा अल-बक़रा पढ़ी जाए।" सहीह बुख़ारी 1/539, हदीस संख्या : 780। इसी तरह सुबह एवं शाम, सोने तथा जागने, घर में प्रवेश करने तथा घर से बाहर निकलने और मस्जिद के अंदर जाने और उससे बाहर निकलने आदि के अज़कार, तथा इनके अतिरिक्त अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सिखाए हुए अन्य अज़कार, जैसे सोते समय आयत अल-कुर्सी एवं सूरा अल-बक़रा की अंतिम दो आयतों का पढ़ना आदि भी शैतान को भगाने का काम करते हैं। इसी तरह जिसने सौ बार "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह सब कुछ करने की क्षमता रखता है।" पढ़ा, उसे दिन भर के लिए शैतान से सुरक्षा मिल जाती है। इसी तरह अज़ान भी शैतान को भगाने का काम करती है।

“शक्तिशाली मोमिन कमज़ोर मोमिन के मुकाबले में अल्लाह के समीप अधिक बेहतर तथा प्रिय है। किंतु, प्रत्येक के अंदर भलाई है। जो चीज तुम्हारे लिए लाभदायक हो, उसके लिए तत्पर रहो और अल्लाह की मदद माँगो तथा असमर्थता न दिखाओ। फिर यदि तुम्हें कोई विपत्ति पहुँचे, तो यह न कहो कि यदि मैंने ऐसा किया होता, तो ऐसा और ऐसा होता। बल्कि यह कहो कि अल्लाह ने ऐसा ही भाग्य में लिख रखा था और वह जो चाहता है, करता है। क्योंकि ‘अगर’ शब्द शैतान के कार्य का द्वार खोलता है।” सहीह मुस्लिम 4/2052, हदीस संख्या : 2664।

इसे हसन बसरी के कथन के रूप में बयान किया जाता है। देखिए : इब्न अल-क़य्यिम की किताब तोहफ़ा अल-मौदूद पृष्ठ : 20। जबकि अल-औसत में इसे इब्न अल-मुंज़िर के हवाले से नक़ल किया गया है।

यह बात नववी ने अल-अज़कार पृष्ठ : 349 में कही है। तथा देखिए : सलीम हिलाली की सहीह अल-अज़कार 2/713 तथा इस किताब में लेखक की किताब तमाम अत-तख़रीज फ़ी अज़-ज़िक्र व अद-दुआ व अल-इलाज बि-अर-रुक़ा 1/ 416।

सहीह बुख़ारी 4/119, हदीस संख्या : 3371, वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- हैं।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/282, हदीस संख्या : 796।

"जब कोई मुसलमान किसी बीमार व्यक्ति का, जिसकी मृत्यु का समय न आया हो, हाल जानने और उसे ढारस देने के लिए उसके पास जाता है और सात बार यह दुआ पढ़ता है : ... तो उसे स्वास्थ्य लाभ हो जाता है।" सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 2083 तथा सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3106। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 2/210, तथा सहीह अल-जामे 5/180।

सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 969, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1442 और मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 975। देखिए सहीह इब्न-ए-माजा 1/244 तथा सहीह तिरमिज़ी 1/286। अहमद शाकिर ने भी इसे सहीह कहा है।

सहीह बुख़ारी 7/10 हदीस संख्या : 4435 तथा सहीह मुस्लिम 4/1893 हदीस संख्या : 2444।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 8/144 हदीस संख्या : 4449। इस हदीस में मिसवाक का उल्लेख है।

सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3430, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3794। अलबानी ने इसे सहीह तिरमिज़ी 3/152 और सहीह इब्न-ए-माजा 2/317 में सहीह कहा है।

सुनन अबू दाऊद 3/190, हदीस संख्या : 3116। देखिए : सहीह अल-जामे 5/432।

सहीह मुस्लिम 2/632, हदीस संख्या : 918।

सहीह मुस्लिम 2/634, हदीस संख्या : 920।

सहीह मुस्लिम 2/663, हदीस संख्या : 963।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 3201, तिरमिज़ी : 1024, नसई : 1985, इब्न-ए-माजा 1/480, हदीस संख्या : 1498 तथा मुसनद-ए-अहमद 2/368, हदीस संख्या : 8809। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/251।

सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1499। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/251। सुनन अबू दाऊद 3/211, हदीस संख्या : 3202।

मुसतदरक हाकिम 1/359। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। देखिए : अलबानी की किताब अहकाम अल-जनाइज़ पृष्ठ : 125।

सईद बिन मुसय्यिब कहते हैं : "मैंने अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- के पीछे एक ऐसे बच्चे की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी, जिसने कभी कोई गुनाह नहीं किया था, इसके बावजूद उन्होंने यह दुआ पढ़ी : ...।" देखिए : इमाम मालिक की अल-मुवत्ता 1/288, इब्न-ए-अबू शैबा की अल-मुसन्नफ़ 3/217 तथा बैहक़ी 4/9। शोऐब अरनाऊत ने शर्ह अस-सुन्नह के अनुसंधान 5/357 में इसकी सनद को सहीह कहा है।

देखिए : इब्न-ए-क़ुदामा की अल-मुग़नी 3/416 तथा शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ की किताब अद-दुरूस अल-मुहिम्मह लि-आम्मह अल-उम्मह पृष्ठ : 15।

हसन बच्चे पर सूरा फ़ातिहा पढ़ते और उसके बाद यह दुआ पढ़ते : ... इसे बग़वी ने शर्ह अस-सुन्नह 5/357 में तथा अब्दुर रज़्ज़ाक़ ने हदीस संख्या : 6558 के तहत नक़ल किया है। जबकि इमाम बुख़ारी ने इसे किताब अल-जनाइज़, अध्याय : क़िराअह फ़ातिहा अल-किताब अला अल-जनाज़ह 2/113 में, हदीस संख्या : 1335 से पहले तालीक़ करके नक़ल किया है।

सहीह बुख़ारी 2/80, हदीस संख्या : 1284 तथा सहीह मुस्लिम 2/636, हदीस संख्या : 923।

नववी की किताब अल-अज़कार पृष्ठ : 126।

सुनन अबू दाऊद 3/314, हदीस संख्या : 3215, सहीह सनद के साथ। इसी तरह मुसनद अहमद, हदीस संख्या : 5234 तथा 4812। उसके शब्द हैं : "بسم اللَّه، وعلى ملّة رسول اللَّه" इसकी सनद भी सहीह है।

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब मृतक को दफ़न करने का काम संपन्न कर लेते तो उसके पास खड़े हो जाते और फ़रमाते : "अपने भाई के लिए क्षमायाचना करो और उसके लिए सुदृढ़ रहने की दुआ करो। क्योंकि इस समय उससे प्रश्न किया जा रहा है।" सुनन अबू दाऊद 3/315, हदीस संख्या : 3223, तथा हाकिम 1/370। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है।

सहीह मुस्लिम 2/671, हदीस संख्या : 975 तथा इब्न-ए-माजा 1/494, हदीस संख्या : 1547। हदीस के वर्णनकर्ता बुरैदा -रज़ियल्लाहु अनहु- हैं और यहाँ नक़ल किए गए शब्द इब्न-ए-माजा से लिए गए हैं। जबकि दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग सहीह मुस्लिम 2/671, हदीस संख्या : 975 में लिया गया है और आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णित है।

सुनन अबू दाऊद 4/326 हदीस संख्या : 5099 तथा इब्न-ए-माजा 2/1228, हदीस संख्या : 3727। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/305।

सहीह मुस्लिम 2/666, हदीस संख्या : 899 तथा सहीह बुख़ारी 4/76, हदीस संख्या : 3206 एवं 4829। शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- जब बादल गरजने की आवाज़ सुनते, तो बात करना बंद कर देते और यह दुआ पढ़ते : ...। मुवत्ता 2/992। अलबानी सहीह अल-कलिम अत-तय्यिब पृष्ठ : 157 में कहते हैं : सहाबी के कथन के रूप में इसकी सनद सहीह है।

सुनन अबू दाऊद 1/303, हदीस संख्या : 1171, अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/216 में सहीह कहा है।

सहीह बुख़ारी 1/224, हदीस संख्या : 1014, तथा सहीह मुस्लिम 2/613, हदीस संख्या : 897।

सुनन अबू दाऊद 1/305, हदीस संख्या : 1178। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/218 में हसन कहा है।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/282, हदीस संख्या : 796।

सहीह बुख़ारी 1/205, हदीस संख्या : 846, तथा सहीह मुस्लिम 1/83, हदीस संख्या : 71।

सहीह बुख़ारी 1/224, हदीस संख्या : 933, तथा सहीह मुस्लिम 2/614, हदीस संख्या : 897।

सुनन तिरमिज़ी 5/504, हदीस संख्या : 3451, तथा सुनन दारिमी 1/336। शब्द दारिमी के हैं। देखिए : सहीह तिरमिज़ी : 3/157।

सुनन अबू दाऊद 2/306, हदीस संख्या :2359, आदि। देखिए : सहीह अल-जामे 4/209।

सुनन इब्न-ए-माजा 1/557, हदीस संख्या : 1753 में इसे अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- की दुआ के रूप में नक़ल किया गया है। हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर ने इसे अल-अज़कार की तख़रीज में हसन कहा है। देखिए : शर्ह अल-अज़कार 4/342।

सुनन अबू दाऊद 3/347, हदीस संख्या : 3767 तथा सुनन तिरमिज़ी 4/288, हदीस संख्या : 1858। देखिए सहीह तिरमिज़ी 2/167।

सुनन तिरमिज़ी 5/506, हदीस संख्या :3455, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/158।

इसे अबू दाऊद हदीस संख्या :4025, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3458 और इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3285 ने रिवायत किया है। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/159।

सहीह बुख़ारी 6/214, हदीस संख्या : 5458 और सुनन तिरमिजी 5/507, हदीस संख्या : 3456। शब्द सुनन तिरमिज़ी के हैं।

सहीह मुस्लिम 3/1615, हदीस संख्या : 2042।

सहीह मुस्लिम 3/1626, हदीस संख्या : 2055।

सुनन अबू दाऊद 3/367, हदीस संख्या : 3856, इब्न-ए-माजा 1/556, हदीस संख्या : 1747 तथा नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 296-298। यहाँ स्पष्ट रूप से यह बताया गया है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब किसी के यहाँ इफ़तार करते, तो यह दुआ पढ़ते थे। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 2/730 में सहीह कहा है।

सहीह मुस्लिम 2/1054, हदीस संख्या : 1150।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 4/103, हदीस संख्या : 1894, तथा सहीह मुस्लिम 2/806, हदीस संख्या : 1151।

सहीह मुस्लिम 2/1000, हदीस संख्या : 1373।

सहीह बुख़ारी 7/125, हदीस संख्या : 5870।

सुनन तिरमिज़ी 5/82, हदीस संख्या : 2741, मुसनद-ए-अहमद 4/400, हदीस संख्या : 19586 तथा अबू दाऊद 4/308, हदीस संख्या : 5040। देखिए : सहीह अबू दाऊद 2/354।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 2130, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 1091, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1905 तथा नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 259। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/316।

सुनन अबू दाऊद 2/248 हदीस संख्या : 2160 तथा इब्न-ए-माजा 1/617, हदीस संख्या 1918। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/324।

सहीह बुख़ारी 6/141, हदीस संख्या : 141 तथा सहीह मुस्लिम 2/1028, हदीस संख्या : 1434।

सहीह बुख़ारी 7/99 हदीस संख्या : 3282 तथा सहीह मुस्लिम 4/2015 हदीस संख्या : 2610।

सुनन तिरमिज़ी 5/494, 5/493, ददीस संख्या : 3432। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/153।

सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3434 तथा सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3814, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/153 और सहीह इब्न-ए-माजा 2/321। शब्द तिरमिज़ी के हैं।

सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 4858, सुनन तिरमिज़ी : 3433 और सुनन नसई हदीस संख्या : 1344। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/153। एक सहीह हदीस में है कि आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने फ़रमाया : "अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब भी किसी सभा में बैठते, क़ुरआन की तिलावत करते या कोई नमाज़ पढ़ते तो उसका अंत इन शब्दों द्वारा करते : ... " नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 308 तथा मुसनद-ए-अहमद 6/77, हदीस संख्या : 24486। इसे डॉ फ़ारूक़ हमादा ने नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह के अनुसंधान के दौरान सहीह कहा है। देखिए पृष्ठ : 273।

मुसनद-ए-अहमद 5/82, हदीस संख्या : 20778 तथा नसई की अमल अल-यौम व अल-लैलह, पृष्ठ : 218, हदीस संख्या : 421, अनुसंधान : डॉक्टर फ़ारूक़ हमादा।

सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 2035। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6244 तथा सहीह अत-तिरमिज़ी 2/200।

सहीह मुस्लिम 1/555, हदीस संख्या : 809। जबकि एक रिवायत में है : "सूरा अल-कह्फ़ के अंत से।" सहीह मुस्लिम 1/556, हदीस संख्या : 809।

देखिए : इस किताब की हदीस संख्या : 55 तथा 56, पृष्ठ : 41।

सुनन अबू दाऊद 4/333, हदीस संख्या : 5125। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/965 में सहीह कहा है।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/282, हदीस संख्या : 796।

नसई की अलम अल-यौम वल-लैलह, पृष्ठ : 300 तथा इब्न-ए-माजा 2/809, हदीस संख्या : 2424। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/55।

मुसनद-ए-अहमद 4/403, हदीस संख्या : 19606 तथा बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 716। देखिए : सहीह अल-जामे 3/233 तथा अलबानी की सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/19।

इब्न अस-सुन्नी, पृष्ठ : 138, हदीस संख्या : 278। देखिए : इब्न अल-क़य्यिम की अल-वाबिल अस-सय्यिब, पृष्ठ : 304, अनुसंधान : बशीर मुहम्मद अयून।

मुसनद-ए-अहमद 2/220, हदीस संख्या : 7045 तथा इब्न अस-सुन्नी, हदीस संख्या : 292। अलबानी ने इसे अस-सिलसिला अस-सहीहा 3/54, हदीस संख्या : 1065 में सहीह कहा है। अल्लाह के रसूल को शगुन पसंद था। यही एक कारण है कि आपने एक व्यक्ति से एक अच्छी बात सुनी, जो आपके मन को भा गई, तो फ़रमाया : "हमने तेरे मुँह से तेरा शगुन ले लिया।" सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3719 तथा मुसनद-ए-अहमद, हदीस संख्या : 9040। अलबानी ने इसे अस-सिलसिला अस-सहीहा 2/363 में अबू अश-शैख़ की कितबा अख़लाक़ अन-नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, पृष्ठ : 270 के हवाले से सहीह कहा है।

सुनन अबू दाऊद 3/34, हदीस संख्या : 2602 तथा सुनन तिरमिज़ी 5/501, हदीस संख्या : 3446। देखिए : सहीह तिरमिजी 3/156। दोनों आयतों के लिए देखिए : सूरा अज़-ज़ुख़रुफ़, आयत संख्या : 13-14।

सहीह मुस्लिम 2/978, हदीस संख्या : 1342।

मुसतदरक हाकिम 2/100, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 524। जबकि हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर ने तख़रीज अल-अज़कार 5/154 में हसन कहा है। शैख़ बिन बाज़ कहते हैं : "नसई ने इसे हसन सनद से रिवायत किया है।" देखिए : तोहफ़ा अल-अख़यार, पृष्ठ : 37।

सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 3428, इब्न-ए-माजा 5/291, हदीस संख्या : 3860 तथा हाकिम 1/538। अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/21 तथा सहीह तिरमिज़ी 3/152 में हसन कहा है।

सुनन अबू दाऊद 4/296, हदीस संख्या : 4982। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/941 में सहीह कहा है।

मुसनद-ए-अहमद 2/403, हदीस : 9230 तथा इब्न-ए-माजा 2/943, हदीस संख्या : 2825। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/133।

मुसनद-ए-अहमद 2/7, हदीस संख्या : 4524 और सुनन तिरमिज़ी 5/499, हदीस संख्या : 3443। अलबानी ने इसे सहीह सुनन तिरमिज़ी 3/419 में सहीह कहा है।

सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 3444। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/155।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/282, हदीस संख्या : 796।

सहीह मुस्लिम 4/2086, हदीस संख्या : 2718। इस हदीस में आए हुए शब्द "سَمعَ سامِعٌ" को दो तरह से पढ़ा गया है। एक "سَمِعَ سامعٌ", जिसका अर्थ है, एक गवाही देने वाले ने हमारे द्वारा अल्लाह की नेमतों पर उसकी प्रशंसा किए जाने और नेमतों द्वारा उसके हमारी परीक्षा लेने की गवाही दी। दूसरे "سَمَّعَ سامِعٌ" का अर्थ है, एक सुनने वाले ने हमारे इस कथन को दूसरे तक पहुँचाया। दरअसल अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस तरह की बात भोर के समय ज़िक्र तथा दुआ के महत्व को इंगित करने के लिए कही है। शर्ह अन-नववी अला सहीह मुस्लिम 17/39।

सहीह मुस्लिम 4/2080, हदीस संख्या : 2709।

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब किसी युद्ध या हज से लौटते, तो यह दुआ कहते थे। सहीह बुख़ारी 7/163, हदीस संख्या : 1797 तथा सहीह मुस्लिम 2/980, हदीस संख्या : 1344।

इब्न अस-सुन्नी की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 377 तथा मुसतदरक हाकिम 1/499। अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 4/201 में सहीह कहा है।

सहीह मुस्लिम 1/288, हदीस संख्या :384।

सुनन अबू दाऊद 2/218, हदीस संख्या : 2044 तथा अहमद 2/367, हदीस संख्या : 8804। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 2/383 में सहीह कहा है।

सुनन तिरमिज़ी 5/551, हदीस संख्या : 3546 आदि। देखिए : सहीह अल-जामे 3/25 तथा सहीह अत-तिरमिज़ी 3/177।

सुनन नसई 3/43, हदीस संख्या : 1282 तथा हाकिम 2/421। अलबानी ने इसे सहीह नसई 1/274 में सहीह कहा है। .

अबू दाऊद हदीस संख्या : 2041। अलबानी ने सहीह अबू दाऊद 1/383 में इसे हसन कहा है।

सहीह मुस्लिम 1/74, हदीस संख्या : 54 तथा मुसनद-ए-अहमद, हदीस संख्या : 1430। शब्द मुसनद-ए-अहमद के हैं। जबकि सहीह मुस्लिम के शब्द हैं : "तुम जन्नत में उस समय तक प्रवेश नहीं कर सकते..."

इमाम बुख़ारी ने इसे अपनी सहीह 1/82 हदीस संख्या : 28 में अम्मार बिन यासिर -रज़ियल्लाहु अनहु- से सहाबी के कथन में रूप में बिना सनद के नक़ल किया है।

सहीह बुख़ारी 1/55, हदीस संख्या : 12 तथा सहीह मुस्लिम 1/65 हदीस संख्या : 39।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/42, हदीस संख्या : 6258 तथा सहीह मुस्लिम 4/1705, हदीस संख्या : 2163।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/350 हदीस संख्या : 3303 और सहीह मुस्लिम 4/2092 हदीस संख्या : 2729।

सुनन अबू दाऊद 4/327 हदीस संख्या : 5105 तथा अहमद 3/306, हदीस संखअया : 14283। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/961 में सहीह कहा है।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/171, हदीस संख्या : 6361 तथा सहीह मुस्लिम 4/2007, हदीस संख्या : 396। सहीह मुस्लिम के शब्द हैं : "उसे उसके लिए परिशुद्धता एवं कृपा का साधन बना दे।"

सहीह मुस्लिम 4/2296, हदीस संख्या : 3000।

बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद, हदीस संख्या : 761। अलबानी ने इसे सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद, हदीस संख्या : 585 में सहीह कहा है। दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग बैहक़ी की शोअब अल-ईमान 4/228 से लिया गया है और एक अन्य सनद से वर्णित है।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/408, हदीस संख्या :1549 तथा सहीह मुस्लिम 2/841, हदीस संख्या 1184।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/476, हदीस संख्या : 1613। यहाँ जिस चीज़ से इशारा करने की बात कही गई है, उससे मुराद नेज़ा है। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी 3/472।

सुनन अबू दाऊद 2/179, हदीस संख्या : 1894, मुसनद-ए-अहमद 3/411, हदीस संख्या : 15398 और बग़वी की शर्ह अस-सुन्नह 7/354। आयत के लिए देखिए : सूरा अल-बक़रा आयत संख्या : 201।

सहीह मुस्लिम 2/888, हदीस संख्या : 1218। आयत के लिए देखिए : सूरा अल-बक़रा आयत संख्या : 158।

सुनन तिरमिज़ी, दीस संख्या : 3585। अलबानी ने इस सहीह तिरमिज़ी 3/184 तथा सिलसिला सहीहा 4/6 में हसन कहा है।

सहीह मुस्लिम 2/891, हदीस संख्या : 1218।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/583, हदीस संख्या : 1751। यहाँ लाए गए शब्द यहीं से लिए गए हैं। तथा सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/583, 3/584, 3/581, हदीस संख्या : 1753। इमाम मुस्लिम ने भी इसे रिवायत किया है। देखिए हदीस संख्या : 1218।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 1/210, 390, 414, हदीस संख्या : 115, 3599 एवं 6218 और सहीह मुस्लिम 4/ 1857 हदीस संख्या : 1674।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 8/441, हदीस संख्या : 4741 तथा 3092, सुनन तिरमिज़ी : 2180 तथा नसई की अल-कुबरा हदीस संख्या : 11185। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 2/103 एवं 2/235 तथा मुसनद-ए-अहमद 5/218, हदीस संख्या : 21900।

अबू दाऊद हदीस संख्या : 2774, तिरमिज़ी हदीस संख्या :1578, इब्न-ए-माजा हदीस संख्या :1394। देखिए : सहीह अब्न-ए-माजा 1/233 तथा इरवा अल-ग़लील 2/226।

सहीह मुस्लिम 4/1728, हदीस संख्या : 2202।

मुसनद-ए-अहमद 4/447, हदीस संख्या : 15700, इब्न-ए-माजा, ददीस संख्या : 3508 तथा मालिक 3/118-119। अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 1/212 में सहीह कहा है। देखिए अरनाऊत द्वारा संपादित ज़ाद अल-मआद की अनुसंधानयुक्त प्रति 4/170।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/381, हदीस संख्या : 3346 तथा सहीह मुस्लिम 4/2208, हदीस संख्या :2880।

सहीह मुस्लिम 3/1557, हदीस संख्या : 1967 तथा बैहक़ी 9/287। दोनों कोषठकों के बीच का भाग बैहक़ी 9/287 आदि से लिया गया है। जबकि अंतिम वाक्य को मैंने सहीह मुस्लिम की रिवायत से लिया है लेकिन केवल अर्थ लिया है शब्द नहीं।

मुसनद-ए-अहमद 3/419, दीस संख्या : 15461, सहीह सनद के साथ। इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 637। इसकी सनद को अरनाऊद ने अत-तहाविया की अनुसंधानयुक्त प्रति पृष्ठ : 133 में सहीह कहा है। देखिए : मजमा अज़-ज़वाइद 10/127।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/282, हदीस संख्या : 796।

सहीह मुस्लिम 4/2076, हदीस संख्या : 2702।

सुनन अबू दाऊद 2/85, हदीस संख्या : 1517, तिरमिज़ी 5/569, हदीस संख्या : 3577 और मुसतदरक हाकिम 1/511। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त कही है। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/182 तथा जामे अल-उसूल लि-अहादीस अर-रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, अरनाऊत के अनुसंधान के साथ 4/389-390।

सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 3579, सुनन नसई 1/279, हदीस संख्या : 572 और हाकिम 1/309। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/183 तथा जामे अल-उसूल लि-अहादीस अर-रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, अरनाऊत के अनुसंधा के साथ 4/144।

सहीह मुस्लिम 1/350, हदीस संख्या : 482।

सहीह मुस्लिम 4/2075, हदीस संख्या : 2702, इब्न अल-असीर कहते हैं : : "ليُغان على قلبي" का अर्थ है, मेरे दिल पर पर्दा डाल दिया जाता है और उसे ढाँप दिया जाता है। दरअसल इससे मुराद ग़फ़लत है। क्योंकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमेशा अल्लाह के ज़िक्र, उससे निकटता की प्राप्ति के फ़िक्र और उसके ध्यान में लीन रहते थे। अतः, इस संबंध में कभी ज़रा सी भी ग़फ़लत होती, तो उसे पाप समझते हुए क्षमा याचना करने लगते। देखिए : जामे अल-उसूल 4/386।

सहीह बुख़ारी 7/168, हदीस संख्या : 6405 तथा सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या : 2691। देखिए : इसी किताब की पृष्ठ संख्या : 65।

सहीह बुख़ारी 7/67, हदीस संख्या : 6404 तथा सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या : 2693 यहाँ शब्द मुस्लिम के हैं। देखिए : इस किताब की दुआ संख्या : 93, पृष्ठ : 66।

सहीह बुख़ारी 7/168 हदीस संख्या :6404 तथा सहीह मुस्लिम 4/2072 हदीस संख्या :2694।

सहीह मुस्लिम 4/2072, हदीस संख्या : 2695।

सहीह मुस्लिम 4/2073, हदीस संख्या : 2698।

सुनन तिरमिज़ी 5/511, हदीस संख्या : 3464 तथा मुसतदरक हाकिम 1/501। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। देखिए : सहीह अल-जामे 5/531 तथा सहीह तिरमिज़ी 3/160।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/213, हदीस संख्या :4206 और सहीह मुस्लिम 4/2076, हदीस संख्या :2704।

सहीह मुस्लिम 3/1685, हदीस संख्या : 2137।

सहीह मुस्लिम 4/2072, हदीस संख्या : 2696। जबकि अबू दाऊद 1/220 हदीस संख्या : 832 में यह वृद्धि है : जब वह देहाती जाने लगा, तो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "इसने अपने हाथ को भलाई से भर लिया।"

सहीह मुस्लिम 4/2073, हदीस संख्या : 3697। जबकि एक रिवायत में है : "ये वाक्य तुम्हारे लिए दुनिया एवं आख़िरत दोनों को एकत्र कर देंगे।"

सुनन तिरमिज़ी 5/462, हदीस संख्या : 3383, इब्न-ए-माजा 2/1249, हदीस संख्या : 3800 तथा हाकिम 1/503। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। देखिए : सहीह अल-जामे 1/362।

मुसनद-ए-अहमद, हदीस संख्या : 513, अहमद शाकिर की तरतीब के साथ। देखिए : मजमा अज़-ज़वाइद 1/297। इब्न-ए-हजर ने इसे बुलूग़ अल-मराम में अबू सईद की रिवायत से नसई (की अल-कुबरा : 10617) की ओर मंसूब किया है और उसके बाद कहा है : इसे इब्-ए-हिब्बान [हदीस संख्या : 840] और हाकिम [1/541] ने सहीह कहा है।

सुनन अबू दाऊद 2/81, हदीस संख्या : 1502 तथा सुनन तिरमिज़ी 5/521, हदीस संख्या : 3486। देखिए : सहीह अल-जामे 1/271, हदीस संख्या : 4865। यहाँ आए हुए शब्द सुनन अबू दाऊद के हैं। देखिए : सहीह अल-जामे 4/271, हदीस संख्या : 4865। अलबानी ने इसे सहीह सुनन अबू दाऊद 1/411 में सहीह कहा है।

सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/88, हदीस संख्या : 5623 तथा सहीह मुस्लिम 3/1595, हदीस संख्या : 2012।

असल किताब, उसमें उल्लिखित हदीसों के संदर्भों के विस्तृत रूप से उल्लेख के साथ चार खंडों में छप चुकी है। उसके प्रथम एवं द्वितीय खंड में "हिस्न अल-मुस्लिम" मौजूद है।